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35. vātaśōṇitacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো বাতশোণিতচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातो वातशोणितचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-11) · Śloka 11

হুতাগ্নিহোত্রমাসীনমৃষিমধ্যে পুনর্বসুম্| পৃষ্টবান্ গুরুমেকাগ্রমগ্নিবেশোঽগ্নিবর্চসম্||৩|| অগ্নিমারুততুল্যস্য সংসর্গস্যানিলাসৃজোঃ| হেতুলক্ষণভৈষজ্যান্যথাস্মৈ গুরুরব্রবীত্||৪|| লবণাম্লকটুক্ষারস্নিগ্ধোষ্ণাজীর্ণভোজনৈঃ| ক্লিন্নশুষ্কাম্বুজানূপমাংসপিণ্যাকমূলকৈঃ||৫|| কুলত্থমাষনিষ্পাবশাকাদিপললেক্ষুভিঃ| দধ্যারনালসৌবীরশুক্ততক্রসুরাসবৈঃ||৬|| বিরুদ্ধাধ্যশনক্রোধদিবাস্বপ্নপ্রজাগরৈঃ| প্রাযশঃ সুকুমারাণাং মিষ্টান্নসুখভোজিনাম্ ||৭|| অচঙ্ক্রমণশীলানাং কুপ্যতে বাতশোণিতম্| অভিঘাতাদশুদ্ধ্যা চ প্রদুষ্টে শোণিতে নৃণাম্||৮|| কষাযকটুতিক্তাল্পরূক্ষাহারাদভোজনাত্| হযোষ্ট্রযানযানাম্বুক্রীডাপ্লবনলঙ্ঘনৈঃ ||৯|| উষ্ণে চাত্যধ্ববৈষম্যাদ্ব্যবাযাদ্বেগনিগ্রহাত্ | বাযুর্বিবৃদ্ধো বৃদ্ধেন রক্তেনাবারিতঃ পথি||১০|| কৃত্স্নং সন্দূষযেদ্রক্তং তজ্জ্ঞেযং বাতশোণিতম্| খুডং বাতবলাসাখ্যমাঢ্যবাতং চ নামভিঃ||১১||

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हुताग्निहोत्रमासीनमृषिमध्ये पुनर्वसुम्| पृष्टवान् गुरुमेकाग्रमग्निवेशोऽग्निवर्चसम्||३|| अग्निमारुततुल्यस्य संसर्गस्यानिलासृजोः| हेतुलक्षणभैषज्यान्यथास्मै गुरुरब्रवीत्||४|| लवणाम्लकटुक्षारस्निग्धोष्णाजीर्णभोजनैः| क्लिन्नशुष्काम्बुजानूपमांसपिण्याकमूलकैः||५|| कुलत्थमाषनिष्पावशाकादिपललेक्षुभिः| दध्यारनालसौवीरशुक्ततक्रसुरासवैः||६|| विरुद्धाध्यशनक्रोधदिवास्वप्नप्रजागरैः| प्रायशः सुकुमाराणां मिष्टान्नसुखभोजिनाम् ||७|| अचङ्क्रमणशीलानां कुप्यते वातशोणितम्| अभिघातादशुद्ध्या च प्रदुष्टे शोणिते नृणाम्||८|| कषायकटुतिक्ताल्परूक्षाहारादभोजनात्| हयोष्ट्रयानयानाम्बुक्रीडाप्लवनलङ्घनैः ||९|| उष्णे चात्यध्ववैषम्याद्व्यवायाद्वेगनिग्रहात् | वायुर्विवृद्धो वृद्धेन रक्तेनावारितः पथि||१०|| कृत्स्नं सन्दूषयेद्रक्तं तज्ज्ञेयं वातशोणितम्| खुडं वातबलासाख्यमाढ्यवातं च नामभिः||११||

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Adhikarana 3 (12-15) · Śloka 15

তস্য স্থানং করৌ পাদাবঙ্গুল্যঃ সর্বসন্ধযঃ| কৃত্বাঽঽদৌ হস্তপাদে তু মূলং দেহে বিধাবতি||১২|| সৌক্ষ্ম্যাত্ সর্বসরত্বাচ্চ পবনস্যাসৃজস্তথা| তদ্দ্রবত্বাত্ সরত্বাচ্চ দেহং গচ্ছন্ সিরাযনৈঃ||১৩|| পর্বস্বভিহতং ক্ষুব্ধং বক্রত্বাদবতিষ্ঠতে| স্থিতং পিত্তাদিসংসৃষ্টং তাস্তাঃ সৃজতি বেদনাঃ||১৪|| করোতি দুঃখং তেষ্বেব তস্মাত্ প্রাযেণ সন্ধিষু| ভবন্তি বেদনাস্তাস্তা অত্যর্থং দুঃসহা নৃণাম্||১৫||

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तस्य स्थानं करौ पादावङ्गुल्यः सर्वसन्धयः| कृत्वाऽऽदौ हस्तपादे तु मूलं देहे विधावति||१२|| सौक्ष्म्यात् सर्वसरत्वाच्च पवनस्यासृजस्तथा| तद्द्रवत्वात् सरत्वाच्च देहं गच्छन् सिरायनैः||१३|| पर्वस्वभिहतं क्षुब्धं वक्रत्वादवतिष्ठते| स्थितं पित्तादिसंसृष्टं तास्ताः सृजति वेदनाः||१४|| करोति दुःखं तेष्वेव तस्मात् प्रायेण सन्धिषु| भवन्ति वेदनास्तास्ता अत्यर्थं दुःसहा नृणाम्||१५||

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Adhikarana 4 (16-18) · Śloka 18

স্বেদোঽত্যর্থং ন বা কার্ষ্ণ্যং স্পর্শাজ্ঞত্বং ক্ষতেঽতিরুক্| সন্ধিশৈথিল্যমালস্যং সদনং পিডকোদ্গমঃ||১৬|| জানুজঙ্ঘোরুকট্যংসহস্তপাদাঙ্গসন্ধিষু| নিস্তোদঃ স্ফুরণং ভেদো গুরুত্বং সুপ্তিরেব চ||১৭|| কণ্ডূঃ সন্ধিষু রুগ্ভূত্বা ভূত্বা নশ্যতি চাসকৃত্| বৈবর্ণ্যং মণ্ডলোত্পত্তির্বাতাসৃক্পূর্বলক্ষণম্||১৮||

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स्वेदोऽत्यर्थं न वा कार्ष्ण्यं स्पर्शाज्ञत्वं क्षतेऽतिरुक्| सन्धिशैथिल्यमालस्यं सदनं पिडकोद्गमः||१६|| जानुजङ्घोरुकट्यंसहस्तपादाङ्गसन्धिषु| निस्तोदः स्फुरणं भेदो गुरुत्वं सुप्तिरेव च||१७|| कण्डूः सन्धिषु रुग्भूत्वा भूत्वा नश्यति चासकृत्| वैवर्ण्यं मण्डलोत्पत्तिर्वातासृक्पूर्वलक्षणम्||१८||

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Adhikarana 5 (19-23) · Śloka 23

উত্তানমথ গম্ভীরং দ্বিবিধং তত্ প্রচক্ষতে| ত্বঙ্মাংসাশ্রযমুত্তানং গম্ভীরং ত্বন্তরাশ্রযম্||১৯|| কণ্ডূদাহরুগাযামতোদস্ফুরণকুঞ্চনৈঃ| অন্বিতা শ্যাবরক্তা ত্বগ্বাহ্যে তাম্রা তথেষ্যতে||২০|| গম্ভীরে শ্বযথুঃ স্তব্ধঃ কঠিনোঽন্তর্ভৃশার্তিমান্| শ্যাবস্তাম্রোঽথবা দাহতোদস্ফুরণপাকবান্||২১|| রুগ্বিদাহান্বিতোঽভীক্ষ্ণং বাযুঃ সন্ধ্যস্থিমজ্জসু| ছিন্দন্নিব চরত্যন্তর্বক্রীকুর্বংশ্চ বেগবান্||২২|| করোতি খঞ্জং পঙ্গুং বা শরীরে সর্বতশ্চরন্| সর্বৈর্লিঙ্গৈশ্চ বিজ্ঞেযং বাতাসৃগুভযাশ্রযম্||২৩||

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उत्तानमथ गम्भीरं द्विविधं तत् प्रचक्षते| त्वङ्मांसाश्रयमुत्तानं गम्भीरं त्वन्तराश्रयम्||१९|| कण्डूदाहरुगायामतोदस्फुरणकुञ्चनैः| अन्विता श्यावरक्ता त्वग्बाह्ये ताम्रा तथेष्यते||२०|| गम्भीरे श्वयथुः स्तब्धः कठिनोऽन्तर्भृशार्तिमान्| श्यावस्ताम्रोऽथवा दाहतोदस्फुरणपाकवान्||२१|| रुग्विदाहान्वितोऽभीक्ष्णं वायुः सन्ध्यस्थिमज्जसु| छिन्दन्निव चरत्यन्तर्वक्रीकुर्वंश्च वेगवान्||२२|| करोति खञ्जं पङ्गुं वा शरीरे सर्वतश्चरन्| सर्वैर्लिङ्गैश्च विज्ञेयं वातासृगुभयाश्रयम्||२३||

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Adhikarana 6 (24-29) · Śloka 29

তত্র বাতেঽধিকে বা স্যাদ্রক্তে পিত্তে কফেঽপি বা| সংসৃষ্টেষু সমস্তেষু যচ্চ তচ্ছৃণু লক্ষণম্||২৪|| বিশেষতঃ সিরাযামশূলস্ফুরণতোদনম্ | শোথস্য কার্ষ্ণ্যং রৌক্ষ্যং চ শ্যাবতাবৃদ্ধিহানযঃ||২৫|| ধমন্যঙ্গুলিসন্ধীনাং সঙ্কোচোঽঙ্গগ্রহোঽতিরুক্| কুঞ্চনস্তম্ভনে শীতপ্রদ্বেষশ্চানিলেঽধিকে||২৬|| শ্বযথুর্ভৃশরুক্ তোদস্তাম্রশ্চিমিচিমাযতে| স্নিগ্ধরূক্ষৈঃ শমং নৈতি কণ্ডূক্লেদান্বিতোঽসৃজি ||২৭|| বিদাহো বেদনা মূর্চ্ছা স্বেদস্তৃষ্ণা মদো ভ্রমঃ| রাগঃ পাকশ্চ ভেদশ্চ শোষশ্চোক্তানি পৈত্তিকে||২৮|| স্তৈমিত্যং গৌরবং স্নেহঃ সুপ্তির্মন্দা চ রুক্ কফে| হেতুলক্ষণসংসর্গাদ্বিদ্যাদ্দ্বন্দ্বত্রিদোষজম্||২৯||

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तत्र वातेऽधिके वा स्याद्रक्ते पित्ते कफेऽपि वा| संसृष्टेषु समस्तेषु यच्च तच्छृणु लक्षणम्||२४|| विशेषतः सिरायामशूलस्फुरणतोदनम् | शोथस्य कार्ष्ण्यं रौक्ष्यं च श्यावतावृद्धिहानयः||२५|| धमन्यङ्गुलिसन्धीनां सङ्कोचोऽङ्गग्रहोऽतिरुक्| कुञ्चनस्तम्भने शीतप्रद्वेषश्चानिलेऽधिके||२६|| श्वयथुर्भृशरुक् तोदस्ताम्रश्चिमिचिमायते| स्निग्धरूक्षैः शमं नैति कण्डूक्लेदान्वितोऽसृजि ||२७|| विदाहो वेदना मूर्च्छा स्वेदस्तृष्णा मदो भ्रमः| रागः पाकश्च भेदश्च शोषश्चोक्तानि पैत्तिके||२८|| स्तैमित्यं गौरवं स्नेहः सुप्तिर्मन्दा च रुक् कफे| हेतुलक्षणसंसर्गाद्विद्याद्द्वन्द्वत्रिदोषजम्||२९||

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Adhikarana 7 (30-34) · Śloka 34

একদোষানুগং সাধ্যং নবং, যাপ্যং দ্বিদোষজম্| ত্রিদোষজমসাধ্যং স্যাদ্যস্য চ স্যুরুপদ্রবাঃ||৩০|| অস্বপ্নারোচকশ্বাসমাংসকোথশিরোগ্রহাঃ| মূর্চ্ছাযমদরুক্তৃষ্ণাজ্বরমোহপ্রবেপকাঃ||৩১|| হিক্কাপাঙ্গুল্যবীসর্পপাকতোদভ্রমক্লমাঃ| অঙ্গুলীবক্রতা স্ফোটা দাহমর্মগ্রহার্বুদাঃ||৩২|| এতৈরুপদ্রবৈর্বর্জ্যং মোহেনৈকেন বাঽপি যত্| সম্প্রস্রাবি বিবর্ণং চ স্তব্ধমর্বুদকৃচ্চ যত্||৩৩|| বর্জযেচ্চৈব সঙ্কোচকরমিন্দ্রিযতাপনম্| অকৃত্স্নোপদ্রবং যাপ্যং সাধ্যং স্যান্নিরুপদ্রবম্||৩৪||

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एकदोषानुगं साध्यं नवं, याप्यं द्विदोषजम्| त्रिदोषजमसाध्यं स्याद्यस्य च स्युरुपद्रवाः||३०|| अस्वप्नारोचकश्वासमांसकोथशिरोग्रहाः| मूर्च्छायमदरुक्तृष्णाज्वरमोहप्रवेपकाः||३१|| हिक्कापाङ्गुल्यवीसर्पपाकतोदभ्रमक्लमाः| अङ्गुलीवक्रता स्फोटा दाहमर्मग्रहार्बुदाः||३२|| एतैरुपद्रवैर्वर्ज्यं मोहेनैकेन वाऽपि यत्| सम्प्रस्रावि विवर्णं च स्तब्धमर्बुदकृच्च यत्||३३|| वर्जयेच्चैव सङ्कोचकरमिन्द्रियतापनम्| अकृत्स्नोपद्रवं याप्यं साध्यं स्यान्निरुपद्रवम्||३४||

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Adhikarana 8 (35-40) · Śloka 40

রক্তমার্গং নিহন্ত্যাশু শাখাসন্ধিষু মারুতঃ| নিবিশ্যান্যোন্যমাবার্য বেদনাভির্হরেদসূন্||৩৫|| তত্র মুঞ্চেদসৃক্ শৃঙ্গজলৌকঃসূচ্যলাবুভিঃ| প্রচ্ছনৈর্বা সিরাভির্বা যথাদোষং যথাবলম্||৩৬|| রুগ্দাহশূলতোদার্তাদসৃক্ স্রাব্যং জলৌকসা| শৃঙ্গৈস্তুম্বৈর্হরেত্ সুপ্তিকণ্ডূচিমিচিমাযনাত্||৩৭|| দেশাদ্দেশং ব্রজত্ স্রাব্যং সিরাভিঃ প্রচ্ছনেন বা| অঙ্গগ্লানৌ ন তু স্রাব্যং রূক্ষে বাতোত্তরে চ যত্ ||৩৮|| গম্ভীরং শ্বযথুং স্তম্ভং কম্পং স্নাযুসিরামযান্| গ্লানিং চাপি সসঙ্কোচাং কুর্যাদ্বাযুরসৃক্ক্ষযাত্||৩৯|| খাঞ্জ্যাদীন্ বাতরোগাংশ্চ মৃত্যুং চাত্যবসেচনাত্| কুর্যাত্তস্মাত্ প্রমাণেন স্নিগ্ধাদ্রক্তং বিনির্হরেত্||৪০||

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रक्तमार्गं निहन्त्याशु शाखासन्धिषु मारुतः| निविश्यान्योन्यमावार्य वेदनाभिर्हरेदसून्||३५|| तत्र मुञ्चेदसृक् शृङ्गजलौकःसूच्यलाबुभिः| प्रच्छनैर्वा सिराभिर्वा यथादोषं यथाबलम्||३६|| रुग्दाहशूलतोदार्तादसृक् स्राव्यं जलौकसा| शृङ्गैस्तुम्बैर्हरेत् सुप्तिकण्डूचिमिचिमायनात्||३७|| देशाद्देशं व्रजत् स्राव्यं सिराभिः प्रच्छनेन वा| अङ्गग्लानौ न तु स्राव्यं रूक्षे वातोत्तरे च यत् ||३८|| गम्भीरं श्वयथुं स्तम्भं कम्पं स्नायुसिरामयान्| ग्लानिं चापि ससङ्कोचां कुर्याद्वायुरसृक्क्षयात्||३९|| खाञ्ज्यादीन् वातरोगांश्च मृत्युं चात्यवसेचनात्| कुर्यात्तस्मात् प्रमाणेन स्निग्धाद्रक्तं विनिर्हरेत्||४०||

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Adhikarana 9 (41) · Śloka 42

বিরেচ্যঃ স্নেহযিত্বাঽঽদৌ স্নেহযুক্তৈর্বিরেচনৈঃ| রূক্ষৈর্বা মৃদুভিঃ শস্তমসকৃদ্বস্তিকর্ম চ||৪১|| সেকাভ্যঙ্গপ্রদেহান্নস্নেহাঃ প্রাযোঽবিদাহিনঃ| বাতরক্তে প্রশস্যন্ত ...|৪২|

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विरेच्यः स्नेहयित्वाऽऽदौ स्नेहयुक्तैर्विरेचनैः| रूक्षैर्वा मृदुभिः शस्तमसकृद्वस्तिकर्म च||४१|| सेकाभ्यङ्गप्रदेहान्नस्नेहाः प्रायोऽविदाहिनः| वातरक्ते प्रशस्यन्त ...|४२|

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Adhikarana 10 (42-48) · Śloka 48

... বিশেষং তু নিবোধ মে||৪২|| বাহ্যমালেপনাভ্যঙ্গপরিষেকোপনাহনৈঃ| বিরেকাস্থাপনস্নেহপানৈর্গম্ভীরমাচরেত্||৪৩|| সর্পিস্তৈলবসামজ্জাপানাভ্যঞ্জনবস্তিভিঃ| সুখোষ্ণৈরুপনাহৈশ্চ বাতোত্তরমুপাচরেত্||৪৪|| বিরেচনৈর্ঘৃতক্ষীরপানৈঃ সেকৈঃ সবস্তিভিঃ| শীতৈর্নির্বাপণৈশ্চাপি রক্তপিত্তোত্তরং জযেত্||৪৫|| বমনং মৃদু নাত্যর্থং স্নেহসেকৌ বিলঙ্ঘনম্| কোষ্ণা লেপাশ্চ শস্যন্তে বাতরক্তে কফোত্তরে||৪৬|| কফবাতোত্তরে শীতৈঃ প্রলিপ্তে বাতশোণিতে| দাহশোথরুজাকণ্ডূবিবৃদ্ধিঃ স্তম্ভনাদ্ভবেত্||৪৭|| রক্তপিত্তোত্তরে চোষ্ণৈর্দাহঃ ক্লেদোঽবদারণম্| ভবেত্তস্মাদ্ভিষগ্দোষবলং বুদ্ধ্বাঽঽচরেত্ক্রিযাম্||৪৮||

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... विशेषं तु निबोध मे||४२|| बाह्यमालेपनाभ्यङ्गपरिषेकोपनाहनैः| विरेकास्थापनस्नेहपानैर्गम्भीरमाचरेत्||४३|| सर्पिस्तैलवसामज्जापानाभ्यञ्जनबस्तिभिः| सुखोष्णैरुपनाहैश्च वातोत्तरमुपाचरेत्||४४|| विरेचनैर्घृतक्षीरपानैः सेकैः सबस्तिभिः| शीतैर्निर्वापणैश्चापि रक्तपित्तोत्तरं जयेत्||४५|| वमनं मृदु नात्यर्थं स्नेहसेकौ विलङ्घनम्| कोष्णा लेपाश्च शस्यन्ते वातरक्ते कफोत्तरे||४६|| कफवातोत्तरे शीतैः प्रलिप्ते वातशोणिते| दाहशोथरुजाकण्डूविवृद्धिः स्तम्भनाद्भवेत्||४७|| रक्तपित्तोत्तरे चोष्णैर्दाहः क्लेदोऽवदारणम्| भवेत्तस्माद्भिषग्दोषबलं बुद्ध्वाऽऽचरेत्क्रियाम्||४८||

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Adhikarana 11 (49-54) · Śloka 54

দিবাস্বপ্নং সসন্তাপং ব্যাযামং মৈথুনং তথা| কটূষ্ণং গুর্বভিষ্যন্দি লবণাম্লং চ বর্জযেত্||৪৯|| পুরাণা যবগোধূমনীবারাঃ শালিষষ্টিকাঃ| ভোজনার্থং রসার্থং বা বিষ্কিরপ্রতুদা হিতাঃ||৫০|| আঢক্যশ্চণকা মুদ্গা মসূরাঃ সমকুষ্ঠকাঃ| যূষার্থং বহুসর্পিষ্কাঃ প্রশস্তা বাতশোণিতে||৫১|| সুনিষণ্ণকবেত্রাগ্রকাকমাচীশতাবরী| বাস্তুকোপোদিকাশাকং শাকং সৌবর্চলং তথা||৫২|| ঘৃতমাংসরসৈর্ভৃষ্টং শাকসাত্ম্যায দাপযেত্| ব্যঞ্জনার্থং, তথা গব্যং মাহিষাজং পযো হিতম্||৫৩|| ইতি সঙ্ক্ষেপতঃ প্রোক্তং বাতরক্তচিকিত্সিতম্| এতদেব পুনঃ সর্বং ব্যাসতঃ সম্প্রবক্ষ্যতে||৫৪||

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दिवास्वप्नं ससन्तापं व्यायामं मैथुनं तथा| कटूष्णं गुर्वभिष्यन्दि लवणाम्लं च वर्जयेत्||४९|| पुराणा यवगोधूमनीवाराः शालिषष्टिकाः| भोजनार्थं रसार्थं वा विष्किरप्रतुदा हिताः||५०|| आढक्यश्चणका मुद्गा मसूराः समकुष्ठकाः| यूषार्थं बहुसर्पिष्काः प्रशस्ता वातशोणिते||५१|| सुनिषण्णकवेत्राग्रकाकमाचीशतावरी| वास्तुकोपोदिकाशाकं शाकं सौवर्चलं तथा||५२|| घृतमांसरसैर्भृष्टं शाकसात्म्याय दापयेत्| व्यञ्जनार्थं, तथा गव्यं माहिषाजं पयो हितम्||५३|| इति सङ्क्षेपतः प्रोक्तं वातरक्तचिकित्सितम्| एतदेव पुनः सर्वं व्यासतः सम्प्रवक्ष्यते||५४||

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Adhikarana 12 (55-60) · Śloka 60

শ্রাবণীক্ষীরকাকোলীজীবকর্ষভকৈঃ সমৈঃ| সিদ্ধং সমধুকৈঃ সর্পিঃ সক্ষীরং বাতরক্তনুত্||৫৫|| বলামতিবলাং মেদামাত্মগুপ্তাং শতাবরীম্| কাকোলীং ক্ষীরকাকোলীং রাস্নামৃদ্ধিং চ পেষযেত্||৫৬|| ঘৃতং চতুর্গুণক্ষীরং তৈঃ সিদ্ধং বাতরক্তনুত্| হৃত্পাণ্ডুরোগবীসর্পকামলাজ্বরনাশনম্||৫৭|| ত্রাযন্তিকাতামলকীদ্বিকাকোলীশতাবরী| কশেরুকাকষাযেণ কল্কৈরেভিঃ পচেদ্ধৃতম্||৫৮|| দত্ত্বা পরূষকাদ্রাক্ষাকাশ্মর্যেক্ষুরসান্ সমান্| পৃথগ্বিদার্যাঃ স্বরসং তথা ক্ষীরং চতুর্গুণম্||৫৯|| এতত্ প্রাযোগিকং সর্পিঃ পারূষকমিতি স্মৃতম্| বাতরক্তে ক্ষতে ক্ষীণে বীসর্পে পৈত্তিকে জ্বরে||৬০|| ইতি পারূষকং ঘৃতম্|

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श्रावणीक्षीरकाकोलीजीवकर्षभकैः समैः| सिद्धं समधुकैः सर्पिः सक्षीरं वातरक्तनुत्||५५|| बलामतिबलां मेदामात्मगुप्तां शतावरीम्| काकोलीं क्षीरकाकोलीं रास्नामृद्धिं च पेषयेत्||५६|| घृतं चतुर्गुणक्षीरं तैः सिद्धं वातरक्तनुत्| हृत्पाण्डुरोगवीसर्पकामलाज्वरनाशनम्||५७|| त्रायन्तिकातामलकीद्विकाकोलीशतावरी| कशेरुकाकषायेण कल्कैरेभिः पचेद्धृतम्||५८|| दत्त्वा परूषकाद्राक्षाकाश्मर्येक्षुरसान् समान्| पृथग्विदार्याः स्वरसं तथा क्षीरं चतुर्गुणम्||५९|| एतत् प्रायोगिकं सर्पिः पारूषकमिति स्मृतम्| वातरक्ते क्षते क्षीणे वीसर्पे पैत्तिके ज्वरे||६०|| इति पारूषकं घृतम्|

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Adhikarana 13 (61-70) · Śloka 70

দ্বে পঞ্চমূলে বর্ষাভূমেরণ্ডং সপুনর্নবম্| মুদ্গপর্ণীং মহামেদাং মাষপর্ণীং শতাবরীম্||৬১|| শঙ্খপুষ্পীমবাক্পুষ্পীং রাস্নামতিবলাং বলাম্| পৃথগ্দ্বিপলিকং কৃত্বা জলদ্রোণে বিপাচযেত্||৬২|| পাদশেষে সমান্ ক্ষীরধাত্রীক্ষুচ্ছাগলান্ রসান্| ঘৃতাঢকেন সংযোজ্য শনৈর্মৃদ্বগ্নিনা পচেত্||৬৩|| কল্কানাবাপ্য মেদে দ্বে কাশ্মর্যফলমুত্পলম্| ত্বক্ক্ষীরীং পিপ্পলীং দ্রাক্ষাং পদ্মবীজং পুনর্নবাম্||৬৪|| নাগরং ক্ষীরকাকোলীং পদ্মকং বৃহতীদ্বযম্| বীরাং শৃঙ্গাটকং ভব্যমুরুমাণং নিকোচকম্||৬৫|| খর্জূরাক্ষোটবাতামমুঞ্জাতাভিষুকাংস্তথা| এতৈর্ঘৃতাঢকে সিদ্ধে ক্ষৌদ্রং শীতে প্রদাপযেত্||৬৬|| সম্যক্ সিদ্ধং চ বিজ্ঞায সুগুপ্তং সন্নিধাপযেত্| কৃতরক্ষাবিধিং চৌক্ষে প্রাশযেদক্ষসম্মিতম্||৬৭|| পাণ্ডুরোগং জ্বরং হিক্কাং স্বরভেদং ভগন্দরম্| পার্শ্বশূলং ক্ষযং কাসং প্লীহানং বাতশোণিতম্||৬৮|| ক্ষতশোষমপস্মারমশ্মরীং শর্করাং তথা| সর্বাঙ্গৈকাঙ্গরোগাংশ্চ মূত্রসঙ্গং চ নাশযেত্||৬৯|| বলবর্ণকরং ধন্যং বলীপলিতনাশনম্| জীবনীযমিদং সর্পির্বৃষ্যং বন্ধ্যাসুতপ্রদম্||৭০||

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द्वे पञ्चमूले वर्षाभूमेरण्डं सपुनर्नवम्| मुद्गपर्णीं महामेदां माषपर्णीं शतावरीम्||६१|| शङ्खपुष्पीमवाक्पुष्पीं रास्नामतिबलां बलाम्| पृथग्द्विपलिकं कृत्वा जलद्रोणे विपाचयेत्||६२|| पादशेषे समान् क्षीरधात्रीक्षुच्छागलान् रसान्| घृताढकेन संयोज्य शनैर्मृद्वग्निना पचेत्||६३|| कल्कानावाप्य मेदे द्वे काश्मर्यफलमुत्पलम्| त्वक्क्षीरीं पिप्पलीं द्राक्षां पद्मबीजं पुनर्नवाम्||६४|| नागरं क्षीरकाकोलीं पद्मकं बृहतीद्वयम्| वीरां शृङ्गाटकं भव्यमुरुमाणं निकोचकम्||६५|| खर्जूराक्षोटवाताममुञ्जाताभिषुकांस्तथा| एतैर्घृताढके सिद्धे क्षौद्रं शीते प्रदापयेत्||६६|| सम्यक् सिद्धं च विज्ञाय सुगुप्तं सन्निधापयेत्| कृतरक्षाविधिं चौक्षे प्राशयेदक्षसम्मितम्||६७|| पाण्डुरोगं ज्वरं हिक्कां स्वरभेदं भगन्दरम्| पार्श्वशूलं क्षयं कासं प्लीहानं वातशोणितम्||६८|| क्षतशोषमपस्मारमश्मरीं शर्करां तथा| सर्वाङ्गैकाङ्गरोगांश्च मूत्रसङ्गं च नाशयेत्||६९|| बलवर्णकरं धन्यं वलीपलितनाशनम्| जीवनीयमिदं सर्पिर्वृष्यं वन्ध्यासुतप्रदम्||७०||

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Adhikarana 14 (71-75) · Śloka 75

দ্রাক্ষামধু(ধূ)কতোযাভ্যাং সিদ্ধং বা সসিতোপলম্| পিবেদ্ধৃতং তথা ক্ষীরং গুডূচীস্বরসে শৃতম্||৭১|| জীবকর্ষভকৌ মেদামৃষ্যপ্রোক্তাং শতাবরীম্| মধুকং মধুপর্ণীং চ কাকোলীদ্বযমেব চ||৭২|| মুদ্গমাষাখ্যপর্ণিন্যৌ দশমূলং পুনর্নবাম্| বলামৃতাবিদারীশ্চ সাশ্বগন্ধাশ্মভেদকাঃ||৭৩|| এষাং কষাযকল্কাভ্যাং সর্পিস্তৈলং চ সাধযেত্| লাভতশ্চ বসামজ্জধান্বপ্রাতুদবৈষ্কিরম্||৭৪|| চতুর্গুণেন পযসা তত্ সিদ্ধং বাতশোণিতম্| সর্বদেহাশ্রিতং হন্তি ব্যাধীন্ ঘোরাংশ্চ বাতজান্||৭৫||

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द्राक्षामधु(धू)कतोयाभ्यां सिद्धं वा ससितोपलम्| पिबेद्धृतं तथा क्षीरं गुडूचीस्वरसे शृतम्||७१|| जीवकर्षभकौ मेदामृष्यप्रोक्तां शतावरीम्| मधुकं मधुपर्णीं च काकोलीद्वयमेव च||७२|| मुद्गमाषाख्यपर्णिन्यौ दशमूलं पुनर्नवाम्| बलामृताविदारीश्च साश्वगन्धाश्मभेदकाः||७३|| एषां कषायकल्काभ्यां सर्पिस्तैलं च साधयेत्| लाभतश्च वसामज्जधान्वप्रातुदवैष्किरम्||७४|| चतुर्गुणेन पयसा तत् सिद्धं वातशोणितम्| सर्वदेहाश्रितं हन्ति व्याधीन् घोरांश्च वातजान्||७५||

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Adhikarana 15 (76-87) · Śloka 87

স্থিরা শ্বদংষ্ট্রা বৃহতী সারিবা সশতাবরী| কাশ্মর্যাণ্যাত্মগুপ্তা চ বৃশ্চীরো দ্বে বলে তথা||৭৬|| এষাং ক্বাথে চতুঃক্ষীরং পৃথক্ তৈলং পৃথগ্ঘৃতম্| মেদাশতাবরীযষ্টিজীবন্তীজীবকর্ষভৈঃ||৭৭|| পক্ত্বা মাত্রা ততঃ ক্ষীরত্রিগুণাঽধ্যর্ধশর্করা| খজেন মথিতা পেযা বাতরক্তে ত্রিদোষজে||৭৮|| তৈলং পযঃ শর্করাং চ পাযযেদ্বা সুমূর্চ্ছিতম্| সর্পিস্তৈলসিতাক্ষৌদ্রৈর্মিশ্রং বাঽপি পিবেত্ পযঃ||৭৯|| অংশুমত্যা শৃতঃ প্রস্থঃ পযসো দ্বিসিতোপলঃ| পানে প্রশস্যতে তদ্বত্ পিপ্পলীনাগরৈঃ শৃতঃ||৮০|| বলাশতাবলীরাস্নাদশমূলৈঃ সপীলুভিঃ| শ্যামৈরণ্ডস্থিরাভিশ্চ বাতার্তিঘ্নং শৃতং পযঃ||৮১|| ধারোষ্ণং মূত্রযুক্তং বা ক্ষীরং দোষানুলোমনম্| পিবেদ্বা সত্রিবৃচ্চূর্ণং পিত্তরক্তাবৃতানিলঃ||৮২|| ক্ষীরেণৈরণ্ডতৈলং বা প্রযোগেণ পিবেন্নরঃ| বহুদোষো বিরেকার্থং জীর্ণে ক্ষীরৌদনাশনঃ||৮৩|| কষাযমভযানাং বা ঘৃতভৃষ্টং পিবেন্নরঃ| ক্ষীরানুপানং ত্রিবৃতাচূর্ণং দ্রাক্ষারসেন বা||৮৪|| কাশ্মর্যং ত্রিবৃতাং দ্রাক্ষাং ত্রিফলাং সপরূষকাম্| শৃতং পিবেদ্বিরেকায লবণক্ষৌদ্রসংযুতম্||৮৫|| ত্রিফলাযাঃ কষাযং বা পিবেত্ ক্ষৌদ্রেণ সংযুতম্| ধাত্রীহরিদ্রামুস্তানাং কষাযং বা কফাধিকঃ||৮৬|| যোগৈশ্চ কল্পবিহিতৈরসকৃত্তং বিরেচযেত্| মৃদুভিঃ স্নেহসংযুক্তৈর্জ্ঞাত্বা বাতং মলাবৃতম্||৮৭||

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स्थिरा श्वदंष्ट्रा बृहती सारिवा सशतावरी| काश्मर्याण्यात्मगुप्ता च वृश्चीरो द्वे बले तथा||७६|| एषां क्वाथे चतुःक्षीरं पृथक् तैलं पृथग्घृतम्| मेदाशतावरीयष्टिजीवन्तीजीवकर्षभैः||७७|| पक्त्वा मात्रा ततः क्षीरत्रिगुणाऽध्यर्धशर्करा| खजेन मथिता पेया वातरक्ते त्रिदोषजे||७८|| तैलं पयः शर्करां च पाययेद्वा सुमूर्च्छितम्| सर्पिस्तैलसिताक्षौद्रैर्मिश्रं वाऽपि पिबेत् पयः||७९|| अंशुमत्या शृतः प्रस्थः पयसो द्विसितोपलः| पाने प्रशस्यते तद्वत् पिप्पलीनागरैः शृतः||८०|| बलाशतावलीरास्नादशमूलैः सपीलुभिः| श्यामैरण्डस्थिराभिश्च वातार्तिघ्नं शृतं पयः||८१|| धारोष्णं मूत्रयुक्तं वा क्षीरं दोषानुलोमनम्| पिबेद्वा सत्रिवृच्चूर्णं पित्तरक्तावृतानिलः||८२|| क्षीरेणैरण्डतैलं वा प्रयोगेण पिबेन्नरः| बहुदोषो विरेकार्थं जीर्णे क्षीरौदनाशनः||८३|| कषायमभयानां वा घृतभृष्टं पिबेन्नरः| क्षीरानुपानं त्रिवृताचूर्णं द्राक्षारसेन वा||८४|| काश्मर्यं त्रिवृतां द्राक्षां त्रिफलां सपरूषकाम्| शृतं पिबेद्विरेकाय लवणक्षौद्रसंयुतम्||८५|| त्रिफलायाः कषायं वा पिबेत् क्षौद्रेण संयुतम्| धात्रीहरिद्रामुस्तानां कषायं वा कफाधिकः||८६|| योगैश्च कल्पविहितैरसकृत्तं विरेचयेत्| मृदुभिः स्नेहसंयुक्तैर्ज्ञात्वा वातं मलावृतम्||८७||

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Adhikarana 16 (88-95) · Śloka 95

নির্হরেদ্বা মলং তস্য সঘৃতৈঃ ক্ষীরবস্তিভিঃ| ন হি বস্তিসমং কিঞ্চিদ্বাতরক্তচিকিত্সিতম্||৮৮|| বস্তিবঙ্ক্ষণপার্শ্বোরুপর্বাস্থিজঠরার্তিষু| উদাবর্তে চ শস্যন্তে নিরূহাঃ সানুবাসনাঃ||৮৯|| দদ্যাত্তৈলানি চেমানি বস্তিকর্মণি বুদ্ধিমান্| নস্যাভ্যঞ্জনসেকেষু দাহশূলোপশান্তযে||৯০|| মধুযষ্ট্যাস্তুলাযাস্তু কষাযে পাদশেষিতে| তৈলাঢকং সমক্ষীরং পচেত্ কল্কৈঃ পলোন্মিতৈঃ||৯১|| শতপুষ্পাবরীমূর্বাপযস্যাগুরুচন্দনৈঃ| স্থিরাহংসপদীমাংসীদ্বিমেদামধুপর্ণিভিঃ||৯২|| কাকোলীক্ষীরকাকোলীতামলক্যৃদ্ধিপদ্মকৈঃ| জীবকর্ষভজীবন্তীত্বক্পত্রনখবালকৈঃ||৯৩|| প্রপৌণ্ডরীকমঞ্জিষ্ঠাসারিবৈন্দ্রীবিতুন্নকৈঃ| চতুষ্প্রযোগাত্তদ্ধন্তি তৈলং মারুতশোণিতম্||৯৪|| সোপদ্রবং সাঙ্গশূলং সর্বগাত্রানুগং তথা| বাতাসৃক্পিত্তদাহার্তিজ্বরঘ্নং বলবর্ণকৃত্||৯৫|| ইতি মধুপর্ণ্যাদিতৈলম্|

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निर्हरेद्वा मलं तस्य सघृतैः क्षीरबस्तिभिः| न हि बस्तिसमं किञ्चिद्वातरक्तचिकित्सितम्||८८|| बस्तिवङ्क्षणपार्श्वोरुपर्वास्थिजठरार्तिषु| उदावर्ते च शस्यन्ते निरूहाः सानुवासनाः||८९|| दद्यात्तैलानि चेमानि बस्तिकर्मणि बुद्धिमान्| नस्याभ्यञ्जनसेकेषु दाहशूलोपशान्तये||९०|| मधुयष्ट्यास्तुलायास्तु कषाये पादशेषिते| तैलाढकं समक्षीरं पचेत् कल्कैः पलोन्मितैः||९१|| शतपुष्पावरीमूर्वापयस्यागुरुचन्दनैः| स्थिराहंसपदीमांसीद्विमेदामधुपर्णिभिः||९२|| काकोलीक्षीरकाकोलीतामलक्यृद्धिपद्मकैः| जीवकर्षभजीवन्तीत्वक्पत्रनखवालकैः||९३|| प्रपौण्डरीकमञ्जिष्ठासारिवैन्द्रीवितुन्नकैः| चतुष्प्रयोगात्तद्धन्ति तैलं मारुतशोणितम्||९४|| सोपद्रवं साङ्गशूलं सर्वगात्रानुगं तथा| वातासृक्पित्तदाहार्तिज्वरघ्नं बलवर्णकृत्||९५|| इति मधुपर्ण्यादितैलम्|

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Adhikarana 17 (96-109) · Śloka 109

মধুকস্য শতং দ্রাক্ষা খর্জূরাণি পরূষকম্| মধূকৌদনপাক্যৌ চ প্রস্থং মুঞ্জাতকস্য চ||৯৬|| কাশ্মর্যাঢকমিত্যেতচ্চতুর্দ্রোণে পচেদপাম্| শেষেঽষ্টভাগে পূতে চ তস্মিংস্তৈলাঢকং পচেত্||৯৭|| তথাঽঽমলককাশ্মর্যবিদারীক্ষুরসৈঃ সমৈঃ| চতুর্দ্রোণেন পযসা কল্কং দত্ত্বা পলোন্মিতম্||৯৮|| কদম্বামলকাক্ষোটপদ্মবীজকশেরুকম্| শৃঙ্গাটকং শৃঙ্গবেরং লবাণং পিপ্পলীং সিতাম্||৯৯|| জীবনীযৈশ্চ সংসিদ্ধং ক্ষৌদ্রপ্রস্থেন সংসৃজেত্| নস্যাভ্যঞ্জনপানেষু বস্তৌ চাপি নিযোজযেত্||১০০|| বাতব্যাধিষু সর্বেষু মন্যাস্তম্ভে হনুগ্রহে| সর্বাঙ্গৈকাঙ্গবাতে চ ক্ষতক্ষীণে ক্ষতজ্বরে||১০১|| সুকুমারকমিত্যেতদ্বাতাস্রামযনাশনম্| স্বরবর্ণকরং তৈলমারোগ্যবলপুষ্টিদম্||১০২|| ইতি সুকুমারকতৈলম্| গুডূচীং মধুকং হ্রস্বং পঞ্চমূলং পুনর্নবাম্| রাস্নামেরণ্ডমূলং চ জীবনীযানি লাভতঃ||১০৩|| পলানাং শতকৈর্ভাগৈর্বলাপঞ্চশতং তথা| কোলবিল্বযবান্মাষান্কুলত্থাংশ্চাঢকোন্মিতান্||১০৪|| কাশ্মর্যাণাং সুশুষ্কাণাং দ্রোণং দ্রোণশতেঽম্ভসি| সাধযেজ্জর্জরং ধৌতং চতুর্দ্রোণং চ শেষযেত্||১০৫|| তৈলদ্রোণং পচেত্তেন দত্ত্বা পঞ্চগুণং পযঃ| পিষ্ট্বা ত্রিপলিকং চৈব চন্দনোশীরকেশরম্||১০৬|| পত্রৈলাগুরুকুষ্ঠানি তগরং মধুযষ্টিকাম্| মঞ্জিষ্ঠাষ্টপলং চৈব তত্ সিদ্ধং সার্বযৌগিকম্||১০৭|| বাতরক্তে ক্ষতক্ষীণে ভারার্তে ক্ষীণরেতসি| বেপনাক্ষেপভগ্নানাং সর্বাঙ্গৈকাঙ্গরোগিণাম্||১০৮|| যোনিদোষমপস্মারমুন্মাদং খঞ্জপঙ্গুতাম্| হন্যাত্ প্রসবনং চৈতত্তৈলাগ্র্যমমৃতাহ্বযম্||১০৯|| ইত্যমৃতাদ্যং তৈলম্|

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मधुकस्य शतं द्राक्षा खर्जूराणि परूषकम्| मधूकौदनपाक्यौ च प्रस्थं मुञ्जातकस्य च||९६|| काश्मर्याढकमित्येतच्चतुर्द्रोणे पचेदपाम्| शेषेऽष्टभागे पूते च तस्मिंस्तैलाढकं पचेत्||९७|| तथाऽऽमलककाश्मर्यविदारीक्षुरसैः समैः| चतुर्द्रोणेन पयसा कल्कं दत्त्वा पलोन्मितम्||९८|| कदम्बामलकाक्षोटपद्मबीजकशेरुकम्| शृङ्गाटकं शृङ्गवेरं लवाणं पिप्पलीं सिताम्||९९|| जीवनीयैश्च संसिद्धं क्षौद्रप्रस्थेन संसृजेत्| नस्याभ्यञ्जनपानेषु बस्तौ चापि नियोजयेत्||१००|| वातव्याधिषु सर्वेषु मन्यास्तम्भे हनुग्रहे| सर्वाङ्गैकाङ्गवाते च क्षतक्षीणे क्षतज्वरे||१०१|| सुकुमारकमित्येतद्वातास्रामयनाशनम्| स्वरवर्णकरं तैलमारोग्यबलपुष्टिदम्||१०२|| इति सुकुमारकतैलम्| गुडूचीं मधुकं ह्रस्वं पञ्चमूलं पुनर्नवाम्| रास्नामेरण्डमूलं च जीवनीयानि लाभतः||१०३|| पलानां शतकैर्भागैर्बलापञ्चशतं तथा| कोलबिल्वयवान्माषान्कुलत्थांश्चाढकोन्मितान्||१०४|| काश्मर्याणां सुशुष्काणां द्रोणं द्रोणशतेऽम्भसि| साधयेज्जर्जरं धौतं चतुर्द्रोणं च शेषयेत्||१०५|| तैलद्रोणं पचेत्तेन दत्त्वा पञ्चगुणं पयः| पिष्ट्वा त्रिपलिकं चैव चन्दनोशीरकेशरम्||१०६|| पत्रैलागुरुकुष्ठानि तगरं मधुयष्टिकाम्| मञ्जिष्ठाष्टपलं चैव तत् सिद्धं सार्वयौगिकम्||१०७|| वातरक्ते क्षतक्षीणे भारार्ते क्षीणरेतसि| वेपनाक्षेपभग्नानां सर्वाङ्गैकाङ्गरोगिणाम्||१०८|| योनिदोषमपस्मारमुन्मादं खञ्जपङ्गुताम्| हन्यात् प्रसवनं चैतत्तैलाग्र्यममृताह्वयम्||१०९|| इत्यमृताद्यं तैलम्|

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Adhikarana 18 (110-113) · Śloka 113

পদ্মবেতসযষ্ট্যাহ্বফেনিলাপদ্মকোত্পলৈঃ| পৃথক্পঞ্চপলৈর্দর্ভবলাচন্দনকিংশুকৈঃ||১১০|| জলে শৃতৈঃ পচেত্তৈলপ্রস্থং সৌবীরসম্মিতম্| লোধ্রকালীযকোশীরজীবকর্ষভকেশরৈঃ||১১১|| মদযন্তীলতাপত্রপদ্মকেশরপদ্মকৈঃ| প্রপৌণ্ডরীককাশ্মর্যমাংসীমেদাপ্রিযঙ্গুভিঃ||১১২|| কুঙ্কুমস্য পলার্ধেন মঞ্জিষ্ঠাযাঃ পলেন চ| মহাপদ্মমিদং তৈলং বাতাসৃগ্জ্বরনাশনম্||১১৩|| ইতি মহাপদ্মং তৈলম্|

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पद्मवेतसयष्ट्याह्वफेनिलापद्मकोत्पलैः| पृथक्पञ्चपलैर्दर्भबलाचन्दनकिंशुकैः||११०|| जले शृतैः पचेत्तैलप्रस्थं सौवीरसम्मितम्| लोध्रकालीयकोशीरजीवकर्षभकेशरैः||१११|| मदयन्तीलतापत्रपद्मकेशरपद्मकैः| प्रपौण्डरीककाश्मर्यमांसीमेदाप्रियङ्गुभिः||११२|| कुङ्कुमस्य पलार्धेन मञ्जिष्ठायाः पलेन च| महापद्ममिदं तैलं वातासृग्ज्वरनाशनम्||११३|| इति महापद्मं तैलम्|

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Adhikarana 19 (114) · Śloka 115

পদ্মকোশীরযষ্ট্যাহ্বরজনীক্বাথসাধিতম্| স্যাত্ পিষ্টৈঃ সর্জমঞ্জিষ্ঠাবীরাকাকোলিচন্দনৈঃ||১১৪|| খুড্ডাকপদ্মকমিদং তৈলং বাতাস্রদাহনুত্|১১৫| ইতি খুড্ডাকপদ্মকং তৈলম্|

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पद्मकोशीरयष्ट्याह्वरजनीक्वाथसाधितम्| स्यात् पिष्टैः सर्जमञ्जिष्ठावीराकाकोलिचन्दनैः||११४|| खुड्डाकपद्मकमिदं तैलं वातास्रदाहनुत्|११५| इति खुड्डाकपद्मकं तैलम्|

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Adhikarana 20 (115-118) · Śloka 118

শতেন যষ্টিমধুকাত্ সাধ্যং দশগুণং পযঃ||১১৫|| তস্মিংস্তৈলে চতুর্দ্রোণে মধুকস্য পলেন তু| সিদ্ধং মধুককাশ্মর্যসৈর্বা বাতরক্তনুত্||১১৬|| মধুপর্ণ্যাঃ পলং পিষ্ট্বা তৈলপ্রস্থং চতুর্গুণে| ক্ষীরে সাধ্যং শতং কৃত্বা তদেবং মধুকাচ্ছতে||১১৭|| সিদ্ধং দেযং ত্রিদোষে স্যাদ্বাতাস্রে শ্বাসকাসনুত্| হৃত্পাণ্ডুরোগবীসর্পকামলাদাহনাশনম্||১১৮|| ইতি শতপাকং মধুকতৈলম্|

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शतेन यष्टिमधुकात् साध्यं दशगुणं पयः||११५|| तस्मिंस्तैले चतुर्द्रोणे मधुकस्य पलेन तु| सिद्धं मधुककाश्मर्यसैर्वा वातरक्तनुत्||११६|| मधुपर्ण्याः पलं पिष्ट्वा तैलप्रस्थं चतुर्गुणे| क्षीरे साध्यं शतं कृत्वा तदेवं मधुकाच्छते||११७|| सिद्धं देयं त्रिदोषे स्याद्वातास्रे श्वासकासनुत्| हृत्पाण्डुरोगवीसर्पकामलादाहनाशनम्||११८|| इति शतपाकं मधुकतैलम्|

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Adhikarana 21 (119-120) · Śloka 120

বলাকষাযকল্কাভ্যাং তৈলং ক্ষীরসমং পচেত্| সহস্রং শতবারং বা বাতাসৃগ্বাতরোগনুত্||১১৯|| রসাযনমিদং শ্রেষ্ঠমিন্দ্রিযাণাং প্রসাদনম্| জীবনং বৃংহণং স্বর্যং শুক্রাসৃগ্দোষনাশনম্||১২০|| ইতি সহস্রপাকং শতপাকং বা বলাতৈলম্|

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बलाकषायकल्काभ्यां तैलं क्षीरसमं पचेत्| सहस्रं शतवारं वा वातासृग्वातरोगनुत्||११९|| रसायनमिदं श्रेष्ठमिन्द्रियाणां प्रसादनम्| जीवनं बृंहणं स्वर्यं शुक्रासृग्दोषनाशनम्||१२०|| इति सहस्रपाकं शतपाकं वा बलातैलम्|

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Adhikarana 22 (121-122) · Śloka 122

গুডূচীরসদুগ্ধাভ্যাং তৈলং দ্রাক্ষারসেন বা| সিদ্ধং মধুককাশ্মর্যরসৈর্বা বাতরক্তনুত্||১২১|| আরনালাঢকে তৈলং পাদসর্জরসং শৃতম্| প্রভূতে খজিতং তোযে জ্বরদাহার্তিনুত্ পরম্||১২২||

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गुडूचीरसदुग्धाभ्यां तैलं द्राक्षारसेन वा| सिद्धं मधुककाश्मर्यरसैर्वा वातरक्तनुत्||१२१|| आरनालाढके तैलं पादसर्जरसं शृतम्| प्रभूते खजितं तोये ज्वरदाहार्तिनुत् परम्||१२२||

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Adhikarana 23 (123) · Śloka 123

সমধূচ্ছিষ্টমাঞ্জিষ্ঠং সসর্জরসসারিবম্| পিণ্ডতৈলং তদভ্যঙ্গাদ্বাতরক্তরুজাপহম্||১২৩|| ইতি পিণ্ডতৈলম্|

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समधूच्छिष्टमाञ्जिष्ठं ससर्जरससारिवम्| पिण्डतैलं तदभ्यङ्गाद्बातरक्तरुजापहम्||१२३|| इति पिण्डतैलम्|

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Adhikarana 24 (124-155) · Śloka 155

দশমূলশৃতং ক্ষীরং সদ্যঃ শূলনিবারণম্| পরিষেকোঽনিলপ্রাযে তদ্বত্ কোষ্ণেন সর্পিষা||১২৪|| স্নেহৈর্মধুরসিদ্ধৈর্বা চতুর্ভিঃ পরিষেচযেত্| স্তম্ভাক্ষেপকশূলার্তং কোষ্ণৈর্দাহে তু শীতলৈঃ||১২৫|| তদ্বদ্গব্যাবিকচ্ছাগৈঃ ক্ষীরৈস্তৈলবিমিশ্রিতৈঃ| ক্বাথৈর্বা জীবনীযানাং পঞ্চমূলস্য বা ভিষক্||১২৬|| দ্রাক্ষেক্ষুরসমদ্যানি দধিমস্ত্বম্লকাঞ্জিকম্| সেকার্থে তণ্ডুলক্ষৌদ্রশর্করাম্বু চ শস্যতে||১২৭|| কুমুদোত্পলপদ্মাদ্যৈর্মণিহারৈঃ সচন্দনৈঃ| শীততোযানুগৈর্দাহে প্রোক্ষণং স্পর্শনং হিতম্||১২৮|| চন্দ্রপাদাম্বুসংসিক্তে ক্ষৌমপদ্মদলচ্ছদে| শযনে পুলিনস্পর্শশীতমারুতবীজিতে||১২৯|| চন্দনার্দ্রস্তনকরাঃ প্রিযা নার্যঃ প্রিযংবদাঃ| স্পর্শশীতাঃ সুখস্পর্শা ঘ্নন্তি দাহং রুজং ক্লমম্||১৩০|| সরাগে সরুজে দাহে রক্তং বিস্রাব্য লেপযেত্| মধুকাশ্বত্থত্বঙ্মাংসীবীরোদুম্বরশাদ্বলৈঃ||১৩১|| জলজৈর্যবচূর্ণৈর্বা সযষ্ট্যাহ্বপযোঘৃতৈঃ| সর্পিষা জীবনীযৈর্বা পিষ্টৈর্লেপোঽর্তিদাহনুত্||১৩২|| তিলাঃ প্রিযালো মধুকং বিসং মূলং চ বেতসাত্| আজেন পযসা পিষ্টঃ প্রলেপো দাহরাগনুত্||১৩৩|| প্রপৌণ্ডরীকমঞ্জিষ্ঠাদার্বীমধুকচন্দনৈঃ| সিতোপলৈরকাসক্তুমসূরোশীরপদ্মকৈঃ||১৩৪|| লেপো রুগ্দাহবীসর্পরাগশোফনিবারণঃ| পিত্তরক্তোত্তরে ত্বেতে, লেপান্ বাতোত্তরে শৃণু||১৩৫|| বাতঘ্নৈঃ সাধিতঃ স্নিগ্ধঃ সক্ষীরমুদ্গপাযসঃ | তিলসর্ষপপিণ্ডৈর্বাঽপ্যুপনাহো রুজাপহঃ||১৩৬|| ঔদকপ্রসহানূপবেশবারাঃ সুসংস্কৃতাঃ| জীবনীযৌষধৈঃ স্নেহযুক্তাঃ স্যুরুপনাহনে||১৩৭|| স্তম্ভতোদরুগাযামশোথাঙ্গগ্রহনাশনাঃ| জীবনীযৌষধৈঃ সিদ্ধা সপযস্কা বসাঽপি বা||১৩৮|| ঘৃতং সহচরান্মূলং জীবন্তী চ্ছাগলং পযঃ| লেপঃ পিষ্টাস্তিলাস্তদ্বদ্ভৃষ্টাঃ পযসি নির্বৃতাঃ||১৩৯|| ক্ষীরপিষ্টমুমালেপমেরণ্ডস্য ফলানি চ| কুর্যাচ্ছূলনিবৃত্ত্যর্থং শতাহ্বামনিলেঽধিকে||১৪০|| সমূলাগ্রচ্ছদৈরণ্ডক্বাথে দ্বিপ্রাস্থিকং পৃথক্| ঘৃতং তৈলং বসা মজ্জা চানূপমৃগপক্ষিণাম্||১৪১|| কল্কার্থে জীবনীযানি গব্যং ক্ষীরমথাজকম্| হরিদ্রোত্পলকুষ্ঠৈলাশতাহ্বাশ্বহনচ্ছদান্ ||১৪২|| বিল্বমাত্রান্ পৃথক্ পুষ্পং কাকুভং চাপি সাধযেত্| মধূচ্ছিষ্টপলান্যষ্টৌ দদ্যাচ্ছীতেঽবতারিতে||১৪৩|| শূলেনৈষোঽর্দিতাঙ্গানাং লেপঃ সন্ধিগতেঽনিলে| বাতরক্তে চ্যুতে ভগ্নে খঞ্জে কুব্জে চ শস্যতে||১৪৪|| শোফগৌরবকণ্ড্বাদ্যৈর্যুক্তে ত্বস্মিন্ কফোত্তরে| মূত্রক্ষারসুরাপক্বং ঘৃতমভ্যঞ্জনে হিতম্||১৪৫|| পদ্মকং ত্বক্ সমধুকং সারিবা চেতি তৈর্ঘৃতম্| সিদ্ধং সমধুশুক্তং স্যাত্ সেকাভ্যঙ্গে কফোত্তরে||১৪৬|| ক্ষারস্তৈলং গবাং মূত্রং জলং চ কটুকৈঃ শৃতম্| পরিষেকে প্রশংসন্তি বাতরক্তে কফোত্তরে||১৪৭|| লেপঃ সর্ষপনিম্বার্কহিংস্রাক্ষীরতিলৈর্হিতঃ| শ্রেষ্ঠঃ সিদ্ধঃ কপিত্থত্বগ্ঘৃতক্ষীরৈঃ সসক্তুভিঃ||১৪৮|| গৃহধূমো বচা কুষ্ঠং শতাহ্বা রজনীদ্বযম্| প্রলেপঃ শূলনুদ্বাতরক্তে বাতকফোত্তরে||১৪৯|| তগরং ত্বক্ শতাহ্বৈলা কুষ্ঠং মুস্তং হরেণুকা| দারু ব্যাঘ্রনখং চাম্লপিষ্টং বাতকফাস্রনুত্||১৫০|| মধুশিগ্রোর্হিতং তদ্বদ্বীজং ধান্যাম্লসংযুতম্| মুহূর্তং লিপ্তমম্লৈশ্চ সিঞ্চেদ্বাতকফোত্তরম্||১৫১|| ত্রিফলাব্যোষপত্রৈলাত্বক্ক্ষীরীচিত্রকং বচাম্| বিডঙ্গং পিপ্পলীমূলং রোমশং বৃষকত্বচম্||১৫২|| ঋদ্ধিং তামলকীং চব্যং সমভাগানি পেষযেত্| কল্যং লিপ্তমযস্পাত্রে মধ্যাহ্নে ভক্ষযেত্ততঃ||১৫৩|| বর্জযেদ্দধিশুক্তানি ক্ষারং বৈরোধিকানি চ| বাতাস্রে সর্বদোষেঽপি হিতং শূলার্দিতে পরম্||১৫৪|| বুদ্ধ্বা স্থানবিশেষাংশ্চ দোষাণাং চ বলাবলম্| চিকিত্সিতমিদং কুর্যাদূহাপোহবিকল্পবিত্||১৫৫||

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दशमूलशृतं क्षीरं सद्यः शूलनिवारणम्| परिषेकोऽनिलप्राये तद्वत् कोष्णेन सर्पिषा||१२४|| स्नेहैर्मधुरसिद्धैर्वा चतुर्भिः परिषेचयेत्| स्तम्भाक्षेपकशूलार्तं कोष्णैर्दाहे तु शीतलैः||१२५|| तद्वद्गव्याविकच्छागैः क्षीरैस्तैलविमिश्रितैः| क्वाथैर्वा जीवनीयानां पञ्चमूलस्य वा भिषक्||१२६|| द्राक्षेक्षुरसमद्यानि दधिमस्त्वम्लकाञ्जिकम्| सेकार्थे तण्डुलक्षौद्रशर्कराम्बु च शस्यते||१२७|| कुमुदोत्पलपद्माद्यैर्मणिहारैः सचन्दनैः| शीततोयानुगैर्दाहे प्रोक्षणं स्पर्शनं हितम्||१२८|| चन्द्रपादाम्बुसंसिक्ते क्षौमपद्मदलच्छदे| शयने पुलिनस्पर्शशीतमारुतवीजिते||१२९|| चन्दनार्द्रस्तनकराः प्रिया नार्यः प्रियंवदाः| स्पर्शशीताः सुखस्पर्शा घ्नन्ति दाहं रुजं क्लमम्||१३०|| सरागे सरुजे दाहे रक्तं विस्राव्य लेपयेत्| मधुकाश्वत्थत्वङ्मांसीवीरोदुम्बरशाद्वलैः||१३१|| जलजैर्यवचूर्णैर्वा सयष्ट्याह्वपयोघृतैः| सर्पिषा जीवनीयैर्वा पिष्टैर्लेपोऽर्तिदाहनुत्||१३२|| तिलाः प्रियालो मधुकं बिसं मूलं च वेतसात्| आजेन पयसा पिष्टः प्रलेपो दाहरागनुत्||१३३|| प्रपौण्डरीकमञ्जिष्ठादार्वीमधुकचन्दनैः| सितोपलैरकासक्तुमसूरोशीरपद्मकैः||१३४|| लेपो रुग्दाहवीसर्परागशोफनिवारणः| पित्तरक्तोत्तरे त्वेते, लेपान् वातोत्तरे शृणु||१३५|| वातघ्नैः साधितः स्निग्धः सक्षीरमुद्गपायसः | तिलसर्षपपिण्डैर्वाऽप्युपनाहो रुजापहः||१३६|| औदकप्रसहानूपवेशवाराः सुसंस्कृताः| जीवनीयौषधैः स्नेहयुक्ताः स्युरुपनाहने||१३७|| स्तम्भतोदरुगायामशोथाङ्गग्रहनाशनाः| जीवनीयौषधैः सिद्धा सपयस्का वसाऽपि वा||१३८|| घृतं सहचरान्मूलं जीवन्ती च्छागलं पयः| लेपः पिष्टास्तिलास्तद्वद्भृष्टाः पयसि निर्वृताः||१३९|| क्षीरपिष्टमुमालेपमेरण्डस्य फलानि च| कुर्याच्छूलनिवृत्त्यर्थं शताह्वामनिलेऽधिके||१४०|| समूलाग्रच्छदैरण्डक्वाथे द्विप्रास्थिकं पृथक्| घृतं तैलं वसा मज्जा चानूपमृगपक्षिणाम्||१४१|| कल्कार्थे जीवनीयानि गव्यं क्षीरमथाजकम्| हरिद्रोत्पलकुष्ठैलाशताह्वाश्वहनच्छदान् ||१४२|| बिल्वमात्रान् पृथक् पुष्पं काकुभं चापि साधयेत्| मधूच्छिष्टपलान्यष्टौ दद्याच्छीतेऽवतारिते||१४३|| शूलेनैषोऽर्दिताङ्गानां लेपः सन्धिगतेऽनिले| वातरक्ते च्युते भग्ने खञ्जे कुब्जे च शस्यते||१४४|| शोफगौरवकण्ड्वाद्यैर्युक्ते त्वस्मिन् कफोत्तरे| मूत्रक्षारसुरापक्वं घृतमभ्यञ्जने हितम्||१४५|| पद्मकं त्वक् समधुकं सारिवा चेति तैर्घृतम्| सिद्धं समधुशुक्तं स्यात् सेकाभ्यङ्गे कफोत्तरे||१४६|| क्षारस्तैलं गवां मूत्रं जलं च कटुकैः शृतम्| परिषेके प्रशंसन्ति वातरक्ते कफोत्तरे||१४७|| लेपः सर्षपनिम्बार्कहिंस्राक्षीरतिलैर्हितः| श्रेष्ठः सिद्धः कपित्थत्वग्घृतक्षीरैः ससक्तुभिः||१४८|| गृहधूमो वचा कुष्ठं शताह्वा रजनीद्वयम्| प्रलेपः शूलनुद्वातरक्ते वातकफोत्तरे||१४९|| तगरं त्वक् शताह्वैला कुष्ठं मुस्तं हरेणुका| दारु व्याघ्रनखं चाम्लपिष्टं वातकफास्रनुत्||१५०|| मधुशिग्रोर्हितं तद्वद्बीजं धान्याम्लसंयुतम्| मुहूर्तं लिप्तमम्लैश्च सिञ्चेद्वातकफोत्तरम्||१५१|| त्रिफलाव्योषपत्रैलात्वक्क्षीरीचित्रकं वचाम्| विडङ्गं पिप्पलीमूलं रोमशं वृषकत्वचम्||१५२|| ऋद्धिं तामलकीं चव्यं समभागानि पेषयेत्| कल्यं लिप्तमयस्पात्रे मध्याह्ने भक्षयेत्ततः||१५३|| वर्जयेद्दधिशुक्तानि क्षारं वैरोधिकानि च| वातास्रे सर्वदोषेऽपि हितं शूलार्दिते परम्||१५४|| बुद्ध्वा स्थानविशेषांश्च दोषाणां च बलाबलम्| चिकित्सितमिदं कुर्यादूहापोहविकल्पवित्||१५५||

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Adhikarana 25 (156-159) · Śloka 159

কুপিতে মার্গসংরোধান্মেদসো বা কফস্য বা| অতিবৃদ্ধ্যাঽনিলে নাদৌ শস্তং স্নেহনবৃংহণম্||১৫৬|| ব্যাযামশোধনারিষ্টমূত্রপানৈর্বিরেচনৈঃ| তক্রাভযাপ্রযোগৈশ্চ ক্ষপযেত্ কফমেদসী||১৫৭|| বোধবৃক্ষকষাযং তু প্রপিবেন্মধুনা সহ| বাতরক্তং জযত্যাশু ত্রিদোষমপি দারুণম্||১৫৮|| পুরাণযবগোধূমসীধ্বরিষ্টসুরাসবৈঃ| শিলাজতুপ্রযোগৈশ্চ গুগ্গুলোর্মাক্ষিকস্য চ||১৫৯||

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कुपिते मार्गसंरोधान्मेदसो वा कफस्य वा| अतिवृद्ध्याऽनिले नादौ शस्तं स्नेहनबृंहणम्||१५६|| व्यायामशोधनारिष्टमूत्रपानैर्विरेचनैः| तक्राभयाप्रयोगैश्च क्षपयेत् कफमेदसी||१५७|| बोधवृक्षकषायं तु प्रपिबेन्मधुना सह| वातरक्तं जयत्याशु त्रिदोषमपि दारुणम्||१५८|| पुराणयवगोधूमसीध्वरिष्टसुरासवैः| शिलाजतुप्रयोगैश्च गुग्गुलोर्माक्षिकस्य च||१५९||

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Adhikarana 26 (160) · Śloka 160

গম্ভীরে রক্তমাক্রান্তং স্যাচ্চেত্তদ্বাতবজ্জযেত্| পশ্চাদ্বাতে ক্রিযাং কুর্যাদ্বাতরক্তপ্রসাদনীম্||১৬০||

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गम्भीरे रक्तमाक्रान्तं स्याच्चेत्तद्वातवज्जयेत्| पश्चाद्वाते क्रियां कुर्याद्वातरक्तप्रसादनीम्||१६०||

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Adhikarana 27 (161-162) · Śloka 162

রক্তপিত্তাতিবৃদ্ধ্যা তু পাকমাশু নিযচ্ছতি| ভিন্নং স্রবতি বা রক্তং বিদগ্ধং পূযমেব বা||১৬১|| তযোঃ ক্রিযা বিধাতব্যা ভেদশোধনরোপণৈঃ | কুর্যাদুপদ্রবাণাং চ ক্রিযাং স্বাং স্বাচ্চিকিত্সিতাত্||১৬২||

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रक्तपित्तातिवृद्ध्या तु पाकमाशु नियच्छति| भिन्नं स्रवति वा रक्तं विदग्धं पूयमेव वा||१६१|| तयोः क्रिया विधातव्या भेदशोधनरोपणैः | कुर्यादुपद्रवाणां च क्रियां स्वां स्वाच्चिकित्सितात्||१६२||

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Adhikarana 28 (163-165) · Śloka 165

তত্র শ্লোকাঃ- হেতুঃ স্থানানি মূলং চ যস্মাত্ প্রাযেণ সন্ধিষু| কুপ্যতি প্রাক্ চ যদ্রূপং দ্বিবিধস্য চ লক্ষণম্||১৬৩|| পৃথগ্ভিন্নস্য লিঙ্গং চ দোষাধিক্যমুপদ্রবাঃ| সাধ্যং যাপ্যমসাধ্যং চ ক্রিযা সাধ্যস্য চাখিলা||১৬৪|| বাতরক্তস্য নির্দিষ্টা সমাসব্যাসতস্তথা| মহর্ষিণাঽগ্নিবেশায তথৈবাবস্থিকী ক্রিযা||১৬৫||

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तत्र श्लोकाः- हेतुः स्थानानि मूलं च यस्मात् प्रायेण सन्धिषु| कुप्यति प्राक् च यद्रूपं द्विविधस्य च लक्षणम्||१६३|| पृथग्भिन्नस्य लिङ्गं च दोषाधिक्यमुपद्रवाः| साध्यं याप्यमसाध्यं च क्रिया साध्यस्य चाखिला||१६४|| वातरक्तस्य निर्दिष्टा समासव्यासतस्तथा| महर्षिणाऽग्निवेशाय तथैवावस्थिकी क्रिया||१६५||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 29

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে চিকিত্সিতস্থানে বাতশোণিতচিকিত্সিতং নামৈকোনত্রিংশোঽধ্যাযঃ||২৯||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते चिकित्सितस्थाने वातशोणितचिकित्सितं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः||२९||

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