Adhikarana Urustambhasya nidAnasamprAptipUrvakaM lakShaNam (1-5) · Śloka 5
অথোরুস্তম্ভনিদানম্ | শীতোষ্ণদ্রবসংশুষ্কগুরুস্নিগ্ধৈর্নিষেবিতৈঃ | জীর্ণাজীর্ণে তথাঽঽযাসসঙ্ক্ষোভস্বপ্নজাগরৈঃ ||১|| সশ্লেষ্মমেদঃপবনঃ সামমত্যর্থসঞ্চিতম্ | অভিভূযেতরং দোষমূরূ চেত্ প্রতিপদ্যতে ||২|| সক্থ্যস্থিনী প্রপূর্যান্তঃ শ্লেষ্মণা স্তিমিতেন চ | তদা স্তভ্নাতি তেনোরূ স্তব্ধৌ শীতাবচেতনৌ ||৩|| পরকীযাবিব গুরূ স্যাতামতিভৃশব্যথৌ | ধ্যানাঙ্গমর্দস্তৈমিত্যতন্দ্রাচ্ছর্দ্যরুচিজ্বরৈঃ ||৪|| সংযুক্তৌ পাদসদনকৃচ্ছ্রোদ্ধরণসুপ্তিভিঃ | তমূরুস্তম্ভমিত্যাহুরাঢ্যবাতমথাপরে ||৫|| (বা. নি. অ. ১৫) |
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अथोरुस्तम्भनिदानम् | शीतोष्णद्रवसंशुष्कगुरुस्निग्धैर्निषेवितैः | जीर्णाजीर्णे तथाऽऽयाससङ्क्षोभस्वप्नजागरैः ||१|| सश्लेष्ममेदःपवनः साममत्यर्थसञ्चितम् | अभिभूयेतरं दोषमूरू चेत् प्रतिपद्यते ||२|| सक्थ्यस्थिनी प्रपूर्यान्तः श्लेष्मणा स्तिमितेन च | तदा स्तभ्नाति तेनोरू स्तब्धौ शीतावचेतनौ ||३|| परकीयाविव गुरू स्यातामतिभृशव्यथौ | ध्यानाङ्गमर्दस्तैमित्यतन्द्राच्छर्द्यरुचिज्वरैः ||४|| संयुक्तौ पादसदनकृच्छ्रोद्धरणसुप्तिभिः | तमूरुस्तम्भमित्याहुराढ्यवातमथापरे ||५|| (वा. नि. अ. १५) |
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