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16. mukharōganidānam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো মুখরোগাণাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो मुखरोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

মুখরোগাঃ পঞ্চষষ্টির্ভবন্তি সপ্তস্বাযতনেষু | তত্রাযতনানি- ওষ্ঠৌ, দন্তমূলানি, দন্তাঃ, জিহ্বা, তালু, কণ্ঠঃ, সর্বাণি চেতি | তত্রাষ্টাবোষ্ঠযোঃ, পঞ্চদশ দন্তমূলেষু, অষ্টৌ দন্তেষু, পঞ্চ জিহ্বাযাং, নব তালুনি, সপ্তদশ কণ্ঠে, ত্রযঃ সর্বেষ্বাযতনেষু ||৩||

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मुखरोगाः पञ्चषष्टिर्भवन्ति सप्तस्वायतनेषु | तत्रायतनानि- ओष्ठौ, दन्तमूलानि, दन्ताः, जिह्वा, तालु, कण्ठः, सर्वाणि चेति | तत्राष्टावोष्ठयोः, पञ्चदश दन्तमूलेषु, अष्टौ दन्तेषु, पञ्च जिह्वायां, नव तालुनि, सप्तदश कण्ठे, त्रयः सर्वेष्वायतनेषु ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তত্রৌষ্ঠপ্রকোপা বাতপিত্তশ্লেষ্মসন্নিপাতরক্তমাংসমেদোভিঘাতনিমিত্তাঃ ||৪||

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तत्रौष्ठप्रकोपा वातपित्तश्लेष्मसन्निपातरक्तमांसमेदोभिघातनिमित्ताः ||४||

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Adhikarana 4 (5-12) · Śloka 12

কর্কশৌ পরুষৌ স্তব্ধৌ কৃষ্ণৌ তীব্ররুগন্বিতৌ | দাল্যেতে পরিপাট্যেতে হ্যোষ্ঠৌ মারুতকোপতঃ ||৫|| আচিতৌ পিডকাভিস্তু সর্ষপাকৃতিভির্ভৃশম্ | সদাহপাকসংস্রাবৌ নীলৌ পীতৌ চ পিত্ততঃ ||৬|| সবর্ণাভিস্তু চীযেতে পিডকাভিরবেদনৌ | কণ্ডূমন্তৌ কফাচ্ছূনৌ পিচ্ছিলৌ শীতলৌ গুরূ ||৭|| সকৃত্ কৃষ্ণৌ সকৃত্ পীতৌ সকৃচ্ছ্বেতৌ তথৈব চ | সন্নিপাতেন বিজ্ঞেযাবনেকপিডিকাচিতৌ ||৮|| খর্জূরফলবর্ণাভিঃ পিডকাভিঃ সমাচিতৌ | রক্তোপসৃষ্টৌ রুধিরং স্রবতঃ শোণিতপ্রভৌ ||৯|| মাংসদুষ্টৌ গুরূ স্থূলৌ মাংসপিণ্ডবদুদ্গতৌ | জন্তবশ্চাত্র মূর্চ্ছন্তি সৃক্কস্যোভযতো মুখাত্ ||১০|| মেদসা ঘৃতমণ্ডাভৌ কণ্ডূমন্তৌ স্থিরৌ মৃদূ | অচ্ছং স্ফটিকসঙ্কাশমাস্রাবং স্রবতো গুরূ ||১১|| ক্ষতজাভৌ বিদীর্যেতে পাট্যেতে চাভিঘাততঃ | গ্রথিতৌ চ সমাখ্যাতাবোষ্ঠৌ কণ্ডূসমন্বিতৌ ||১২||

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कर्कशौ परुषौ स्तब्धौ कृष्णौ तीव्ररुगन्वितौ | दाल्येते परिपाट्येते ह्योष्ठौ मारुतकोपतः ||५|| आचितौ पिडकाभिस्तु सर्षपाकृतिभिर्भृशम् | सदाहपाकसंस्रावौ नीलौ पीतौ च पित्ततः ||६|| सवर्णाभिस्तु चीयेते पिडकाभिरवेदनौ | कण्डूमन्तौ कफाच्छूनौ पिच्छिलौ शीतलौ गुरू ||७|| सकृत् कृष्णौ सकृत् पीतौ सकृच्छ्वेतौ तथैव च | सन्निपातेन विज्ञेयावनेकपिडिकाचितौ ||८|| खर्जूरफलवर्णाभिः पिडकाभिः समाचितौ | रक्तोपसृष्टौ रुधिरं स्रवतः शोणितप्रभौ ||९|| मांसदुष्टौ गुरू स्थूलौ मांसपिण्डवदुद्गतौ | जन्तवश्चात्र मूर्च्छन्ति सृक्कस्योभयतो मुखात् ||१०|| मेदसा घृतमण्डाभौ कण्डूमन्तौ स्थिरौ मृदू | अच्छं स्फटिकसङ्काशमास्रावं स्रवतो गुरू ||११|| क्षतजाभौ विदीर्येते पाट्येते चाभिघाततः | ग्रथितौ च समाख्यातावोष्ठौ कण्डूसमन्वितौ ||१२||

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Adhikarana 5 (13) · Śloka 13

দন্তমূলগতাস্তু- শীতাদো, দন্তপুপ্পুটকো, দন্তবেষ্টকঃ, শৌষিরো, মহাশৌষিরঃ, পরিদর, উপকুশো, দন্তবৈদর্ভো, বর্ধনঃ, অধিমাংসো, নাড্যঃ পঞ্চেতি ||১৩||

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दन्तमूलगतास्तु- शीतादो, दन्तपुप्पुटको, दन्तवेष्टकः, शौषिरो, महाशौषिरः, परिदर, उपकुशो, दन्तवैदर्भो, वर्धनः, अधिमांसो, नाड्यः पञ्चेति ||१३||

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Adhikarana 6 (14-26) · Śloka 26

শোণিতং দন্তবেষ্টেভ্যো যস্যাকস্মাত্ প্রবর্ততে | দুর্গন্ধীনি সকৃষ্ণানি প্রক্লেদীনি মৃদূনি চ ||১৪|| দন্তমাংসানি শীর্যন্তে পচন্তি চ পরস্পরম্ | শীতাদো নাম স ব্যাধিঃ কফশোণিতসম্ভবঃ ||১৫|| দন্তযোস্ত্রিষু বা যস্য শ্বযথুঃ সরুজো মহান্ | দন্তপুপ্পুটকো জ্ঞেযঃ কফরক্তনিমিত্তজঃ ||১৬|| স্রবন্তি পূযরুধিরং চলা দন্তা ভবন্তি চ | দন্তবেষ্টঃ স বিজ্ঞেযো দুষ্টশোণিতসম্ভবঃ ||১৭|| শ্বযথুর্দন্তমূলেষু রুজাবান্ কফরক্তজঃ | লালাস্রাবী স বিজ্ঞেযঃ কণ্ডূমাঞ্ শৌষিরো গদঃ ||১৮|| দন্তাশ্চলন্তি বেষ্টেভ্যস্তালু চাপ্যবদীর্যতে | দন্তমাংসানি পচ্যন্তে মুখং চ পরিপীড্যতে ||১৯|| যস্মিন্ স সর্বজো ব্যাধির্মহাশৌষিরসঞ্জ্ঞকঃ | দন্তমাংসানি শীর্যন্তে যস্মিন্ ষ্ঠীবতি চাপ্যসৃক্ ||২০|| পিত্তাসৃক্কফজো ব্যাধির্জ্ঞেযঃ পরিদরো হি সঃ | বেষ্টেষু দাহঃ পাকশ্চ তেভ্যো দন্তাশ্চলন্তি চ ||২১|| আঘট্টিতাঃ প্রস্রবন্তি শোণিতং মন্দবেদনাঃ | আধ্মাযন্তে স্রুতে রক্তে মুখং পূতি চ জাযতে ||২২|| যস্মিন্নুপকুশঃ স স্যাত্ পিত্তরক্তকৃতো গদঃ | ঘৃষ্টেষু দন্তমূলেষু সংরম্ভো জাযতে মহান্ ||২৩|| ভবন্তি চ চলা দন্তাঃ স বৈদর্ভোঽভিঘাতজঃ | মারুতেনাধিকো দন্তো জাযতে তীব্রবেদনঃ ||২৪|| বর্ধনঃ স মতো ব্যাধির্জাতে রুক্ চ প্রশাম্যতি | হানব্যে পশ্চিমে দন্তে মহাঞ্ছোথো মহারুজঃ ||২৫|| লালাস্রাবী কফকৃতো বিজ্ঞেযঃ সোঽধিমাংসকঃ | দন্তমূলগতা নাড্যঃ পঞ্চ জ্ঞেযা যথেরিতাঃ ||২৬||

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शोणितं दन्तवेष्टेभ्यो यस्याकस्मात् प्रवर्तते | दुर्गन्धीनि सकृष्णानि प्रक्लेदीनि मृदूनि च ||१४|| दन्तमांसानि शीर्यन्ते पचन्ति च परस्परम् | शीतादो नाम स व्याधिः कफशोणितसम्भवः ||१५|| दन्तयोस्त्रिषु वा यस्य श्वयथुः सरुजो महान् | दन्तपुप्पुटको ज्ञेयः कफरक्तनिमित्तजः ||१६|| स्रवन्ति पूयरुधिरं चला दन्ता भवन्ति च | दन्तवेष्टः स विज्ञेयो दुष्टशोणितसम्भवः ||१७|| श्वयथुर्दन्तमूलेषु रुजावान् कफरक्तजः | लालास्रावी स विज्ञेयः कण्डूमाञ् शौषिरो गदः ||१८|| दन्ताश्चलन्ति वेष्टेभ्यस्तालु चाप्यवदीर्यते | दन्तमांसानि पच्यन्ते मुखं च परिपीड्यते ||१९|| यस्मिन् स सर्वजो व्याधिर्महाशौषिरसञ्ज्ञकः | दन्तमांसानि शीर्यन्ते यस्मिन् ष्ठीवति चाप्यसृक् ||२०|| पित्तासृक्कफजो व्याधिर्ज्ञेयः परिदरो हि सः | वेष्टेषु दाहः पाकश्च तेभ्यो दन्ताश्चलन्ति च ||२१|| आघट्टिताः प्रस्रवन्ति शोणितं मन्दवेदनाः | आध्मायन्ते स्रुते रक्ते मुखं पूति च जायते ||२२|| यस्मिन्नुपकुशः स स्यात् पित्तरक्तकृतो गदः | घृष्टेषु दन्तमूलेषु संरम्भो जायते महान् ||२३|| भवन्ति च चला दन्ताः स वैदर्भोऽभिघातजः | मारुतेनाधिको दन्तो जायते तीव्रवेदनः ||२४|| वर्धनः स मतो व्याधिर्जाते रुक् च प्रशाम्यति | हानव्ये पश्चिमे दन्ते महाञ्छोथो महारुजः ||२५|| लालास्रावी कफकृतो विज्ञेयः सोऽधिमांसकः | दन्तमूलगता नाड्यः पञ्च ज्ञेया यथेरिताः ||२६||

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Adhikarana 7 (27-35) · Śloka 35

দন্তগতাস্তু- দালনঃ, ক্রিমিদন্তকো, দন্তহর্ষো, ভঞ্জনকঃ, দন্তশর্করা, কপালিকা, শ্যাবদন্তকো, হনুমোক্ষশ্চেতি ||২৭|| দাল্যন্তে বহুধা দন্তা যস্মিংস্তীব্ররুগন্বিতাঃ | দালনঃ স ইতি জ্ঞেযঃ সদাগতিনিমিত্তজঃ ||২৮|| কৃষ্ণশ্ছিদ্রী চলঃ স্রাবী সসংরম্ভো মহারুজঃ | অনিমিত্তরুজো বাতাদ্বিজ্ঞেযঃ কৃমিদন্তকঃ ||২৯|| শীতমুষ্ণং চ দশনাঃ সহন্তে স্পর্শনং ন চ | যস্য তং দন্তহর্ষং তু ব্যাধিং বিদ্যাত্ সমীরণাত্ ||৩০|| বক্ত্রং বক্রং ভবেদ্যস্মিন্ দন্তভঙ্গশ্চ তীব্ররুক্ | কফবাতকৃতো ব্যাধিঃ স ভঞ্জনকসঞ্জ্ঞিতঃ ||৩১|| শর্করেব স্থিরীভূতো মলো দন্তেষু যস্য বৈ | সা দন্তানাং গুণহরী বিজ্ঞেযা দন্তশর্করা ||৩২|| দলন্তি দন্তবল্কানি যদা শর্করযা সহ | জ্ঞেযা কপালিকা সৈব দশনানাং বিনাশিনী ||৩৩|| যোঽসৃঙ্মিশ্রেণ পিত্তেন দগ্ধো দন্তস্ত্বশেষতঃ | শ্যাবতাং নীলতাং বাঽপি গতঃ স শ্যাবদন্তকঃ ||৩৪|| বাতেন তৈস্তৈর্ভাবৈস্তু হনুসন্ধির্বিসংহতঃ | হনুমোক্ষ ইতি জ্ঞেযো ব্যাধিরর্দিতলক্ষণঃ ||৩৫||

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दन्तगतास्तु- दालनः, क्रिमिदन्तको, दन्तहर्षो, भञ्जनकः, दन्तशर्करा, कपालिका, श्यावदन्तको, हनुमोक्षश्चेति ||२७|| दाल्यन्ते बहुधा दन्ता यस्मिंस्तीव्ररुगन्विताः | दालनः स इति ज्ञेयः सदागतिनिमित्तजः ||२८|| कृष्णश्छिद्री चलः स्रावी ससंरम्भो महारुजः | अनिमित्तरुजो वाताद्विज्ञेयः कृमिदन्तकः ||२९|| शीतमुष्णं च दशनाः सहन्ते स्पर्शनं न च | यस्य तं दन्तहर्षं तु व्याधिं विद्यात् समीरणात् ||३०|| वक्त्रं वक्रं भवेद्यस्मिन् दन्तभङ्गश्च तीव्ररुक् | कफवातकृतो व्याधिः स भञ्जनकसञ्ज्ञितः ||३१|| शर्करेव स्थिरीभूतो मलो दन्तेषु यस्य वै | सा दन्तानां गुणहरी विज्ञेया दन्तशर्करा ||३२|| दलन्ति दन्तवल्कानि यदा शर्करया सह | ज्ञेया कपालिका सैव दशनानां विनाशिनी ||३३|| योऽसृङ्मिश्रेण पित्तेन दग्धो दन्तस्त्वशेषतः | श्यावतां नीलतां वाऽपि गतः स श्यावदन्तकः ||३४|| वातेन तैस्तैर्भावैस्तु हनुसन्धिर्विसंहतः | हनुमोक्ष इति ज्ञेयो व्याधिरर्दितलक्षणः ||३५||

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Adhikarana 8 (36-39) · Śloka 39

জিহ্বাগতাস্তু- কণ্টকাস্ত্রিবিধাস্ত্রিভির্দোষৈঃ, অলাস, উপজিহ্বিকা চেতি ||৩৬|| জিহ্বাঽনিলেন স্ফুটিতা প্রসুপ্তা ভবেচ্চ শাকচ্ছদনপ্রকাশা | পিত্তেন পীতা পরিদহ্যতে চ চিতা সরক্তৈরপি কণ্টকৈশ্চ | কফেন গুর্বী বহলা চিতা চ মাংসোদ্গমৈঃ শাল্মলিকণ্টকাভৈঃ ||৩৭|| জিহ্বাতলে যঃ শ্বযথুঃ প্রগাঢঃ সোঽলাসসঞ্জ্ঞঃ কফরক্তমূর্তিঃ | জিহ্বাং স তু স্তম্ভযতি প্রবৃদ্ধো মূলে তু জিহ্বা ভৃশমেতি পাকম্ ||৩৮|| জিহ্বাগ্ররূপঃ শ্বযথুর্হি জিহ্বামুন্নম্য জাতঃ কফরক্তযোনিঃ | প্রসেককণ্ডূপরিদাহযুক্তা প্রকথ্যতেঽসাবুপজিহ্বিকেতি ||৩৯||

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जिह्वागतास्तु- कण्टकास्त्रिविधास्त्रिभिर्दोषैः, अलास, उपजिह्विका चेति ||३६|| जिह्वाऽनिलेन स्फुटिता प्रसुप्ता भवेच्च शाकच्छदनप्रकाशा | पित्तेन पीता परिदह्यते च चिता सरक्तैरपि कण्टकैश्च | कफेन गुर्वी बहला चिता च मांसोद्गमैः शाल्मलिकण्टकाभैः ||३७|| जिह्वातले यः श्वयथुः प्रगाढः सोऽलाससञ्ज्ञः कफरक्तमूर्तिः | जिह्वां स तु स्तम्भयति प्रवृद्धो मूले तु जिह्वा भृशमेति पाकम् ||३८|| जिह्वाग्ररूपः श्वयथुर्हि जिह्वामुन्नम्य जातः कफरक्तयोनिः | प्रसेककण्डूपरिदाहयुक्ता प्रकथ्यतेऽसावुपजिह्विकेति ||३९||

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Adhikarana 9 (40-45) · Śloka 45

তালুগতাস্তু- গলশুণ্ডিকা, তুণ্ডিকেরী, অধ্রুষঃ, কচ্ছপঃ, অর্বুদং, মাংসসঙ্ঘাতঃ, তালুপুপ্পুটঃ, তালুশোষঃ, তালুপাক ইতি ||৪০|| শ্লেষ্মাসৃগ্ভ্যাং তালুমূলাত্ প্রবৃদ্ধো দীর্ঘঃ শোফো ধ্মাতবস্তিপ্রকাশঃ | তৃষ্ণাকাসশ্বাসকৃত্ সম্প্রদিষ্টো ব্যাধির্বৈদ্যৈঃ কণ্ঠশুণ্ডীতি নাম্না ||৪১|| শোফঃ স্থূলস্তোদদাহপ্রপাকী প্রাগুক্তাভ্যাং তুণ্ডিকেরী মতা তু | শোফঃ স্তব্ধো লোহিতস্তালুদেশে রক্তাজ্জ্ঞেযঃ সোঽধ্রুষো রুগ্জ্বরাঢ্যঃ ||৪২|| কূর্মোত্সন্নোঽবেদনোঽশীঘ্রজন্মাঽরক্তো জ্ঞেযঃ কচ্ছপঃ শ্লেষ্মণা স্যাত্ | পদ্মাকারং তালুমধ্যে তু শোফং বিদ্যাদ্রক্তাদর্বুদং প্রোক্তলিঙ্গম্ ||৪৩|| দুষ্টং মাংসং শ্লেষ্মণা নীরুজং চ তাল্বন্তঃস্থং মাংসসঙ্ঘাতমাহুঃ | নীরুক্ স্থাযী কোলমাত্রঃ কফাত্ স্যান্মেদোযুক্তাত্ পুপ্পুটস্তালুদেশে ||৪৪|| শোষোঽত্যর্থং দীর্যতে চাপি তালুঃ শ্বাসো বাতাত্তালুশোষঃ সপিত্তাত্ | পিত্তং কুর্যাত্ পাকমত্যর্থঘোরং তালুন্যেনং তালুপাকং বদন্তি ||৪৫||

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तालुगतास्तु- गलशुण्डिका, तुण्डिकेरी, अध्रुषः, कच्छपः, अर्बुदं, मांससङ्घातः, तालुपुप्पुटः, तालुशोषः, तालुपाक इति ||४०|| श्लेष्मासृग्भ्यां तालुमूलात् प्रवृद्धो दीर्घः शोफो ध्मातबस्तिप्रकाशः | तृष्णाकासश्वासकृत् सम्प्रदिष्टो व्याधिर्वैद्यैः कण्ठशुण्डीति नाम्ना ||४१|| शोफः स्थूलस्तोददाहप्रपाकी प्रागुक्ताभ्यां तुण्डिकेरी मता तु | शोफः स्तब्धो लोहितस्तालुदेशे रक्ताज्ज्ञेयः सोऽध्रुषो रुग्ज्वराढ्यः ||४२|| कूर्मोत्सन्नोऽवेदनोऽशीघ्रजन्माऽरक्तो ज्ञेयः कच्छपः श्लेष्मणा स्यात् | पद्माकारं तालुमध्ये तु शोफं विद्याद्रक्तादर्बुदं प्रोक्तलिङ्गम् ||४३|| दुष्टं मांसं श्लेष्मणा नीरुजं च ताल्वन्तःस्थं मांससङ्घातमाहुः | नीरुक् स्थायी कोलमात्रः कफात् स्यान्मेदोयुक्तात् पुप्पुटस्तालुदेशे ||४४|| शोषोऽत्यर्थं दीर्यते चापि तालुः श्वासो वातात्तालुशोषः सपित्तात् | पित्तं कुर्यात् पाकमत्यर्थघोरं तालुन्येनं तालुपाकं वदन्ति ||४५||

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Adhikarana 10 (46) · Śloka 46

কণ্ঠগতাস্তু- রোহিণ্যঃ পঞ্চ, কণ্ঠশালূকম্, অধিজিহ্বো, বলযো, বলাস , একবৃন্দো, বৃন্দঃ, শতঘ্নী, গিলাযুঃ, গলবিদ্রধিঃ, গলৌঘঃ, স্বরঘ্নো, মাংসতানো, বিদারী চেতি ||৪৬||

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कण्ठगतास्तु- रोहिण्यः पञ्च, कण्ठशालूकम्, अधिजिह्वो, बलयो, बलास , एकवृन्दो, वृन्दः, शतघ्नी, गिलायुः, गलविद्रधिः, गलौघः, स्वरघ्नो, मांसतानो, विदारी चेति ||४६||

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Adhikarana 11 (47-50) · Śloka 50

গলেঽনিলঃ পিত্তকফৌ চ মূর্চ্ছিতৌ পৃথক্ সমস্তাশ্চ তথৈব শোণিতম্ | প্রদূষ্য মাংসং গলরোধিনোঽঙ্কুরান্ সৃজন্তি যান্ সাঽসুহরা হি রোহিণী ||৪৭|| জিহ্বাং সমন্তাদ্ভৃশবেদনা যে মাংসাঙ্কুরাঃ কণ্ঠনিরোধিনঃ স্যুঃ | তাং রোহিণীং বাতকৃতাং বদন্তি বাতাত্মকোপদ্রবগাঢযুক্তাম্ ||৪৮|| ক্ষিপ্রোদ্গমা ক্ষিপ্রবিদাহপাকা তীব্রজ্বরা পিত্তনিমিত্তজা স্যাত্ | স্রোতোনিরোধিন্যপি মন্দপাকা গুর্বী স্থিরা সা কফসম্ভবা বৈ ||৪৯|| গম্ভীরপাকাঽপ্রতিবারবীর্যা ত্রিদোষলিঙ্গা ত্রযসম্ভবা স্যাত্ | স্ফোটাচিতা পিত্তসমানলিঙ্গাঽসাধ্যা প্রদিষ্টা রুধিরাত্মিকেযম্ ||৫০||

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गलेऽनिलः पित्तकफौ च मूर्च्छितौ पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम् | प्रदूष्य मांसं गलरोधिनोऽङ्कुरान् सृजन्ति यान् साऽसुहरा हि रोहिणी ||४७|| जिह्वां समन्ताद्भृशवेदना ये मांसाङ्कुराः कण्ठनिरोधिनः स्युः | तां रोहिणीं वातकृतां वदन्ति वातात्मकोपद्रवगाढयुक्ताम् ||४८|| क्षिप्रोद्गमा क्षिप्रविदाहपाका तीव्रज्वरा पित्तनिमित्तजा स्यात् | स्रोतोनिरोधिन्यपि मन्दपाका गुर्वी स्थिरा सा कफसम्भवा वै ||४९|| गम्भीरपाकाऽप्रतिवारवीर्या त्रिदोषलिङ्गा त्रयसम्भवा स्यात् | स्फोटाचिता पित्तसमानलिङ्गाऽसाध्या प्रदिष्टा रुधिरात्मिकेयम् ||५०||

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Adhikarana 12 (51) · Śloka 51

কোলাস্থিমাত্রঃ কফসম্ভবো যো গ্রন্থির্গলে কণ্টকশূকভূতঃ | খরঃ স্থিরঃ শস্ত্রনিপাতসাধ্যস্তং কণ্ঠশালূকমিতি ব্রুবন্তি ||৫১||

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कोलास्थिमात्रः कफसम्भवो यो ग्रन्थिर्गले कण्टकशूकभूतः | खरः स्थिरः शस्त्रनिपातसाध्यस्तं कण्ठशालूकमिति ब्रुवन्ति ||५१||

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Adhikarana 13 (52) · Śloka 52

জিহ্বাগ্ররূপঃ শ্বযথুঃ কফাত্তু জিহ্বাপ্রবন্ধোপরি রক্তমিশ্রাত্ | জ্ঞেযোঽধিজিহ্বঃ খলু রোগ এষ বিবর্জযেদাগতপাকমেনম্ ||৫২||

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जिह्वाग्ररूपः श्वयथुः कफात्तु जिह्वाप्रबन्धोपरि रक्तमिश्रात् | ज्ञेयोऽधिजिह्वः खलु रोग एष विवर्जयेदागतपाकमेनम् ||५२||

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Adhikarana 14 (53) · Śloka 53

বলাস এবাযতমুন্নতং চ শোফং করোত্যন্নগতিং নিবার্য | তং সর্বথৈবাপ্রতিবারবীর্যং বিবর্জনীযং বলযং বদন্তি ||৫৩||

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बलास एवायतमुन्नतं च शोफं करोत्यन्नगतिं निवार्य | तं सर्वथैवाप्रतिवारवीर्यं विवर्जनीयं वलयं वदन्ति ||५३||

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Adhikarana 15 (54) · Śloka 54

গলে তু শোফং কুরুতঃ প্রবৃদ্ধৌ শ্লেষ্মানিলৌ শ্বাসরুজোপপন্নম্ | মর্মচ্ছিদং দুস্তরমেতদাহুর্বলাসসঞ্জ্ঞং নিপুণা বিকারম্ ||৫৪||

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गले तु शोफं कुरुतः प्रवृद्धौ श्लेष्मानिलौ श्वासरुजोपपन्नम् | मर्मच्छिदं दुस्तरमेतदाहुर्बलाससञ्ज्ञं निपुणा विकारम् ||५४||

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Adhikarana 16 (55-56) · Śloka 56

বৃত্তোন্নতো যঃ শ্বযথুঃ সদাহঃ কণ্ড্বন্বিতোঽপাক্যমৃদুর্গুরুশ্চ | নাম্নৈকবৃন্দঃ পরিকীর্তিতোঽসৌ ব্যাধির্বলাসক্ষতজপ্রসূতঃ ||৫৫|| সমুন্নতং বৃত্তমমন্দদাহং তীব্রজ্বরং বৃন্দমুদাহরন্তি | তং চাপি পিত্তক্ষতজপ্রকোপাদ্বিদ্যাত্ সতোদং পবনাস্রজং তু ||৫৬||

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वृत्तोन्नतो यः श्वयथुः सदाहः कण्ड्वन्वितोऽपाक्यमृदुर्गुरुश्च | नाम्नैकवृन्दः परिकीर्तितोऽसौ व्याधिर्बलासक्षतजप्रसूतः ||५५|| समुन्नतं वृत्तममन्ददाहं तीव्रज्वरं वृन्दमुदाहरन्ति | तं चापि पित्तक्षतजप्रकोपाद्विद्यात् सतोदं पवनास्रजं तु ||५६||

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Adhikarana 17 (57) · Śloka 57

বর্তির্ঘনা কণ্ঠনিরোধিনী যা চিতাঽতিমাত্রং পিশিতপ্ররোহৈঃ | নানারুজোচ্ছ্রাযকরী ত্রিদোষাজ্জ্ঞেযা শতঘ্নীব শতঘ্ন্যসাধ্যা ||৫৭||

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वर्तिर्घना कण्ठनिरोधिनी या चिताऽतिमात्रं पिशितप्ररोहैः | नानारुजोच्छ्रायकरी त्रिदोषाज्ज्ञेया शतघ्नीव शतघ्न्यसाध्या ||५७||

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Adhikarana 18 (58) · Śloka 58

গ্রন্থির্গলে ত্বামলকাস্থিমাত্রঃ স্থিরোঽল্পরুক্ স্যাত্ কফরক্তমূর্তিঃ | সংলক্ষ্যতে সক্তমিবাশনং চ স শস্ত্রসাধ্যস্তু গিলাযুসঞ্জ্ঞঃ ||৫৮||

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ग्रन्थिर्गले त्वामलकास्थिमात्रः स्थिरोऽल्परुक् स्यात् कफरक्तमूर्तिः | संलक्ष्यते सक्तमिवाशनं च स शस्त्रसाध्यस्तु गिलायुसञ्ज्ञः ||५८||

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Adhikarana 19 (59) · Śloka 59

সর্বং গলং ব্যাপ্য সমুত্থিতো যঃ শোফো রুজো যত্র চ সন্তি সর্বাঃ | স সর্বদোষো গলবিদ্রধিস্তু তস্যৈব তুল্যঃ খলু সর্বজস্য ||৫৯||

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सर्वं गलं व्याप्य समुत्थितो यः शोफो रुजो यत्र च सन्ति सर्वाः | स सर्वदोषो गलविद्रधिस्तु तस्यैव तुल्यः खलु सर्वजस्य ||५९||

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Adhikarana 20 (60-61) · Śloka 61

শোফো মহানন্নজলাবরোধী তীব্রজ্বরো বাতগতের্নিহন্তা | কফেন জাতো রুধিরান্বিতেন গলে গলৌঘঃ পরিকীর্ত্যতেঽসৌ ||৬০|| যোঽতিপ্রতাম্যন্ শ্বসিতি প্রসক্তং ভিন্নস্বরঃ শুষ্কবিমুক্তকণ্ঠঃ | কফোপদিগ্ধেষ্বনিলাযনেষু জ্ঞেযঃ স রোগঃ শ্বসনাত্ স্বরঘ্নঃ ||৬১||

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शोफो महानन्नजलावरोधी तीव्रज्वरो वातगतेर्निहन्ता | कफेन जातो रुधिरान्वितेन गले गलौघः परिकीर्त्यतेऽसौ ||६०|| योऽतिप्रताम्यन् श्वसिति प्रसक्तं भिन्नस्वरः शुष्कविमुक्तकण्ठः | कफोपदिग्धेष्वनिलायनेषु ज्ञेयः स रोगः श्वसनात् स्वरघ्नः ||६१||

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Adhikarana 21 (62) · Śloka 62

প্রতানবান্ যঃ শ্বযথুঃ সুকষ্টো গলোপরোধং কুরুতে ক্রমেণ | স মাংসতানঃ কথিতোঽবলম্বী প্রাণপ্রণুত্ সর্বকৃতো বিকারঃ ||৬২||

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प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण | स मांसतानः कथितोऽवलम्बी प्राणप्रणुत् सर्वकृतो विकारः ||६२||

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Adhikarana 22 (63) · Śloka 63

সদাহতোদং শ্বযথুং সরক্তমন্তর্গলে পূতিবিশীর্ণমাংসম্ | পিত্তেন বিদ্যাদ্বদনে বিদারীং পার্শ্বে বিশেষাত্ স তু যেন শেতে ||৬৩||

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सदाहतोदं श्वयथुं सरक्तमन्तर्गले पूतिविशीर्णमांसम् | पित्तेन विद्याद्वदने विदारीं पार्श्वे विशेषात् स तु येन शेते ||६३||

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Adhikarana 23 (64) · Śloka 64

সর্বসরাস্তু বাতপিত্তকফশোণিতনিমিত্তাঃ ||৬৪||

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सर्वसरास्तु वातपित्तकफशोणितनिमित्ताः ||६४||

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Adhikarana 24 (65-66) · Śloka 66

স্ফোটৈঃ সতোদৈর্বদনং সমন্তাদ্যস্যাচিতং সর্বসরঃ স বাতাত্ | রক্তৈঃ সদাহৈস্তনুভিঃ সপীতৈর্যস্যাচিতং চাপি স পিত্তকোপাত্ ||৬৫|| কণ্ডূযুতৈরল্পরুজৈঃ সবর্ণৈর্যস্যাচিতং চাপি স বৈ কফেন | রক্তেন পিত্তোদিত এক এব কৈশ্চিত্ প্রদিষ্টো মুখপাকসঞ্জ্ঞঃ ||৬৬||

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स्फोटैः सतोदैर्वदनं समन्ताद्यस्याचितं सर्वसरः स वातात् | रक्तैः सदाहैस्तनुभिः सपीतैर्यस्याचितं चापि स पित्तकोपात् ||६५|| कण्डूयुतैरल्परुजैः सवर्णैर्यस्याचितं चापि स वै कफेन | रक्तेन पित्तोदित एक एव कैश्चित् प्रदिष्टो मुखपाकसञ्ज्ञः ||६६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 16

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে মুখরোগনিদানং নাম ষোডশোঽধ্যাযঃ ||১৬|| ইতি ভগবতা শ্রীধন্বন্তরিণোপদিষ্টাযাং তচ্ছিষ্যেণ মহর্ষিণা সুশ্রুতেন বিরচিতাযাং সুশ্রুতসংহিতাযাং দ্বিতীযং নিদানস্থানং সমাপ্তম্ |

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इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मुखरोगनिदानं नाम षोडशोऽध्यायः ||१६|| इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां द्वितीयं निदानस्थानं समाप्तम् |

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16. mukharōganidānam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi