Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ভগ্নানাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो भग्नानां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ভগ্নানাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो भग्नानां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
পতনপীডনপ্রহারাক্ষেপণব্যালমৃগদশনপ্রভৃতিভিরভিঘাতবিশেষৈরনেকবিধমস্থ্নাং ভঙ্গমুপদিশন্তি ||৩||
पतनपीडनप्रहाराक्षेपणव्यालमृगदशनप्रभृतिभिरभिघातविशेषैरनेकविधमस्थ्नां भङ्गमुपदिशन्ति ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তত্র ভঙ্গ(গ্ন)জাতমনেকবিধমনুসার্যমাণং দ্বিবিধমেবোপপদ্যতে সন্ধিমুক্তং, কাণ্ডভগ্নং চ | তত্র ষড্বিধং সন্ধিমুক্তং, দ্বাদশবিধং কাণ্ডভগ্নং ভবতি ||৪||
तत्र भङ्ग(ग्न)जातमनेकविधमनुसार्यमाणं द्विविधमेवोपपद्यते सन्धिमुक्तं, काण्डभग्नं च | तत्र षड्विधं सन्धिमुक्तं, द्वादशविधं काण्डभग्नं भवति ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তত্র সন্ধিমুক্তম্- উত্পিষ্টং, বিশ্লিষ্টং, বিবর্তিতম্, অবক্ষিপ্তম্, অতিক্ষিপ্তং, তির্যক্ক্ষিপ্তমিতি ষড্বিধম্ ||৫||
तत्र सन्धिमुक्तम्- उत्पिष्टं, विश्लिष्टं, विवर्तितम्, अवक्षिप्तम्, अतिक्षिप्तं, तिर्यक्क्षिप्तमिति षड्विधम् ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তত্র প্রসারণাকুঞ্চনবিবর্তনাক্ষেপণাশক্তিরুগ্ররুজত্বং স্পর্শাসহত্বং চেতি সামান্যং সন্ধিমুক্তলক্ষণমুক্তম্ ||৬||
तत्र प्रसारणाकुञ्चनविवर्तनाक्षेपणाशक्तिरुग्ररुजत्वं स्पर्शासहत्वं चेति सामान्यं सन्धिमुक्तलक्षणमुक्तम् ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
বৈশেষিকং তূত্পিষ্টে সন্ধাবুভযতঃ শোফো বেদনাপ্রাদুর্ভাবো বিশেষতশ্চ নানাপ্রকারা বেদনা রাত্রৌ প্রাদুর্ভবন্তি; বিশ্লিষ্টেঽল্পঃ শোফো বেদনাসাতত্যং সন্ধিবিক্রিযা চ; বিবর্তিতে তু সন্ধিপার্শ্বাপগমনাদ্বিষমাঙ্গতা বেদনা চ; অবক্ষিপ্তে সন্ধিবিশ্লেষস্তীব্ররুজত্বং চ; অতিক্ষিপ্তে দ্বযোঃ সন্ধ্যস্থ্নোরতিক্রান্ততা বেদনা চ; তির্যক্ক্ষিপ্তে ত্বেকাস্থিপার্শ্বাপগমনমত্যর্থং বেদনা চেতি ||৭||
वैशेषिकं तूत्पिष्टे सन्धावुभयतः शोफो वेदनाप्रादुर्भावो विशेषतश्च नानाप्रकारा वेदना रात्रौ प्रादुर्भवन्ति; विश्लिष्टेऽल्पः शोफो वेदनासातत्यं सन्धिविक्रिया च; विवर्तिते तु सन्धिपार्श्वापगमनाद्विषमाङ्गता वेदना च; अवक्षिप्ते सन्धिविश्लेषस्तीव्ररुजत्वं च; अतिक्षिप्ते द्वयोः सन्ध्यस्थ्नोरतिक्रान्तता वेदना च; तिर्यक्क्षिप्ते त्वेकास्थिपार्श्वापगमनमत्यर्थं वेदना चेति ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
কাণ্ডভগ্নমত ঊর্ধ্বং বক্ষ্যামঃ- কর্কটকম্, অশ্বকর্ণং, চূর্ণিতং, পিচ্চিতম্, অস্থিচ্ছল্লিতং, কাণ্ডভগ্নং, মজ্জানুগতম্, অতিপাতিতং, বক্রং, ছিন্নং, পাটিতং, স্ফুটিতমিতি দ্বাদশবিধম্ ||৮||
काण्डभग्नमत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः- कर्कटकम्, अश्वकर्णं, चूर्णितं, पिच्चितम्, अस्थिच्छल्लितं, काण्डभग्नं, मज्जानुगतम्, अतिपातितं, वक्रं, छिन्नं, पाटितं, स्फुटितमिति द्वादशविधम् ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
শ্বযথুবাহুল্যং স্পন্দনবিবর্তনস্পর্শাসহিষ্ণুত্বমবপীড্যমানে শব্দঃ স্রস্তাঙ্গতা বিবিধবেদনাপ্রাদুর্ভাবঃ সর্বাস্ববস্থাসু ন শর্মলাভ ইতি সমাসেন কাণ্ডভগ্নলক্ষণমুক্তম্ ||৯||
श्वयथुबाहुल्यं स्पन्दनविवर्तनस्पर्शासहिष्णुत्वमवपीड्यमाने शब्दः स्रस्ताङ्गता विविधवेदनाप्रादुर्भावः सर्वास्ववस्थासु न शर्मलाभ इति समासेन काण्डभग्नलक्षणमुक्तम् ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
বিশেষস্তু সম্মূঢমুভযতোঽস্থি মধ্যে ভ(ল)গ্নং গ্রন্থিরিবোন্নতং কর্কটকম্, অশ্বকর্ণবদুদ্গতমশ্বকর্ণকং, স্পৃশ্যমানং শব্দবচ্চূর্ণিতমবগচ্ছেত্, পিচ্চিতং পৃথুতাং গতমনল্পশোফং , পার্শ্বযোরস্থি হীনোদ্গতমস্থিচ্ছলিতং, বেল্লতে প্রকম্পমানং কাণ্ডভগ্নম্, অস্থ্যবযবোঽস্থিমধ্যমনুপ্রবিশ্য মজ্জানমুন্নহ্যতীতি মজ্জানুগতম্, অস্থি নিঃশেষতশ্ছিন্নমতিপাতিতম্, আভুগ্নমবিমুক্তাস্থি বক্রম্, অন্যতরপার্শ্বাবশিষ্টং ছিন্নং, পাটিতমণুবহুবিদারিতং বেদনাবচ্চ, শূকপূর্ণমিবাধ্মাতং বিপুলং বিস্ফুটিতং স্ফুটিতমিতি ||১০||
विशेषस्तु सम्मूढमुभयतोऽस्थि मध्ये भ(ल)ग्नं ग्रन्थिरिवोन्नतं कर्कटकम्, अश्वकर्णवदुद्गतमश्वकर्णकं, स्पृश्यमानं शब्दवच्चूर्णितमवगच्छेत्, पिच्चितं पृथुतां गतमनल्पशोफं , पार्श्वयोरस्थि हीनोद्गतमस्थिच्छलितं, वेल्लते प्रकम्पमानं काण्डभग्नम्, अस्थ्यवयवोऽस्थिमध्यमनुप्रविश्य मज्जानमुन्नह्यतीति मज्जानुगतम्, अस्थि निःशेषतश्छिन्नमतिपातितम्, आभुग्नमविमुक्तास्थि वक्रम्, अन्यतरपार्श्वावशिष्टं छिन्नं, पाटितमणुबहुविदारितं वेदनावच्च, शूकपूर्णमिवाध्मातं विपुलं विस्फुटितं स्फुटितमिति ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
তেষু চূর্ণিতচ্ছিন্নাতিপাতিতমজ্জানুগতানি কৃচ্ছ্রসাধ্যানি, কৃশবৃদ্ধবালানাং ক্ষতক্ষীণকুষ্ঠিশ্বাসিনাং সন্ধ্যুপগতং চেতি ||১১||
तेषु चूर्णितच्छिन्नातिपातितमज्जानुगतानि कृच्छ्रसाध्यानि, कृशवृद्धबालानां क्षतक्षीणकुष्ठिश्वासिनां सन्ध्युपगतं चेति ||११||
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Adhikarana 11 (12-14) · Śloka 15
ভবন্তি চাত্র- ভিন্নং কপালং কট্যাং তু সন্ধিমুক্তং তথা চ্যুতম্ | জঘনং প্রতি পিষ্টং চ বর্জযেত্তচ্চিকিত্সকঃ ||১২|| অসংশ্লিষ্টং কপালং তু ললাটে চূর্ণিতং চ যত্ | ভগ্নং স্তনান্তরে শঙ্খে পৃষ্ঠে মূর্ধ্নি চ বর্জযেত্ ||১৩|| আদিতো যচ্চ দুর্জাতমস্থি সন্ধিরথাপি বা | সম্যগ্যমিতমপ্যস্থি দুর্ন্যাসাদ্দুর্নিবন্ধনাত্ ||১৪|| সঙ্ক্ষোভাদ্বাঽপি যদ্গচ্ছেদ্বিক্রিযাং তচ্চ বর্জযেত্ |১৫|
भवन्ति चात्र- भिन्नं कपालं कट्यां तु सन्धिमुक्तं तथा च्युतम् | जघनं प्रति पिष्टं च वर्जयेत्तच्चिकित्सकः ||१२|| असंश्लिष्टं कपालं तु ललाटे चूर्णितं च यत् | भग्नं स्तनान्तरे शङ्खे पृष्ठे मूर्ध्नि च वर्जयेत् ||१३|| आदितो यच्च दुर्जातमस्थि सन्धिरथापि वा | सम्यग्यमितमप्यस्थि दुर्न्यासाद्दुर्निबन्धनात् ||१४|| सङ्क्षोभाद्वाऽपि यद्गच्छेद्विक्रियां तच्च वर्जयेत् |१५|
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Adhikarana 12 (15) · Śloka 16
মধ্যস্য বযসোঽবস্থাস্তিস্রো যাঃ পরিকীর্তিতাঃ ||১৫|| তত্র স্থিরো ভবেজ্জন্তুরুপক্রান্তো বিজানতা |১৬|
मध्यस्य वयसोऽवस्थास्तिस्रो याः परिकीर्तिताः ||१५|| तत्र स्थिरो भवेज्जन्तुरुपक्रान्तो विजानता |१६|
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Adhikarana 13 (16) · Śloka 17
তরুণাস্থীনি নম্যন্তে ভজ্যন্তে নলকানি তু ||১৬|| কপালানি বিভিদ্যন্তে স্ফুটন্তি রুচকানি চ ||১৭||
तरुणास्थीनि नम्यन्ते भज्यन्ते नलकानि तु ||१६|| कपालानि विभिद्यन्ते स्फुटन्ति रुचकानि च ||१७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 15
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে ভগ্ননিদানং নাম পঞ্চদশোঽধ্যাযঃ ||১৫||
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने भग्ननिदानं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ||१५||
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