Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽপস্মারচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातोऽपस्मारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽপস্মারচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातोऽपस्मारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
স্মৃতেরপগমং প্রাহুরপস্মারং ভিষগ্বিদঃ| তমঃপ্রবেশং বীভত্সচেষ্টং ধীসত্ত্বসম্প্লবাত্||৩||
स्मृतेरपगमं प्राहुरपस्मारं भिषग्विदः| तमःप्रवेशं बीभत्सचेष्टं धीसत्त्वसम्प्लवात्||३||
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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
বিভ্রান্তবহুদোষাণামহিতাশুচিভোজনাত্ | রজস্তমোভ্যাং বিহতে সত্ত্বে দোষাবৃতে হৃদি||৪|| চিন্তাকামভযক্রোধশোকোদ্বেগাদিভিস্তথা| মনস্যভিহতে নৄণামপস্মারঃ প্রবর্ততে||৫||
विभ्रान्तबहुदोषाणामहिताशुचिभोजनात् | रजस्तमोभ्यां विहते सत्त्वे दोषावृते हृदि||४|| चिन्ताकामभयक्रोधशोकोद्वेगादिभिस्तथा| मनस्यभिहते नॄणामपस्मारः प्रवर्तते||५||
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Adhikarana 4 (6-7) · Śloka 8
ধমনীভিঃ শ্রিতা দোষা হৃদযং পীডযন্তি হি| সম্পীড্যমানো ব্যথতে মূঢো ভ্রান্তেন চেতসা||৬|| পশ্যত্যসন্তি রূপাণি পততি প্রস্ফুরত্যপি| জিহ্বাক্ষিভ্রূঃ স্রবল্লালো হস্তৌ পাদৌ চ বিক্ষিপন্||৭|| দোষবেগে চ বিগতে সুপ্তবত্ প্রতিবুদ্ধ্যতে|৮|
धमनीभिः श्रिता दोषा हृदयं पीडयन्ति हि| सम्पीड्यमानो व्यथते मूढो भ्रान्तेन चेतसा||६|| पश्यत्यसन्ति रूपाणि पतति प्रस्फुरत्यपि| जिह्वाक्षिभ्रूः स्रवल्लालो हस्तौ पादौ च विक्षिपन्||७|| दोषवेगे च विगते सुप्तवत् प्रतिबुद्ध्यते|८|
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Adhikarana 5 (8-13) · Śloka 13
পৃথগ্দোষৈঃ সমস্তৈশ্চ বক্ষ্যতে স চতুর্বিধঃ||৮|| কম্পতে প্রদশেদ্দন্তান্ ফেনোদ্বামী শ্বসিত্যপি| পরুষারুণকৃষ্ণানি পশ্যেদ্রূপাণি চানিলাত্||৯|| পীতফেনাঙ্গবক্ত্রাক্ষঃ পীতাসৃগ্রূপদর্শনঃ| সতৃষ্ণোষ্ণানলব্যাপ্তলোকদর্শী চ পৈত্তিকঃ||১০|| শুক্লফেনাঙ্গবক্ত্রাক্ষঃ শীতো হৃষ্টাঙ্গজো গুরুঃ| পশ্যঞ্ছুক্লানি রূপাণি শ্লৈষ্মিকো মুচ্যতে চিরাত্||১১|| সর্বৈরেতৈঃ সমস্তৈস্তু লিঙ্গৈর্জ্ঞেযস্ত্রিদোষজঃ| অপস্মারঃ স চাসাধ্যো যঃ ক্ষীণস্যানবশ্চ যঃ||১২|| পক্ষাদ্বা দ্বাদশাহাদ্বা মাসাদ্বা কুপিতা মলাঃ| অপস্মারায কুর্বন্তি বেগং কিঞ্চিদথান্তরম্||১৩||
पृथग्दोषैः समस्तैश्च वक्ष्यते स चतुर्विधः||८|| कम्पते प्रदशेद्दन्तान् फेनोद्वामी श्वसित्यपि| परुषारुणकृष्णानि पश्येद्रूपाणि चानिलात्||९|| पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः| सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः||१०|| शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतो हृष्टाङ्गजो गुरुः| पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि श्लैष्मिको मुच्यते चिरात्||११|| सर्वैरेतैः समस्तैस्तु लिङ्गैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः| अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः||१२|| पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः| अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किञ्चिदथान्तरम्||१३||
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Adhikarana 6 (14-15) · Śloka 15
তৈরাবৃতানাং হৃত্স্রোতোমনসাং সম্প্রবোধনম্| তীক্ষ্ণৈরাদৌ ভিষক্ কুর্যাত্ কর্মভির্বমনাদিভিঃ||১৪|| বাতিকং বস্তিভূযিষ্ঠৈঃ পৈত্তং প্রাযো বিরেচনৈঃ| শ্লৈষ্মিকং বমনপ্রাযৈরপস্মারমুপাচরেত্||১৫||
तैरावृतानां हृत्स्रोतोमनसां सम्प्रबोधनम्| तीक्ष्णैरादौ भिषक् कुर्यात् कर्मभिर्वमनादिभिः||१४|| वातिकं बस्तिभूयिष्ठैः पैत्तं प्रायो विरेचनैः| श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत्||१५||
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Adhikarana 7 (16-17) · Śloka 17
সর্বতঃ সুবিশুদ্ধস্য সম্যগাশ্বাসিতস্য চ| অপস্মারবিমোক্ষার্থং যোগান্ সংশমনাঞ্ছৃণু||১৬|| গোশকৃদ্রসদধ্যম্লক্ষীরমূত্রৈঃ সমৈর্ঘৃতম্| সিদ্ধং পিবেদপস্মারকামলাজ্বরনাশনম্||১৭|| ইতি পঞ্চগব্যং ঘৃতম্|
सर्वतः सुविशुद्धस्य सम्यगाश्वासितस्य च| अपस्मारविमोक्षार्थं योगान् संशमनाञ्छृणु||१६|| गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्घृतम्| सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम्||१७|| इति पञ्चगव्यं घृतम्|
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Adhikarana 8 (18-24) · Śloka 24
দ্বে পঞ্চমূল্যৌ ত্রিফলা রজন্যৌ কুটজত্বচম্| সপ্তপর্ণমপামার্গং নীলিনীং কটুরোহিণীম্||১৮|| শম্পাকং ফল্গুমূলং চ পৌষ্করং সদুরালভম্| দ্বিপলানি জলদ্রোণে পক্ত্বা পাদাবশেষিতে||১৯|| ভার্গীং পাঠাং ত্রিকটুকং ত্রিবৃতাং নিচুলানি চ| শ্রেযসীমাঢকীং মূর্বাং দন্তীং ভূনিম্বচিত্রকৌ||২০|| দ্বে সারিবে রোহিষং চ ভূতীকং মদযন্তিকাম্| ক্ষিপেত্পিষ্ট্বাঽক্ষমাত্রাণি তেন প্রস্থং ঘৃতাত্ পচেত্||২১|| গোশকৃদ্রসদধ্যম্লক্ষীরমূত্রৈশ্চ তত্সমৈঃ| পঞ্চগব্যমিতি খ্যাতং মহত্তদমৃতোপমম্||২২|| অপস্মারে তথোন্মাদে শ্বযথাবুদরেষু চ| গুল্মার্শঃপাণ্ডুরোগেষু কামলাযাং হলীমকে||২৩|| শস্যতে ঘৃতমেতত্তু প্রযোক্তব্যং দিনে দিনে| অলক্ষ্মীগ্রহরোগঘ্নং চাতুর্থকবিনাশনম্||২৪|| ইতি মহাপঞ্চগব্যং ঘৃতম্|
द्वे पञ्चमूल्यौ त्रिफला रजन्यौ कुटजत्वचम्| सप्तपर्णमपामार्गं नीलिनीं कटुरोहिणीम्||१८|| शम्पाकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम्| द्विपलानि जलद्रोणे पक्त्वा पादावशेषिते||१९|| भार्गीं पाठां त्रिकटुकं त्रिवृतां निचुलानि च| श्रेयसीमाढकीं मूर्वां दन्तीं भूनिम्बचित्रकौ||२०|| द्वे सारिवे रोहिषं च भूतीकं मदयन्तिकाम्| क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तेन प्रस्थं घृतात् पचेत्||२१|| गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैश्च तत्समैः| पञ्चगव्यमिति ख्यातं महत्तदमृतोपमम्||२२|| अपस्मारे तथोन्मादे श्वयथावुदरेषु च| गुल्मार्शःपाण्डुरोगेषु कामलायां हलीमके||२३|| शस्यते घृतमेतत्तु प्रयोक्तव्यं दिने दिने| अलक्ष्मीग्रहरोगघ्नं चातुर्थकविनाशनम्||२४|| इति महापञ्चगव्यं घृतम्|
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Adhikarana 9 (25-27) · Śloka 27
ব্রাহ্মীরসবচাকুষ্ঠশঙ্খপুষ্পীভিরেব চ| পুরাণং ঘৃতমুন্মাদালক্ষ্ম্যপস্মারপাপনুত্||২৫|| ঘৃতং সৈন্ধবহিঙ্গুভ্যাং বার্ষে বাস্তে চতুর্গুণে| মূত্রে সিদ্ধমপস্মারহৃদ্গ্রহামযনাশনম্||২৬|| বচাশম্পাককৈটর্যবযঃস্থাহিঙ্গুচোরকৈঃ| সিদ্ধং পলঙ্কষাযুক্তৈর্বাতশ্লেষ্মাত্মকে ঘৃতম্||২৭||
ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च| पुराणं घृतमुन्मादालक्ष्म्यपस्मारपापनुत्||२५|| घृतं सैन्धवहिङ्गुभ्यां वार्षे बास्ते चतुर्गुणे| मूत्रे सिद्धमपस्मारहृद्ग्रहामयनाशनम्||२६|| वचाशम्पाककैटर्यवयःस्थाहिङ्गुचोरकैः| सिद्धं पलङ्कषायुक्तैर्वातश्लेष्मात्मके घृतम्||२७||
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Adhikarana 10 (28-31) · Śloka 31
তৈলপ্রস্থং ঘৃতপ্রস্থং জীবনীযৈঃ পলোন্মিতৈঃ| ক্ষীরদ্রোণে পচেত্ সিদ্ধমপস্মারবিনাশনম্||২৮|| কংসে ক্ষীরেক্ষুরসযোঃ কাশ্মর্যেঽষ্টগুণে রসে| কার্ষিকৈর্জীবনীযৈশ্চ ঘৃতপ্রস্থং বিপাচযেত্||২৯|| বাতপিত্তোদ্ভবং ক্ষিপ্রমপস্মারং নিযচ্ছতি| তদ্বত্ কাশবিদারীক্ষুকুশক্বাথশৃতং ঘৃতম্||৩০|| মধুকদ্বিপলে কল্কে দ্রোণে চামলকীরসাত্| তদ্বত্ সিদ্ধো ঘৃতপ্রস্থঃ পিত্তাপস্মারভেষজম্||৩১||
तैलप्रस्थं घृतप्रस्थं जीवनीयैः पलोन्मितैः| क्षीरद्रोणे पचेत् सिद्धमपस्मारविनाशनम्||२८|| कंसे क्षीरेक्षुरसयोः काश्मर्येऽष्टगुणे रसे| कार्षिकैर्जीवनीयैश्च घृतप्रस्थं विपाचयेत्||२९|| वातपित्तोद्भवं क्षिप्रमपस्मारं नियच्छति| तद्वत् काशविदारीक्षुकुशक्वाथशृतं घृतम्||३०|| मधुकद्विपले कल्के द्रोणे चामलकीरसात्| तद्वत् सिद्धो घृतप्रस्थः पित्तापस्मारभेषजम्||३१||
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Adhikarana 11 (32-33) · Śloka 33
অভ্যঙ্গঃ সার্ষপং তৈলং বস্তমূত্রে চতুর্গুণে| সিদ্ধং স্যাদ্গোশকৃন্মূত্রৈঃ স্নানোত্সাদনমেব চ||৩২|| কটভীনিম্বকট্বঙ্গমধুশিগ্রুত্বচাং রসে| সিদ্ধং মূত্রসমং তৈলমভ্যঙ্গার্থে প্রশস্যতে||৩৩||
अभ्यङ्गः सार्षपं तैलं बस्तमूत्रे चतुर्गुणे| सिद्धं स्याद्गोशकृन्मूत्रैः स्नानोत्सादनमेव च||३२|| कटभीनिम्बकट्वङ्गमधुशिग्रुत्वचां रसे| सिद्धं मूत्रसमं तैलमभ्यङ्गार्थे प्रशस्यते||३३||
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Adhikarana 12 (34-36) · Śloka 36
পলঙ্কষাবচাপথ্যাবৃশ্চিকাল্যর্কসর্ষপৈঃ| জটিলাপূতনাকেশীনাকুলীহিঙ্গুচোরকৈঃ||৩৪|| লশুনাতিরসাচিত্রাকুষ্ঠৈর্বিড্ভিশ্চ পক্ষিণাম্| মাংসাশিনাং যথালাভং বস্তমূত্রে চতুর্গুণে||৩৫|| সিদ্ধমভ্যঞ্জনং তৈলমপস্মারবিনাশনম্| এতৈশ্চৈবৌষধৈঃ কার্যং ধূপনং সপ্রলেপনম্||৩৬||
पलङ्कषावचापथ्यावृश्चिकाल्यर्कसर्षपैः| जटिलापूतनाकेशीनाकुलीहिङ्गुचोरकैः||३४|| लशुनातिरसाचित्राकुष्ठैर्विड्भिश्च पक्षिणाम्| मांसाशिनां यथालाभं बस्तमूत्रे चतुर्गुणे||३५|| सिद्धमभ्यञ्जनं तैलमपस्मारविनाशनम्| एतैश्चैवौषधैः कार्यं धूपनं सप्रलेपनम्||३६||
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Adhikarana 13 (37-38) · Śloka 38
পিপ্পলীং লবণং চিত্রাং হিঙ্গু হিঙ্গুশিবাটিকাম্| কাকোলীং সর্ষপান্ কাকনাসাং কৈটর্যচন্দনে||৩৭|| শুনঃস্কন্ধাস্থিনখরান্ পর্শুকাং চেতি পেষযেত্| বস্তমূত্রেণ পুষ্যর্ক্ষে প্রদেহঃ স্যাত্ সধূপনঃ||৩৮||
पिप्पलीं लवणं चित्रां हिङ्गु हिङ्गुशिवाटिकाम्| काकोलीं सर्षपान् काकनासां कैटर्यचन्दने||३७|| शुनःस्कन्धास्थिनखरान् पर्शुकां चेति पेषयेत्| बस्तमूत्रेण पुष्यर्क्षे प्रदेहः स्यात् सधूपनः||३८||
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Adhikarana 14 (39-40) · Śloka 40
অপেতরাক্ষসীকুষ্ঠপূতনাকেশিচোরকৈঃ| উত্সাদনং মূত্রপিষ্টৈর্মূত্রৈরেবাবসেচনম্||৩৯|| জলৌকঃশকৃতা তদ্বদ্দগ্ধৈর্বা বস্তরোমভিঃ| খরাস্থিভির্হস্তিনখৈস্তথা গোপুচ্ছলোমভিঃ||৪০||
अपेतराक्षसीकुष्ठपूतनाकेशिचोरकैः| उत्सादनं मूत्रपिष्टैर्मूत्रैरेवावसेचनम्||३९|| जलौकःशकृता तद्वद्दग्धैर्वा बस्तरोमभिः| खरास्थिभिर्हस्तिनखैस्तथा गोपुच्छलोमभिः||४०||
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Adhikarana 15 (41-45) · Śloka 45
কপিলানাং গবাং মূত্রং নাবনং পরমং হিতম্| শ্বশৃগালবিডালানাং সিংহাদীনাং চ শস্যতে||৪১|| ভার্গী বচা নাগদন্তী শ্বেতা শ্বেতা বিষাণিকা| জ্যোতিষ্মতী নাগদন্তী পাদোক্তা মূত্রপেষিতাঃ||৪২|| যোগাস্ত্রযোঽতঃ ষড্ বিন্দূন্ পঞ্চ বা নাবযেদ্ভিষক্| ত্রিফলাব্যোষপীতদ্রুযবক্ষারফণিজ্ঝকৈঃ||৪৩|| শ্যামাপামার্গকারঞ্জফলৈর্মূত্রেঽথ বস্তজে| সাধিতং নাবনং তৈলমপস্মারবিনাশনম্||৪৪|| পিপ্পলী বৃশ্চিকালী চ কুষ্ঠং চ লবণানি চ| ভার্গী চ চূর্ণিতং নস্তঃ কার্যং প্রধমনং পরম্||৪৫||
कपिलानां गवां मूत्रं नावनं परमं हितम्| श्वशृगालबिडालानां सिंहादीनां च शस्यते||४१|| भार्गी वचा नागदन्ती श्वेता श्वेता विषाणिका| ज्योतिष्मती नागदन्ती पादोक्ता मूत्रपेषिताः||४२|| योगास्त्रयोऽतः षड् बिन्दून् पञ्च वा नावयेद्भिषक्| त्रिफलाव्योषपीतद्रुयवक्षारफणिज्झकैः||४३|| श्यामापामार्गकारञ्जफलैर्मूत्रेऽथ बस्तजे| साधितं नावनं तैलमपस्मारविनाशनम्||४४|| पिप्पली वृश्चिकाली च कुष्ठं च लवणानि च| भार्गी च चूर्णितं नस्तः कार्यं प्रधमनं परम्||४५||
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Adhikarana 16 (46-49) · Śloka 49
কাযস্থাং শারদান্মুদ্গান্মুস্তোশীরযবাংস্তথা| সব্যোষান্ বস্তমূত্রেণ পিষ্ট্বা বর্তীঃ প্রকল্পযেত্||৪৬|| অপস্মারে তথোন্মাদে সর্পদষ্টে গরার্দিতে| বিষপীতে জলমৃতে চৈতাঃ স্যুরমৃতোপমাঃ||৪৭|| মুস্তং বযঃস্থাং ত্রিফলাং কাযস্থাং হিঙ্গু শাদ্বলম্| ব্যোষং মাষান্ যবান্মূত্রৈর্বাস্তমৈষার্ষভৈস্ত্রিভিঃ||৪৮|| পিষ্ট্বা কৃত্বা চ তাং বর্তিমপস্মারে প্রযোজযেত্| কিলাসে চ তথোন্মাদে জ্বরেষু বিষমেষু চ||৪৯||
कायस्थां शारदान्मुद्गान्मुस्तोशीरयवांस्तथा| सव्योषान् बस्तमूत्रेण पिष्ट्वा वर्तीः प्रकल्पयेत्||४६|| अपस्मारे तथोन्मादे सर्पदष्टे गरार्दिते| विषपीते जलमृते चैताः स्युरमृतोपमाः||४७|| मुस्तं वयःस्थां त्रिफलां कायस्थां हिङ्गु शाद्वलम्| व्योषं माषान् यवान्मूत्रैर्बास्तमैषार्षभैस्त्रिभिः||४८|| पिष्ट्वा कृत्वा च तां वर्तिमपस्मारे प्रयोजयेत्| किलासे च तथोन्मादे ज्वरेषु विषमेषु च||४९||
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Adhikarana 17 (50-52) · Śloka 52
পুষ্যোদ্ধৃতং শুনঃ পিত্তমপস্মারঘ্নমঞ্জনম্| তদেব সর্পিষা যুক্তং ধূপনং পরমং মতম্||৫০|| নকুলোলূকমার্জারগৃধ্রকীটাহিকাকজৈঃ| তুণ্ডৈঃ পক্ষৈঃ পুরীষৈশ্চ ধূপনং কারযেদ্ভিষক্||৫১|| আভিঃ ক্রিযাভিঃ সিদ্ধাভির্হৃদযং সম্প্রবুধ্যতে| স্রোতাংসি চাপি শুধ্যন্তি ততঃ সঞ্জ্ঞাং স বিন্দতি||৫২||
पुष्योद्धृतं शुनः पित्तमपस्मारघ्नमञ्जनम्| तदेव सर्पिषा युक्तं धूपनं परमं मतम्||५०|| नकुलोलूकमार्जारगृध्रकीटाहिकाकजैः| तुण्डैः पक्षैः पुरीषैश्च धूपनं कारयेद्भिषक्||५१|| आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिर्हृदयं सम्प्रबुध्यते| स्रोतांसि चापि शुध्यन्ति ततः सञ्ज्ञां स विन्दति||५२||
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Adhikarana 18 (53) · Śloka 53
যস্যানুবন্ধস্ত্বাগন্তুর্দোষলিঙ্গাধিকাকৃতিঃ| দৃশ্যেত তস্য কার্যং স্যাদাগন্তূন্মাদভেষজম্||৫৩||
यस्यानुबन्धस्त्वागन्तुर्दोषलिङ्गाधिकाकृतिः| दृश्येत तस्य कार्यं स्यादागन्तून्मादभेषजम्||५३||
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Adhikarana 19 (54-63) · Śloka 63
অনন্তরমুবাচেদমগ্নিবেশঃ কৃতাঞ্জলিঃ| ভগবন্! প্রাক্ সমুদ্দিষ্টঃ শ্লোকস্থানে মহাগদঃ||৫৪|| অতত্ত্বাভিনিবেশো যস্তদ্ধেত্বাকৃতিভেষজম্| তত্র নোক্তমতঃ শ্রোতুমিচ্ছামি তদিহোচ্যতাম্||৫৫|| শুশ্রূষবে বচঃ শ্রুত্বা শিষ্যাযাহ পুনর্বসুঃ| মহাগদং সৌম্য! শৃণু সহেত্বাকৃতিভেষজম্||৫৬|| মলিনাহারশীলস্য বেগান্ প্রাপ্তান্নিগৃহ্ণতঃ| শীতোষ্ণস্নিগ্ধরূক্ষাদ্যৈর্হেতুভিশ্চাতিসেবিতৈঃ||৫৭|| হৃদযং সমুপাশ্রিত্য মনোবুদ্ধিবহাঃ সিরাঃ| দোষাঃ সন্দূষ্য তিষ্ঠন্তি রজোমোহাবৃতাত্মনঃ||৫৮|| রজস্তমোভ্যাং বৃদ্ধাভ্যাং বুদ্ধৌ মনসি চাবৃতে| হৃদযে ব্যাকুলে দোষৈরথ মূঢোঽল্পচেতনঃ ||৫৯|| বিষমাং কুরুতে বুদ্ধিং নিত্যানিত্যে হিতাহিতে| অতত্ত্বাভিনিবেশং তমাহুরাপ্তা মহাগদম্||৬০|| স্নেহস্বেদোপপন্নং তং সংশোধ্য বমনাদিভিঃ| কৃতসংসর্জনং মেধ্যৈরন্নপানৈরুপাচরেত্||৬১|| ব্রাহ্মীস্বরসযুক্তং যত্ পঞ্চগব্যমুদাহৃতম্| তত্ সেব্যং শঙ্খপুষ্পী চ যচ্চ মেধ্যং রসাযনম্||৬২|| সুহৃদশ্চানুকূলাস্তং স্বাপ্তা ধর্মার্থবাদিনঃ| সংযোজযেযুর্বিজ্ঞানধৈর্যস্মৃতিসমাধিভিঃ ||৬৩||
अनन्तरमुवाचेदमग्निवेशः कृताञ्जलिः| भगवन्! प्राक् समुद्दिष्टः श्लोकस्थाने महागदः||५४|| अतत्त्वाभिनिवेशो यस्तद्धेत्वाकृतिभेषजम्| तत्र नोक्तमतः श्रोतुमिच्छामि तदिहोच्यताम्||५५|| शुश्रूषवे वचः श्रुत्वा शिष्यायाह पुनर्वसुः| महागदं सौम्य! शृणु सहेत्वाकृतिभेषजम्||५६|| मलिनाहारशीलस्य वेगान् प्राप्तान्निगृह्णतः| शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैर्हेतुभिश्चातिसेवितैः||५७|| हृदयं समुपाश्रित्य मनोबुद्धिवहाः सिराः| दोषाः सन्दूष्य तिष्ठन्ति रजोमोहावृतात्मनः||५८|| रजस्तमोभ्यां वृद्धाभ्यां बुद्धौ मनसि चावृते| हृदये व्याकुले दोषैरथ मूढोऽल्पचेतनः ||५९|| विषमां कुरुते बुद्धिं नित्यानित्ये हिताहिते| अतत्त्वाभिनिवेशं तमाहुराप्ता महागदम्||६०|| स्नेहस्वेदोपपन्नं तं संशोध्य वमनादिभिः| कृतसंसर्जनं मेध्यैरन्नपानैरुपाचरेत्||६१|| ब्राह्मीस्वरसयुक्तं यत् पञ्चगव्यमुदाहृतम्| तत् सेव्यं शङ्खपुष्पी च यच्च मेध्यं रसायनम्||६२|| सुहृदश्चानुकूलास्तं स्वाप्ता धर्मार्थवादिनः| संयोजयेयुर्विज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ||६३||
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Adhikarana 20 (64-65) · Śloka 65
প্রযুঞ্জ্যাত্তৈললশুনং পযসা বা শতাবরীম্| ব্রাহ্মীরসং কুষ্ঠরসং বচাং বা মধুসংযুতাম্||৬৪|| দুশ্চিকিত্স্যো হ্যপস্মারশ্চিরকারী কৃতাস্পদঃ | তস্মাদ্রসাযনৈরেনং প্রাযশঃ সমুপাচরেত্||৬৫||
प्रयुञ्ज्यात्तैललशुनं पयसा वा शतावरीम्| ब्राह्मीरसं कुष्ठरसं वचां वा मधुसंयुताम्||६४|| दुश्चिकित्स्यो ह्यपस्मारश्चिरकारी कृतास्पदः | तस्माद्रसायनैरेनं प्रायशः समुपाचरेत्||६५||
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Adhikarana 21 (66) · Śloka 66
জলাগ্নিদ্রুমশৈলেভ্যো বিষমেভ্যশ্চ তং সদা| রক্ষেদুন্মাদিনং চৈব সদ্যঃ প্রাণহরা হি তে||৬৬||
जलाग्निद्रुमशैलेभ्यो विषमेभ्यश्च तं सदा| रक्षेदुन्मादिनं चैव सद्यः प्राणहरा हि ते||६६||
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Adhikarana 22 (67-68) · Śloka 68
তত্র শ্লোকৌ- হেতুং কুর্বন্ত্যপস্মারং দোষাঃ প্রকুপিতা যথা| সামান্যতঃ পৃথক্ত্বাচ্চ লিঙ্গং তেষাং চ ভেষজম্||৬৭|| মহাগদসমুত্থানং লিঙ্গং চোবাচ সৌষধম্| মুনির্ব্যাসসমাসাভ্যামপস্মারচিকিত্সিতে ||৬৮||
तत्र श्लोकौ- हेतुं कुर्वन्त्यपस्मारं दोषाः प्रकुपिता यथा| सामान्यतः पृथक्त्वाच्च लिङ्गं तेषां च भेषजम्||६७|| महागदसमुत्थानं लिङ्गं चोवाच सौषधम्| मुनिर्व्याससमासाभ्यामपस्मारचिकित्सिते ||६८||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 10
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে চিকিত্সাস্থানেঽপস্মারচিকিত্সিতং নাম দশমোঽধ্যাযঃ||১০||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते चिकित्सास्थानेऽपस्मारचिकित्सितं नाम दशमोऽध्यायः||१०||
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