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15. unmādacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাত উন্মাদচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथात उन्मादचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

বুদ্ধিস্মৃতিজ্ঞানতপোনিবাসঃ পুনর্বসুঃ প্রাণভৃতাং শরণ্যঃ| উন্মাদহেত্বাকৃতিভেষজানি কালেঽগ্নিবেশায শশংস পৃষ্টঃ||৩||

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बुद्धिस्मृतिज्ञानतपोनिवासः पुनर्वसुः प्राणभृतां शरण्यः| उन्मादहेत्वाकृतिभेषजानि कालेऽग्निवेशाय शशंस पृष्टः||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

বিরুদ্ধদুষ্টাশুচিভোজনানি প্রধর্ষণং দেবগুরুদ্বিজানাম্| উন্মাদহেতুর্ভযহর্ষপূর্বো মনোঽভিঘাতো বিষমাশ্চ চেষ্টাঃ||৪||

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विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम्| उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

তৈরল্পসত্ত্বস্য মলাঃ প্রদুষ্টা বুদ্ধের্নিবাসং হৃদযং প্রদূষ্য| স্রোতাংস্যধিষ্ঠায মনোবহানি প্রমোহযন্ত্যাশু নরস্য চেতঃ||৫||

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तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रदूष्य| स्रोतांस्यधिष्ठाय मनोवहानि प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः||५||

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Adhikarana 5 (6-7) · Śloka 7

ধীবিভ্রমঃ সত্ত্বপরিপ্লবশ্চ পর্যাকুলা দৃষ্টিরধীরতা চ| অবদ্ধবাক্ত্বং হৃদযং চ শূন্যং সামান্যমুন্মাদগদস্য লিঙ্গম্||৬|| স মূঢচেতা ন সুখং ন দুঃখং নাচারধর্মৌ কুত এব শান্তিম্| বিন্দত্যপাস্তস্মৃতিবুদ্ধিসঞ্জ্ঞো ভ্রমত্যযং চেত ইতস্ততশ্চ||৭||

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धीविभ्रमः सत्त्वपरिप्लवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च| अबद्धवाक्त्वं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्मादगदस्य लिङ्गम्||६|| स मूढचेता न सुखं न दुःखं नाचारधर्मौ कुत एव शान्तिम्| विन्दत्यपास्तस्मृतिबुद्धिसञ्ज्ञो भ्रमत्ययं चेत इतस्ततश्च||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

সমুদ্ভ্রমং বুদ্ধিমনঃস্মৃতীনামুন্মাদমাগন্তুনিজোত্থমাহুঃ|৮|

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समुद्भ्रमं बुद्धिमनःस्मृतीनामुन्मादमागन्तुनिजोत्थमाहुः|८|

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Adhikarana 7 (8-10) · Śloka 10

তস্যোদ্ভবং পঞ্চবিধং পৃথক্ তু বক্ষ্যামি লিঙ্গানি চিকিত্সিতং চ||৮|| রূক্ষাল্পশীতান্নবিরেকধাতুক্ষযোপবাসৈরনিলোঽতিবৃদ্ধঃ| চিন্তাদিজুষ্টং হৃদযং প্রদূষ্য বুদ্ধিং স্মৃতিং চাপ্যুপহন্তি শীঘ্রম্||৯|| অস্থানহাসস্মিতনৃত্যগীতবাগঙ্গবিক্ষেপণরোদনানি| পারুষ্যকার্শ্যারুণবর্ণতাশ্চ জীর্ণে বলং চানিলজস্য রূপম্||১০||

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तस्योद्भवं पञ्चविधं पृथक् तु वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च||८|| रूक्षाल्पशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः| चिन्तादिजुष्टं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृतिं चाप्युपहन्ति शीघ्रम्||९|| अस्थानहासस्मितनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि| पारुष्यकार्श्यारुणवर्णताश्च जीर्णे बलं चानिलजस्य रूपम्||१०||

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Adhikarana 8 (11-12) · Śloka 12

অজীর্ণকট্বম্লবিদাহ্যশীতৈর্ভোজ্যৈশ্চিতং পিত্তমুদীর্ণবেগম্| উন্মাদমত্যুগ্রমনাত্মকস্য হৃদি শ্রিতং পূর্ববদাশু কুর্যাত্||১১|| অমর্ষসংরম্ভবিনগ্নভাবাঃ সন্তর্জনাতিদ্রবণৌষ্ণ্যরোষাঃ | প্রচ্ছাযশীতান্নজলাভিলাষাঃ পীতা চ ভাঃ পিত্তকৃতস্য লিঙ্গম্||১২||

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अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भोज्यैश्चितं पित्तमुदीर्णवेगम्| उन्मादमत्युग्रमनात्मकस्य हृदि श्रितं पूर्ववदाशु कुर्यात्||११|| अमर्षसंरम्भविनग्नभावाः सन्तर्जनातिद्रवणौष्ण्यरोषाः | प्रच्छायशीतान्नजलाभिलाषाः पीता च भाः पित्तकृतस्य लिङ्गम्||१२||

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Adhikarana 9 (13-14) · Śloka 14

সম্পূরণৈর্মন্দবিচেষ্টিতস্য সোষ্মা কফো মর্মণি সম্প্রবৃদ্ধঃ| বুদ্ধিং স্মৃতিং চাপ্যুপহত্য চিত্তং প্রমোহযন্ সঞ্জনযেদ্বিকারম্||১৩|| বাক্চেষ্টিতং মন্দমরোচকশ্চ নারীবিবিক্তপ্রিযতাঽতিনিদ্রা| ছর্দিশ্চ লালা চ বলং চ ভুঙ্ক্তে নখাদিশৌক্ল্যং চ কফাত্মকস্য||১৪||

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सम्पूरणैर्मन्दविचेष्टितस्य सोष्मा कफो मर्मणि सम्प्रवृद्धः| बुद्धिं स्मृतिं चाप्युपहत्य चित्तं प्रमोहयन् सञ्जनयेद्विकारम्||१३|| वाक्चेष्टितं मन्दमरोचकश्च नारीविविक्तप्रियताऽतिनिद्रा| छर्दिश्च लाला च बलं च भुङ्क्ते नखादिशौक्ल्यं च कफात्मकस्य||१४||

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Adhikarana 10 (15) · Śloka 15

যঃ সন্নিপাতপ্রভবোঽতিঘোরঃ সর্বৈঃ সমস্তৈঃ স চ হেতুভিঃ স্যাত্| সর্বাণি রূপাণি বিভর্তি তাদৃগ্বিরুদ্ঘভৈষজ্যবিধির্বিবর্জ্যঃ||১৫||

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यः सन्निपातप्रभवोऽतिघोरः सर्वैः समस्तैः स च हेतुभिः स्यात्| सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति तादृग्विरुद्घभैषज्यविधिर्विवर्ज्यः||१५||

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Adhikarana 11 (16) · Śloka 16

দেবর্ষিগন্ধর্বপিশাচযক্ষরক্ষঃপিতৄণামভিধর্ষণানি| আগন্তুহেতুর্নিযমব্রতাদি মিথ্যাকৃতং কর্ম চ পূর্বদেহে||১৬||

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देवर्षिगन्धर्वपिशाचयक्षरक्षःपितॄणामभिधर्षणानि| आगन्तुहेतुर्नियमव्रतादि मिथ्याकृतं कर्म च पूर्वदेहे||१६||

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Adhikarana 12 (17) · Śloka 17

অমর্ত্যবাগ্বিক্রমবীর্যচেষ্টো জ্ঞানাদিবিজ্ঞানবলাদিভির্যঃ| উন্মাদকালোঽনিযতশ্চ যস্য ভূতোত্থমুন্মাদমুদাহরেত্তম্||১৭||

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अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टो ज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः| उन्मादकालोऽनियतश्च यस्य भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तम्||१७||

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Adhikarana 13 (18) · Śloka 18

অদূষযন্তঃ পুরুষস্য দেহং দেবাদযঃ স্বৈস্তু গুণপ্রভাবৈঃ| বিশন্ত্যদৃশ্যাস্তরসা যথৈব চ্ছাযাতপৌ দর্পণসূর্যকান্তৌ||১৮||

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अदूषयन्तः पुरुषस्य देहं देवादयः स्वैस्तु गुणप्रभावैः| विशन्त्यदृश्यास्तरसा यथैव च्छायातपौ दर्पणसूर्यकान्तौ||१८||

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Adhikarana 14 (19) · Śloka 19

আঘাতকালো হি স পূর্বরূপঃ প্রোক্তো নিদানেঽথ সুরাদিভিশ্চ| উন্মাদরূপাণি পৃথঙ্নিবোধ কালং চ গম্যান্ পুরুষাংশ্চ তেষাম্||১৯||

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आघातकालो हि स पूर्वरूपः प्रोक्तो निदानेऽथ सुरादिभिश्च| उन्मादरूपाणि पृथङ्निबोध कालं च गम्यान् पुरुषांश्च तेषाम्||१९||

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Adhikarana 15 (20) · Śloka 20

তদ্যথা- সৌম্যদৃষ্টিং গম্ভীরমধৃষ্যমকোপনমস্বপ্নভোজনাভিলাষিণমল্পস্বেদমূত্রপুরীষবাতং শুভগন্ধং ফুল্লপদ্মবদনমিতি দেবোন্মত্তং বিদ্যাত্; গুরুবৃদ্ধসিদ্ধর্ষীণামভিশাপাভিচারাভিধ্যানানুরূপচেষ্টাহারব্যাহারং তৈরুন্মত্তং বিদ্যাত্; অপ্রসন্নদৃষ্টিমপশ্যন্তং নিদ্রালুং প্রতিহতবাচমনন্নাভিলাষমরোচকাবিপাকপরীতং চ পিতৃভিরুন্মত্তং বিদ্যাত্; (চণ্ডং সাহসিকং তীক্ষ্ণং গম্ভীরমধৃষ্যং) মুখবাদ্যনৃত্যগীতান্নপানস্নানমাল্যধূপগন্ধরতিং রক্তবস্ত্রবলিকর্মহাস্যকথানুযোগপ্রিযং শুভগন্ধং চ গন্ধর্বোন্মত্তং বিদ্যাত্; অসকৃত্স্বপ্নরোদনহাস্যং নৃত্যগীতবাদ্যপাঠকথান্নপানস্নানমাল্যধূপগন্ধরতিং রক্তবিপ্লুতাক্ষং দ্বিজাতিবৈদ্যপরিবাদিনং রহস্যভাষিণং চ যক্ষোন্মত্তং বিদ্যাত্; নষ্টনিদ্রমন্নপানদ্বেষিণমনাহারমপ্যতিবলিনং শস্ত্রশোণিতমাংসরক্তমাল্যাভিলাষিণং সন্তর্জকং চ রাক্ষসোন্মত্তং বিদ্যাত্; প্রহাসনৃত্যপ্রধানং দেববিপ্রবৈদ্যদ্বেষাবজ্ঞাভিঃ স্তুতিবেদমন্ত্রশাস্ত্রোদাহরণৈঃ কাষ্ঠাদিভিরাত্মপীডনেন চ ব্রহ্মরাক্ষসোন্মত্তং বিদ্যাত্; অস্বস্থচিত্তং স্থানমলভমানং নৃত্যগীতহাসিনং বদ্ধাবদ্ধপ্রলাপিনং সঙ্করকূটমলিনরথ্যাচেলতৃণাশ্মকাষ্ঠাধিরোহণরতিং ভিন্নরূক্ষস্বরং নগ্নং বিধাবন্তং নৈকত্র তিষ্ঠন্তং দুঃখান্যাবেদযন্তং নষ্টস্মৃতিং চ পিশাচোন্মত্তং বিদ্যাত্||২০||

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तद्यथा- सौम्यदृष्टिं गम्भीरमधृष्यमकोपनमस्वप्नभोजनाभिलाषिणमल्पस्वेदमूत्रपुरीषवातं शुभगन्धं फुल्लपद्मवदनमिति देवोन्मत्तं विद्यात्; गुरुवृद्धसिद्धर्षीणामभिशापाभिचाराभिध्यानानुरूपचेष्टाहारव्याहारं तैरुन्मत्तं विद्यात्; अप्रसन्नदृष्टिमपश्यन्तं निद्रालुं प्रतिहतवाचमनन्नाभिलाषमरोचकाविपाकपरीतं च पितृभिरुन्मत्तं विद्यात्; (चण्डं साहसिकं तीक्ष्णं गम्भीरमधृष्यं) मुखवाद्यनृत्यगीतान्नपानस्नानमाल्यधूपगन्धरतिं रक्तवस्त्रबलिकर्महास्यकथानुयोगप्रियं शुभगन्धं च गन्धर्वोन्मत्तं विद्यात्; असकृत्स्वप्नरोदनहास्यं नृत्यगीतवाद्यपाठकथान्नपानस्नानमाल्यधूपगन्धरतिं रक्तविप्लुताक्षं द्विजातिवैद्यपरिवादिनं रहस्यभाषिणं च यक्षोन्मत्तं विद्यात्; नष्टनिद्रमन्नपानद्वेषिणमनाहारमप्यतिबलिनं शस्त्रशोणितमांसरक्तमाल्याभिलाषिणं सन्तर्जकं च राक्षसोन्मत्तं विद्यात्; प्रहासनृत्यप्रधानं देवविप्रवैद्यद्वेषावज्ञाभिः स्तुतिवेदमन्त्रशास्त्रोदाहरणैः काष्ठादिभिरात्मपीडनेन च ब्रह्मराक्षसोन्मत्तं विद्यात्; अस्वस्थचित्तं स्थानमलभमानं नृत्यगीतहासिनं बद्धाबद्धप्रलापिनं सङ्करकूटमलिनरथ्याचेलतृणाश्मकाष्ठाधिरोहणरतिं भिन्नरूक्षस्वरं नग्नं विधावन्तं नैकत्र तिष्ठन्तं दुःखान्यावेदयन्तं नष्टस्मृतिं च पिशाचोन्मत्तं विद्यात्||२०||

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Adhikarana 16 (21) · Śloka 21

তত্র চৌক্ষাচারং তপঃস্বাধ্যাযকোবিদং নরং প্রাযঃ শুক্লপ্রতিপদি ত্রযোদশ্যাং চ ছিদ্রমবেক্ষ্যাভিধর্ষযন্তি দেবাঃ, স্নানশুচিবিবিক্তসেবিনং ধর্মশাস্ত্রশ্রুতিবাক্যকুশলং প্রাযঃ ষষ্ঠ্যাং নবম্যাং চর্ষযঃ, মাতৃপিতৃগুরুবৃদ্ধসিদ্ধাচার্যোপসেবিনং প্রাযো দশম্যামমাবস্যাযাং চ পিতরঃ, গন্ধর্বাঃ স্তুতিগীতবাদিত্ররতিং পরদারগন্ধমাল্যপ্রিযং চৌক্ষাচারং প্রাযো দ্বাদশ্যাং চতুর্দশ্যাং চ, সত্ত্ববলরূপগর্বশৌর্যযুক্তং মাল্যানুলেপনহাস্যপ্রিযমতিবাক্করণং প্রাযঃ শুক্লৈকাদশ্যাং সপ্তম্যাং চ যক্ষাঃ, স্বাধ্যাযতপোনিযমোপবাসব্রহ্মচর্যদেবযতিগুরুপূজাঽরতিং ভ্রষ্টশৌচং ব্রাহ্মণমব্রাহ্মণং বা ব্রাহ্ম্ণবাদিনং শূরমানিনং দেবাগারসলিলক্রীডনরতিং প্রাযঃ শুক্লপঞ্চম্যাং পূর্ণচন্দ্রদর্শনে চ ব্রহ্মরাক্ষসাঃ, রক্ষঃপিশাচাস্তু হীনসত্ত্বং পিশুনং স্ত্রৈণং লুব্ধং শঠং প্রাযো দ্বিতীযাতৃতীযাষ্টমীষু; ইত্যপরিসঙ্খ্যেযানাং গ্রহাণামাবিষ্কৃততমা হ্যষ্টাবেতে ব্যাখ্যাতাঃ||২১||

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तत्र चौक्षाचारं तपःस्वाध्यायकोविदं नरं प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयोदश्यां च छिद्रमवेक्ष्याभिधर्षयन्ति देवाः, स्नानशुचिविविक्तसेविनं धर्मशास्त्रश्रुतिवाक्यकुशलं प्रायः षष्ठ्यां नवम्यां चर्षयः, मातृपितृगुरुवृद्धसिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो दशम्याममावस्यायां च पितरः, गन्धर्वाः स्तुतिगीतवादित्ररतिं परदारगन्धमाल्यप्रियं चौक्षाचारं प्रायो द्वादश्यां चतुर्दश्यां च, सत्त्वबलरूपगर्वशौर्ययुक्तं माल्यानुलेपनहास्यप्रियमतिवाक्करणं प्रायः शुक्लैकादश्यां सप्तम्यां च यक्षाः, स्वाध्यायतपोनियमोपवासब्रह्मचर्यदेवयतिगुरुपूजाऽरतिं भ्रष्टशौचं ब्राह्मणमब्राह्मणं वा ब्राह्म्णवादिनं शूरमानिनं देवागारसलिलक्रीडनरतिं प्रायः शुक्लपञ्चम्यां पूर्णचन्द्रदर्शने च ब्रह्मराक्षसाः, रक्षःपिशाचास्तु हीनसत्त्वं पिशुनं स्त्रैणं लुब्धं शठं प्रायो द्वितीयातृतीयाष्टमीषु; इत्यपरिसङ्ख्येयानां ग्रहाणामाविष्कृततमा ह्यष्टावेते व्याख्याताः||२१||

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Adhikarana 17 (22) · Śloka 22

সর্বেষ্বপি তু খল্বেষু যো হস্তাবুদ্যম্য রোষসংরম্ভান্নিঃশঙ্কমন্যেষ্বাত্মনি বা নিপাতযেত্ স হ্যসাধ্যো জ্ঞেযঃ; তথা যঃ সাশ্রুনেত্রো মেঢ্রপ্রবৃত্তরক্তঃ ক্ষতজিহ্বঃ প্রস্রুতনাসিকশ্ছিদ্যমানচর্মাঽপ্রতিহন্যমানবাণিঃ সততং বিকূজন্ দুর্বর্ণস্তৃষার্তঃ পূতিগন্ধশ্চ স হিংসার্থিনোন্মত্তো জ্ঞেযঃ; তং পরিবর্জযেত্||২২||

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सर्वेष्वपि तु खल्वेषु यो हस्तावुद्यम्य रोषसंरम्भान्निःशङ्कमन्येष्वात्मनि वा निपातयेत् स ह्यसाध्यो ज्ञेयः; तथा यः साश्रुनेत्रो मेढ्रप्रवृत्तरक्तः क्षतजिह्वः प्रस्रुतनासिकश्छिद्यमानचर्माऽप्रतिहन्यमानवाणिः सततं विकूजन् दुर्वर्णस्तृषार्तः पूतिगन्धश्च स हिंसार्थिनोन्मत्तो ज्ञेयः; तं परिवर्जयेत्||२२||

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Adhikarana 18 (23) · Śloka 23

রত্যর্চনাকামোন্মাদিনৌ তু ভিষগভিপ্রাযাচারাভ্যাং বুদ্ধ্বা তদঙ্গোপহারবলিমিশ্রেণ| মন্ত্রভৈষজ্যবিধিনোপক্রমেত্||২৩||

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रत्यर्चनाकामोन्मादिनौ तु भिषगभिप्रायाचाराभ्यां बुद्ध्वा तदङ्गोपहारबलिमिश्रेण| मन्त्रभैषज्यविधिनोपक्रमेत्||२३||

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Adhikarana 19 (24-32) · Śloka 33

তত্র দ্বযোরপি নিজাগন্তুনিমিত্তযোরুন্মাদযোঃ সমাসবিস্তরাভ্যাং ভেষজবিধিমনুব্যাখ্যাস্যামঃ||২৪|| উন্মাদে বাতজে পূর্বং স্নেহপানং বিশেষবিত্| কুর্যাদাবৃতমার্গে তু সস্নেহং মৃদু শোধনম্||২৫|| কফপিত্তোদ্ভবেঽপ্যাদৌ বমনং সবিরেচনম্| স্নিগ্ধস্বিন্নস্য কর্তব্যং শুদ্ধে সংসর্জনক্রমঃ||২৬|| নিরূহং স্নেহবস্তিং চ শিরসশ্চ বিরেচনম্| ততঃ কুর্যাদ্যথাদোষং তেষাং ভূযস্ত্বমাচরেত্||২৭|| হৃদিন্দ্রিযশিরঃকোষ্ঠে সংশুদ্ধে বমনাদিভিঃ| মনঃপ্রসাদমাপ্নোতি স্মৃতিং সঞ্জ্ঞাং চ বিন্দতি||২৮|| শুদ্ধস্যাচারবিভ্রংশে তীক্ষ্ণং নাবনমঞ্জনম্| তাডনং চ মনোবুদ্ধিদেহসংবেজনং হিতম্||২৯|| যঃ সক্তোঽবিনযে পট্টৈঃ সংযম্য সুদৃঢৈঃ সুখৈঃ| অপেতলোহকাষ্ঠাদ্যে সংরোধ্যশ্চ তমোগৃহে||৩০|| তর্জনং ত্রাসনং দানং হর্ষণং সান্ত্বনং ভযম্| বিস্মযো বিস্মৃতের্হেতোর্নযন্তি প্রকৃতিং মনঃ||৩১|| প্রদেহোত্সাদনাভ্যঙ্গধূমাঃ পানং চ সর্পিষঃ| প্রযোক্তব্যং মনোবুদ্ধিস্মৃতিসঞ্জ্ঞাপ্রবোধনম্||৩২|| সর্পিঃপানাদিরাগন্তোর্মন্ত্রাদিশ্চেষ্যতে বিধিঃ|৩৩|

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तत्र द्वयोरपि निजागन्तुनिमित्तयोरुन्मादयोः समासविस्तराभ्यां भेषजविधिमनुव्याख्यास्यामः||२४|| उन्मादे वातजे पूर्वं स्नेहपानं विशेषवित्| कुर्यादावृतमार्गे तु सस्नेहं मृदु शोधनम्||२५|| कफपित्तोद्भवेऽप्यादौ वमनं सविरेचनम्| स्निग्धस्विन्नस्य कर्तव्यं शुद्धे संसर्जनक्रमः||२६|| निरूहं स्नेहबस्तिं च शिरसश्च विरेचनम्| ततः कुर्याद्यथादोषं तेषां भूयस्त्वमाचरेत्||२७|| हृदिन्द्रियशिरःकोष्ठे संशुद्धे वमनादिभिः| मनःप्रसादमाप्नोति स्मृतिं सञ्ज्ञां च विन्दति||२८|| शुद्धस्याचारविभ्रंशे तीक्ष्णं नावनमञ्जनम्| ताडनं च मनोबुद्धिदेहसंवेजनं हितम्||२९|| यः सक्तोऽविनये पट्टैः संयम्य सुदृढैः सुखैः| अपेतलोहकाष्ठाद्ये संरोध्यश्च तमोगृहे||३०|| तर्जनं त्रासनं दानं हर्षणं सान्त्वनं भयम्| विस्मयो विस्मृतेर्हेतोर्नयन्ति प्रकृतिं मनः||३१|| प्रदेहोत्सादनाभ्यङ्गधूमाः पानं च सर्पिषः| प्रयोक्तव्यं मनोबुद्धिस्मृतिसञ्ज्ञाप्रबोधनम्||३२|| सर्पिःपानादिरागन्तोर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः|३३|

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Adhikarana 20 (33-41) · Śloka 41

অতঃ সিদ্ধতমান্যোগাঞ্ছৃণূন্মাদবিনাশনান্||৩৩|| হিঙ্গুসৌবর্চলব্যোষৈর্দ্বিপলাংশৈর্ঘৃতাঢকম্| চতুর্গুণে গবাং মূত্রে সিদ্ধমুন্মাদনাশনম্||৩৪|| বিশালা ত্রিফলা কৌন্তী দেবদার্বেলবালুকম্| স্থিরা নতং রজন্যৌ দ্বে সারিবে দ্বে প্রিযঙ্গুকা||৩৫|| নীলোত্পলৈলামঞ্জিষ্ঠাদন্তীদাডিমকেশরম্| তালীশপত্রং বৃহতী মালত্যাঃ কুসুমং নবম্||৩৬|| বিডঙ্গং পৃশ্নিপর্ণী চ কুষ্ঠং চন্দনপদ্মকৌ| অষ্টাবিংশতিভিঃ কল্কৈরেতৈরক্ষসমন্বিতৈঃ||৩৭|| চতুর্গুণে জলে সম্যগ্ঘৃতপ্রস্থং বিপাচযেত্| অপস্মারে জ্বরে কাসে শোষে মন্দেঽনলে ক্ষযে||৩৮|| বাতরক্তে প্রতিশ্যাযে তৃতীযকচতুর্থকে| ছর্দ্যর্শোমূত্রকৃচ্ছ্রেষু বিসর্পোপহতেষু চ||৩৯|| কণ্ডূপাণ্ড্বামযোন্মাদবিষমেহগদেষু চ| ভূতোপহতচিত্তানাং গদ্গদানামচেসাম্||৪০|| শস্তং স্ত্রীণাং চ বন্ধ্যানাং ধন্যমাযুর্বলপ্রদম্| অলক্ষ্মীপাপরক্ষোঘ্নং সর্বগ্রহবিনাশনম্||৪১|| কল্যাণকমিদং সর্পিঃ শ্রেষ্ঠং পুংসবনেষু চ| ইতি কল্যাণকং ঘৃতম্|

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अतः सिद्धतमान्योगाञ्छृणून्मादविनाशनान्||३३|| हिङ्गुसौवर्चलव्योषैर्द्विपलांशैर्घृताढकम्| चतुर्गुणे गवां मूत्रे सिद्धमुन्मादनाशनम्||३४|| विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेलवालुकम्| स्थिरा नतं रजन्यौ द्वे सारिवे द्वे प्रियङ्गुका||३५|| नीलोत्पलैलामञ्जिष्ठादन्तीदाडिमकेशरम्| तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम्||३६|| विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठं चन्दनपद्मकौ| अष्टाविंशतिभिः कल्कैरेतैरक्षसमन्वितैः||३७|| चतुर्गुणे जले सम्यग्घृतप्रस्थं विपाचयेत्| अपस्मारे ज्वरे कासे शोषे मन्देऽनले क्षये||३८|| वातरक्ते प्रतिश्याये तृतीयकचतुर्थके| छर्द्यर्शोमूत्रकृच्छ्रेषु विसर्पोपहतेषु च||३९|| कण्डूपाण्ड्वामयोन्मादविषमेहगदेषु च| भूतोपहतचित्तानां गद्गदानामचेसाम्||४०|| शस्तं स्त्रीणां च वन्ध्यानां धन्यमायुर्बलप्रदम्| अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहविनाशनम्||४१|| कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च| इति कल्याणकं घृतम्|

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Adhikarana 21 (42-44) · Śloka 44

এভ্য এব স্থিরাদীনি জলে পক্ত্বৈকবিংশতিম্||৪২|| রসে তস্মিন্ পচেত্ সর্পির্গৃষ্টিক্ষীরে চতুর্গুণে| বীরার্দ্রমাষকাকোলীস্বযঙ্গুপ্তর্ষভর্ধিভিঃ||৪৩|| মেদযা চ সমৈঃ কল্কৈস্তত্ স্যাত্ কল্যাণকং মহত্| বৃংহণীযং বিশেষেণ সন্নিপাতহরং পরম্||৪৪|| ইতি মহাকল্যাণকং ঘৃতম্|

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एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम्||४२|| रसे तस्मिन् पचेत् सर्पिर्गृष्टिक्षीरे चतुर्गुणे| वीरार्द्रमाषकाकोलीस्वयङ्गुप्तर्षभर्धिभिः||४३|| मेदया च समैः कल्कैस्तत् स्यात् कल्याणकं महत्| बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम्||४४|| इति महाकल्याणकं घृतम्|

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Adhikarana 22 (45-48) · Śloka 48

জটিলাং পূতনাং কেশীং চারটীং মর্কটীং বচাম্| ত্রাযমাণাং জযাং বীরাং চোরকং কটুরোহিণীম্||৪৫|| বযঃস্থাং শূকরীং ছত্রামতিচ্ছত্রাং পলঙ্কষাম্| মহাপুরুষদন্তাং চ কাযস্থাং নাকুলীদ্বযম্||৪৬|| কটম্ভরাং বৃশ্চিকালীং স্থিরাং চাহৃত্য তৈর্ঘৃতম্| সিদ্ধং চাতুর্থকোন্মাদগ্রহাপস্মারনাশনম্||৪৭|| মহাপৈশাচিকং নাম ঘৃতমেতদ্যথাঽমৃতম্| বুদ্ধিস্মৃতিকরং চৈব বালানাং চাঙ্গবর্ধনম্||৪৮|| ইতি মহাপৈশাচিকং ঘৃতম্|

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जटिलां पूतनां केशीं चारटीं मर्कटीं वचाम्| त्रायमाणां जयां वीरां चोरकं कटुरोहिणीम्||४५|| वयःस्थां शूकरीं छत्रामतिच्छत्रां पलङ्कषाम्| महापुरुषदन्तां च कायस्थां नाकुलीद्वयम्||४६|| कटम्भरां वृश्चिकालीं स्थिरां चाहृत्य तैर्घृतम्| सिद्धं चातुर्थकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम्||४७|| महापैशाचिकं नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम्| बुद्धिस्मृतिकरं चैव बालानां चाङ्गवर्धनम्||४८|| इति महापैशाचिकं घृतम्|

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Adhikarana 23 (49-56) · Śloka 56

লশুনানাং শতং ত্রিংশদভযাস্ত্র্যূষণাত্ পলম্| গবাং চর্মমসীপ্রস্থো দ্ব্যাঢকং ক্ষীরমূত্রযোঃ||৪৯|| পুরাণসর্পিষঃ প্রস্থ এভিঃ সিদ্ধং প্রযোজযেত্| হিঙ্গুচূর্ণপলং শীতে দত্ত্বা চ মধুমাণিকাম্||৫০|| তদ্দোষাগন্তুসম্ভূতানুন্মাদান্ বিষমজ্বরান্| অপস্মারাংশ্চ হন্ত্যাশু পানাভ্যঞ্জননাবনৈঃ||৫১|| ইতি লশুনাদ্যং ঘৃতম্| লশুনস্যাবিনষ্টস্য তুলার্ধং নিস্তুষীকৃতম্| তদর্ধং দশমূলস্য দ্ব্যাঢকেঽপাং বিপাচযেত্||৫২|| পাদশেষে ঘৃতপ্রস্থং লশুনস্য রসং তথা| কোলমূলকবৃক্ষাম্লমাতুলুঙ্গার্দ্রকৈ রসৈঃ||৫৩|| দাডিমাম্বুসুরামস্তুকাঞ্জিকাম্লৈস্তদর্ধিকৈঃ| সাধযেত্ত্রিফলাদারুলবণব্যোষদীপ্যকৈঃ||৫৪|| যবানীচব্যহিঙ্গ্বম্লবেতসৈশ্চ পলার্ধিকৈঃ| সিদ্ধমেতত্ পিবেচ্ছূলগুল্মার্শোজঠরাপহম্||৫৫|| ব্রধ্নপাণ্ড্বামযপ্লীহযোনিদোষজ্বরকৃমীন্| বাতশ্লেষ্মামযান্ সর্বানুন্মাদাংশ্চাপকর্ষতি||৫৬|| ইত্যপরং লশুনাদ্যং ঘৃতম্|

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लशुनानां शतं त्रिंशदभयास्त्र्यूषणात् पलम्| गवां चर्ममसीप्रस्थो द्व्याढकं क्षीरमूत्रयोः||४९|| पुराणसर्पिषः प्रस्थ एभिः सिद्धं प्रयोजयेत्| हिङ्गुचूर्णपलं शीते दत्त्वा च मधुमाणिकाम्||५०|| तद्दोषागन्तुसम्भूतानुन्मादान् विषमज्वरान्| अपस्मारांश्च हन्त्याशु पानाभ्यञ्जननावनैः||५१|| इति लशुनाद्यं घृतम्| लशुनस्याविनष्टस्य तुलार्धं निस्तुषीकृतम्| तदर्धं दशमूलस्य द्व्याढकेऽपां विपाचयेत्||५२|| पादशेषे घृतप्रस्थं लशुनस्य रसं तथा| कोलमूलकवृक्षाम्लमातुलुङ्गार्द्रकै रसैः||५३|| दाडिमाम्बुसुरामस्तुकाञ्जिकाम्लैस्तदर्धिकैः| साधयेत्त्रिफलादारुलवणव्योषदीप्यकैः||५४|| यवानीचव्यहिङ्ग्वम्लवेतसैश्च पलार्धिकैः| सिद्धमेतत् पिबेच्छूलगुल्मार्शोजठरापहम्||५५|| ब्रध्नपाण्ड्वामयप्लीहयोनिदोषज्वरकृमीन्| वातश्लेष्मामयान् सर्वानुन्मादांश्चापकर्षति||५६|| इत्यपरं लशुनाद्यं घृतम्|

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Adhikarana 24 (57-62) · Śloka 63

হিঙ্গুনা হিঙ্গুপর্ণ্যা চ সকাযস্থবযঃস্থযা| সিদ্ধং সর্পির্হিতং তদ্বদ্বযঃস্থাহিঙ্গুচোরকৈঃ||৫৭|| কেবলং সিদ্ধমেভির্বা পুরাণং পাযযেদ্ঘৃতম্| পাযযিত্বোত্তমাং মাত্রাং শ্বভ্রে রুন্ধ্যাদ্গৃহেঽপি বা||৫৮|| বিশেষতঃ পুরাণং চ ঘৃতং তং পাযযেদ্ভিষক্| ত্রিদোষঘ্নং পবিত্রত্বাদ্বিশেষাদ্গ্রহনাশনম্||৫৯|| গুণকর্মাধিকং পানাদাস্বাদাত্ কটুতিক্তকম্| উগ্রগন্ধং পুরাণং স্যাদ্দশবর্ষস্থিতং ঘৃতম্||৬০|| লাক্ষারসনিভং শীতং তদ্ধি সর্বগ্রহাপহম্| মেধ্যং বিরেচনেষ্বগ্র্যং প্রপুরাণমতঃ পরম্||৬১|| নাসাধ্যং নাম তস্যাস্তি যত্ স্যাদ্বর্ষশতস্থিতম্| দৃষ্টং স্পৃষ্টমথাঘ্রাতং তদ্ধি সর্বগ্রহাপহম্||৬২|| অপস্মারগ্রহোন্মাদবতাং শস্তং বিশেষতঃ|৬৩|

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हिङ्गुना हिङ्गुपर्ण्या च सकायस्थवयःस्थया| सिद्धं सर्पिर्हितं तद्वद्वयःस्थाहिङ्गुचोरकैः||५७|| केवलं सिद्धमेभिर्वा पुराणं पाययेद्घृतम्| पाययित्वोत्तमां मात्रां श्वभ्रे रुन्ध्याद्गृहेऽपि वा||५८|| विशेषतः पुराणं च घृतं तं पाययेद्भिषक्| त्रिदोषघ्नं पवित्रत्वाद्विशेषाद्ग्रहनाशनम्||५९|| गुणकर्माधिकं पानादास्वादात् कटुतिक्तकम्| उग्रगन्धं पुराणं स्याद्दशवर्षस्थितं घृतम्||६०|| लाक्षारसनिभं शीतं तद्धि सर्वग्रहापहम्| मेध्यं विरेचनेष्वग्र्यं प्रपुराणमतः परम्||६१|| नासाध्यं नाम तस्यास्ति यत् स्याद्वर्षशतस्थितम्| दृष्टं स्पृष्टमथाघ्रातं तद्धि सर्वग्रहापहम्||६२|| अपस्मारग्रहोन्मादवतां शस्तं विशेषतः|६३|

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Adhikarana 25 (63-75) · Śloka 76

এতানৌষধযোগান্ বা বিধেযত্বমগচ্ছতি||৬৩|| অঞ্জনোত্সাদনালেপনাবনাদিষু যোজযেত্| শিরীষো মধুকং হিঙ্গু লশুনং তগরং বচা||৬৪|| কুষ্ঠং চ বস্তমূত্রেণ পিষ্টং স্যান্নাবনাঞ্জনম্| তদ্বদ্ব্যোষং হরিদ্রে দ্বে মঞ্জিষ্ঠাহিঙ্গুসর্ষপাঃ||৬৫|| শিরীষবীজং চোন্মাদগ্রহাপস্মারনাশনম্| পিষ্ট্বা তুল্যমপামার্গং হিঙ্গ্বালং হিঙ্গুপত্রিকাম্||৬৬|| বার্তিঃ স্যান্মরিচার্ধাংশা পিত্তাভ্যাং গোশৃগালযোঃ| তযাঽঞ্জযেদপস্মারভূতোন্মাদজ্বরার্দিতান্||৬৭|| ভূতার্তানমরার্তাংশ্চ নরাংশ্চৈব দৃগামযে| মরিচং চাতপে মাংসং সপিত্তং স্থিতমঞ্জনম্||৬৮|| বৈকৃতং পশ্যতঃ কার্যং দোষভূতহতস্মৃতেঃ| সিদ্ধার্থকো বচা হিঙ্গু করঞ্জো দেবদারু চ||৬৯|| মঞ্জিষ্ঠা ত্রিফলা শ্বেতা কটভীত্বক্ কটুত্রিকম্| সমাংশানি প্রিযঙ্গুশ্চ শিরীষো রজনীদ্বযম্||৭০|| বস্তমূত্রেণ পিষ্টোঽযমগদঃ পানমঞ্জনম্| নস্যমালেপনং চৈব স্নানমুদ্বর্তনং তথা||৭১|| অপস্মারবিষোন্মাদকৃত্যালক্ষ্মীজ্বরাপহঃ| ভূতেভ্যশ্চ ভযং হন্তি রাজদ্বারে চ শস্যতে||৭২|| সর্পিরেতেন সিদ্ধং বা সগোমূত্রং তদর্থকৃত্| প্রসেকে পীনসে গন্ধৈর্ধূমবর্তিং কৃতাং পিবেত্||৭৩|| বৈরেচনিকধূমোক্তৈঃ শ্বেতাদ্যৈর্বা সহিঙ্গুভিঃ| শল্লকোলূকমার্জারজম্বূকবৃকবস্তজৈঃ||৭৪|| মূত্রপিত্তশকৃল্লোমনখৈশ্চর্মভিরেব চ| সেকাঞ্জনং প্রধমনং নস্যং ধূমং চ কারযেত্||৭৫|| বাতশ্লেষ্মাত্মকে প্রাযঃ ...|৭৬|

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एतानौषधयोगान् वा विधेयत्वमगच्छति||६३|| अञ्जनोत्सादनालेपनावनादिषु योजयेत्| शिरीषो मधुकं हिङ्गु लशुनं तगरं वचा||६४|| कुष्ठं च बस्तमूत्रेण पिष्टं स्यान्नावनाञ्जनम्| तद्वद्व्योषं हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठाहिङ्गुसर्षपाः||६५|| शिरीषबीजं चोन्मादग्रहापस्मारनाशनम्| पिष्ट्वा तुल्यमपामार्गं हिङ्ग्वालं हिङ्गुपत्रिकाम्||६६|| वार्तिः स्यान्मरिचार्धांशा पित्ताभ्यां गोशृगालयोः| तयाऽञ्जयेदपस्मारभूतोन्मादज्वरार्दितान्||६७|| भूतार्तानमरार्तांश्च नरांश्चैव दृगामये| मरिचं चातपे मांसं सपित्तं स्थितमञ्जनम्||६८|| वैकृतं पश्यतः कार्यं दोषभूतहतस्मृतेः| सिद्धार्थको वचा हिङ्गु करञ्जो देवदारु च||६९|| मञ्जिष्ठा त्रिफला श्वेता कटभीत्वक् कटुत्रिकम्| समांशानि प्रियङ्गुश्च शिरीषो रजनीद्वयम्||७०|| बस्तमूत्रेण पिष्टोऽयमगदः पानमञ्जनम्| नस्यमालेपनं चैव स्नानमुद्वर्तनं तथा||७१|| अपस्मारविषोन्मादकृत्यालक्ष्मीज्वरापहः| भूतेभ्यश्च भयं हन्ति राजद्वारे च शस्यते||७२|| सर्पिरेतेन सिद्धं वा सगोमूत्रं तदर्थकृत्| प्रसेके पीनसे गन्धैर्धूमवर्तिं कृतां पिबेत्||७३|| वैरेचनिकधूमोक्तैः श्वेताद्यैर्वा सहिङ्गुभिः| शल्लकोलूकमार्जारजम्बूकवृकबस्तजैः||७४|| मूत्रपित्तशकृल्लोमनखैश्चर्मभिरेव च| सेकाञ्जनं प्रधमनं नस्यं धूमं च कारयेत्||७५|| वातश्लेष्मात्मके प्रायः ...|७६|

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Adhikarana 26 (76-77) · Śloka 77

... পৈত্তিকে তু প্রশস্যতে| তিক্তকং জীবনীযং চ সর্পিঃ স্নেহশ্চ মিশ্রকঃ||৭৬|| শীতানি চান্নপানানি মধুরাণি মৃদূনি চ| শঙ্খকেশান্তসন্ধৌ বা মোক্ষযেজ্জ্ঞো ভিষক্ সিরাম্| উন্মাদে বিষমে চৈব জ্বরেঽপস্মার এব চ||৭৭||

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... पैत्तिके तु प्रशस्यते| तिक्तकं जीवनीयं च सर्पिः स्नेहश्च मिश्रकः||७६|| शीतानि चान्नपानानि मधुराणि मृदूनि च| शङ्खकेशान्तसन्धौ वा मोक्षयेज्ज्ञो भिषक् सिराम्| उन्मादे विषमे चैव ज्वरेऽपस्मार एव च||७७||

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Adhikarana 27 (78) · Śloka 78

ঘৃতমাংসবিতৃপ্তং বা নিবাতে স্থাপযেত্ সুখম্| ত্যক্ত্বা মতিস্মৃতিভ্রংশং সঞ্জ্ঞাং লব্ধ্বা প্রমুচ্যতে ||৭৮||

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घृतमांसवितृप्तं वा निवाते स्थापयेत् सुखम्| त्यक्त्वा मतिस्मृतिभ्रंशं सञ्ज्ञां लब्ध्वा प्रमुच्यते ||७८||

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Adhikarana 28 (79-84) · Śloka 84

আশ্বাসযেত্ সুহৃদ্বা তং বাক্যৈর্ধর্মার্থসংহিতৈঃ| ব্রূযাদিষ্টবিনাশং বা দর্শযেদদ্ভুতানি বা||৭৯|| বদ্ধং সর্ষপতৈলাক্তং ন্যসেদ্বোত্তানমাতপে| কপিকচ্ছ্বাঽথবা তপ্তৈর্লোহতৈলজলৈঃ স্পৃশেত্||৮০|| কশাভিস্তাডযিত্বা বা সুবদ্ধং বিজনে গৃহে| রুন্ধ্যাচ্চেতো হি বিভ্রান্তং ব্রজত্যস্য তথা শমম্||৮১|| সর্পেণোদ্ধৃতদংষ্ট্রেণ দান্তৈঃ সিংহৈর্গজৈশ্চ তম্| ত্রাসযেচ্ছস্ত্রহস্তৈর্বা তস্করৈঃ শত্রুভিস্তথা||৮২|| অথবা রাজপুরুষা বহির্নীত্বা সুসংযতম্| ত্রাসযেযুর্বধেনৈনং তর্জযন্তো নৃপাজ্ঞযা||৮৩|| দেহদুঃখভযেভ্যো হি পরং প্রাণভযং স্মৃতম্| তেন যাতি শমং তস্য সর্বতো বিপ্লুতং মনঃ||৮৪||

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आश्वासयेत् सुहृद्वा तं वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः| ब्रूयादिष्टविनाशं वा दर्शयेदद्भुतानि वा||७९|| बद्धं सर्षपतैलाक्तं न्यसेद्वोत्तानमातपे| कपिकच्छ्वाऽथवा तप्तैर्लोहतैलजलैः स्पृशेत्||८०|| कशाभिस्ताडयित्वा वा सुबद्धं विजने गृहे| रुन्ध्याच्चेतो हि विभ्रान्तं व्रजत्यस्य तथा शमम्||८१|| सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिंहैर्गजैश्च तम्| त्रासयेच्छस्त्रहस्तैर्वा तस्करैः शत्रुभिस्तथा||८२|| अथवा राजपुरुषा बहिर्नीत्वा सुसंयतम्| त्रासयेयुर्वधेनैनं तर्जयन्तो नृपाज्ञया||८३|| देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं स्मृतम्| तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः||८४||

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Adhikarana 29 (85-86) · Śloka 86

ইষ্টদ্রব্যবিনাশাত্তু মনো যস্যোপহন্যতে| তস্য তত্সদৃশপ্রাপ্তিসান্ত্বাশ্বাসৈঃ শমং নযেত্||৮৫|| কামশোকভযক্রোধহর্ষের্ষ্যালোভসম্ভবান্| পরস্পরপ্রতিদ্বন্দ্বৈরেভিরেব শমং নযেত্||৮৬||

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इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते| तस्य तत्सदृशप्राप्तिसान्त्वाश्वासैः शमं नयेत्||८५|| कामशोकभयक्रोधहर्षेर्ष्यालोभसम्भवान्| परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत्||८६||

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Adhikarana 30 (87-95) · Śloka 95

বুদ্ধ্বা দেশং বযঃ সাত্ম্যং দোষং কালং বলাবলে| চিকিত্সিতমিদং কুর্যাদুন্মাদে ভূতদোষজে||৮৭|| দেবর্ষিপিতৃগন্ধর্বৈরুন্মত্তস্য তু বুদ্ধিমান্| বর্জযেদঞ্জনাদীনি তীক্ষ্ণানি ক্রূরকর্ম চ||৮৮|| সর্পিষ্পানাদি তস্যেহ মৃদু ভৈষজ্যমাচরেত্| পূজাং বল্যুপহারাংশ্চ মন্ত্রাঞ্জনবিধীংস্তথা||৮৯|| শান্তিকর্মেষ্টিহোমাংশ্চ জপস্বস্ত্যযনানি চ| বেদোক্তান্ নিযমাংশ্চাপি প্রাযশ্চিত্তানি চাচরেত্||৯০|| ভূতানামধিপং দেবমীশ্বরং জগতঃ প্রভুম্| পূজযন্ প্রযতো নিত্যং জযত্যুন্মাদজং ভযম্||৯১|| রুদ্রস্য প্রমথা নাম গণা লোকে চরন্তি যে| তেষাং পূজাং চ কুর্বাণ উন্মাদেভ্যঃ প্রমুচ্যতে||৯২|| বলিভির্মঙ্গলৈর্হোমৈরোষধ্যগদধারণৈঃ| সত্যাচারতপোজ্ঞানপ্রদাননিযমব্রতৈঃ||৯৩|| দেবগোব্রহ্মণানাং চ গুরূণাং পূজনেন চ| আগন্তুঃ প্রশমং যাতি সিদ্ধৈর্মন্ত্রৌষধৈস্তথা||৯৪|| যচ্চোপদেক্ষ্যতে কিঞ্চিদপস্মারচিকিত্সিতে| উন্মাদে তচ্চ কর্তব্যং সামান্যাদ্ধেতুদূষ্যযোঃ||৯৫||

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बुद्ध्वा देशं वयः सात्म्यं दोषं कालं बलाबले| चिकित्सितमिदं कुर्यादुन्मादे भूतदोषजे||८७|| देवर्षिपितृगन्धर्वैरुन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्| वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकर्म च||८८|| सर्पिष्पानादि तस्येह मृदु भैषज्यमाचरेत्| पूजां बल्युपहारांश्च मन्त्राञ्जनविधींस्तथा||८९|| शान्तिकर्मेष्टिहोमांश्च जपस्वस्त्ययनानि च| वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाचरेत्||९०|| भूतानामधिपं देवमीश्वरं जगतः प्रभुम्| पूजयन् प्रयतो नित्यं जयत्युन्मादजं भयम्||९१|| रुद्रस्य प्रमथा नाम गणा लोके चरन्ति ये| तेषां पूजां च कुर्वाण उन्मादेभ्यः प्रमुच्यते||९२|| बलिभिर्मङ्गलैर्होमैरोषध्यगदधारणैः| सत्याचारतपोज्ञानप्रदाननियमव्रतैः||९३|| देवगोब्रह्मणानां च गुरूणां पूजनेन च| आगन्तुः प्रशमं याति सिद्धैर्मन्त्रौषधैस्तथा||९४|| यच्चोपदेक्ष्यते किञ्चिदपस्मारचिकित्सिते| उन्मादे तच्च कर्तव्यं सामान्याद्धेतुदूष्ययोः||९५||

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Adhikarana 31 (96) · Śloka 96

নিবৃত্তামিষমদ্যো যো হিতাশী প্রযতঃ শুচিঃ| নিজাগন্তুভিরুন্মাদৈঃ সত্ত্ববান্ ন স যুজ্যতে||৯৬||

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निवृत्तामिषमद्यो यो हिताशी प्रयतः शुचिः| निजागन्तुभिरुन्मादैः सत्त्ववान् न स युज्यते||९६||

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Adhikarana 32 (97) · Śloka 97

প্রসাদশ্চেন্দ্রিযার্থনাং বুদ্ধ্যাত্মমনসাং তথা| ধাতূনাং প্রকৃতিস্থত্বং বিগতোন্মাদলক্ষণম্||৯৭||

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प्रसादश्चेन्द्रियार्थनां बुद्ध्यात्ममनसां तथा| धातूनां प्रकृतिस्थत्वं विगतोन्मादलक्षणम्||९७||

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Adhikarana 33 (98) · Śloka 98

তত্র শ্লোকঃ- উন্মাদানাং সমুত্থানং লক্ষণং সচিকিত্সিতম্| নিজাগন্তুনিমিত্তানামুক্তবান্ ভিষগুত্তমঃ||৯৮||

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तत्र श्लोकः- उन्मादानां समुत्थानं लक्षणं सचिकित्सितम्| निजागन्तुनिमित्तानामुक्तवान् भिषगुत्तमः||९८||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 9

ইত্যাগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলপূরিতে চিকিত্সাস্থানে উন্মাদচিকিত্সিতং নাম নবমোঽধ্যাযঃ||৯||

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इत्याग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलपूरिते चिकित्सास्थाने उन्मादचिकित्सितं नाम नवमोऽध्यायः||९||

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15. unmādacikitsitam — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi