Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত উদরচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथात उदरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত উদরচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथात उदरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-8) · Śloka 8
সিদ্ধবিদ্যাধরাকীর্ণে কৈলাসে নন্দনোপমে| তপ্যমানং তপস্তীব্রং সাক্ষাদ্ধর্মমিব স্থিতম্||৩|| আযুর্বেদবিদাং শ্রেষ্ঠং ভিষগ্বিদ্যাপ্রবর্তকম্| পুনর্বসুং জিতাত্মানমগ্নিবেশোঽব্রবীদ্বচঃ||৪|| ভগবন্নুদরৈর্দুঃখৈর্দৃশ্যন্তে হ্যর্দিতা নরাঃ| শুষ্কবক্ত্রাঃ কৃশৈর্গাত্রৈরাধ্মাতোদরকুক্ষযঃ||৫|| প্রনষ্টাগ্নিবলাহারাঃ সর্বচেষ্টাস্বনীশ্বরাঃ| দীনাঃ প্রতিক্রিযাভাবাজ্জহতোঽসূননাথবত্||৬|| তেষামাযতনং সঙ্খ্যাং প্রাগ্রূপাকৃতিভেষজম্| যথাবচ্ছ্রোতুমিচ্ছামি গুরুণা সম্যগীরিতম্||৭|| সর্বভূতহিতাযর্ষিঃ শিষ্যেণৈবং প্রচোদিতঃ| সর্বভূতহিতং বাক্যং ব্যাহর্তুমুপচক্রমে||৮||
सिद्धविद्याधराकीर्णे कैलासे नन्दनोपमे| तप्यमानं तपस्तीव्रं साक्षाद्धर्ममिव स्थितम्||३|| आयुर्वेदविदां श्रेष्ठं भिषग्विद्याप्रवर्तकम्| पुनर्वसुं जितात्मानमग्निवेशोऽब्रवीद्वचः||४|| भगवन्नुदरैर्दुःखैर्दृश्यन्ते ह्यर्दिता नराः| शुष्कवक्त्राः कृशैर्गात्रैराध्मातोदरकुक्षयः||५|| प्रनष्टाग्निबलाहाराः सर्वचेष्टास्वनीश्वराः| दीनाः प्रतिक्रियाभावाज्जहतोऽसूननाथवत्||६|| तेषामायतनं सङ्ख्यां प्राग्रूपाकृतिभेषजम्| यथावच्छ्रोतुमिच्छामि गुरुणा सम्यगीरितम्||७|| सर्वभूतहितायर्षिः शिष्येणैवं प्रचोदितः| सर्वभूतहितं वाक्यं व्याहर्तुमुपचक्रमे||८||
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Adhikarana 3 (9-11) · Śloka 11
অগ্নিদোষান্মনুষ্যাণাং রোগসঙ্ঘাঃ পৃথগ্বিধাঃ| মলবৃদ্ধ্যা প্রবর্তন্তে বিশেষেণোদরাণি তু||৯|| মন্দেঽগ্নৌ মলিনৈর্ভুক্তৈরপাকাদ্দোষসঞ্চযঃ| প্রাণাগ্ন্যপানান্ সন্দূষ্য মার্গান্রুদ্ধ্বাঽধরোত্তরান্||১০|| ত্বঙ্মাংসান্তরমাগম্য কুক্ষিমাধ্মাপযন্ ভৃশম্| জনযত্যুদরং তস্য হেতুং শৃণু সলক্ষণম্||১১||
अग्निदोषान्मनुष्याणां रोगसङ्घाः पृथग्विधाः| मलवृद्ध्या प्रवर्तन्ते विशेषेणोदराणि तु||९|| मन्देऽग्नौ मलिनैर्भुक्तैरपाकाद्दोषसञ्चयः| प्राणाग्न्यपानान् सन्दूष्य मार्गान्रुद्ध्वाऽधरोत्तरान्||१०|| त्वङ्मांसान्तरमागम्य कुक्षिमाध्मापयन् भृशम्| जनयत्युदरं तस्य हेतुं शृणु सलक्षणम्||११||
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Adhikarana 4 (12-15) · Śloka 15
অত্যুষ্ণলবণক্ষারবিদাহ্যম্লগরাশনাত্| মিথ্যাসংসর্জনাদ্রূক্ষবিরুদ্ধাশুচিভোজনাত্||১২|| প্লীহার্শোগ্রহণীদোষকর্শনাত্ কর্মবিভ্রমাত্| ক্লিষ্টানামপ্রতীকারাদ্রৌক্ষ্যাদ্বেগবিধারণাত্||১৩|| স্রোতসাং দূষণাদামাত্ সঙ্ক্ষোভাদতিপূরণাত্| অর্শোবালশকৃদ্রোধাদন্ত্রস্ফুটনভেদনাত্||১৪|| অতিসঞ্চিতদোষাণাং পাপং কর্ম চ কুর্বতাম্| উদরাণ্যুপজাযন্তে মন্দাগ্নীনাং বিশেষতঃ||১৫||
अत्युष्णलवणक्षारविदाह्यम्लगराशनात्| मिथ्यासंसर्जनाद्रूक्षविरुद्धाशुचिभोजनात्||१२|| प्लीहार्शोग्रहणीदोषकर्शनात् कर्मविभ्रमात्| क्लिष्टानामप्रतीकाराद्रौक्ष्याद्वेगविधारणात्||१३|| स्रोतसां दूषणादामात् सङ्क्षोभादतिपूरणात्| अर्शोबालशकृद्रोधादन्त्रस्फुटनभेदनात्||१४|| अतिसञ्चितदोषाणां पापं कर्म च कुर्वताम्| उदराण्युपजायन्ते मन्दाग्नीनां विशेषतः||१५||
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Adhikarana 5 (16-19) · Śloka 19
ক্ষুন্নাশঃ স্বাদ্বতিস্নিগ্ধগুর্বন্নং পচ্যতে চিরাত্| ভুক্তং বিদহ্যতে সর্বং জীর্ণাজীর্ণং ন বেত্তি চ||১৬|| সহতে নাতিসৌহিত্যমীষচ্ছোফশ্চ পাদযোঃ| শশ্বদ্বলক্ষযোঽল্পেঽপি ব্যাযামে শ্বাসমৃচ্ছতি||১৭|| বৃদ্ধিঃ পুরীষনিচযো রূক্ষোদাবর্তহেতুকা| বস্তিসন্ধৌ রুগাধ্মানং বর্ধতে পাট্যতেঽপি চ||১৮|| আতন্যতে চ জঠরমপি লঘ্বল্পভোজনাত্| রাজীজন্ম বলীনাশ ইতি লিঙ্গং ভবিষ্যতাম্||১৯||
क्षुन्नाशः स्वाद्वतिस्निग्धगुर्वन्नं पच्यते चिरात्| भुक्तं विदह्यते सर्वं जीर्णाजीर्णं न वेत्ति च||१६|| सहते नातिसौहित्यमीषच्छोफश्च पादयोः| शश्वद्बलक्षयोऽल्पेऽपि व्यायामे श्वासमृच्छति||१७|| वृद्धिः पुरीषनिचयो रूक्षोदावर्तहेतुका| बस्तिसन्धौ रुगाध्मानं वर्धते पाट्यतेऽपि च||१८|| आतन्यते च जठरमपि लघ्वल्पभोजनात्| राजीजन्म वलीनाश इति लिङ्गं भविष्यताम्||१९||
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Adhikarana 6 (20-22) · Śloka 22
রুদ্ধ্বা স্বেদাম্বুবাহীনি দোষাঃ স্রোতাংসি সঞ্চিতাঃ| প্রাণাগ্ন্যপানান্ সন্দূষ্য জনযন্ত্যুদরং নৃণাম্||২০|| কুক্ষেরাধ্মানমাটোপঃ শোফঃ পাদকরস্য চ| মন্দোঽগ্নিঃ শ্লক্ষ্ণগণ্ডত্বং কার্শ্যং চোদরলক্ষণম্||২১|| পৃথগ্দোষৈঃ সমস্তৈশ্চ প্লীহবদ্ধক্ষতোদকৈঃ| সম্ভবন্ত্যুদরাণ্যষ্টৌ তেষাং লিঙ্গং পৃথক্ শৃণু||২২||
रुद्ध्वा स्वेदाम्बुवाहीनि दोषाः स्रोतांसि सञ्चिताः| प्राणाग्न्यपानान् सन्दूष्य जनयन्त्युदरं नृणाम्||२०|| कुक्षेराध्मानमाटोपः शोफः पादकरस्य च| मन्दोऽग्निः श्लक्ष्णगण्डत्वं कार्श्यं चोदरलक्षणम्||२१|| पृथग्दोषैः समस्तैश्च प्लीहबद्धक्षतोदकैः| सम्भवन्त्युदराण्यष्टौ तेषां लिङ्गं पृथक् शृणु||२२||
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Adhikarana 7 (23-25) · Śloka 25
রূক্ষাল্পভোজনাযাসবেগোদাবর্তকর্শনৈঃ| বাযুঃ প্রকুপিতঃ কুক্ষিহৃদ্বস্তিগুদমার্গগঃ||২৩|| হত্বাঽগ্নিং কফমুদ্ধূয তেন রূদ্ধগতিস্ততঃ| আচিনোত্যুদরং জন্তোস্ত্বঙ্মাংসান্তরমাশ্রিতঃ||২৪|| তস্য রূপাণি- কুক্ষিপাণিপাদবৃষণশ্বযথুঃ, উদরবিপাটনম্, অনিযতৌ চ বৃদ্ধিহ্রাসৌ, কুক্ষিপার্শ্বশূলোদাবর্তাঙ্গমর্দপর্বভেদশুষ্ককাসকার্শ্যদৌর্বল্যারোচকাবিপাকাঃ, অধোগুরুত্বং, বাতবর্চোমূত্রসঙ্গঃ, শ্যাবারুণত্বং চ নখনযনবদনত্বঙ্মূত্রবর্চসাম্, অপি চোদরং তন্বসিতরাজীসিরাসন্ততম্, আহতমাধ্মাতদৃতিশব্দবদ্ভবতি, বাযুশ্চোর্ধ্বমধস্তির্যক্ চ সশূলশব্দশ্চরতি, এতদ্বাতোদরমিতি বিদ্যাত্||২৫||
रूक्षाल्पभोजनायासवेगोदावर्तकर्शनैः| वायुः प्रकुपितः कुक्षिहृद्बस्तिगुदमार्गगः||२३|| हत्वाऽग्निं कफमुद्धूय तेन रूद्धगतिस्ततः| आचिनोत्युदरं जन्तोस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः||२४|| तस्य रूपाणि- कुक्षिपाणिपादवृषणश्वयथुः, उदरविपाटनम्, अनियतौ च वृद्धिह्रासौ, कुक्षिपार्श्वशूलोदावर्ताङ्गमर्दपर्वभेदशुष्ककासकार्श्यदौर्बल्यारोचकाविपाकाः, अधोगुरुत्वं, वातवर्चोमूत्रसङ्गः, श्यावारुणत्वं च नखनयनवदनत्वङ्मूत्रवर्चसाम्, अपि चोदरं तन्वसितराजीसिरासन्ततम्, आहतमाध्मातदृतिशब्दवद्भवति, वायुश्चोर्ध्वमधस्तिर्यक् च सशूलशब्दश्चरति, एतद्वातोदरमिति विद्यात्||२५||
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Adhikarana 8 (26-28) · Śloka 28
কট্বম্ললবণাত্যুষ্ণতীক্ষ্ণাগ্ন্যাতপসেবনৈঃ| বিদাহ্যধ্যশনাজীর্ণৈশ্চাশু পিত্তং সমাচিতম্||২৬|| প্রাপ্যানিলকফৌ রুদ্ধ্বা মার্গমুন্মার্গমাস্থিতম্| নিহন্ত্যামাশযে বহ্নিং জনযত্যুদরং ততঃ||২৭|| তস্য রূপাণি- দাহজ্বরতৃষ্ণামূর্চ্ছাতীসারভ্রমাঃ, কটুকাস্যত্বং, হরিতহারিদ্রত্বং চ নখনযনবদনত্বঙ্মূত্রবর্চসাম্, অপি চোদরং নীলপীতহারিদ্রহরিততাম্ররাজীসিরাবনদ্ধং, দহ্যতে, দূযতে, ধূপ্যতে, ঊষ্মাযতে, স্বিদ্যতে, ক্লিদ্যতে, মৃদুস্পর্শং ক্ষিপ্রপাকং চ ভবতি; এতত্ পিত্তোদরমিতি বিদ্যাত্||২৮||
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णाग्न्यातपसेवनैः| विदाह्यध्यशनाजीर्णैश्चाशु पित्तं समाचितम्||२६|| प्राप्यानिलकफौ रुद्ध्वा मार्गमुन्मार्गमास्थितम्| निहन्त्यामाशये वह्निं जनयत्युदरं ततः||२७|| तस्य रूपाणि- दाहज्वरतृष्णामूर्च्छातीसारभ्रमाः, कटुकास्यत्वं, हरितहारिद्रत्वं च नखनयनवदनत्वङ्मूत्रवर्चसाम्, अपि चोदरं नीलपीतहारिद्रहरितताम्रराजीसिरावनद्धं, दह्यते, दूयते, धूप्यते, ऊष्मायते, स्विद्यते, क्लिद्यते, मृदुस्पर्शं क्षिप्रपाकं च भवति; एतत् पित्तोदरमिति विद्यात्||२८||
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Adhikarana 9 (29-31) · Śloka 31
অব্যাযামদিবাস্বপ্নস্বাদ্বতিস্নিগ্ধপিচ্ছিলৈঃ| দধিদুগ্ধৌদকানূপমাংসৈশ্চাপ্যতিসেবিতৈঃ||২৯|| ক্রুদ্ধেন শ্লেষ্মণা স্রোতঃস্বাবৃতেষ্বাবৃতোঽনিলঃ| তমেব পীডযন্ কুর্যাদুদরং বহিরন্ত্রগঃ ||৩০|| তস্য রূপাণি- গৌরবারোচকাবিপাকাঙ্গমর্দাঃ, সুপ্তিঃ, পাণিপাদমুষ্কোরুশোফঃ, উত্ক্লেশনিদ্রাকাসশ্বাসাঃ, শুক্লত্বং চ নখনযনবদনত্বঙ্মূত্রবর্চসাম্; অপি চোদরং শুক্লরাজীসিরাসন্ততং, গুরু, স্তিমিতং, স্থিরং, কঠিনং চ ভবতি; এতচ্ছ্লেষ্মোদরমিতি বিদ্যাত্||৩১||
अव्यायामदिवास्वप्नस्वाद्वतिस्निग्धपिच्छिलैः| दधिदुग्धौदकानूपमांसैश्चाप्यतिसेवितैः||२९|| क्रुद्धेन श्लेष्मणा स्रोतःस्वावृतेष्वावृतोऽनिलः| तमेव पीडयन् कुर्यादुदरं बहिरन्त्रगः ||३०|| तस्य रूपाणि- गौरवारोचकाविपाकाङ्गमर्दाः, सुप्तिः, पाणिपादमुष्कोरुशोफः, उत्क्लेशनिद्राकासश्वासाः, शुक्लत्वं च नखनयनवदनत्वङ्मूत्रवर्चसाम्; अपि चोदरं शुक्लराजीसिरासन्ततं, गुरु, स्तिमितं, स्थिरं, कठिनं च भवति; एतच्छ्लेष्मोदरमिति विद्यात्||३१||
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Adhikarana 10 (32-34) · Śloka 34
দুর্বলাগ্নেরপথ্যামবিরোধিগুরুভোজনৈঃ| স্ত্রীদত্তৈশ্চ রজোরোমবিণ্মূত্রাস্থিনখাদিভিঃ||৩২|| বিষৈশ্চ মন্দৈর্বাতাদ্যাঃ কুপিতাঃ সঞ্চযং ত্রযঃ| শনৈঃ কোষ্ঠে প্রকুর্বন্তো জনযন্ত্যুদরং নৃণাম্||৩৩|| তস্য রূপাণি- সর্বেষামেব দোষাণাং সমস্তানি লিঙ্গান্যুপলভ্যন্তে, বর্ণাশ্চ সর্বে নখাদিষু, উদরমপি নানাবর্ণরাজীসিরাসন্ততং ভবতি; এতত্ সন্নিপাতোদরমিতি বিদ্যাত্||৩৪||
दुर्बलाग्नेरपथ्यामविरोधिगुरुभोजनैः| स्त्रीदत्तैश्च रजोरोमविण्मूत्रास्थिनखादिभिः||३२|| विषैश्च मन्दैर्वाताद्याः कुपिताः सञ्चयं त्रयः| शनैः कोष्ठे प्रकुर्वन्तो जनयन्त्युदरं नृणाम्||३३|| तस्य रूपाणि- सर्वेषामेव दोषाणां समस्तानि लिङ्गान्युपलभ्यन्ते, वर्णाश्च सर्वे नखादिषु, उदरमपि नानावर्णराजीसिरासन्ततं भवति; एतत् सन्निपातोदरमिति विद्यात्||३४||
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Adhikarana 11 (35-38) · Śloka 38
অশিতস্যাতিসঙ্ক্ষোভাদ্যানযানাতিচেষ্টিতৈঃ| অতিব্যবাযভারাধ্ববমনব্যাধিকর্শনৈঃ||৩৫|| বামপার্শ্বাশ্রিতঃ প্লীহা চ্যুতঃ স্থানাত্ প্রবর্ধতে| শোণিতং বা রসাদিভ্যো বিবৃদ্ধং তং বিবর্ধযেত্||৩৬|| তস্য প্লীহা কঠিনোঽষ্ঠীলেবাদৌ বর্ধমানঃ কচ্ছপসংস্থান উপলভ্যতে; স চোপেক্ষিতঃ ক্রমেণ কুক্ষিং জঠরমগ্ন্যধিষ্ঠানং চ পরিক্ষিপন্নুদরমভিনির্বর্তযতি||৩৭|| তস্য রূপাণি- দৌর্বল্যারোচকাবিপাকবর্চোমূত্রগ্রহতমঃপ্রবেশপিপাসাঙ্গমর্দচ্ছর্দিমূর্চ্ছাঙ্গসাদ- কাসশ্বাসমৃদুজ্বরানাহাগ্নিনাশকার্শ্যাস্যবৈরস্যপর্বভেদকোষ্ঠবাতশূলানি, অপি চোদরমরুণবর্ণং বিবর্ণং বা নীলহরিতহারিদ্ররাজিমদ্ভবতি; এবমেব যকৃদপি দক্ষিণপার্শ্বস্থং কুর্যাত্, তুল্যহেতুলিঙ্গৌষধত্বাত্তস্য প্লীহজঠর এবাবরোধ ইতি; এতত্ প্লীহোদরমিতি বিদ্যাত্||৩৮||
अशितस्यातिसङ्क्षोभाद्यानयानातिचेष्टितैः| अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्शनैः||३५|| वामपार्श्वाश्रितः प्लीहा च्युतः स्थानात् प्रवर्धते| शोणितं वा रसादिभ्यो विवृद्धं तं विवर्धयेत्||३६|| तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठीलेवादौ वर्धमानः कच्छपसंस्थान उपलभ्यते; स चोपेक्षितः क्रमेण कुक्षिं जठरमग्न्यधिष्ठानं च परिक्षिपन्नुदरमभिनिर्वर्तयति||३७|| तस्य रूपाणि- दौर्बल्यारोचकाविपाकवर्चोमूत्रग्रहतमःप्रवेशपिपासाङ्गमर्दच्छर्दिमूर्च्छाङ्गसाद- कासश्वासमृदुज्वरानाहाग्निनाशकार्श्यास्यवैरस्यपर्वभेदकोष्ठवातशूलानि, अपि चोदरमरुणवर्णं विवर्णं वा नीलहरितहारिद्रराजिमद्भवति; एवमेव यकृदपि दक्षिणपार्श्वस्थं कुर्यात्, तुल्यहेतुलिङ्गौषधत्वात्तस्य प्लीहजठर एवावरोध इति; एतत् प्लीहोदरमिति विद्यात्||३८||
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Adhikarana 12 (39-41) · Śloka 41
পক্ষ্মবালৈঃ সহান্নেন ভুক্তৈর্বদ্ধাযনে গুদে| উদাবর্তৈস্তথাঽর্শোভিরন্ত্রসম্মূর্চ্ছনেন বা||৩৯|| অপানো মার্গসংরোধাদ্ধত্বাঽগ্নিং কুপিতোঽনিলঃ| বর্চঃপিত্তকফান্ রুদ্ধ্বা জনযত্যুদরং ততঃ||৪০|| তস্য রূপাণি- তৃষ্ণাদাহজ্বরমুখতালুশোষোরুসাদকাসশ্বাসদৌর্বল্যারোচকাবিপাক- বর্চোমূত্রসঙ্গাধ্মানচ্ছর্দিক্ষবথুশিরোহৃন্নাভিগুদশূলানি, অপি চোদরং মূঢবাতং স্থিরমরুণং নীলরাজি সিরাবনদ্ধরাজিকং বা প্রাযো নাভ্যুপরি গোপুচ্ছবদভিনির্বর্তত ইতি; এতদ্বদ্ধগুদোদরমিতি বিদ্যাত্||৪১||
पक्ष्मबालैः सहान्नेन भुक्तैर्बद्धायने गुदे| उदावर्तैस्तथाऽर्शोभिरन्त्रसम्मूर्च्छनेन वा||३९|| अपानो मार्गसंरोधाद्धत्वाऽग्निं कुपितोऽनिलः| वर्चःपित्तकफान् रुद्ध्वा जनयत्युदरं ततः||४०|| तस्य रूपाणि- तृष्णादाहज्वरमुखतालुशोषोरुसादकासश्वासदौर्बल्यारोचकाविपाक- वर्चोमूत्रसङ्गाध्मानच्छर्दिक्षवथुशिरोहृन्नाभिगुदशूलानि, अपि चोदरं मूढवातं स्थिरमरुणं नीलराजि सिरावनद्धराजिकं वा प्रायो नाभ्युपरि गोपुच्छवदभिनिर्वर्तत इति; एतद्बद्धगुदोदरमिति विद्यात्||४१||
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Adhikarana 13 (42-44) · Śloka 44
শর্করাতৃণকাষ্ঠাস্থিকণ্টকৈরন্নসংযুতৈঃ| ভিদ্যেতান্ত্রং যদা ভুক্তৈর্জৃম্ভযাঽত্যশনেন বা||৪২|| পাকং গচ্ছেদ্রসস্তেভ্যশ্ছিদ্রেভ্যঃ প্রস্রবদ্বহিঃ| পূরযন্ গুদমন্ত্রং চ জনযত্যুদরং ততঃ||৪৩|| তস্য রূপাণি- তদধো নাভ্যাঃ প্রাযোঽভিবর্ধমানমুদকোদরং ভবতি, যথাবলং চ দোষাণাং রূপাণি দর্শযতি, অপি চাতুরঃ সলোহিতনীলপীতপিচ্ছিলকুণপগন্ধ্যামবর্চ উপবেশতে, হিক্কাশ্বাসকাসতৃষ্ণাপ্রমেহারোচকাবিপাকদৌর্বল্যপরীতশ্চ ভবতি; এতচ্ছিদ্রোদরমিতি বিদ্যাত্||৪৪||
शर्करातृणकाष्ठास्थिकण्टकैरन्नसंयुतैः| भिद्येतान्त्रं यदा भुक्तैर्जृम्भयाऽत्यशनेन वा||४२|| पाकं गच्छेद्रसस्तेभ्यश्छिद्रेभ्यः प्रस्रवद्बहिः| पूरयन् गुदमन्त्रं च जनयत्युदरं ततः||४३|| तस्य रूपाणि- तदधो नाभ्याः प्रायोऽभिवर्धमानमुदकोदरं भवति, यथाबलं च दोषाणां रूपाणि दर्शयति, अपि चातुरः सलोहितनीलपीतपिच्छिलकुणपगन्ध्यामवर्च उपवेशते, हिक्काश्वासकासतृष्णाप्रमेहारोचकाविपाकदौर्बल्यपरीतश्च भवति; एतच्छिद्रोदरमिति विद्यात्||४४||
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Adhikarana 14 (45-49) · Śloka 49
স্নেহপীতস্য মন্দাগ্নেঃ ক্ষীণস্যাতিকৃশস্য বা| অত্যম্বুপানান্নষ্টেঽগ্নৌ মারুতঃ ক্লোম্নি সংস্থিতঃ||৪৫|| স্রোতঃসু রুদ্ধমার্গেষু কফশ্চোদকমূর্চ্ছিতঃ| বর্ধযেতাং তদেবাম্বু স্বস্থানাদুদরায তৌ||৪৬|| তস্য রূপাণি- অনন্নকাঙ্ক্ষাপিপাসাগুদস্রাবশূলশ্বাসকাসদৌর্বল্যানি, অপি চোদরং নানাবর্ণরাজিসিরাসন্ততমুদকপূর্ণদৃতিক্ষোভসংস্পর্শং ভবতি, এতদুদকোদরমিতি বিদ্যাত্||৪৭|| তত্র অচিরোত্পন্নমনুপদ্রবমনুদকমপ্রাপ্তমুদরং ত্বরমাণশ্চিকিত্সেত্; উপেক্ষিতানাং হ্যেষাং দোষাঃ স্বস্থানাদপবৃত্তা পরিপাকাদ্দ্রবীভূতাঃ সন্ধীন্ স্রোতাংসি চোপক্লেদযন্তি, স্বেদশ্চ বাহ্যেষু স্রোতঃসু প্রতিহতগতিস্তির্যগবতিষ্ঠমানস্তদেবোদকমাপ্যাযযতি; তত্র পিচ্ছোত্পত্তৌ মণ্ডলমুদরং গুরু স্তিমিতমাকোঠিতমশব্দং মৃদুস্পর্শমপগতরাজীকমাক্রান্তং নাভ্যামেবোপসর্পতি| ততোঽনন্তরমুদকপ্রাদুর্ভাবঃ| তস্য রূপাণি- কুক্ষেরতিমাত্রবৃদ্ধিঃ, সিরান্তর্ধানগমনম্, উদকপূর্ণদৃতিসঙ্ক্ষোভসংস্পর্শত্বং চ||৪৮|| তদাঽঽতুরমুপদ্রবাঃ স্পৃশন্তি- ছর্দ্যতীসারতমকতৃষ্ণাশ্বাসকাসহিক্কাদৌর্বল্যপার্শ্বশূলারুচিস্বরভেদমূত্রসঙ্গাদযঃ; তথাবিধমচিকিত্স্যং বিদ্যাদিতি||৪৯||
स्नेहपीतस्य मन्दाग्नेः क्षीणस्यातिकृशस्य वा| अत्यम्बुपानान्नष्टेऽग्नौ मारुतः क्लोम्नि संस्थितः||४५|| स्रोतःसु रुद्धमार्गेषु कफश्चोदकमूर्च्छितः| वर्धयेतां तदेवाम्बु स्वस्थानादुदराय तौ||४६|| तस्य रूपाणि- अनन्नकाङ्क्षापिपासागुदस्रावशूलश्वासकासदौर्बल्यानि, अपि चोदरं नानावर्णराजिसिरासन्ततमुदकपूर्णदृतिक्षोभसंस्पर्शं भवति, एतदुदकोदरमिति विद्यात्||४७|| तत्र अचिरोत्पन्नमनुपद्रवमनुदकमप्राप्तमुदरं त्वरमाणश्चिकित्सेत्; उपेक्षितानां ह्येषां दोषाः स्वस्थानादपवृत्ता परिपाकाद्द्रवीभूताः सन्धीन् स्रोतांसि चोपक्लेदयन्ति, स्वेदश्च बाह्येषु स्रोतःसु प्रतिहतगतिस्तिर्यगवतिष्ठमानस्तदेवोदकमाप्याययति; तत्र पिच्छोत्पत्तौ मण्डलमुदरं गुरु स्तिमितमाकोठितमशब्दं मृदुस्पर्शमपगतराजीकमाक्रान्तं नाभ्यामेवोपसर्पति| ततोऽनन्तरमुदकप्रादुर्भावः| तस्य रूपाणि- कुक्षेरतिमात्रवृद्धिः, सिरान्तर्धानगमनम्, उदकपूर्णदृतिसङ्क्षोभसंस्पर्शत्वं च||४८|| तदाऽऽतुरमुपद्रवाः स्पृशन्ति- छर्द्यतीसारतमकतृष्णाश्वासकासहिक्कादौर्बल्यपार्श्वशूलारुचिस्वरभेदमूत्रसङ्गादयः; तथाविधमचिकित्स्यं विद्यादिति||४९||
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Adhikarana 15 (50-51) · Śloka 51
ভবন্তি চাত্র- বাতাত্পিত্তাত্কফাত্ প্লীহ্নঃ সন্নিপাতাত্তথোদকাত্| পরং পরং কৃচ্ছ্রতরমুদরং ভিষগাদিশেত্||৫০|| পক্ষাদ্বদ্ধগুদং তূর্ধ্বং সর্বং জাতোদকং তথা| প্রাযো ভবত্যভাবায চ্ছিদ্রান্ত্রং চোদরং নৃণাম্||৫১||
भवन्ति चात्र- वातात्पित्तात्कफात् प्लीह्नः सन्निपातात्तथोदकात्| परं परं कृच्छ्रतरमुदरं भिषगादिशेत्||५०|| पक्षाद्बद्धगुदं तूर्ध्वं सर्वं जातोदकं तथा| प्रायो भवत्यभावाय च्छिद्रान्त्रं चोदरं नृणाम्||५१||
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Adhikarana 16 (52-54) · Śloka 54
শূনাক্ষং কুটিলোপস্থমুপক্লিন্নতনুত্বচম্| বলশোণিতমাংসাগ্নিপরিক্ষীণং চ বর্জযেত্||৫২|| শ্বযথুঃ সর্বমর্মোত্থঃ শ্বাসো হিক্কাঽরুচিঃ সতৃট্| মূর্চ্ছা চ্ছর্দিরতীসারো নিহন্ত্যুদরিণং নরম্||৫৩|| জন্মনৈবোদরং সর্বং প্রাযঃ কৃচ্ছ্রতমং মতম্| বলিনস্তদজাতাম্বু যত্নসাধ্যং নবোত্থিতম্||৫৪||
शूनाक्षं कुटिलोपस्थमुपक्लिन्नतनुत्वचम्| बलशोणितमांसाग्निपरिक्षीणं च वर्जयेत्||५२|| श्वयथुः सर्वमर्मोत्थः श्वासो हिक्काऽरुचिः सतृट्| मूर्च्छा च्छर्दिरतीसारो निहन्त्युदरिणं नरम्||५३|| जन्मनैवोदरं सर्वं प्रायः कृच्छ्रतमं मतम्| बलिनस्तदजाताम्बु यत्नसाध्यं नवोत्थितम्||५४||
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Adhikarana 17 (55-58) · Śloka 58
অজাতশোথমরুণং সশব্দং নাতিভারিকম্| সদা গুডগুডাযচ্চ সিরাজালগবাক্ষিতম্||৫৫|| নাভিং বিষ্টভ্য পাযৌ তু বেগং কৃত্বা প্রণশ্যতি| হৃন্নাভিবঙ্ক্ষণকটীগুদপ্রত্যেকশূলিনঃ||৫৬|| কর্কশং সৃজতো বাতং নাতিমন্দে চ পাবকে| লোলস্যাবিরসে চাস্যে মূত্রেঽল্পে সংহতে বিষি||৫৭|| অজাতোদকমিত্যেতৈর্লিঙ্গৈর্বিজ্ঞায তত্ত্বতঃ| উপাক্রমেদ্ভিষগ্দোষবলকালবিশেষবিত্||৫৮||
अजातशोथमरुणं सशब्दं नातिभारिकम्| सदा गुडगुडायच्च सिराजालगवाक्षितम्||५५|| नाभिं विष्टभ्य पायौ तु वेगं कृत्वा प्रणश्यति| हृन्नाभिवङ्क्षणकटीगुदप्रत्येकशूलिनः||५६|| कर्कशं सृजतो वातं नातिमन्दे च पावके| लोलस्याविरसे चास्ये मूत्रेऽल्पे संहते विषि||५७|| अजातोदकमित्येतैर्लिङ्गैर्विज्ञाय तत्त्वतः| उपाक्रमेद्भिषग्दोषबलकालविशेषवित्||५८||
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Adhikarana 18 (59-67) · Śloka 67
বাতোদরং বলমতঃ পূর্বং স্নেহৈরুপাচরেত্| স্নিগ্ধায স্বেদিতাঙ্গায দদ্যাত্ স্নেহবিরেচনম্||৫৯|| হৃতে দোষে পরিম্লানং বেষ্টযেদ্বাসসোদরম্| তথাঽস্যানবকাশত্বাদ্বাযুর্নাধ্মাপযেত্ পুনঃ||৬০|| দোষাতিমাত্রোপচযাত্ স্রোতোমার্গনিরোধনাত্| সম্ভবত্যুদরং তস্মান্নিত্যমেব বিরেচযেত্||৬১|| শুদ্ধং সংসৃজ্য চ ক্ষীরং বলার্থং পাযযেত্তু তম্| প্রাগুত্ক্লেশান্নিবর্ত্যং চ বলে লব্ধে ক্রমাত্ পযঃ||৬২|| যূষৈ রসৈর্বা মন্দাম্ললবণৈরেধিতানলম্| সোদাবর্তং পুনঃ স্নিগ্ধং স্বিন্নমাস্থাপযেন্নরম্||৬৩|| স্ফুরণাক্ষেপসন্ধ্যস্থিপার্শ্বপৃষ্ঠত্রিকার্তিষু| দীপ্তাগ্নিং বদ্ধবিড্বাতং রূক্ষমপ্যনুবাসযেত্||৬৪|| তীক্ষ্ণাধোভাগযুক্তোঽস্য নিরূহো দাশমূলিকঃ| বাতঘ্নাম্লশৃতৈরণ্ডতিলতৈলানুবাসনম্||৬৫|| অবিরেচ্যং তু যং বিদ্যাদ্দুর্বলং স্থবিরং শিশুম্| সুকুমারং প্রকৃত্যাঽল্পদোষং বাঽথোল্বণানিলম্||৬৬|| তং ভিষক্ শমনৈঃ সর্পির্যূষমাংসরসৌদনৈঃ| বস্ত্যভ্যঙ্গানুবাসৈশ্চ ক্ষীরৈশ্চোপাচরেদ্বুধঃ||৬৭||
वातोदरं बलमतः पूर्वं स्नेहैरुपाचरेत्| स्निग्धाय स्वेदिताङ्गाय दद्यात् स्नेहविरेचनम्||५९|| हृते दोषे परिम्लानं वेष्टयेद्वाससोदरम्| तथाऽस्यानवकाशत्वाद्वायुर्नाध्मापयेत् पुनः||६०|| दोषातिमात्रोपचयात् स्रोतोमार्गनिरोधनात्| सम्भवत्युदरं तस्मान्नित्यमेव विरेचयेत्||६१|| शुद्धं संसृज्य च क्षीरं बलार्थं पाययेत्तु तम्| प्रागुत्क्लेशान्निवर्त्यं च बले लब्धे क्रमात् पयः||६२|| यूषै रसैर्वा मन्दाम्ललवणैरेधितानलम्| सोदावर्तं पुनः स्निग्धं स्विन्नमास्थापयेन्नरम्||६३|| स्फुरणाक्षेपसन्ध्यस्थिपार्श्वपृष्ठत्रिकार्तिषु| दीप्ताग्निं बद्धविड्वातं रूक्षमप्यनुवासयेत्||६४|| तीक्ष्णाधोभागयुक्तोऽस्य निरूहो दाशमूलिकः| वातघ्नाम्लशृतैरण्डतिलतैलानुवासनम्||६५|| अविरेच्यं तु यं विद्याद्दुर्बलं स्थविरं शिशुम्| सुकुमारं प्रकृत्याऽल्पदोषं वाऽथोल्बणानिलम्||६६|| तं भिषक् शमनैः सर्पिर्यूषमांसरसौदनैः| बस्त्यभ्यङ्गानुवासैश्च क्षीरैश्चोपाचरेद्बुधः||६७||
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Adhikarana 19 (68-71) · Śloka 71
পিত্তোদরে তু বলিনং পূর্বমেব বিরেচযেত্| দুর্বলং ত্বনুবাস্যাদৌ শোধযেত্ ক্ষীরবস্তিনা||৬৮|| সঞ্জাতবলকাযাগ্নিং পুনঃ স্নিগ্ধং বিরেচযেত্| পযসা সত্রিবৃত্কল্কেনোরুবূকশৃতেন বা||৬৯|| সাতলাত্রাযমাণাভ্যাং শৃতেনারগ্বধেন বা| সকফে বা সমূত্রেণ সবাতে তিক্তসর্পিষা||৭০|| পুনঃ ক্ষীরপ্রযোগং চ বস্তিকর্ম বিরেচনম্| ক্রমেণ ধ্রুবমাতিষ্ঠন্ যুক্তঃ পিত্তোদরং জযেত্||৭১||
पित्तोदरे तु बलिनं पूर्वमेव विरेचयेत्| दुर्बलं त्वनुवास्यादौ शोधयेत् क्षीरबस्तिना||६८|| सञ्जातबलकायाग्निं पुनः स्निग्धं विरेचयेत्| पयसा सत्रिवृत्कल्केनोरुबूकशृतेन वा||६९|| सातलात्रायमाणाभ्यां शृतेनारग्वधेन वा| सकफे वा समूत्रेण सवाते तिक्तसर्पिषा||७०|| पुनः क्षीरप्रयोगं च बस्तिकर्म विरेचनम्| क्रमेण ध्रुवमातिष्ठन् युक्तः पित्तोदरं जयेत्||७१||
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Adhikarana 20 (72-73) · Śloka 73
স্নিগ্ধং স্বিন্নং বিশুদ্ধং তু কফোদরিণমাতুরম্| সংসর্জযেত্ কটুক্ষারযুক্তৈরন্নৈঃ কফাপহৈঃ||৭২|| গোমূত্রারিষ্টপানৈশ্চ চূর্ণাযস্কৃতিভিস্তথা| সক্ষারৈস্তৈলপানৈশ্চ শমযেত্তু কফোদরম্||৭৩||
स्निग्धं स्विन्नं विशुद्धं तु कफोदरिणमातुरम्| संसर्जयेत् कटुक्षारयुक्तैरन्नैः कफापहैः||७२|| गोमूत्रारिष्टपानैश्च चूर्णायस्कृतिभिस्तथा| सक्षारैस्तैलपानैश्च शमयेत्तु कफोदरम्||७३||
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Adhikarana 21 (74) · Śloka 74
সন্নিপাতোদরে সর্বা যথোক্তাঃ কারযেত্ ক্রিযাঃ| সোপদ্রবং তু নির্বৃত্তং প্রত্যাখ্যেযং বিজানতা|৭৪|
सन्निपातोदरे सर्वा यथोक्ताः कारयेत् क्रियाः| सोपद्रवं तु निर्वृत्तं प्रत्याख्येयं विजानता|७४|
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Adhikarana 22 (85-88) · Śloka 89
উদাবর্তরুজানাহৈর্দাহমোহতৃষাজ্বরৈঃ| গৌরবারুচিকাঠিন্যৈশ্চানিলাদীন্ যথাক্রমম্||৭৫|| লিঙ্গৈঃ প্লীহ্ন্যধিকান্ দৃষ্ট্বা রক্তং চাপি স্বলক্ষণৈঃ| চিকিত্সাং সম্প্রকুর্বীত যথাদোষং যথাবলম্||৭৬|| স্নেহং স্বেদং বিরেকং চ নিরূহমনুবাসনম্| সমীক্ষ্য কারযেদ্বাহৌ বামে বা ব্যধযেত্ সিরাম্||৭৭|| ষট্পলং পাযযেত্ সর্পিঃ পিপ্পলীর্বা প্রযোজযেত্| সগুডামভযাং বাঽপি ক্ষারারিষ্টগণাংস্তথা||৭৮|| এষ ক্রিযাক্রমঃ প্রোক্তো যোগান্ সংশমনাঞ্ছৃণু| পিপ্পলী নাগরং দন্তী চিত্রকং দ্বিগুণাভযম্||৭৯|| বিডঙ্গাংশযুতং চূর্ণমেতদুষ্ণাম্বুনা পিবেত্| বিডঙ্গং চিত্রকং শুণ্ঠীং সঘৃতাং সৈন্ধবং বচাম্||৮০|| দগ্ধ্বা কপালে পযসা গুল্মপ্লীহাপহং পিবেত্| রোহীতকলতানাং তু কাণ্ডকানভযাজলে||৮১|| মূত্রে বা সুনুযাত্তচ্চ সপ্তরাত্রস্থিতং পিবেত্| কামলাগুল্মমেহার্শঃপ্লীহসর্বোদরক্রিমীন্||৮২|| স হন্যাজ্জাঙ্গলরসৈর্জীর্ণে স্যাচ্চাত্র ভোজনম্| রোহীতকত্বচঃ কৃত্বা পলানাং পঞ্চবিংশতিম্||৮৩|| কোলদ্বিপ্রস্থসংযুক্তং কষাযমুপকল্পযেত্| পলিকৈঃ পঞ্চকোলৈস্তু তৈঃ সর্বৈশ্চাপি তুল্যযা||৭৪|| রোহীতকত্বচা পিষ্টৈর্ঘৃতপ্রস্থং বিপাচযেত্| প্লীহাভিবৃদ্ধিং শমযত্যেতদাশু প্রযোজিতম্||৮৫|| তথা গুল্মোদরশ্বাসক্রিমিপাণ্ডুত্বকামলাঃ| অগ্নিকর্ম চ কুর্বীত ভিষগ্বাতকফোল্বণে||৮৬|| পৈত্তিকে জীবনীযানি সর্পীংষি ক্ষীরবস্তযঃ| রক্তাবসেকঃ সংশুদ্ধিঃ ক্ষীরপানং চ শস্যতে||৮৭|| যূষৈর্মাংসরসৈশ্চাপি দীপনীযসমাযুতৈঃ| যকৃতি প্লীহবত্ সর্বং তুল্যত্বাদ্ভেষজং মতম্||৮৮|| লঘূন্যন্নানি সংসৃজ্য দদ্যাত্ প্লীহোদরে ভিষক্|৮৯|
उदावर्तरुजानाहैर्दाहमोहतृषाज्वरैः| गौरवारुचिकाठिन्यैश्चानिलादीन् यथाक्रमम्||७५|| लिङ्गैः प्लीह्न्यधिकान् दृष्ट्वा रक्तं चापि स्वलक्षणैः| चिकित्सां सम्प्रकुर्वीत यथादोषं यथाबलम्||७६|| स्नेहं स्वेदं विरेकं च निरूहमनुवासनम्| समीक्ष्य कारयेद्बाहौ वामे वा व्यधयेत् सिराम्||७७|| षट्पलं पाययेत् सर्पिः पिप्पलीर्वा प्रयोजयेत्| सगुडामभयां वाऽपि क्षारारिष्टगणांस्तथा||७८|| एष क्रियाक्रमः प्रोक्तो योगान् संशमनाञ्छृणु| पिप्पली नागरं दन्ती चित्रकं द्विगुणाभयम्||७९|| विडङ्गांशयुतं चूर्णमेतदुष्णाम्बुना पिबेत्| विडङ्गं चित्रकं शुण्ठीं सघृतां सैन्धवं वचाम्||८०|| दग्ध्वा कपाले पयसा गुल्मप्लीहापहं पिबेत्| रोहीतकलतानां तु काण्डकानभयाजले||८१|| मूत्रे वा सुनुयात्तच्च सप्तरात्रस्थितं पिबेत्| कामलागुल्ममेहार्शःप्लीहसर्वोदरक्रिमीन्||८२|| स हन्याज्जाङ्गलरसैर्जीर्णे स्याच्चात्र भोजनम्| रोहीतकत्वचः कृत्वा पलानां पञ्चविंशतिम्||८३|| कोलद्विप्रस्थसंयुक्तं कषायमुपकल्पयेत्| पलिकैः पञ्चकोलैस्तु तैः सर्वैश्चापि तुल्यया||७४|| रोहीतकत्वचा पिष्टैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत्| प्लीहाभिवृद्धिं शमयत्येतदाशु प्रयोजितम्||८५|| तथा गुल्मोदरश्वासक्रिमिपाण्डुत्वकामलाः| अग्निकर्म च कुर्वीत भिषग्वातकफोल्बणे||८६|| पैत्तिके जीवनीयानि सर्पींषि क्षीरबस्तयः| रक्तावसेकः संशुद्धिः क्षीरपानं च शस्यते||८७|| यूषैर्मांसरसैश्चापि दीपनीयसमायुतैः| यकृति प्लीहवत् सर्वं तुल्यत्वाद्भेषजं मतम्||८८|| लघून्यन्नानि संसृज्य दद्यात् प्लीहोदरे भिषक्|८९|
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Adhikarana 23 (89-92) · Śloka 93
স্বিন্নায বদ্ধোদরিণে মূত্রতীক্ষ্ণৌষধান্বিতম্||৮৯|| সতৈললবণং দদ্যান্নিরূহং সানুবাসনম্| পরিস্রংসীনি চান্নানি তীক্ষ্ণং চৈব বিরেচনম্||৯০|| উদাবর্তহরং কর্ম কার্যং বাতঘ্নমেব চ| ছিদ্রোদরমৃতে স্বেদাচ্ছ্লেষ্মোদরবদাচরেত্||৯১|| জাতং জাতং জলং স্রাব্যমেবং তদ্যাপযেদ্ভিষক্| তৃষ্ণাকাসজ্বরার্তং তু ক্ষীণমাংসাগ্নিভোজনম্||৯২|| বর্জযেচ্ছ্বাসিনং তদ্বচ্ছূলিনং দুর্বলেন্দ্রিযম্|৯৩|
स्विन्नाय बद्धोदरिणे मूत्रतीक्ष्णौषधान्वितम्||८९|| सतैललवणं दद्यान्निरूहं सानुवासनम्| परिस्रंसीनि चान्नानि तीक्ष्णं चैव विरेचनम्||९०|| उदावर्तहरं कर्म कार्यं वातघ्नमेव च| छिद्रोदरमृते स्वेदाच्छ्लेष्मोदरवदाचरेत्||९१|| जातं जातं जलं स्राव्यमेवं तद्यापयेद्भिषक्| तृष्णाकासज्वरार्तं तु क्षीणमांसाग्निभोजनम्||९२|| वर्जयेच्छ्वासिनं तद्वच्छूलिनं दुर्बलेन्द्रियम्|९३|
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Adhikarana 24 (93-94) · Śloka 95
অপাং দোষহরাণ্যাদৌ প্রদদ্যাদুদকোদরে||৯৩|| মূত্রযুক্তানি তীক্ষ্ণানি বিবিধক্ষারবন্তি চ| দীপনীযৈঃ কফঘ্নৈশ্চ তমাহারৈরুপাচরেত্||৯৪|| দ্রবেভ্যশ্চোদকাদিভ্যো নিযচ্ছেদনুপূর্বশঃ|৯৫|
अपां दोषहराण्यादौ प्रदद्यादुदकोदरे||९३|| मूत्रयुक्तानि तीक्ष्णानि विविधक्षारवन्ति च| दीपनीयैः कफघ्नैश्च तमाहारैरुपाचरेत्||९४|| द्रवेभ्यश्चोदकादिभ्यो नियच्छेदनुपूर्वशः|९५|
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Adhikarana 25 (95-100) · Śloka 101
সর্বমেবোদরং প্রাযো দোষসঙ্ঘাতজং মতম্||৯৫|| তস্মাত্ত্রিদোষশমনীং ক্রিযাং সর্বত্র কারযেত্| দোষৈঃ কুক্ষৌ হি সম্পূর্ণে বহ্নির্মন্দত্বমৃচ্ছতি||৯৬|| তস্মাদ্ভোজ্যানি ভোজ্যানি দীপনানি লঘূনি চ| রক্তশালীন্ যবান্মুদ্গাঞ্জাঙ্গলাংশ্চ মৃগদ্বিজান্||৯৭|| পযোমূত্রাসবারিষ্টান্মধুসীধুং তথা সুরাম্| যবাগূমোদনং বাঽপি যূষৈরদ্যাদ্রসৈরপি||৯৮|| মন্দাম্লস্নেহকটুভিঃ পঞ্চমূলোপসাধিতৈঃ| ঔদকানূপজং মাংসং শাকং পিষ্টকৃতং তিলান্||৯৯|| ব্যাযামাধ্বদিবাস্বপ্নং যানযানং চ বর্জযেত্| তথোষ্ণলবণাম্লানি বিদাহীনি গুরূণি চ||১০০|| নাদ্যাদন্নানি জঠরী তোযপানং চ বর্জযেত্|১০১|
सर्वमेवोदरं प्रायो दोषसङ्घातजं मतम्||९५|| तस्मात्त्रिदोषशमनीं क्रियां सर्वत्र कारयेत्| दोषैः कुक्षौ हि सम्पूर्णे वह्निर्मन्दत्वमृच्छति||९६|| तस्माद्भोज्यानि भोज्यानि दीपनानि लघूनि च| रक्तशालीन् यवान्मुद्गाञ्जाङ्गलांश्च मृगद्विजान्||९७|| पयोमूत्रासवारिष्टान्मधुसीधुं तथा सुराम्| यवागूमोदनं वाऽपि यूषैरद्याद्रसैरपि||९८|| मन्दाम्लस्नेहकटुभिः पञ्चमूलोपसाधितैः| औदकानूपजं मांसं शाकं पिष्टकृतं तिलान्||९९|| व्यायामाध्वदिवास्वप्नं यानयानं च वर्जयेत्| तथोष्णलवणाम्लानि विदाहीनि गुरूणि च||१००|| नाद्यादन्नानि जठरी तोयपानं च वर्जयेत्|१०१|
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Adhikarana 26 (101-106) · Śloka 107
নাতিসান্দ্রং হিতং পানে স্বাদু তক্রমপেলবম্||১০১|| ত্র্যূষণক্ষারলবণৈর্যুক্তং তু নিচযোদরী| বাতোদরী পিবেত্তক্রং পিপ্পলীলবণান্বিতম্||১০২|| শর্করামধুকোপেতং স্বাদু পিত্তোদরী পিবেত্| যবানীসৈন্ধবাজাজীব্যোষযুক্তং কফোদরী||১০৩|| পিবেন্মধুযুতং তক্রং কবোষ্ণং নাতিপেলবম্| মধুতৈলবচাশুণ্ঠীশতাহ্বাকুষ্ঠসৈন্ধবৈঃ||১০৪|| যুক্তং প্লীহোদরী জাতং সব্যোষং তূদকোদরী| বদ্ধোদরী তু হপুষাযবান্যজাজিসৈন্ধবৈঃ ||১০৫|| পিবেচ্ছিদ্রোদরী তক্রং পিপ্পলীক্ষৌদ্রসংযুতম্| গৌরবারোচকার্তানাং সমন্দাগ্ন্যতিসারিণাম্||১০৬|| তক্রং বাতকফার্তানামমৃতত্বায কল্পতে|১০৭|
नातिसान्द्रं हितं पाने स्वादु तक्रमपेलवम्||१०१|| त्र्यूषणक्षारलवणैर्युक्तं तु निचयोदरी| वातोदरी पिबेत्तक्रं पिप्पलीलवणान्वितम्||१०२|| शर्करामधुकोपेतं स्वादु पित्तोदरी पिबेत्| यवानीसैन्धवाजाजीव्योषयुक्तं कफोदरी||१०३|| पिबेन्मधुयुतं तक्रं कवोष्णं नातिपेलवम्| मधुतैलवचाशुण्ठीशताह्वाकुष्ठसैन्धवैः||१०४|| युक्तं प्लीहोदरी जातं सव्योषं तूदकोदरी| बद्धोदरी तु हपुषायवान्यजाजिसैन्धवैः ||१०५|| पिबेच्छिद्रोदरी तक्रं पिप्पलीक्षौद्रसंयुतम्| गौरवारोचकार्तानां समन्दाग्न्यतिसारिणाम्||१०६|| तक्रं वातकफार्तानाममृतत्वाय कल्पते|१०७|
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Adhikarana 27 (107-110) · Śloka 111
শোফানাহার্তিতৃণ্মূর্চ্ছাপীডিতে কারভং পযঃ||১০৭|| শুদ্ধানাং ক্ষামদেহানাং গব্যং ছাগং সমাহিষম্| দেবদারুপলাশার্কহস্তিপিপ্পলিশিগ্রুকৈঃ||১০৮|| সাশ্বগন্ধৈঃ সগোমূত্রৈঃ প্রদিহ্যাদুদরং সমৈঃ| বৃশ্চিকালীং বচাং কুষ্ঠং পঞ্চমূলীং পুনর্নবাম্||১০৯|| ভূতীকং নাগরং ধান্যং জলে পক্ত্বাঽবসেচযেত্| পলাশং কত্তৃণং রাস্নাং তদ্বত্ পক্ত্বাঽবসেচযেত্||১১০|| মূত্রাণ্যষ্টাবুদরিণাং সেকে পানে চ যোজযেত্|১১১|
शोफानाहार्तितृण्मूर्च्छापीडिते कारभं पयः||१०७|| शुद्धानां क्षामदेहानां गव्यं छागं समाहिषम्| देवदारुपलाशार्कहस्तिपिप्पलिशिग्रुकैः||१०८|| साश्वगन्धैः सगोमूत्रैः प्रदिह्यादुदरं समैः| वृश्चिकालीं वचां कुष्ठं पञ्चमूलीं पुनर्नवाम्||१०९|| भूतीकं नागरं धान्यं जले पक्त्वाऽवसेचयेत्| पलाशं कत्तृणं रास्नां तद्वत् पक्त्वाऽवसेचयेत्||११०|| मूत्राण्यष्टावुदरिणां सेके पाने च योजयेत्|१११|
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Adhikarana 28 (111) · Śloka 112
রূক্ষাণাং বহুবাতানাং তথা সংশোধনার্থিনাম্||১১১|| দীপনীযানি সর্পীংষি জঠরঘ্নানি চক্ষ্মহে|১১২|
रूक्षाणां बहुवातानां तथा संशोधनार्थिनाम्||१११|| दीपनीयानि सर्पींषि जठरघ्नानि चक्ष्महे|११२|
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Adhikarana 29 (112-115) · Śloka 116
পিপ্পলীপিপ্পলীমূলচব্যচিত্রকনাগরৈঃ||১১২|| সক্ষারৈরর্ধপলিকৈর্দ্বিপ্রস্থং সর্পিষঃ পচেত্| কল্কৈর্দ্বিপঞ্চমূলস্য তুলার্ধস্বরসেন চ||১১৩|| দধিমণ্ডাঢকোপেতং তত্ সর্পির্জঠরাপহম্| শ্বযথুং বাতবিষ্টম্ভং গুল্মার্শাংসি চ নাশযেত্||১১৪|| নাগরত্রিফলাপ্রস্থং ঘৃততৈলাত্তথাঽঽঢকম্| মস্তুনঃ সাধযিত্বৈতত্ পিবেত্ সর্বোদরাপহম্||১১৫|| কফমারুতসম্ভূতে গুল্মে চৈতত্ প্রশস্যতে|১১৬|
पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः||११२|| सक्षारैरर्धपलिकैर्द्विप्रस्थं सर्पिषः पचेत्| कल्कैर्द्विपञ्चमूलस्य तुलार्धस्वरसेन च||११३|| दधिमण्डाढकोपेतं तत् सर्पिर्जठरापहम्| श्वयथुं वातविष्टम्भं गुल्मार्शांसि च नाशयेत्||११४|| नागरत्रिफलाप्रस्थं घृततैलात्तथाऽऽढकम्| मस्तुनः साधयित्वैतत् पिबेत् सर्वोदरापहम्||११५|| कफमारुतसम्भूते गुल्मे चैतत् प्रशस्यते|११६|
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Adhikarana 30 (116-117) · Śloka 118
চতুর্গুণে জলে মূত্রে দ্বিগুণে চিত্রকাত্ পলে||১১৬|| কল্কে সিদ্ধং ঘৃতপ্রস্থং সক্ষারং জঠরী পিবেত্| যবকোলকুলত্থানাং পঞ্চমূলরসেন চ||১১৭|| সুরাসৌবীরকাভ্যাং চ সিদ্ধং বাঽপি পিবেদ্ঘৃতম্|১১৮|
चतुर्गुणे जले मूत्रे द्विगुणे चित्रकात् पले||११६|| कल्के सिद्धं घृतप्रस्थं सक्षारं जठरी पिबेत्| यवकोलकुलत्थानां पञ्चमूलरसेन च||११७|| सुरासौवीरकाभ्यां च सिद्धं वाऽपि पिबेद्घृतम्|११८|
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Adhikarana 31 (118) · Śloka 119
এভিঃ স্নিগ্ধায সঞ্জাতে বলে শান্তে চ মারুতে||১১৮|| স্রস্তে দোষাশযে দদ্যাত্ কল্পদিষ্টং বিরেচনম্|১১৯|
एभिः स्निग्धाय सञ्जाते बले शान्ते च मारुते||११८|| स्रस्ते दोषाशये दद्यात् कल्पदिष्टं विरेचनम्|११९|
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Adhikarana 32 (119-123) · Śloka 124
পটোলমূলং রজনীং বিডঙ্গং ত্রিফলাত্বচম্||১১৯|| কম্পিল্লকং নীলিনীং চ ত্রিবৃতাং চেতি চূর্ণযেত্| ষডাদ্যান্ কার্ষিকানন্ত্যাংস্ত্রীংশ্চ দ্বিত্রিচতুর্গুণান্||১২০|| কৃত্বা চূর্ণমতো মুষ্টিং গবাং মূত্রেণ না পিবেত্| বিরিক্তো মৃদু ভুঞ্জীত ভোজনং জাঙ্গলৈ রসৈঃ||১২১|| মণ্ডং পেযাং চ পীত্বা না সব্যোষং ষডহং পযঃ| শৃতং পিবেত্ততশ্চূর্ণং পিবেদেবং পুনঃ পুনঃ||১২২|| হন্তি সর্বোদরাণ্যেতচ্চূর্ণং জাতোদকান্যপি| কামলাং পাণ্ডুরোগং চ শ্বযথুং চাপকর্ষতি||১২৩|| পটোলাদ্যমিদং চূর্ণমুদরেষু প্রপূজিতম্|১২৪|
पटोलमूलं रजनीं विडङ्गं त्रिफलात्वचम्||११९|| कम्पिल्लकं नीलिनीं च त्रिवृतां चेति चूर्णयेत्| षडाद्यान् कार्षिकानन्त्यांस्त्रींश्च द्वित्रिचतुर्गुणान्||१२०|| कृत्वा चूर्णमतो मुष्टिं गवां मूत्रेण ना पिबेत्| विरिक्तो मृदु भुञ्जीत भोजनं जाङ्गलै रसैः||१२१|| मण्डं पेयां च पीत्वा ना सव्योषं षडहं पयः| शृतं पिबेत्ततश्चूर्णं पिबेदेवं पुनः पुनः||१२२|| हन्ति सर्वोदराण्येतच्चूर्णं जातोदकान्यपि| कामलां पाण्डुरोगं च श्वयथुं चापकर्षति||१२३|| पटोलाद्यमिदं चूर्णमुदरेषु प्रपूजितम्|१२४|
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Adhikarana 33 (124-132) · Śloka 132
গবাক্ষীং শঙ্খিনীং দন্তীং তিল্বকস্য ত্বচং বচাম্||১২৪|| পিবেদ্দ্রাক্ষাম্বুগোমূত্রকোলকর্কন্ধুসীধুভিঃ| যবানী হপুষা ধান্যং ত্রিফলা চোপকুঞ্চিকা||১২৫|| কারবী পিপ্পলীমূলমজগন্ধা শটী বচা| শতাহ্বা জীরকং ব্যোষং স্বর্ণক্ষীরী সচিত্রকা||১২৬|| দ্বৌ ক্ষারৌ পৌষ্করং মূলং কুষ্ঠং লবণপঞ্চকম্| বিডঙ্গং চ সমাংশানি দন্ত্যা ভাগত্রযং তথা||১২৭|| ত্রিবৃদ্বিশালে দ্বিগুণে সাতলা স্যাচ্চতুর্গুণা| এতন্নারাযণং নাম চূর্ণং রোগগণাপহম্||১২৮|| নৈনত্ প্রাপ্যাতিবর্তন্তে রোগা বিষ্ণুমিবাসুরাঃ| তক্রেণোদরিভিঃ পেযং গুল্মিভির্বদরাম্বুনা||১২৯|| আনদ্ধবাতে সুরযা বাতরোগে প্রসন্নযা| দধিমণ্ডেন বিট্সঙ্গে দাডিমাম্বুভিরর্শসৈঃ||১৩০|| পরিকর্তে সবৃক্ষাম্লমুষ্ণাম্বুভিরজীর্ণকে| ভগন্দরে পাণ্ডুরোগে শ্বাসে কাসে গলগ্রহে||১৩১|| হৃদ্রোগে গ্রহণীদোষে কুষ্ঠে মন্দেঽনলে জ্বরে| দংষ্ট্রাবিষে মূলবিষে সগরে কৃত্রিমে বিষে||১৩২|| যথার্হং স্নিগ্ধকোষ্ঠেন পেযমেতদ্বিরেচনম্| ইতি নারাযণচূর্ণম্|
गवाक्षीं शङ्खिनीं दन्तीं तिल्वकस्य त्वचं वचाम्||१२४|| पिबेद्द्राक्षाम्बुगोमूत्रकोलकर्कन्धुसीधुभिः| यवानी हपुषा धान्यं त्रिफला चोपकुञ्चिका||१२५|| कारवी पिप्पलीमूलमजगन्धा शटी वचा| शताह्वा जीरकं व्योषं स्वर्णक्षीरी सचित्रका||१२६|| द्वौ क्षारौ पौष्करं मूलं कुष्ठं लवणपञ्चकम्| विडङ्गं च समांशानि दन्त्या भागत्रयं तथा||१२७|| त्रिवृद्विशाले द्विगुणे सातला स्याच्चतुर्गुणा| एतन्नारायणं नाम चूर्णं रोगगणापहम्||१२८|| नैनत् प्राप्यातिवर्तन्ते रोगा विष्णुमिवासुराः| तक्रेणोदरिभिः पेयं गुल्मिभिर्बदराम्बुना||१२९|| आनद्धवाते सुरया वातरोगे प्रसन्नया| दधिमण्डेन विट्सङ्गे दाडिमाम्बुभिरर्शसैः||१३०|| परिकर्ते सवृक्षाम्लमुष्णाम्बुभिरजीर्णके| भगन्दरे पाण्डुरोगे श्वासे कासे गलग्रहे||१३१|| हृद्रोगे ग्रहणीदोषे कुष्ठे मन्देऽनले ज्वरे| दंष्ट्राविषे मूलविषे सगरे कृत्रिमे विषे||१३२|| यथार्हं स्निग्धकोष्ठेन पेयमेतद्विरेचनम्| इति नारायणचूर्णम्|
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Adhikarana 34 (133-137) · Śloka 137
হপুষাং কাঞ্চনক্ষীরীং ত্রিফলাং কটুরোহিণীম্||১৩৩|| নীলিনীং ত্রাযমাণাং চ সাতলাং ত্রিবৃতাং বচাম্| সৈন্ধবং কাললবণং পিপ্পলীং চেতি চূর্ণযেত্||১৩৪|| দাডিমত্রিফলামাংসরসমূত্রসুখোদকৈঃ| পেযোঽযং সর্বগুল্মেষু প্লীহ্নি সর্বোদরেষু চ||১৩৫|| শ্বিত্রে কুষ্ঠে সরুজকে সবাতে বিষমাগ্নিষু| শোথার্শঃপাণ্ডুরোগেষু কামলাযাং হলীমকে||১৩৬|| বাতং পিত্তং কফং চাশু বিরেকাত্ সম্প্রসাধযেত্| ইতি হপুষাদ্যং চূর্ণম্| নীলিনীং নিচুলং ব্যোষং দ্বৌ ক্ষারৌ লবণানি চ||১৩৭|| চিত্রকং চ পিবেচ্চূর্ণং সর্পিষোদরগুল্মনুত্| ইতি নীলিন্যাদ্যং চূর্ণম্|
हपुषां काञ्चनक्षीरीं त्रिफलां कटुरोहिणीम्||१३३|| नीलिनीं त्रायमाणां च सातलां त्रिवृतां वचाम्| सैन्धवं काललवणं पिप्पलीं चेति चूर्णयेत्||१३४|| दाडिमत्रिफलामांसरसमूत्रसुखोदकैः| पेयोऽयं सर्वगुल्मेषु प्लीह्नि सर्वोदरेषु च||१३५|| श्वित्रे कुष्ठे सरुजके सवाते विषमाग्निषु| शोथार्शःपाण्डुरोगेषु कामलायां हलीमके||१३६|| वातं पित्तं कफं चाशु विरेकात् सम्प्रसाधयेत्| इति हपुषाद्यं चूर्णम्| नीलिनीं निचुलं व्योषं द्वौ क्षारौ लवणानि च||१३७|| चित्रकं च पिबेच्चूर्णं सर्पिषोदरगुल्मनुत्| इति नीलिन्याद्यं चूर्णम्|
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Adhikarana 35 (138-140) · Śloka 140
ক্ষীরদ্রোণং সুধাক্ষীরপ্রস্থার্ধসহিতং দধি||১৩৮|| জাতং বিমথ্য তদ্যুক্ত্যা ত্রিবৃত্সিদ্ধং পিবেদ্ঘৃতম্| তথা সিদ্ধং ঘৃতপ্রস্থং পযস্যষ্টগুণে পিবেত্||১৩৯|| স্নুক্ক্ষীরপলকল্কেন ত্রিবৃতাষট্পলেন চ| গুল্মানাং গরদোষাণামুদরাণাং চ শান্তযে||১৪০|| ইতি স্নুহীক্ষীরঘৃতম্|
क्षीरद्रोणं सुधाक्षीरप्रस्थार्धसहितं दधि||१३८|| जातं विमथ्य तद्युक्त्या त्रिवृत्सिद्धं पिबेद्घृतम्| तथा सिद्धं घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पिबेत्||१३९|| स्नुक्क्षीरपलकल्केन त्रिवृताषट्पलेन च| गुल्मानां गरदोषाणामुदराणां च शान्तये||१४०|| इति स्नुहीक्षीरघृतम्|
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Adhikarana 36 (141-145) · Śloka 146
দধিমণ্ডাঢকে সিদ্ধাত্ স্নুক্ক্ষীরপলকল্কিতাত্| ঘৃতপ্রস্থাত্ পিবেন্মাত্রাং তদ্বজ্জঠরশান্তযে||১৪১|| এষাং চানু পিবেত্ পেযাং পযো বা স্বাদু বা রসম্| ঘৃতে জীর্ণে বিরিক্তস্তু কোষ্ণং নাগরকৈঃ শৃতম্||১৪২|| পিবেদম্বু ততঃ পেযাং যূষং কৌলত্থকং ততঃ| পিবেদ্রূক্ষস্ত্র্যহং ত্বেবং ভূযো বা প্রতিভোজিতঃ||১৪৩|| পুনঃ পুনঃ পিবেত্ সর্পিরানুপূর্ব্যা তযৈব চ| ঘৃতান্যেতানি সিদ্ধানি বিদধ্যাত্ কুশলো ভিষক্||১৪৪|| গুল্মানাং গরদোষাণামুদরাণাং চ শান্তযে| পীলুকল্কোপসিদ্ধং বা ঘৃতমানাহভেদনম্||১৪৫|| গুল্মঘ্নং নীলিনীসর্পিঃ স্নেহং বা মিশ্রকং পিবেত্|১৪৬|
दधिमण्डाढके सिद्धात् स्नुक्क्षीरपलकल्कितात्| घृतप्रस्थात् पिबेन्मात्रां तद्वज्जठरशान्तये||१४१|| एषां चानु पिबेत् पेयां पयो वा स्वादु वा रसम्| घृते जीर्णे विरिक्तस्तु कोष्णं नागरकैः शृतम्||१४२|| पिबेदम्बु ततः पेयां यूषं कौलत्थकं ततः| पिबेद्रूक्षस्त्र्यहं त्वेवं भूयो वा प्रतिभोजितः||१४३|| पुनः पुनः पिबेत् सर्पिरानुपूर्व्या तयैव च| घृतान्येतानि सिद्धानि विदध्यात् कुशलो भिषक्||१४४|| गुल्मानां गरदोषाणामुदराणां च शान्तये| पीलुकल्कोपसिद्धं वा घृतमानाहभेदनम्||१४५|| गुल्मघ्नं नीलिनीसर्पिः स्नेहं वा मिश्रकं पिबेत्|१४६|
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Adhikarana 37 (146-171) · Śloka 172
ক্রমান্নির্হৃতদোষাণাং জাঙ্গলপ্রতিভোজিনাম্ ||১৪৬|| দোষশেষনিবৃত্ত্যর্থং যোগান্ বক্ষ্যাম্যতঃ পরম্| চিত্রকামরদারুভ্যাং কল্কং ক্ষীরেণ না পিবেত্||১৪৭|| মাসং যুক্তস্তথা হস্তিপিপ্পলী বিশ্বভেষজম্| বিডঙ্গং চিত্রকং দন্তী চব্যং ব্যোষং চ তৈঃ পযঃ||১৪৮|| কল্কৈঃ কোলসমৈঃ পীত্বা প্রবৃদ্ধমুদরং জযেত্| পিবেত্ কষাযং ত্রিফলাদন্তীরোহিতকৈঃ শৃতম্||১৪৯|| ব্যোষক্ষারযুতং জীর্ণে রসৈরদ্যাত্তু জাঙ্গলৈঃ| মাংসং বা ভোজনং ভোজ্যং সুধাক্ষীরঘৃতান্বিতম্||১৫০|| ক্ষীরানুপানাং গোমূত্রেণাভযাং বা প্রযোজযেত্| সপ্তাহং মাহিষং মূত্রং ক্ষীরং চানন্নভুক্ পিবেত্||১৫১|| মাসমৌষ্ট্রং পযশ্ছাগং ত্রীন্মাসান্ ব্যোষসংযুতম্| হরীতকীসহস্রং বা ক্ষীরাশী বা শিলাজতু||১৫২|| শিলাজতুবিধানেন গুগ্গুলুং বা প্রযোজযেত্| শৃঙ্গবেরার্দ্রকরসঃ পানে ক্ষীরসমো হিতঃ||১৫৩|| তৈলং রসেন তেনৈব সিদ্ধং দশগুণেন বা| দন্তীদ্রবন্তীফলজং তৈলং দূষ্যোদরে হিতম্||১৫৪|| শূলানাহবিবন্ধেষু মস্তুযূষরসাদিভিঃ| সরলামধুশিগ্রূণাং বীজেভ্যো মূলকস্য চ||১৫৫|| তৈলান্যভ্যঙ্গপানার্থং শূলঘ্নান্যনিলোদরে| স্তৈমিত্যারুচিহৃল্লাসে মন্দেঽগ্নৌ মদ্যপায চ||১৫৬|| অরিষ্টান্ দাপযেত্ ক্ষারান্ কফস্ত্যানস্থিরোদরে| শ্লেষ্মণো বিলযার্থং তু দোষং বীক্ষ্য ভিষগ্বরঃ||১৫৭|| পিপ্পলীং তিল্বকং হিঙ্গু নাগরং হস্তিপিপ্পলীম্| ভল্লাতকং শিগ্রুফলং ত্রিফলাং কটুরোহিণীম্||১৫৮|| দেবদারু হরিদ্রে দ্বে সরলাতিবিষে বচাম্ | কুষ্ঠং মুস্তং তথা পঞ্চ লবণানি প্রকল্প্য চ||১৫৯|| দধিসর্পির্বসামজ্জতৈলযুক্তানি দাহযেত্| অন্নাদূর্ধ্বমতঃ ক্ষারাদ্বিডালকপদং পিবেত্||১৬০|| মদিরাদধিমণ্ডোষ্ণজলারিষ্টসুরাসবৈঃ| হৃদ্রোগং শ্বযথুং গুল্মং প্লীহার্শোজঠরাণি চ||১৬১|| বিসূচিকামুদাবর্তং বাতাষ্ঠীলাং চ নাশযেত্| ক্ষারং চাজকরীষাণাং স্রুতং মূত্রৈর্বিপাচযেত্||১৬২|| কার্ষিকং পিপ্পলীমূলং পঞ্চৈব লবণানি চ| পিপ্পলীং চিত্রকং শুণ্ঠীং ত্রিফলাং ত্রিবৃতাং বচাম্||১৬৩|| দ্বৌ ক্ষারৌ সাতলাং দন্তীং স্বর্ণক্ষীরীং বিষাণিকাম্| কোলপ্রমাণাং বটিকাং পিবেত্ সৌবীরসংযুতাম্||১৬৪|| শ্বযথাববিপাকে চ প্রবৃদ্ধে চ দকোদরে| ভাবিতানাং গবাং মূত্রে ষষ্টিকানাং তু তণ্ডুলৈঃ||১৬৫|| যবাগূং পযসা সিদ্ধাং প্রকামং ভোজযেন্নরম্| পিবেদিক্ষুরসং চানু জঠরাণাং নিবৃত্তযে||১৬৬|| স্বং স্বং স্থানং ব্রজন্ত্যেবং তথা পিত্তকফানিলাঃ| শঙ্খিনীস্নুক্ত্রিবৃদ্দন্তীচিরবিল্বাদিপল্লবৈঃ||১৬৭|| শাকং গাঢপুরীষায প্রাগ্ভক্তং দাপযেদ্ভিষক্ | ততোঽস্মৈ শিথিলীভূতবর্চোদোষায শাস্ত্রবিত্||১৬৮|| দদ্যান্মূত্রযুতং ক্ষীরং দোষশেষহরং শিবম্| পার্শ্বশূলমুপস্তম্ভং হৃদ্গ্রহং চাপি মারুতঃ||১৬৯|| জনযেদ্যস্য তং তৈলং বিল্বক্ষারেণ পাযযেত্| তথাঽগ্নিমন্থস্যোনাকপলাশতিলনালজৈঃ||১৭০|| বলাকদল্যপামার্গক্ষারৈঃ প্রত্যেকশঃ স্রুতৈঃ| তৈলং পক্ত্বা ভিষগ্দদ্যাদুদরাণাং প্রশান্তযে||১৭১|| নিবর্ততে চোদরিণাং হৃদ্গ্রহশ্চানিলোদ্ভবঃ|১৭২|
क्रमान्निर्हृतदोषाणां जाङ्गलप्रतिभोजिनाम् ||१४६|| दोषशेषनिवृत्त्यर्थं योगान् वक्ष्याम्यतः परम्| चित्रकामरदारुभ्यां कल्कं क्षीरेण ना पिबेत्||१४७|| मासं युक्तस्तथा हस्तिपिप्पली विश्वभेषजम्| विडङ्गं चित्रकं दन्ती चव्यं व्योषं च तैः पयः||१४८|| कल्कैः कोलसमैः पीत्वा प्रवृद्धमुदरं जयेत्| पिबेत् कषायं त्रिफलादन्तीरोहितकैः शृतम्||१४९|| व्योषक्षारयुतं जीर्णे रसैरद्यात्तु जाङ्गलैः| मांसं वा भोजनं भोज्यं सुधाक्षीरघृतान्वितम्||१५०|| क्षीरानुपानां गोमूत्रेणाभयां वा प्रयोजयेत्| सप्ताहं माहिषं मूत्रं क्षीरं चानन्नभुक् पिबेत्||१५१|| मासमौष्ट्रं पयश्छागं त्रीन्मासान् व्योषसंयुतम्| हरीतकीसहस्रं वा क्षीराशी वा शिलाजतु||१५२|| शिलाजतुविधानेन गुग्गुलुं वा प्रयोजयेत्| शृङ्गवेरार्द्रकरसः पाने क्षीरसमो हितः||१५३|| तैलं रसेन तेनैव सिद्धं दशगुणेन वा| दन्तीद्रवन्तीफलजं तैलं दूष्योदरे हितम्||१५४|| शूलानाहविबन्धेषु मस्तुयूषरसादिभिः| सरलामधुशिग्रूणां बीजेभ्यो मूलकस्य च||१५५|| तैलान्यभ्यङ्गपानार्थं शूलघ्नान्यनिलोदरे| स्तैमित्यारुचिहृल्लासे मन्देऽग्नौ मद्यपाय च||१५६|| अरिष्टान् दापयेत् क्षारान् कफस्त्यानस्थिरोदरे| श्लेष्मणो विलयार्थं तु दोषं वीक्ष्य भिषग्वरः||१५७|| पिप्पलीं तिल्वकं हिङ्गु नागरं हस्तिपिप्पलीम्| भल्लातकं शिग्रुफलं त्रिफलां कटुरोहिणीम्||१५८|| देवदारु हरिद्रे द्वे सरलातिविषे वचाम् | कुष्ठं मुस्तं तथा पञ्च लवणानि प्रकल्प्य च||१५९|| दधिसर्पिर्वसामज्जतैलयुक्तानि दाहयेत्| अन्नादूर्ध्वमतः क्षाराद्बिडालकपदं पिबेत्||१६०|| मदिरादधिमण्डोष्णजलारिष्टसुरासवैः| हृद्रोगं श्वयथुं गुल्मं प्लीहार्शोजठराणि च||१६१|| विसूचिकामुदावर्तं वाताष्ठीलां च नाशयेत्| क्षारं चाजकरीषाणां स्रुतं मूत्रैर्विपाचयेत्||१६२|| कार्षिकं पिप्पलीमूलं पञ्चैव लवणानि च| पिप्पलीं चित्रकं शुण्ठीं त्रिफलां त्रिवृतां वचाम्||१६३|| द्वौ क्षारौ सातलां दन्तीं स्वर्णक्षीरीं विषाणिकाम्| कोलप्रमाणां वटिकां पिबेत् सौवीरसंयुताम्||१६४|| श्वयथावविपाके च प्रवृद्धे च दकोदरे| भावितानां गवां मूत्रे षष्टिकानां तु तण्डुलैः||१६५|| यवागूं पयसा सिद्धां प्रकामं भोजयेन्नरम्| पिबेदिक्षुरसं चानु जठराणां निवृत्तये||१६६|| स्वं स्वं स्थानं व्रजन्त्येवं तथा पित्तकफानिलाः| शङ्खिनीस्नुक्त्रिवृद्दन्तीचिरबिल्वादिपल्लवैः||१६७|| शाकं गाढपुरीषाय प्राग्भक्तं दापयेद्भिषक् | ततोऽस्मै शिथिलीभूतवर्चोदोषाय शास्त्रवित्||१६८|| दद्यान्मूत्रयुतं क्षीरं दोषशेषहरं शिवम्| पार्श्वशूलमुपस्तम्भं हृद्ग्रहं चापि मारुतः||१६९|| जनयेद्यस्य तं तैलं बिल्वक्षारेण पाययेत्| तथाऽग्निमन्थस्योनाकपलाशतिलनालजैः||१७०|| बलाकदल्यपामार्गक्षारैः प्रत्येकशः स्रुतैः| तैलं पक्त्वा भिषग्दद्यादुदराणां प्रशान्तये||१७१|| निवर्तते चोदरिणां हृद्ग्रहश्चानिलोद्भवः|१७२|
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Adhikarana 38 (172-174) · Śloka 175
কফে বাতেন পিত্তেন তাভ্যাং বাঽপ্যাবৃতেঽনিলে||১৭২|| বলিনঃ স্বৌষধযুতং তৈলমেরণ্ডজং হিতম্| সুবিরিক্তো নরো যস্তু পুনরাধ্মাপিতো ভবেত্||১৭৩|| সুস্নিগ্ধৈরম্ললবণৈর্নিরূহৈস্তমুপাচরেত্| সোপস্তম্ভোঽপি বা বাযুরাধ্মাপযতি যং নরম্||১৭৪|| তীক্ষ্ণৈঃ সক্ষারগোমূত্রৈর্বস্তিভিস্তমুপাচরেত্|১৭৫|
कफे वातेन पित्तेन ताभ्यां वाऽप्यावृतेऽनिले||१७२|| बलिनः स्वौषधयुतं तैलमेरण्डजं हितम्| सुविरिक्तो नरो यस्तु पुनराध्मापितो भवेत्||१७३|| सुस्निग्धैरम्ललवणैर्निरूहैस्तमुपाचरेत्| सोपस्तम्भोऽपि वा वायुराध्मापयति यं नरम्||१७४|| तीक्ष्णैः सक्षारगोमूत्रैर्बस्तिभिस्तमुपाचरेत्|१७५|
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Adhikarana 39 (175-183) · Śloka 184
ক্রিযাতিবৃত্তে জঠরে ত্রিদোষে চাপ্রশাম্যতি||১৭৫|| জ্ঞাতীন্ সসুহৃদো দারান্ ব্রাহ্মণান্নৃপতীন্ গুরূন্| অনুজ্ঞাপ্য ভিষক্ কর্ম বিদধ্যাত্ সংশযং ব্রুবন্||১৭৬|| অক্রিযাযাং ধ্রুবো মৃত্যুঃ ক্রিযাযাং সংশযো ভবেত্| এবমাখ্যায তস্যেদমনুজ্ঞাতঃ সুহৃদ্গণৈঃ||১৭৭|| পানভোজনসংযুক্তং বিষমস্মৈ প্রযোজযেত্| যস্মিন্ বা কুপিতঃ সর্পো বিসৃজেদ্ধি ফলে বিষম্||১৭৮|| ভোজযেত্তদুদরিণং প্রবিচার্য ভিষগ্বরঃ| তেনাস্য দোষসঙ্ঘাতঃ স্থিরো লীনো বিমার্গগঃ||১৭৯|| বিষেণাশুপ্রমাথিত্বাদাশু ভিন্নঃ প্রবর্ততে| বিষেণ হৃতদোষং তং শীতাম্বুপরিষেচিতম্||১৮০|| পাযযেত ভিষগ্দুগ্ধং যবাগূং বা যথাবলম্| ত্রিবৃন্মণ্ডূকপর্ণ্যোশ্চ শাকং সযববাস্তুকম্||১৮১|| ভক্ষযেত্ কালশাকং বা স্বরসোদকসাধিতম্ | নিরম্ললবণস্নেহং স্বিন্নাস্বিন্নমনন্নভুক্||১৮২|| মাসমেকং ততশ্চৈব তৃষিতঃ স্বরসং পিবেত্| এবং বিনির্হৃতে দোষে শাকৈর্মাসাত্ পরং ততঃ||১৮৩|| দুর্বলায প্রযুঞ্জীত প্রাণভৃত্ কারভং পযঃ|১৮৪|
क्रियातिवृत्ते जठरे त्रिदोषे चाप्रशाम्यति||१७५|| ज्ञातीन् ससुहृदो दारान् ब्राह्मणान्नृपतीन् गुरून्| अनुज्ञाप्य भिषक् कर्म विदध्यात् संशयं ब्रुवन्||१७६|| अक्रियायां ध्रुवो मृत्युः क्रियायां संशयो भवेत्| एवमाख्याय तस्येदमनुज्ञातः सुहृद्गणैः||१७७|| पानभोजनसंयुक्तं विषमस्मै प्रयोजयेत्| यस्मिन् वा कुपितः सर्पो विसृजेद्धि फले विषम्||१७८|| भोजयेत्तदुदरिणं प्रविचार्य भिषग्वरः| तेनास्य दोषसङ्घातः स्थिरो लीनो विमार्गगः||१७९|| विषेणाशुप्रमाथित्वादाशु भिन्नः प्रवर्तते| विषेण हृतदोषं तं शीताम्बुपरिषेचितम्||१८०|| पाययेत भिषग्दुग्धं यवागूं वा यथाबलम्| त्रिवृन्मण्डूकपर्ण्योश्च शाकं सयववास्तुकम्||१८१|| भक्षयेत् कालशाकं वा स्वरसोदकसाधितम् | निरम्ललवणस्नेहं स्विन्नास्विन्नमनन्नभुक्||१८२|| मासमेकं ततश्चैव तृषितः स्वरसं पिबेत्| एवं विनिर्हृते दोषे शाकैर्मासात् परं ततः||१८३|| दुर्बलाय प्रयुञ्जीत प्राणभृत् कारभं पयः|१८४|
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Adhikarana 40 (184-188) · Śloka 188
ইদং তু শল্যহর্তৄণাং কর্ম স্যাদ্দৃষ্টকর্মণাম্||১৮৪|| বামং কুক্ষিং মাপযিত্বা নাভ্যধশ্চতুরঙ্গুলম্| মাত্রাযুক্তেন শস্ত্রেণ পাটযেন্মতিমান্ ভিষক্||১৮৫|| বিপাট্যান্ত্রং ততঃ পশ্চাদ্বীক্ষ্য বদ্ধক্ষতান্ত্রযোঃ| সর্পিষাঽভ্যজ্য কেশাদীনবমৃজ্য বিমোক্ষযেত্||১৮৬|| মূর্চ্ছনাদ্যচ্চ সম্মূঢমন্ত্রং তচ্চ বিমোক্ষযেত্| ছিদ্রাণ্যন্ত্রস্য তু স্থূলৈর্দংশযিত্বা পিপীলিকৈঃ||১৮৭|| বহুশঃ সঙ্গৃহীতানি জ্ঞাত্বা চ্ছিত্বা পিপীলিকান্| প্রতিযোগৈঃ প্রবেশ্যান্ত্রং প্রেযৈঃ সীব্যেদ্ব্রণং ততঃ||১৮৮||
इदं तु शल्यहर्तॄणां कर्म स्याद्दृष्टकर्मणाम्||१८४|| वामं कुक्षिं मापयित्वा नाभ्यधश्चतुरङ्गुलम्| मात्रायुक्तेन शस्त्रेण पाटयेन्मतिमान् भिषक्||१८५|| विपाट्यान्त्रं ततः पश्चाद्वीक्ष्य बद्धक्षतान्त्रयोः| सर्पिषाऽभ्यज्य केशादीनवमृज्य विमोक्षयेत्||१८६|| मूर्च्छनाद्यच्च सम्मूढमन्त्रं तच्च विमोक्षयेत्| छिद्राण्यन्त्रस्य तु स्थूलैर्दंशयित्वा पिपीलिकैः||१८७|| बहुशः सङ्गृहीतानि ज्ञात्वा च्छित्वा पिपीलिकान्| प्रतियोगैः प्रवेश्यान्त्रं प्रेयैः सीव्येद्व्रणं ततः||१८८||
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Adhikarana 41 (189-194) · Śloka 194
তথা জাতোদকং সর্বমুদরং ব্যধযেদ্ভিষক্| বামপার্শ্বে ত্বধো নাভের্নাডীং দত্ত্বা চ গালযেত্||১৮৯|| বিস্রাব্য চ বিমৃদ্যৈতদ্বেষ্টযেদ্বাসসোদরম্| তথা বস্তিবিরেকাদ্যৈর্ম্লানং সর্বং চ বেষ্টযেত্||১৯০|| নিঃস্রুতে লঙ্ঘিতঃ পেযামস্নেহলবণাং পিবেত্| অতঃ পরং তু ষণ্মাসান্ ক্ষীরবৃত্তির্ভবেন্নরঃ||১৯১|| ত্রীন্ মাসান্ পযসা পেযাং পিবেত্ত্রীংশ্চাপি ভোজযেত্| শ্যামাকং কোরদূষং বা ক্ষীরেণালবণং লঘু||১৯২|| নরঃ সংবত্সরেণৈবং জযেত্ প্রাপ্তং জলোদরম্| প্রযোগাণাং চ সর্বেষামনু ক্ষীরং প্রযোজযেত্||১৯৩|| দোষানুবন্ধরক্ষার্থং বলস্থৈর্যার্থমেব চ| প্রযোগাপচিতাঙ্গানাং হিতং হ্যুদরিণাং পযঃ| সর্বধাতুক্ষযার্তানাং দেবানামমৃতং যথা||১৯৪||
तथा जातोदकं सर्वमुदरं व्यधयेद्भिषक्| वामपार्श्वे त्वधो नाभेर्नाडीं दत्त्वा च गालयेत्||१८९|| विस्राव्य च विमृद्यैतद्वेष्टयेद्वाससोदरम्| तथा बस्तिविरेकाद्यैर्म्लानं सर्वं च वेष्टयेत्||१९०|| निःस्रुते लङ्घितः पेयामस्नेहलवणां पिबेत्| अतः परं तु षण्मासान् क्षीरवृत्तिर्भवेन्नरः||१९१|| त्रीन् मासान् पयसा पेयां पिबेत्त्रींश्चापि भोजयेत्| श्यामाकं कोरदूषं वा क्षीरेणालवणं लघु||१९२|| नरः संवत्सरेणैवं जयेत् प्राप्तं जलोदरम्| प्रयोगाणां च सर्वेषामनु क्षीरं प्रयोजयेत्||१९३|| दोषानुबन्धरक्षार्थं बलस्थैर्यार्थमेव च| प्रयोगापचिताङ्गानां हितं ह्युदरिणां पयः| सर्वधातुक्षयार्तानां देवानाममृतं यथा||१९४||
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Adhikarana 42 (195-196) · Śloka 196
তত্র শ্লোকৌ- হেতুং প্রাগ্রূপমষ্টানাং লিঙ্গং ব্যাসসমাসতঃ| উপদ্রবান্ গরীযস্ত্বং সাধ্যাসাধ্যত্বমেব চ||১৯৫|| জাতাজাতাম্বুলিঙ্গানি চিকিত্সাং চোক্তবানৃষিঃ| সমাসব্যাসনির্দেশৈরুদরাণাং চিকিত্সিতে||১৯৬||
तत्र श्लोकौ- हेतुं प्राग्रूपमष्टानां लिङ्गं व्याससमासतः| उपद्रवान् गरीयस्त्वं साध्यासाध्यत्वमेव च||१९५|| जाताजाताम्बुलिङ्गानि चिकित्सां चोक्तवानृषिः| समासव्यासनिर्देशैरुदराणां चिकित्सिते||१९६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 13
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলপূরিতে চিকিত্সাস্থানে উদরচিকিত্সিতং নাম ত্রযোদশোঽধ্যাযঃ||১৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रेऽप्राप्ते दृढबलपूरिते चिकित्सास्थाने उदरचिकित्सितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः||१३||
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