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18. śvayathucikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ শ্বযথুচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः श्वयथुचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

ভিষগ্বরিষ্ঠং সুরসিদ্ধজুষ্টং মুনীন্দ্রমত্র্যাত্মজমগ্নিবেশঃ| মহাগদস্য শ্বযথোর্যথাবত্ প্রকোপরূপপ্রশমানপৃচ্ছত্||৩||

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भिषग्वरिष्ठं सुरसिद्धजुष्टं मुनीन्द्रमत्र्यात्मजमग्निवेशः| महागदस्य श्वयथोर्यथावत् प्रकोपरूपप्रशमानपृच्छत्||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তস্মৈ জগাদাগদবেদসিন্ধুপ্রবর্তনাদ্রিপ্রবরোঽত্রিজস্তান্| বাতাদিভেদাত্ত্রিবিধস্য সম্যঙ্নিজানিজৈকাঙ্গজসর্বজস্য||৪||

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तस्मै जगादागदवेदसिन्धुप्रवर्तनाद्रिप्रवरोऽत्रिजस्तान्| वातादिभेदात्त्रिविधस्य सम्यङ्निजानिजैकाङ्गजसर्वजस्य||४||

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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 6

শুদ্ধ্যামযাভক্তকৃশাবলানাং ক্ষারাম্লতীক্ষ্ণোষ্ণগুরূপসেবা| দধ্যামমৃচ্ছাকবিরোধিদুষ্টগরোপসৃষ্টান্ননিষেবণং চ||৫|| অর্শাংস্যচেষ্টা ন চ দেহশুদ্ধির্মর্মোপঘাতো বিষমা প্রসূতিঃ| মিথ্যোপচারঃ প্রতিকর্মণাং চ নিজস্য হেতুঃ শ্বযথোঃ প্রদিষ্টঃ||৬||

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शुद्ध्यामयाभक्तकृशाबलानां क्षाराम्लतीक्ष्णोष्णगुरूपसेवा| दध्याममृच्छाकविरोधिदुष्टगरोपसृष्टान्ननिषेवणं च||५|| अर्शांस्यचेष्टा न च देहशुद्धिर्मर्मोपघातो विषमा प्रसूतिः| मिथ्योपचारः प्रतिकर्मणां च निजस्य हेतुः श्वयथोः प्रदिष्टः||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

বাহ্যাস্ত্বচো দূষযিতাঽভিঘাতঃ কাষ্ঠাশ্মশস্ত্রাগ্নিবিষাযসাদ্যৈঃ | আগন্তুহেতুঃ, ...|৭|

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बाह्यास्त्वचो दूषयिताऽभिघातः काष्ठाश्मशस्त्राग्निविषायसाद्यैः | आगन्तुहेतुः, ...|७|

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

... ত্রিবিধো নিজশ্চ সর্বার্ধগাত্রাবযবাশ্রিতত্বাত্||৭||

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... त्रिविधो निजश्च सर्वार्धगात्रावयवाश्रितत्वात्||७||

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8

বাহ্যাঃ সিরাঃ প্রাপ্য যদা কফাসৃক্পিত্তানি সন্দূষযতীহ বাযুঃ| তৈর্বদ্ধমার্গঃ স তদা বিসর্পন্নুত্সেধলিঙ্গং শ্বযথুং করোতি||৮||

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बाह्याः सिराः प्राप्य यदा कफासृक्पित्तानि सन्दूषयतीह वायुः| तैर्बद्धमार्गः स तदा विसर्पन्नुत्सेधलिङ्गं श्वयथुं करोति||८||

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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9

উরঃস্থিতৈরূর্ধ্বমধস্তু বাযোঃ স্থানস্থিতৈর্মধ্যগতৈস্তু মধ্যে| সর্বাঙ্গগঃ সর্বগতৈঃ ক্বচিত্স্থৈর্দোষৈঃ ক্বচিত্ স্যাচ্ছ্বযথুস্তদাখ্যঃ||৯||

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उरःस्थितैरूर्ध्वमधस्तु वायोः स्थानस्थितैर्मध्यगतैस्तु मध्ये| सर्वाङ्गगः सर्वगतैः क्वचित्स्थैर्दोषैः क्वचित् स्याच्छ्वयथुस्तदाख्यः||९||

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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10

ঊষ্মা তথা স্যাদ্দবথুঃ সিরাণামাযাম ইত্যেব চ পূর্বরূপম্|১০|

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ऊष्मा तथा स्याद्दवथुः सिराणामायाम इत्येव च पूर्वरूपम्|१०|

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Adhikarana 10 (10) · Śloka 10

সর্বস্ত্রিদোষোঽধিকদোষলিঙ্গৈস্তচ্ছব্দমভ্যেতি ভিষগ্জিতং চ||১০||

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सर्वस्त्रिदोषोऽधिकदोषलिङ्गैस्तच्छब्दमभ्येति भिषग्जितं च||१०||

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Adhikarana 11 (11) · Śloka 11

সগৌরবং স্যাদনবস্থিতত্বং সোত্সেধমুষ্মাঽথ সিরাতনুত্বম্| সলোমহর্ষাঽঙ্গবিবর্ণতা চ সামান্যলিঙ্গং শ্বযথোঃ প্রদিষ্টম্||১১||

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सगौरवं स्यादनवस्थितत्वं सोत्सेधमुष्माऽथ सिरातनुत्वम्| सलोमहर्षाऽङ्गविवर्णता च सामान्यलिङ्गं श्वयथोः प्रदिष्टम्||११||

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Adhikarana 12 (12) · Śloka 12

চলস্তনুত্বক্পরুষোঽরুণোঽসিতঃ প্রসুপ্তিহর্ষার্তিযুতোঽনিমিত্ততঃ| প্রশাম্যতি প্রোন্নমতি প্রপীডিতো দিবাবলী চ শ্বযথুঃ সমীরণাত্||১২||

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चलस्तनुत्वक्परुषोऽरुणोऽसितः प्रसुप्तिहर्षार्तियुतोऽनिमित्ततः| प्रशाम्यति प्रोन्नमति प्रपीडितो दिवाबली च श्वयथुः समीरणात्||१२||

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Adhikarana 13 (13) · Śloka 13

মৃদুঃ সগন্ধোঽসিতপীতরাগবান্ ভ্রমজ্বরস্বেদতৃষামদান্বিতঃ| য উষ্যতে স্পর্শরুগক্ষিরাগকৃত্ স পিত্তশোথো ভৃশদাহপাকবান্||১৩||

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मृदुः सगन्धोऽसितपीतरागवान् भ्रमज्वरस्वेदतृषामदान्वितः| य उष्यते स्पर्शरुगक्षिरागकृत् स पित्तशोथो भृशदाहपाकवान्||१३||

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Adhikarana 14 (14) · Śloka 14

গুরুঃ স্থিরঃ পাণ্ডুররোচকান্বিতঃ প্রসেকনিদ্রাবমিবহ্নিমান্দ্যকৃত্| স কৃচ্ছ্রজন্মপ্রশমো নিপীডিতো ন চোন্নমেদ্রাত্রিবলী কফাত্মকঃ||১৪||

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गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचकान्वितः प्रसेकनिद्रावमिवह्निमान्द्यकृत्| स कृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो न चोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः||१४||

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Adhikarana 15 (15) · Śloka 15

কৃশস্য রোগৈরবলস্য যো ভবেদুপদ্রবৈর্বা বমিপূর্বকৈর্যুতঃ| স হন্তি মর্মানুগতোঽথ রাজিমান্ পরিস্রবেদ্ধীনবলস্য সর্বগঃ||১৫||

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कृशस्य रोगैरबलस्य यो भवेदुपद्रवैर्वा वमिपूर्वकैर्युतः| स हन्ति मर्मानुगतोऽथ राजिमान् परिस्रवेद्धीनबलस्य सर्वगः||१५||

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Adhikarana 16 (16) · Śloka 16

অহীনমাংসস্য য একদোষজো নবো বলস্থস্য সুখঃ স সাধনে|১৬|

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अहीनमांसस्य य एकदोषजो नवो बलस्थस्य सुखः स साधने|१६|

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Adhikarana 17 (16) · Śloka 16

নিদানদোষর্তুবিপর্যযক্রমৈরুপাচরেত্তং বলদোষকালবিত্||১৬||

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निदानदोषर्तुविपर्ययक्रमैरुपाचरेत्तं बलदोषकालवित्||१६||

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Adhikarana 18 (17-19) · Śloka 19

অথামজং লঙ্ঘনপাচনক্রমৈর্বিশোধনৈরুল্বণদোষমাদিতঃ| শিরোগতং শীর্ষবিরেচনৈরধো বিরেচনৈরূর্ধ্বহরৈস্তথোর্ধ্বজম্||১৭|| উপাচরেত্ স্নেহভবং বিরূক্ষণৈঃ প্রকল্পযেত্ স্নেহবিধিং চ রূক্ষজে| বিবদ্ধবিট্কেঽনিলজে নিরূহণং ঘৃতং তু পিত্তানিলজে সতিক্তকম্||১৮|| পযশ্চ মূর্চ্ছারতিদাহতর্ষিতে বিশোধনীযে তু সমূত্রমিষ্যতে| কফোত্থিতং ক্ষারকটূষ্ণসংযুতৈঃ সমূত্রতক্রাসবযুক্তিভির্জযেত্||১৯||

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अथामजं लङ्घनपाचनक्रमैर्विशोधनैरुल्बणदोषमादितः| शिरोगतं शीर्षविरेचनैरधो विरेचनैरूर्ध्वहरैस्तथोर्ध्वजम्||१७|| उपाचरेत् स्नेहभवं विरूक्षणैः प्रकल्पयेत् स्नेहविधिं च रूक्षजे| विबद्धविट्केऽनिलजे निरूहणं घृतं तु पित्तानिलजे सतिक्तकम्||१८|| पयश्च मूर्च्छारतिदाहतर्षिते विशोधनीये तु समूत्रमिष्यते| कफोत्थितं क्षारकटूष्णसंयुतैः समूत्रतक्रासवयुक्तिभिर्जयेत्||१९||

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Adhikarana 19 (20) · Śloka 20

গ্রাম্যাব্জানূপং পিশিতমবলং শুষ্কশাকং নবান্নং গৌডং পিষ্টান্নং দধি তিলকৃতং বিজ্জলং মদ্যমম্লম্| ধানা বল্লূরং সমশনমথো গুর্বসাত্ম্যং বিদাহি স্বপ্নং চারাত্রৌ শ্বযথুগদবান্ বর্জযেন্মৈথুনং চ||২০||

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ग्राम्याब्जानूपं पिशितमबलं शुष्कशाकं नवान्नं गौडं पिष्टान्नं दधि तिलकृतं विज्जलं मद्यमम्लम्| धाना वल्लूरं समशनमथो गुर्वसात्म्यं विदाहि स्वप्नं चारात्रौ श्वयथुगदवान् वर्जयेन्मैथुनं च||२०||

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Adhikarana 20 (21-22) · Śloka 22

ব্যোষং ত্রিবৃত্তিক্তকরোহিণী চ সাযোরজস্কা ত্রিফলারসেন| পীতং কফোত্থং শমযেত্তু শোফং গব্যেন মূত্রেণ হরীতকী চ||২১|| হরীতকীনাগরদেবদারু সুখাম্বুযুক্তং সপুনর্নবং বা| সর্বং পিবেত্ত্রিষ্বপি মূত্রযুক্তং স্নাতশ্চ জীর্ণে পযসাঽন্নমদ্যাত্||২২||

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व्योषं त्रिवृत्तिक्तकरोहिणी च सायोरजस्का त्रिफलारसेन| पीतं कफोत्थं शमयेत्तु शोफं गव्येन मूत्रेण हरीतकी च||२१|| हरीतकीनागरदेवदारु सुखाम्बुयुक्तं सपुनर्नवं वा| सर्वं पिबेत्त्रिष्वपि मूत्रयुक्तं स्नातश्च जीर्णे पयसाऽन्नमद्यात्||२२||

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Adhikarana 21 (23-28) · Śloka 28

পুনর্নবানাগরমুস্তকল্কান্ প্রস্থেন ধীরঃ পযসাঽক্ষমাত্রান্| মযূরকং মাগধিকাং সমূলাং সনাগরাং বা প্রপিবেত্ সবাতে||২৩|| দন্তীত্রিবৃত্ত্র্যূষণচিত্রকৈর্বা পযঃ শৃতং দোষহরং পিবেন্না| দ্বিপ্রস্থমাত্রং তু পলার্ধিকৈস্তৈরর্ধাবশিষ্টং পবনে সপিত্তে||২৪|| সশুণ্ঠিপীতদ্রুরসং প্রযোজ্যং শ্যামোরুবূকোষণসাধিতং বা| ত্বগ্দারুবর্ষাভুমহৌষধৈর্বা গুডূচিকানাগরদন্তিভির্বা||২৫|| সপ্তাহমৌষ্ট্রং ত্বথবাঽপি মাসং পযঃ পিবেদ্ভোজনবারিবর্জী| গব্যং সমূত্রং মহিষীপযো বা ক্ষীরাশনো মূত্রমথো গবাং বা||২৬|| তক্রং পিবেদ্বা গুরুভিন্নবর্চাঃ সব্যোষসৌবর্চলমাক্ষিকং চ| গুডাভযাং বা গুডনাগরং বা সদোষভিন্নামবিবদ্ধবর্চাঃ||২৭|| বিড্বাতসঙ্গে পযসা রসৈর্বা প্রাগ্ভক্তমদ্যাদুরুবূকতৈলম্ | স্রোতোবিবন্ধেঽগ্নিরুচিপ্রণাশে মদ্যান্যরিষ্টাংশ্চ পিবেত্ সুজাতান্||২৮||

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पुनर्नवानागरमुस्तकल्कान् प्रस्थेन धीरः पयसाऽक्षमात्रान्| मयूरकं मागधिकां समूलां सनागरां वा प्रपिबेत् सवाते||२३|| दन्तीत्रिवृत्त्र्यूषणचित्रकैर्वा पयः शृतं दोषहरं पिबेन्ना| द्विप्रस्थमात्रं तु पलार्धिकैस्तैरर्धावशिष्टं पवने सपित्ते||२४|| सशुण्ठिपीतद्रुरसं प्रयोज्यं श्यामोरुबूकोषणसाधितं वा| त्वग्दारुवर्षाभुमहौषधैर्वा गुडूचिकानागरदन्तिभिर्वा||२५|| सप्ताहमौष्ट्रं त्वथवाऽपि मासं पयः पिबेद्भोजनवारिवर्जी| गव्यं समूत्रं महिषीपयो वा क्षीराशनो मूत्रमथो गवां वा||२६|| तक्रं पिबेद्वा गुरुभिन्नवर्चाः सव्योषसौवर्चलमाक्षिकं च| गुडाभयां वा गुडनागरं वा सदोषभिन्नामविबद्धवर्चाः||२७|| विड्वातसङ्गे पयसा रसैर्वा प्राग्भक्तमद्यादुरुबूकतैलम् | स्रोतोविबन्धेऽग्निरुचिप्रणाशे मद्यान्यरिष्टांश्च पिबेत् सुजातान्||२८||

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Adhikarana 22 (29-31) · Śloka 31

গণ্ডীরভল্লাতকচিত্রকাংশ্চ ব্যোষং বিডঙ্গং বৃহতীদ্বযং চ| দ্বিপ্রস্থিকং গোমযপাবকেন দ্রোণে পচেত্ কূর্চিকমস্তুনস্তু ||২৯|| ত্রিভাগশেষং চ সুপূতশীতং দ্রোণেন তত্ প্রাকৃতমস্তুনা চ| সিতোপলাযাশ্চ শতেন যুক্তং লিপ্তে ঘটে চিত্রকপিপ্পলীনাম্||৩০|| বৈহাযসে স্থাপিতমাদশাহাত্ প্রযোজযংস্তদ্বিনিহন্তি শোফান্| ভগন্দরার্শঃক্রিমিকুষ্ঠমেহান্ বৈবর্ণ্যকার্শ্যানিলহিক্কনং চ||৩১|| ইতি গণ্ডীরাদ্যরিষ্টঃ|

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गण्डीरभल्लातकचित्रकांश्च व्योषं विडङ्गं बृहतीद्वयं च| द्विप्रस्थिकं गोमयपावकेन द्रोणे पचेत् कूर्चिकमस्तुनस्तु ||२९|| त्रिभागशेषं च सुपूतशीतं द्रोणेन तत् प्राकृतमस्तुना च| सितोपलायाश्च शतेन युक्तं लिप्ते घटे चित्रकपिप्पलीनाम्||३०|| वैहायसे स्थापितमादशाहात् प्रयोजयंस्तद्विनिहन्ति शोफान्| भगन्दरार्शःक्रिमिकुष्ठमेहान् वैवर्ण्यकार्श्यानिलहिक्कनं च||३१|| इति गण्डीराद्यरिष्टः|

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Adhikarana 23 (32-33) · Śloka 33

কাশ্মর্যধাত্রীমরিচাভযাক্ষদ্রাক্ষাফলানাং চ সপিপ্পলীনাম্| শতং শতং জীর্ণগুডাত্তুলাং চ সঙ্ক্ষুদ্য কুম্ভে মধুনা প্রলিপ্তে||৩২|| সপ্তাহমুষ্ণে দ্বিগুণং তু শীতে স্থিতং জলদ্রোণযুতং পিবেন্না| শোফান্ বিবন্ধান্ কফবাতজাংশ্চ নিহন্ত্যরিষ্টোঽষ্টশতোঽগ্নিকৃচ্চ||৩৩|| ইত্যষ্টশতোঽরিষ্টঃ|

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काश्मर्यधात्रीमरिचाभयाक्षद्राक्षाफलानां च सपिप्पलीनाम्| शतं शतं जीर्णगुडात्तुलां च सङ्क्षुद्य कुम्भे मधुना प्रलिप्ते||३२|| सप्ताहमुष्णे द्विगुणं तु शीते स्थितं जलद्रोणयुतं पिबेन्ना| शोफान् विबन्धान् कफवातजांश्च निहन्त्यरिष्टोऽष्टशतोऽग्निकृच्च||३३|| इत्यष्टशतोऽरिष्टः|

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Adhikarana 24 (34-38) · Śloka 38

পুনর্নবে দ্বে চ বলে সপাঠে দন্তীং গুডূচীমথ চিত্রকং চ| নিদিগ্ধিকাং চ ত্রিপলানি পক্ত্বা দ্রোণাবশেষে সলিলে ততস্তম্||৩৪|| পূত্বা রসং দ্বে চ গুডাত্ পুরাণাত্তুলে মধুপ্রস্থযুতং সুশীতম্| মাসং নিদধ্যাদ্ঘৃতভাজনস্থং পল্লে যবানাং পরতস্তু মাসাত্||৩৫|| চূর্ণীকৃতৈরর্ধপলাংশিকৈস্তং পত্রত্বগেলামরিচাম্বুলোহৈঃ | গন্ধান্বিতং ক্ষৌদ্রঘৃতপ্রদিগ্ধে জীর্ণে পিবেদ্ ব্যাধিবলং সমীক্ষ্য||৩৬|| হৃত্পাণ্ডুরোগং শ্বযথুং প্রবৃদ্ধং প্লীহজ্বরারোচকমেহগুল্মান্| ভগন্দরং ষড্জঠরাণি কাসং শ্বাসং গ্রহণ্যামযকুষ্ঠকণ্ডূঃ||৩৭|| শাখানিলং বদ্ধপুরীষতাং চ হিক্কাং কিলাসং চ হলীমকং চ| ক্ষিপ্রং জযেদ্বর্ণবলাযুরোজস্তেজোন্বিতো মাংসরসান্নভোজী||৩৮|| ইতি পুনর্নবাদ্যরিষ্টঃ|

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पुनर्नवे द्वे च बले सपाठे दन्तीं गुडूचीमथ चित्रकं च| निदिग्धिकां च त्रिपलानि पक्त्वा द्रोणावशेषे सलिले ततस्तम्||३४|| पूत्वा रसं द्वे च गुडात् पुराणात्तुले मधुप्रस्थयुतं सुशीतम्| मासं निदध्याद्घृतभाजनस्थं पल्ले यवानां परतस्तु मासात्||३५|| चूर्णीकृतैरर्धपलांशिकैस्तं पत्रत्वगेलामरिचाम्बुलोहैः | गन्धान्वितं क्षौद्रघृतप्रदिग्धे जीर्णे पिबेद् व्याधिबलं समीक्ष्य||३६|| हृत्पाण्डुरोगं श्वयथुं प्रवृद्धं प्लीहज्वरारोचकमेहगुल्मान्| भगन्दरं षड्जठराणि कासं श्वासं ग्रहण्यामयकुष्ठकण्डूः||३७|| शाखानिलं बद्धपुरीषतां च हिक्कां किलासं च हलीमकं च| क्षिप्रं जयेद्वर्णबलायुरोजस्तेजोन्वितो मांसरसान्नभोजी||३८|| इति पुनर्नवाद्यरिष्टः|

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Adhikarana 25 (39-40) · Śloka 40

ফলত্রিকং দীপ্যকচিত্রকৌ চ সপিপ্পলীলোহরজো বিডঙ্গম্| চূর্ণীকৃতং কৌডবিকং দ্বিরংশং ক্ষৌদ্রং পুরাণস্য তুলাং গুডস্য||৩৯|| মাসং নিদধ্যাদ্ঘৃতভাজনস্থং যবেষু তানেব নিহন্তি রোগান্| যে চার্শসাং পাণ্ডুবিকারিণাং চ প্রোক্তা হিতাঃ শোফিষু তেঽপ্যরিষ্টাঃ||৪০|| ইতি ত্রিফলাদ্যরিষ্টঃ|

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फलत्रिकं दीप्यकचित्रकौ च सपिप्पलीलोहरजो विडङ्गम्| चूर्णीकृतं कौडविकं द्विरंशं क्षौद्रं पुराणस्य तुलां गुडस्य||३९|| मासं निदध्याद्घृतभाजनस्थं यवेषु तानेव निहन्ति रोगान्| ये चार्शसां पाण्डुविकारिणां च प्रोक्ता हिताः शोफिषु तेऽप्यरिष्टाः||४०|| इति त्रिफलाद्यरिष्टः|

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Adhikarana 26 (41-42) · Śloka 42

কৃষ্ণা সপাঠা গজপিপ্পলী চ নিদিগ্ধিকা চিত্রকনাগরে চ| সপিপ্পলীমূলরজন্যজাজীমুস্তং চ চূর্ণং সুখতোযপীতম্||৪১|| হন্যাত্ত্রিদোষং চিরজং চ শোফং কল্কশ্চ ভূনিম্বমহৌষধস্য| অযোরজস্ত্র্যূষণযাবশূকচূর্ণং চ পীতং ত্রিফলারসেন||৪২||

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कृष्णा सपाठा गजपिप्पली च निदिग्धिका चित्रकनागरे च| सपिप्पलीमूलरजन्यजाजीमुस्तं च चूर्णं सुखतोयपीतम्||४१|| हन्यात्त्रिदोषं चिरजं च शोफं कल्कश्च भूनिम्बमहौषधस्य| अयोरजस्त्र्यूषणयावशूकचूर्णं च पीतं त्रिफलारसेन||४२||

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Adhikarana 27 (43-46) · Śloka 46

ক্ষারদ্বযং স্যাল্লবণানি চত্বার্যযোরজো ব্যোষফলত্রিকে চ| সপিপ্পলীমূলবিডঙ্গসারং মুস্তাজমোদামরদারুবিল্বম্||৪৩|| কলিঙ্গকাশ্চিত্রকমূলপাঠে যষ্ট্যাহ্বযং সাতিবিষং পলাংশম্| সহিঙ্গুকর্ষং ত্বণুশুষ্কচূর্ণং দ্রোণং তথা মূলকশুণ্ঠকানাম্||৪৪|| স্যাদ্ভস্মনস্তত্ সলিলেন সাধ্যমালোড্য যাবদ্ঘনমপ্রদগ্ধম্| স্ত্যানং ততঃ কোলসমাং তু মাত্রাং কৃত্বা সুশুষ্কাং বিধিনোপযুঞ্জ্যাত্||৪৫|| প্লীহোদরশ্বিত্রহলীমকার্শঃপাণ্ড্বামযারোচকশোষশোফান্| বিসূচিকাগুল্মগরাশ্মরীশ্চ সশ্বাসকাসাঃ প্রণুদেত্ সকুষ্ঠাঃ||৪৬|| ইতি ক্ষারগুডিকা|

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क्षारद्वयं स्याल्लवणानि चत्वार्ययोरजो व्योषफलत्रिके च| सपिप्पलीमूलविडङ्गसारं मुस्ताजमोदामरदारुबिल्वम्||४३|| कलिङ्गकाश्चित्रकमूलपाठे यष्ट्याह्वयं सातिविषं पलांशम्| सहिङ्गुकर्षं त्वणुशुष्कचूर्णं द्रोणं तथा मूलकशुण्ठकानाम्||४४|| स्याद्भस्मनस्तत् सलिलेन साध्यमालोड्य यावद्घनमप्रदग्धम्| स्त्यानं ततः कोलसमां तु मात्रां कृत्वा सुशुष्कां विधिनोपयुञ्ज्यात्||४५|| प्लीहोदरश्वित्रहलीमकार्शःपाण्ड्वामयारोचकशोषशोफान्| विसूचिकागुल्मगराश्मरीश्च सश्वासकासाः प्रणुदेत् सकुष्ठाः||४६|| इति क्षारगुडिका|

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Adhikarana 28 (47-48) · Śloka 48

প্রযোজযেদার্দ্রকনাগরং বা তুল্যং গুডেনার্ধপলাভিবৃদ্ধ্যা| মাত্রা পরং পঞ্চপলানি মাসং জীর্ণে পযো যূষরসাশ্চ ভক্তম্||৪৭|| গুল্মোদরার্শঃশ্বযথুপ্রমেহাঞ্ শ্বাসপ্রতিশ্যালসকাবিপাকান্| সকামলাশোষমনোবিকারান্ কাসং কফং চৈব জযেত্ প্রযোগঃ||৪৮||

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प्रयोजयेदार्द्रकनागरं वा तुल्यं गुडेनार्धपलाभिवृद्ध्या| मात्रा परं पञ्चपलानि मासं जीर्णे पयो यूषरसाश्च भक्तम्||४७|| गुल्मोदरार्शःश्वयथुप्रमेहाञ् श्वासप्रतिश्यालसकाविपाकान्| सकामलाशोषमनोविकारान् कासं कफं चैव जयेत् प्रयोगः||४८||

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Adhikarana 29 (49) · Śloka 49

রসস্তথৈবার্দ্রকনাগরস্য পেযোঽথ জীর্ণে পযসাঽন্নমদ্যাত্| জত্বশ্মজং চ ত্রিফলারসেন হন্যাত্ত্রিদোষং শ্বযথুং প্রসহ্য||৪৯|| ইতি শিলাজতুপ্রযোগঃ|

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रसस्तथैवार्द्रकनागरस्य पेयोऽथ जीर्णे पयसाऽन्नमद्यात्| जत्वश्मजं च त्रिफलारसेन हन्यात्त्रिदोषं श्वयथुं प्रसह्य||४९|| इति शिलाजतुप्रयोगः|

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Adhikarana 30 (50-52) · Śloka 52

দ্বিপঞ্চমূলস্য পচেত্ কষাযে কংসেঽভযানাং চ শতং গুডস্য| লেহে সুসিদ্ধেঽথ বিনীয চূর্ণং ব্যোষং ত্রিসৌগন্ধ্যমুষাস্থিতে চ||৫০|| প্রস্থার্ধমাত্রং মধুনঃ সুশীতে কিঞ্চিচ্চ চূর্ণাদপি যাবশূকাত্| একাভযাং প্রাশ্য ততশ্চ লেহাচ্ছুক্তিং নিহন্তি শ্বযথুং প্রবৃদ্ধম্||৫১|| শ্বাসজ্বরারোচকমেহগুল্মপ্লীহত্রিদোষোদরপাণ্ডুরোগান্| কার্শ্যামবাতাবসৃগম্লপিত্তবৈবর্ণ্যমূত্রানিলশুক্রদোষান্||৫২|| ইতি কংসহরীতকী|

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द्विपञ्चमूलस्य पचेत् कषाये कंसेऽभयानां च शतं गुडस्य| लेहे सुसिद्धेऽथ विनीय चूर्णं व्योषं त्रिसौगन्ध्यमुषास्थिते च||५०|| प्रस्थार्धमात्रं मधुनः सुशीते किञ्चिच्च चूर्णादपि यावशूकात्| एकाभयां प्राश्य ततश्च लेहाच्छुक्तिं निहन्ति श्वयथुं प्रवृद्धम्||५१|| श्वासज्वरारोचकमेहगुल्मप्लीहत्रिदोषोदरपाण्डुरोगान्| कार्श्यामवातावसृगम्लपित्तवैवर्ण्यमूत्रानिलशुक्रदोषान्||५२|| इति कंसहरीतकी|

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Adhikarana 31 (53-54) · Śloka 54

পটোলমূলামরদারুদন্তীত্রাযন্তিপিপ্পল্যভযাবিশালাঃ| যষ্ট্যাহ্বযং তিক্তকরোহিণী চ সচন্দনা স্যান্নিচুলানি দার্বী||৫৩|| কর্ষোন্মিতৈস্তৈঃ ক্বথিতঃ কষাযো ঘৃতেন পেযঃ কুডবেন যুক্তঃ| বীসর্পদাহজ্বরসন্নিপাততৃষ্ণাবিষাণি শ্বযথুং চ হন্তি||৫৪||

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पटोलमूलामरदारुदन्तीत्रायन्तिपिप्पल्यभयाविशालाः| यष्ट्याह्वयं तिक्तकरोहिणी च सचन्दना स्यान्निचुलानि दार्वी||५३|| कर्षोन्मितैस्तैः क्वथितः कषायो घृतेन पेयः कुडवेन युक्तः| वीसर्पदाहज्वरसन्निपाततृष्णाविषाणि श्वयथुं च हन्ति||५४||

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Adhikarana 32 (55-57) · Śloka 57

সচিত্রকং ধান্যযবান্যজাজীসৌবর্চলং ত্র্যূষণবেতসাম্লম্| বিল্বাত্ ফলং দাডিমযাবশূকৌ সপিপ্পলীমূলমথাপি চব্যম্||৫৫|| পিষ্ট্বাঽক্ষমাত্রাণি জলাঢকেন পক্ত্বা ঘৃতপ্রস্থমথ প্রযুঞ্জ্যাত্| অর্শাংসি গুল্মং শ্বযথুং চ কৃচ্ছ্রং নিহন্তি বহ্নিং চ করোতি দীপ্তম্||৫৬|| পিবেদ্ঘৃতং বাঽষ্টগুণাম্বুসিদ্ধং সচিত্রকক্ষারমুদারবীর্যম্| কল্যাণকং বাঽপি সপঞ্চগব্যং তিক্তং মহদ্বাঽপ্যথ তিক্তকং বা||৫৭||

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सचित्रकं धान्ययवान्यजाजीसौवर्चलं त्र्यूषणवेतसाम्लम्| बिल्वात् फलं दाडिमयावशूकौ सपिप्पलीमूलमथापि चव्यम्||५५|| पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि जलाढकेन पक्त्वा घृतप्रस्थमथ प्रयुञ्ज्यात्| अर्शांसि गुल्मं श्वयथुं च कृच्छ्रं निहन्ति वह्निं च करोति दीप्तम्||५६|| पिबेद्घृतं वाऽष्टगुणाम्बुसिद्धं सचित्रकक्षारमुदारवीर्यम्| कल्याणकं वाऽपि सपञ्चगव्यं तिक्तं महद्वाऽप्यथ तिक्तकं वा||५७||

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Adhikarana 33 (58-59) · Śloka 59

ক্ষীরং ঘটে চিত্রককল্কলিপ্তে দধ্যাগতং সাধু বিমথ্য তেন| তজ্জং ঘৃতং চিত্রকমূলগর্ভং তক্রেণ সিদ্ধং শ্বযথুঘ্নমগ্র্যম্||৫৮|| অর্শোঽতিসারানিলগুল্মমেহাংশ্চৈতন্নিহন্ত্যগ্নিবলপ্রদং চ| তক্রেণ চাদ্যাত্ সঘৃতেন তেন ভোজ্যানি সিদ্ধামথবা যবাগূম্||৫৯|| ইতি চিত্রকঘৃতম্|

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क्षीरं घटे चित्रककल्कलिप्ते दध्यागतं साधु विमथ्य तेन| तज्जं घृतं चित्रकमूलगर्भं तक्रेण सिद्धं श्वयथुघ्नमग्र्यम्||५८|| अर्शोऽतिसारानिलगुल्ममेहांश्चैतन्निहन्त्यग्निबलप्रदं च| तक्रेण चाद्यात् सघृतेन तेन भोज्यानि सिद्धामथवा यवागूम्||५९|| इति चित्रकघृतम्|

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Adhikarana 34 (60-63) · Śloka 63

জীবন্ত্যজাজীশটিপুষ্করাহ্বৈঃ সকারবীচিত্রকবিল্বমধ্যৈঃ| সযাবশূকৈর্বদরপ্রমাণৈর্বৃক্ষাম্লযুক্তা ঘৃততৈলভৃষ্টা||৬০|| অর্শোঽতিসারানিলগুল্মশোফহৃদ্রোগমন্দাগ্নিহিতা যবাগূঃ| যা পঞ্চকোলৈর্বিধিনৈব তেন সিদ্ধা ভবেত্ সা চ সমা তযৈব||৬১|| কুলত্থযূষশ্চ সপিপ্পলীকো মৌদ্গশ্চ সত্র্যূষণযাবশূকঃ| রসস্তথা বিষ্কিরজাঙ্গলানাং সকূর্মগোধাশিখিশল্লকানাম্||৬২|| সুবর্চলা গৃঞ্জনকং পটোলং সবাযসীমূলকবেত্রনিম্বম্| শাকার্থিনাং শাকমিতি প্রশস্তং ভোজ্যে পুরাণশ্চ যবঃ সশালিঃ||৬৩||

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जीवन्त्यजाजीशटिपुष्कराह्वैः सकारवीचित्रकबिल्वमध्यैः| सयावशूकैर्बदरप्रमाणैर्वृक्षाम्लयुक्ता घृततैलभृष्टा||६०|| अर्शोऽतिसारानिलगुल्मशोफहृद्रोगमन्दाग्निहिता यवागूः| या पञ्चकोलैर्विधिनैव तेन सिद्धा भवेत् सा च समा तयैव||६१|| कुलत्थयूषश्च सपिप्पलीको मौद्गश्च सत्र्यूषणयावशूकः| रसस्तथा विष्किरजाङ्गलानां सकूर्मगोधाशिखिशल्लकानाम्||६२|| सुवर्चला गृञ्जनकं पटोलं सवायसीमूलकवेत्रनिम्बम्| शाकार्थिनां शाकमिति प्रशस्तं भोज्ये पुराणश्च यवः सशालिः||६३||

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Adhikarana 35 (64-67) · Śloka 67

আভ্যন্তরং ভেষজমুক্তমেতদ্বর্হির্হিতং যচ্ছৃণু তদ্যথাবত্| স্নেহান্ প্রদেহান্ পরিষেচনানি স্বেদাংশ্চ বাতপ্রবলস্য কুর্যাত্||৬৪|| শৈলেযকুষ্ঠাগুরুদারুকৌন্তীত্বক্পদ্মকৈলাম্বুপলাশমুস্তৈঃ| প্রিযঙ্গুথৌণেযকহেমমাংসীতালীশপত্রপ্লবপত্রধান্যৈঃ||৬৫|| শ্রীবেষ্টকধ্যামকপিপ্পলীভিঃ স্পৃক্কানখৈশ্চৈব যথোপলাভম্| বাতান্বিতেঽভ্যঙ্গমুশন্তি তৈলং সিদ্ধং সুপিষ্টৈরপি চ প্রদেহম্||৬৬|| জলৈশ্চ বাসার্ককরঞ্জশিগ্রুকাশ্মর্যপত্রার্জকজৈশ্চ সিদ্ধৈঃ| স্বিন্নো মৃদূষ্ণৈ রবিতপ্ততোযৈঃ স্নাতশ্চ গন্ধৈরনুলেপনীযঃ||৬৭||

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आभ्यन्तरं भेषजमुक्तमेतद्बर्हिर्हितं यच्छृणु तद्यथावत्| स्नेहान् प्रदेहान् परिषेचनानि स्वेदांश्च वातप्रबलस्य कुर्यात्||६४|| शैलेयकुष्ठागुरुदारुकौन्तीत्वक्पद्मकैलाम्बुपलाशमुस्तैः| प्रियङ्गुथौणेयकहेममांसीतालीशपत्रप्लवपत्रधान्यैः||६५|| श्रीवेष्टकध्यामकपिप्पलीभिः स्पृक्कानखैश्चैव यथोपलाभम्| वातान्वितेऽभ्यङ्गमुशन्ति तैलं सिद्धं सुपिष्टैरपि च प्रदेहम्||६६|| जलैश्च वासार्ककरञ्जशिग्रुकाश्मर्यपत्रार्जकजैश्च सिद्धैः| स्विन्नो मृदूष्णै रवितप्ततोयैः स्नातश्च गन्धैरनुलेपनीयः||६७||

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Adhikarana 36 (68-69) · Śloka 69

সবেতসাঃ ক্ষীরবতাং দ্রুমাণাং ত্বচঃ সমঞ্জিষ্ঠলতামৃণালাঃ| সচন্দনাঃ পদ্মকবালকৌ চ পৈত্তে প্রদেহস্তু সতৈলপাকঃ||৬৮|| আক্তস্য তেনাম্বু রবিপ্রতপ্তং সচন্দনং সাভযপদ্মকং চ| স্নানে হিতং ক্ষীরবতাং কষাযঃ ক্ষীরোদকং চন্দনলেপনং চ||৬৯||

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सवेतसाः क्षीरवतां द्रुमाणां त्वचः समञ्जिष्ठलतामृणालाः| सचन्दनाः पद्मकवालकौ च पैत्ते प्रदेहस्तु सतैलपाकः||६८|| आक्तस्य तेनाम्बु रविप्रतप्तं सचन्दनं साभयपद्मकं च| स्नाने हितं क्षीरवतां कषायः क्षीरोदकं चन्दनलेपनं च||६९||

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Adhikarana 37 (70-73) · Śloka 73

কফে তু কৃষ্ণাসিকতাপুরাণপিণ্যাকশিগ্রুত্বগুমাপ্রলেপঃ| কুলত্থশুণ্ঠীজলমূত্রসেকশ্চণ্ডাগুরুভ্যামনুলেপনং চ||৭০|| বিভীতকানাং ফলমধ্যলেপঃ সর্বেষু দাহার্তিহরঃ প্রদিষ্টঃ| যষ্ট্যাহ্বমুস্তৈঃ সকপিত্থপত্রৈঃ সচন্দনৈস্তত্পিডকাসু লেপঃ||৭১|| রাস্নাবৃষার্কত্রিফলাবিডঙ্গং শিগ্রুত্বচো মূষিকপর্ণিকা চ| নিম্বার্জকৌ ব্যাঘ্রনখঃ সদূর্বা সুবর্চলা তিক্তকরোহিণী চ||৭২|| সকাকমাচী বৃহতী সকুষ্ঠা পুনর্নবা চিত্রকনাগরে চ| উন্মর্দনং শোফিষু মূত্রপিষ্টং শস্তস্তথা মূলকতোযসেকঃ||৭৩||

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कफे तु कृष्णासिकतापुराणपिण्याकशिग्रुत्वगुमाप्रलेपः| कुलत्थशुण्ठीजलमूत्रसेकश्चण्डागुरुभ्यामनुलेपनं च||७०|| बिभीतकानां फलमध्यलेपः सर्वेषु दाहार्तिहरः प्रदिष्टः| यष्ट्याह्वमुस्तैः सकपित्थपत्रैः सचन्दनैस्तत्पिडकासु लेपः||७१|| रास्नावृषार्कत्रिफलाविडङ्गं शिग्रुत्वचो मूषिकपर्णिका च| निम्बार्जकौ व्याघ्रनखः सदूर्वा सुवर्चला तिक्तकरोहिणी च||७२|| सकाकमाची बृहती सकुष्ठा पुनर्नवा चित्रकनागरे च| उन्मर्दनं शोफिषु मूत्रपिष्टं शस्तस्तथा मूलकतोयसेकः||७३||

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Adhikarana 38 (74) · Śloka 74

শোফাস্তু গাত্রাবযবাশ্রিতা যে তে স্থানদূষ্যাকৃতিনামভেদাত্| অনেকসঙ্খ্যাঃ কতিচিচ্চ তেষাং নিদর্শনার্থং গদতো নিবোধ||৭৪||

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शोफास्तु गात्रावयवाश्रिता ये ते स्थानदूष्याकृतिनामभेदात्| अनेकसङ्ख्याः कतिचिच्च तेषां निदर्शनार्थं गदतो निबोध||७४||

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Adhikarana 39 (75) · Śloka 75

দোষাস্ত্রযঃ স্বৈঃ কুপিতা নিদানৈঃ কুর্বন্তি শোফং শিরসঃ সুঘোরম্|৭৫|

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दोषास्त्रयः स्वैः कुपिता निदानैः कुर्वन्ति शोफं शिरसः सुघोरम्|७५|

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Adhikarana 40 (75) · Śloka 75

অন্তর্গলে ঘুর্ঘুরিকান্বিতং চ শালূকমুচ্ছ্বাসনিরোধকারি||৭৫||

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अन्तर्गले घुर्घुरिकान्वितं च शालूकमुच्छ्वासनिरोधकारि||७५||

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Adhikarana 41 (76) · Śloka 76

গলস্য সন্ধৌ চিবুকে গলে চ সদাহরাগঃ শ্বসনাসু চোগ্রঃ| শোফো ভৃশার্তিস্তু বিডালিকা স্যাদ্ধন্যাদ্গলে চেদ্বলযীকৃতা সা||৭৬||

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गलस्य सन्धौ चिबुके गले च सदाहरागः श्वसनासु चोग्रः| शोफो भृशार्तिस्तु बिडालिका स्याद्धन्याद्गले चेद्वलयीकृता सा||७६||

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Adhikarana 42 (77-78) · Śloka 78

স্যাত্তালুবিদ্রধ্যপি দাহরাগপাকান্বিতস্তালুনি সা ত্রিদোষাত্| জিহ্বোপরিষ্টাদুপজিহ্বিকা স্যাত্ কফাদধস্তাদধিজিহ্বিকা চ||৭৭|| যো দন্তমাংসেষু তু রক্তপিত্তাত্ পাকো ভবেত্ সোপকুশঃ প্রদিষ্টঃ| স্যাদ্দন্তবিদ্রধ্যপি দন্তমাংসে শোফঃ কফাচ্ছোণিতসঞ্চযোত্থঃ||৭৮||

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स्यात्तालुविद्रध्यपि दाहरागपाकान्वितस्तालुनि सा त्रिदोषात्| जिह्वोपरिष्टादुपजिह्विका स्यात् कफादधस्तादधिजिह्विका च||७७|| यो दन्तमांसेषु तु रक्तपित्तात् पाको भवेत् सोपकुशः प्रदिष्टः| स्याद्दन्तविद्रध्यपि दन्तमांसे शोफः कफाच्छोणितसञ्चयोत्थः||७८||

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Adhikarana 43 (79-80) · Śloka 80

গলস্য পার্শ্বে গলগণ্ড একঃ স্যাদ্গণ্ডমালা বহুভিস্তু গণ্ডৈঃ| সাধ্যাঃ স্মৃতাঃ পীনসপার্শ্বশূলকাসজ্বরচ্ছর্দিযুতাস্ত্বসাধ্যাঃ||৭৯|| তেষাং সিরাকাযশিরোবিরেকা ধূমঃ পুরাণস্য ঘৃতস্য পানম্| স্যাল্লঙ্ঘনং বক্ত্রভবেষু চাপি প্রঘর্ষণং স্যাত্ কবলগ্রহশ্চ||৮০||

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गलस्य पार्श्वे गलगण्ड एकः स्याद्गण्डमाला बहुभिस्तु गण्डैः| साध्याः स्मृताः पीनसपार्श्वशूलकासज्वरच्छर्दियुतास्त्वसाध्याः||७९|| तेषां सिराकायशिरोविरेका धूमः पुराणस्य घृतस्य पानम्| स्याल्लङ्घनं वक्त्रभवेषु चापि प्रघर्षणं स्यात् कवलग्रहश्च||८०||

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Adhikarana 44 (81-86) · Śloka 86

অঙ্গৈকদেশেষ্বনিলাদিভিঃ স্যাত্ স্বরূপধারী স্ফুরণঃ সিরাভিঃ| গ্রন্থির্মহান্মাংসভবস্ত্বনর্তির্মেদোভবঃ স্নিগ্ধতমশ্চলশ্চ||৮১|| সংশোধিতে স্বেদিতমশ্মকাষ্ঠৈঃ সাঙ্গুষ্ঠদণ্ডৈর্বিলযেদপক্বম্| বিপাট্য চোদ্ধৃত্য ভিষক্ সকোশং শস্ত্রেণ দগ্ধ্বা ব্রণবচ্চিকিত্সেত্||৮২|| অদগ্ধ ঈষত্ পরিশেষিতশ্চ প্রযাতি ভূযোঽপি শনৈর্বিবৃদ্ধিম্| তস্মাদশেষঃ কুশলৈঃ সমন্তাচ্ছেদ্যো ভবেদ্বীক্ষ্য শরীরদেশান্||৮৩|| শেষে কৃতে পাকবশেন শীর্যাত্ততঃ ক্ষতোত্থঃ প্রসরেদ্বিসর্পঃ| উপদ্রবং তং প্রবিচার্য তজ্জ্ঞস্তৈর্ভেষজৈঃ পূর্বতরৈর্যথোক্তৈঃ||৮৪|| নিবারযেদাদিত এব যত্নাদ্বিধানবিত্ স্বস্ববিধিং বিধায| ততঃ ক্রমেণাস্য যথাবিধানং ব্রণং ব্রণজ্ঞস্ত্বরযা চিকিত্সেত্||৮৫|| বিবর্জযেত্ কুক্ষ্যুদরাশ্রিতং চ তথা গলে মর্মণি সংশ্রিতং চ| স্থূলঃ খরশ্চাপি ভবেদ্বিবর্জ্যো যশ্চাপি বালস্থবিরাবলানাম্||৮৬||

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अङ्गैकदेशेष्वनिलादिभिः स्यात् स्वरूपधारी स्फुरणः सिराभिः| ग्रन्थिर्महान्मांसभवस्त्वनर्तिर्मेदोभवः स्निग्धतमश्चलश्च||८१|| संशोधिते स्वेदितमश्मकाष्ठैः साङ्गुष्ठदण्डैर्विलयेदपक्वम्| विपाट्य चोद्धृत्य भिषक् सकोशं शस्त्रेण दग्ध्वा व्रणवच्चिकित्सेत्||८२|| अदग्ध ईषत् परिशेषितश्च प्रयाति भूयोऽपि शनैर्विवृद्धिम्| तस्मादशेषः कुशलैः समन्ताच्छेद्यो भवेद्वीक्ष्य शरीरदेशान्||८३|| शेषे कृते पाकवशेन शीर्यात्ततः क्षतोत्थः प्रसरेद्विसर्पः| उपद्रवं तं प्रविचार्य तज्ज्ञस्तैर्भेषजैः पूर्वतरैर्यथोक्तैः||८४|| निवारयेदादित एव यत्नाद्विधानवित् स्वस्वविधिं विधाय| ततः क्रमेणास्य यथाविधानं व्रणं व्रणज्ञस्त्वरया चिकित्सेत्||८५|| विवर्जयेत् कुक्ष्युदराश्रितं च तथा गले मर्मणि संश्रितं च| स्थूलः खरश्चापि भवेद्विवर्ज्यो यश्चापि बालस्थविराबलानाम्||८६||

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Adhikarana 45 (87) · Śloka 87

গ্রন্থ্যর্বুদানাং চ যতোঽবিশেষঃ প্রদেশহেত্বাকৃতিদোষদূষ্যৈঃ| ততশ্চিকিত্সেদ্ভিষগর্বুদানি বিধানবিদ্গ্রন্থিচিকিত্সিতেন||৮৭||

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ग्रन्थ्यर्बुदानां च यतोऽविशेषः प्रदेशहेत्वाकृतिदोषदूष्यैः| ततश्चिकित्सेद्भिषगर्बुदानि विधानविद्ग्रन्थिचिकित्सितेन||८७||

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Adhikarana 46 (88-89) · Śloka 90

তাম্রা সশূলা পিডকা ভবেদ্যা সা চালজী নাম পরিস্রুতাগ্রা| শোফোঽক্ষতশ্চর্মনখান্তরে স্যান্মাংসাস্রদূষী ভৃশশীঘ্রপাকঃ||৮৮|| জ্বরান্বিতা বঙ্ক্ষণকক্ষজা যা বর্তির্নিরর্তিঃ কঠিনাযতা চ| বিদারিকা সা কফমারুতাভ্যাং তেষাং যথাদোষমুপক্রমঃ স্যাত্||৮৯|| বিস্রাবণং পিণ্ডিকযোপনাহঃ পক্বেষু চৈব ব্রণবচ্চিকিত্সা|৯০|

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ताम्रा सशूला पिडका भवेद्या सा चालजी नाम परिस्रुताग्रा| शोफोऽक्षतश्चर्मनखान्तरे स्यान्मांसास्रदूषी भृशशीघ्रपाकः||८८|| ज्वरान्विता वङ्क्षणकक्षजा या वर्तिर्निरर्तिः कठिनायता च| विदारिका सा कफमारुताभ्यां तेषां यथादोषमुपक्रमः स्यात्||८९|| विस्रावणं पिण्डिकयोपनाहः पक्वेषु चैव व्रणवच्चिकित्सा|९०|

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Adhikarana 47 (90-93) · Śloka 93

বিস্ফোটকাঃ সর্বশরীরগাস্তু স্ফোটাঃ সরাগজ্বরতর্ষযুক্তাঃ||৯০|| যজ্ঞোপবীতপ্রতিমাঃ প্রভূতাঃ পিত্তানিলাভ্যাং জনিতাস্তু কক্ষাঃ | যাশ্চাপরাঃ স্যুঃ পিডকাঃ প্রকীর্ণাঃ স্থূলাণুমধ্যা অপি পিত্তজাস্তাঃ||৯১|| ক্ষুদ্রপ্রমাণাঃ পিডকাঃ শরীরে সর্বাঙ্গগাঃ সজ্বরদাহতৃষ্ণাঃ| কণ্ডূযুতাঃ সারুচিসপ্রসেকা রোমান্তিকাঃ পিত্তকফাত্ প্রদিষ্টাঃ||৯২|| যাঃ সর্বগাত্রেষু মসূরমাত্রা মসূরিকাঃ পিত্তকফাত্ প্রদিষ্টাঃ| বীসর্পশান্ত্যৈ বিহিতা ক্রিযা যা তাং তেষু কুষ্ঠে চ হিতাং বিদধ্যাত্||৯৩||

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विस्फोटकाः सर्वशरीरगास्तु स्फोटाः सरागज्वरतर्षयुक्ताः||९०|| यज्ञोपवीतप्रतिमाः प्रभूताः पित्तानिलाभ्यां जनितास्तु कक्षाः | याश्चापराः स्युः पिडकाः प्रकीर्णाः स्थूलाणुमध्या अपि पित्तजास्ताः||९१|| क्षुद्रप्रमाणाः पिडकाः शरीरे सर्वाङ्गगाः सज्वरदाहतृष्णाः| कण्डूयुताः सारुचिसप्रसेका रोमान्तिकाः पित्तकफात् प्रदिष्टाः||९२|| याः सर्वगात्रेषु मसूरमात्रा मसूरिकाः पित्तकफात् प्रदिष्टाः| वीसर्पशान्त्यै विहिता क्रिया या तां तेषु कुष्ठे च हितां विदध्यात्||९३||

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Adhikarana 48 (94-95) · Śloka 95

ব্রধ্নোঽনিলাদ্যৈর্বৃষণে স্বলিঙ্গৈরন্ত্রং নিরেতি প্রবিশেন্মুহুশ্চ| মূত্রেণ পূর্ণং মৃদু মেদসা চেত্ স্নিগ্ধং চ বিদ্যাত্ কঠিনং চ শোথম্||৯৪|| বিরেচনাভ্যঙ্গনিরূহলেপাঃ পক্বেষু চৈব ব্রণবচ্চিকিত্সা| স্যান্মূত্রসেকঃ কফজং বিপাট্য বিশোধ্য সীব্যেদ্ব্রণবচ্চ পক্বম্||৯৫||

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ब्रध्नोऽनिलाद्यैर्वृषणे स्वलिङ्गैरन्त्रं निरेति प्रविशेन्मुहुश्च| मूत्रेण पूर्णं मृदु मेदसा चेत् स्निग्धं च विद्यात् कठिनं च शोथम्||९४|| विरेचनाभ्यङ्गनिरूहलेपाः पक्वेषु चैव व्रणवच्चिकित्सा| स्यान्मूत्रसेकः कफजं विपाट्य विशोध्य सीव्येद्व्रणवच्च पक्वम्||९५||

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Adhikarana 49 (96-97) · Śloka 97

ক্রিম্যস্থিসূক্ষ্মক্ষণনব্যবাযপ্রবাহণান্যুত্কটকাশ্বপৃষ্ঠৈঃ | গুদস্য পার্শ্বে পিডকা ভৃশার্তিঃ পক্বপ্রভিন্না তু ভগন্দরঃ স্যাত্||৯৬|| বিরেচনং চৈষণপাটনং চ বিশুদ্ধমার্গস্য চ তৈলদাহঃ| স্যাত্ ক্ষারসূত্রেণ সুপাচিতেন ছিন্নস্য চাস্য ব্রণবচ্চিকিত্সা||৯৭||

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क्रिम्यस्थिसूक्ष्मक्षणनव्यवायप्रवाहणान्युत्कटकाश्वपृष्ठैः | गुदस्य पार्श्वे पिडका भृशार्तिः पक्वप्रभिन्ना तु भगन्दरः स्यात्||९६|| विरेचनं चैषणपाटनं च विशुद्धमार्गस्य च तैलदाहः| स्यात् क्षारसूत्रेण सुपाचितेन छिन्नस्य चास्य व्रणवच्चिकित्सा||९७||

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Adhikarana 50 (98) · Śloka 98

জঙ্ঘাসু পিণ্ডীপ্রপদোপরিষ্টাত্ স্যাচ্ছ্লীপদং মাংসকফাস্রদোষাত্| সিরাকফঘ্নশ্চ বিধিঃ সমগ্রস্তত্রেষ্যতে সর্ষপলেপনং চ||৯৮||

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जङ्घासु पिण्डीप्रपदोपरिष्टात् स्याच्छ्लीपदं मांसकफास्रदोषात्| सिराकफघ्नश्च विधिः समग्रस्तत्रेष्यते सर्षपलेपनं च||९८||

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Adhikarana 51 (99-100) · Śloka 100

মন্দাস্তু পিত্তপ্রবলাঃ প্রদুষ্টা দোষাঃ সুতীব্রং তনুরক্তপাকম্| কুর্বন্তি শোথং জ্বরতর্ষযুক্তং বিসর্পণং জালকগর্দভাখ্যম্||৯৯|| বিলঙ্ঘনং রক্তবিমোক্ষণং চ বিরূক্ষণং কাযবিশোধনং চ| ধাত্রীপ্রযোগাঞ্ শিশিরান্ প্রদেহান্ কুর্যাত্ সদা জালকগর্দভস্য||১০০||

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मन्दास्तु पित्तप्रबलाः प्रदुष्टा दोषाः सुतीव्रं तनुरक्तपाकम्| कुर्वन्ति शोथं ज्वरतर्षयुक्तं विसर्पणं जालकगर्दभाख्यम्||९९|| विलङ्घनं रक्तविमोक्षणं च विरूक्षणं कायविशोधनं च| धात्रीप्रयोगाञ् शिशिरान् प्रदेहान् कुर्यात् सदा जालकगर्दभस्य||१००||

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Adhikarana 52 (101) · Śloka 101

এবংবিধাংশ্চাপ্যপরান্ পরীক্ষ্য শোথপ্রকারাননিলাদিলিঙ্গৈঃ| শান্তিং নযেদ্দোষহরৈর্যথাস্বমালেপনচ্ছেদনভেদদাহৈঃ||১০১||

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एवंविधांश्चाप्यपरान् परीक्ष्य शोथप्रकाराननिलादिलिङ्गैः| शान्तिं नयेद्दोषहरैर्यथास्वमालेपनच्छेदनभेददाहैः||१०१||

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Adhikarana 53 (102) · Śloka 102

প্রাযোঽভিঘাতাদনিলঃ সরক্তঃ শোথং সরাগং প্রকরোতি তত্র| বীসর্পনুন্মারুতরক্তনুচ্চ কার্যং বিষঘ্নং বিষজে চ কর্ম||১০২||

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प्रायोऽभिघातादनिलः सरक्तः शोथं सरागं प्रकरोति तत्र| वीसर्पनुन्मारुतरक्तनुच्च कार्यं विषघ्नं विषजे च कर्म||१०२||

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Adhikarana 54 (103) · Śloka 103

তত্র শ্লোকঃ- ত্রিবিধস্য দোষভেদাত্ সর্বার্ধাবযবগাত্রভেদাচ্চ| শ্বযথোর্দ্বিবিধস্য তথা লিঙ্গানি চিকিত্সিতং চোক্তম্||১০৩||

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तत्र श्लोकः- त्रिविधस्य दोषभेदात् सर्वार्धावयवगात्रभेदाच्च| श्वयथोर्द्विविधस्य तथा लिङ्गानि चिकित्सितं चोक्तम्||१०३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 12

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে চিকিত্সাস্থানে শ্বযথুচিকিত্সিতং নাম দ্বাদশোঽধ্যাযঃ||১২||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते चिकित्सास्थाने श्वयथुचिकित्सितं नाम द्वादशोऽध्यायः||१२||

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18. śvayathucikitsitam — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi