Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো জনপদোদ্ধ্বংসনীযং বিমানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো জনপদোদ্ধ্বংসনীযং বিমানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
জনপদমণ্ডলে পঞ্চালক্ষেত্রে দ্বিজাতিবরাধ্যুষিতে কাম্পিল্যরাজধান্যাং ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেযোঽন্তেবাসিগণপরিবৃতঃ পশ্চিমে ঘর্মমাসে গঙ্গাতীরে বনবিচারমনুবিচরঞ্ছিষ্যমগ্নিবেশমব্রবীত্||৩||
जनपदमण्डले पञ्चालक्षेत्रे द्विजातिवराध्युषिते काम्पिल्यराजधान्यां भगवान् पुनर्वसुरात्रेयोऽन्तेवासिगणपरिवृतः पश्चिमे घर्ममासे गङ्गातीरे वनविचारमनुविचरञ्छिष्यमग्निवेशमब्रवीत्||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
দৃশ্যন্তে হি খলু সৌম্য! নক্ষত্রগ্রহগণচন্দ্রসূর্যানিলানলানাং দিশাং চাপ্রকৃতিভূতানামৃতুবৈকারিকা ভাবাঃ, অচিরাদিতো ভূরপি চ ন যথাবদ্রসবীর্যবিপাকপ্রভাবমোষধীনাং প্রতিবিধাস্যতি, তদ্বিযোগাচ্চাতঙ্কপ্রাযতা নিযতা| তস্মাত্ প্রাগুদ্ধ্বংসাত্ প্রাক্ চ ভূমের্বিরসীভাবাদুদ্ধরধ্বং সৌম্য! ভৈষজ্যানি যাবন্নোপহতরসবীর্যবিপাকপ্রভাবাণি ভবন্তি| বযং চৈষাং রসবীর্যবিপাকপ্রভাবানুপযোক্ষ্যামহে যে চাস্মাননুকাঙ্ক্ষন্তি, যাংশ্চ বযমনুকাঙ্ক্ষামঃ| ন হি সম্যগুদ্ধৃতেষু সৌম্য! ভৈষজ্যেষু সম্যগ্বিহিতেষু সম্যক্ চাবচারিতেষু জনপদোদ্ধ্বংসকরাণাং বিকারাণাং কিঞ্চিত্ প্রতীকারগৌরবং ভবতি||৪||
दृश्यन्ते हि खलु सौम्य! नक्षत्रग्रहगणचन्द्रसूर्यानिलानलानां दिशां चाप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका भावाः, अचिरादितो भूरपि च न यथावद्रसवीर्यविपाकप्रभावमोषधीनां प्रतिविधास्यति, तद्वियोगाच्चातङ्कप्रायता नियता| तस्मात् प्रागुद्ध्वंसात् प्राक् च भूमेर्विरसीभावादुद्धरध्वं सौम्य! भैषज्यानि यावन्नोपहतरसवीर्यविपाकप्रभावाणि भवन्ति| वयं चैषां रसवीर्यविपाकप्रभावानुपयोक्ष्यामहे ये चास्माननुकाङ्क्षन्ति, यांश्च वयमनुकाङ्क्षामः| न हि सम्यगुद्धृतेषु सौम्य! भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यक् चावचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां किञ्चित् प्रतीकारगौरवं भवति||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
এবংবাদিনং ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- উদ্ধৃতানি খলু ভগবন্! ভৈষজ্যানি, সম্যগ্বিহিতানি, সম্যগবচারিতানি চ; অপি তু খলু জনপদোদ্ধ্বংসনমেকেনৈব ব্যাধিনা যুগপদসমানপ্রকৃত্যাহারদেহবলসাত্ম্যসত্ত্ববযসাং মনুষ্যাণাং কস্মাদ্ভবতীতি||৫||
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- उद्धृतानि खलु भगवन्! भैषज्यानि, सम्यग्विहितानि, सम्यगवचारितानि च; अपि तु खलु जनपदोद्ध्वंसनमेकेनैव व्याधिना युगपदसमानप्रकृत्याहारदेहबलसात्म्यसत्त्ववयसां मनुष्याणां कस्माद्भवतीति||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- এবমসামান্যাবতামপ্যেভিরগ্নিবেশ! প্রকৃত্যাদিভির্ভাবৈর্মনুষ্যাণাং যেঽন্যে ভাবাঃ সামান্যাস্তদ্বৈগুণ্যাত্ সমানকালাঃ সমানলিঙ্গাশ্চ ব্যাধযোঽভিনির্বর্তমানা জনপদমুদ্ধ্বংসযন্তি| তে তু খল্বিমে ভাবাঃ সামান্যা জনপদেষু ভবন্তি; তদ্যথা- বাযুঃ, উদকং, দেশঃ, কাল ইতি||৬||
तमुवाच भगवानात्रेयः- एवमसामान्यावतामप्येभिरग्निवेश! प्रकृत्यादिभिर्भावैर्मनुष्याणां येऽन्ये भावाः सामान्यास्तद्वैगुण्यात् समानकालाः समानलिङ्गाश्च व्याधयोऽभिनिर्वर्तमाना जनपदमुद्ध्वंसयन्ति| ते तु खल्विमे भावाः सामान्या जनपदेषु भवन्ति; तद्यथा- वायुः, उदकं, देशः, काल इति||६||
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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8
তত্র বাতমেবংবিধমনারোগ্যকরং বিদ্যাত্; তদ্যথা-যথর্তুবিষমমতিস্তিমিতমতিচলমতিপরুষমতিশীতমত্যুষ্ণমতিরূক্ষমত্যভিষ্যন্দিনমতিভৈরবারাবমতিপ্রতিহত- পরস্পরগতিমতিকুণ্ডলিনমসাত্ম্যগন্ধবাষ্পসিকতাপাংশুধূমোপহতমিতি (১); উদকং তু খল্বত্যর্থবিকৃতগন্ধবর্ণরসস্পর্শং ক্লেদবহুলমপক্রান্তজলচরবিহঙ্গমুপক্ষীণজলেশযমপ্রীতিকরমপগতগুণং বিদ্যাত্ (২); দেশং পুনঃ প্রকৃতিবিকৃতবর্ণগন্ধরসস্পর্শং ক্লেদবহুলমুপসৃষ্টং সরীসৃপব্যালমশকশলভমক্ষিকামূষকোলূকশ্মাশানিকশকুনিজম্বূকাদিভিস্তৃণোলূপোপবনবন্তং প্রতানাদিবহুলমপূর্ববদবপতিতশুষ্কনষ্টশস্যং ধূম্রপবনং প্রধ্মাতপতত্রিগণমুত্ক্রুষ্টশ্বগণমুদ্ভ্রান্তব্যথিতবিবিধমৃগপক্ষিসঙ্ঘমুত্সৃষ্টনষ্টধর্মসত্যলজ্জাচারশীলগুণজনপদং শশ্বত্ক্ষুভিতোদীর্ণসলিলাশযং প্রততোল্কাপাতনির্ঘাতভূমিকম্পমতিভযারাবরূপং রূক্ষতাম্রারুণসিতাভ্রজালসংবৃতার্কচন্দ্রতারকমভীক্ষ্ণং সসম্ভ্রমোদ্বেগমিব সত্রাসরুদিতমিব সতমস্কমিব গুহ্যকাচরিতমিবাক্রন্দিতশব্দবহুলং চাহিতং বিদ্যাত্ (৩); কালং তু খলু যথর্তুলিঙ্গাদ্বিপরীতলিঙ্গমতিলিঙ্গং হীনলিঙ্গং চাহিতং ব্যবস্যেত্ (৪); ইমানেবন্দোষযুক্তাংশ্চতুরো ভাবাঞ্জনপদোদ্ধ্বংসকরান্ বদন্তি কুশলাঃ; অতোঽন্যথাভূতাংস্তু হিতানাচক্ষতে||৭|| বিগুণেষ্বপি খল্বেতেষু জনপদোদ্ধ্বংসকরেষু ভাবেষু ভেষজেনোপপাদ্যমানানামভযং ভবতি রোগেভ্য ইতি||৮||
तत्र वातमेवंविधमनारोग्यकरं विद्यात्; तद्यथा-यथर्तुविषममतिस्तिमितमतिचलमतिपरुषमतिशीतमत्युष्णमतिरूक्षमत्यभिष्यन्दिनमतिभैरवारावमतिप्रतिहत- परस्परगतिमतिकुण्डलिनमसात्म्यगन्धबाष्पसिकतापांशुधूमोपहतमिति (१); उदकं तु खल्वत्यर्थविकृतगन्धवर्णरसस्पर्शं क्लेदबहुलमपक्रान्तजलचरविहङ्गमुपक्षीणजलेशयमप्रीतिकरमपगतगुणं विद्यात् (२); देशं पुनः प्रकृतिविकृतवर्णगन्धरसस्पर्शं क्लेदबहुलमुपसृष्टं सरीसृपव्यालमशकशलभमक्षिकामूषकोलूकश्माशानिकशकुनिजम्बूकादिभिस्तृणोलूपोपवनवन्तं प्रतानादिबहुलमपूर्ववदवपतितशुष्कनष्टशस्यं धूम्रपवनं प्रध्मातपतत्रिगणमुत्क्रुष्टश्वगणमुद्भ्रान्तव्यथितविविधमृगपक्षिसङ्घमुत्सृष्टनष्टधर्मसत्यलज्जाचारशीलगुणजनपदं शश्वत्क्षुभितोदीर्णसलिलाशयं प्रततोल्कापातनिर्घातभूमिकम्पमतिभयारावरूपं रूक्षताम्रारुणसिताभ्रजालसंवृतार्कचन्द्रतारकमभीक्ष्णं ससम्भ्रमोद्वेगमिव सत्रासरुदितमिव सतमस्कमिव गुह्यकाचरितमिवाक्रन्दितशब्दबहुलं चाहितं विद्यात् (३); कालं तु खलु यथर्तुलिङ्गाद्विपरीतलिङ्गमतिलिङ्गं हीनलिङ्गं चाहितं व्यवस्येत् (४); इमानेवन्दोषयुक्तांश्चतुरो भावाञ्जनपदोद्ध्वंसकरान् वदन्ति कुशलाः; अतोऽन्यथाभूतांस्तु हितानाचक्षते||७|| विगुणेष्वपि खल्वेतेषु जनपदोद्ध्वंसकरेषु भावेषु भेषजेनोपपाद्यमानानामभयं भवति रोगेभ्य इति||८||
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Adhikarana 7 (9-11) · Śloka 11
ভবন্তি চাত্র- বৈগুণ্যমুপপন্নানাং দেশকালানিলাম্ভসাম্| গরীযস্ত্বং বিশেষেণ হেতুমত্ সম্প্রবক্ষ্যতে||৯|| বাতাজ্জলং জলাদ্দেশং দেশাত্ কালং স্বভাবতঃ| বিদ্যাদ্দুষ্পরিহার্যত্বাদ্গরীযস্তরমর্থবিত্ ||১০|| বায্বাদিষু যথোক্তানাং দোষাণাং তু বিশেষবিত্| প্রতীকারস্য সৌকর্যে বিদ্যাল্লাঘবলক্ষণম্||১১||
भवन्ति चात्र- वैगुण्यमुपपन्नानां देशकालानिलाम्भसाम्| गरीयस्त्वं विशेषेण हेतुमत् सम्प्रवक्ष्यते||९|| वाताज्जलं जलाद्देशं देशात् कालं स्वभावतः| विद्याद्दुष्परिहार्यत्वाद्गरीयस्तरमर्थवित् ||१०|| वाय्वादिषु यथोक्तानां दोषाणां तु विशेषवित्| प्रतीकारस्य सौकर्ये विद्याल्लाघवलक्षणम्||११||
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Adhikarana 8 (12-18) · Śloka 18
চতুর্ষ্বপি তু দুষ্টেষু কালান্তেষু যদা নরাঃ| ভেষজেনোপপাদ্যন্তে ন ভবন্ত্যাতুরাস্তদা||১২|| যেষাং ন মৃত্যুসামান্যং সামান্যং ন চ কর্মণাম্| কর্ম পঞ্চবিধং তেষাং ভেষজং পরমুচ্যতে||১৩|| রসাযনানাং বিধিবচ্চোপযোগঃ প্রশস্যতে| শস্যতে দেহবৃত্তিশ্চ ভেষজৈঃ পূর্বমুদ্ধৃতৈঃ||১৪|| সত্যং ভূতে দযা দানং বলযো দেবতার্চনম্| সদ্ধৃত্তস্যানুবৃত্তিশ্চ প্রশমো গুপ্তিরাত্মনঃ||১৫|| হিতং জনপদানাং চ শিবানামুপসেবনম্| সেবনং ব্রহ্মচর্যস্য তথৈব ব্রহ্মচারিণাম্||১৬|| সঙ্কথা ধর্মশাস্ত্রাণাং মহর্ষীণাং জিতাত্মনাম্| ধার্মিকৈঃ সাত্ত্বিকৈর্নিত্যং সহাস্যা বৃদ্ধসম্মতৈঃ||১৭|| ইত্যেতদ্ভেষজং প্রোক্তমাযুষঃ পরিপালনম্| যেষামনিযতো মৃত্যুস্তস্মিন্ কালে সুদারুণে||১৮||
चतुर्ष्वपि तु दुष्टेषु कालान्तेषु यदा नराः| भेषजेनोपपाद्यन्ते न भवन्त्यातुरास्तदा||१२|| येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम्| कर्म पञ्चविधं तेषां भेषजं परमुच्यते||१३|| रसायनानां विधिवच्चोपयोगः प्रशस्यते| शस्यते देहवृत्तिश्च भेषजैः पूर्वमुद्धृतैः||१४|| सत्यं भूते दया दानं बलयो देवतार्चनम्| सद्धृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः||१५|| हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम्| सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम्||१६|| सङ्कथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम्| धार्मिकैः सात्त्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसम्मतैः||१७|| इत्येतद्भेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम्| येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे||१८||
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Adhikarana 9 (19-20) · Śloka 20
ইতি শ্রুত্বা জনপদোদ্ধ্বংসনে কারণানি পুনরপি ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- অথ খলু ভগবন্! কুতোমূলমেষাং বায্বাদীনাং বৈগুণ্যমুত্পদ্যতে? যেনোপপন্না জনপদমুদ্ধ্বংসযন্তীতি||১৯|| তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- সর্বেষামপ্যগ্নিবেশ! বায্বাদীনাং যদ্বৈগুণ্যমুত্পদ্যতে তস্য মূলমধর্মঃ, তন্মূলং বাঽসত্কর্ম পূর্বকৃতং; তযোর্যোনিঃ প্রজ্ঞাপরাধ এব| তদ্যথা- যদা বৈ দেশনগরনিগমজনপদপ্রধানা ধর্মমুত্ক্রম্যাধর্মেণ প্রজাং বর্তযন্তি, তদাশ্রিতোপাশ্রিতাঃ পৌরজনপদা ব্যবহারোপজীবিনশ্চ তমধর্মমভিবর্ধযন্তি, ততঃ সোঽধর্মঃ প্রসভং ধর্মমন্তর্ধত্তে, ততস্তেঽন্তর্হিতধর্মাণো দেবতাভিরপি ত্যজ্যন্তে; তেষাং তথাঽন্তর্হিতধর্মণামধর্মপ্রধানানামপক্রান্তদেবতানামৃতবো ব্যাপদ্যন্তে; তেন নাপো যথাকালং দেবো বর্ষতি ন বা বর্ষতি বিকৃতং বা বর্ষতি, বাতা ন সম্যগভিবান্তি, ক্ষিতির্ব্যাপদ্যতে, সলিলান্যুপশুষ্যন্তি, ওষধযঃ স্বভাবং পরিহাযাপদ্যন্তে বিকৃতিং; তত উদ্ধ্বংসন্তে জনপদাঃ স্পৃশ্যাভ্যবহার্যদোষাত্ ||২০||
इति श्रुत्वा जनपदोद्ध्वंसने कारणानि पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- अथ खलु भगवन्! कुतोमूलमेषां वाय्वादीनां वैगुण्यमुत्पद्यते? येनोपपन्ना जनपदमुद्ध्वंसयन्तीति||१९|| तमुवाच भगवानात्रेयः- सर्वेषामप्यग्निवेश! वाय्वादीनां यद्वैगुण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः, तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतं; तयोर्योनिः प्रज्ञापराध एव| तद्यथा- यदा वै देशनगरनिगमजनपदप्रधाना धर्ममुत्क्रम्याधर्मेण प्रजां वर्तयन्ति, तदाश्रितोपाश्रिताः पौरजनपदा व्यवहारोपजीविनश्च तमधर्ममभिवर्धयन्ति, ततः सोऽधर्मः प्रसभं धर्ममन्तर्धत्ते, ततस्तेऽन्तर्हितधर्माणो देवताभिरपि त्यज्यन्ते; तेषां तथाऽन्तर्हितधर्मणामधर्मप्रधानानामपक्रान्तदेवतानामृतवो व्यापद्यन्ते; तेन नापो यथाकालं देवो वर्षति न वा वर्षति विकृतं वा वर्षति, वाता न सम्यगभिवान्ति, क्षितिर्व्यापद्यते, सलिलान्युपशुष्यन्ति, ओषधयः स्वभावं परिहायापद्यन्ते विकृतिं; तत उद्ध्वंसन्ते जनपदाः स्पृश्याभ्यवहार्यदोषात् ||२०||
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Adhikarana 10 (21) · Śloka 21
তথা শস্ত্রপ্রভবস্যাপি জনপদোদ্ধ্বংসস্যাধর্ম এব হেতুর্ভবতি| যেঽতিপ্রবৃদ্ধলোভক্রোধমোহমানাস্তে দুর্বলানবমত্যাত্মস্বজনপরোপঘাতায শস্ত্রেণ পরস্পরমভিক্রামন্তি, পরান্ বাঽভিক্রামন্তি, পরৈর্বাঽভিক্রাম্যন্তে||২১||
तथा शस्त्रप्रभवस्यापि जनपदोद्ध्वंसस्याधर्म एव हेतुर्भवति| येऽतिप्रवृद्धलोभक्रोधमोहमानास्ते दुर्बलानवमत्यात्मस्वजनपरोपघाताय शस्त्रेण परस्परमभिक्रामन्ति, परान् वाऽभिक्रामन्ति, परैर्वाऽभिक्राम्यन्ते||२१||
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Adhikarana 11 (22) · Śloka 22
রক্ষোগণাদিভির্বা বিবিধৈর্ভূতসঙ্ঘৈস্তমধর্মমন্যদ্বাঽপ্যপচারান্তরমুপলভ্যাভিহন্যন্তে||২২||
रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्घैस्तमधर्ममन्यद्वाऽप्यपचारान्तरमुपलभ्याभिहन्यन्ते||२२||
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Adhikarana 12 (23) · Śloka 23
তথাঽভিশাপপ্রভবস্যাপ্যধর্ম এব হেতুর্ভবতি| যে লুপ্তধর্মাণো ধর্মাদপেতাস্তে গুরুবৃদ্ধসিদ্ধর্ষিপূজ্যানবমত্যাহিতান্যাচরন্তি; ততস্তাঃ প্রজা গুর্বাদিভিরভিশপ্তা ভস্মতামুপযান্তি প্রাগেবানেকপুরুষকুলবিনাশায, নিযতপ্রত্যযোপলম্ভাদনিযতাশ্চাপরে ||২৩||
तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति| ये लुप्तधर्माणो धर्मादपेतास्ते गुरुवृद्धसिद्धर्षिपूज्यानवमत्याहितान्याचरन्ति; ततस्ताः प्रजा गुर्वादिभिरभिशप्ता भस्मतामुपयान्ति प्रागेवानेकपुरुषकुलविनाशाय, नियतप्रत्ययोपलम्भादनियताश्चापरे ||२३||
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Adhikarana 13 (24) · Śloka 24
প্রাগপি চাধর্মাদৃতে নাশুভোত্পত্তিরন্যতোঽভূত্| আদিকালে হ্যদিতিসুতসমৌজসোঽতিবিমলবিপুলপ্রভাবাঃ প্রত্যক্ষদেবদেবর্ষিধর্মযজ্ঞবিধিবিধানাঃ শৈলসারসংহতস্থিরশরীরাঃ প্রসন্নবর্ণেন্দ্রিযাঃ পবনসমবলজবপরাক্রমাশ্চারুস্ফিচোঽভিরূপপ্রমাণাকৃতিপ্রসাদোপচযবন্তঃ সত্যার্জবানৃশংস্যদানদমনিযমতপোপবাসব্রহ্মচর্যব্রতপরা ব্যপগতভযরাগদ্বেষমোহলোভক্রোধশোকমানরোগনিদ্রাতন্দ্রাশ্রমক্লমালস্যপরিগ্রহাশ্চ পুরুষা বভূবুরমিতাযুষঃ| তেষামুদারসত্ত্বগুণকর্মণামচিন্ত্যরসবীর্যবিপাকপ্রভাবগুণসমুদিতানি প্রাদুর্বভূবুঃ শস্যানি সর্বগুণসমুদিতত্বাত্ পৃথিব্যাদীনাং কৃতযুগস্যাদৌ| ভ্রশ্যতি তু কৃতযুগে কেষাঞ্চিদত্যাদানাত্ সাম্পন্নিকানাং সত্ত্বানাং শরীরগৌরবমাসীত্, শরীরগৌরবাচ্ছ্রমঃ, শ্রমাদালস্যম্, আলস্যাত্ সঞ্চযঃ, সঞ্চযাত্ পরিগ্রহঃ, পরিগ্রহাল্লোভঃ প্রাদুরাসীত্ কৃতে| ততস্ত্রেতাযাং লোভাদভিদ্রোহঃ, অভিদ্রোহানৃতবচনম্, অনৃতবচনাত্ কামক্রোধমানদ্বেষপারুষ্যাভিঘাতভযতাপশোকচিন্তোদ্বেগাদযঃ প্রবৃত্তাঃ| ততস্ত্রেতাযাং ধর্মপাদোঽন্তর্ধানমগমত্| তস্যান্তর্ধানাত্ যুগবর্ষপ্রমাণস্য পাদহ্রাসঃ, পৃথিব্যাদেশ্চ গুণপাদপ্রণাশোঽভূত্| তত্প্রণাশকৃতশ্চ শস্যানাং স্নেহবৈমল্যরসবীর্যবিপাকপ্রভাবগুণপাদভ্রাংশঃ| ততস্তানি প্রজাশরীরাণি হীযমানগুণপাদৈরাহারবিহারৈরযথাপূর্বমুপষ্টভ্যমানান্যগ্নিমারুতপরীতানি প্রাগ্ব্যাধিভির্জ্বরাদিভিরাক্রান্তানি| অতঃ প্রাণিনো হ্রাসমবাপুরাযুষঃ ক্রমশ ইতি||২৪||
प्रागपि चाधर्मादृते नाशुभोत्पत्तिरन्यतोऽभूत्| आदिकाले ह्यदितिसुतसमौजसोऽतिविमलविपुलप्रभावाः प्रत्यक्षदेवदेवर्षिधर्मयज्ञविधिविधानाः शैलसारसंहतस्थिरशरीराः प्रसन्नवर्णेन्द्रियाः पवनसमबलजवपराक्रमाश्चारुस्फिचोऽभिरूपप्रमाणाकृतिप्रसादोपचयवन्तः सत्यार्जवानृशंस्यदानदमनियमतपोपवासब्रह्मचर्यव्रतपरा व्यपगतभयरागद्वेषमोहलोभक्रोधशोकमानरोगनिद्रातन्द्राश्रमक्लमालस्यपरिग्रहाश्च पुरुषा बभूवुरमितायुषः| तेषामुदारसत्त्वगुणकर्मणामचिन्त्यरसवीर्यविपाकप्रभावगुणसमुदितानि प्रादुर्बभूवुः शस्यानि सर्वगुणसमुदितत्वात् पृथिव्यादीनां कृतयुगस्यादौ| भ्रश्यति तु कृतयुगे केषाञ्चिदत्यादानात् साम्पन्निकानां सत्त्वानां शरीरगौरवमासीत्, शरीरगौरवाच्छ्रमः, श्रमादालस्यम्, आलस्यात् सञ्चयः, सञ्चयात् परिग्रहः, परिग्रहाल्लोभः प्रादुरासीत् कृते| ततस्त्रेतायां लोभादभिद्रोहः, अभिद्रोहानृतवचनम्, अनृतवचनात् कामक्रोधमानद्वेषपारुष्याभिघातभयतापशोकचिन्तोद्वेगादयः प्रवृत्ताः| ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमगमत्| तस्यान्तर्धानात् युगवर्षप्रमाणस्य पादह्रासः, पृथिव्यादेश्च गुणपादप्रणाशोऽभूत्| तत्प्रणाशकृतश्च शस्यानां स्नेहवैमल्यरसवीर्यविपाकप्रभावगुणपादभ्रांशः| ततस्तानि प्रजाशरीराणि हीयमानगुणपादैराहारविहारैरयथापूर्वमुपष्टभ्यमानान्यग्निमारुतपरीतानि प्राग्व्याधिभिर्ज्वरादिभिराक्रान्तानि| अतः प्राणिनो ह्रासमवापुरायुषः क्रमश इति||२४||
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Adhikarana 14 (25-27) · Śloka 27
ভবতশ্চাত্র- যুগে যুগে ধর্মপাদঃ ক্রমেণানেন হীযতে| গুণপাদশ্চ ভূতানামেবং লোকঃ প্রলীযতে||২৫|| সংবত্সরশতে পূর্ণে যাতি সংবত্সরঃ ক্ষযম্| দেহিনামাযুষঃ কালে যত্র যন্মানমিষ্যতে||২৬|| ইতি বিকারাণাং প্রাগুত্পত্তিহেতুরুক্তো ভবতি||২৭||
भवतश्चात्र- युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते| गुणपादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते||२५|| संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम्| देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते||२६|| इति विकाराणां प्रागुत्पत्तिहेतुरुक्तो भवति||२७||
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Adhikarana 15 (28-32) · Śloka 33
এবংবাদিনং ভগবন্তমগ্নিবেশ উবাচ- কিন্নু খলু ভগবন্! নিযতকালপ্রমাণমাযুঃ সর্বং ন বেতি||২৮|| তং ভগবানুবাচ- ইহাগ্নিবেশ! ভূতানামাযুর্যুক্তিমপেক্ষতে| দৈবে পুরুষকারে চ স্থিতং হ্যস্য বলাবলম্||২৯|| দৈবমাত্মকৃতং বিদ্যাত্ কর্ম যত্ পৌর্বদৈহিকম্| স্মৃতঃ পুরুষকারস্তু ক্রিযতে যদিহাপরম্||৩০|| বলাবলবিশেষোঽস্তি তযোরপি চ কর্মণোঃ| দৃষ্টং হি ত্রিবিধং কর্ম হীনং মধ্যমমুত্তমম্||৩১|| তযোরুদারযোর্যুক্তির্দীর্ঘস্য চ সুখস্য চ| নিযতস্যাযুষো হেতুর্বিপরীতস্য চেতরা||৩২|| মধ্যমা মধ্যমস্যেষ্টা কারণং শৃণু চাপরম্|৩৩|
एवंवादिनं भगवन्तमग्निवेश उवाच- किन्नु खलु भगवन्! नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं न वेति||२८|| तं भगवानुवाच- इहाग्निवेश! भूतानामायुर्युक्तिमपेक्षते| दैवे पुरुषकारे च स्थितं ह्यस्य बलाबलम्||२९|| दैवमात्मकृतं विद्यात् कर्म यत् पौर्वदैहिकम्| स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम्||३०|| बलाबलविशेषोऽस्ति तयोरपि च कर्मणोः| दृष्टं हि त्रिविधं कर्म हीनं मध्यममुत्तमम्||३१|| तयोरुदारयोर्युक्तिर्दीर्घस्य च सुखस्य च| नियतस्यायुषो हेतुर्विपरीतस्य चेतरा||३२|| मध्यमा मध्यमस्येष्टा कारणं शृणु चापरम्|३३|
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Adhikarana 16 (33-35) · Śloka 35
দৈবং পুরুষকারেণ দুর্বলং হ্যুপহন্যতে||৩৩|| দৈবেন চেতরত্ কর্ম বিশিষ্টেনোপহন্যতে| দৃষ্ট্বা যদেকে মন্যন্তে নিযতং মানমাযুষঃ||৩৪|| কর্ম কিঞ্চিত্ ক্বচিত্ কালে বিপাকে নিযতং মহত্| কিঞ্চিত্ত্বকালনিযতং প্রত্যযৈঃ প্রতিবোধ্যতে||৩৫||
दैवं पुरुषकारेण दुर्बलं ह्युपहन्यते||३३|| दैवेन चेतरत् कर्म विशिष्टेनोपहन्यते| दृष्ट्वा यदेके मन्यन्ते नियतं मानमायुषः||३४|| कर्म किञ्चित् क्वचित् काले विपाके नियतं महत्| किञ्चित्त्वकालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते||३५||
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Adhikarana 17 (36) · Śloka 36
তস্মাদুভযদৃষ্টত্বাদেকান্তগ্রহণমসাধু| নিদর্শনমপি চাত্রোদাহরিষ্যমঃ- যদি হি নিযতকালপ্রমাণমাযুঃ সর্বং স্যাত্, তদাঽঽযুষ্কামাণাং ন মন্ত্রৌষধিমণিমঙ্গলবল্যুপহারহোমনিযমপ্রাযশ্চিত্তোপবাসস্বস্ত্যযনপ্রণিপাতগমনাদ্যাঃ ক্রিযা ইষ্টযশ্চ প্রযোজ্যেরন্; নোদ্ভ্রান্তচণ্ডচপলগোজোষ্ট্রখরতুরগমহিষাদযঃ পবনাদযশ্চ দুষ্টাঃ পরিহার্যাঃ স্যুঃ, ন প্রপাতগিরিবিষমদুর্গাম্বুবেগাঃ, তথা ন প্রমত্তোন্মত্তোদ্ভান্তচণ্ডচপলমোহলোভাকুলমতযঃ, নারযঃ, ন প্রবৃদ্ধোঽগ্নিঃ, চ বিবিধবিষাশ্রযাঃ সরীসৃপোরগাদযঃ, ন সাহসং, নাদেশকালচর্যা, ন নরেন্দ্রপ্রকোপ ইতি; এবমাদযো হি ভাবা নাভাবকরাঃ স্যুঃ, আযুষঃ সর্বস্য নিযতকালপ্রমাণত্বাত্| ন চানভ্যস্তাকালমরণভযনিবারকাণামকালমরণভযমাগচ্ছেত্ প্রণিনাং, ব্যর্থাশ্চারম্ভকথাপ্রযোগবুদ্ধযঃ স্যুর্মহর্ষীণাং রসাযনাধিকারে, নাপীন্দ্রো নিযতাযুষং শত্রুং বজ্রেণাভিহন্যাত্, নাশ্বিনাবার্তং ভেষজেনোপপাদযেতাং , ন মহর্ষযো যথেষ্টমাযুস্তপসা প্রাপ্নুযুঃ, ন চ বিদিতবেদিতব্যা মহর্ষযঃ সসুরেশাঃ সম্যক্ পশ্যেযুরুপদিশেযুরাচরেযুর্বা| অপি চ সর্বচক্ষুষামেতত্ পরং যদৈন্দ্রং চক্ষুঃ , ইদং চাপ্যস্মাকং তেন প্রত্যক্ষং; যথা- পুরুষসহস্রাণামুত্থাযোত্থাযাহবং কুর্বতামকুর্বতাং চাতুল্যাযুষ্ট্বং, তথা জাতমাত্রাণামপ্রতীকারাত্ প্রতীকারাচ্চ, অবিষবিষপ্রাশিনাং চাপ্যতুল্যাযুষ্ট্বমেব, ন চ তুল্যো যোগক্ষেম উদপানঘটানাং চিত্রঘটানাং চোত্সীদতাং; তস্মাদ্ধিতোপচারমূলং জীবিতম্, অতো বিপর্যযান্মৃত্যুঃ| অপি চ দেশকালাত্মগুণবিপরীতানাং কর্মণামাহারবিকারাণাং চ ক্রমোপযোগঃ সম্যক্, ত্যাগঃ সর্বস্য চাতিযোগাযোগমিথ্যাযোগানাং, সর্বাতিযোগসন্ধারণম্ , অসন্ধারণমুদীর্ণানাং চ গতিমতাং, সাহসানাং চ বর্জনম্, আরোগ্যানুবৃত্তৌ হেতুমুপলভামহে সম্যগুপদিশামঃ সম্যক্ পশ্যামশ্চেতি||৩৬||
तस्मादुभयदृष्टत्वादेकान्तग्रहणमसाधु| निदर्शनमपि चात्रोदाहरिष्यमः- यदि हि नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं स्यात्, तदाऽऽयुष्कामाणां न मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनाद्याः क्रिया इष्टयश्च प्रयोज्येरन्; नोद्भ्रान्तचण्डचपलगोजोष्ट्रखरतुरगमहिषादयः पवनादयश्च दुष्टाः परिहार्याः स्युः, न प्रपातगिरिविषमदुर्गाम्बुवेगाः, तथा न प्रमत्तोन्मत्तोद्भान्तचण्डचपलमोहलोभाकुलमतयः, नारयः, न प्रवृद्धोऽग्निः, च विविधविषाश्रयाः सरीसृपोरगादयः, न साहसं, नादेशकालचर्या, न नरेन्द्रप्रकोप इति; एवमादयो हि भावा नाभावकराः स्युः, आयुषः सर्वस्य नियतकालप्रमाणत्वात्| न चानभ्यस्ताकालमरणभयनिवारकाणामकालमरणभयमागच्छेत् प्रणिनां, व्यर्थाश्चारम्भकथाप्रयोगबुद्धयः स्युर्महर्षीणां रसायनाधिकारे, नापीन्द्रो नियतायुषं शत्रुं वज्रेणाभिहन्यात्, नाश्विनावार्तं भेषजेनोपपादयेतां , न महर्षयो यथेष्टमायुस्तपसा प्राप्नुयुः, न च विदितवेदितव्या महर्षयः ससुरेशाः सम्यक् पश्येयुरुपदिशेयुराचरेयुर्वा| अपि च सर्वचक्षुषामेतत् परं यदैन्द्रं चक्षुः , इदं चाप्यस्माकं तेन प्रत्यक्षं; यथा- पुरुषसहस्राणामुत्थायोत्थायाहवं कुर्वतामकुर्वतां चातुल्यायुष्ट्वं, तथा जातमात्राणामप्रतीकारात् प्रतीकाराच्च, अविषविषप्राशिनां चाप्यतुल्यायुष्ट्वमेव, न च तुल्यो योगक्षेम उदपानघटानां चित्रघटानां चोत्सीदतां; तस्माद्धितोपचारमूलं जीवितम्, अतो विपर्ययान्मृत्युः| अपि च देशकालात्मगुणविपरीतानां कर्मणामाहारविकाराणां च क्रमोपयोगः सम्यक्, त्यागः सर्वस्य चातियोगायोगमिथ्यायोगानां, सर्वातियोगसन्धारणम् , असन्धारणमुदीर्णानां च गतिमतां, साहसानां च वर्जनम्, आरोग्यानुवृत्तौ हेतुमुपलभामहे सम्यगुपदिशामः सम्यक् पश्यामश्चेति||३६||
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Adhikarana 18 (37) · Śloka 37
অতঃ পরমগ্নিবেশ উবাচ- এবং সত্যনিযতকালপ্রমাণাযুষাং ভগবন্! কথং কালমৃত্যুরকালমৃত্যুর্বাভবতীতি||৩৭||
अतः परमग्निवेश उवाच- एवं सत्यनियतकालप्रमाणायुषां भगवन्! कथं कालमृत्युरकालमृत्युर्वाभवतीति||३७||
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Adhikarana 19 (38) · Śloka 38
তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- শ্রূযতামগ্নিবেশ! যথা যানসমাযুক্তোঽক্ষঃ প্রকৃত্যৈবাক্ষগুণৈরুপেতঃ স চ সর্বগুণোপপন্নো বাহ্যমানো যথাকালং স্বপ্রমাণক্ষযাদেবাবসানং গচ্ছেত্, তথাঽঽযুঃ শরীরোপগতং বলবত্প্রকৃত্যা যথাবদুপচর্যমাণং স্বপ্রমাণক্ষযাদেবাবসানং গচ্ছতি; স মৃত্যুঃ কালে| যথা চ স এবাক্ষোঽতিভারাধিষ্ঠিতত্বাদ্বিষমপথাদপথাদক্ষচক্রভঙ্গাদ্বাহ্যবাহকদোষাদণিমোক্ষাদনুপাঙ্গাত্ পর্যসনাচ্চান্তরাঽবসানমাপদ্যতে, তথাঽঽযুরপ্যযথাবলমারম্ভাদযথাগ্ন্যভ্যবহরণাদ্বিষমাভ্যাবহরণাদ্বিষমশরীরন্যাসাদতিমৈথুনাদসত্সংশ্রযাদুদীর্ণ- বেগবিনিগ্রহাদ্বিধার্যবেগাবিধারণাদ্ভূতবিষবায্বগ্ন্যুপতাপাদভিঘাতাদাহারপ্রতীকারবিবর্জনাচ্চান্তরাঽবসানমাপদ্যতে, স মৃত্যুরকালে; তথা জ্বরাদীনপ্যাতঙ্কান্মিথ্যোপচরিতানকালমৃত্যূন্ পশ্যাম ইতি||৩৮||
तमुवाच भगवानात्रेयः- श्रूयतामग्निवेश! यथा यानसमायुक्तोऽक्षः प्रकृत्यैवाक्षगुणैरुपेतः स च सर्वगुणोपपन्नो वाह्यमानो यथाकालं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छेत्, तथाऽऽयुः शरीरोपगतं बलवत्प्रकृत्या यथावदुपचर्यमाणं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छति; स मृत्युः काले| यथा च स एवाक्षोऽतिभाराधिष्ठितत्वाद्विषमपथादपथादक्षचक्रभङ्गाद्वाह्यवाहकदोषादणिमोक्षादनुपाङ्गात् पर्यसनाच्चान्तराऽवसानमापद्यते, तथाऽऽयुरप्ययथाबलमारम्भादयथाग्न्यभ्यवहरणाद्विषमाभ्यावहरणाद्विषमशरीरन्यासादतिमैथुनादसत्संश्रयादुदीर्ण- वेगविनिग्रहाद्विधार्यवेगाविधारणाद्भूतविषवाय्वग्न्युपतापादभिघातादाहारप्रतीकारविवर्जनाच्चान्तराऽवसानमापद्यते, स मृत्युरकाले; तथा ज्वरादीनप्यातङ्कान्मिथ्योपचरितानकालमृत्यून् पश्याम इति||३८||
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Adhikarana 20 (39) · Śloka 39
অথাগ্নিবেশঃ পপ্রচ্ছ- কিন্নু খলু ভগবন্! জ্বরিতেভ্যঃ পানীযমুষ্ণং প্রযচ্ছন্তি ভিষজো ভূযিষ্ঠং ন তথা শীতম্, অস্তি চ শীতসাধ্যোঽপি ধাতুর্জ্বরকর ইতি||৩৯||
अथाग्निवेशः पप्रच्छ- किन्नु खलु भगवन्! ज्वरितेभ्यः पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठं न तथा शीतम्, अस्ति च शीतसाध्योऽपि धातुर्ज्वरकर इति||३९||
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Adhikarana 21 (40) · Śloka 40
তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- জ্বরিতস্য কাযসমুত্থানদেশকালানভিসমীক্ষ্য পাচনার্থং পানীযমুষ্ণং প্রযচ্ছন্তি ভিষজঃ| জ্বরো হ্যামাশযসমুত্থঃ, প্রাযো ভেষজানি চামাশযসমুত্থানাং বিকারাণাং পাচনবমনাপতর্পণসমর্থানি ভবন্তি; পাচনার্থং চ পানীযমুষ্ণং, তস্মাদেতজ্জ্বরিতেভ্যঃ প্রযচ্ছন্তি ভিষজো ভূযিষ্ঠম্| তদ্ধি তেষাং পীতং বাতমনুলোমযতি, অগ্নিং চোদর্যমুদীরযতি, ক্ষিপ্রং জরাং গচ্ছতি, শ্লেষ্মাণং পরিশোষযতি, স্বল্পমপি চ পীতং তৃষ্ণাপ্রশমনাযোপকল্পতে; তথাযুক্তমপি চৈতন্নাত্যর্থোত্সন্নপিত্তে জ্বরে সদাহভ্রমপ্রলাপাতিসারে বা প্রদেযম্, উষ্ণেন হি দাহভ্রমপ্রলাপাতিসারা ভূযোঽভিবর্ধন্তে, শীতেন চোপশাম্যন্তীতি||৪০||
तमुवाच भगवानात्रेयः- ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकालानभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः| ज्वरो ह्यामाशयसमुत्थः, प्रायो भेषजानि चामाशयसमुत्थानां विकाराणां पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति; पाचनार्थं च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठम्| तद्धि तेषां पीतं वातमनुलोमयति, अग्निं चोदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं परिशोषयति, स्वल्पमपि च पीतं तृष्णाप्रशमनायोपकल्पते; तथायुक्तमपि चैतन्नात्यर्थोत्सन्नपित्ते ज्वरे सदाहभ्रमप्रलापातिसारे वा प्रदेयम्, उष्णेन हि दाहभ्रमप्रलापातिसारा भूयोऽभिवर्धन्ते, शीतेन चोपशाम्यन्तीति||४०||
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Adhikarana 22 (41) · Śloka 41
ভবতি চাত্র- শীতেনোষ্ণকৃতান্ রোগাঞ্ছমযন্তি ভিষগ্বিদঃ| যে তু শীতকৃতা রোগাস্তেষামুষ্ণং ভিষগ্জিতম্||৪১||
भवति चात्र- शीतेनोष्णकृतान् रोगाञ्छमयन्ति भिषग्विदः| ये तु शीतकृता रोगास्तेषामुष्णं भिषग्जितम्||४१||
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Adhikarana 23 (42-44) · Śloka 44
এবমিতরেষামপি ব্যাধীনাং নিদানবিপরীতং ভেষজং ভবতি; যথা- অপতর্পণনিমিত্তানাং ব্যাধীনাং নান্তরেণ পূরণমস্তি শান্তিঃ, তথা পূরণনিমিত্তানাং ব্যাধীনাং নান্তরেণাপতর্পণম্||৪২|| অপতর্পণমপি চ ত্রিবিধং- লঙ্ঘনং, লঙ্ঘনপাচনং, দোষাবসেচনং চেতি||৪৩|| তত্র লঙ্ঘনমল্পবলদোষাণাং , লঙ্ঘনেন হ্যগ্নিমারুতবৃদ্ধ্যা বাতাতপপরীতমিবাল্পমুদকমল্পো দোষঃ প্রশোষমাপদ্যতে; লঙ্ঘনপাচনে তু মধ্যবলদোষাণাং, লঙ্ঘনপাচনাভ্যাং হি সূর্যসন্তাপমারুতাভ্যাং পাংশুভস্মাবকিরণৈরিব চানতিবহূদকং মধ্যবলো দোষঃ প্রশোষমাপদ্যতে; বহুদোষাণাং পুনর্দোষাবসেচনমেব কার্যং, ন হ্যভিন্নে কেদারসেতৌ পল্বলাপ্রসেকোঽস্তি, তদ্বদ্দোষাবসেচনম্||৪৪||
एवमितरेषामपि व्याधीनां निदानविपरीतं भेषजं भवति; यथा- अपतर्पणनिमित्तानां व्याधीनां नान्तरेण पूरणमस्ति शान्तिः, तथा पूरणनिमित्तानां व्याधीनां नान्तरेणापतर्पणम्||४२|| अपतर्पणमपि च त्रिविधं- लङ्घनं, लङ्घनपाचनं, दोषावसेचनं चेति||४३|| तत्र लङ्घनमल्पबलदोषाणां , लङ्घनेन ह्यग्निमारुतवृद्ध्या वातातपपरीतमिवाल्पमुदकमल्पो दोषः प्रशोषमापद्यते; लङ्घनपाचने तु मध्यबलदोषाणां, लङ्घनपाचनाभ्यां हि सूर्यसन्तापमारुताभ्यां पांशुभस्मावकिरणैरिव चानतिबहूदकं मध्यबलो दोषः प्रशोषमापद्यते; बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेव कार्यं, न ह्यभिन्ने केदारसेतौ पल्वलाप्रसेकोऽस्ति, तद्वद्दोषावसेचनम्||४४||
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Adhikarana 24 (45) · Śloka 45
দোষাবসেচনমন্যদ্বা ভেষজং প্রাপ্তকালমপ্যাতুরস্য নৈবংবিধস্য কুর্যাত্| তদ্যথা- অনপবাদপ্রতীকারস্যাধনস্যাপরিচারকস্য বৈদ্যমানিনশ্চণ্ডস্যাসূযকস্য তীব্রাধর্মারুচেরতিক্ষীণবলমাংসশোণিতস্যাসাধ্যরোগোপহতস্য মুমূর্ষুলিঙ্গান্বিতস্য চেতি| এবংবিধং হ্যাতুরমুপচরন্ ভিষক্ পাপীযসাঽযশসা যোগমৃচ্ছতীতি||৪৫||
दोषावसेचनमन्यद्वा भेषजं प्राप्तकालमप्यातुरस्य नैवंविधस्य कुर्यात्| तद्यथा- अनपवादप्रतीकारस्याधनस्यापरिचारकस्य वैद्यमानिनश्चण्डस्यासूयकस्य तीव्राधर्मारुचेरतिक्षीणबलमांसशोणितस्यासाध्यरोगोपहतस्य मुमूर्षुलिङ्गान्वितस्य चेति| एवंविधं ह्यातुरमुपचरन् भिषक् पापीयसाऽयशसा योगमृच्छतीति||४५||
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Adhikarana 25 (46-48) · Śloka 48
ভবতি চাত্র- তদাত্বে চানুবন্ধে বা যস্য স্যাদশুভং ফলম্| কর্মণস্তন্ন কর্তব্যমেতদ্বুদ্ধিমতাং মতম্||৪৬|| (অল্পোদকদ্রুমো যস্তু প্রবাতঃ প্রচুরাতপঃ| জ্ঞেযঃ স জাঙ্গলো দেশঃ স্বল্পরোগতমোঽপি চ||৪৭|| প্রচুরোদকবৃক্ষো যো নিবাতো দুর্লভাতপঃ| অনূপো বহুদোষশ্চ, সমঃ সাধারণো মতঃ)||৪৮||
भवति चात्र- तदात्वे चानुबन्धे वा यस्य स्यादशुभं फलम्| कर्मणस्तन्न कर्तव्यमेतद्बुद्धिमतां मतम्||४६|| (अल्पोदकद्रुमो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः| ज्ञेयः स जाङ्गलो देशः स्वल्परोगतमोऽपि च||४७|| प्रचुरोदकवृक्षो यो निवातो दुर्लभातपः| अनूपो बहुदोषश्च, समः साधारणो मतः)||४८||
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Adhikarana 26 (49-52) · Śloka 52
তত্র শ্লোকাঃ- পূর্বরূপাণি সামান্যা হেতবঃ সস্বলক্ষণাঃ| দেশোদ্ধ্বংসস্য ভৈষজ্যং হেতূনাং মূলমেব চ||৪৯|| প্রাগ্বিকারসমুত্পত্তিরাযুষশ্চ ক্ষযক্রমঃ| মরণং প্রতি ভূতানাং কালাকালবিনিশ্চযঃ||৫০|| যথা চাকালমরণং যথাযুক্তং চ ভেষজম্| সিদ্ধিং যাত্যৌষধং যেষাং ন কুর্যাদ্যেন হেতুনা||৫১|| তদাত্রেযোঽগ্নিবেশায নিখিলং সর্বমুক্তবান্| দেশোদ্ধ্বংসনিমিত্তীযে বিমানে মুনিসত্তমঃ||৫২||
तत्र श्लोकाः- पूर्वरूपाणि सामान्या हेतवः सस्वलक्षणाः| देशोद्ध्वंसस्य भैषज्यं हेतूनां मूलमेव च||४९|| प्राग्विकारसमुत्पत्तिरायुषश्च क्षयक्रमः| मरणं प्रति भूतानां कालाकालविनिश्चयः||५०|| यथा चाकालमरणं यथायुक्तं च भेषजम्| सिद्धिं यात्यौषधं येषां न कुर्याद्येन हेतुना||५१|| तदात्रेयोऽग्निवेशाय निखिलं सर्वमुक्तवान्| देशोद्ध्वंसनिमित्तीये विमाने मुनिसत्तमः||५२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 3
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে বিমানস্থানে জনপদোদ্ধ্বংসনীযবিমানং নাম তৃতীযোঽধ্যাযঃ||৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने जनपदोद्ध्वंसनीयविमानं नाम तृतीयोऽध्यायः||३||
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