Adhikarana pratij~jA (1) · Śloka 1
অথাতঃ স্নপনাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ| ইতি হ স্মাহুরাত্রে যাদযো মহর্ষযঃ||১||
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अथातः स्नपनाध्यायं व्याख्यास्यामः| इति ह स्माहुरात्रे यादयो महर्षयः||१||
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Adhikarana pratij~jA (1) · Śloka 1
অথাতঃ স্নপনাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ| ইতি হ স্মাহুরাত্রে যাদযো মহর্ষযঃ||১||
अथातः स्नपनाध्यायं व्याख्यास्यामः| इति ह स्माहुरात्रे यादयो महर्षयः||१||
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Adhikarana snapanasthAnam (2) · Śloka 2
সরিত্সঙ্গমগোতীর্থগজেন্দ্রস্কন্ধগোকুলে| চতুষ্পথে চ স্নপযেদ্বালং সস্তন্যমাতরম্| শ্মশানে দীর্ঘরোগার্ত্তং মৃতাপত্যাং চ যোষিতম্||২||
सरित्सङ्गमगोतीर्थगजेन्द्रस्कन्धगोकुले| चतुष्पथे च स्नपयेद्बालं सस्तन्यमातरम्| श्मशाने दीर्घरोगार्त्तं मृतापत्यां च योषितम्||२||
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Adhikarana snapanayogyA mahI (3) · Śloka 3
দূর্বাক্ষীরিদ্রুমবতী প্রাগুদক্প্রবণা মহী| স্নিগ্ধনীরুজপুষ্পাঢ্যপাদপা স্নপনে শুভা||৩||
दूर्वाक्षीरिद्रुमवती प्रागुदक्प्रवणा मही| स्निग्धनीरुजपुष्पाढ्यपादपा स्नपने शुभा||३||
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Adhikarana snapanayogyaH kAlaH (4) · Śloka 4
রেবতীশ্রবণস্বাতীপ্রাজাপত্যোত্তরৈন্দেবে| পুষ্যে মূলে চ বালস্য স্নানং পর্বদিনেষু চ||৪||
रेवतीश्रवणस्वातीप्राजापत्योत्तरैन्देवे| पुष्ये मूले च बालस्य स्नानं पर्वदिनेषु च||४||
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Adhikarana snapanasthale maNDalanirmANam (5) · Śloka 5
চতুর্হস্তাষ্টহস্তং বা দ্বাত্রিংশদ্ধস্তমেব বা| নল্বমাত্রপ্রমাণং বা ত্রিবর্ণং মণ্ডলং লিখেত্| গোচর্মচাপেষুমিতস্ত্রিবিধো নল্ব উচ্যতে| চতুরস্রং চতুর্দ্বারং পতাকাভিরলঙ্কৃতম্| আকীর্ণং পরিতো দূর্বাসিদ্ধার্থকযবাঙ্কুরৈঃ||৫||
चतुर्हस्ताष्टहस्तं वा द्वात्रिंशद्धस्तमेव वा| नल्वमात्रप्रमाणं वा त्रिवर्णं मण्डलं लिखेत्| गोचर्मचापेषुमितस्त्रिविधो नल्व उच्यते| चतुरस्रं चतुर्द्वारं पताकाभिरलङ्कृतम्| आकीर्णं परितो दूर्वासिद्धार्थकयवाङ्कुरैः||५||
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Adhikarana maNDale devatA~gkanam (6) · Śloka 6
ক্রমাত্প্রাচ্যাদিষু লিখেদ্গজারূঢং পুরন্দরম্| ধর্মরাজং মহিষগং চক্রাহ্বস্থমপাম্পতিম্| ধনদং চ গদাপাণিং যমস্থানমতীত্য চ| মাতৃস্থানং লিখেত্তস্মিন্ সবৃষং নন্দিকেশ্বরম্| সবধ্বনুচরং চাদৌ মৃন্মযং চ বিনাযকম্||৬||
क्रमात्प्राच्यादिषु लिखेद्गजारूढं पुरन्दरम्| धर्मराजं महिषगं चक्राह्वस्थमपाम्पतिम्| धनदं च गदापाणिं यमस्थानमतीत्य च| मातृस्थानं लिखेत्तस्मिन् सवृषं नन्दिकेश्वरम्| सवध्वनुचरं चादौ मृन्मयं च विनायकम्||६||
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Adhikarana maNDale vividhacihnAnAma~gkanam (7) · Śloka 7
অতীত্য বরুণাবাসং সহস্রারং নিবেশযেত্| বিষ্ণুপ্রহরণং চক্রং সর্ববিঘ্ননিবারণম্| সুরযক্ষেশযোর্মধ্যে পদ্মহস্তালযাং শ্রিযম্| নন্দ্যাবর্তাঙ্কুশাদর্শমত্স্যস্বস্তিকতোরণম্| শঙ্খং চ দক্ষিণাবর্তং শ্রীবত্সং মাল্যদাম চ| ইন্দ্রাদীনাং পরীবারমৈশান্যাদি বিদিক্ষু চ||৭||
अतीत्य वरुणावासं सहस्रारं निवेशयेत्| विष्णुप्रहरणं चक्रं सर्वविघ्ननिवारणम्| सुरयक्षेशयोर्मध्ये पद्महस्तालयां श्रियम्| नन्द्यावर्ताङ्कुशादर्शमत्स्यस्वस्तिकतोरणम्| शङ्खं च दक्षिणावर्तं श्रीवत्सं माल्यदाम च| इन्द्रादीनां परीवारमैशान्यादि विदिक्षु च||७||
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Adhikarana maNDale rAkShasInAma~gkanam (8) · Śloka 8
লম্বোদরী লম্বভুজা লম্বকর্ণী চ রাক্ষসী| ইন্দ্রদ্বারে নিবেশ্যাঃ স্যুর্যমদ্বারে প্রলম্বিনী| লম্বকেশ্যপতিদ্বারে কৌবরে লম্বনাসিকা||৮||
लम्बोदरी लम्बभुजा लम्बकर्णी च राक्षसी| इन्द्रद्वारे निवेश्याः स्युर्यमद्वारे प्रलम्बिनी| लम्बकेश्यपतिद्वारे कौबरे लम्बनासिका||८||
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Adhikarana maNDale sha~gkUnAma~gkanam (9) · Śloka 9
ষট্কীলানাযসান্কুর্যাত্সপ্তত্রৈলৌহিকান্ ভিষক্| দ্বৌ চাত্র খাদিরৌ শঙ্কূ চন্দনাম্বুসমুক্ষিতৌ||৯||
षट्कीलानायसान्कुर्यात्सप्तत्रैलौहिकान् भिषक्| द्वौ चात्र खादिरौ शङ्कू चन्दनाम्बुसमुक्षितौ||९||
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Adhikarana maNDale ghaTAnAM niveshanam (10) · Śloka 10
অষ্টৌ ঘটাঃ ষোডশ বা দ্বাত্রিংশদ্ দ্বিগুণা অপি| স্বস্তিকাঙ্কাঃ প্রবালাভা রঙ্গৈরশ্লেষকৈঃ কৃতাঃ| যথার্হৌষধসংযুক্তশুচিতোযপ্রপূরিতাঃ| ক্ষীরিবৃক্ষপলাশাব্জগন্ধমাল্যোপশোভিতাঃ| মণ্ডলস্য চতুদ্বরি কর্তব্যাঃ সুনিবেশিতাঃ||১০||
अष्टौ घटाः षोडश वा द्वात्रिंशद् द्विगुणा अपि| स्वस्तिकाङ्काः प्रवालाभा रङ्गैरश्लेषकैः कृताः| यथार्हौषधसंयुक्तशुचितोयप्रपूरिताः| क्षीरिवृक्षपलाशाब्जगन्धमाल्योपशोभिताः| मण्डलस्य चतुद्वरि कर्तव्याः सुनिवेशिताः||१०||
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Adhikarana ghaTAdiShu hemAdinikShepaNam (11) · Śloka 11
পূর্বেষু প্রক্ষিপেদ্ধেম ততশ্চ মণিমৌক্তিকম্| অপরেষ্বৌষধীবীজানুদক্ষ্বক্ষতসর্ষপান্||১১||
पूर्वेषु प्रक्षिपेद्धेम ततश्च मणिमौक्तिकम्| अपरेष्वौषधीबीजानुदक्ष्वक्षतसर्षपान्||११||
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Adhikarana mRudAdisAmagryAharaNam (12) · Śloka 12
মৃদঃ পবিত্রা রক্ষোঘ্নীরাহরেত সুরালযাত্| হস্তিশালাশ্বশালাভ্যাং শৃঙ্গাটকচতুষ্পথাত্| বল্মীকাগ্রান্নদীতীরাদ্বেশ্যাকোশনৃপালযাত্| গুপ্তিদ্বারাত্সমুদ্রাচ্চ সমিদ্ধং চাগ্নিমাহরেত্| সমিধঃ ক্ষীরিবৃক্ষাণাং গন্ধমাল্যং ঘৃতং মধু| অক্ষতাংস্তণ্ডুলান্ লাজান্ পঞ্চবর্ণোদনং তিলান্||১২||
मृदः पवित्रा रक्षोघ्नीराहरेत सुरालयात्| हस्तिशालाश्वशालाभ्यां शृङ्गाटकचतुष्पथात्| वल्मीकाग्रान्नदीतीराद्वेश्याकोशनृपालयात्| गुप्तिद्वारात्समुद्राच्च समिद्धं चाग्निमाहरेत्| समिधः क्षीरिवृक्षाणां गन्धमाल्यं घृतं मधु| अक्षतांस्तण्डुलान् लाजान् पञ्चवर्णोदनं तिलान्||१२||
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Adhikarana tatra pIThe dhAtrIbAlayorupaveshanam (13) · Śloka 13
ততো মধ্যস্থিতে পদ্মে সহ ধাত্র্যোপবেশযেত্| বালমৌদুম্বরে পীঠে পালাশে বাপ্যুদঙ্মুগ্খম্| আস্তৃতে হরিতৈর্দর্ভৈর্ন তু প্রাচ্যাদিদিঙ্মুখম্||১৩||
ततो मध्यस्थिते पद्मे सह धात्र्योपवेशयेत्| बालमौदुम्बरे पीठे पालाशे वाप्युदङ्मुग्खम्| आस्तृते हरितैर्दर्भैर्न तु प्राच्यादिदिङ्मुखम्||१३||
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Adhikarana tatra samantraM juhuyAt (14) · Śloka 14
উদাহরিষ্যতে মন্ত্রো যঃ স্কন্দবলিকর্মণি| জুহুযাত্তেন তত্রাগ্নিমুদীচ্যাং স্থাপিতং দিশি||১৪||
उदाहरिष्यते मन्त्रो यः स्कन्दबलिकर्मणि| जुहुयात्तेन तत्राग्निमुदीच्यां स्थापितं दिशि||१४||
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Adhikarana vaidyadvArA snapanavidhiH (15) · Śloka 15
ত্রিরাত্রোপোষিতো বৈদ্যঃ শুক্লবাসা জিতেন্দ্রিযঃ| সর্ষপাক্ষতযুক্তাভির্মৃদ্ধির্গাত্রাণি মার্জযেত্| যথোদিতাভিঃ স্নপযেদ্ ঘটৈঃ প্রাচ্যাদিদিক্স্থিতৈঃ| ক্রমাত্ প্রদক্ষিণোত্ক্ষিপ্তঃ ....................||১৫||
त्रिरात्रोपोषितो वैद्यः शुक्लवासा जितेन्द्रियः| सर्षपाक्षतयुक्ताभिर्मृद्धिर्गात्राणि मार्जयेत्| यथोदिताभिः स्नपयेद् घटैः प्राच्यादिदिक्स्थितैः| क्रमात् प्रदक्षिणोत्क्षिप्तः ....................||१५||
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Adhikarana atha mantrAH - tatra prathamakalashamantraH (indrakalashamantraH) (17) · Śloka 17
...................................... তত্র মন্ত্রং প্রযোজযেত্| অমৃতাত্ পূর্বমুত্পন্নমিমং তে কলশং শুভম্| দদাতু ভগবানিন্দ্রো বিজযং নাম নামতঃ| রক্তপীতাম্বরধরৈর্ভূতৈর্বহুভিরন্বিতঃ| রাক্ষসোরগগন্ধর্বপিশাচৈশ্চানুসেবিতঃ| বজ্রঘণ্টাশনিধরৈর্মেঘৈশ্চ বিবিধস্বনৈঃ| দেবসঙ্ঘৈঃ পরিবৃতো গজেন্দ্রস্কন্ধসংশ্রিতঃ| এভিঃ সার্ধং মহানিন্দ্রঃ স্নপনং তেঽনুমন্যতাম্| পূর্বদ্বারে স্থিতং দিব্যং বজ্রমিন্দ্রাজ্ঞযা শুভম্| তত্র সর্বাণি পাপানি নিহন্তা চাপরাজিতঃ| ইন্দ্রায নমঃ স্বাহা| ইন্দ্রাণ্যৈ নমঃ স্বাহা| অপরা- জিতায স্বাহা| মেঘাধিপতযে স্বাহা| দেবাধিপতযে স্বাহা| শতক্রতবে স্বাহা| ১৬(১)|১৭|
...................................... तत्र मन्त्रं प्रयोजयेत्| अमृतात् पूर्वमुत्पन्नमिमं ते कलशं शुभम्| ददातु भगवानिन्द्रो विजयं नाम नामतः| रक्तपीताम्बरधरैर्भूतैर्बहुभिरन्वितः| राक्षसोरगगन्धर्वपिशाचैश्चानुसेवितः| वज्रघण्टाशनिधरैर्मेघैश्च विविधस्वनैः| देवसङ्घैः परिवृतो गजेन्द्रस्कन्धसंश्रितः| एभिः सार्धं महानिन्द्रः स्नपनं तेऽनुमन्यताम्| पूर्वद्वारे स्थितं दिव्यं वज्रमिन्द्राज्ञया शुभम्| तत्र सर्वाणि पापानि निहन्ता चापराजितः| इन्द्राय नमः स्वाहा| इन्द्राण्यै नमः स्वाहा| अपरा- जिताय स्वाहा| मेघाधिपतये स्वाहा| देवाधिपतये स्वाहा| शतक्रतवे स्वाहा| १६(१)|१७|
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Adhikarana dvitIyakalashamantraH (yamakalashamantraH) (16(2)) · Śloka 17
দ্বিতীযং কলশং পুণ্যমাদিত্যসদৃশপ্রভম্| যমো দদাতু ভগবন্ বৈজযন্তং তু নামতঃ| কৃষ্ণাঞ্জননিভৈর্ঘোরৈঃ কৃষ্ণাম্বরধরৈস্তথা| বৃতঃ করালৈর্বিকৃতৈ রাক্ষসৈরুগ্রবিক্রমৈঃ| শ্মশানারণ্যনিলযৈর্মৃতবস্ত্রান্ত্রভূষণৈঃ| ত্বগস্থিমজ্জমাংসাদৈঃ প্রেতৈর্বহুভিরাবৃতঃ| ধর্মরাজো যমঃ শ্রীমান্ সত্যসন্ধো মহাতপাঃ| দিব্যং মহিষমারুহ্য স্নপনং তেঽনুমন্যতাম্| দক্ষিণদ্বারসংস্থস্তে যমদণ্ডঃ প্রতাপবান্| দুঃস্বপ্নং দুষ্কৃতং পাপং সর্বমদ্য হনিষ্যতি| যমায নমঃ স্বাহা| যমদণ্ডায নমঃ স্বাহা| মহিষ বাহনায স্বাহা| প্রেতাধিপতযে স্বাহা| ধর্মাধিপতযে স্বাহা| বৈজযন্তায স্বাহা| ১৬(২)||১৭||
द्वितीयं कलशं पुण्यमादित्यसदृशप्रभम्| यमो ददातु भगवन् वैजयन्तं तु नामतः| कृष्णाञ्जननिभैर्घोरैः कृष्णाम्बरधरैस्तथा| वृतः करालैर्विकृतै राक्षसैरुग्रविक्रमैः| श्मशानारण्यनिलयैर्मृतवस्त्रान्त्रभूषणैः| त्वगस्थिमज्जमांसादैः प्रेतैर्बहुभिरावृतः| धर्मराजो यमः श्रीमान् सत्यसन्धो महातपाः| दिव्यं महिषमारुह्य स्नपनं तेऽनुमन्यताम्| दक्षिणद्वारसंस्थस्ते यमदण्डः प्रतापवान्| दुःस्वप्नं दुष्कृतं पापं सर्वमद्य हनिष्यति| यमाय नमः स्वाहा| यमदण्डाय नमः स्वाहा| महिष वाहनाय स्वाहा| प्रेताधिपतये स्वाहा| धर्माधिपतये स्वाहा| वैजयन्ताय स्वाहा| १६(२)||१७||
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Adhikarana tRutIyakalashamantraH (varuNakalashamantraH) (16(3)) · Śloka 15
জযন্তং জযবৃদ্ধ্যর্থং তৃতীযং কলশং শুভম্| দদাতু মধুরাজস্তে ভগবান্ বরুণঃ স্বযম্| শ্বেতমাল্যাম্বরধরৈঃ শ্বেতগন্ধানুলেপনৈঃ| গন্ধর্বৈঃ পত্রগেন্দ্রৈশ্চ ভগবাননুশোভিতঃ| তীর্থকূপনদীবৃক্ষনিষ্কুটোদ্যানবাসিভিঃ| প্রবলৈঃ কপিলৈঃ মুণ্ডৈর্বিকটৈর্বামনৈস্তথা| বৃতঃ পরিষদৈর্ভূতৈঃ পাশমুদ্গরপাণিভিঃ| এভিঃ সহাদ্য ভগবান্ বরুণস্ত্বাভিষিঞ্চতু| বরুণস্য মহাপাশোঽপ্যপরদ্বারমাশ্রিতঃ| তব পাপং বিহন্ত্যাশু সর্ববিঘ্ননিবারণঃ| বরুণায নমঃ স্বাহা| শ্বেতাম্বরধরায স্বাহা| মকর বাহনায স্বাহা| জযন্তায স্বাহা| ১৬(৩)||১৫||
जयन्तं जयवृद्ध्यर्थं तृतीयं कलशं शुभम्| ददातु मधुराजस्ते भगवान् वरुणः स्वयम्| श्वेतमाल्याम्बरधरैः श्वेतगन्धानुलेपनैः| गन्धर्वैः पत्रगेन्द्रैश्च भगवाननुशोभितः| तीर्थकूपनदीवृक्षनिष्कुटोद्यानवासिभिः| प्रबलैः कपिलैः मुण्डैर्विकटैर्वामनैस्तथा| वृतः परिषदैर्भूतैः पाशमुद्गरपाणिभिः| एभिः सहाद्य भगवान् वरुणस्त्वाभिषिञ्चतु| वरुणस्य महापाशोऽप्यपरद्वारमाश्रितः| तव पापं विहन्त्याशु सर्वविघ्ननिवारणः| वरुणाय नमः स्वाहा| श्वेताम्बरधराय स्वाहा| मकर वाहनाय स्वाहा| जयन्ताय स्वाहा| १६(३)||१५||
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Adhikarana caturthakalashamantraH (dhanadakalashamantraH) (16(4)) · Śloka 13
চতুর্থং কলশং পুণ্যং প্রধানমপরাজিতম্| ধনেশ্বরো মহাবাহুঃ প্রযচ্ছত্বলকাধিপঃ| চিত্রমাল্যাম্বরধরৈশ্চিত্রগন্ধানুলোপনৈঃ| চিত্রমদ্যমদোন্মত্তৈর্যক্ষৈঃ সমুপসেবিতঃ| মুদিতোদ্গীতগন্ধর্বৈঃ সেবিতশ্চাপ্সরোগণৈঃ| স তে বৈশ্রবণঃ শ্রীমান্ স্নপনত্বনুমন্যতাম্| সর্বব্যাধিহরা দীপ্তা দ্বারমুত্তরমাশ্রিতা| গদা তে নাশযত্বদ্য সর্বপাপং দিশো দশ| ধনাধিপতযে স্বাহা| গদাপাণযে স্বাহা| অপরাজিতায স্বাহা| চিত্রাম্বরধরায স্বাহা| ১৬(৪)||১৩||
चतुर्थं कलशं पुण्यं प्रधानमपराजितम्| धनेश्वरो महाबाहुः प्रयच्छत्वलकाधिपः| चित्रमाल्याम्बरधरैश्चित्रगन्धानुलोपनैः| चित्रमद्यमदोन्मत्तैर्यक्षैः समुपसेवितः| मुदितोद्गीतगन्धर्वैः सेवितश्चाप्सरोगणैः| स ते वैश्रवणः श्रीमान् स्नपनत्वनुमन्यताम्| सर्वव्याधिहरा दीप्ता द्वारमुत्तरमाश्रिता| गदा ते नाशयत्वद्य सर्वपापं दिशो दश| धनाधिपतये स्वाहा| गदापाणये स्वाहा| अपराजिताय स्वाहा| चित्राम्बरधराय स्वाहा| १६(४)||१३||
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Adhikarana mantrapAThaH (16(5)) · Śloka 33
আপঃ পবিত্রং লোকেঽস্মিন্নাপো বৈ পরমং শুচিঃ| আপো বৈ দেবতাঃ সর্বা আপস্ত্বামভিষিচ্যতাম্| ব্রহ্মা ব্রহ্মর্ষিভিঃ সার্ধং ভগবাংস্ত্বাভিষিঞ্চতু| স্বাহা| সাঙ্গোপাঙ্গাস্তথা বেদাঃ কীর্তির্লক্ষ্মীঃ সরস্বতী| বালা দাক্ষাযণী সীতা সাবিত্রী সরমা দ্যুতিঃ| আকাশগঙ্গা গঙ্গাদ্যা মহানদ্যো মহোদধিঃ| নদীনাং সঙ্গমাস্তীর্থা নির্ঝরাঃ সাগরাস্তথা| মেরুর্মহেন্দ্রো হিমবান্ জগচ্চ স্থাবরত্ত্রযম্| স্কন্দাদযো গ্রহাশ্চৈব তোষিতা বলিকর্মণা| অদ্য ত্বামিভিষিঞ্চন্তু নীরুজো ভব দারক| নমো ভগবতে পিতামহায| ঔম্ - মং ঔম্ - মং - ল্মি - ল্মি - লিমুক্ - লিমুক্ - লিপিভবনেভ্যঃ স্বাহা| নমো ভগবতে রুদ্রায হিলি - হিলি মেল্লি - মেল্লি বেল্লি - বেল্লি ম্মিলি -ম্মিলি স্বাহা| রাক্ষসাশ্চ পলাযন্তু ভূতাশ্চ ত্রস্তমানসাঃ| মৃতাশনা মহাজিহ্বাস্তথা বিঘ্নবিনাযকাঃ| নমো ভগবতে কুমারায পিলি-পিলি খিল্লি-খিল্লি খিণি-খিণি স্বাহা| পুষ্করং পুষ্করাখ্যং নৈমিশং চ তথা গযা| প্রভাসং প্রবরং তীর্থং তথা পিণ্ডারকাহ্বযম্| তীর্থান্যেতানি সর্বাণি অভিষিঞ্চন্তু স্বস্তি তে| নমো ভগবতীভ্যো মহাযোগীশ্বরীভ্যো নিমি-নিমি মেনু- মেনু তরু-তুরু স্বাহা| যাশ্চ জাতাপহারিণ্যো রাক্ষস্যো বিকৃতাননাঃ| অপি তা নিহতাঃ সর্বাঃ যাশ্চান্যাঃ পাপচিন্তকাঃ| সতীনাং কপিলানাং চ সিদ্ধানং চৈব তেজসা| তেজসা চর্ষিবিপ্রাণাং মযাদ্য স্নপিতো ভবান্| প্রভুর্মৃত্যুরলক্ষ্মীশ্চ কালরাত্রিশ্চ সারথিঃ (সারতিঃ)| লম্বা চ লোহশঙ্কুশ্চ পূতনা কূটপূতনা| অশুভং যচ্চ তে কিঞ্চিত্সর্বং প্রতিহতং মযা| আদিত্যা বসবো রুদ্রা অশ্বিনাবৌষধীগণাঃ| গাবোঽন্তরিক্ষং সন্ধ্যে চ নক্ষত্রগ্রহবত্সরাঃ| বিশ্বাবসুশ্চ হাহা চ নারদস্তুম্বুরুস্তথা| ধন্বন্তরিরগস্ত্যশ্চ সুস্নাতং প্রদিশন্তু তে| ১৬(৫)||৩৩||
आपः पवित्रं लोकेऽस्मिन्नापो वै परमं शुचिः| आपो वै देवताः सर्वा आपस्त्वामभिषिच्यताम्| ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिः सार्धं भगवांस्त्वाभिषिञ्चतु| स्वाहा| साङ्गोपाङ्गास्तथा वेदाः कीर्तिर्लक्ष्मीः सरस्वती| बाला दाक्षायणी सीता सावित्री सरमा द्युतिः| आकाशगङ्गा गङ्गाद्या महानद्यो महोदधिः| नदीनां सङ्गमास्तीर्था निर्झराः सागरास्तथा| मेरुर्महेन्द्रो हिमवान् जगच्च स्थावरत्त्रयम्| स्कन्दादयो ग्रहाश्चैव तोषिता बलिकर्मणा| अद्य त्वामिभिषिञ्चन्तु नीरुजो भव दारक| नमो भगवते पितामहाय| औम् - मं औम् - मं - ल्मि - ल्मि - लिमुक् - लिमुक् - लिपिभवनेभ्यः स्वाहा| नमो भगवते रुद्राय हिलि - हिलि मेल्लि - मेल्लि वेल्लि - वेल्लि म्मिलि -म्मिलि स्वाहा| राक्षसाश्च पलायन्तु भूताश्च त्रस्तमानसाः| मृताशना महाजिह्वास्तथा विघ्नविनायकाः| नमो भगवते कुमाराय पिलि-पिलि खिल्लि-खिल्लि खिणि-खिणि स्वाहा| पुष्करं पुष्कराख्यं नैमिशं च तथा गया| प्रभासं प्रवरं तीर्थं तथा पिण्डारकाह्वयम्| तीर्थान्येतानि सर्वाणि अभिषिञ्चन्तु स्वस्ति ते| नमो भगवतीभ्यो महायोगीश्वरीभ्यो निमि-निमि मेनु- मेनु तरु-तुरु स्वाहा| याश्च जातापहारिण्यो राक्षस्यो विकृताननाः| अपि ता निहताः सर्वाः याश्चान्याः पापचिन्तकाः| सतीनां कपिलानां च सिद्धानं चैव तेजसा| तेजसा चर्षिविप्राणां मयाद्य स्नपितो भवान्| प्रभुर्मृत्युरलक्ष्मीश्च कालरात्रिश्च सारथिः (सारतिः)| लम्बा च लोहशङ्कुश्च पूतना कूटपूतना| अशुभं यच्च ते किञ्चित्सर्वं प्रतिहतं मया| आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनावौषधीगणाः| गावोऽन्तरिक्षं सन्ध्ये च नक्षत्रग्रहवत्सराः| विश्वावसुश्च हाहा च नारदस्तुम्बुरुस्तथा| धन्वन्तरिरगस्त्यश्च सुस्नातं प्रदिशन्तु ते| १६(५)||३३||
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Adhikarana snapanottarA caryA (17) · Śloka 17
স্নাতো দ্বিজভিষগ্ভৃত্যান্যথাবিভবমর্চযেত্| মাংসব্যবাযাহঃ স্বপ্নান্ পঞ্চরাত্রং বিবর্জযেত্||১৭||
स्नातो द्विजभिषग्भृत्यान्यथाविभवमर्चयेत्| मांसव्यवायाहः स्वप्नान् पञ्चरात्रं विवर्जयेत्||१७||
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Adhikarana vidhivatsnapanastavanam (18) · Śloka 18
স্নপনং পাপ্মজিত্পুণ্যং নীরুজামপি পুষ্টিকৃত্| রোগিণাং সর্বরোগঘ্নং বন্ধ্যানামপি পুত্রদম্| বিধিনা বিধিহীনন্তু সবৈদ্যং হন্তি বালকম্| নৈতদশ্রদ্দধানায যোজ্যং নানুপসীদতে||১৮||
स्नपनं पाप्मजित्पुण्यं नीरुजामपि पुष्टिकृत्| रोगिणां सर्वरोगघ्नं वन्ध्यानामपि पुत्रदम्| विधिना विधिहीनन्तु सवैद्यं हन्ति बालकम्| नैतदश्रद्दधानाय योज्यं नानुपसीदते||१८||
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Adhikarana snapanajalasAdhanArthamauShadhinirdeshaH (19-20) · Śloka 20
পূতীকরঞ্জত্বক্পত্রং ক্ষীরিভ্যো বর্বরাদপি| তুম্বীবিশালারলুকশমীবিল্বকপিত্থতঃ| স্থাল্যামুত্ক্বাথ্য তত্তোযং বালানাং স্নপনং শিবম্| রাত্রৌ প্রসুপ্তলোকাযাং পুষ্টিদং সর্বরোগজিত্||১৯|| ইতি বৈদ্যপতিসিংহগুপ্তস্য সূনোর্বাগ্ভটস্য কৃতাবষ্টাঙ্গসংগ্রহসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রে স্নপনবিধির্নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ||২০||
पूतीकरञ्जत्वक्पत्रं क्षीरिभ्यो वर्बरादपि| तुम्बीविशालारलुकशमीबिल्वकपित्थतः| स्थाल्यामुत्क्वाथ्य तत्तोयं बालानां स्नपनं शिवम्| रात्रौ प्रसुप्तलोकायां पुष्टिदं सर्वरोगजित्||१९|| इति वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भटस्य कृतावष्टाङ्गसंग्रहसंहितायामुत्तरतन्त्रे स्नपनविधिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः||२०||
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