Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽতীসারচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातोऽतीसारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽতীসারচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातोऽतीसारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ভগবন্তং খল্বাত্রেযং কৃতাহ্নিকং হুতাগ্নিহোত্রমাসীনমৃষিগণপরিবৃতমুত্তরে হিমবতঃ পার্শ্বে বিনযাদুপেত্যাভিবাদ্য চাগ্নিবেশ উবাচ- ভগবন্! অতীসারস্য প্রাগুত্পত্তিনিমিত্তলক্ষণোপশমনানি প্রজানুগ্রহার্থমাখ্যাতুমর্হসীতি||৩||
भगवन्तं खल्वात्रेयं कृताह्निकं हुताग्निहोत्रमासीनमृषिगणपरिवृतमुत्तरे हिमवतः पार्श्वे विनयादुपेत्याभिवाद्य चाग्निवेश उवाच- भगवन्! अतीसारस्य प्रागुत्पत्तिनिमित्तलक्षणोपशमनानि प्रजानुग्रहार्थमाख्यातुमर्हसीति||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
অথ ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেযস্তদগ্নিবেশবচনমনুনিশম্যোবাচ- শ্রূযতামগ্নিবেশ! সর্বমেতদখিলেন ব্যাখ্যাযমানম্| আদিকালে খলু যজ্ঞেষু পশবঃ সমালভনীযা বভূবুর্নালম্ভায প্রক্রিযন্তে স্ম| ততো দক্ষযজ্ঞং প্রত্যবরকালং মনোঃ পুত্রাণাং নরিষ্যন্নাভাগেক্ষ্বাকুনৃগশর্যাত্যাদীনাং ক্রতুষু পশূনামেবাভ্যনুজ্ঞানাত্ পশবঃ প্রোক্ষণমবাপুঃ| অতশ্চ প্রত্যবরকালং পৃষধ্রেণ দীর্ঘসত্রেণ যজতা পশূনামলাভাদ্গবামালম্ভঃ প্রবর্তিতঃ| তং দৃষ্ট্বা প্রব্যথিতা ভূতগণাঃ, তেষাং চোপযোগাদুপাকৃতানাং গবাং গৌরবাদৌষ্ণ্যাদসাত্ম্যত্বাদশস্তোপযোগাচ্চোপহতাগ্নীনামুপহতমনসাং চাতীসারঃ পূর্বমুত্পন্নঃ পৃষধ্রযজ্ঞে||৪||
अथ भगवान् पुनर्वसुरात्रेयस्तदग्निवेशवचनमनुनिशम्योवाच- श्रूयतामग्निवेश! सर्वमेतदखिलेन व्याख्यायमानम्| आदिकाले खलु यज्ञेषु पशवः समालभनीया बभूवुर्नालम्भाय प्रक्रियन्ते स्म| ततो दक्षयज्ञं प्रत्यवरकालं मनोः पुत्राणां नरिष्यन्नाभागेक्ष्वाकुनृगशर्यात्यादीनां क्रतुषु पशूनामेवाभ्यनुज्ञानात् पशवः प्रोक्षणमवापुः| अतश्च प्रत्यवरकालं पृषध्रेण दीर्घसत्रेण यजता पशूनामलाभाद्गवामालम्भः प्रवर्तितः| तं दृष्ट्वा प्रव्यथिता भूतगणाः, तेषां चोपयोगादुपाकृतानां गवां गौरवादौष्ण्यादसात्म्यत्वादशस्तोपयोगाच्चोपहताग्नीनामुपहतमनसां चातीसारः पूर्वमुत्पन्नः पृषध्रयज्ञे||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
অথাবরকালং বাতলস্য বাতাতপব্যাযামাতিমাত্রনিষেবিণো রূক্ষাল্পপ্রমিতাশিনস্তীক্ষ্ণমদ্যব্যবাযনিত্যস্যোদাবর্তযতশ্চ বেগান্ বাযুঃ প্রকোপমাপদ্যতে, পক্তা চোপহন্যতে; স বাযুঃ কুপিতোঽগ্নাবুপহতে মূত্রস্বেদৌ পুরীষাশযমুপহৃত্য, তাভ্যাং পুরীষং দ্রবীকৃত্য, অতীসারায প্রকল্পতে| তস্য রূপাণি- বিজ্জলমামং বিপ্লুতমবসাদি রূক্ষং দ্রবং সশূলমামগন্ধমীষচ্ছব্দমশব্দং বা বিবদ্ধমূত্রবাতমতিসার্যতে পুরীষং, বাযুশ্চান্তঃকোষ্ঠে সশব্দশূলস্তির্যক্ চরতি বিবদ্ধ ইত্যামাতিসারো বাতাত্| পক্বং বা বিবদ্ধমল্পাল্পং সশব্দং সশূলফেনপিচ্ছাপরিকর্তিকং হৃষ্টরোমা বিনিঃশ্বসঞ্ শুষ্কমুখঃ কট্যূরুত্রিকজানুপৃষ্ঠপার্শ্বশূলী ভ্রষ্টগুদো মুহুর্মুহুর্বিগ্রথিতমুপবেশ্যতে পুরীষং বাতাত্; তমাহুরনুগ্রথিতমিত্যেকে, বাতানুগ্রথিতবর্চস্ত্বাত্||৫||
अथावरकालं वातलस्य वातातपव्यायामातिमात्रनिषेविणो रूक्षाल्पप्रमिताशिनस्तीक्ष्णमद्यव्यवायनित्यस्योदावर्तयतश्च वेगान् वायुः प्रकोपमापद्यते, पक्ता चोपहन्यते; स वायुः कुपितोऽग्नावुपहते मूत्रस्वेदौ पुरीषाशयमुपहृत्य, ताभ्यां पुरीषं द्रवीकृत्य, अतीसाराय प्रकल्पते| तस्य रूपाणि- विज्जलमामं विप्लुतमवसादि रूक्षं द्रवं सशूलमामगन्धमीषच्छब्दमशब्दं वा विबद्धमूत्रवातमतिसार्यते पुरीषं, वायुश्चान्तःकोष्ठे सशब्दशूलस्तिर्यक् चरति विबद्ध इत्यामातिसारो वातात्| पक्वं वा विबद्धमल्पाल्पं सशब्दं सशूलफेनपिच्छापरिकर्तिकं हृष्टरोमा विनिःश्वसञ् शुष्कमुखः कट्यूरुत्रिकजानुपृष्ठपार्श्वशूली भ्रष्टगुदो मुहुर्मुहुर्विग्रथितमुपवेश्यते पुरीषं वातात्; तमाहुरनुग्रथितमित्येके, वातानुग्रथितवर्चस्त्वात्||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
পিত্তলস্য পুনরম্ললবণকটুকক্ষারোষ্ণতীক্ষ্ণাতিমাত্রনিষেবিণঃ প্রততাগ্নিসূর্যসন্তাপোষ্ণমারুতোপহতগাত্রস্য ক্রোধের্ষ্যাবহুলস্য পিত্তং প্রকোপমাপদ্যতে| তত্ প্রকুপিতং দ্রবত্বাদূষ্মাণমুপহত্য পুরীষাশযবিসৃতমৌষ্ণ্যাদ্ দ্রবত্বাত্ সরত্বাচ্চ ভিত্ত্বা পুরীষমতিসারায প্রকল্পতে| তস্য রূপাণি- হারিদ্রং হরিতং নীলং কৃষ্ণং রক্তপিত্তোপহিতমতিদুর্গন্ধমতিসার্যতে পুরীষং, তৃষ্ণাদাহস্বেদমূর্চ্ছাশূলব্রধ্নসন্তাপপাকপরীত ইতি পিত্তাতিসারঃ||৬||
पित्तलस्य पुनरम्ललवणकटुकक्षारोष्णतीक्ष्णातिमात्रनिषेविणः प्रतताग्निसूर्यसन्तापोष्णमारुतोपहतगात्रस्य क्रोधेर्ष्याबहुलस्य पित्तं प्रकोपमापद्यते| तत् प्रकुपितं द्रवत्वादूष्माणमुपहत्य पुरीषाशयविसृतमौष्ण्याद् द्रवत्वात् सरत्वाच्च भित्त्वा पुरीषमतिसाराय प्रकल्पते| तस्य रूपाणि- हारिद्रं हरितं नीलं कृष्णं रक्तपित्तोपहितमतिदुर्गन्धमतिसार्यते पुरीषं, तृष्णादाहस्वेदमूर्च्छाशूलब्रध्नसन्तापपाकपरीत इति पित्तातिसारः||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
শ্লেষ্মলস্য তু গুরুমধুরশীতস্নিগ্ধোপসেবিনঃ সম্পূরকস্যাচিন্তযতো দিবাস্বপ্নপরস্যালসস্য শ্লেষ্মা প্রকোপমাপদ্যতে| স স্বভাবাদ্ গুরুমধুরশীতস্নিগ্ধঃ স্রস্তোঽগ্নিমুপহত্য সৌম্যস্বভাবাত্ পুরীষাশযমুপহত্যোপক্লেদ্য পুরীষমতিসারায কল্পতে| তস্য রূপাণি- স্নিগ্ধং শ্বেতং পিচ্ছিলং তন্তুমদামং গুরু দুর্গন্ধং শ্লেষ্মোপহিতমনুবদ্ধশূলমল্পাল্পমভীক্ষ্ণমতিসার্যতে সপ্রবাহিকং, গুরূদরগুদবস্তিবঙ্ক্ষণদেশঃ কৃতেঽপ্যকৃতসঞ্জ্ঞঃ সলোমহর্ষঃ সোত্ক্লেশো নিদ্রালস্যপরীতঃ সদনোঽন্নদ্বেষী চেতি শ্লেষ্মাতিসারঃ||৭||
श्लेष्मलस्य तु गुरुमधुरशीतस्निग्धोपसेविनः सम्पूरकस्याचिन्तयतो दिवास्वप्नपरस्यालसस्य श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते| स स्वभावाद् गुरुमधुरशीतस्निग्धः स्रस्तोऽग्निमुपहत्य सौम्यस्वभावात् पुरीषाशयमुपहत्योपक्लेद्य पुरीषमतिसाराय कल्पते| तस्य रूपाणि- स्निग्धं श्वेतं पिच्छिलं तन्तुमदामं गुरु दुर्गन्धं श्लेष्मोपहितमनुबद्धशूलमल्पाल्पमभीक्ष्णमतिसार्यते सप्रवाहिकं, गुरूदरगुदबस्तिवङ्क्षणदेशः कृतेऽप्यकृतसञ्ज्ञः सलोमहर्षः सोत्क्लेशो निद्रालस्यपरीतः सदनोऽन्नद्वेषी चेति श्लेष्मातिसारः||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
অতিশীতস্নিগ্ধরূক্ষোষ্ণগুরুখরকঠিনবিষমবিরুদ্ধাসাত্ম্যভোজনাদভোজনাত্ কালাতীতভোজনাদ্ যত্কিঞ্চিদভ্যবহরণাত্ প্রদুষ্টমদ্যপানীযপানাদতিমদ্যপানাদসংশোধনাত্ প্রতিকর্মণাং বিষমগমনাদনুপচারাজ্জ্বলনাদিত্যপবনসলিলাতিসেবনাদস্বপ্না- দতিস্বপ্নাদ্বেগবিধারণাদৃতুবিপর্যযাদযথাবলমারম্ভাদ্ভযশোকচিত্তোদ্বেগাতিযোগাত্ কৃমিশোষজ্বরার্শোবিকারাতিকর্ষণাদ্বা ব্যাপন্নাগ্নেস্ত্রযো দোষাঃ প্রকুপিতা ভূয এবাগ্নিমুপহত্য পক্বাশযমনুপ্রবিশ্যাতীসারং সর্বদোষলিঙ্গং জনযন্তি||৮||
अतिशीतस्निग्धरूक्षोष्णगुरुखरकठिनविषमविरुद्धासात्म्यभोजनादभोजनात् कालातीतभोजनाद् यत्किञ्चिदभ्यवहरणात् प्रदुष्टमद्यपानीयपानादतिमद्यपानादसंशोधनात् प्रतिकर्मणां विषमगमनादनुपचाराज्ज्वलनादित्यपवनसलिलातिसेवनादस्वप्ना- दतिस्वप्नाद्वेगविधारणादृतुविपर्ययादयथाबलमारम्भाद्भयशोकचित्तोद्वेगातियोगात् कृमिशोषज्वरार्शोविकारातिकर्षणाद्वा व्यापन्नाग्नेस्त्रयो दोषाः प्रकुपिता भूय एवाग्निमुपहत्य पक्वाशयमनुप्रविश्यातीसारं सर्वदोषलिङ्गं जनयन्ति||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
অপি চ শোণিতাদীন্ ধাতূনতিপ্রকৃষ্টং দূষযন্তো ধাতুদোষস্বভাবকৃতানতীসারবর্ণানুপদর্শযন্তি| তত্র শোণিতাদিষু ধাতুষ্বতিপ্রদুষ্টেষু হারিদ্রহরিতনীলমাঞ্জিষ্ঠমাংসধাবনসন্নিকাশং রক্তং কৃষ্ণং শ্বেতং বরাহভেদঃসদৃশমনুবদ্ধবেদনমবেদনং বা সমাসব্যত্যাসাদুপবেশ্যতে শকৃদ্ গ্রথিতমামং সকৃত্, সকৃদপি পক্বমনতিক্ষীণমাংসশোণিতবলো মন্দাগ্নির্বিহতমুখরসশ্চ; তাদৃশমাতুরং কৃচ্ছ্রসাধ্যং বিদ্যাত্| এভির্বর্ণৈরতিসার্যমাণং সোপদ্রবমাতুরমসাধ্যোঽযমিতি প্রত্যাচক্ষীত; তদ্যথা- পক্বশোণিতাভং যকৃত্খণ্ডোপমং মেদোমাংসোদকসন্নিকাশং দধিঘৃতমজ্জতৈলবসাক্ষীরবেসবারাভমতিনীলমতিরক্তমতিকৃষ্ণমুদকমিবাচ্ছং পুনর্মেচকাভমতিস্নিগ্ধং হরিতনীলকষাযবর্ণং কর্বুরমাবিলং পিচ্ছিলং তন্তুমদামং চন্দ্রকোপগতমতিকুণপপূতিপূযগন্ধ্যামামমত্স্যগন্ধি মক্ষিকাকান্তং কুথিতবহুধাতুস্রাবমল্পপুরীষমপুরীষং বাঽতিসার্যমাণং তৃষ্ণাদাহজ্বরভ্রমতমকহিক্কাশ্বাসানুবন্ধমতিবেদনমবেদনং বা স্রস্তপক্বগুদং পতিতগুদবলিং মুক্তনালমতিক্ষীণবলমাংসশোণিতং সর্বপর্বাস্থিশূলিনমরোচকারতিপ্রলাপসম্মোহপরীতং সহসোপরতবিকারমতিসারিণমচিকিত্স্যং বিদ্যাত্; ইতি সন্নিপাতাতিসারঃ||৯||
अपि च शोणितादीन् धातूनतिप्रकृष्टं दूषयन्तो धातुदोषस्वभावकृतानतीसारवर्णानुपदर्शयन्ति| तत्र शोणितादिषु धातुष्वतिप्रदुष्टेषु हारिद्रहरितनीलमाञ्जिष्ठमांसधावनसन्निकाशं रक्तं कृष्णं श्वेतं वराहभेदःसदृशमनुबद्धवेदनमवेदनं वा समासव्यत्यासादुपवेश्यते शकृद् ग्रथितमामं सकृत्, सकृदपि पक्वमनतिक्षीणमांसशोणितबलो मन्दाग्निर्विहतमुखरसश्च; तादृशमातुरं कृच्छ्रसाध्यं विद्यात्| एभिर्वर्णैरतिसार्यमाणं सोपद्रवमातुरमसाध्योऽयमिति प्रत्याचक्षीत; तद्यथा- पक्वशोणिताभं यकृत्खण्डोपमं मेदोमांसोदकसन्निकाशं दधिघृतमज्जतैलवसाक्षीरवेसवाराभमतिनीलमतिरक्तमतिकृष्णमुदकमिवाच्छं पुनर्मेचकाभमतिस्निग्धं हरितनीलकषायवर्णं कर्बुरमाविलं पिच्छिलं तन्तुमदामं चन्द्रकोपगतमतिकुणपपूतिपूयगन्ध्यामाममत्स्यगन्धि मक्षिकाकान्तं कुथितबहुधातुस्रावमल्पपुरीषमपुरीषं वाऽतिसार्यमाणं तृष्णादाहज्वरभ्रमतमकहिक्काश्वासानुबन्धमतिवेदनमवेदनं वा स्रस्तपक्वगुदं पतितगुदवलिं मुक्तनालमतिक्षीणबलमांसशोणितं सर्वपर्वास्थिशूलिनमरोचकारतिप्रलापसम्मोहपरीतं सहसोपरतविकारमतिसारिणमचिकित्स्यं विद्यात्; इति सन्निपातातिसारः||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
তমসাধ্যতামসম্প্রাপ্তং চিকিত্সেদ্ যথাপ্রধানোপক্রমেণ হেতূপশযদোষবিশেষপরীক্ষযা চেতি||১০||
तमसाध्यतामसम्प्राप्तं चिकित्सेद् यथाप्रधानोपक्रमेण हेतूपशयदोषविशेषपरीक्षया चेति||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
আগন্তূ দ্বাবতীসারৌ মানসৌ ভযশোকজৌ| তত্তযোর্লক্ষণং বাযোর্যদতীসারলক্ষণম্||১১||
आगन्तू द्वावतीसारौ मानसौ भयशोकजौ| तत्तयोर्लक्षणं वायोर्यदतीसारलक्षणम्||११||
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Adhikarana 11 (12-13) · Śloka 13
মারুতো ভযশোকাভ্যাং শীঘ্রং হি পরিকুপ্যতি| তযোঃ ক্রিযা বাতহরী হর্ষণাশ্বাসনানি চ||১২|| ইত্যুক্তাঃ ষডতীসারাঃ, সাধ্যানাং সাধনং ত্বতঃ| প্রবক্ষ্যাম্যনুপূর্বেণ যথাবত্তন্নিবোধত||১৩||
मारुतो भयशोकाभ्यां शीघ्रं हि परिकुप्यति| तयोः क्रिया वातहरी हर्षणाश्वासनानि च||१२|| इत्युक्ताः षडतीसाराः, साध्यानां साधनं त्वतः| प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वेण यथावत्तन्निबोधत||१३||
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Adhikarana 12 (14-19) · Śloka 19
দোষাঃ সন্নিচিতা যস্য বিদগ্ধাহারমূর্চ্ছিতাঃ| অতীসারায কল্পন্তে ভূযস্তান্ সম্প্রবর্তযেত্||১৪|| ন তু সঙ্গ্রহণং দেযং পূর্বমামাতিসারিণে| বিবধ্যমানাঃ প্রাগ্দোষা জনযন্ত্যামযান্ বহূন্||১৫|| দণ্ডকালসকাধ্মানগ্রহণ্যর্শোগদাংস্তথা| শোথপাণ্ড্বামযপ্লীহকুষ্ঠগুল্মোদরজ্বরান্||১৬|| তস্মাদুপেক্ষেতোত্ক্লিষ্টান্ বর্তমানান্ স্বযং মলান্| কৃচ্ছ্রং বা বহতাং দদ্যাদভযাং সম্প্রবর্তিনীম্||১৭|| তযা প্রবাহিতে দোষে প্রশাম্যত্যুদরামযঃ| জাযতে দেহলঘুতা জঠরাগ্নিশ্চ বর্ধতে||১৮|| প্রমথ্যাং মধ্যদোষাণাং দদ্যাদ্দীপনপাচনীম্| লঙ্ঘনং চাল্পদোষাণাং প্রশস্তমতিসারিণাম্||১৯||
दोषाः सन्निचिता यस्य विदग्धाहारमूर्च्छिताः| अतीसाराय कल्पन्ते भूयस्तान् सम्प्रवर्तयेत्||१४|| न तु सङ्ग्रहणं देयं पूर्वमामातिसारिणे| विबध्यमानाः प्राग्दोषा जनयन्त्यामयान् बहून्||१५|| दण्डकालसकाध्मानग्रहण्यर्शोगदांस्तथा| शोथपाण्ड्वामयप्लीहकुष्ठगुल्मोदरज्वरान्||१६|| तस्मादुपेक्षेतोत्क्लिष्टान् वर्तमानान् स्वयं मलान्| कृच्छ्रं वा वहतां दद्यादभयां सम्प्रवर्तिनीम्||१७|| तया प्रवाहिते दोषे प्रशाम्यत्युदरामयः| जायते देहलघुता जठराग्निश्च वर्धते||१८|| प्रमथ्यां मध्यदोषाणां दद्याद्दीपनपाचनीम्| लङ्घनं चाल्पदोषाणां प्रशस्तमतिसारिणाम्||१९||
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Adhikarana 13 (20-22) · Śloka 22
পিপ্পলী নাগরং ধান্যং ভূতীকমভযা বচা| হ্রীবেরং ভদ্রমুস্তানি বিল্বং নাগরধান্যকম্||২০|| পৃশ্নিপর্ণী শ্বদংষ্ট্রা চ সমঙ্গা কণ্টকারিকা| তিস্রঃ প্রমথ্যা বিহিতাঃ শ্লোকার্ধৈরতিসারিণাম্||২১|| বচাপ্রতিবিষাভ্যাং বা মুস্তপর্পটকেন বা| হ্রীবেরশৃঙ্গবেরাভ্যাং পক্বং বা পাযযেজ্জলম্||২২||
पिप्पली नागरं धान्यं भूतीकमभया वचा| ह्रीवेरं भद्रमुस्तानि बिल्वं नागरधान्यकम्||२०|| पृश्निपर्णी श्वदंष्ट्रा च समङ्गा कण्टकारिका| तिस्रः प्रमथ्या विहिताः श्लोकार्धैरतिसारिणाम्||२१|| वचाप्रतिविषाभ्यां वा मुस्तपर्पटकेन वा| ह्रीवेरशृङ्गवेराभ्यां पक्वं वा पाययेज्जलम्||२२||
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Adhikarana 14 (23-25) · Śloka 25
যুক্তেঽন্নকালে ক্ষুত্ক্ষামং লঘূন্যন্নানি ভোজযেত্| তথা স শীঘ্রমাপ্নোতি রুচিমগ্নিবলং বলম্||২৩|| তক্রেণাবন্তিসোমেন যবাগ্বা তর্পণেন বা| সুরযা মধুনা চাদৌ যথাসাত্ম্যমুপাচরেত্||২৪|| যবাগূভির্বিলেপীভিঃ খডৈর্যূষৈ রসৌদনৈঃ| দীপনগ্রাহিসংযুক্তৈঃ ক্রমশ্চ স্যাদতঃ পরম্||২৫||
युक्तेऽन्नकाले क्षुत्क्षामं लघून्यन्नानि भोजयेत्| तथा स शीघ्रमाप्नोति रुचिमग्निबलं बलम्||२३|| तक्रेणावन्तिसोमेन यवाग्वा तर्पणेन वा| सुरया मधुना चादौ यथासात्म्यमुपाचरेत्||२४|| यवागूभिर्विलेपीभिः खडैर्यूषै रसौदनैः| दीपनग्राहिसंयुक्तैः क्रमश्च स्यादतः परम्||२५||
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Adhikarana 15 (26-29) · Śloka 29
শালপর্ণীং পৃশ্নিপর্ণীং বৃহতীং কণ্টকারিকাম্| বলাং শ্বদংষ্ট্রাং বিল্বানি পাঠাং নাগরধান্যকম্||২৬|| শটীং পলাশং হপুষাং বচাং জীরকপিপ্পলীম্| যবানীং পিপ্পলীমূলং চিত্রকং হস্তিপিপ্পলীম্||২৭|| বৃক্ষাম্লং দাডিমাম্লং চ সহিঙ্গু বিডসৈন্ধবম্| প্রযোজযেদন্নপানে বিধিনা সূপকল্পিতম্||২৮|| বাতশ্লেষ্মহরো হ্যেষ গণো দীপনপাচনঃ| গ্রাহী বল্যো রোচনশ্চ তস্মাচ্ছস্তোঽতিসারিণাম্||২৯||
शालपर्णीं पृश्निपर्णीं बृहतीं कण्टकारिकाम्| बलां श्वदंष्ट्रां बिल्वानि पाठां नागरधान्यकम्||२६|| शटीं पलाशं हपुषां वचां जीरकपिप्पलीम्| यवानीं पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पलीम्||२७|| वृक्षाम्लं दाडिमाम्लं च सहिङ्गु बिडसैन्धवम्| प्रयोजयेदन्नपाने विधिना सूपकल्पितम्||२८|| वातश्लेष्महरो ह्येष गणो दीपनपाचनः| ग्राही बल्यो रोचनश्च तस्माच्छस्तोऽतिसारिणाम्||२९||
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Adhikarana 16 (30-33) · Śloka 33
আমে পরিণতে যস্তু বিবদ্ধমতিসার্যতে| সশূলপিচ্ছমল্পাল্পং বহুশঃ সপ্রবাহিকম্||৩০|| যূষেণ মূলকানাং তং বদরাণামথাপি বা| উপোদিকাযাঃ ক্ষীরিণ্যা যবান্যা বাস্তুকস্য বা||৩১|| সুবর্চলাযাশ্চঞ্চোর্বা শাকেনাবল্গুজস্য বা| শট্যাঃ কর্কারুকাণাং বা জীবন্ত্যাশ্চির্ভটস্য বা||৩২|| লোণিকাযাঃ সপাঠাযাঃ শুষ্কশাকেন বা পুনঃ| দধিদাডিমসিদ্ধেন বহুস্নেহেন ভোজযেত্||৩৩||
आमे परिणते यस्तु विबद्धमतिसार्यते| सशूलपिच्छमल्पाल्पं बहुशः सप्रवाहिकम्||३०|| यूषेण मूलकानां तं बदराणामथापि वा| उपोदिकायाः क्षीरिण्या यवान्या वास्तुकस्य वा||३१|| सुवर्चलायाश्चञ्चोर्वा शाकेनावल्गुजस्य वा| शट्याः कर्कारुकाणां वा जीवन्त्याश्चिर्भटस्य वा||३२|| लोणिकायाः सपाठायाः शुष्कशाकेन वा पुनः| दधिदाडिमसिद्धेन बहुस्नेहेन भोजयेत्||३३||
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Adhikarana 17 (34-41) · Śloka 41
কল্কঃ স্যাদ্বালবিল্বানাং তিলকল্কশ্চ তত্সমঃ| দধ্নঃ সরোঽম্লস্নেহাদ্যঃ খডো হন্যাত্ প্রবাহিকাম্||৩৪|| যবানাং মুদ্গমাষাণাং শালীনাং চ তিলস্য চ| কোলানাং বালবিল্বানাং ধান্যযূষং প্রকল্পযেত্||৩৫|| ঐকধ্যং যমকে ভৃষ্টং দধিদাডিমসারিকম্| বর্চঃক্ষযে শুষ্কমুখং শাল্যন্নং তেন ভোজযেত্||৩৬|| দধ্নঃ সরং বা যমকে ভৃষ্টং সগুডনাগরম্| সুরাং বা যমকে ভৃষ্টাং ব্যঞ্জনার্থে প্রদাপযেত্||৩৭|| ফলাম্লং যমকে ভৃষ্টং যূষং গৃঞ্জনকস্য বা| লোপাকরসমম্লং বা স্নিগ্ধাম্লং কচ্ছপস্য বা||৩৮|| বর্হিতিত্তিরিদক্ষাণাং বর্তকানাং তথা রসাঃ| স্নিগ্ধাম্লাঃ শালযশ্চাগ্র্যা বর্চঃক্ষযরুজাপহাঃ||৩৯|| অন্তরাধিরসং পূত্বা রক্তং মেষস্য চোভযম্| পচেদ্দাডিমসারাম্লং সধান্যস্নেহনাগরম্||৪০|| ওদনং রক্তশালীনাং তেনাদ্যাত্ প্রপিবেচ্চ তত্| তথা বর্চঃক্ষযকৃতৈর্ব্যাধিভির্বিপ্রমুচ্যতে||৪১||
कल्कः स्याद्बालबिल्वानां तिलकल्कश्च तत्समः| दध्नः सरोऽम्लस्नेहाद्यः खडो हन्यात् प्रवाहिकाम्||३४|| यवानां मुद्गमाषाणां शालीनां च तिलस्य च| कोलानां बालबिल्वानां धान्ययूषं प्रकल्पयेत्||३५|| ऐकध्यं यमके भृष्टं दधिदाडिमसारिकम्| वर्चःक्षये शुष्कमुखं शाल्यन्नं तेन भोजयेत्||३६|| दध्नः सरं वा यमके भृष्टं सगुडनागरम्| सुरां वा यमके भृष्टां व्यञ्जनार्थे प्रदापयेत्||३७|| फलाम्लं यमके भृष्टं यूषं गृञ्जनकस्य वा| लोपाकरसमम्लं वा स्निग्धाम्लं कच्छपस्य वा||३८|| बर्हितित्तिरिदक्षाणां वर्तकानां तथा रसाः| स्निग्धाम्लाः शालयश्चाग्र्या वर्चःक्षयरुजापहाः||३९|| अन्तराधिरसं पूत्वा रक्तं मेषस्य चोभयम्| पचेद्दाडिमसाराम्लं सधान्यस्नेहनागरम्||४०|| ओदनं रक्तशालीनां तेनाद्यात् प्रपिबेच्च तत्| तथा वर्चःक्षयकृतैर्व्याधिभिर्विप्रमुच्यते||४१||
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Adhikarana 18 (42-44) · Śloka 44
গুদনিঃসরণে শূলে পানমম্লস্য সর্পিষঃ| প্রশস্যতে নিরামাণামথবাঽপ্যনুবাসনম্||৪২|| চাঙ্গেরীকোলদধ্যম্লনাগরক্ষারসংযুতম্| ঘৃতমুত্ক্বথিতং পেযং গুদভ্রংশরুজাপহম্||৪৩|| ইতি চাঙ্গেরীঘৃতম্| সচব্যপিপ্পলীমূলং সব্যোষবিডদাডিমম্| পেযমম্লং ঘৃতং যুক্ত্যা সধান্যাজাজিচিত্রকম্||৪৪|| ইতি গুদভ্রংশে চব্যাদিঘৃতম্|
गुदनिःसरणे शूले पानमम्लस्य सर्पिषः| प्रशस्यते निरामाणामथवाऽप्यनुवासनम्||४२|| चाङ्गेरीकोलदध्यम्लनागरक्षारसंयुतम्| घृतमुत्क्वथितं पेयं गुदभ्रंशरुजापहम्||४३|| इति चाङ्गेरीघृतम्| सचव्यपिप्पलीमूलं सव्योषविडदाडिमम्| पेयमम्लं घृतं युक्त्या सधान्याजाजिचित्रकम्||४४|| इति गुदभ्रंशे चव्यादिघृतम्|
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Adhikarana 19 (45) · Śloka 45
দশমূলোপসিদ্ধং বা সবিল্বমনুবাসনম্| শটীশতাহ্বাবিল্বৈর্বা বচযা চিত্রকেণ বা||৪৫|| ইতি গুদভ্রংশেঽনুবাসনম্|
दशमूलोपसिद्धं वा सबिल्वमनुवासनम्| शटीशताह्वाबिल्वैर्वा वचया चित्रकेण वा||४५|| इति गुदभ्रंशेऽनुवासनम्|
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Adhikarana 20 (46) · Śloka 46
স্তব্ধভ্রষ্টগুদে পূর্বং স্নেহস্বেদৌ প্রযোজযেত্| সুস্বিন্নং তং মৃদূভূতং পিচুনা সম্প্রবেশযেত্||৪৬||
स्तब्धभ्रष्टगुदे पूर्वं स्नेहस्वेदौ प्रयोजयेत्| सुस्विन्नं तं मृदूभूतं पिचुना सम्प्रवेशयेत्||४६||
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Adhikarana 21 (47-49) · Śloka 49
বিবদ্ধবাতবর্চাস্তু বহুশূলপ্রবাহিকঃ| সরক্তপিচ্ছস্তৃষ্ণার্তঃ ক্ষীরসৌহিত্যমর্হতি||৪৭|| যমকস্যোপরি ক্ষীরং ধারোষ্ণং বা পিবেন্নরঃ| শৃতমেরণ্ডমূলেন বালবিল্বেন বা পযঃ ||৪৮|| এবং ক্ষীরপ্রযোগেণ রক্তং পিচ্ছা চ শাম্যতি| শূলং প্রবাহিকা চৈব বিবন্ধশ্চোপশাম্যতি||৪৯||
विबद्धवातवर्चास्तु बहुशूलप्रवाहिकः| सरक्तपिच्छस्तृष्णार्तः क्षीरसौहित्यमर्हति||४७|| यमकस्योपरि क्षीरं धारोष्णं वा पिबेन्नरः| शृतमेरण्डमूलेन बालबिल्वेन वा पयः ||४८|| एवं क्षीरप्रयोगेण रक्तं पिच्छा च शाम्यति| शूलं प्रवाहिका चैव विबन्धश्चोपशाम्यति||४९||
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Adhikarana 22 (50) · Śloka 50
পিত্তাতিসারং পুনর্নিদানোপশযাকৃতিভিরামান্বযমুপলভ্য যথাবলং লঙ্ঘনপাচনাভ্যামুপাচরেত্| তৃষ্যতস্তু মুস্তপর্পটকোশীরসারিবাচন্দনকিরাততিক্তকোদীচ্যবারিভিরুপচারঃ| লঙ্ঘিতস্য চাহারকালে বলাতিবলাসূর্পপর্ণীশালপর্ণীপৃশ্নিপর্ণীবৃহতীকণ্টকারিকাশতাবরীশ্বদংষ্ট্রানির্যূহসংযুক্তেন যথাসাত্ম্যং যবাগূমণ্ডাদিনা তর্পণাদিনা বা ক্রমেণোপচারঃ| মুদ্গমসূরহরেণুমকুষ্ঠকাঢকীযূষৈর্বা লাবকপিঞ্জলশশহরিণৈণকালপুচ্ছকরসৈরীষদম্লৈরনম্লৈর্বা ক্রমশোঽগ্নিং সন্ধুক্ষযেত্| অনুবন্ধে ত্বস্য দীপনীযপাচনীযোপশমনীযসঙ্গ্রহণীযান্ যোগান্ সম্প্রযোজযেদিতি||৫০||
पित्तातिसारं पुनर्निदानोपशयाकृतिभिरामान्वयमुपलभ्य यथाबलं लङ्घनपाचनाभ्यामुपाचरेत्| तृष्यतस्तु मुस्तपर्पटकोशीरसारिवाचन्दनकिराततिक्तकोदीच्यवारिभिरुपचारः| लङ्घितस्य चाहारकाले बलातिबलासूर्पपर्णीशालपर्णीपृश्निपर्णीबृहतीकण्टकारिकाशतावरीश्वदंष्ट्रानिर्यूहसंयुक्तेन यथासात्म्यं यवागूमण्डादिना तर्पणादिना वा क्रमेणोपचारः| मुद्गमसूरहरेणुमकुष्ठकाढकीयूषैर्वा लावकपिञ्जलशशहरिणैणकालपुच्छकरसैरीषदम्लैरनम्लैर्वा क्रमशोऽग्निं सन्धुक्षयेत्| अनुबन्धे त्वस्य दीपनीयपाचनीयोपशमनीयसङ्ग्रहणीयान् योगान् सम्प्रयोजयेदिति||५०||
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Adhikarana 23 (51-56) · Śloka 56
সক্ষৌদ্রাতিবিষং পিষ্ট্বা বত্সকস্য ফলত্বচম্| পিবেত্ পিত্তাতিসারঘ্নং তণ্ডুলোদকসংযুতম্||৫১|| কিরাততিক্তকো মুস্তং বত্সকঃ সরসাঞ্জনঃ| বিল্বং দারুহরিদ্রা ত্বক্ হ্রীবেরং সদুরালভম্||৫২|| চন্দনং চ মৃণালং চ নাগরং লোধ্রমুত্পলম্| তিলা মোচরসো লোধ্রং সমঙ্গা কমলোত্পলম্||৫৩|| উত্পলং ধাতকীপুষ্পং দাডিমত্বঙ্মহৌষধম্| কট্ফলং নাগরং পাঠা জম্ব্বাম্রাস্থিদুরালভাঃ||৫৪|| যোগাঃ ষডেতে সক্ষৌদ্রাস্তণ্ডুলোদকসংযুতাঃ| পেযাঃ পিত্তাতিসারঘ্নাঃ শ্লোকার্ধেন নিদর্শিতাঃ||৫৫|| জীর্ণোষধানাং শস্যন্তে যথাযোগং প্রকল্পিতৈঃ| রসৈঃ সাঙ্গ্রাহিকৈর্যুক্তাঃ পুরাণা রক্তশালযঃ||৫৬||
सक्षौद्रातिविषं पिष्ट्वा वत्सकस्य फलत्वचम्| पिबेत् पित्तातिसारघ्नं तण्डुलोदकसंयुतम्||५१|| किराततिक्तको मुस्तं वत्सकः सरसाञ्जनः| बिल्वं दारुहरिद्रा त्वक् ह्रीबेरं सदुरालभम्||५२|| चन्दनं च मृणालं च नागरं लोध्रमुत्पलम्| तिला मोचरसो लोध्रं समङ्गा कमलोत्पलम्||५३|| उत्पलं धातकीपुष्पं दाडिमत्वङ्महौषधम्| कट्फलं नागरं पाठा जम्ब्वाम्रास्थिदुरालभाः||५४|| योगाः षडेते सक्षौद्रास्तण्डुलोदकसंयुताः| पेयाः पित्तातिसारघ्नाः श्लोकार्धेन निदर्शिताः||५५|| जीर्णोषधानां शस्यन्ते यथायोगं प्रकल्पितैः| रसैः साङ्ग्राहिकैर्युक्ताः पुराणा रक्तशालयः||५६||
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Adhikarana 24 (57-62) · Śloka 62
পিত্তাতিসারো দীপাগ্নেঃ ক্ষিপ্রং সমুপশাম্যতি| অজাক্ষীরপ্রযোগেণ বলং বর্ণশ্চ বর্ধতে||৫৭|| বহুদোষস্য দীপ্তাগ্নেঃ সপ্রাণস্য ন তিষ্ঠতি| পৈত্তিকো যদ্যতীসারঃ পযসা তং বিরেচযেত্||৫৮|| পলাশফলনির্যূহং পযসা সহ পাযযেত্| ততোঽনুপাযযেত্ কোষ্ণং ক্ষীরমেব যথাবলম্||৫৯|| প্রবাহিতে তেন মলে প্রশাম্যত্যুদরামযঃ| পলাশবত্ প্রযোজ্যা বা ত্রাযমাণা বিশোধিনী||৬০|| সাংসর্গ্যাং ক্রিযমাণাযাং শূলং যদ্যনুবর্ততে| স্রুতদোষস্য তং শীঘ্রং যথাবদনুবাসযেত্||৬১|| শতপুষ্পাবরীভ্যাং চ পযসা মধুকেন চ| তৈলপাদং ঘৃতং সিদ্ধং সবিল্বমনুবাসনম্||৬২||
पित्तातिसारो दीपाग्नेः क्षिप्रं समुपशाम्यति| अजाक्षीरप्रयोगेण बलं वर्णश्च वर्धते||५७|| बहुदोषस्य दीप्ताग्नेः सप्राणस्य न तिष्ठति| पैत्तिको यद्यतीसारः पयसा तं विरेचयेत्||५८|| पलाशफलनिर्यूहं पयसा सह पाययेत्| ततोऽनुपाययेत् कोष्णं क्षीरमेव यथाबलम्||५९|| प्रवाहिते तेन मले प्रशाम्यत्युदरामयः| पलाशवत् प्रयोज्या वा त्रायमाणा विशोधिनी||६०|| सांसर्ग्यां क्रियमाणायां शूलं यद्यनुवर्तते| स्रुतदोषस्य तं शीघ्रं यथावदनुवासयेत्||६१|| शतपुष्पावरीभ्यां च पयसा मधुकेन च| तैलपादं घृतं सिद्धं सबिल्वमनुवासनम्||६२||
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Adhikarana 25 (63-68) · Śloka 68
কৃতানুবাসনস্যাস্য কৃতসংসর্জনস্য চ| বর্ততে যদ্যতীসারঃ পিচ্ছাবস্তিরতঃ পরম্||৬৩|| পরিবেষ্ট্য কুশৈরার্দ্রৈরার্দ্রবৃন্তানি শাল্মলেঃ| কৃষ্ণমৃত্তিকযাঽঽলিপ্য স্বেদযেদ্গোমযাগ্নিনা||৬৪|| সুশুষ্কাং মৃত্তিকাং জ্ঞাত্বা তানি বৃন্তানি শাল্মলেঃ| শৃতে পযসি মৃদ্নীযাদাপোথ্যোলূখলে ততঃ||৬৫|| পিণ্ডং মুষ্টিসমং প্রস্থে তত্ পূতং তৈলসর্পিষোঃ| স্নেহিতং মাত্রযা যুক্তং কল্কেন মধুকস্য চ||৬৬|| বস্তিমভ্যক্তগাত্রায দদ্যাত্ প্রত্যাগতে ততঃ| স্নাত্বা ভুঞ্জীত পযসা জাঙ্গলানাং রসেন বা||৬৭|| পিত্তাতিসারজ্বরশোথগুল্মজীর্ণাতিসারগ্রহণীপ্রদোষান্| জযত্যযং শীঘ্রমতিপ্রবৃদ্ধান্ বিরেচনাস্থাপনযোশ্চ বস্তিঃ ||৬৮||
कृतानुवासनस्यास्य कृतसंसर्जनस्य च| वर्तते यद्यतीसारः पिच्छाबस्तिरतः परम्||६३|| परिवेष्ट्य कुशैरार्द्रैरार्द्रवृन्तानि शाल्मलेः| कृष्णमृत्तिकयाऽऽलिप्य स्वेदयेद्गोमयाग्निना||६४|| सुशुष्कां मृत्तिकां ज्ञात्वा तानि वृन्तानि शाल्मलेः| शृते पयसि मृद्नीयादापोथ्योलूखले ततः||६५|| पिण्डं मुष्टिसमं प्रस्थे तत् पूतं तैलसर्पिषोः| स्नेहितं मात्रया युक्तं कल्केन मधुकस्य च||६६|| बस्तिमभ्यक्तगात्राय दद्यात् प्रत्यागते ततः| स्नात्वा भुञ्जीत पयसा जाङ्गलानां रसेन वा||६७|| पित्तातिसारज्वरशोथगुल्मजीर्णातिसारग्रहणीप्रदोषान्| जयत्ययं शीघ्रमतिप्रवृद्धान् विरेचनास्थापनयोश्च बस्तिः ||६८||
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Adhikarana 26 (69-70) · Śloka 70
পিত্তাতিসারী যস্ত্বেতাং ক্রিযাং মুক্ত্বা নিষেবতে| পিত্তলান্যন্নপানানি তস্য পিত্তং মহাবলম্||৬৯|| কুর্যাদ্রক্তাতিসারং তু রক্তমাশু প্রদূষযেত্| তৃষ্ণাং শূলং বিদাহং চ গুদপাকং চ দারুণম্||৭০||
पित्तातिसारी यस्त्वेतां क्रियां मुक्त्वा निषेवते| पित्तलान्यन्नपानानि तस्य पित्तं महाबलम्||६९|| कुर्याद्रक्तातिसारं तु रक्तमाशु प्रदूषयेत्| तृष्णां शूलं विदाहं च गुदपाकं च दारुणम्||७०||
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Adhikarana 27 (71-76) · Śloka 76
তত্র চ্ছাগং পযঃ শস্তং শীতং সমধুশর্করম্| পানার্থং ভোজনার্থং চ গুদপ্রক্ষালনে তথা||৭১|| ওদনং রক্তশালীনাং পযসা তেন ভোজযেত্| রসৈঃ পারাবতাদীনাং ঘৃতভৃষ্টৈঃ সশর্করৈঃ||৭২|| শশপক্ষিমৃগাণাং চ শীতানাং ধন্বচারিণাম্| রসৈরনম্লৈঃ সঘৃতৈর্ভোজযেত্তং সশর্করৈঃ||৭৩|| রুধিরং মার্গমাজং বা ঘৃতভৃষ্টং প্রশস্যতে| কাশ্মর্যফলযূষো বা কিঞ্চিদম্লঃ সশর্করঃ||৭৪|| নীলোত্পলং মোচরসং সমঙ্গা পদ্মকেশরম্| অজাক্ষীরযুতং দদ্যাজ্জীর্ণে চ পযসৌদনম্||৭৫|| দুর্বলং পাযযিত্বা বা তস্যৈবোপরি ভোজযেত্| প্রাগ্ভক্তং নবনীতং বা দদ্যাত্ সমধুশর্করম্||৭৬||
तत्र च्छागं पयः शस्तं शीतं समधुशर्करम्| पानार्थं भोजनार्थं च गुदप्रक्षालने तथा||७१|| ओदनं रक्तशालीनां पयसा तेन भोजयेत्| रसैः पारावतादीनां घृतभृष्टैः सशर्करैः||७२|| शशपक्षिमृगाणां च शीतानां धन्वचारिणाम्| रसैरनम्लैः सघृतैर्भोजयेत्तं सशर्करैः||७३|| रुधिरं मार्गमाजं वा घृतभृष्टं प्रशस्यते| काश्मर्यफलयूषो वा किञ्चिदम्लः सशर्करः||७४|| नीलोत्पलं मोचरसं समङ्गा पद्मकेशरम्| अजाक्षीरयुतं दद्याज्जीर्णे च पयसौदनम्||७५|| दुर्बलं पाययित्वा वा तस्यैवोपरि भोजयेत्| प्राग्भक्तं नवनीतं वा दद्यात् समधुशर्करम्||७६||
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Adhikarana 28 (77-79) · Śloka 79
প্রাশ্য ক্ষীরোত্থিতং সর্পিঃ কপিঞ্জলরসাশনঃ| ত্র্যহাদারোগ্যমাপ্নোতি পযসা ক্ষীরভুক্ তথা||৭৭|| পীত্বা শতাবরীকল্কং পযসা ক্ষীরভুগ্জযেত্| রক্তাতিসারং পীত্বা বা তযা সিদ্ধং ঘৃতং নরঃ||৭৮|| ঘৃতং যবাগূমণ্ডেন কুটজস্য ফলৈঃ শৃতম্| পেযং তস্যানু পাতব্যা পেযা রক্তোপশান্তযে||৭৯||
प्राश्य क्षीरोत्थितं सर्पिः कपिञ्जलरसाशनः| त्र्यहादारोग्यमाप्नोति पयसा क्षीरभुक् तथा||७७|| पीत्वा शतावरीकल्कं पयसा क्षीरभुग्जयेत्| रक्तातिसारं पीत्वा वा तया सिद्धं घृतं नरः||७८|| घृतं यवागूमण्डेन कुटजस्य फलैः शृतम्| पेयं तस्यानु पातव्या पेया रक्तोपशान्तये||७९||
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Adhikarana 29 (80-81) · Śloka 81
ত্বক্ চ দারুহরিদ্রাযাঃ কুটজস্য ফলানি চ| পিপ্পলী শৃঙ্গবেরং চ দ্রাক্ষা কটুকরোহিণী||৮০|| ষড্ভিরেতৈর্ঘৃতং সিদ্ধং পেযামণ্ডাবচারিতম্| অতীসারং জযেচ্ছীঘ্রং ত্রিদোষমপি দারুণম্||৮১||
त्वक् च दारुहरिद्रायाः कुटजस्य फलानि च| पिप्पली शृङ्गवेरं च द्राक्षा कटुकरोहिणी||८०|| षड्भिरेतैर्घृतं सिद्धं पेयामण्डावचारितम्| अतीसारं जयेच्छीघ्रं त्रिदोषमपि दारुणम्||८१||
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Adhikarana 30 (82-84) · Śloka 84
কৃষ্ণমৃন্মধুকং শঙ্খং রুধিরং তণ্ডুলোদকম্| পীতমেকত্র সক্ষৌদ্রং রক্তসঙ্গ্রহণং পরম্||৮২|| পীতঃ প্রিযঙ্গুকাকল্কঃ সক্ষৌদ্রস্তণ্ডুলাম্ভসা| রক্তস্রাবং জযেচ্ছীঘ্রং ধন্বমাংসরসাশিনঃ||৮৩|| কল্কস্তিলানাং কৃষ্ণানাং শর্করাপঞ্চভাগিকঃ| আজেন পযসা পীতঃ সদ্যো রক্তং নিযচ্ছতি||৮৪||
कृष्णमृन्मधुकं शङ्खं रुधिरं तण्डुलोदकम्| पीतमेकत्र सक्षौद्रं रक्तसङ्ग्रहणं परम्||८२|| पीतः प्रियङ्गुकाकल्कः सक्षौद्रस्तण्डुलाम्भसा| रक्तस्रावं जयेच्छीघ्रं धन्वमांसरसाशिनः||८३|| कल्कस्तिलानां कृष्णानां शर्करापञ्चभागिकः| आजेन पयसा पीतः सद्यो रक्तं नियच्छति||८४||
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Adhikarana 31 (85-86) · Śloka 86
পলং বত্সকবীজস্য শ্রপযিত্বা রসং পিবেত্| যো রসাশী জযেচ্ছীঘ্রং স পৈত্তং জঠরামযম্||৮৫|| পীত্বা সশর্করাক্ষৌদ্রং চন্দনং তণ্ডুলাম্ভসা| দাহতৃষ্ণাপ্রমেহেভ্যো রক্তস্রাবাচ্চ মুচ্যতে||৮৬||
पलं वत्सकबीजस्य श्रपयित्वा रसं पिबेत्| यो रसाशी जयेच्छीघ्रं स पैत्तं जठरामयम्||८५|| पीत्वा सशर्कराक्षौद्रं चन्दनं तण्डुलाम्भसा| दाहतृष्णाप्रमेहेभ्यो रक्तस्रावाच्च मुच्यते||८६||
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Adhikarana 32 (87-88) · Śloka 88
গুদো বহুভিরুত্থানৈর্যস্য পিত্তেন পচ্যতে| সেচযেত্তং সুশীতেন পটোলমধুকাম্বুনা||৮৭|| পঞ্চবল্কমধূকানাং রসৈরিক্ষুরসৈর্ঘৃতৈঃ| ছাগৈর্গব্যৈঃ পযোভির্বা শর্করাক্ষৌদ্রসংযুতৈঃ||৮৮||
गुदो बहुभिरुत्थानैर्यस्य पित्तेन पच्यते| सेचयेत्तं सुशीतेन पटोलमधुकाम्बुना||८७|| पञ्चवल्कमधूकानां रसैरिक्षुरसैर्घृतैः| छागैर्गव्यैः पयोभिर्वा शर्कराक्षौद्रसंयुतैः||८८||
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Adhikarana 33 (89-92) · Śloka 93
প্রক্ষালনানাং কল্কৈর্বা সসর্পিষ্কৈঃ প্রলেপযেত্| এষাং বা সুকৃতৈশ্চূর্ণৈস্তং গুদং প্রতিসারযেত্||৮৯|| ধাতকীলোধ্রচূর্ণৈর্বা সমাংশৈঃ প্রতিসারযেত্| তথা স্রবতি নো রক্তং গুদং তৈঃ প্রতিসারিতম্||৯০|| পক্বতা প্রশমং যাতি বেদনা চোপশাম্যতি| যথোক্তৈঃ সেচনৈঃ শীতৈঃ শোণিতেঽতিস্রবত্যপি||৯১|| গুদবঙ্ক্ষণকট্যূরু সেচযেদ্ঘৃতভাবিতম্| চন্দনাদ্যেন তৈলেন শতধৌতেন সর্পিষা||৯২|| কার্পাসসঙ্গৃহীতেন সেচযেদ্গুদবঙ্ক্ষণম্|৯৩|
प्रक्षालनानां कल्कैर्वा ससर्पिष्कैः प्रलेपयेत्| एषां वा सुकृतैश्चूर्णैस्तं गुदं प्रतिसारयेत्||८९|| धातकीलोध्रचूर्णैर्वा समांशैः प्रतिसारयेत्| तथा स्रवति नो रक्तं गुदं तैः प्रतिसारितम्||९०|| पक्वता प्रशमं याति वेदना चोपशाम्यति| यथोक्तैः सेचनैः शीतैः शोणितेऽतिस्रवत्यपि||९१|| गुदवङ्क्षणकट्यूरु सेचयेद्घृतभावितम्| चन्दनाद्येन तैलेन शतधौतेन सर्पिषा||९२|| कार्पाससङ्गृहीतेन सेचयेद्गुदवङ्क्षणम्|९३|
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Adhikarana 34 (93-95) · Śloka 96
অল্পাল্পং বহুশো রক্তং সশূলমুপবেশ্যতে||৯৩|| যদা বাযুর্বিবদ্ধশ্চ কৃচ্ছ্রং চরতি বা ন বা| পিচ্ছাবস্তিং তদা তস্য যথোক্তমুপকল্পযেত্||৯৪|| প্রপৌণ্ডরীকসিদ্ধেন সর্পিষা চানুবাসযেত্| প্রাযশো দুর্বলগুদাশ্চিরকালাতিসারিণঃ||৯৫|| তস্মাদভীক্ষ্ণশস্তেষাং গুদে স্নেহং প্রযোজযেত্|৯৬|
अल्पाल्पं बहुशो रक्तं सशूलमुपवेश्यते||९३|| यदा वायुर्विबद्धश्च कृच्छ्रं चरति वा न वा| पिच्छाबस्तिं तदा तस्य यथोक्तमुपकल्पयेत्||९४|| प्रपौण्डरीकसिद्धेन सर्पिषा चानुवासयेत्| प्रायशो दुर्बलगुदाश्चिरकालातिसारिणः||९५|| तस्मादभीक्ष्णशस्तेषां गुदे स्नेहं प्रयोजयेत्|९६|
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Adhikarana 35 (96-100) · Śloka 101
পবনোঽতিপ্রবৃত্তো হি স্বে স্থানে লভতেঽধিকম্||৯৬|| বলং তস্য সপিত্তস্য জযার্থে বস্তিরুত্তমঃ| রক্তং বিট্সহিতং পূর্বং পশ্চাদ্বা যোঽতিসার্যতে||৯৭|| শতাবরীঘৃতং তস্য লেহার্থমুপকল্পযেত্| শর্করার্ধাংশিকং লীঢং নবনীতং নবোদ্ধৃতম্||৯৮|| ক্ষৌদ্রপাদং জযেচ্ছীঘ্রং তং বিকারং হিতাশিনঃ| ন্যগ্রোধোদুম্বরাশ্বত্থশুঙ্গানাপোথ্য বাসযেত্||৯৯|| অহোরাত্রং জলে তপ্তে ঘৃতং তেনাম্ভসা পচেত্| তদর্ধশর্করাযুক্তং লিহ্যাত্ সক্ষৌদ্রপাদিকম্||১০০|| অধো বা যদি বাঽপ্যূর্ধ্বং যস্য রক্তং প্রবর্ততে|১০১|
पवनोऽतिप्रवृत्तो हि स्वे स्थाने लभतेऽधिकम्||९६|| बलं तस्य सपित्तस्य जयार्थे बस्तिरुत्तमः| रक्तं विट्सहितं पूर्वं पश्चाद्वा योऽतिसार्यते||९७|| शतावरीघृतं तस्य लेहार्थमुपकल्पयेत्| शर्करार्धांशिकं लीढं नवनीतं नवोद्धृतम्||९८|| क्षौद्रपादं जयेच्छीघ्रं तं विकारं हिताशिनः| न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गानापोथ्य वासयेत्||९९|| अहोरात्रं जले तप्ते घृतं तेनाम्भसा पचेत्| तदर्धशर्करायुक्तं लिह्यात् सक्षौद्रपादिकम्||१००|| अधो वा यदि वाऽप्यूर्ध्वं यस्य रक्तं प्रवर्तते|१०१|
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Adhikarana 36 (101) · Śloka 102
যস্ত্বেবং দুর্বলো মোহাত্ পিত্তলান্যেব সেবতে||১০১|| দারুণং স বলীপাকং প্রাপ্য শীঘ্রং বিপদ্যতে|১০২|
यस्त्वेवं दुर्बलो मोहात् पित्तलान्येव सेवते||१०१|| दारुणं स वलीपाकं प्राप्य शीघ्रं विपद्यते|१०२|
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Adhikarana 37 (102-103) · Śloka 104
শ্লেষ্মাতিসারে প্রথমং হিতং লঙ্ঘনপাচনম্||১০২|| যোজ্যশ্চামাতিসারঘ্নো যথোক্তো দীপনো গণঃ| লঙ্ঘিতস্যানুপূর্ব্যাং চ কৃতাযাং ন নিবর্ততে||১০৩|| কফজো যদ্যতীসারঃ কফঘ্নৈস্তমুপাচরেত্|১০৪|
श्लेष्मातिसारे प्रथमं हितं लङ्घनपाचनम्||१०२|| योज्यश्चामातिसारघ्नो यथोक्तो दीपनो गणः| लङ्घितस्यानुपूर्व्यां च कृतायां न निवर्तते||१०३|| कफजो यद्यतीसारः कफघ्नैस्तमुपाचरेत्|१०४|
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Adhikarana 38 (104-112) · Śloka 113
বিল্বং কর্কটিকা মুস্তমভযা বিশ্বভেষজম্||১০৪|| বচা বিডঙ্গং ভূতীকং ধান্যকং দেবদারু চ| কুষ্ঠং সাতিবিষা পাঠা চব্যং কটুকরোহিণী||১০৫|| পিপ্পলী পিপ্পলীমূলং চিত্রকং হস্তিপিপ্পলী| যোগাঞ্ছ্লোকার্ধবিহিতাংশ্চতুরস্তান্ প্রযোজযেত্||১০৬|| শৃতাঞ্ছ্লেষ্মাতিসারেষু কাযাগ্নিবলবর্ধনান্| অজাজীমসিতাং পাঠাং নাগরং মরিচানি চ||১০৭|| ধাতকীদ্বিগুণং দদ্যান্মাতুলুঙ্গরসাপ্লুতম্| রসাঞ্জনং সাতিবিষং কুটজস্য ফলানি চ||১০৮|| ধাতকীদ্বিগুণং দদ্যাত্ পাতুং সক্ষৌদ্রনাগরম্| ধাতকী নাগরং বিল্বং লোধ্রং পদ্মস্য কেশরম্||১০৯|| জম্বূত্বঙ্নাগরং ধান্যং পাঠা মোচরসো বলা| সমঙ্গা ধাতকী বিল্বমধ্যং জম্ব্বাম্রযোস্ত্বচঃ||১১০|| কপিত্থানি বিডঙ্গানি নাগরং মরিচানি চ| চাঙ্গেরীকোলতক্রাম্লাংশ্চতুরস্তান্ কফোত্তরে||১১১|| শ্লোকার্ধবিহিতান্ দদ্যাত্ সস্নেহলবণান্ খডান্| কপিত্থমধ্যং লীঢ্বা তু সব্যোষক্ষৌদ্রশর্করম্||১১২|| কট্ফলং মধুযুক্তং বা মুচ্যতে জঠরামযাত্|১১৩|
बिल्वं कर्कटिका मुस्तमभया विश्वभेषजम्||१०४|| वचा विडङ्गं भूतीकं धान्यकं देवदारु च| कुष्ठं सातिविषा पाठा चव्यं कटुकरोहिणी||१०५|| पिप्पली पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पली| योगाञ्छ्लोकार्धविहितांश्चतुरस्तान् प्रयोजयेत्||१०६|| शृताञ्छ्लेष्मातिसारेषु कायाग्निबलवर्धनान्| अजाजीमसितां पाठां नागरं मरिचानि च||१०७|| धातकीद्विगुणं दद्यान्मातुलुङ्गरसाप्लुतम्| रसाञ्जनं सातिविषं कुटजस्य फलानि च||१०८|| धातकीद्विगुणं दद्यात् पातुं सक्षौद्रनागरम्| धातकी नागरं बिल्वं लोध्रं पद्मस्य केशरम्||१०९|| जम्बूत्वङ्नागरं धान्यं पाठा मोचरसो बला| समङ्गा धातकी बिल्वमध्यं जम्ब्वाम्रयोस्त्वचः||११०|| कपित्थानि विडङ्गानि नागरं मरिचानि च| चाङ्गेरीकोलतक्राम्लांश्चतुरस्तान् कफोत्तरे||१११|| श्लोकार्धविहितान् दद्यात् सस्नेहलवणान् खडान्| कपित्थमध्यं लीढ्वा तु सव्योषक्षौद्रशर्करम्||११२|| कट्फलं मधुयुक्तं वा मुच्यते जठरामयात्|११३|
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Adhikarana 39 (113-116) · Śloka 116
কণাং মধুযুতাং পীত্বা তক্রং পীত্বা সচিত্রকম্||১১৩|| জগ্ধ্বা বা বালবিল্বানি মুচ্যতে জঠরামযাত্| বালবিল্বং গুডং তৈলং পিপ্পলীং বিশ্বভেষজম্| লিহ্যাদ্বাতে প্রতিহতে সশূলঃ সপ্রবাহিকঃ||১১৪|| ভোজ্যং মূলকষাযেণ বাতঘ্নৈশ্চোপসেবনৈঃ| বাতাতিসারবিহিতৈর্যূষৈর্মাংসরসৈঃ খডৈঃ||১১৫|| পূর্বোক্তমম্লসর্পির্বা ষট্পলং বা যথাবলম্| পুরাণং বা ঘৃতং দদ্যাদ্যবাগূমণ্ডমিশ্রিতম্||১১৬||
कणां मधुयुतां पीत्वा तक्रं पीत्वा सचित्रकम्||११३|| जग्ध्वा वा बालबिल्वानि मुच्यते जठरामयात्| बालबिल्वं गुडं तैलं पिप्पलीं विश्वभेषजम्| लिह्याद्वाते प्रतिहते सशूलः सप्रवाहिकः||११४|| भोज्यं मूलकषायेण वातघ्नैश्चोपसेवनैः| वातातिसारविहितैर्यूषैर्मांसरसैः खडैः||११५|| पूर्वोक्तमम्लसर्पिर्वा षट्पलं वा यथाबलम्| पुराणं वा घृतं दद्याद्यवागूमण्डमिश्रितम्||११६||
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Adhikarana 40 (117-120) · Śloka 120
বাতশ্লেষ্মবিবন্ধে বা কফে বাঽতিস্রবত্যপি| শূলে প্রবাহিকাযাং বা পিচ্ছাবস্তিং প্রযোজযেত্||১১৭|| পিপ্পলীবিল্বকুষ্ঠানাং শতাহ্বাবচযোরপি| কল্কৈঃ সলবণৈর্যুক্তং পূর্বোক্তং সন্নিধাপযেত্||১১৮|| প্রত্যাগতে সুখং স্নাতং কৃতাহারং দিনাত্যযে| বিল্বতৈলেন মতিমান্সুখোষ্ণেনানুবাসযেত্||১১৯|| বচান্তৈরথবা কল্কৈস্তৈলং পক্ত্বাঽনুবাসযেত্| বহুশঃ কফবাতার্তস্তথা স লভতে সুখম্||১২০||
वातश्लेष्मविबन्धे वा कफे वाऽतिस्रवत्यपि| शूले प्रवाहिकायां वा पिच्छाबस्तिं प्रयोजयेत्||११७|| पिप्पलीबिल्वकुष्ठानां शताह्वावचयोरपि| कल्कैः सलवणैर्युक्तं पूर्वोक्तं सन्निधापयेत्||११८|| प्रत्यागते सुखं स्नातं कृताहारं दिनात्यये| बिल्वतैलेन मतिमान्सुखोष्णेनानुवासयेत्||११९|| वचान्तैरथवा कल्कैस्तैलं पक्त्वाऽनुवासयेत्| बहुशः कफवातार्तस्तथा स लभते सुखम्||१२०||
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Adhikarana 41 (121) · Śloka 121
স্বে স্থানে মারুতোঽবশ্যং বর্ধতে কফসঙ্ক্ষযে| স বৃদ্ধঃ সহসা হন্যাত্তস্মাত্তং ত্বরযা জযেত্||১২১||
स्वे स्थाने मारुतोऽवश्यं वर्धते कफसङ्क्षये| स वृद्धः सहसा हन्यात्तस्मात्तं त्वरया जयेत्||१२१||
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Adhikarana 42 (122) · Śloka 122
বাতস্যানু জযেত্ পিত্তং, পিত্তস্যানু জযেত্ কফম্| ত্রযাণাং বা জযেত্ পূর্বং যো ভবেদ্বলবত্তমঃ||১২২||
वातस्यानु जयेत् पित्तं, पित्तस्यानु जयेत् कफम्| त्रयाणां वा जयेत् पूर्वं यो भवेद्बलवत्तमः||१२२||
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Adhikarana 43 (123) · Śloka 123
তত্র শ্লোকঃ- প্রাগুত্পত্তিনিমিত্তানি লক্ষণং সাধ্যতা ন চ| ক্রিযা চাবস্থিকী সিদ্ধা নির্দিষ্টা হ্যতিসারিণাম্||১২৩||
तत्र श्लोकः- प्रागुत्पत्तिनिमित्तानि लक्षणं साध्यता न च| क्रिया चावस्थिकी सिद्धा निर्दिष्टा ह्यतिसारिणाम्||१२३||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 19
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানেঽতিসারচিকিত্সিতং নামৈকোনবিংশোঽধ্যাযঃ||১৯||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थानेऽतिसारचिकित्सितं नामैकोनविंशोऽध्यायः||१९||
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