Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতশ্ছর্দিচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातश्छर्दिचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতশ্ছর্দিচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातश्छर्दिचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
যশস্বিনং ব্রহ্মতপোদ্যুতিভ্যাং জ্বলন্তমগ্ন্যর্কসমপ্রভাবম্| পুনর্বসুং ভূতহিতে নিবিষ্টং পপ্রচ্ছ শিষ্যোঽত্রিজমগ্নিবেশঃ||৩||
यशस्विनं ब्रह्मतपोद्युतिभ्यां ज्वलन्तमग्न्यर्कसमप्रभावम्| पुनर्वसुं भूतहिते निविष्टं पप्रच्छ शिष्योऽत्रिजमग्निवेशः||३||
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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
যাশ্ছর্দযঃ পঞ্চ পুরা ত্বযোক্তা রোগাধিকারে ভিষজাং বরিষ্ঠ!| তাসাং চিকিত্সাং সনিদানলিঙ্গাং যথাবদাচক্ষ্ব নৃণাং হিতার্থম্||৪|| তদগ্নিবেশস্য বচো নিশম্য প্রীতো ভিষক্শ্রেষ্ঠ ইদং জগাদ| যাশ্ছর্দযঃ পঞ্চ পুরা মযোক্তাস্তা বিস্তরেণ ব্রুবতো নিবোধ||৫||
याश्छर्दयः पञ्च पुरा त्वयोक्ता रोगाधिकारे भिषजां वरिष्ठ!| तासां चिकित्सां सनिदानलिङ्गां यथावदाचक्ष्व नृणां हितार्थम्||४|| तदग्निवेशस्य वचो निशम्य प्रीतो भिषक्श्रेष्ठ इदं जगाद| याश्छर्दयः पञ्च पुरा मयोक्तास्ता विस्तरेण ब्रुवतो निबोध||५||
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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
দোষৈঃ পৃথক্ত্রিপ্রভবাশ্চতস্রো দ্বিষ্টার্থযোগাদপি পঞ্চমী স্যাত্|৬|
दोषैः पृथक्त्रिप्रभवाश्चतस्रो द्बिष्टार्थयोगादपि पञ्चमी स्यात्|६|
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তাসাং হৃদুত্ক্লেশকফপ্রসেকৌ দ্বেষোঽশনে চৈব হি পূর্বরূপম্||৬||
तासां हृदुत्क्लेशकफप्रसेकौ द्वेषोऽशने चैव हि पूर्वरूपम्||६||
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Adhikarana 6 (7-9) · Śloka 9
ব্যাযামতীক্ষ্ণৌষধশোকরোগভযোপবাসাদ্যতিকর্শিতস্য| বাযুর্মহাস্রোতসি সম্প্রবৃদ্ধ উত্ক্লেশ্য দোষাংস্তত ঊর্ধ্বমস্যন্||৭|| আমাশযোত্ক্লেশকৃতাং চ মর্ম প্রপীডযংশ্ছর্দিমুদীরযেত্তু| হৃত্পার্শ্বপীডামুখশোষমূর্ধনাভ্যর্তিকাসস্বরভেদতোদৈঃ||৮|| উদ্গারশব্দপ্রবলং সফেনং বিচ্ছিন্নকৃষ্ণং তনুকং কষাযম্| কৃচ্ছ্রেণ চাল্পং মহতা চ বেগেনার্তোঽনিলাচ্ছর্দযতীহ দুঃখম্||৯||
व्यायामतीक्ष्णौषधशोकरोगभयोपवासाद्यतिकर्शितस्य| वायुर्महास्रोतसि सम्प्रवृद्ध उत्क्लेश्य दोषांस्तत ऊर्ध्वमस्यन्||७|| आमाशयोत्क्लेशकृतां च मर्म प्रपीडयंश्छर्दिमुदीरयेत्तु| हृत्पार्श्वपीडामुखशोषमूर्धनाभ्यर्तिकासस्वरभेदतोदैः||८|| उद्गारशब्दप्रबलं सफेनं विच्छिन्नकृष्णं तनुकं कषायम्| कृच्छ्रेण चाल्पं महता च वेगेनार्तोऽनिलाच्छर्दयतीह दुःखम्||९||
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Adhikarana 7 (10-11) · Śloka 11
অজীর্ণকট্বম্লবিদাহ্যশীতৈরামাশযে পিত্তমুদীর্ণবেগম্| রসাযনীভির্বিসৃতং প্রপীড্য মর্মোর্ধ্বমাগম্য বমিং করোতি||১০|| মূর্চ্ছাপিপাসামুখশোষমূর্ধতাল্বক্ষিসন্তাপতমোভ্রমার্তঃ| পীতং ভৃশোষ্ণং হরিতং সতিক্তং ধূম্রং চ পিত্তেন বমেত্ সদাহম্||১১||
अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैरामाशये पित्तमुदीर्णवेगम्| रसायनीभिर्विसृतं प्रपीड्य मर्मोर्ध्वमागम्य वमिं करोति||१०|| मूर्च्छापिपासामुखशोषमूर्धताल्वक्षिसन्तापतमोभ्रमार्तः| पीतं भृशोष्णं हरितं सतिक्तं धूम्रं च पित्तेन वमेत् सदाहम्||११||
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Adhikarana 8 (12-13) · Śloka 13
স্নিগ্ধাতিগুর্বামবিদাহিভোজ্যৈঃ স্বপ্নাদিভিশ্চৈব কফোঽতিবৃদ্ধঃ| উরঃ শিরো মর্ম রসাযনীশ্চ সর্বাঃ সমাবৃত্য বমিং করোতি||১২|| তন্দ্রাস্যমাধুর্যকফপ্রসেকসন্তোষনিদ্রারুচিগৌরবার্তঃ| স্নিগ্ধং ঘনং স্বাদু কফাদ্বিশুদ্ধং সলোমহর্ষোঽল্পরুজং বমেত্তু||১৩||
स्निग्धातिगुर्वामविदाहिभोज्यैः स्वप्नादिभिश्चैव कफोऽतिवृद्धः| उरः शिरो मर्म रसायनीश्च सर्वाः समावृत्य वमिं करोति||१२|| तन्द्रास्यमाधुर्यकफप्रसेकसन्तोषनिद्रारुचिगौरवार्तः| स्निग्धं घनं स्वादु कफाद्विशुद्धं सलोमहर्षोऽल्परुजं वमेत्तु||१३||
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Adhikarana 9 (14-15) · Śloka 15
সমশ্নতঃ সর্বরসান্ প্রসক্তমামপ্রদোষর্তুবিপর্যযৈশ্চ| সর্বে প্রকোপং যুগপত্ প্রপন্নাশ্ছর্দিং ত্রিদোষাং জনযন্তি দোষাঃ||১৪|| শূলাবিপাকারুচিদাহতৃষ্ণাশ্বাসপ্রমোহপ্রবলা প্রসক্তম্| ছর্দিস্ত্রিদোষাল্লবণাম্লনীলসান্দ্রোষ্ণরক্তং বমতাং নৃণাং স্যাত্||১৫||
समश्नतः सर्वरसान् प्रसक्तमामप्रदोषर्तुविपर्ययैश्च| सर्वे प्रकोपं युगपत् प्रपन्नाश्छर्दिं त्रिदोषां जनयन्ति दोषाः||१४|| शूलाविपाकारुचिदाहतृष्णाश्वासप्रमोहप्रबला प्रसक्तम्| छर्दिस्त्रिदोषाल्लवणाम्लनीलसान्द्रोष्णरक्तं वमतां नृणां स्यात्||१५||
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Adhikarana 10 (16-17) · Śloka 17
বিট্স্বেদমূত্রাম্বুবহানি বাযুঃ স্রোতাংসি সংরুধ্য যদোর্ধ্বমেতি| উত্সন্নদোষস্য সমাচিতং তং দোষং সমুদ্ধূয নরস্য কোষ্ঠাত্||১৬|| বিণ্মূত্রযোস্তত্ সমবর্ণগন্ধং তৃট্শ্বাসহিক্কার্তিযুতং প্রসক্তম্| প্রচ্ছর্দযেদ্দুষ্টমিহাতিবেগাত্তযাঽর্দিতশ্চাশু বিনাশমেতি||১৭||
विट्स्वेदमूत्राम्बुवहानि वायुः स्रोतांसि संरुध्य यदोर्ध्वमेति| उत्सन्नदोषस्य समाचितं तं दोषं समुद्धूय नरस्य कोष्ठात्||१६|| विण्मूत्रयोस्तत् समवर्णगन्धं तृट्श्वासहिक्कार्तियुतं प्रसक्तम्| प्रच्छर्दयेद्दुष्टमिहातिवेगात्तयाऽर्दितश्चाशु विनाशमेति||१७||
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Adhikarana 11 (18) · Śloka 18
দ্বিষ্টপ্রতীপাশুচিপূত্যমেধ্যবীভত্সগন্ধাশনদর্শনৈশ্চ| যচ্ছর্দযেত্তপ্তমনা মনোধ্নৈর্দ্বিষ্টার্থসংযোগভবা মতা সা||১৮||
द्विष्टप्रतीपाशुचिपूत्यमेध्यबीभत्सगन्धाशनदर्शनैश्च| यच्छर्दयेत्तप्तमना मनोध्नैर्द्विष्टार्थसंयोगभवा मता सा||१८||
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Adhikarana 12 (19) · Śloka 19
ক্ষীণস্য যা ছর্দিরতিপ্রবৃদ্ধা সোপদ্রবা শোণিতপূযযুক্তা| সচন্দ্রিকাং তাং প্রবদন্ত্যসাধ্যাং সাধ্যাং চিকিত্সেদনুপদ্রবাং চ||১৯||
क्षीणस्य या छर्दिरतिप्रवृद्धा सोपद्रवा शोणितपूययुक्ता| सचन्द्रिकां तां प्रवदन्त्यसाध्यां साध्यां चिकित्सेदनुपद्रवां च||१९||
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Adhikarana 13 (20-22) · Śloka 22
আমাশযোত্ক্লেশভবা হি সর্বাশ্ছর্দ্যো মতা লঙ্ঘনমেব তস্মাত্| প্রাক্কারযেন্মারুতজাং বিমুচ্য সংশোধনং বা কফপিত্তহারি||২০|| চূর্ণানি লিহ্যান্মধুনাঽভযানাং হৃদ্যানি বা যানি বিরেচনানি| মদ্যৈঃ পযোভিশ্চ যুতানি যুক্ত্যা নযন্ত্যধো দোষমুদীর্ণমূর্ধ্বম্||২১|| বল্লীফলাদ্যৈর্বমনং পিবেদ্বা যো দুর্বলস্তং শমনৈশ্চিকিত্সেত্| রসৈর্মনোজ্ঞৈর্লঘুভির্বিশুষ্কৈর্ভক্ষ্যৈঃ সভোজ্যৈর্বিবিধৈশ্চ পানৈঃ||২২||
आमाशयोत्क्लेशभवा हि सर्वाश्छर्द्यो मता लङ्घनमेव तस्मात्| प्राक्कारयेन्मारुतजां विमुच्य संशोधनं वा कफपित्तहारि||२०|| चूर्णानि लिह्यान्मधुनाऽभयानां हृद्यानि वा यानि विरेचनानि| मद्यैः पयोभिश्च युतानि युक्त्या नयन्त्यधो दोषमुदीर्णमूर्ध्वम्||२१|| वल्लीफलाद्यैर्वमनं पिबेद्वा यो दुर्बलस्तं शमनैश्चिकित्सेत्| रसैर्मनोज्ञैर्लघुभिर्विशुष्कैर्भक्ष्यैः सभोज्यैर्विविधैश्च पानैः||२२||
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Adhikarana 14 (23-25) · Śloka 25
সুসংস্কৃতাস্তিত্তিরিবর্হিলাবরসা ব্যপোহন্ত্যনিলপ্রবৃত্তাম্| ছর্দিং তথা কোলকুলত্থধান্যবিল্বাদিমূলাম্লযবৈশ্চ যূষঃ||২৩|| বাতাত্মিকাযাং হৃদযদ্রবার্তো নরঃ পিবেত্ সৈন্ধববদ্ধৃতং তু| সিদ্ধং তথা ধান্যকনাগরাভ্যাং দধ্না চ তোযেন চ দাডিমস্য||২৪|| ব্যোষেণ যুক্তাং লবণৈস্ত্রিভিশ্চ ঘৃতস্য মাত্রামথবা বিদধ্যাত্| স্নিগ্ধানি হৃদ্যানি চ ভোজনানি রসৈঃ সযূষৈর্দধিদাডিমাম্লৈঃ||২৫||
सुसंस्कृतास्तित्तिरिबर्हिलावरसा व्यपोहन्त्यनिलप्रवृत्ताम्| छर्दिं तथा कोलकुलत्थधान्यबिल्वादिमूलाम्लयवैश्च यूषः||२३|| वातात्मिकायां हृदयद्रवार्तो नरः पिबेत् सैन्धववद्धृतं तु| सिद्धं तथा धान्यकनागराभ्यां दध्ना च तोयेन च दाडिमस्य||२४|| व्योषेण युक्तां लवणैस्त्रिभिश्च घृतस्य मात्रामथवा विदध्यात्| स्निग्धानि हृद्यानि च भोजनानि रसैः सयूषैर्दधिदाडिमाम्लैः||२५||
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Adhikarana 15 (26-33) · Śloka 33
পিত্তাত্মিকাযামনুলোমনার্থং দ্রাক্ষাবিদারীক্ষুরসৈস্ত্রিবৃত্ স্যাত্| কফাশযস্থং ত্বতিমাত্রবৃদ্ধং পিত্তং হরেত্ স্বাদুভিরূর্ধ্বমেব||২৬|| শুদ্ধায কালে মধুশর্করাভ্যাং লাজৈশ্চ মন্থং যদি বাঽপি পেযাম্| প্রদাপযেন্মুদ্গরসেন বাঽপি শাল্যোদনং জাঙ্গলজৈ রসৈর্বা||২৭|| সিতোপলামাক্ষিকপিপ্পলীভিঃ কুল্মাষলাজাযবসক্তুগৃঞ্জান্| খর্জূরমাংসান্যথ নারিকেলং দ্রাক্ষামথো বা বদরাণি লিহ্যাত্||২৮|| স্রোতোজলাজোত্পলকোলমজ্জচূর্ণানি লিহ্যান্মধুনাঽভযাং চ| কোলাস্থিমজ্জাঞ্জনমক্ষিকাবিড্লাজাসিতামাগধিকাকণান্ বা||২৯|| দ্রাক্ষারসং বাঽপি পিবেত্ সুশীতং মৃদ্ভৃষ্টলোষ্টপ্রভবং জলং বা| জম্ব্বাম্রযোঃ পল্লবজং কষাযং পিবেত্ সুশীতং মধুসংযুতং বা||৩০|| নিশি স্থিতং বারি সমুদ্গকৃষ্ণং সোশীরধান্যং চণকোদকং বা| গবেধুকামূলজলং গুডূচ্যা জলং পিবেদিক্ষুরসং পযো বা||৩১|| সেব্যং পিবেত্ কাঞ্চনগৈরিকং বা সবালকং তণ্ডুলধাবনেন| ধাত্রীরসেনোত্তমচন্দনং বা তৃষ্ণাবমিঘ্নানি সমাক্ষিকাণি||৩২|| কল্কং তথা চন্দনচব্যমাংসীদ্রাক্ষোত্তমাবালকগৈরিকাণাম্| শীতাম্বুনা গৈরিকশালিচূর্ণং মূর্বাং তথা তণ্ডুলধাবনেন||৩৩||
पित्तात्मिकायामनुलोमनार्थं द्राक्षाविदारीक्षुरसैस्त्रिवृत् स्यात्| कफाशयस्थं त्वतिमात्रवृद्धं पित्तं हरेत् स्वादुभिरूर्ध्वमेव||२६|| शुद्धाय काले मधुशर्कराभ्यां लाजैश्च मन्थं यदि वाऽपि पेयाम्| प्रदापयेन्मुद्गरसेन वाऽपि शाल्योदनं जाङ्गलजै रसैर्वा||२७|| सितोपलामाक्षिकपिप्पलीभिः कुल्माषलाजायवसक्तुगृञ्जान्| खर्जूरमांसान्यथ नारिकेलं द्राक्षामथो वा बदराणि लिह्यात्||२८|| स्रोतोजलाजोत्पलकोलमज्जचूर्णानि लिह्यान्मधुनाऽभयां च| कोलास्थिमज्जाञ्जनमक्षिकाविड्लाजासितामागधिकाकणान् वा||२९|| द्राक्षारसं वाऽपि पिबेत् सुशीतं मृद्भृष्टलोष्टप्रभवं जलं वा| जम्ब्वाम्रयोः पल्लवजं कषायं पिबेत् सुशीतं मधुसंयुतं वा||३०|| निशि स्थितं वारि समुद्गकृष्णं सोशीरधान्यं चणकोदकं वा| गवेधुकामूलजलं गुडूच्या जलं पिबेदिक्षुरसं पयो वा||३१|| सेव्यं पिबेत् काञ्चनगैरिकं वा सबालकं तण्डुलधावनेन| धात्रीरसेनोत्तमचन्दनं वा तृष्णावमिघ्नानि समाक्षिकाणि||३२|| कल्कं तथा चन्दनचव्यमांसीद्राक्षोत्तमाबालकगैरिकाणाम्| शीताम्बुना गैरिकशालिचूर्णं मूर्वां तथा तण्डुलधावनेन||३३||
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Adhikarana 16 (34-39) · Śloka 39
কফাত্মিকাযাং বমনং প্রশস্তং সপিপ্পলীসর্ষপনিম্বতোযৈঃ| পিণ্ডীতকৈঃ সৈন্ধবসম্প্রযুক্তৈর্বম্যাং কফামাশযশোধনার্থম্||৩৪|| গোধূমশালীন্ সযবান্ পুরাণান্ যূষৈঃ পটোলামৃতচিত্রকাণাম্| ব্যোষস্য নিম্বস্য চ তক্রসিদ্ধৈর্যূষৈঃ ফলাম্লৈঃ কটুভিস্তথাঽদ্যাত্||৩৫|| রসাংশ্চ শূল্যানি চ জাঙ্গলানাং মাংসানি জীর্ণান্মধুসীধ্বরিষ্টান্| রাগাংস্তথা ষাডবপানকানি দ্রাক্ষাকপিত্থৈঃ ফলপূরকৈশ্চ||৩৬|| মুদ্গান্মসূরাংশ্চণকান্ কলাযান্ ভৃষ্টান্ যুতান্নাগরমাক্ষিকাভ্যাম্| লিহ্যাত্তথৈব ত্রিফলাবিডঙ্গচূর্ণং বিডঙ্গপ্লবযোরথো বা||৩৭|| সজাম্ববং বা বদরাম্লচূর্ণং মুস্তাযুতাং কর্কটকস্য শৃঙ্গীম্| দুরালভাং বা মধুসম্প্রযুক্তাং লিহ্যাত্ কফচ্ছর্দিবিনিগ্রহার্থম্||৩৮|| মনঃশিলাযাঃ ফলপূরকস্য রসৈঃ কপিত্থস্য চ পিপ্পলীনাম্| ক্ষৌদ্রেণ চূর্ণং মরিচৈশ্চ যুক্তং লিহঞ্জযেচ্ছর্দিমুদীর্ণবেগাম্||৩৯||
कफात्मिकायां वमनं प्रशस्तं सपिप्पलीसर्षपनिम्बतोयैः| पिण्डीतकैः सैन्धवसम्प्रयुक्तैर्वम्यां कफामाशयशोधनार्थम्||३४|| गोधूमशालीन् सयवान् पुराणान् यूषैः पटोलामृतचित्रकाणाम्| व्योषस्य निम्बस्य च तक्रसिद्धैर्यूषैः फलाम्लैः कटुभिस्तथाऽद्यात्||३५|| रसांश्च शूल्यानि च जाङ्गलानां मांसानि जीर्णान्मधुसीध्वरिष्टान्| रागांस्तथा षाडवपानकानि द्राक्षाकपित्थैः फलपूरकैश्च||३६|| मुद्गान्मसूरांश्चणकान् कलायान् भृष्टान् युतान्नागरमाक्षिकाभ्याम्| लिह्यात्तथैव त्रिफलाविडङ्गचूर्णं विडङ्गप्लवयोरथो वा||३७|| सजाम्बवं वा बदराम्लचूर्णं मुस्तायुतां कर्कटकस्य शृङ्गीम्| दुरालभां वा मधुसम्प्रयुक्तां लिह्यात् कफच्छर्दिविनिग्रहार्थम्||३८|| मनःशिलायाः फलपूरकस्य रसैः कपित्थस्य च पिप्पलीनाम्| क्षौद्रेण चूर्णं मरिचैश्च युक्तं लिहञ्जयेच्छर्दिमुदीर्णवेगाम्||३९||
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Adhikarana 17 (40) · Śloka 40
যৈষা পৃথক্ত্বেন মযা ক্রিযোক্তা তাং সন্নিপাতেঽপি সমস্য বুদ্ধ্যা| দোষর্তুরোগাগ্নিবলান্যবেক্ষ্য প্রযোজযেচ্ছাস্ত্রবিদপ্রমত্তঃ||৪০||
यैषा पृथक्त्वेन मया क्रियोक्ता तां सन्निपातेऽपि समस्य बुद्ध्या| दोषर्तुरोगाग्निबलान्यवेक्ष्य प्रयोजयेच्छास्त्रविदप्रमत्तः||४०||
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Adhikarana 18 (41-44) · Śloka 44
মনোভিঘাতে তু মনোনুকূলা বাচঃ সমাশ্বাসনহর্ষণানি| লোকপ্রসিদ্ধাঃ শ্রুতযো বযস্যাঃ শৃঙ্গারিকাশ্চৈব হিতা বিহারাঃ||৪১|| গন্ধা বিচিত্রা মনসোঽনুকূলা মৃত্পুষ্পশুক্তাম্লফলাদিকানাম্| শাকানি ভোজ্যান্যথ পানকানি সুসংস্কৃতাঃ ষাডবরাগলেহাঃ||৪২|| যূষা রসাঃ কাম্বলিকা খডাশ্চ মাংসানি ধানা বিবিধাশ্চ ভক্ষ্যাঃ| ফলানি মূলানি চ গন্ধবর্ণরসৈরুপেতানি বমিং জযন্তি||৪৩|| গন্ধং রসং স্পর্শমথাপি শব্দং রূপং চ যদ্যত্ প্রিযমপ্যসাত্ম্যম্| তদেব দদ্যাত্ প্রশমায তস্যাস্তজ্জো হি রোগঃ সুখ এব জেতুম্||৪৪||
मनोभिघाते तु मनोनुकूला वाचः समाश्वासनहर्षणानि| लोकप्रसिद्धाः श्रुतयो वयस्याः शृङ्गारिकाश्चैव हिता विहाराः||४१|| गन्धा विचित्रा मनसोऽनुकूला मृत्पुष्पशुक्ताम्लफलादिकानाम्| शाकानि भोज्यान्यथ पानकानि सुसंस्कृताः षाडवरागलेहाः||४२|| यूषा रसाः काम्बलिका खडाश्च मांसानि धाना विविधाश्च भक्ष्याः| फलानि मूलानि च गन्धवर्णरसैरुपेतानि वमिं जयन्ति||४३|| गन्धं रसं स्पर्शमथापि शब्दं रूपं च यद्यत् प्रियमप्यसात्म्यम्| तदेव दद्यात् प्रशमाय तस्यास्तज्जो हि रोगः सुख एव जेतुम्||४४||
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Adhikarana 19 (45) · Śloka 45
ছর্দ্যুত্থিতানাং চ চিকিত্সিতাত্ স্বাচ্চিকিত্সিতং কার্যমুপদ্রবাণাম্| অতিপ্রবৃত্তাসু বিরেচনস্য কর্মাতিযোগে বিহিতং বিধেযম্||৪৫||
छर्द्युत्थितानां च चिकित्सितात् स्वाच्चिकित्सितं कार्यमुपद्रवाणाम्| अतिप्रवृत्तासु विरेचनस्य कर्मातियोगे विहितं विधेयम्||४५||
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Adhikarana 20 (46-47) · Śloka 47
বমিপ্রসঙ্গাত্ পবনোঽপ্যবশ্যং ধাতুক্ষযাদ্ধৃদ্ধিমুপৈতি তস্মাত্| চিরপ্রবৃত্তাস্বনিলাপহানি কার্যাণ্যুপস্তম্ভনবৃংহণানি||৪৬|| সর্পির্গুডাঃ ক্ষীরবিধির্ঘৃতানি কল্যাণকত্র্যূষণজীবনানি| বৃষ্যাস্তথা মাংসরসাঃ সলেহাশ্চিরপ্রসক্তাং চ বমিং জযন্তি||৪৭||
वमिप्रसङ्गात् पवनोऽप्यवश्यं धातुक्षयाद्धृद्धिमुपैति तस्मात्| चिरप्रवृत्तास्वनिलापहानि कार्याण्युपस्तम्भनबृंहणानि||४६|| सर्पिर्गुडाः क्षीरविधिर्घृतानि कल्याणकत्र्यूषणजीवनानि| वृष्यास्तथा मांसरसाः सलेहाश्चिरप्रसक्तां च वमिं जयन्ति||४७||
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Adhikarana 21 (48) · Śloka 48
তত্র শ্লোকঃ- হেতুং সঙ্খ্যাং লক্ষণমুপদ্রবান্ সাধ্যতাং ন যোগাংশ্চ| ছর্দীনাং প্রশমার্থং প্রাহ চিকিত্সিতং মুনিবর্যঃ||৪৮||
तत्र श्लोकः- हेतुं सङ्ख्यां लक्षणमुपद्रवान् साध्यतां न योगांश्च| छर्दीनां प्रशमार्थं प्राह चिकित्सितं मुनिवर्यः||४८||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 20
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে চিকিত্সাস্থানে ছর্দিচিকিত্সিতং নাম বিংশোঽধ্যাযঃ||২০||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते चिकित्सास्थाने छर्दिचिकित्सितं नाम विंशोऽध्यायः||२०||
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