Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মাষপর্ণভৃতীযং বাজীকরণপাদং ব্যখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो माषपर्णभृतीयं वाजीकरणपादं व्यख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মাষপর্ণভৃতীযং বাজীকরণপাদং ব্যখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो माषपर्णभृतीयं वाजीकरणपादं व्यख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5
মাষপর্ণভৃতাং ধেনুং গৃষ্টিং পুষ্টাং চতুঃস্তনীম্| সমানবর্ণবত্সাং চ জীবদ্বত্সাং চ বুদ্ধিমান্||৩|| রোহিণীমথবা কৃষ্ণামূর্ধ্বশৃঙ্গীমদারুণাম্| ইক্ষ্বাদামর্জুনাদাং বা সান্দ্রক্ষীরাং চ ধারযেত্||৪|| কেবলং তু পযস্তস্যাঃ শৃতং বাঽশৃতমেব বা| শর্করাক্ষৌদ্রসর্পির্ভির্যুক্তং তদ্বৃষ্যমুত্তমম্||৫||
माषपर्णभृतां धेनुं गृष्टिं पुष्टां चतुःस्तनीम्| समानवर्णवत्सां च जीवद्वत्सां च बुद्धिमान्||३|| रोहिणीमथवा कृष्णामूर्ध्वशृङ्गीमदारुणाम्| इक्ष्वादामर्जुनादां वा सान्द्रक्षीरां च धारयेत्||४|| केवलं तु पयस्तस्याः शृतं वाऽशृतमेव वा| शर्कराक्षौद्रसर्पिर्भिर्युक्तं तद्वृष्यमुत्तमम्||५||
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Adhikarana 3 (6-7) · Śloka 7
শুক্রলৈর্জীবনীযৈশ্চ বৃংহণৈর্বলবর্ধনৈঃ| ক্ষীরসঞ্জননৈশ্চৈব পযঃ সিদ্ধং পৃথক্ পৃথক্||৬|| যুক্তং গোধূমচূর্ণেন সঘৃতক্ষৌদ্রশর্করম্| পর্যাযেণ প্রযোক্তব্যমিচ্ছতা শুক্রমক্ষযম্||৭||
शुक्रलैर्जीवनीयैश्च बृंहणैर्बलवर्धनैः| क्षीरसञ्जननैश्चैव पयः सिद्धं पृथक् पृथक्||६|| युक्तं गोधूमचूर्णेन सघृतक्षौद्रशर्करम्| पर्यायेण प्रयोक्तव्यमिच्छता शुक्रमक्षयम्||७||
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Adhikarana 4 (8-10) · Śloka 10
মেদাং পযস্যাং জীবন্তীং বিদারীং কণ্টকারিকাম্| শ্বদংষ্ট্রাং ক্ষীরিকাং মাষান্ গোধূমাঞ্ছালিষষ্টিকান্||৮|| পযস্যর্ধোদকে পক্ত্বা কার্ষিকানাঢকোন্মিতে| বিবর্জযেত্ পযঃশেষং তত্ পূতং ক্ষৌদ্রসর্পিষা||৯|| যুক্তং সশর্করং পীত্বা বৃদ্ধঃ সপ্ততিকোঽপি বা| বিপুলং লভতেঽপত্যং যুবেব চ স হৃষ্যতি||১০||
मेदां पयस्यां जीवन्तीं विदारीं कण्टकारिकाम्| श्वदंष्ट्रां क्षीरिकां माषान् गोधूमाञ्छालिषष्टिकान्||८|| पयस्यर्धोदके पक्त्वा कार्षिकानाढकोन्मिते| विवर्जयेत् पयःशेषं तत् पूतं क्षौद्रसर्पिषा||९|| युक्तं सशर्करं पीत्वा वृद्धः सप्ततिकोऽपि वा| विपुलं लभतेऽपत्यं युवेव च स हृष्यति||१०||
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Adhikarana 5 (11) · Śloka 11
মণ্ডলৈর্জাতরূপস্য তস্যা এব পযঃ শৃতম্| অপত্যজননং সিদ্ধং সঘৃতক্ষৌদ্রশর্করম্||১১||
मण्डलैर्जातरूपस्य तस्या एव पयः शृतम्| अपत्यजननं सिद्धं सघृतक्षौद्रशर्करम्||११||
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Adhikarana 6 (12-14) · Śloka 14
ত্রিংশত্ সুপিষ্টাঃ পিপ্পল্যঃ প্রকুঞ্চে তৈলসর্পিষোঃ| ভৃষ্টাঃ সশর্করাক্ষৌদ্রাঃ ক্ষীরধারাবদোহিতাঃ||১২|| পীত্বা যথাবলং চোর্ধ্বং ষষ্টিকং ক্ষীরসর্পিষা| ভুক্ত্বা ন রাত্রিমস্তব্ধং লিঙ্গং পশ্যতি না ক্ষরত্||১৩|| (ইতি বৃষ্যঃ পিপ্পলীযোগঃ)| শ্বদংষ্ট্রাযা বিদার্যাশ্চ রসে ক্ষীরচতুর্গুণে| ঘৃতাঢ্যঃ সাধিতো বৃষ্যো মাষষষ্টিকপাযসঃ||১৪|| (ইতি বৃষ্যপাযসযোগঃ)|
त्रिंशत् सुपिष्टाः पिप्पल्यः प्रकुञ्चे तैलसर्पिषोः| भृष्टाः सशर्कराक्षौद्राः क्षीरधारावदोहिताः||१२|| पीत्वा यथाबलं चोर्ध्वं षष्टिकं क्षीरसर्पिषा| भुक्त्वा न रात्रिमस्तब्धं लिङ्गं पश्यति ना क्षरत्||१३|| (इति वृष्यः पिप्पलीयोगः)| श्वदंष्ट्राया विदार्याश्च रसे क्षीरचतुर्गुणे| घृताढ्यः साधितो वृष्यो माषषष्टिकपायसः||१४|| (इति वृष्यपायसयोगः)|
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Adhikarana 7 (15-17) · Śloka 17
ফলানাং জীবনীযানাং স্নিগ্ধানাং রুচিকারিণাম্| কুডবশ্চূর্ণিতানাং স্যাত্ স্বযঙ্গুপ্তাফলস্য চ||১৫|| কুডবশ্চৈব মাষাণাং দ্বৌ দ্বৌ চ তিলমুদ্গযোঃ| গোধূমশালিচূর্ণানাং কুডবঃ কুডবো ভবেত্||১৬|| সর্পিষঃ কুডবশ্চৈকস্তত্ সর্বং ক্ষীরমর্দিতম্ | পক্ত্বা পূপলিকাঃ খাদেদ্বহ্ব্যঃ স্যুর্যস্য যোষিতঃ||১৭|| (ইতি বৃষ্যপূপলিকাঃ)|
फलानां जीवनीयानां स्निग्धानां रुचिकारिणाम्| कुडवश्चूर्णितानां स्यात् स्वयङ्गुप्ताफलस्य च||१५|| कुडवश्चैव माषाणां द्वौ द्वौ च तिलमुद्गयोः| गोधूमशालिचूर्णानां कुडवः कुडवो भवेत्||१६|| सर्पिषः कुडवश्चैकस्तत् सर्वं क्षीरमर्दितम् | पक्त्वा पूपलिकाः खादेद्बह्व्यः स्युर्यस्य योषितः||१७|| (इति वृष्यपूपलिकाः)|
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Adhikarana 8 (18) · Śloka 18
ঘৃতং শতাবরীগর্ভং ক্ষীরে দশগুণে পচেত্| শর্করাপিপ্পলীক্ষৌদ্রযুক্তং তদ্বৃষ্যমুত্তমম্||১৮|| (ইতি বৃষ্যং শতাবরীঘৃতম্)|
घृतं शतावरीगर्भं क्षीरे दशगुणे पचेत्| शर्करापिप्पलीक्षौद्रयुक्तं तद्वृष्यमुत्तमम्||१८|| (इति वृष्यं शतावरीघृतम्)|
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Adhikarana 9 (19) · Śloka 19
কর্ষং মধুকচূর্ণস্য ঘৃতক্ষৌদ্রসমাংশিকম্ | প্রযুঙ্ক্তে যঃ পযশ্চানু নিত্যবেগঃ স না ভবেত্||১৯|| (ইতি বৃষ্যমধুকযোগঃ)|
कर्षं मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमांशिकम् | प्रयुङ्क्ते यः पयश्चानु नित्यवेगः स ना भवेत्||१९|| (इति वृष्यमधुकयोगः)|
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Adhikarana 10 (20-25) · Śloka 25
ঘৃতক্ষীরাশনো নির্ভীর্নির্ব্যাধির্নিত্যগো যুবা| সঙ্কল্পপ্রবণো নিত্যং নরঃ স্ত্রীষু বৃষাযতে||২০|| কৃতৈককৃত্যাঃ সিদ্ধার্থা যে চান্যোঽন্যানুবর্তিনঃ| কলাসু কুশলাস্তুল্যাঃ সত্ত্বেন বযসা চ যে||২১|| কুলমাহাত্ম্যদাক্ষিণ্যশীলশৌচসমন্বিতাঃ| যে কামনিত্যা যে হৃষ্টা যে বিশোকা গতব্যথাঃ||২২|| যে তুল্যশীলা যে ভক্তা যে প্রিযা যে প্রিযংবদাঃ| তৈর্নরঃ সহ বিস্রব্ধঃ সুবযস্যৈর্বৃষাযতে||২৩|| অভ্যঙ্গোত্সাদনস্নানগন্ধমাল্যবিভূষণৈঃ| গৃহশয্যাসনসুখৈর্বাসোভিরহতৈঃ প্রিযৈঃ||২৪|| বিহঙ্গানাং রুতৈরিষ্টৈঃ স্ত্রীণাং চাভরণস্বনৈঃ| সংবাহনৈর্বরস্ত্রীণামিষ্টানাং চ বৃষাযতে||২৫||
घृतक्षीराशनो निर्भीर्निर्व्याधिर्नित्यगो युवा| सङ्कल्पप्रवणो नित्यं नरः स्त्रीषु वृषायते||२०|| कृतैककृत्याः सिद्धार्था ये चान्योऽन्यानुवर्तिनः| कलासु कुशलास्तुल्याः सत्त्वेन वयसा च ये||२१|| कुलमाहात्म्यदाक्षिण्यशीलशौचसमन्विताः| ये कामनित्या ये हृष्टा ये विशोका गतव्यथाः||२२|| ये तुल्यशीला ये भक्ता ये प्रिया ये प्रियंवदाः| तैर्नरः सह विस्रब्धः सुवयस्यैर्वृषायते||२३|| अभ्यङ्गोत्सादनस्नानगन्धमाल्यविभूषणैः| गृहशय्यासनसुखैर्वासोभिरहतैः प्रियैः||२४|| विहङ्गानां रुतैरिष्टैः स्त्रीणां चाभरणस्वनैः| संवाहनैर्वरस्त्रीणामिष्टानां च वृषायते||२५||
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Adhikarana 11 (26-28) · Śloka 28
মত্তদ্বিরেফাচরিতাঃ সপদ্মাঃ সলিলাশযাঃ| জাত্যুত্পলসুগন্ধীনি শীতগর্ভগৃহণি চ||২৬|| নদ্যঃ ফেনোত্তরীযাশ্চ গিরযো নীলসানবঃ| উন্নতির্নীলমেঘানাং, রম্যচন্দ্রোদযা নিশাঃ||২৭|| বাযবঃ সুখসংস্পর্শাঃ কুমুদাকরগন্ধিনঃ| রতিভোগক্ষমা রাত্র্যঃ সঙ্কোচাগুরুবল্লভাঃ||২৮||
मत्तद्विरेफाचरिताः सपद्माः सलिलाशयाः| जात्युत्पलसुगन्धीनि शीतगर्भगृहणि च||२६|| नद्यः फेनोत्तरीयाश्च गिरयो नीलसानवः| उन्नतिर्नीलमेघानां, रम्यचन्द्रोदया निशाः||२७|| वायवः सुखसंस्पर्शाः कुमुदाकरगन्धिनः| रतिभोगक्षमा रात्र्यः सङ्कोचागुरुवल्लभाः||२८||
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Adhikarana 12 (29-31) · Śloka 31
সুখাঃ সহাযাঃ পরপুষ্টঘুষ্টাঃ ফুল্লা বনান্তা বিশদান্নপানাঃ| গান্ধর্বশব্দাশ্চ সুগন্ধযোগাঃ সত্ত্বং বিশালং নিরুপদ্রবং চ||২৯|| সিদ্ধার্থতা চাভিনবশ্চ কামঃ স্ত্রী চাযুধং সর্বমিহাত্মজস্য| বযো নবং জাতমদশ্চ কালো হর্ষস্য যোনিঃ পরমা নরাণাম্||৩০|| তত্র শ্লোকঃ- প্রহর্ষযোনযো যোগা ব্যাখ্যাতা দশ পঞ্চ চ| মাষপর্ণভৃতীযেঽস্মিন্ পাদে শুক্রবলপ্রদাঃ ||৩১||
सुखाः सहायाः परपुष्टघुष्टाः फुल्ला वनान्ता विशदान्नपानाः| गान्धर्वशब्दाश्च सुगन्धयोगाः सत्त्वं विशालं निरुपद्रवं च||२९|| सिद्धार्थता चाभिनवश्च कामः स्त्री चायुधं सर्वमिहात्मजस्य| वयो नवं जातमदश्च कालो हर्षस्य योनिः परमा नराणाम्||३०|| तत्र श्लोकः- प्रहर्षयोनयो योगा व्याख्याता दश पञ्च च| माषपर्णभृतीयेऽस्मिन् पादे शुक्रबलप्रदाः ||३१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 3
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানে বাজীকরণাধ্যাযে মাষপর্ণভৃতীযো নাম বাজীকরণপাদস্তৃতীযঃ||৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने वाजीकरणाध्याये माषपर्णभृतीयो नाम वाजीकरणपादस्तृतीयः||३||
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