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8. vājīkaraṇā'dhyāyaḥ - pumāñjātabalādikō vājīkaraṇapādaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ পুমাঞ্জাতবলাদিকং বাজীকরণপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः पुमाञ्जातबलादिकं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-10) · Śloka 10

পুমান্ যথা জাতবলো যাবদিচ্ছং স্ত্রিযো ব্রজেত্| যথা চাপত্যবান্ সদ্যো ভবেত্তদুপদেক্ষ্যতে||৩|| ন হি জাতবলাঃ সর্বে নরাশ্চাপত্যভাগিনঃ| বৃহচ্ছরীরা বলিনঃ সন্তি নারীষু দুর্বলাঃ||৪|| সন্তি চাল্পাশ্রযাঃ স্ত্রীষু বলবন্তো বহুপ্রজাঃ| প্রকৃত্যা চাবলাঃ সন্তি সন্তি চামযদুর্বলাঃ||৫|| নরাশ্চটকবত্ কেচিদ্ ব্রজন্তি বহুশঃ স্ত্রিযম্| গজবচ্চ প্রসিঞ্চন্তি কেচিন্ন বহুগামিনঃ||৬|| কালযোগবলাঃ কেচিত্ কেচিদভ্যসনধ্রুবাঃ| কেচিত্ প্রযত্নৈর্ব্যজ্যন্তে বৃষাঃ কেচিত্ স্বভাবতঃ||৭|| তস্মাত্ প্রযোগান্ বক্ষ্যামো দুর্বলানাং বলপ্রদান্| সুখোপভোগান্ বলিনাং ভূযশ্চ বলবর্ধনান্||৮|| পূর্বং শুদ্ধশরীরাণাং নিরূহৈঃ সানুবাসনৈঃ| বলাপেক্ষী প্রযুঞ্জীত শুক্রাপত্যবিবর্ধনান্||৯|| ঘৃততৈলরসক্ষীরশর্করামধুসংযুতাঃ| বস্তযঃ সংবিধাতব্যাঃ ক্ষীরমাংসরসাশিনাম্||১০||

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पुमान् यथा जातबलो यावदिच्छं स्त्रियो व्रजेत्| यथा चापत्यवान् सद्यो भवेत्तदुपदेक्ष्यते||३|| न हि जातबलाः सर्वे नराश्चापत्यभागिनः| बृहच्छरीरा बलिनः सन्ति नारीषु दुर्बलाः||४|| सन्ति चाल्पाश्रयाः स्त्रीषु बलवन्तो बहुप्रजाः| प्रकृत्या चाबलाः सन्ति सन्ति चामयदुर्बलाः||५|| नराश्चटकवत् केचिद् व्रजन्ति बहुशः स्त्रियम्| गजवच्च प्रसिञ्चन्ति केचिन्न बहुगामिनः||६|| कालयोगबलाः केचित् केचिदभ्यसनध्रुवाः| केचित् प्रयत्नैर्व्यज्यन्ते वृषाः केचित् स्वभावतः||७|| तस्मात् प्रयोगान् वक्ष्यामो दुर्बलानां बलप्रदान्| सुखोपभोगान् बलिनां भूयश्च बलवर्धनान्||८|| पूर्वं शुद्धशरीराणां निरूहैः सानुवासनैः| बलापेक्षी प्रयुञ्जीत शुक्रापत्यविवर्धनान्||९|| घृततैलरसक्षीरशर्करामधुसंयुताः| बस्तयः संविधातव्याः क्षीरमांसरसाशिनाम्||१०||

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Adhikarana 3 (11-14) · Śloka 14

পিষ্ট্বা বরাহমাংসানি দত্ত্বা মরিচসৈন্ধবে| কোলবদ্গুলিকাঃ কৃত্বা তপ্তে সর্পিষি বর্তযেত্ ||১১|| বর্তনস্তম্ভিতাস্তাশ্চ প্রক্ষেপ্যাঃ কৌক্কুটে রসে| ঘৃতাঢ্যে গন্ধপিশুনে দধিদাডিমসারিকে||১২|| যথা ন ভিন্দ্যাদ্গুলি(টি)কাস্তথা তং সাধযেদ্রসম্| তং পিবন্ ভক্ষযংস্তাশ্চ লভতে শুক্রমক্ষযম্||১৩|| মাংসানামেবমন্যেষাং মেদ্যানাং কারযেদ্ভিষক্| গুটিকাঃ সরসাস্তাসং প্রযোগঃ শুক্রবর্ধনঃ||১৪|| (ইতি বৃষ্যা মাংসগুটিকাঃ)|

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पिष्ट्वा वराहमांसानि दत्त्वा मरिचसैन्धवे| कोलवद्गुलिकाः कृत्वा तप्ते सर्पिषि वर्तयेत् ||११|| वर्तनस्तम्भितास्ताश्च प्रक्षेप्याः कौक्कुटे रसे| घृताढ्ये गन्धपिशुने दधिदाडिमसारिके||१२|| यथा न भिन्द्याद्गुलि(टि)कास्तथा तं साधयेद्रसम्| तं पिबन् भक्षयंस्ताश्च लभते शुक्रमक्षयम्||१३|| मांसानामेवमन्येषां मेद्यानां कारयेद्भिषक्| गुटिकाः सरसास्तासं प्रयोगः शुक्रवर्धनः||१४|| (इति वृष्या मांसगुटिकाः)|

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Adhikarana 4 (15-16) · Śloka 16

মাষানঙ্কুরিতাঞ্ছুদ্ধান্ বিতুষান্ সাজডাফলান্| ঘৃতাঢ্যে মাহিষরসে দধিদাডিমসারিকে||১৫|| প্রক্ষিপেন্মাত্রযা যুক্তো ধান্যজীরকনাগরৈঃ| ভুক্তঃ পীতশ্চ স রসঃ কুরুতে শুক্রমক্ষযম্||১৬|| (ইতি বৃষ্যো মাহিষরসঃ)|

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माषानङ्कुरिताञ्छुद्धान् वितुषान् साजडाफलान्| घृताढ्ये माहिषरसे दधिदाडिमसारिके||१५|| प्रक्षिपेन्मात्रया युक्तो धान्यजीरकनागरैः| भुक्तः पीतश्च स रसः कुरुते शुक्रमक्षयम्||१६|| (इति वृष्यो माहिषरसः)|

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Adhikarana 5 (17-18) · Śloka 18

আর্দ্রাণি মত্স্যমাংসানি শফরীর্বা সুভার্জিতাঃ| তপ্তে সর্পিষি যঃ খাদেত্ স গচ্ছেত্ স্ত্রীষু ন ক্ষযম্||১৭|| ঘৃতভৃষ্টান্ রসে চ্ছাগে রোহিতান্ ফলসারিকে| অনুপীতরসান্ স্নিগ্ধানপত্যার্থী প্রযোজযেত্||১৮|| (ইতি বৃষ্যঘৃতভৃষ্টমত্স্যমাংসানি)|

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आर्द्राणि मत्स्यमांसानि शफरीर्वा सुभार्जिताः| तप्ते सर्पिषि यः खादेत् स गच्छेत् स्त्रीषु न क्षयम्||१७|| घृतभृष्टान् रसे च्छागे रोहितान् फलसारिके| अनुपीतरसान् स्निग्धानपत्यार्थी प्रयोजयेत्||१८|| (इति वृष्यघृतभृष्टमत्स्यमांसानि)|

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Adhikarana 6 (19-22) · Śloka 22

কুট্টকং মত্স্যমাংসানাং হিঙ্গুসৈন্ধবধান্যকৈঃ| যুক্তং গোধূমচূর্ণেন ঘৃতে পূপলিকাঃ পচেত্||১৯|| মাহিষে চ রসে মত্স্যান্ স্নিগ্ধাম্ললবণান্ পচেত্| রসে চানুগতে মাংসং পোথযেত্তত্র চাবপেত্||২০|| মরিচং জীরকং ধান্যমল্পং হিঙ্গু নবং ঘৃতম্| মাষপূপলিকানাং তদ্গর্ভার্থমুপকল্পযেত্||২১|| এতৌ পূপলিকাযোগৌ বৃংহণৌ বলবর্ধনৌ| হর্ষসৌভাগ্যদৌ পুত্র্যৌ পরং শুক্রাভিবর্ধনৌ||২২|| (ইতি বৃষ্যৌ পূপলিকাযোগৌ)|

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कुट्टकं मत्स्यमांसानां हिङ्गुसैन्धवधान्यकैः| युक्तं गोधूमचूर्णेन घृते पूपलिकाः पचेत्||१९|| माहिषे च रसे मत्स्यान् स्निग्धाम्ललवणान् पचेत्| रसे चानुगते मांसं पोथयेत्तत्र चावपेत्||२०|| मरिचं जीरकं धान्यमल्पं हिङ्गु नवं घृतम्| माषपूपलिकानां तद्गर्भार्थमुपकल्पयेत्||२१|| एतौ पूपलिकायोगौ बृंहणौ बलवर्धनौ| हर्षसौभाग्यदौ पुत्र्यौ परं शुक्राभिवर्धनौ||२२|| (इति वृष्यौ पूपलिकायोगौ)|

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Adhikarana 7 (23-27) · Śloka 27

মাষাত্মগুপ্তাগোধূমশালিষষ্টিকপৈষ্টিকম্| শর্করাযা বিদার্যাশ্চ চূর্ণমিক্ষুরকস্য চ||২৩|| সংযোজ্য মসৃণে ক্ষীরে ঘৃতে পূপলিকাঃ পচেত্| পযোঽনুপানাস্তাঃ শীঘ্রং কুর্বন্তি বৃষতাং পরাম্||২৪|| (ইতি বৃষ্যা মাষাদিপূপলিকাঃ)| শর্করাযাস্তুলৈকা স্যাদেকা গব্যস্য সর্পিষঃ| প্রস্থো বিদার্যাশ্চূর্ণস্য পিপ্পল্যাঃ প্রস্থ এব চ||২৫|| অর্ধাঢকং তুগাক্ষীর্যাঃ ক্ষৌদ্রস্যাভিনবস্য চ| তত্সর্বং মূর্চ্ছিতং তিষ্ঠেন্মার্তিকে ঘৃতভাজনে||২৬|| মাত্রামগ্নিসমাং তস্য প্রাতঃ প্রাতঃ প্রযোজযেত্| এষ বৃষ্যঃ পরং যোগো বল্যো বৃংহণ এব চ||২৭||

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माषात्मगुप्तागोधूमशालिषष्टिकपैष्टिकम्| शर्कराया विदार्याश्च चूर्णमिक्षुरकस्य च||२३|| संयोज्य मसृणे क्षीरे घृते पूपलिकाः पचेत्| पयोऽनुपानास्ताः शीघ्रं कुर्वन्ति वृषतां पराम्||२४|| (इति वृष्या माषादिपूपलिकाः)| शर्करायास्तुलैका स्यादेका गव्यस्य सर्पिषः| प्रस्थो विदार्याश्चूर्णस्य पिप्पल्याः प्रस्थ एव च||२५|| अर्धाढकं तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्याभिनवस्य च| तत्सर्वं मूर्च्छितं तिष्ठेन्मार्तिके घृतभाजने||२६|| मात्रामग्निसमां तस्य प्रातः प्रातः प्रयोजयेत्| एष वृष्यः परं योगो बल्यो बृंहण एव च||२७||

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Adhikarana 8 (28-29) · Śloka 29

শতাবর্যা বিদার্যাশ্চ তথা মাষাত্মগুপ্তযোঃ| শ্বদংষ্ট্রাযাশ্চ নিষ্ক্বাথাঞ্জলেষু চ পৃথক্ পৃথক্||২৮|| সাধযিত্বা ঘৃতপ্রস্থং পযস্যষ্টগুণে পুনঃ| শর্করামধুযুক্তং তদপত্যার্থী প্রযোজযেত্||২৯|| (ইত্যপত্যকরং ঘৃতম্)|

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शतावर्या विदार्याश्च तथा माषात्मगुप्तयोः| श्वदंष्ट्रायाश्च निष्क्वाथाञ्जलेषु च पृथक् पृथक्||२८|| साधयित्वा घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पुनः| शर्करामधुयुक्तं तदपत्यार्थी प्रयोजयेत्||२९|| (इत्यपत्यकरं घृतम्)|

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Adhikarana 9 (30-32) · Śloka 32

ঘৃতপাত্রং শতগুণে বিদারীস্বরসে পচেত্| সিদ্ধং পুনঃ শতগুণে গব্যে পযসি সাধযেত্||৩০|| শর্করাযাস্তুগাক্ষীর্যাং ক্ষৌদ্রস্যেক্ষুরকস্য চ| পিপ্পল্যাঃ সাজডাযাশ্চ ভাগৈঃ পাদাংশিকৈর্যুতম্||৩১|| গুলি(টি)কাঃ কারযেদ্বৈদ্যো যথা স্থুলমুদুম্বরম্| তাসাং প্রযোগাত্ পুরুষঃ কুলিঙ্গ ইব হৃষ্যতি||৩২|| (ইতি বৃষ্যগুটিকাঃ)|

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घृतपात्रं शतगुणे विदारीस्वरसे पचेत्| सिद्धं पुनः शतगुणे गव्ये पयसि साधयेत्||३०|| शर्करायास्तुगाक्षीर्यां क्षौद्रस्येक्षुरकस्य च| पिप्पल्याः साजडायाश्च भागैः पादांशिकैर्युतम्||३१|| गुलि(टि)काः कारयेद्वैद्यो यथा स्थुलमुदुम्बरम्| तासां प्रयोगात् पुरुषः कुलिङ्ग इव हृष्यति||३२|| (इति वृष्यगुटिकाः)|

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Adhikarana 10 (33-35) · Śloka 35

সিতোপলাপলশতং তদর্ধং নবসর্পিষঃ| ক্ষৌদ্রপাদেন সংযুক্তং সাধযেজ্জলপাদিকম্||৩৩|| সান্দ্রং গোধূমচূর্ণানাং পাদং স্তীর্ণে শিলাতলে| শুচৌ শ্লক্ষ্ণে সমুত্কীর্য মর্দনেনোপপাদযেত্||৩৪|| শুদ্ধা উত্কারিকাঃ কার্যশ্চন্দ্রমণ্ডলসন্নিভাঃ| তাসাং প্রযোগাদ্গজবন্নারীঃ সন্তর্পযেন্নরঃ||৩৫|| (ইতি বৃষ্যোত্কারিকা)|

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सितोपलापलशतं तदर्धं नवसर्पिषः| क्षौद्रपादेन संयुक्तं साधयेज्जलपादिकम्||३३|| सान्द्रं गोधूमचूर्णानां पादं स्तीर्णे शिलातले| शुचौ श्लक्ष्णे समुत्कीर्य मर्दनेनोपपादयेत्||३४|| शुद्धा उत्कारिकाः कार्यश्चन्द्रमण्डलसन्निभाः| तासां प्रयोगाद्गजवन्नारीः सन्तर्पयेन्नरः||३५|| (इति वृष्योत्कारिका)|

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Adhikarana 11 (36-45) · Śloka 45

যত্ কিঞ্চিন্মধুরং স্নিগ্ধং জীবনং বৃংহণং গুরু| হর্ষণং মনসশ্চৈব সর্বং তদ্বৃষ্যমুচ্যতে||৩৬|| দ্রব্যৈরেবংবিধৈস্তস্মাদ্ভাবিতঃ প্রমদাং ব্রজেত্| আত্মবেগেন চোদীর্ণঃ স্ত্রীগুণৈশ্চ প্রহর্ষিতঃ||৩৭|| গত্বা স্নাত্বা পযঃ পীত্বা রসং বাঽনু শযীত না| তথাঽস্যাপ্যাযতে ভূযঃ শুক্রং চ বলমেব চ||৩৮|| যথা মুকুলপুষ্পস্য সু(খ) গন্ধো নোপলভ্যতে| লভ্যতে তদ্বিকাশাত্তু তথা শুক্রং হি দেহিনাম্||৩৯|| নর্তে বৈ ষোডশাদ্বর্ষাত্ সপ্তত্যাঃ পরতো ন চ| আযুষ্কামো নরঃ স্ত্রীভিঃ সংযোগং কর্তুমর্হতি||৪০|| অতিবালো হ্যসম্পূর্ণসর্বধাতুঃ স্ত্রিযং ব্রজন্| উপশুষ্যেত সহসা তডাগমিব কাজলম্||৪১|| শুষ্কং রূক্ষং যথা কাষ্ঠং জন্তুদগ্ধং বিজর্জরম্| স্পৃষ্টমাশু বিশীর্যেত তথা বৃদ্ধঃ স্ত্রিযো ব্রজন্||৪২|| জরযা চিন্তযা শুক্রং ব্যাধিভিঃ কর্মকর্ষণাত্| ক্ষযং গচ্ছত্যনশনাত্ স্ত্রীণাং চাতিনিষেবণাত্||৪৩|| ক্ষযাদ্ভযাদবিশ্রম্ভাচ্ছোকাত্ স্ত্রীদোষদর্শনাত্| নারীণামরসজ্ঞত্বাদবিচারাদসেবনাত্||৪৪|| তৃপ্তস্যাপি স্ত্রিযো গন্তুং ন শক্তিরুপজাযতে| দেহসত্ত্ববলাপেক্ষী হর্ষঃ শক্তিশ্চ হর্ষজা||৪৫||

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यत् किञ्चिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं बृंहणं गुरु| हर्षणं मनसश्चैव सर्वं तद्वृष्यमुच्यते||३६|| द्रव्यैरेवंविधैस्तस्माद्भावितः प्रमदां व्रजेत्| आत्मवेगेन चोदीर्णः स्त्रीगुणैश्च प्रहर्षितः||३७|| गत्वा स्नात्वा पयः पीत्वा रसं वाऽनु शयीत ना| तथाऽस्याप्यायते भूयः शुक्रं च बलमेव च||३८|| यथा मुकुलपुष्पस्य सु(ख) गन्धो नोपलभ्यते| लभ्यते तद्विकाशात्तु तथा शुक्रं हि देहिनाम्||३९|| नर्ते वै षोडशाद्वर्षात् सप्तत्याः परतो न च| आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति||४०|| अतिबालो ह्यसम्पूर्णसर्वधातुः स्त्रियं व्रजन्| उपशुष्येत सहसा तडागमिव काजलम्||४१|| शुष्कं रूक्षं यथा काष्ठं जन्तुदग्धं विजर्जरम्| स्पृष्टमाशु विशीर्येत तथा वृद्धः स्त्रियो व्रजन्||४२|| जरया चिन्तया शुक्रं व्याधिभिः कर्मकर्षणात्| क्षयं गच्छत्यनशनात् स्त्रीणां चातिनिषेवणात्||४३|| क्षयाद्भयादविश्रम्भाच्छोकात् स्त्रीदोषदर्शनात्| नारीणामरसज्ञत्वादविचारादसेवनात्||४४|| तृप्तस्यापि स्त्रियो गन्तुं न शक्तिरुपजायते| देहसत्त्वबलापेक्षी हर्षः शक्तिश्च हर्षजा||४५||

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Adhikarana 12 (46-49) · Śloka 49

রস ইক্ষৌ যথা দধ্নি সর্পিস্তৈলং তিলে যথা| সর্বত্রানুগতং দেহে শুক্রং সংস্পর্শনে তথা||৪৬|| তত্ স্ত্রীপুরুষসংযোগে চেষ্টাসঙ্কল্পপীডনাত্| শুক্রং প্রচ্যবতে স্থানাজ্জলমার্দ্রাত্ পটাদিব||৪৭|| হর্ষাত্তর্ষাত্ সরত্বাচ্চ পৈচ্ছিল্যাদ্গৌরবাদপি| অণুপ্রবণভাবাচ্চ দ্রুতত্বান্মারুতস্য চ||৪৮|| অষ্টাভ্য এভ্যো হেতুভ্যঃ শুক্রং দেহাত্ প্রসিচ্যতে| চরতো বিশ্বরূপস্য রূপদ্রব্যং যদুচ্যতে||৪৯||

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रस इक्षौ यथा दध्नि सर्पिस्तैलं तिले यथा| सर्वत्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पर्शने तथा||४६|| तत् स्त्रीपुरुषसंयोगे चेष्टासङ्कल्पपीडनात्| शुक्रं प्रच्यवते स्थानाज्जलमार्द्रात् पटादिव||४७|| हर्षात्तर्षात् सरत्वाच्च पैच्छिल्याद्गौरवादपि| अणुप्रवणभावाच्च द्रुतत्वान्मारुतस्य च||४८|| अष्टाभ्य एभ्यो हेतुभ्यः शुक्रं देहात् प्रसिच्यते| चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यं यदुच्यते||४९||

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Adhikarana 13 (50) · Śloka 50

বহলং মধুরং স্নিগ্ধমবিস্রং গুরু পিচ্ছিলম্| শুক্লং বহু চ যচ্ছুক্রং ফলবত্তদসংশযম্||৫০||

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बहलं मधुरं स्निग्धमविस्रं गुरु पिच्छिलम्| शुक्लं बहु च यच्छुक्रं फलवत्तदसंशयम्||५०||

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Adhikarana 14 (51) · Śloka 51

যেন নারীষু সামর্থ্যং বাজীবল্লভতে নরঃ| ব্রজেচ্চাভ্যধিকং যেন বাজীকরণমেব তত্||৫১||

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येन नारीषु सामर्थ्यं वाजीवल्लभते नरः| व्रजेच्चाभ्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत्||५१||

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Adhikarana 15 (52-53) · Śloka 53

তত্র শ্লোকৌ- হেতুর্যোগোপদেশস্য যোগা দ্বাদশ চোত্তমাঃ| যত্ পূর্বং মৈথুনাত্ সেব্যং সেব্যং যন্মৈথুনাদনু||৫২|| যদা ন সেব্যাঃ প্রমদাঃ কৃত্স্নঃ শুক্রবিনিশ্চযঃ| নিরুক্তং চেহ নির্দিষ্টং পুমাঞ্জাতবলাদিকে||৫৩||

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तत्र श्लोकौ- हेतुर्योगोपदेशस्य योगा द्वादश चोत्तमाः| यत् पूर्वं मैथुनात् सेव्यं सेव्यं यन्मैथुनादनु||५२|| यदा न सेव्याः प्रमदाः कृत्स्नः शुक्रविनिश्चयः| निरुक्तं चेह निर्दिष्टं पुमाञ्जातबलादिके||५३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 2

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানে বাজীকরণাধ্যাযে পুমাঞ্জাতবলাদিকো নাম বাজীকরণপাদশ্চতুর্থঃ||৪|| সমাপ্তশ্চাযং দ্বিতীযো বাজীকরণাধ্যাযঃ||২||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने वाजीकरणाध्याये पुमाञ्जातबलादिको नाम वाजीकरणपादश्चतुर्थः||४|| समाप्तश्चायं द्वितीयो वाजीकरणाध्यायः||२||

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8. vājīkaraṇā'dhyāyaḥ - pumāñjātabalādikō vājīkaraṇapādaḥ — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi