Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽণুজ্যোতীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातोऽणुज्योतीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽণুজ্যোতীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातोऽणुज्योतीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
অণুজ্যোতিরনেকাগ্রো দুশ্ছাযো দুর্মনাঃ সদা| রতিং ন লভতে যাতি পরলোকং সমান্তরম্||৩||
अणुज्योतिरनेकाग्रो दुश्छायो दुर्मनाः सदा| रतिं न लभते याति परलोकं समान्तरम्||३||
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Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6
বলিং বলিভৃতো যস্য প্রণীতং নোপভুঞ্জতে| লোকান্তরগতঃ পিণ্ডং ভুঙ্ক্তে সংবত্সরেণ সঃ||৪|| সপ্তর্ষীণাং সমীপস্থাং যো ন পশ্যত্যরুন্ধতীম্| সংবত্সরান্তে জন্তুঃ স সম্পশ্যতি মহত্তমঃ||৫|| বিকৃত্যা বিনিমিত্তং যঃ শোভামুপচযং ধনম্| প্রাপ্নোত্যতো বা বিভ্রংশং সমান্তং তস্য জীবিতম্||৬||
बलिं बलिभृतो यस्य प्रणीतं नोपभुञ्जते| लोकान्तरगतः पिण्डं भुङ्क्ते संवत्सरेण सः||४|| सप्तर्षीणां समीपस्थां यो न पश्यत्यरुन्धतीम्| संवत्सरान्ते जन्तुः स सम्पश्यति महत्तमः||५|| विकृत्या विनिमित्तं यः शोभामुपचयं धनम्| प्राप्नोत्यतो वा विभ्रंशं समान्तं तस्य जीवितम्||६||
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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
ভক্তিঃ শীলং স্মৃতিস্ত্যাগো বুদ্ধির্বলমহেতুকম্| ষডেতানি নিবর্তন্তে ষড্ভির্মাসৈর্মরিষ্যতঃ||৭||
भक्तिः शीलं स्मृतिस्त्यागो बुद्धिर्बलमहेतुकम्| षडेतानि निवर्तन्ते षड्भिर्मासैर्मरिष्यतः||७||
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Adhikarana 5 (8-9) · Śloka 9
ধমনীনামপূর্বাণাং জালমত্যর্থশোভনম্| ললাটে দৃশ্যতে যস্য ষণ্মাসান্ন স জীবতি||৮|| লেখাভিশ্চন্দ্রবক্রাভির্ললাটমুপচীযতে| যস্য তস্যাযুষঃ ষড্ভির্মাসৈরন্তং সমাদিশেত্||৯||
धमनीनामपूर्वाणां जालमत्यर्थशोभनम्| ललाटे दृश्यते यस्य षण्मासान्न स जीवति||८|| लेखाभिश्चन्द्रवक्राभिर्ललाटमुपचीयते| यस्य तस्यायुषः षड्भिर्मासैरन्तं समादिशेत्||९||
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Adhikarana 6 (10-11) · Śloka 11
শরীরকম্পঃ সম্মোহো গতির্বচনমেব চ| মত্তস্যেবোপলভ্যন্তে যস্য মাসং ন জীবতি||১০|| রেতোমূত্রপুরীষাণি যস্য মজ্জন্তি চাম্ভসি| স মাসাত্ স্বজনদ্বেষ্টা মৃত্যুবারিণি মজ্জতি||১১||
शरीरकम्पः सम्मोहो गतिर्वचनमेव च| मत्तस्येवोपलभ्यन्ते यस्य मासं न जीवति||१०|| रेतोमूत्रपुरीषाणि यस्य मज्जन्ति चाम्भसि| स मासात् स्वजनद्वेष्टा मृत्युवारिणि मज्जति||११||
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Adhikarana 7 (12-17) · Śloka 17
হস্তপাদং মুখং চোভে বিশেষাদ্যস্য শুষ্যতঃ| শূযেতে বা বিনা দেহাত্ স চ মাসং ন জীবতি||১২|| ললাটে মূর্ধ্নি বস্তৌ বা নীলা যস্য প্রকাশতে| রাজী বালেন্দুকুটিলা ন স জীবিতুমর্হতি||১৩|| প্রবালগুটিকাভাসা যস্য গাত্রে মসূরিকাঃ| উত্পদ্যাশু বিনশ্যন্তি ন চিরাত্ স বিনশ্যতি||১৪|| গ্রীবাবমর্দো বলবাঞ্জিহ্বাশ্বযথুরেব চ| ব্রধ্নাস্যগলপাকশ্চ যস্য পক্বং তমাদিশেত্||১৫|| সম্ভ্রমোঽতিপ্রলাপোঽতিভেদোঽস্থ্নামতিদারুণঃ | কালপাশপরীতস্য ত্রযমেতত্ প্রবর্ততে||১৬|| প্রমুহ্য লুঞ্চযেত্ কেশান্ পরিগৃহ্ণাত্যতীব চ| নরঃ স্বস্থবদাহারমবলঃ কালচোদিতঃ||১৭||
हस्तपादं मुखं चोभे विशेषाद्यस्य शुष्यतः| शूयेते वा विना देहात् स च मासं न जीवति||१२|| ललाटे मूर्ध्नि बस्तौ वा नीला यस्य प्रकाशते| राजी बालेन्दुकुटिला न स जीवितुमर्हति||१३|| प्रवालगुटिकाभासा यस्य गात्रे मसूरिकाः| उत्पद्याशु विनश्यन्ति न चिरात् स विनश्यति||१४|| ग्रीवावमर्दो बलवाञ्जिह्वाश्वयथुरेव च| ब्रध्नास्यगलपाकश्च यस्य पक्वं तमादिशेत्||१५|| सम्भ्रमोऽतिप्रलापोऽतिभेदोऽस्थ्नामतिदारुणः | कालपाशपरीतस्य त्रयमेतत् प्रवर्तते||१६|| प्रमुह्य लुञ्चयेत् केशान् परिगृह्णात्यतीव च| नरः स्वस्थवदाहारमबलः कालचोदितः||१७||
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Adhikarana 8 (18-19) · Śloka 19
সমীপে চক্ষুষোঃ কৃত্বা মৃগযেতাঙ্গুলীকরম্| স্মযতেঽপি চ কালান্ধ ঊর্ধ্বগানিমিষেক্ষণঃ ||১৮|| শযনাদাসনাদঙ্গাত্ কাষ্ঠাত্ কুড্যাদথাপি বা| অসন্মৃগযতে কিঞ্চিত্ স মুহ্যন্ কালচোদিতঃ||১৯||
समीपे चक्षुषोः कृत्वा मृगयेताङ्गुलीकरम्| स्मयतेऽपि च कालान्ध ऊर्ध्वगानिमिषेक्षणः ||१८|| शयनादासनादङ्गात् काष्ठात् कुड्यादथापि वा| असन्मृगयते किञ्चित् स मुह्यन् कालचोदितः||१९||
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Adhikarana 9 (20-21) · Śloka 21
অহাস্যহাসী সম্মুহ্যন্ প্রলেঢি দশনচ্ছদৌ| শীতপাদকরোচ্ছ্বাসো যো নরো ন স জীবতি||২০|| আহ্বযংস্তং সমীপস্থং স্বজনং জনমেব বা| মহামোহাবৃতমনাঃ পশ্যন্নপি ন পশ্যতি||২১||
अहास्यहासी सम्मुह्यन् प्रलेढि दशनच्छदौ| शीतपादकरोच्छ्वासो यो नरो न स जीवति||२०|| आह्वयंस्तं समीपस्थं स्वजनं जनमेव वा| महामोहावृतमनाः पश्यन्नपि न पश्यति||२१||
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Adhikarana 10 (22) · Śloka 22
অযোগমতিযোগং বা শরীরে মতিমান্ ভিষক্| খাদীনাং যুগপদ্দৃষ্ট্বা ভেষজং নাবচারযেত্||২২||
अयोगमतियोगं वा शरीरे मतिमान् भिषक्| खादीनां युगपद्दृष्ट्वा भेषजं नावचारयेत्||२२||
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Adhikarana 11 (23-24) · Śloka 24
অতিপ্রবৃদ্ধ্যা রোগাণাং মনসশ্চ বলক্ষযাত্| বাসমুত্সৃজতি ক্ষিপ্রং শরীরী দেহসঞ্জ্ঞকম্||২৩|| বর্ণস্বরাবগ্নিবলং বাগিন্দ্রিযমনোবলম্| হীযতেঽসুক্ষযে নিদ্রা নিত্যা ভবতি বা ন বা||২৪||
अतिप्रवृद्ध्या रोगाणां मनसश्च बलक्षयात्| वासमुत्सृजति क्षिप्रं शरीरी देहसञ्ज्ञकम्||२३|| वर्णस्वरावग्निबलं वागिन्द्रियमनोबलम्| हीयतेऽसुक्षये निद्रा नित्या भवति वा न वा||२४||
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Adhikarana 12 (25-26) · Śloka 26
ভিষগ্ভেষজপানান্নগুরুমিত্রদ্বিষশ্চ যে| বশগাঃ সর্ব এবৈতে বোদ্ধব্যাঃ সমবর্তিনঃ||২৫|| এতেষু রোগঃ ক্রমতে ভেষজং প্রতিহন্যতে| নৈষামন্নানি ভুঞ্জীত ন চোদকমপি স্পৃশেত্||২৬||
भिषग्भेषजपानान्नगुरुमित्रद्विषश्च ये| वशगाः सर्व एवैते बोद्धव्याः समवर्तिनः||२५|| एतेषु रोगः क्रमते भेषजं प्रतिहन्यते| नैषामन्नानि भुञ्जीत न चोदकमपि स्पृशेत्||२६||
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Adhikarana 13 (27) · Śloka 27
পাদাঃ সমেতাশ্চত্বারঃ সম্পন্নাঃ সাধকৈর্গুণৈঃ| ব্যর্থা গতাযুষো দ্রব্যং বিনা নাস্তি গুণোদযঃ||২৭||
पादाः समेताश्चत्वारः सम्पन्नाः साधकैर्गुणैः| व्यर्था गतायुषो द्रव्यं विना नास्ति गुणोदयः||२७||
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Adhikarana 14 (28) · Śloka 28
পরীক্ষ্যমাযুর্ভিষজা নীরুজস্যাতুরস্য চ| আযুর্জ্ঞানফলং কৃত্স্নমাযুর্জ্ঞে হ্যনুবর্ততে||২৮||
परीक्ष्यमायुर्भिषजा नीरुजस्यातुरस्य च| आयुर्ज्ञानफलं कृत्स्नमायुर्ज्ञे ह्यनुवर्तते||२८||
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Adhikarana 15 (29) · Śloka 29
তত্র শ্লোকঃ- ক্রিযাপথমতিক্রান্তাঃ কেবলং দেহমাপ্লুতাঃ| চিহ্নং কুর্বন্তি যদ্দোষাস্তদরিষ্টং নিরুচ্যতে||২৯||
तत्र श्लोकः- क्रियापथमतिक्रान्ताः केवलं देहमाप्लुताः| चिह्नं कुर्वन्ति यद्दोषास्तदरिष्टं निरुच्यते||२९||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 11
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানেঽণুজ্যোতীযমিন্দ্রিযং নামৈকাদশোঽধ্যাযঃ||১১||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थानेऽणुज्योतीयमिन्द्रियं नामैकादशोऽध्यायः||११||
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