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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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12. gōmayacūrṇīyamindriyam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো গোমযচূর্ণীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातो गोमयचूर्णीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-8) · Śloka 8

যস্য গোমযচূর্ণাভং চূর্ণং মূর্ধনি জাযতে| সস্নেহং ভ্রশ্যতে চৈব মাসান্তং তস্য জীবিতম্||৩|| নিকষন্নিব যঃ পাদৌ চ্যুতাংসঃ পরিধাবতি| বিকৃত্যা ন স লোকেঽস্মিংশ্চিরং বসতি মানবঃ||৪|| যস্য স্নাতানুলিপ্তস্য পূর্বং শুষ্যত্যুরো ভৃশম্| আর্দ্রেষু সর্বগাত্রেষু সোঽর্ধমাসং ন জীবতি||৫|| যমুদ্দিশ্যাতুরং বৈদ্যঃ সংবর্তযিতুমৌষধম্ | যতমানো ন শক্নোতি দুর্লভং তস্য জীবিতম্||৬|| বিজ্ঞাতং বহুশঃ সিদ্ধং বিধিবচ্চাবচারিতম্| ন সিধ্যত্যৌষধং যস্য নাস্তি তস্য চিকিত্সিতম্||৭|| আহারমুপযুঞ্জানো ভিষজা সূপকল্পিতম্| যঃ ফলং তস্য নাপ্নোতি দুর্লভং তস্য জীবিতম্||৮||

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यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते| सस्नेहं भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम्||३|| निकषन्निव यः पादौ च्युतांसः परिधावति| विकृत्या न स लोकेऽस्मिंश्चिरं वसति मानवः||४|| यस्य स्नातानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरो भृशम्| आर्द्रेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमासं न जीवति||५|| यमुद्दिश्यातुरं वैद्यः संवर्तयितुमौषधम् | यतमानो न शक्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम्||६|| विज्ञातं बहुशः सिद्धं विधिवच्चावचारितम्| न सिध्यत्यौषधं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम्||७|| आहारमुपयुञ्जानो भिषजा सूपकल्पितम्| यः फलं तस्य नाप्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम्||८||

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Adhikarana 3 (9-24) · Śloka 25

দূতাধিকারে বক্ষ্যামো লক্ষণানি মুমূর্ষতাম্| যানি দৃষ্ট্বা ভিষক্ প্রাজ্ঞঃ প্রত্যাখ্যাযাদসংযমম্||৯|| মুক্তকেশেঽথবা নগ্নে রুদত্যপ্রযতেঽথবা| ভিষগভ্যাগতং দৃষ্ট্বা দূতং মরণমাদিশেত্||১০|| সুপ্তে ভিষজি যে দূতাশ্ছিন্দত্যপি চ ভিন্দতি| আগচ্ছন্তি ভিষক্ তেষাং ন ভর্তারমনুব্রজেত্||১১|| জুহ্বত্যগ্নিং তথা পিণ্ডান্ পিতৃভ্যো নির্বপত্যপি| বৈদ্যে দূতা য আযান্তি তে ঘ্নন্তি প্রজিঘাংসবঃ||১২|| কথযত্যপ্রশস্তানি চিন্তযত্যথবা পুনঃ| বৈদ্যে দূতা মনুষ্যাণামাগচ্ছন্তি মুমূর্ষতাম্||১৩|| মৃতদগ্ধবিনষ্টানি ভজতি ব্যাহরত্যপি| অপ্রশস্তানি চান্যানি বৈদ্যে দূতা মুমূর্ষতাম্||১৪|| বিকারসামান্যগুণে দেশে কালেঽথবা ভিষক্| দূতমভ্যাগতং দৃষ্ট্বা নাতুরং তমুপাচরেত্||১৫|| দীনভীতদ্রুতত্রস্তমলিনামসতীং স্ত্রিযম্| ত্রীন্ ব্যাকৃতীংশ্চ ষণ্ডাংশ্চ দূতান্ বিদ্যান্মুমূর্ষতাম্||১৬|| অঙ্গব্যসনিনং দূতং লিঙ্গিনং ব্যাধিতং তথা| সম্প্রেক্ষ্য চোগ্রকর্মাণং ন বৈদ্যো গন্তুমর্হতি||১৭|| আতুরার্থমনুপ্রাপ্তং খরোষ্ট্ররথবাহনম্| দূতং দৃষ্ট্বা ভিষগ্বিদ্যাদাতুরস্য পরাভবম্||১৮|| পলালবুসমাংসাস্থিকেশলোমনখদ্বিজান্| মার্জনীং মুসলং শূর্পমুপানচ্চর্ম বিচ্যুতম্ ||১৯|| তৃণকাষ্ঠতুষাঙ্গারং স্পৃশন্তো লোষ্টমশ্ম চ| তত্পূর্বদর্শনে দূতা ব্যাহরন্তি মুমূর্ষতাম্||২০|| যস্মিংশ্চ দূতে ব্রুবতি বাক্যমাতুরসংশ্রযম্| পশ্যেন্নিমিত্তমশুভং তং চ নানুব্রজেদ্ভিষক্||২১|| তথা ব্যসনিনং প্রেতং প্রেতালঙ্কারমেব বা| ভিন্নং দগ্ধং বিনষ্টং বা তদ্বাদীনি বচাংসি বা||২২|| রসো বা কটুকস্তীব্রো গন্ধো বা কৌণপো মহান্| স্পর্শো বা বিপুলঃ ক্রূরো যদ্বাঽন্যদশুভং ভবেত্||২৩|| তত্পূর্বমভিতো বাক্যং বাক্যকালেঽথবা পুনঃ| দূতানাং ব্যাহৃতং শ্রুত্বা ধীরো মরণমাদিশেত্||২৪|| ইতি দূতাধিকারোঽযমুক্তঃ কৃত্স্নো মুমূর্ষতাম্|২৫|

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दूताधिकारे वक्ष्यामो लक्षणानि मुमूर्षताम्| यानि दृष्ट्वा भिषक् प्राज्ञः प्रत्याख्यायादसंयमम्||९|| मुक्तकेशेऽथवा नग्ने रुदत्यप्रयतेऽथवा| भिषगभ्यागतं दृष्ट्वा दूतं मरणमादिशेत्||१०|| सुप्ते भिषजि ये दूताश्छिन्दत्यपि च भिन्दति| आगच्छन्ति भिषक् तेषां न भर्तारमनुव्रजेत्||११|| जुह्वत्यग्निं तथा पिण्डान् पितृभ्यो निर्वपत्यपि| वैद्ये दूता य आयान्ति ते घ्नन्ति प्रजिघांसवः||१२|| कथयत्यप्रशस्तानि चिन्तयत्यथवा पुनः| वैद्ये दूता मनुष्याणामागच्छन्ति मुमूर्षताम्||१३|| मृतदग्धविनष्टानि भजति व्याहरत्यपि| अप्रशस्तानि चान्यानि वैद्ये दूता मुमूर्षताम्||१४|| विकारसामान्यगुणे देशे कालेऽथवा भिषक्| दूतमभ्यागतं दृष्ट्वा नातुरं तमुपाचरेत्||१५|| दीनभीतद्रुतत्रस्तमलिनामसतीं स्त्रियम्| त्रीन् व्याकृतींश्च षण्डांश्च दूतान् विद्यान्मुमूर्षताम्||१६|| अङ्गव्यसनिनं दूतं लिङ्गिनं व्याधितं तथा| सम्प्रेक्ष्य चोग्रकर्माणं न वैद्यो गन्तुमर्हति||१७|| आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम्| दूतं दृष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम्||१८|| पलालबुसमांसास्थिकेशलोमनखद्विजान्| मार्जनीं मुसलं शूर्पमुपानच्चर्म विच्युतम् ||१९|| तृणकाष्ठतुषाङ्गारं स्पृशन्तो लोष्टमश्म च| तत्पूर्वदर्शने दूता व्याहरन्ति मुमूर्षताम्||२०|| यस्मिंश्च दूते ब्रुवति वाक्यमातुरसंश्रयम्| पश्येन्निमित्तमशुभं तं च नानुव्रजेद्भिषक्||२१|| तथा व्यसनिनं प्रेतं प्रेतालङ्कारमेव वा| भिन्नं दग्धं विनष्टं वा तद्वादीनि वचांसि वा||२२|| रसो वा कटुकस्तीव्रो गन्धो वा कौणपो महान्| स्पर्शो वा विपुलः क्रूरो यद्वाऽन्यदशुभं भवेत्||२३|| तत्पूर्वमभितो वाक्यं वाक्यकालेऽथवा पुनः| दूतानां व्याहृतं श्रुत्वा धीरो मरणमादिशेत्||२४|| इति दूताधिकारोऽयमुक्तः कृत्स्नो मुमूर्षताम्|२५|

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Adhikarana 4 (25-31) · Śloka 32

পথ্যাতুরকুলানাং চ বক্ষ্যাম্যৌত্পাতিকং পুনঃ||২৫|| অবক্ষুতমথোত্ক্রুষ্টং স্খলনং পতনং তথা| আক্রোশঃ সম্প্রহারো বা প্রতিষেধো বিগর্হণম্||২৬|| বস্ত্রোষ্ণীষোত্তরাসঙ্গশ্ছত্রোপানদ্যুগাশ্রযম্| ব্যসনং দর্শনং চাপি মৃতব্যসনিনাং তথা||২৭|| চৈত্যধ্বজপতাকানাং পূর্ণানাং পতনানি চ| হতানিষ্টপ্রবাদাশ্চ দূষণং ভস্মপাংশুভিঃ||২৮|| পথচ্ছেদো বিডালেন শুনা সর্পেণ বা পুনঃ| মৃগদ্বিজানাং ক্রূরাণাং গিরো দীপ্তাং দিশং প্রতি||২৯|| শযনাসনযানানামুত্তানানাং চ দর্শনম্| ইত্যেতান্যপ্রশস্তানি সর্বাণ্যাহুর্মনীষিণঃ||৩০|| এতানি পথি বৈদ্যেন পশ্যতাঽঽতুরবেশ্মনি| শৃণ্বতা চ ন গন্তব্যং তদাগারং বিপশ্চিতা||৩১|| ইত্যৌত্পাতিকমাখ্যাতং পথি বৈদ্যবিগর্হিতম্|৩২|

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पथ्यातुरकुलानां च वक्ष्याम्यौत्पातिकं पुनः||२५|| अवक्षुतमथोत्क्रुष्टं स्खलनं पतनं तथा| आक्रोशः सम्प्रहारो वा प्रतिषेधो विगर्हणम्||२६|| वस्त्रोष्णीषोत्तरासङ्गश्छत्रोपानद्युगाश्रयम्| व्यसनं दर्शनं चापि मृतव्यसनिनां तथा||२७|| चैत्यध्वजपताकानां पूर्णानां पतनानि च| हतानिष्टप्रवादाश्च दूषणं भस्मपांशुभिः||२८|| पथच्छेदो बिडालेन शुना सर्पेण वा पुनः| मृगद्विजानां क्रूराणां गिरो दीप्तां दिशं प्रति||२९|| शयनासनयानानामुत्तानानां च दर्शनम्| इत्येतान्यप्रशस्तानि सर्वाण्याहुर्मनीषिणः||३०|| एतानि पथि वैद्येन पश्यताऽऽतुरवेश्मनि| शृण्वता च न गन्तव्यं तदागारं विपश्चिता||३१|| इत्यौत्पातिकमाख्यातं पथि वैद्यविगर्हितम्|३२|

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Adhikarana 5 (32-39) · Śloka 39

ইমামপি চ বুধ্যেত গৃহাবস্থাং মুমূর্ষতাম্||৩২|| প্রবেশে পূর্ণকুম্ভাগ্নিমৃদ্বীজফলসর্পিষাম্| বৃষব্রাহ্মণরত্নান্নদেবতানাং চ নির্গতিম্||৩৩|| অগ্নিপূর্ণানি পাত্রাণি ভিন্নানি বিশিখানি চ| ভিষঙ্ মুমূর্ষতাং বেশ্ম প্রবিশন্নেব পশ্যতি||৩৪|| ছিন্নভিন্নানি দগ্ধানি ভগ্নানি মৃদিতানি চ| দুর্বলানি চ সেবন্তে মুমূর্ষোর্বৈশ্মিকা জনাঃ||৩৫|| শযনং বসনং যানং গমনং ভোজনং রুতম্| শ্রূযতেঽমঙ্গলং যস্য নাস্তি তস্য চিকিত্সিতম্||৩৬|| শযনং বসনং যানমন্যং বাঽপি পরিচ্ছদম্| প্রেতবদ্যস্য কুর্বন্তি সুহৃদঃ প্রেত এব সঃ||৩৭|| অন্নং ব্যাপদ্যতেঽত্যর্থং জ্যোতিশ্চৈবোপশাম্যতি| নিবাতে সেন্ধনং যস্য তস্য নাস্তি চিকিত্সিতম্||৩৮|| আতুরস্য গৃহে যস্য ভিদ্যন্তে বা পতন্তি বা| অতিমাত্রমমত্রাণি দুর্লভং তস্য জীবিতম্||৩৯||

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इमामपि च बुध्येत गृहावस्थां मुमूर्षताम्||३२|| प्रवेशे पूर्णकुम्भाग्निमृद्बीजफलसर्पिषाम्| वृषब्राह्मणरत्नान्नदेवतानां च निर्गतिम्||३३|| अग्निपूर्णानि पात्राणि भिन्नानि विशिखानि च| भिषङ् मुमूर्षतां वेश्म प्रविशन्नेव पश्यति||३४|| छिन्नभिन्नानि दग्धानि भग्नानि मृदितानि च| दुर्बलानि च सेवन्ते मुमूर्षोर्वैश्मिका जनाः||३५|| शयनं वसनं यानं गमनं भोजनं रुतम्| श्रूयतेऽमङ्गलं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम्||३६|| शयनं वसनं यानमन्यं वाऽपि परिच्छदम्| प्रेतवद्यस्य कुर्वन्ति सुहृदः प्रेत एव सः||३७|| अन्नं व्यापद्यतेऽत्यर्थं ज्योतिश्चैवोपशाम्यति| निवाते सेन्धनं यस्य तस्य नास्ति चिकित्सितम्||३८|| आतुरस्य गृहे यस्य भिद्यन्ते वा पतन्ति वा| अतिमात्रममत्राणि दुर्लभं तस्य जीवितम्||३९||

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Adhikarana 6 (40-42) · Śloka 42

ভবন্তি চাত্র- যদ্দ্বাদশভিরধ্যাযৈর্ব্যাসতঃ পরিকীর্তিতম্| মুমূর্ষতাং মনুষ্যাণাং লক্ষণং জীবিতান্তকৃত্||৪০|| তত্ সমাসেন বক্ষ্যামঃ পর্যাযান্তরমাশ্রিতম্| পর্যাযবচনং হ্যর্থবিজ্ঞানাযোপপদ্যতে||৪১|| অত্যর্থং পুনরেবেযং বিবক্ষা নো বিধীযতে| তস্মিন্নেবাধিকরণে যত্ পূর্বমভিশব্দিতম্||৪২||

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भवन्ति चात्र- यद्द्वादशभिरध्यायैर्व्यासतः परिकीर्तितम्| मुमूर्षतां मनुष्याणां लक्षणं जीवितान्तकृत्||४०|| तत् समासेन वक्ष्यामः पर्यायान्तरमाश्रितम्| पर्यायवचनं ह्यर्थविज्ञानायोपपद्यते||४१|| अत्यर्थं पुनरेवेयं विवक्षा नो विधीयते| तस्मिन्नेवाधिकरणे यत् पूर्वमभिशब्दितम्||४२||

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Adhikarana 7 (43-61) · Śloka 61

বসতাং চরমং কালং শরীরেষু শরীরিণাম্| অভ্যুগ্রাণাং বিনাশায দেহেভ্যঃ প্রবিবত্সতাম্||৪৩|| ইষ্টাংস্তিতিক্ষতাং প্রাণান্ কান্তং বাসং জিহাসতাম্| তন্ত্রযন্ত্রেষু ভিন্নেষু তমোঽন্ত্যং প্রবিবিক্ষতাম্||৪৪|| বিনাশাযেহ রূপাণি যান্যবস্থান্তরাণি চ| ভবন্তি তানি বক্ষ্যামি যথোদ্দেশং যথাগমম্||৪৫|| প্রাণাঃ সমুপতপ্যন্তে বিজ্ঞানমুপরুধ্যতে| বমন্তি বলমঙ্গানি চেষ্টা ব্যুপরমন্তি চ||৪৬|| ইন্দ্রিযাণি বিনশ্যন্তি খিলীভবতি চেতনা | ঔত্সুক্যং ভজতে সত্ত্বং চেতো ভীরাবিশত্যপি||৪৭|| স্মৃতিস্ত্যজতি মেধা চ হ্রীশ্রিযৌ চাপসর্পতঃ| উপপ্লবন্তে পাপ্মান ওজস্তেজশ্চ নশ্যতি||৪৮|| শীলং ব্যাবর্ততেঽত্যর্থং ভক্তিশ্চ পরিবর্ততে| বিক্রিযন্তে প্রতিচ্ছাযাশ্ছাযাশ্চ বিকৃতিং প্রতি||৪৯|| শুক্রং প্রচ্যবতে স্থানাদুন্মার্গং ভজতেঽনিলঃ| ক্ষযং মাংসানি গচ্ছন্তি গচ্ছত্যসৃগপি ক্ষযম্||৫০|| ঊষ্মাণঃ প্রলযং যান্তি বিশ্লেষং যান্তি সন্ধযঃ| গন্ধা বিকৃতিমাযান্তি ভেদং বর্ণস্বরৌ তথা||৫১|| বৈবর্ণ্যং ভজতে কাযঃ কাযচ্ছিদ্রং বিশুষ্যতি| ধূমঃ সঞ্জাযতে মূর্ধ্নি দারুণাখ্যশ্চ চূর্ণকঃ||৫২|| সততস্পন্দনা দেশাঃ শরীরে যেঽভিলক্ষিতাঃ| তে স্তম্ভানুগতাঃ সর্বে ন চলন্তি কথঞ্চন||৫৩|| গুণাঃ শরীরদেশানাং শীতোষ্ণমৃদুদারুণাঃ| বিপর্যাসেন বর্তন্তে স্থানেষ্বন্যেষু তদ্বিধাঃ||৫৪|| নখেষু জাযতে পুষ্পং পঙ্কো দন্তেষু জাযতে| জটাঃ পক্ষ্মসু জাযন্তে সীমন্তাশ্চাপি মূর্ধনি||৫৫|| ভেষজানি ন সংবৃত্তিং প্রাপ্নুবন্তি যথারুচি| যানি চাপ্যুপপদ্যন্তে তেষাং বীর্যং ন সিধ্যতি||৫৬|| নানাপ্রকৃতযঃ ক্রূরা বিকারা বিবিধৌষধাঃ| ক্ষিপ্রং সমভিবর্তন্তে প্রতিহত্য বলৌজসী||৫৭|| শব্দঃ স্পর্শো রসো রূপং গন্ধশ্চেষ্টা বিচিন্তিতম্ | উত্পদ্যন্তেঽশুভান্যেব প্রতিকর্মপ্রবৃত্তিষু||৫৮|| দৃশ্যন্তে দারুণাঃ স্বপ্না দৌরাত্ম্যমুপজাযতে| প্রেষ্যাঃ প্রতীপতাং যান্তি প্রেতাকৃতিরুদীর্যতে||৫৯|| প্রকৃতির্হীযতেঽত্যর্থং বিকৃতিশ্চাভিবর্ধতে| কৃত্স্নমৌত্পাতিকং ঘোরমরি(নি)ষ্টমুপলক্ষ্যতে||৬০|| ইত্যেতানি মনুষ্যাণাং ভবন্তি বিনশিষ্যতাম্| লক্ষণানি যথোদ্দেশং যান্যুক্তানি যথাগমম্||৬১||

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वसतां चरमं कालं शरीरेषु शरीरिणाम्| अभ्युग्राणां विनाशाय देहेभ्यः प्रविवत्सताम्||४३|| इष्टांस्तितिक्षतां प्राणान् कान्तं वासं जिहासताम्| तन्त्रयन्त्रेषु भिन्नेषु तमोऽन्त्यं प्रविविक्षताम्||४४|| विनाशायेह रूपाणि यान्यवस्थान्तराणि च| भवन्ति तानि वक्ष्यामि यथोद्देशं यथागमम्||४५|| प्राणाः समुपतप्यन्ते विज्ञानमुपरुध्यते| वमन्ति बलमङ्गानि चेष्टा व्युपरमन्ति च||४६|| इन्द्रियाणि विनश्यन्ति खिलीभवति चेतना | औत्सुक्यं भजते सत्त्वं चेतो भीराविशत्यपि||४७|| स्मृतिस्त्यजति मेधा च ह्रीश्रियौ चापसर्पतः| उपप्लवन्ते पाप्मान ओजस्तेजश्च नश्यति||४८|| शीलं व्यावर्ततेऽत्यर्थं भक्तिश्च परिवर्तते| विक्रियन्ते प्रतिच्छायाश्छायाश्च विकृतिं प्रति||४९|| शुक्रं प्रच्यवते स्थानादुन्मार्गं भजतेऽनिलः| क्षयं मांसानि गच्छन्ति गच्छत्यसृगपि क्षयम्||५०|| ऊष्माणः प्रलयं यान्ति विश्लेषं यान्ति सन्धयः| गन्धा विकृतिमायान्ति भेदं वर्णस्वरौ तथा||५१|| वैवर्ण्यं भजते कायः कायच्छिद्रं विशुष्यति| धूमः सञ्जायते मूर्ध्नि दारुणाख्यश्च चूर्णकः||५२|| सततस्पन्दना देशाः शरीरे येऽभिलक्षिताः| ते स्तम्भानुगताः सर्वे न चलन्ति कथञ्चन||५३|| गुणाः शरीरदेशानां शीतोष्णमृदुदारुणाः| विपर्यासेन वर्तन्ते स्थानेष्वन्येषु तद्विधाः||५४|| नखेषु जायते पुष्पं पङ्को दन्तेषु जायते| जटाः पक्ष्मसु जायन्ते सीमन्ताश्चापि मूर्धनि||५५|| भेषजानि न संवृत्तिं प्राप्नुवन्ति यथारुचि| यानि चाप्युपपद्यन्ते तेषां वीर्यं न सिध्यति||५६|| नानाप्रकृतयः क्रूरा विकारा विविधौषधाः| क्षिप्रं समभिवर्तन्ते प्रतिहत्य बलौजसी||५७|| शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धश्चेष्टा विचिन्तितम् | उत्पद्यन्तेऽशुभान्येव प्रतिकर्मप्रवृत्तिषु||५८|| दृश्यन्ते दारुणाः स्वप्ना दौरात्म्यमुपजायते| प्रेष्याः प्रतीपतां यान्ति प्रेताकृतिरुदीर्यते||५९|| प्रकृतिर्हीयतेऽत्यर्थं विकृतिश्चाभिवर्धते| कृत्स्नमौत्पातिकं घोरमरि(नि)ष्टमुपलक्ष्यते||६०|| इत्येतानि मनुष्याणां भवन्ति विनशिष्यताम्| लक्षणानि यथोद्देशं यान्युक्तानि यथागमम्||६१||

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Adhikarana 8 (62-64) · Śloka 64

মরণাযেহ রূপাণি পশ্যতাঽপি ভিষগ্বিদা| অপৃষ্টেন ন বক্তব্যং মরণং প্রত্যুপস্থিতম্||৬২|| পৃষ্টেনাপি ন বক্তব্যং তত্র যত্রোপঘাতকম্| আতুরস্য ভবেদ্দুঃখমথবাঽন্যস্য কস্যচিত্||৬৩|| অব্রুবন্মরণং তস্য নৈনমিচ্ছেচ্চিকিত্সিতুম্| যস্য পশ্যেদ্বিনাশায লিঙ্গানি কুশলো ভিষক্||৬৪||

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मरणायेह रूपाणि पश्यताऽपि भिषग्विदा| अपृष्टेन न वक्तव्यं मरणं प्रत्युपस्थितम्||६२|| पृष्टेनापि न वक्तव्यं तत्र यत्रोपघातकम्| आतुरस्य भवेद्दुःखमथवाऽन्यस्य कस्यचित्||६३|| अब्रुवन्मरणं तस्य नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम्| यस्य पश्येद्विनाशाय लिङ्गानि कुशलो भिषक्||६४||

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Adhikarana 9 (65-66) · Śloka 66

লিঙ্গেভ্যো মরণাখ্যেভ্যো বিপরীতানি পশ্যতা| লিঙ্গান্যারোগ্যমাগন্তু বক্তব্যং ভিষজা ধ্রুবম্||৬৫|| দূতৈরৌত্পাতিকৈর্ভাবৈঃ পথ্যাতুরকুলাশ্রযৈঃ| আতুরাচারশীলেষ্টদ্রব্যসম্পত্তিলক্ষণৈঃ||৬৬||

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लिङ्गेभ्यो मरणाख्येभ्यो विपरीतानि पश्यता| लिङ्गान्यारोग्यमागन्तु वक्तव्यं भिषजा ध्रुवम्||६५|| दूतैरौत्पातिकैर्भावैः पथ्यातुरकुलाश्रयैः| आतुराचारशीलेष्टद्रव्यसम्पत्तिलक्षणैः||६६||

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Adhikarana 10 (67-70) · Śloka 70

স্বাচারং হৃষ্টমব্যঙ্গং যশস্যং শুক্লবাসসম্| অমুণ্ডমজটং দূতং জাতিবেশক্রিযাসমম্||৬৭|| অনুষ্ট্রখরযানস্থমসন্ধ্যাস্বগ্রহেষু চ| অদারুণেষু নক্ষত্রেষ্বনুগ্রেষু ধ্রুবেষু চ||৬৮|| বিনা চতুর্থীং নবমীং বিনা রিক্তাং চতুর্দশীম্| মধ্যাহ্নমর্ধরাত্রং চ ভূকম্পং রাহুদর্শনম্||৬৯|| বিনা দেশমশস্তং চাশস্তৌত্পাতিকলক্ষণম্| দূতং প্রশস্তমব্যগ্রং নির্দিশেদাগতং ভিষক্||৭০||

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स्वाचारं हृष्टमव्यङ्गं यशस्यं शुक्लवाससम्| अमुण्डमजटं दूतं जातिवेशक्रियासमम्||६७|| अनुष्ट्रखरयानस्थमसन्ध्यास्वग्रहेषु च| अदारुणेषु नक्षत्रेष्वनुग्रेषु ध्रुवेषु च||६८|| विना चतुर्थीं नवमीं विना रिक्तां चतुर्दशीम्| मध्याह्नमर्धरात्रं च भूकम्पं राहुदर्शनम्||६९|| विना देशमशस्तं चाशस्तौत्पातिकलक्षणम्| दूतं प्रशस्तमव्यग्रं निर्दिशेदागतं भिषक्||७०||

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Adhikarana 11 (71-79) · Śloka 80

দধ্যক্ষতদ্বিজাতীনাং বৃষভাণাং নৃপস্য চ||৭১|| রত্নানাং পূর্ণকুম্ভানাং সিতস্য তুরগস্য চ| সুরধ্বজপতাকানাং ফলানাং যাবকস্য চ||৭২|| কন্যাপুংবর্ধমানানাং বদ্ধস্যৈকপশোস্তস্থা| পৃথিব্যা উদ্ধৃতাযাশ্চ বহ্নেঃ প্রজ্বলিতস্য চ||৭৩|| মোদকানাং সুমনসাং শুক্লানাং চন্দনস্য চ| মনোজ্ঞস্যান্নপানস্য পূর্ণস্য শকটস্য চ||৭৪|| নৃভির্ধেন্বাঃ সবত্সাযা বডবাযাঃ স্ত্রিযাস্তথা| জীবঞ্জীবকসিদ্ধার্থসারসপ্রিযবাদিনাম্||৭৫|| হংসানাং শতপত্রাণাং চাষাণাং শিখিনাং তথা| মত্স্যাজদ্বিজশঙ্খানাং প্রিযঙ্গূনাং ঘৃতস্য চ||৭৬|| রুচকাদর্শসিদ্ধার্থরোচনানাং চ দর্শনম্| গন্ধঃ সুরভির্বর্ণশ্চ সুশুক্লো মধুরো রসঃ||৭৭|| মৃগপক্ষিমনুষ্যাণাং প্রশস্তাশ্চ গিরঃ শুভাঃ| ছত্রধ্বজপতাকানামুত্ক্ষেপণমভিষ্টুতিঃ||৭৮|| ভেরীমৃদঙ্গশঙ্খানাং শব্দাঃ পুণ্যাহনিস্বনাঃ| বেদাধ্যযনশব্দাশ্চ সুখো বাযুঃ প্রদক্ষিণঃ||৭৯|| পথি বেশ্মপ্রবেশে তু বিদ্যাদারোগ্যলক্ষণম্|৮০|

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दध्यक्षतद्विजातीनां वृषभाणां नृपस्य च||७१|| रत्नानां पूर्णकुम्भानां सितस्य तुरगस्य च| सुरध्वजपताकानां फलानां यावकस्य च||७२|| कन्यापुंवर्धमानानां बद्धस्यैकपशोस्तस्था| पृथिव्या उद्धृतायाश्च वह्नेः प्रज्वलितस्य च||७३|| मोदकानां सुमनसां शुक्लानां चन्दनस्य च| मनोज्ञस्यान्नपानस्य पूर्णस्य शकटस्य च||७४|| नृभिर्धेन्वाः सवत्साया वडवायाः स्त्रियास्तथा| जीवञ्जीवकसिद्धार्थसारसप्रियवादिनाम्||७५|| हंसानां शतपत्राणां चाषाणां शिखिनां तथा| मत्स्याजद्विजशङ्खानां प्रियङ्गूनां घृतस्य च||७६|| रुचकादर्शसिद्धार्थरोचनानां च दर्शनम्| गन्धः सुरभिर्वर्णश्च सुशुक्लो मधुरो रसः||७७|| मृगपक्षिमनुष्याणां प्रशस्ताश्च गिरः शुभाः| छत्रध्वजपताकानामुत्क्षेपणमभिष्टुतिः||७८|| भेरीमृदङ्गशङ्खानां शब्दाः पुण्याहनिस्वनाः| वेदाध्ययनशब्दाश्च सुखो वायुः प्रदक्षिणः||७९|| पथि वेश्मप्रवेशे तु विद्यादारोग्यलक्षणम्|८०|

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Adhikarana 12 (80-86) · Śloka 86

মঙ্গলাচারসম্পন্নঃ সাতুরো বৈশ্মিকো জনঃ||৮০|| শ্রদ্দধানোঽনুকূলশ্চ প্রভূতদ্রব্যসঙ্গ্রহঃ| ধনৈশ্বর্যসুখাবাপ্তিরিষ্টলাভঃ সুখেন চ||৮১|| দ্রব্যাণাং তত্র যোগ্যানাং যোজনা সিদ্ধিরেব চ| গৃহপ্রাসাদশৈলানাং নাগানামৃষভস্য চ||৮২|| হযানাং পুরুষাণাং চ স্বপ্নে সমধিরোহণম্| সোমার্কাগ্নিদ্বিজাতীনাং গবাং নৄণাং পযস্বিনাম্||৮৩|| অর্ণবানাং প্রতরণং বৃদ্ধিঃ সম্বাধনিঃসৃতিঃ| স্বপ্নে দেবৈঃ সপিতৃভিঃ প্রসন্নৈশ্চাভিভাষণম্||৮৪|| দর্শনং শুক্লবস্ত্রাণাং হ্রদস্য বিমলস্য চ| মাংসমত্স্যবিষামেধ্যচ্ছত্রাদর্শপরিগ্রহঃ||৮৫|| স্বপ্নে সুমনসাং চৈব শুক্লানাং দর্শনং শুভম্| অশ্বগোরথযানং চ যানং পূর্বোত্তরেণ চ| রোদনং পতিতোত্থানং দ্বিষতাং চাবমর্দনম্||৮৬||

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मङ्गलाचारसम्पन्नः सातुरो वैश्मिको जनः||८०|| श्रद्दधानोऽनुकूलश्च प्रभूतद्रव्यसङ्ग्रहः| धनैश्वर्यसुखावाप्तिरिष्टलाभः सुखेन च||८१|| द्रव्याणां तत्र योग्यानां योजना सिद्धिरेव च| गृहप्रासादशैलानां नागानामृषभस्य च||८२|| हयानां पुरुषाणां च स्वप्ने समधिरोहणम्| सोमार्काग्निद्विजातीनां गवां नॄणां पयस्विनाम्||८३|| अर्णवानां प्रतरणं वृद्धिः सम्बाधनिःसृतिः| स्वप्ने देवैः सपितृभिः प्रसन्नैश्चाभिभाषणम्||८४|| दर्शनं शुक्लवस्त्राणां ह्रदस्य विमलस्य च| मांसमत्स्यविषामेध्यच्छत्रादर्शपरिग्रहः||८५|| स्वप्ने सुमनसां चैव शुक्लानां दर्शनं शुभम्| अश्वगोरथयानं च यानं पूर्वोत्तरेण च| रोदनं पतितोत्थानं द्विषतां चावमर्दनम्||८६||

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Adhikarana 13 (87-88) · Śloka 88

সত্ত্বলক্ষণসংযোগো ভক্তির্বৈদ্যদ্বিজাতিষু| সাধ্যত্বং ন চ নির্বেদস্তদারোগ্যস্য লক্ষণম্||৮৭|| আরোগ্যাদ্বলমাযুশ্চ সুখং চ লভতে মহত্| ইষ্টাংশ্চাপ্যপরান্ ভাবান্ পুরুষঃ শুভলক্ষণঃ||৮৮||

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सत्त्वलक्षणसंयोगो भक्तिर्वैद्यद्विजातिषु| साध्यत्वं न च निर्वेदस्तदारोग्यस्य लक्षणम्||८७|| आरोग्याद्बलमायुश्च सुखं च लभते महत्| इष्टांश्चाप्यपरान् भावान् पुरुषः शुभलक्षणः||८८||

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Adhikarana 14 (89) · Śloka 89

তত্র শ্লোকৌ- উক্তং গোমযচূর্ণীযে মরণারোগ্যলক্ষণম্| দূতস্বপ্নাতুরোত্পাতযুক্তিসিদ্ধিব্যপাশ্রযম্||৮৯||

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तत्र श्लोकौ- उक्तं गोमयचूर्णीये मरणारोग्यलक्षणम्| दूतस्वप्नातुरोत्पातयुक्तिसिद्धिव्यपाश्रयम्||८९||

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Adhikarana 15 (90) · Śloka 90

ইতীদমুক্তং প্রকৃতং যথাতথং তদন্ববেক্ষ্যং সততং ভিষগ্বিদা| তথা হি সিদ্ধিং চ যশশ্চ শাশ্বতং স সিদ্ধকর্মা লভতে ধনানি চ||৯০||

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इतीदमुक्तं प्रकृतं यथातथं तदन्ववेक्ष्यं सततं भिषग्विदा| तथा हि सिद्धिं च यशश्च शाश्वतं स सिद्धकर्मा लभते धनानि च||९०||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 12

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানে গোমযচূর্ণীযমিন্দ্রিযং নাম দ্বাদশোঽধ্যাযঃ||১২|| ইতি চরকসংহিতাযাং পঞ্চমম্ ইন্দ্রিযস্থানং সম্পূর্ণম্|

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने गोमयचूर्णीयमिन्द्रियं नाम द्वादशोऽध्यायः||१२|| इति चरकसंहितायां पञ्चमम् इन्द्रियस्थानं सम्पूर्णम्|

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