Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ শোষনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ শোষনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ইহ খলু চত্বারি শোষস্যাযতনানি ভবন্তি; তদ্যথা- সাহসং সন্ধারণং ক্ষযো বিষমাশনমিতি||৩||
इह खलु चत्वारि शोषस्यायतनानि भवन्ति; तद्यथा- साहसं सन्धारणं क्षयो विषमाशनमिति||३||
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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
তত্র সাহসং শোষস্যাযতনমিতি যদুক্তং তদনুব্যাখ্যাস্যামঃ- যদা পুরুষো দুর্বলো হি সন্ বলবতা সহ বিগৃহ্ণাতি, অতিমহতা বা ধনুষা ব্যাযচ্ছতি, জল্পতি বাঽপ্যতিমাত্রম্, অতিমাত্রং বা ভারমুদ্বহতি, অপ্সু বা প্লবতে চাতিদূরম্, উত্সাদনপদাঘাতনে বাঽতিপ্রগাঢমাসেবতে, অতিপ্রকৃষ্টং বাঽধ্বানং দ্রুতমভিপততি, অভিহন্যতে বা, অন্যদ্বা কিঞ্চিদেবংবিধং বিষমমতিমাত্রং বা ব্যাযামজাতমারভতে, তস্যাতিমাত্রেণ কর্মণোরঃ ক্ষণ্যতে| তস্যোরঃ ক্ষতমুপপ্লবতে বাযুঃ| স তত্রাবস্থিতঃ শ্লেষ্মাণমুরঃস্থমুপসঙ্গৃহ্য পিত্তং চ দূষযন্ বিহরত্যূর্ধ্বমধস্তির্যক্ চ| তস্য যোংঽশঃ শরীরসন্ধীনাবিশতি তেনাস্য জৃম্ভাঽঙ্গমর্দো জ্বরশ্চোপজাযতে, যস্ত্বামাশযমভ্যুপৈতি তেন রোগা ভবন্তি উরস্যা অরোচকশ্চ , যঃ কণ্ঠমভিপ্রপদ্যতে কণ্ঠস্তেনোদ্ধ্বংস্যতে স্বরশ্চাবসীদতি, যঃ প্রাণবহানি স্রোতাংস্যন্বেতি তেন শ্বাসঃ প্রতিশ্যাযশ্চ জাযতে, যঃ শিরস্যবতিষ্ঠতে শিরস্তেনোপহন্যতে; ততঃ ক্ষণনাচ্চৈবোরসো বিষমগতিত্বাচ্চ বাযোঃ কণ্ঠস্য চোদ্ধ্বংসনাত্ কাসঃ সততমস্য সঞ্জাযতে, স কাসপ্রসঙ্গাদুরসি ক্ষতে শোণিতং ষ্ঠীবতি, শোণিতাগমনাচ্চাস্য দৌর্বল্যমুপজাযতে; এবমেতে সাহসপ্রভবাঃ সাহসিকমুপদ্রবাঃ স্পৃশন্তি| ততঃ স উপশোষণৈরেতৈরুপদ্রবৈরুপদ্রুতঃ শনৈঃ শনৈরুপশুষ্যতি| তস্মাত্ পুরুষো মতিমান্ বলমাত্মনঃ সমীক্ষ্য তদনুরূপাণি কর্মাণ্যারভেত কর্তুং; বলসমাধানং হি শরীরং, শরীরমূলশ্চ পুরুষ ইতি||৪|| ভবতি চাত্র- সাহসং বর্জযেত্ কর্ম রক্ষঞ্জীবিতমাত্মনঃ| জীবন্ হি পুরুষস্ত্বিষ্টং কর্মণঃ ফলমশ্নুতে||৫||
तत्र साहसं शोषस्यायतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः- यदा पुरुषो दुर्बलो हि सन् बलवता सह विगृह्णाति, अतिमहता वा धनुषा व्यायच्छति, जल्पति वाऽप्यतिमात्रम्, अतिमात्रं वा भारमुद्वहति, अप्सु वा प्लवते चातिदूरम्, उत्सादनपदाघातने वाऽतिप्रगाढमासेवते, अतिप्रकृष्टं वाऽध्वानं द्रुतमभिपतति, अभिहन्यते वा, अन्यद्वा किञ्चिदेवंविधं विषममतिमात्रं वा व्यायामजातमारभते, तस्यातिमात्रेण कर्मणोरः क्षण्यते| तस्योरः क्षतमुपप्लवते वायुः| स तत्रावस्थितः श्लेष्माणमुरःस्थमुपसङ्गृह्य पित्तं च दूषयन् विहरत्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च| तस्य योंऽशः शरीरसन्धीनाविशति तेनास्य जृम्भाऽङ्गमर्दो ज्वरश्चोपजायते, यस्त्वामाशयमभ्युपैति तेन रोगा भवन्ति उरस्या अरोचकश्च , यः कण्ठमभिप्रपद्यते कण्ठस्तेनोद्ध्वंस्यते स्वरश्चावसीदति, यः प्राणवहानि स्रोतांस्यन्वेति तेन श्वासः प्रतिश्यायश्च जायते, यः शिरस्यवतिष्ठते शिरस्तेनोपहन्यते; ततः क्षणनाच्चैवोरसो विषमगतित्वाच्च वायोः कण्ठस्य चोद्ध्वंसनात् कासः सततमस्य सञ्जायते, स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितागमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते; एवमेते साहसप्रभवाः साहसिकमुपद्रवाः स्पृशन्ति| ततः स उपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति| तस्मात् पुरुषो मतिमान् बलमात्मनः समीक्ष्य तदनुरूपाणि कर्माण्यारभेत कर्तुं; बलसमाधानं हि शरीरं, शरीरमूलश्च पुरुष इति||४|| भवति चात्र- साहसं वर्जयेत् कर्म रक्षञ्जीवितमात्मनः| जीवन् हि पुरुषस्त्विष्टं कर्मणः फलमश्नुते||५||
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Adhikarana 4 (6-7) · Śloka 7
সন্ধারণং শোষস্যাযতনমিতি যদুক্তং তদনুব্যাখ্যাস্যামঃ- যদা পুরুষো রাজসমীপে ভর্তুঃ সমীপে বা গুরোর্বা পাদমূলে দ্যূতসভমন্যং বা সতাং সমাজং স্ত্রীমধ্যং বা সমনুপ্রবিশ্য যানৈর্বাঽপ্যুচ্চাবচৈরভিযান্ ভযাত্ প্রসঙ্গাদ্ধ্রীমত্ত্বাদ্ধৃণিত্বাদ্বা নিরুণদ্ধ্যাগতান্ বাতমূত্রপুরীষবেগান্ তদা তস্য সন্ধারণাদ্বাযুঃ প্রকোপমাপদ্যতে, স প্রকুপিতঃ পিত্তশ্লেষ্মাণৌ সমুদীর্যোর্ধ্বমধস্তির্যক্ চ বিহরতি; ততশ্চাংশবিশেষেণ পূর্ববচ্ছরীরাবযববিশেষং প্রবিশ্য শূলমুপজনযতি, ভিনত্তি পুরীষমুচ্ছোষযতি বা, পার্শ্বে চাতিরুজতি, অংসাববমৃদ্গাতি, কণ্ঠমুরশ্চাবধমতি, শিরশ্চোপহন্তি, কাসং শ্বাসং জ্বরং স্বরভেদং প্রতিশ্যাযং চোপজনযতি; ততঃ স উপশোষণৈরেতৈরুপদ্রবৈরুপদ্রুতঃ শনৈঃ শনৈরুপশুষ্যতি| তস্মাত্ পুরুষো মতিমানাত্মনঃ শারীরেষ্বেব যোগক্ষেমকরেষু প্রযতেত বিশেষেণ; শরীরং হ্যস্য মূলং, শরীরমূলশ্চ পুরুষো ভবতি||৬|| ভবতি চাত্র- সর্বমন্যত্ পরিত্যজ্য শরীরমনুপালযেত্| তদভাবে হি ভাবানাং সর্বাভাবঃ শরীরিণাম্||৭||
सन्धारणं शोषस्यायतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः- यदा पुरुषो राजसमीपे भर्तुः समीपे वा गुरोर्वा पादमूले द्यूतसभमन्यं वा सतां समाजं स्त्रीमध्यं वा समनुप्रविश्य यानैर्वाऽप्युच्चावचैरभियान् भयात् प्रसङ्गाद्ध्रीमत्त्वाद्धृणित्वाद्वा निरुणद्ध्यागतान् वातमूत्रपुरीषवेगान् तदा तस्य सन्धारणाद्वायुः प्रकोपमापद्यते, स प्रकुपितः पित्तश्लेष्माणौ समुदीर्योर्ध्वमधस्तिर्यक् च विहरति; ततश्चांशविशेषेण पूर्ववच्छरीरावयवविशेषं प्रविश्य शूलमुपजनयति, भिनत्ति पुरीषमुच्छोषयति वा, पार्श्वे चातिरुजति, अंसाववमृद्गाति, कण्ठमुरश्चावधमति, शिरश्चोपहन्ति, कासं श्वासं ज्वरं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयति; ततः स उपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति| तस्मात् पुरुषो मतिमानात्मनः शारीरेष्वेव योगक्षेमकरेषु प्रयतेत विशेषेण; शरीरं ह्यस्य मूलं, शरीरमूलश्च पुरुषो भवति||६|| भवति चात्र- सर्वमन्यत् परित्यज्य शरीरमनुपालयेत्| तदभावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम्||७||
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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8
ক্ষযঃ শোষস্যাযতনমিতি যদুক্তং তদনুব্যাখ্যাস্যামঃ- যদা পুরুষোঽতিমাত্রং শোকচিন্তাপরিগতহৃদযো ভবতি, ঈর্ষ্যোত্কণ্ঠাভযক্রোধাদিভির্বা সমাবিশ্যতে, কৃশো বা সন্ রূক্ষান্নপানসেবী ভবতি, দুর্বলপ্রকৃতিরনাহারোঽল্পাহারো বা ভবতি, তদা তস্য হৃদযস্থাযী রসঃ ক্ষযমুপৈতি; স তস্যোপক্ষযাচ্ছোষং প্রাপ্নোতি, অপ্রতীকারাচ্চানুবধ্যতে যক্ষ্মণা যথোপদেক্ষ্যমাণরূপেণ|৮|
क्षयः शोषस्यायतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः- यदा पुरुषोऽतिमात्रं शोकचिन्तापरिगतहृदयो भवति, ईर्ष्योत्कण्ठाभयक्रोधादिभिर्वा समाविश्यते, कृशो वा सन् रूक्षान्नपानसेवी भवति, दुर्बलप्रकृतिरनाहारोऽल्पाहारो वा भवति, तदा तस्य हृदयस्थायी रसः क्षयमुपैति; स तस्योपक्षयाच्छोषं प्राप्नोति, अप्रतीकाराच्चानुबध्यते यक्ष्मणा यथोपदेक्ष्यमाणरूपेण|८|
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Adhikarana 6 (8-9) · Śloka 9
যদা বা পুরুষোঽতিহর্ষাদতিপ্রসক্তভাবঃ স্ত্রীষ্বতিপ্রসঙ্গমারভতে, তস্যাতিমাত্রপ্রসঙ্গাদ্রেতঃ ক্ষযমেতি| ক্ষযমপি চোপগচ্ছতি রেতসি যদি মনঃ স্ত্রীভ্যো নৈবাস্য নিবর্ততে, তস্য চাতিপ্রণীতসঙ্কল্পস্য মৈথুনমাপদ্যমানস্য ন শুক্রং প্রবর্ততেঽতিমাত্রোপক্ষীণরেতস্ত্বাত্, তথাঽস্য বাযুর্ব্যাযচ্ছমানশরীরস্যৈব ধমনীরনুপ্রবিশ্য শোণিতবাহিনীস্তাভ্যঃ শোণিতং প্রচ্যাবযতি, তচ্ছুক্রক্ষযাদস্য পুনঃ শুক্রমার্গেণ শোণিতং প্রবর্ততে বাতানুসৃতলিঙ্গম্| অথাস্য শুক্রক্ষযাচ্ছোণিতপ্রবর্তনাচ্চ সন্ধযঃ শিথিলীভবন্তি, রৌক্ষ্যমুপজাযতে, ভূযঃ শরীরং দৌর্বল্যমাবিশতি , বাযুঃ প্রকোপমাপদ্যতে; স প্রকুপিতো বশিকং শরীরমনুসর্পন্নুদীর্য শ্লেষ্মপিত্তে পরিশোষযতি মাংসশোণিতে, প্রচ্যাবযতি শ্লেষ্মপিত্তে সংরুজতি পার্শ্বে, অবমৃদ্গাত্যংসৌ , কণ্ঠমুদ্ধ্বংসতি, শিরঃ শ্লেষ্মাণমুপত্ক্লেশ্য প্রতিপূরযতি শ্লেষ্মণা, সন্ধীংশ্চ প্রপীডযন্ করোত্যঙ্গমর্দমরোচকাবিপাকৌ চ, পিত্তশ্লেষ্মোত্ক্লেশাত্ প্রতিলোমগত্বাচ্চ বাযুর্জ্বরং কাসং শ্বাসং স্বরভেদং প্রতিশ্যাযং চোপজনযতি; স কাসপ্রসঙ্গাদুরসি ক্ষতে শোণিতং ষ্ঠীবতি, শোণিতগমনাচ্চাস্য দৌর্বল্যমুপজাযতে, ততঃ স উপশোষণৈরেতৈরুপদ্রবৈরুপদ্রুতঃ শনৈঃ শনৈরুপশুষ্যতি| তস্মাত্ পুরুষো মতিমানাত্মনঃ শরীরমনুরক্ষঞ্ছুক্রমনুরক্ষেত্| পরা হ্যেষা ফলনির্বৃত্তিরাহারস্যেতি||৮|| ভবতি চাত্র- আহারস্য পরং ধাম শুক্রং তদ্রক্ষ্যমাত্মনঃ| ক্ষযো হ্যস্য বহূন্ রোগান্মরণং বা নিযচ্ছতি||৯||
यदा वा पुरुषोऽतिहर्षादतिप्रसक्तभावः स्त्रीष्वतिप्रसङ्गमारभते, तस्यातिमात्रप्रसङ्गाद्रेतः क्षयमेति| क्षयमपि चोपगच्छति रेतसि यदि मनः स्त्रीभ्यो नैवास्य निवर्तते, तस्य चातिप्रणीतसङ्कल्पस्य मैथुनमापद्यमानस्य न शुक्रं प्रवर्ततेऽतिमात्रोपक्षीणरेतस्त्वात्, तथाऽस्य वायुर्व्यायच्छमानशरीरस्यैव धमनीरनुप्रविश्य शोणितवाहिनीस्ताभ्यः शोणितं प्रच्यावयति, तच्छुक्रक्षयादस्य पुनः शुक्रमार्गेण शोणितं प्रवर्तते वातानुसृतलिङ्गम्| अथास्य शुक्रक्षयाच्छोणितप्रवर्तनाच्च सन्धयः शिथिलीभवन्ति, रौक्ष्यमुपजायते, भूयः शरीरं दौर्बल्यमाविशति , वायुः प्रकोपमापद्यते; स प्रकुपितो वशिकं शरीरमनुसर्पन्नुदीर्य श्लेष्मपित्ते परिशोषयति मांसशोणिते, प्रच्यावयति श्लेष्मपित्ते संरुजति पार्श्वे, अवमृद्गात्यंसौ , कण्ठमुद्ध्वंसति, शिरः श्लेष्माणमुपत्क्लेश्य प्रतिपूरयति श्लेष्मणा, सन्धींश्च प्रपीडयन् करोत्यङ्गमर्दमरोचकाविपाकौ च, पित्तश्लेष्मोत्क्लेशात् प्रतिलोमगत्वाच्च वायुर्ज्वरं कासं श्वासं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयति; स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते, ततः स उपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति| तस्मात् पुरुषो मतिमानात्मनः शरीरमनुरक्षञ्छुक्रमनुरक्षेत्| परा ह्येषा फलनिर्वृत्तिराहारस्येति||८|| भवति चात्र- आहारस्य परं धाम शुक्रं तद्रक्ष्यमात्मनः| क्षयो ह्यस्य बहून् रोगान्मरणं वा नियच्छति||९||
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Adhikarana 7 (10-11) · Śloka 11
বিষমাশনং শোষস্যাযতনমিতি যদুক্তং, তদনুব্যাখ্যাস্যামঃ- যদা পুরুষঃ পানাশনভক্ষ্যলেহ্যোপযোগান্ প্রকৃতিকরণসংযোগরাশিদেশকালোপযোগসংস্থোপশযবিষমানাসেবতে, তদা তস্য তেভ্যো বাতপিত্তশ্লেষ্মাণো বৈষম্যমাপদ্যন্তে; তে বিষমাঃ শরীরমনুসৃত্য যদা স্রোতসামযনমুখানি প্রতিবার্যাবতিষ্ঠন্তে তদা জন্তুর্যদ্যদাহারজাতমাহরতি তত্তদস্য মূত্রপুরীষমেবোপজাযতে ভূযিষ্ঠং নান্যস্তথা শরীরধাতুঃ; স পুরীষোপষ্টম্ভাদ্বর্তযতি, তস্মাচ্ছুষ্যতো বিশেষেণ পুরীষমনুরক্ষ্যং তথাঽন্যেষামতিকৃশদুর্বলানাং; তস্যানাপ্যাযমানস্য বিষমাশনোপচিতা দোষাঃ পৃথক্ পৃথগুপদ্রবৈর্যুঞ্জন্তো ভূযঃ শরীরমুপশোষযন্তি| তত্র বাতঃ শূলমঙ্গমর্দং কণ্ঠোদ্ধ্বংসনং পার্শ্বসংরুজনমংসাবমর্দং স্বরভেদং প্রতিশ্যাযং চোপজনযতি; পিত্তং জ্বরমতীসারমন্তর্দাহং চ; শ্লেষ্মা তু প্রতিশ্যাযং শিরসো গুরুত্বমরোচকং কাসং চ, স কাসপ্রসঙ্গাদুরসি ক্ষতে শোণিতং নিষ্ঠীবতি, শোণিতগমনাচ্চাস্য দৌর্বল্যমুপজাযতে| এবমেতে বিষমাশনোপচিতাস্ত্রযো দোষা রাজযক্ষ্যাণমভিনির্বর্তযন্তি| স তৈরুপশোষণৈরুপদ্রবৈরুপদ্রুতঃ শনৈঃ শনৈঃ শুষ্যতি| তস্মাত্ পুরুষো মতিমান্ প্রকৃতিকরণসংযোগরাশিদেশকালোপযোগসংস্থোপশযাদবিষমমাহারমাহরেত্||১০|| ভবতি চাত্র- হিতাশী স্যান্মিতাশী স্যাত্কালভোজী জিতেন্দ্রিযঃ| পশ্যন্ রোগান্ বহূন্ কষ্টান্ বুদ্ধিমান্ বিষমাশনাত্||১১||
विषमाशनं शोषस्यायतनमिति यदुक्तं, तदनुव्याख्यास्यामः- यदा पुरुषः पानाशनभक्ष्यलेह्योपयोगान् प्रकृतिकरणसंयोगराशिदेशकालोपयोगसंस्थोपशयविषमानासेवते, तदा तस्य तेभ्यो वातपित्तश्लेष्माणो वैषम्यमापद्यन्ते; ते विषमाः शरीरमनुसृत्य यदा स्रोतसामयनमुखानि प्रतिवार्यावतिष्ठन्ते तदा जन्तुर्यद्यदाहारजातमाहरति तत्तदस्य मूत्रपुरीषमेवोपजायते भूयिष्ठं नान्यस्तथा शरीरधातुः; स पुरीषोपष्टम्भाद्वर्तयति, तस्माच्छुष्यतो विशेषेण पुरीषमनुरक्ष्यं तथाऽन्येषामतिकृशदुर्बलानां; तस्यानाप्यायमानस्य विषमाशनोपचिता दोषाः पृथक् पृथगुपद्रवैर्युञ्जन्तो भूयः शरीरमुपशोषयन्ति| तत्र वातः शूलमङ्गमर्दं कण्ठोद्ध्वंसनं पार्श्वसंरुजनमंसावमर्दं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयति; पित्तं ज्वरमतीसारमन्तर्दाहं च; श्लेष्मा तु प्रतिश्यायं शिरसो गुरुत्वमरोचकं कासं च, स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं निष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते| एवमेते विषमाशनोपचितास्त्रयो दोषा राजयक्ष्याणमभिनिर्वर्तयन्ति| स तैरुपशोषणैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैः शुष्यति| तस्मात् पुरुषो मतिमान् प्रकृतिकरणसंयोगराशिदेशकालोपयोगसंस्थोपशयादविषममाहारमाहरेत्||१०|| भवति चात्र- हिताशी स्यान्मिताशी स्यात्कालभोजी जितेन्द्रियः| पश्यन् रोगान् बहून् कष्टान् बुद्धिमान् विषमाशनात्||११||
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Adhikarana 8 (12) · Śloka 12
এতৈশ্চতুর্ভিঃ শোষস্যাযতনৈরুপসেবিতৈর্বাতপিত্তশ্লেষ্মাণঃ প্রকোপমাপদ্যন্তে| তে প্রকুপিতা নানাবিধৈরুপদ্রবৈঃ শরীরমুপশোষযন্তি| তং সর্বরোগাণাং কষ্টতমত্বাদ্রাজযক্ষ্মাণমাচক্ষতে ভিষজঃ; যস্মাদ্বা পূর্বমাসীদ্ভগবতঃ সোমস্যোডুরাজস্য তস্মাদ্রাজযক্ষ্মেতি||১২||
एतैश्चतुर्भिः शोषस्यायतनैरुपसेवितैर्वातपित्तश्लेष्माणः प्रकोपमापद्यन्ते| ते प्रकुपिता नानाविधैरुपद्रवैः शरीरमुपशोषयन्ति| तं सर्वरोगाणां कष्टतमत्वाद्राजयक्ष्माणमाचक्षते भिषजः; यस्माद्वा पूर्वमासीद्भगवतः सोमस्योडुराजस्य तस्माद्राजयक्ष्मेति||१२||
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Adhikarana 9 (13) · Śloka 13
তস্যেমানি পূর্বরূপাণি ভবন্তি; তদ্যথা- প্রতিশ্যাযঃ, ক্ষবথুরভীক্ষ্ণং, শ্লেষ্মপ্রসেকঃ, মুখমাধুর্যম্, অনন্নাভিলাষঃ, অন্নকালে চাযাসঃ, দোষদর্শনমদোষেষ্বল্পদোষেষু বা ভাবেষু পাত্রোদকান্নসূপাপূপোপদংশপরিবেশকেষু, ভুক্তবতশ্চাস্য হৃল্লাসঃ, তথোল্লেখনমপ্যাহারস্যান্তরান্তরা, মুখস্য পাদযোশ্চ শোফঃ , পাণ্যোশ্চাবেক্ষণমত্যর্থম্, অক্ষ্ণোঃ শ্বেতাবভাসতা চাতিমাত্রং, বাহ্বোশ্চ প্রমাণজিজ্ঞাসা, স্ত্রীকামতা, নির্ঘৃণিত্বং, বীভত্সদর্শনতা চাস্য কাযে, স্বপ্নে চাভীক্ষ্ণং দর্শনমনুদকানামুদকস্থানানাং শূন্যানাং চ গ্রামনগরনিগমজনপদানাং শুষ্কদগ্ধভগ্নানাং চ বনানাং কৃকলাসমযূরবানরশুকসর্পকাকোলূকাদিভিঃ সংস্পর্শনমধিরোহণং যানং বা শ্বোষ্ট্রখরবরাহৈঃ কেশাস্থিভস্মতুষাঙ্গাররাশীনাং চাধিরোহণমিতি (শোষপূর্বরূপাণি ভবন্তি)||১৩||
तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति; तद्यथा- प्रतिश्यायः, क्षवथुरभीक्ष्णं, श्लेष्मप्रसेकः, मुखमाधुर्यम्, अनन्नाभिलाषः, अन्नकाले चायासः, दोषदर्शनमदोषेष्वल्पदोषेषु वा भावेषु पात्रोदकान्नसूपापूपोपदंशपरिवेशकेषु, भुक्तवतश्चास्य हृल्लासः, तथोल्लेखनमप्याहारस्यान्तरान्तरा, मुखस्य पादयोश्च शोफः , पाण्योश्चावेक्षणमत्यर्थम्, अक्ष्णोः श्वेतावभासता चातिमात्रं, बाह्वोश्च प्रमाणजिज्ञासा, स्त्रीकामता, निर्घृणित्वं, बीभत्सदर्शनता चास्य काये, स्वप्ने चाभीक्ष्णं दर्शनमनुदकानामुदकस्थानानां शून्यानां च ग्रामनगरनिगमजनपदानां शुष्कदग्धभग्नानां च वनानां कृकलासमयूरवानरशुकसर्पकाकोलूकादिभिः संस्पर्शनमधिरोहणं यानं वा श्वोष्ट्रखरवराहैः केशास्थिभस्मतुषाङ्गारराशीनां चाधिरोहणमिति (शोषपूर्वरूपाणि भवन्ति)||१३||
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Adhikarana 10 (14) · Śloka 14
অত ঊর্ধ্বমেকাদশরূপাণি তস্য ভবন্তি; তদ্যথা- শিরসঃ পরিপূর্ণত্বং, কাসঃ, শ্বাসঃ, স্বরভেদঃ, শ্লেষ্মণশ্ছর্দনং, শোণিতষ্ঠীবনং, পার্শ্বসংরোজনম্, অংসাবমর্দঃ, জ্বরঃ, অতীসারঃ, অরোচকশ্চেতি||১৪||
अत ऊर्ध्वमेकादशरूपाणि तस्य भवन्ति; तद्यथा- शिरसः परिपूर्णत्वं, कासः, श्वासः, स्वरभेदः, श्लेष्मणश्छर्दनं, शोणितष्ठीवनं, पार्श्वसंरोजनम्, अंसावमर्दः, ज्वरः, अतीसारः, अरोचकश्चेति||१४||
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Adhikarana 11 (15) · Śloka 15
তত্রাপরিক্ষীণবলমাংসশোণিতো বলবানজাতারিষ্টঃ সর্বৈরপি শোষলিঙ্গৈরুপদ্রুতঃ সাধ্যো জ্ঞেযঃ| বলবানুপচিতো হি সহত্বাদ্ব্যাধ্যৌষধবলস্য কামং সুবহুলিঙ্গোঽপ্যল্পলিঙ্গ এব মন্তব্যঃ||১৫||
तत्रापरिक्षीणबलमांसशोणितो बलवानजातारिष्टः सर्वैरपि शोषलिङ्गैरुपद्रुतः साध्यो ज्ञेयः| बलवानुपचितो हि सहत्वाद्व्याध्यौषधबलस्य कामं सुबहुलिङ्गोऽप्यल्पलिङ्ग एव मन्तव्यः||१५||
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Adhikarana 12 (16-17) · Śloka 17
দুর্বলং ত্বতিক্ষীণবলমাংসশোণিতমল্পলিঙ্গমজাতারিষ্টমপি বহুলিঙ্গং জাতারিষ্টং চ বিদ্যাত্, অসহত্বাদ্ব্যাধ্যৌষধবলস্য; তং পরিবর্জযেত্, ক্ষণেনৈব হি প্রাদুর্ভবন্ত্যরিষ্টানি, অনিমিত্তশ্চারিষ্টপ্রাদুর্ভাব ইতি||১৬|| তত্র শ্লোকঃ- সমুত্থানং চ লিঙ্গং চ যঃ শোষস্যাববুধ্যতে| পূর্বরূপং চ তত্ত্বেন স রাজ্ঞঃ কর্তুমর্হতি||১৭||
दुर्बलं त्वतिक्षीणबलमांसशोणितमल्पलिङ्गमजातारिष्टमपि बहुलिङ्गं जातारिष्टं च विद्यात्, असहत्वाद्व्याध्यौषधबलस्य; तं परिवर्जयेत्, क्षणेनैव हि प्रादुर्भवन्त्यरिष्टानि, अनिमित्तश्चारिष्टप्रादुर्भाव इति||१६|| तत्र श्लोकः- समुत्थानं च लिङ्गं च यः शोषस्यावबुध्यते| पूर्वरूपं च तत्त्वेन स राज्ञः कर्तुमर्हति||१७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 6
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে নিদানস্থানে শোষনিদানং নাম ষষ্ঠোঽধ্যাযঃ||৬||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने शोषनिदानं नाम षष्ठोऽध्यायः||६||
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