Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কুষ্ঠনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কুষ্ঠনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সপ্ত দ্রব্যাণি কুষ্ঠানাং প্রকৃতির্বিকৃতিমাপন্নানি ভবন্তি| তদ্যথা- ত্রযো দোষা বাতপিত্তশ্লেষ্মাণঃ প্রকোপণবিকৃতাঃ, দূষ্যাশ্চ শরীরধাতবস্ত্বঙ্মাংসশোণিতলসীকাশ্চতুর্ধা দোষোপঘাতবিকৃতা ইতি| এতত্ সপ্তানাং সপ্তধাতুকমেবঙ্গতমাজননং কুষ্ঠানাম্, অতঃপ্রভবাণ্যভিনির্বর্তমানানি কেবলং শরীরমুপতপন্তি||৩||
सप्त द्रव्याणि कुष्ठानां प्रकृतिर्विकृतिमापन्नानि भवन्ति| तद्यथा- त्रयो दोषा वातपित्तश्लेष्माणः प्रकोपणविकृताः, दूष्याश्च शरीरधातवस्त्वङ्मांसशोणितलसीकाश्चतुर्धा दोषोपघातविकृता इति| एतत् सप्तानां सप्तधातुकमेवङ्गतमाजननं कुष्ठानाम्, अतःप्रभवाण्यभिनिर्वर्तमानानि केवलं शरीरमुपतपन्ति||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
ন চ কিঞ্চিদস্তি কুষ্ঠমেকদোষপ্রকোপনিমিত্তম্, অস্তি তু খলু সমানপ্রকৃতীনামপি কুষ্ঠানাং দোষাংশাংশবিকল্পানুবন্ধস্থানবিভাগেন বেদনাবর্ণসংস্থানপ্রভাবনামচিকিত্সিতবিশেষঃ| স সপ্তবিধোঽষ্টাদশবিধোঽপরিসঙ্খ্যেযবিধো বা ভবতি| দোষা হি বিকল্পনৈর্বিকল্প্যমানা বিকল্পযন্তি বিকারান্, অন্যত্রাসাধ্যভাবাত্| তেষাং বিকল্পবিকারসঙ্খ্যানেঽতিপ্রসঙ্গমভিসমীক্ষ্য সপ্তবিধমেব কুষ্ঠবিশেষমুপদেক্ষ্যামঃ||৪||
न च किञ्चिदस्ति कुष्ठमेकदोषप्रकोपनिमित्तम्, अस्ति तु खलु समानप्रकृतीनामपि कुष्ठानां दोषांशांशविकल्पानुबन्धस्थानविभागेन वेदनावर्णसंस्थानप्रभावनामचिकित्सितविशेषः| स सप्तविधोऽष्टादशविधोऽपरिसङ्ख्येयविधो वा भवति| दोषा हि विकल्पनैर्विकल्प्यमाना विकल्पयन्ति विकारान्, अन्यत्रासाध्यभावात्| तेषां विकल्पविकारसङ्ख्यानेऽतिप्रसङ्गमभिसमीक्ष्य सप्तविधमेव कुष्ठविशेषमुपदेक्ष्यामः||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
ইহ বাতাদিষু ত্রিষু প্রকুপিতেষু ত্বগাদীংশ্চতুরঃ প্রদূষযত্সু বাতেঽধিকতরে কপালকুষ্ঠমভিনির্বর্ততে, পিত্তে ত্বৌদুম্বরং, শ্লেষ্মণি মণ্ডলকুষ্ঠং, বাতপিত্তযোরৃষ্যজিহ্বং, পিত্তশ্লেষ্মণোঃ পুণ্ডরীকং, শ্লেষ্মমারুতযোঃ সিধ্মকুষ্ঠং, সর্বদোষাভিবৃদ্ধৌ কাকণকমভিনির্বর্ততে; এবমেষ সপ্তবিধঃ কুষ্ঠবিশেষো ভবতি| স চৈষ ভূযস্তরতমতঃ প্রকৃতৌ বিকল্প্যমানাযাং ভূযসীং বিকারবিকল্পসঙ্খ্যামাপদ্যতে||৫||
इह वातादिषु त्रिषु प्रकुपितेषु त्वगादींश्चतुरः प्रदूषयत्सु वातेऽधिकतरे कपालकुष्ठमभिनिर्वर्तते, पित्ते त्वौदुम्बरं, श्लेष्मणि मण्डलकुष्ठं, वातपित्तयोरृष्यजिह्वं, पित्तश्लेष्मणोः पुण्डरीकं, श्लेष्ममारुतयोः सिध्मकुष्ठं, सर्वदोषाभिवृद्धौ काकणकमभिनिर्वर्तते; एवमेष सप्तविधः कुष्ठविशेषो भवति| स चैष भूयस्तरतमतः प्रकृतौ विकल्प्यमानायां भूयसीं विकारविकल्पसङ्ख्यामापद्यते||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তত্রেদং সর্বকুষ্ঠনিদানং সমাসেনোপদেক্ষ্যামঃ- শীতোষ্ণব্যত্যাসমনানুপূর্ব্যোপসেবমানস্য তথা সন্তর্পণাপতর্পণাভ্যবহার্যব্যত্যাসং, মধুফাণিতমত্স্যলকুচমূলককাকমাচীঃ সততমতিমাত্রমজীর্ণে চ সমশ্নতঃ, চিলিচিমং চ পযসা, হাযনকযবকচীনকোদ্দালককোরদূষপ্রাযাণি চান্নানি ক্ষীরদধিতক্রকোলকুলত্থমাষাতসীকুসুম্ভস্নেহবন্তি, এতৈরেবাতিমাত্রং সুহিতস্য চ ব্যবাযব্যাযামসন্তাপানত্যুপসেবমানস্য, ভযশ্রমসন্তাপোপহতস্য চ সহসা শীতোদকমবতরতঃ, বিদগ্ধং চাহারজাতমনুল্লিখ্য বিদাহীন্যভ্যবহরতঃ, ছর্দিং চ প্রতিঘ্নতঃ, স্নেহাংশ্চাতিচরতঃ, ত্রযো দোষাঃ যুগপত্ প্রকোপমাপদ্যন্তে; ত্বগাদযশ্চত্বারঃ শৈথিল্যমাপদ্যন্তে; তেষু শিথিলেষু দোষাঃ প্রকুপিতাঃ স্থানমধিগম্য সন্তিষ্ঠমানাস্তানেব ত্বগাদীন্ দূষযন্তঃ কুষ্ঠান্যভিনির্বর্তযন্তি||৬||
तत्रेदं सर्वकुष्ठनिदानं समासेनोपदेक्ष्यामः- शीतोष्णव्यत्यासमनानुपूर्व्योपसेवमानस्य तथा सन्तर्पणापतर्पणाभ्यवहार्यव्यत्यासं, मधुफाणितमत्स्यलकुचमूलककाकमाचीः सततमतिमात्रमजीर्णे च समश्नतः, चिलिचिमं च पयसा, हायनकयवकचीनकोद्दालककोरदूषप्रायाणि चान्नानि क्षीरदधितक्रकोलकुलत्थमाषातसीकुसुम्भस्नेहवन्ति, एतैरेवातिमात्रं सुहितस्य च व्यवायव्यायामसन्तापानत्युपसेवमानस्य, भयश्रमसन्तापोपहतस्य च सहसा शीतोदकमवतरतः, विदग्धं चाहारजातमनुल्लिख्य विदाहीन्यभ्यवहरतः, छर्दिं च प्रतिघ्नतः, स्नेहांश्चातिचरतः, त्रयो दोषाः युगपत् प्रकोपमापद्यन्ते; त्वगादयश्चत्वारः शैथिल्यमापद्यन्ते; तेषु शिथिलेषु दोषाः प्रकुपिताः स्थानमधिगम्य सन्तिष्ठमानास्तानेव त्वगादीन् दूषयन्तः कुष्ठान्यभिनिर्वर्तयन्ति||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
তেষামিমানি পূর্বরূপাণি ভবন্তি; তদ্যথা- অস্বেদনমতিস্বেদনং পারুষ্যমতিশ্লক্ষ্ণতা বৈবর্ণ্যং কণ্ডূর্নিস্তোদঃ সুপ্ততা পরিদাহঃ পরিহর্ষো লোমহর্ষঃ খরত্বমূষ্মাযণং গৌরবং শ্বযথুর্বীসর্পাগমনমভীক্ষ্ণং চ কাযে কাযচ্ছিদ্রেষূপদেহঃ পক্বদগ্ধদষ্টভগ্নক্ষতোপস্খলিতেষ্বতিমাত্রং বেদনা স্বল্পানামপি চ ব্রণানাং দুষ্টিরসংরোহণং চেতি||৭||
तेषामिमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति; तद्यथा- अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमूष्मायणं गौरवं श्वयथुर्वीसर्पागमनमभीक्ष्णं च काये कायच्छिद्रेषूपदेहः पक्वदग्धदष्टभग्नक्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
ততোঽনন্তরং কুষ্ঠান্যভিনির্বর্তন্তে, তেষামিদং বেদনাবর্ণসংস্থানপ্রভাবনামবিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- রূক্ষারুণপরুষাণি বিষমবিসৃতানি খরপর্যন্তানি তনূন্যুদ্বৃত্তবহিস্তনূনি সুপ্তবত্সুপ্তানি হৃষিতলোমাচিতানি নিস্তোদবহুলান্যল্পকণ্ডূদাহপূযলসীকান্যাশুগতিসমুত্থানান্যাশুভেদীনি জন্তুমন্তি কৃষ্ণারুণকপালবর্ণানি চ কপালকুষ্ঠানীতি বিদ্যাত্(১); তাম্রাণি তাম্রখররোমরাজীভিরবনদ্ধানি বহলানি বহুবহলপূযরক্তলসীকানি কণ্ডূক্লেদকোথদাহপাকবন্ত্যাশুগতিসমুত্থানভেদীনি সসন্তাপক্রিমীণি পক্বোদুম্বরফলবর্ণান্যৌদুম্বরকুষ্ঠানীতি বিদ্যাত্(২); স্নিগ্ধানি গুরূণ্যুত্সেধবন্তি শ্লক্ষ্ণস্থিরপীতপর্যন্তানি শুক্লরক্তাবভাসানি শুক্লরোমরাজীসন্তানানি বহুবহলশুক্লপিচ্ছিলস্রাবীণি বহুক্লেদকণ্ডূক্রিমীণি সক্তগতিসমুত্থানভেদীনি পরিমণ্ডলানি মণ্ডলকুষ্ঠানি বিদ্যাত্(৩); পরুষাণ্যরুণবর্ণানি বহিরন্তঃশ্যাবানি নীলপীততাম্রাবভাসান্যাশুগতিসমুত্থানান্যল্পকণ্ডূক্লেদক্রিমীণি দাহভেদনিস্তোদ(পাক)বহুলানি শূকোপহতোপমবেদনান্যুত্সন্নমধ্যানি তনুপর্যন্তানি কর্কশপিডকাচিতানি দীর্ঘপরিমণ্ডলান্যৃষ্যজিহ্বাকৃতীনি ঋষ্যজিহ্বানীতি বিদ্যাত্ (৪); শুক্লরক্তাবভাসানি রক্তপর্যন্তানি রক্তরাজীসিরাসন্ততান্যুত্সেধবন্তি বহুবহলরক্তপূযলসীকানি কণ্ডূক্রিমিদাহপাকবন্ত্যাশুগতিসমুত্থানভেদীনি পুণ্ডরীকপলাশসঙ্কাশানি পুণ্ডরীকাণীতি বিদ্যাত্ (৫); পরুষারুণানি বিশীর্ণবহিস্তনূন্যন্তঃস্নিগ্ধানি শুক্লরক্তাবভাসানি বহূন্যল্পবেদনান্যল্পকণ্ডূদাহপূযলসীকানি লঘুসমুত্থানান্যল্পভেদক্রিমীণ্যলাবুপুষ্পসঙ্কাশানি সিধ্মকুষ্ঠানীতি বিদ্যাত্ (৬); কাকণন্তিকাবর্ণান্যাদৌ পশ্চাত্তু সর্বকুষ্ঠলিঙ্গসমন্বিতানি পাপীযসা সর্বকুষ্ঠলিঙ্গসম্ভবেনানেকবর্ণানি কাকণানীতি বিদ্যাত্| তান্যসাধ্যানি, সাধ্যানি পুনরিতরাণি||৮||
ततोऽनन्तरं कुष्ठान्यभिनिर्वर्तन्ते, तेषामिदं वेदनावर्णसंस्थानप्रभावनामविशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- रूक्षारुणपरुषाणि विषमविसृतानि खरपर्यन्तानि तनून्युद्वृत्तबहिस्तनूनि सुप्तवत्सुप्तानि हृषितलोमाचितानि निस्तोदबहुलान्यल्पकण्डूदाहपूयलसीकान्याशुगतिसमुत्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि च कपालकुष्ठानीति विद्यात्(१); ताम्राणि ताम्रखररोमराजीभिरवनद्धानि बहलानि बहुबहलपूयरक्तलसीकानि कण्डूक्लेदकोथदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि ससन्तापक्रिमीणि पक्वोदुम्बरफलवर्णान्यौदुम्बरकुष्ठानीति विद्यात्(२); स्निग्धानि गुरूण्युत्सेधवन्ति श्लक्ष्णस्थिरपीतपर्यन्तानि शुक्लरक्तावभासानि शुक्लरोमराजीसन्तानानि बहुबहलशुक्लपिच्छिलस्रावीणि बहुक्लेदकण्डूक्रिमीणि सक्तगतिसमुत्थानभेदीनि परिमण्डलानि मण्डलकुष्ठानि विद्यात्(३); परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तःश्यावानि नीलपीतताम्रावभासान्याशुगतिसमुत्थानान्यल्पकण्डूक्लेदक्रिमीणि दाहभेदनिस्तोद(पाक)बहुलानि शूकोपहतोपमवेदनान्युत्सन्नमध्यानि तनुपर्यन्तानि कर्कशपिडकाचितानि दीर्घपरिमण्डलान्यृष्यजिह्वाकृतीनि ऋष्यजिह्वानीति विद्यात् (४); शुक्लरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसिरासन्ततान्युत्सेधवन्ति बहुबहलरक्तपूयलसीकानि कण्डूक्रिमिदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि पुण्डरीकपलाशसङ्काशानि पुण्डरीकाणीति विद्यात् (५); परुषारुणानि विशीर्णबहिस्तनून्यन्तःस्निग्धानि शुक्लरक्तावभासानि बहून्यल्पवेदनान्यल्पकण्डूदाहपूयलसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदक्रिमीण्यलाबुपुष्पसङ्काशानि सिध्मकुष्ठानीति विद्यात् (६); काकणन्तिकावर्णान्यादौ पश्चात्तु सर्वकुष्ठलिङ्गसमन्वितानि पापीयसा सर्वकुष्ठलिङ्गसम्भवेनानेकवर्णानि काकणानीति विद्यात्| तान्यसाध्यानि, साध्यानि पुनरितराणि||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
তত্র যদসাধ্যং তদসাধ্যতাং নাতিবর্ততে, সাধ্যং পুনঃ কিঞ্চিত্ সাধ্যতামতিবর্ততে কদাচিদপচারাত্| সাধ্যানি হি ষট্ কাকণকবর্জ্যান্যচিকিত্স্যমানান্যপচারতো বা দোষৈরভিষ্যন্দমানান্যসাধ্যতামুপযান্তি||৯||
तत्र यदसाध्यं तदसाध्यतां नातिवर्तते, साध्यं पुनः किञ्चित् साध्यतामतिवर्तते कदाचिदपचारात्| साध्यानि हि षट् काकणकवर्ज्यान्यचिकित्स्यमानान्यपचारतो वा दोषैरभिष्यन्दमानान्यसाध्यतामुपयान्ति||९||
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Adhikarana 9 (10-11) · Śloka 11
সাধ্যানামপি হ্যুপেক্ষ্যমাণানাং ত্বঙ্মাংসশোণিতলসীকাকোথক্লেদসংস্বেদজাঃ ক্রিমযোঽভিমূর্চ্ছন্তি; তে ভক্ষযন্তস্ত্বগাদীন্ দোষাঃ পুনর্দূষযন্ত ইমানুপদ্রবান্ পৃথক্ পৃথগুত্পাদযন্তি- তত্র বাতঃ শ্যাবারুণবর্ণং পরুষতামপি চ রৌক্ষ্যশূলশোষতোদবেপথুহর্ষসঙ্কোচাযাসস্তম্ভসুপ্তিভেদভঙ্গান্, পিত্তং দাহস্বেদক্লেদকোথস্রাবপাকরাগান্, শ্লেষ্মা ত্বস্য শ্বৈত্যশৈত্যকণ্ডূস্থৈর্যগৌরবোত্সেধোপস্নেহোপলেপান্, ক্রিমযস্তু ত্বগাদীংশ্চতুরঃ সিরাঃ স্নাযূশ্চাস্থীন্যপি চ তরুণান্যাদদতে ||১০|| অস্যাং চৈবাবস্থাযামুপদ্রবাঃ কুষ্ঠিনং স্পৃশন্তি; তদ্যথা- প্রস্রবণমঙ্গভেদঃ পতনান্যঙ্গাবযবানাং তৃষ্ণাজ্বরাতীসারদাহদৌর্বল্যারোচকাবিপাকাশ্চ, তথাবিধমসাধ্যং বিদ্যাদিতি||১১||
साध्यानामपि ह्युपेक्ष्यमाणानां त्वङ्मांसशोणितलसीकाकोथक्लेदसंस्वेदजाः क्रिमयोऽभिमूर्च्छन्ति; ते भक्षयन्तस्त्वगादीन् दोषाः पुनर्दूषयन्त इमानुपद्रवान् पृथक् पृथगुत्पादयन्ति- तत्र वातः श्यावारुणवर्णं परुषतामपि च रौक्ष्यशूलशोषतोदवेपथुहर्षसङ्कोचायासस्तम्भसुप्तिभेदभङ्गान्, पित्तं दाहस्वेदक्लेदकोथस्रावपाकरागान्, श्लेष्मा त्वस्य श्वैत्यशैत्यकण्डूस्थैर्यगौरवोत्सेधोपस्नेहोपलेपान्, क्रिमयस्तु त्वगादींश्चतुरः सिराः स्नायूश्चास्थीन्यपि च तरुणान्याददते ||१०|| अस्यां चैवावस्थायामुपद्रवाः कुष्ठिनं स्पृशन्ति; तद्यथा- प्रस्रवणमङ्गभेदः पतनान्यङ्गावयवानां तृष्णाज्वरातीसारदाहदौर्बल्यारोचकाविपाकाश्च, तथाविधमसाध्यं विद्यादिति||११||
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Adhikarana 10 (12-16) · Śloka 16
ভবন্তি চাত্র- সাধ্যোঽযমিতি যঃ পূর্বং নরো রোগমুপেক্ষতে| স কিঞ্চিত্কালমাসাদ্য মৃত এবাববুধ্যতে||১২|| যস্তু প্রাগেব রোগেভ্যো রোগেষু তরুণেষু বা| ভেষজং কুরুতে সম্যক্ স চিরং সুখমশ্নুতে||১৩|| যথা হ্যল্পেন যত্নেন ছিদ্যতে তরুণস্তরুঃ| স এবাতিপ্রবৃদ্ধস্তু ছিদ্যতেঽতিপ্রযত্নতঃ||১৪|| এবমেব বিকারোঽপি তরুণঃ সাধ্যতে সুখম্| বিবৃদ্ধঃ সাধ্যতে কৃচ্ছ্রাদসাধ্যো বাঽপি জাযতে||১৫|| তত্র শ্লোকঃ- সঙ্খ্যা দ্রব্যাণি দোষাশ্চ হেতবঃ পূর্বলক্ষণম্| রূপাণ্যুপদ্রবাশ্চোক্তাঃ কুষ্ঠানাং কৌষ্ঠিকে পৃথক্||১৬||
भवन्ति चात्र- साध्योऽयमिति यः पूर्वं नरो रोगमुपेक्षते| स किञ्चित्कालमासाद्य मृत एवावबुध्यते||१२|| यस्तु प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा| भेषजं कुरुते सम्यक् स चिरं सुखमश्नुते||१३|| यथा ह्यल्पेन यत्नेन छिद्यते तरुणस्तरुः| स एवातिप्रवृद्धस्तु छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः||१४|| एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते सुखम्| विवृद्धः साध्यते कृच्छ्रादसाध्यो वाऽपि जायते||१५|| तत्र श्लोकः- सङ्ख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वलक्षणम्| रूपाण्युपद्रवाश्चोक्ताः कुष्ठानां कौष्ठिके पृथक्||१६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 5
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে নিদানস্থানে কুষ্ঠনিদানং নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ||৫||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने कुष्ठनिदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः||५||
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