Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত উন্মাদনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथात उन्मादनिदानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত উন্মাদনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथात उन्मादनिदानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4
ইহ খলু পঞ্চোন্মাদা ভবন্তি; তদ্যথা- বাতপিত্তকফসন্নিপাতাগন্তুনিমিত্তাঃ||৩|| তত্র দোষনিমিত্তাশ্চত্বারঃ পুরুষাণামেবংবিধানাং ক্ষিপ্রমভিনির্বর্তন্তে; তদ্যথা- ভীরূণামুপক্লিষ্টসত্ত্বানামুত্সন্নদোষাণাং সমলবিকৃতোপহিতান্যনুচিতান্যাহারজাতানি বৈষম্যযুক্তেনোপযোগবিধিনোপযুঞ্জানানাং তন্ত্রপ্রযোগমপি বিষমমাচরতামন্যাশ্চ শরীরচেষ্টা বিষমাঃ সমাচরতামত্যুপক্ষীণদেহানাং ব্যাধিবেগসমুদ্ভ্রমিতানামুপহতমনসাং বা কামক্রোধলোভহর্ষভযমোহাযাসশোকচিন্তোদ্বেগাদিভির্ভূযোঽভিঘাতাভ্যাহতানাং বা মনস্যুপহতে বুদ্ধৌ চ প্রচলিতাযামভ্যুদীর্ণা দোষাঃ প্রকুপিতা হৃদযমুপসৃত্য মনোবহানি স্রোতাংস্যাবৃত্য জনযন্ত্যুন্মাদম্||৪||
इह खलु पञ्चोन्मादा भवन्ति; तद्यथा- वातपित्तकफसन्निपातागन्तुनिमित्ताः||३|| तत्र दोषनिमित्ताश्चत्वारः पुरुषाणामेवंविधानां क्षिप्रमभिनिर्वर्तन्ते; तद्यथा- भीरूणामुपक्लिष्टसत्त्वानामुत्सन्नदोषाणां समलविकृतोपहितान्यनुचितान्याहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोपयोगविधिनोपयुञ्जानानां तन्त्रप्रयोगमपि विषममाचरतामन्याश्च शरीरचेष्टा विषमाः समाचरतामत्युपक्षीणदेहानां व्याधिवेगसमुद्भ्रमितानामुपहतमनसां वा कामक्रोधलोभहर्षभयमोहायासशोकचिन्तोद्वेगादिभिर्भूयोऽभिघाताभ्याहतानां वा मनस्युपहते बुद्धौ च प्रचलितायामभ्युदीर्णा दोषाः प्रकुपिता हृदयमुपसृत्य मनोवहानि स्रोतांस्यावृत्य जनयन्त्युन्मादम्||४||
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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5
উন্মাদং পুনর্মনোবুদ্ধিসঞ্জ্ঞাজ্ঞানস্মৃতিভক্তিশীলচেষ্টাচারবিভ্রমং বিদ্যাত্||৫||
उन्मादं पुनर्मनोबुद्धिसञ्ज्ञाज्ञानस्मृतिभक्तिशीलचेष्टाचारविभ्रमं विद्यात्||५||
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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
তস্যেমানি পূর্বরূপাণি; তদ্যথা- শিরসঃ শূন্যতা, চক্ষুষোরাকুলতা, স্বনঃ কর্ণযোঃ, উচ্ছ্বাসস্যাধিক্যম্, আস্যসংস্রবণম্, অনন্নাভিলাষারোচকাবিপাকাঃ, হৃদ্গ্রহঃ, ধ্যানাযাসসম্মোহোদ্বেগাশ্চাস্থানে, সততং লোমহর্ষঃ, জ্বরশ্চাভীক্ষ্ণম্, উন্মত্তচিত্তত্বম্, উদর্দিত্বম্ , অর্দিতাকৃতিকরণং চ ব্যাধেঃ, স্বপ্নে চাভীক্ষ্ণং দর্শনং ভ্রান্তচলিতানবস্থিতানাং রূপাণামপ্রশস্তানাং চ তিলপীডকচক্রাধিরোহণং বাতকুণ্ডলিকাভিশ্চোন্মথনং নিমজ্জনং চ কলুষাণামম্ভসামাবর্তে চক্ষুষোশ্চাপসর্পণমিতি (দোষনিমিত্তানামুন্মাদানাং পূর্বরূপাণি ভবন্তি)||৬||
तस्येमानि पूर्वरूपाणि; तद्यथा- शिरसः शून्यता, चक्षुषोराकुलता, स्वनः कर्णयोः, उच्छ्वासस्याधिक्यम्, आस्यसंस्रवणम्, अनन्नाभिलाषारोचकाविपाकाः, हृद्ग्रहः, ध्यानायाससम्मोहोद्वेगाश्चास्थाने, सततं लोमहर्षः, ज्वरश्चाभीक्ष्णम्, उन्मत्तचित्तत्वम्, उदर्दित्वम् , अर्दिताकृतिकरणं च व्याधेः, स्वप्ने चाभीक्ष्णं दर्शनं भ्रान्तचलितानवस्थितानां रूपाणामप्रशस्तानां च तिलपीडकचक्राधिरोहणं वातकुण्डलिकाभिश्चोन्मथनं निमज्जनं च कलुषाणामम्भसामावर्ते चक्षुषोश्चापसर्पणमिति (दोषनिमित्तानामुन्मादानां पूर्वरूपाणि भवन्ति)||६||
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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
ততোঽনন্তরমেবমুন্মাদাভিনির্বৃত্তিরেব| তত্রেদমুন্মাদবিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- পরিসরণমজস্রম্, অক্ষিভ্রুবৌষ্ঠাংসহন্বগ্রহস্তপাদাঙ্গবিক্ষেপণমকস্মাত্ , সততমনিযতানাং চ গিরামুত্সর্গঃ, ফেনাগমনমাস্যাত্, অভীক্ষ্ণং স্মিতহসিতনৃত্যগীতবাদিত্রসম্প্রযোগাশ্চাস্থানে, বীণাবংশশঙ্খশম্যাতালশব্দানুকরণমসাম্না, যানমযানৈঃ, অলঙ্করণমনলঙ্কারিকৈর্দ্রব্যৈঃ, লোভশ্চাভ্যবহার্যেষ্বলব্ধেষু, লব্ধেষু চাবমানস্তীব্রমাত্সর্যং চ, কার্শ্যং, পারুষ্যম্, উত্পিণ্ডিতারুণাক্ষতা, বাতোপশযবিপর্যাসাদনুপশযতা চ; ইতি বাতোন্মাদলিঙ্গানি ভবন্তি(১); অমর্ষঃ, ক্রোধঃ, সংরম্ভশ্চাস্থানে, শস্ত্রলোষ্ট্রকশাকাষ্ঠমুষ্টিভিরভিহননং স্বেষাং পরেষাং বা, অভিদ্রবণং, প্রচ্ছাযশীতোদকান্নাভিলাষঃ, সন্তাপশ্চাতিবেলং, তাম্রহরিতহারিদ্রসংরব্ধাক্ষতা, পিত্তোপশযবিপর্যাসাদনুপশযতা চ; ইতি পিত্তোন্মাদলিঙ্গানি ভবন্তি(২); স্থানমেকদেশে, তূষ্ণীম্ভাবঃ, অল্পশশ্চঙ্ক্রমণং, লালাশিঙ্ঘাণকস্রবণম্, অনন্নাভিলাষঃ, রহস্কামতা, বীভত্সত্বং, শৌচদ্বেষঃ, স্বপ্ননিত্যতা, শ্বযথুরাননে, শুক্লস্তিমিতমলোপদিগ্ধাক্ষত্বং, শ্লেষ্মোপশযবিপর্যাসাদনুপশযতা চ; ইতি শ্লেষ্মোন্মাদলিঙ্গানি ভবন্তি(৩); ত্রিদোষলিঙ্গসন্নিপাতে তু সান্নিপাতিকং বিদ্যাত্; তমসাধ্যমাচক্ষতে কুশলাঃ||৭||
ततोऽनन्तरमेवमुन्मादाभिनिर्वृत्तिरेव| तत्रेदमुन्मादविशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- परिसरणमजस्रम्, अक्षिभ्रुवौष्ठांसहन्वग्रहस्तपादाङ्गविक्षेपणमकस्मात् , सततमनियतानां च गिरामुत्सर्गः, फेनागमनमास्यात्, अभीक्ष्णं स्मितहसितनृत्यगीतवादित्रसम्प्रयोगाश्चास्थाने, वीणावंशशङ्खशम्यातालशब्दानुकरणमसाम्ना, यानमयानैः, अलङ्करणमनलङ्कारिकैर्द्रव्यैः, लोभश्चाभ्यवहार्येष्वलब्धेषु, लब्धेषु चावमानस्तीव्रमात्सर्यं च, कार्श्यं, पारुष्यम्, उत्पिण्डितारुणाक्षता, वातोपशयविपर्यासादनुपशयता च; इति वातोन्मादलिङ्गानि भवन्ति(१); अमर्षः, क्रोधः, संरम्भश्चास्थाने, शस्त्रलोष्ट्रकशाकाष्ठमुष्टिभिरभिहननं स्वेषां परेषां वा, अभिद्रवणं, प्रच्छायशीतोदकान्नाभिलाषः, सन्तापश्चातिवेलं, ताम्रहरितहारिद्रसंरब्धाक्षता, पित्तोपशयविपर्यासादनुपशयता च; इति पित्तोन्मादलिङ्गानि भवन्ति(२); स्थानमेकदेशे, तूष्णीम्भावः, अल्पशश्चङ्क्रमणं, लालाशिङ्घाणकस्रवणम्, अनन्नाभिलाषः, रहस्कामता, बीभत्सत्वं, शौचद्वेषः, स्वप्ननित्यता, श्वयथुरानने, शुक्लस्तिमितमलोपदिग्धाक्षत्वं, श्लेष्मोपशयविपर्यासादनुपशयता च; इति श्लेष्मोन्मादलिङ्गानि भवन्ति(३); त्रिदोषलिङ्गसन्निपाते तु सान्निपातिकं विद्यात्; तमसाध्यमाचक्षते कुशलाः||७||
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Adhikarana 6 (8-9) · Śloka 9
সাধ্যানাং তু ত্রযাণাং সাধনানি- স্নেহস্বেদবমনবিরেচনাস্থাপনানুবাসনোপশমন নস্তঃকর্মধূমধূপনাঞ্জনাবপীডপ্রধমনাভ্যঙ্গপ্রদেহপরিষেকানুলেপনবধবন্ধনাবরোধন- বিত্রাসনবিস্মাপনবিস্মারণাপতর্পণসিরাব্যধনানি, ভোজনবিধানং চ যথাস্বং যুক্ত্যা, যচ্চান্যদপি কিঞ্চিন্নিদানবিপরীতমৌষধং কার্যং তদপি স্যাদিতি||৮|| ভবতি চাত্র- উন্মাদান্ দোষজান্ সাধ্যান্ সাধযেদ্ভিষগুত্তমঃ| অনেন বিধিযুক্তেন কর্মণা যত্ প্রকীর্তিতম্||৯||
साध्यानां तु त्रयाणां साधनानि- स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनानुवासनोपशमन नस्तःकर्मधूमधूपनाञ्जनावपीडप्रधमनाभ्यङ्गप्रदेहपरिषेकानुलेपनवधबन्धनावरोधन- वित्रासनविस्मापनविस्मारणापतर्पणसिराव्यधनानि, भोजनविधानं च यथास्वं युक्त्या, यच्चान्यदपि किञ्चिन्निदानविपरीतमौषधं कार्यं तदपि स्यादिति||८|| भवति चात्र- उन्मादान् दोषजान् साध्यान् साधयेद्भिषगुत्तमः| अनेन विधियुक्तेन कर्मणा यत् प्रकीर्तितम्||९||
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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
যস্তু দোষনিমিত্তেভ্য উন্মাদেভ্যঃ সমুত্থানপূর্বরূপলিঙ্গবেদনোপশযবিশেষসমন্বিতো ভবত্যুন্মাদস্তমাগন্তুকমাচক্ষতে| কেচিত্ পুনঃ পূর্বকৃতং কর্মাপ্রশস্তমিচ্ছন্তি তস্য নিমিত্তম্| তস্য চ হেতুঃ প্রজ্ঞাপরাধ এবেতি ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেযঃ| প্রজ্ঞাপরাধাদ্ধ্যযং দেবর্ষিপিতৃগন্ধর্বযক্ষরাক্ষসপিশাচগুরুবৃদ্ধসিদ্ধাচার্যপূজ্যানবমত্যাহিতান্যাচরতি, অন্যদ্বা কিঞ্চিদেবংবিধং কর্মাপ্রশস্তমারভতে; তমাত্মনা হতমুপঘ্নন্তো দেবাদযঃ কুর্বন্ত্যুন্মত্তম্||১০||
यस्तु दोषनिमित्तेभ्य उन्मादेभ्यः समुत्थानपूर्वरूपलिङ्गवेदनोपशयविशेषसमन्वितो भवत्युन्मादस्तमागन्तुकमाचक्षते| केचित् पुनः पूर्वकृतं कर्माप्रशस्तमिच्छन्ति तस्य निमित्तम्| तस्य च हेतुः प्रज्ञापराध एवेति भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः| प्रज्ञापराधाद्ध्ययं देवर्षिपितृगन्धर्वयक्षराक्षसपिशाचगुरुवृद्धसिद्धाचार्यपूज्यानवमत्याहितान्याचरति, अन्यद्वा किञ्चिदेवंविधं कर्माप्रशस्तमारभते; तमात्मना हतमुपघ्नन्तो देवादयः कुर्वन्त्युन्मत्तम्||१०||
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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
তত্র দেবাদিপ্রকোপনিমিত্তেনাগন্তুকোন্মাদেন পুরস্কৃতস্যেমানি পূর্বরূপাণি ভবন্তি; তদ্যথা- দেবগোব্রাহ্মণতপস্বিনাং হিংসারুচিত্বং, কোপনত্বং, নৃশংসাভিপ্রাযতা, অরতিঃ, ওজোবর্ণচ্ছাযাবলবপুষামুপতপ্তিঃ, স্বপ্নে চ দেবাদিভিরভিভর্ত্সনং প্রবর্তনং চেতি; ততোঽনন্তরমুন্মাদাভিনির্বৃত্তিঃ||১১||
तत्र देवादिप्रकोपनिमित्तेनागन्तुकोन्मादेन पुरस्कृतस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति; तद्यथा- देवगोब्राह्मणतपस्विनां हिंसारुचित्वं, कोपनत्वं, नृशंसाभिप्रायता, अरतिः, ओजोवर्णच्छायाबलवपुषामुपतप्तिः, स्वप्ने च देवादिभिरभिभर्त्सनं प्रवर्तनं चेति; ततोऽनन्तरमुन्मादाभिनिर्वृत्तिः||११||
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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
তত্রাযমুন্মাদকরাণাং ভূতানামুন্মাদযিষ্যতামারম্ভবিশেষো ভবতি; তদ্যথা- অবলোকযন্তো দেবা জনযন্ত্যুন্মাদং, গুরুবৃদ্ধসিদ্ধমহর্ষযোঽভিশপন্তঃ, পিতরো দর্শযন্তঃ , স্পৃশন্তো গন্ধর্বাঃ, সমাবিশন্তো যক্ষাঃ, রাক্ষসাস্ত্বাত্মগন্ধমাঘ্রাপযন্তঃ, পিশাচাঃ পুনরারুহ্য বাহযন্তঃ||১২||
तत्रायमुन्मादकराणां भूतानामुन्मादयिष्यतामारम्भविशेषो भवति; तद्यथा- अवलोकयन्तो देवा जनयन्त्युन्मादं, गुरुवृद्धसिद्धमहर्षयोऽभिशपन्तः, पितरो दर्शयन्तः , स्पृशन्तो गन्धर्वाः, समाविशन्तो यक्षाः, राक्षसास्त्वात्मगन्धमाघ्रापयन्तः, पिशाचाः पुनरारुह्य वाहयन्तः||१२||
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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13
তস্যেমানি রূপাণি ভবন্তি; তদ্যথা- অত্যাত্মবলবীর্যপৌরুষপরাক্রমগ্রহণধারণস্মরণজ্ঞানবচনবিজ্ঞানানি , অনিযতশ্চোন্মাদকালঃ||১৩||
तस्येमानि रूपाणि भवन्ति; तद्यथा- अत्यात्मबलवीर्यपौरुषपराक्रमग्रहणधारणस्मरणज्ञानवचनविज्ञानानि , अनियतश्चोन्मादकालः||१३||
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Adhikarana 11 (14) · Śloka 14
উন্মাদযিষ্যতামপি খলু দেবর্ষিপিতৃগন্ধর্বযক্ষরাক্ষসপিশাচানাং গুরুবৃদ্ধসিদ্ধানাং বা এষ্বন্তরেষ্বভিগমনীযাঃ পুরুষা ভবন্তি; তদ্যথা- পাপস্য কর্মণঃ সমারম্ভে, পূর্বকৃতস্য বা কর্মণঃ পরিণামকালে, একস্য বা শূন্যগৃহবাসে চতুষ্পথাধিষ্ঠানে বা, সন্ধ্যাবেলাযামপ্রযতভাবে বা পর্বসন্ধিষু বা মিথুনীভাবে, রজস্বলাভিগমনে বা, বিগুণে বাঽধ্যযনবলিমঙ্গলহোমপ্রযোগে, নিযমব্রতব্রহ্মচর্যভঙ্গে বা, মহাহবে বা, দেশকুলপুরবিনাশে বা, মহাগ্রহোপগমনে বা, স্ত্রিযা বা প্রজননকালে, বিবিধভূতাশুভাশুচিস্পর্শনে বা, বমনবিরেচনরুধিরস্রাবে, অশুচেরপ্রযতস্য বা চৈত্যদেবাযতনাভিগমনে বা, মাংসমধুতিলগুডমদ্যোচ্ছিষ্টে বা, দিগ্বাসসি বা, নিশি নগরনিগমচতুষ্পথোপবনশ্মশানাঘাতনাভিগমনে বা, দ্বিজগুরুসুরযতিপূজ্যাভিধর্ষণে বা, ধর্মাখ্যানব্যতিক্রমে বা, অন্যস্য বা কর্মণোঽপ্রশস্তস্যারম্ভে, ইত্যভিঘাতকালা ব্যাখ্যাতা ভবন্তি||১৪||
उन्मादयिष्यतामपि खलु देवर्षिपितृगन्धर्वयक्षराक्षसपिशाचानां गुरुवृद्धसिद्धानां वा एष्वन्तरेष्वभिगमनीयाः पुरुषा भवन्ति; तद्यथा- पापस्य कर्मणः समारम्भे, पूर्वकृतस्य वा कर्मणः परिणामकाले, एकस्य वा शून्यगृहवासे चतुष्पथाधिष्ठाने वा, सन्ध्यावेलायामप्रयतभावे वा पर्वसन्धिषु वा मिथुनीभावे, रजस्वलाभिगमने वा, विगुणे वाऽध्ययनबलिमङ्गलहोमप्रयोगे, नियमव्रतब्रह्मचर्यभङ्गे वा, महाहवे वा, देशकुलपुरविनाशे वा, महाग्रहोपगमने वा, स्त्रिया वा प्रजननकाले, विविधभूताशुभाशुचिस्पर्शने वा, वमनविरेचनरुधिरस्रावे, अशुचेरप्रयतस्य वा चैत्यदेवायतनाभिगमने वा, मांसमधुतिलगुडमद्योच्छिष्टे वा, दिग्वाससि वा, निशि नगरनिगमचतुष्पथोपवनश्मशानाघातनाभिगमने वा, द्विजगुरुसुरयतिपूज्याभिधर्षणे वा, धर्माख्यानव्यतिक्रमे वा, अन्यस्य वा कर्मणोऽप्रशस्तस्यारम्भे, इत्यभिघातकाला व्याख्याता भवन्ति||१४||
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Adhikarana 12 (15) · Śloka 15
ত্রিবিধং তু খলূন্মাদকরাণাং ভূতানামুন্মাদনে প্রযোজনং ভবতি; তদ্যথা- হিংসা, রতিঃ, অভ্যর্চনং চেতি| তেষাং তং প্রযোজনবিশেষমুন্মত্তাচারবিশেষলক্ষণৈর্বিদ্যাত্| তত্র হিংসার্থিনোন্মাদ্যমানোঽগ্নিং প্রবিশতি, অপ্সু নিমজ্জতি, স্থলাচ্ছ্বভ্রে বা পততি, শস্ত্রকশাকাষ্ঠলোষ্টমুষ্টিভির্হন্ত্যাত্মানম্, অন্যচ্চ প্রাণবধার্থমারভতে কিঞ্চিত্, তমসাধ্যং বিদ্যাত্; সাধ্যৌ পুনর্দ্বাবিতরৌ||১৫||
त्रिविधं तु खलून्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनं भवति; तद्यथा- हिंसा, रतिः, अभ्यर्चनं चेति| तेषां तं प्रयोजनविशेषमुन्मत्ताचारविशेषलक्षणैर्विद्यात्| तत्र हिंसार्थिनोन्माद्यमानोऽग्निं प्रविशति, अप्सु निमज्जति, स्थलाच्छ्वभ्रे वा पतति, शस्त्रकशाकाष्ठलोष्टमुष्टिभिर्हन्त्यात्मानम्, अन्यच्च प्राणवधार्थमारभते किञ्चित्, तमसाध्यं विद्यात्; साध्यौ पुनर्द्वावितरौ||१५||
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Adhikarana 13 (16-17) · Śloka 17
তযোঃ সাধনানি- মন্ত্রৌষধিমণিমঙ্গলবল্যুপহারহোমনিযমব্রতপ্রাযশ্চিত্তোপবাস স্বস্ত্যযনপ্রণিপাতগমনাদীনি||১৬|| এবমেতে পঞ্চোন্মাদা ব্যাখ্যাতা ভবন্তি||১৭||
तयोः साधनानि- मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियमव्रतप्रायश्चित्तोपवास स्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादीनि||१६|| एवमेते पञ्चोन्मादा व्याख्याता भवन्ति||१७||
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Adhikarana 14 (18) · Śloka 18
তে তু খলু নিজাগন্তুবিশেষেণ সাধ্যাসাধ্যবিশেষেণ চ প্রবিভজ্যমানাঃ পঞ্চ সন্তো দ্বাবেব ভবতঃ| তৌ চ পরস্পরমনুবধ্নীতঃ কদাচিদ্যথোক্তহেতুসংসর্গাত্| তযোঃ সংসৃষ্টমেব পূর্বরূপং ভবতি, সংসৃষ্টমেব চ লিঙ্গম্| তত্রাসাধ্যসংযোগং সাধ্যাসাধ্যসংযোগং চাসাধ্যং বিদ্যাত্, সাধ্যং তু সাধ্যসংযোগম্| তস্য সাধনং সাধনসংযোগমেব বিদ্যাদিতি||১৮||
ते तु खलु निजागन्तुविशेषेण साध्यासाध्यविशेषेण च प्रविभज्यमानाः पञ्च सन्तो द्वावेव भवतः| तौ च परस्परमनुबध्नीतः कदाचिद्यथोक्तहेतुसंसर्गात्| तयोः संसृष्टमेव पूर्वरूपं भवति, संसृष्टमेव च लिङ्गम्| तत्रासाध्यसंयोगं साध्यासाध्यसंयोगं चासाध्यं विद्यात्, साध्यं तु साध्यसंयोगम्| तस्य साधनं साधनसंयोगमेव विद्यादिति||१८||
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Adhikarana 15 (19-20) · Śloka 20
ভবন্তি চাত্র- নৈব দেবা ন গন্ধর্বা ন পিশাচা ন রাক্ষসাঃ| ন চান্যে স্বযমক্লিষ্টমুপক্লিশ্নন্তি মানবম্||১৯|| যে ত্বেনমনুবর্তন্তে ক্লিশ্যমানং স্বকর্মণা| ন স তদ্ধেতুকঃ ক্লেশো ন হ্যস্তি কৃতকৃত্যতা||২০||
भवन्ति चात्र- नैव देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः| न चान्ये स्वयमक्लिष्टमुपक्लिश्नन्ति मानवम्||१९|| ये त्वेनमनुवर्तन्ते क्लिश्यमानं स्वकर्मणा| न स तद्धेतुकः क्लेशो न ह्यस्ति कृतकृत्यता||२०||
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Adhikarana 16 (21-24) · Śloka 24
প্রজ্ঞাপরাধাত্ সম্ভূতে ব্যাধৌ কর্মজ আত্মনঃ| নাভিশংসেদ্বুধো দেবান্ন পিতৄন্নাপি রাক্ষসান্||২১|| আত্মানমেব মন্যেত কর্তারং সুখদুঃখযোঃ| তস্মাচ্ছ্রেযস্করং মার্গং প্রতিপদ্যেত নো ত্রসেত্||২২|| দেবাদীনামপচিতির্হিতানাং চোপসেবনম্| তে চ তেভ্যো বিরোধশ্চ সর্বমাযত্তমাত্মনি||২৩|| তত্র শ্লোকঃ- সঙ্খ্যা নিমিত্তং প্রাগ্রূপং লক্ষণং সাধ্যতা ন চ| উন্মাদানাং নিদানেঽস্মিন্ ক্রিযাসূত্রং চ ভাষিতম্||২৪||
प्रज्ञापराधात् सम्भूते व्याधौ कर्मज आत्मनः| नाभिशंसेद्बुधो देवान्न पितॄन्नापि राक्षसान्||२१|| आत्मानमेव मन्येत कर्तारं सुखदुःखयोः| तस्माच्छ्रेयस्करं मार्गं प्रतिपद्येत नो त्रसेत्||२२|| देवादीनामपचितिर्हितानां चोपसेवनम्| ते च तेभ्यो विरोधश्च सर्वमायत्तमात्मनि||२३|| तत्र श्लोकः- सङ्ख्या निमित्तं प्राग्रूपं लक्षणं साध्यता न च| उन्मादानां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम्||२४||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 7
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে নিদানস্থানে উন্মাদনিদানং নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ||৭||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने उन्मादनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः||७||
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