Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ সন্তর্পণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः सन्तर्पणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ সন্তর্পণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः सन्तर्पणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-7) · Śloka 7
সন্তর্পযতি যঃ স্নিগ্ধৈর্মধুরৈর্গুরুপিচ্ছিলৈঃ| নবান্নৈর্নবমদ্যৈশ্চ মাংসৈশ্চানূপবারিজৈঃ||৩|| গোরসৈর্গৌডিকৈশ্চান্নৈঃ পৈষ্টিকৈশ্চাতিমাত্রশঃ| চেষ্টাদ্বেষী দিবাস্বপ্নশয্যাসনসুখে রতঃ||৪|| রোগাস্তস্যোপজাযন্তে সন্তর্পণনিমিত্তজাঃ| প্রমেহপিডকাকোঠকণ্ডূপাণ্ড্বামযজ্বরাঃ||৫|| কুষ্ঠান্যামপ্রদোষাশ্চ মূত্রকৃচ্ছ্রমরোচকঃ| তন্দ্রা ক্লৈব্যমতিস্থৌল্যমালস্যং গুরুগাত্রতা||৬|| ইন্দ্রিযস্রোতসাং লেপো বুদ্ধের্মোহঃ প্রমীলকঃ| শোফাশ্চৈবংবিধাশ্চান্যে শীঘ্রমপ্রতিকুর্বতঃ||৭||
सन्तर्पयति यः स्निग्धैर्मधुरैर्गुरुपिच्छिलैः| नवान्नैर्नवमद्यैश्च मांसैश्चानूपवारिजैः||३|| गोरसैर्गौडिकैश्चान्नैः पैष्टिकैश्चातिमात्रशः| चेष्टाद्वेषी दिवास्वप्नशय्यासनसुखे रतः||४|| रोगास्तस्योपजायन्ते सन्तर्पणनिमित्तजाः| प्रमेहपिडकाकोठकण्डूपाण्ड्वामयज्वराः||५|| कुष्ठान्यामप्रदोषाश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकः| तन्द्रा क्लैब्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगात्रता||६|| इन्द्रियस्रोतसां लेपो बुद्धेर्मोहः प्रमीलकः| शोफाश्चैवंविधाश्चान्ये शीघ्रमप्रतिकुर्वतः||७||
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Adhikarana 3 (8-25) · Śloka 26
শস্তমুল্লেখনং তত্র বিরেকো রক্তমোক্ষণম্| ব্যাযামশ্চোপবাসশ্চ ধূমাশ্চ স্বেদনানি চ||৮|| সক্ষৌদ্রশ্চাভযাপ্রাশঃ প্রাযো রূক্ষান্নসেবনম্| চূর্ণপ্রদেহা যে চোক্তাঃ কণ্ডূকোঠবিনাশনাঃ||৯|| ত্রিফলারগ্বধং পাঠাং সপ্তপর্ণং সবত্সকম্| মুস্তং সমদনং নিম্বং জলেনোত্ক্বথিতং পিবেত্||১০|| তেন মেহাদযো যান্তি নাশমভ্যস্যতো ধ্রুবম্| মাত্রাকালপ্রযুক্তেন সন্তর্পণসমুত্থিতাঃ||১১|| মুস্তমারগ্বধঃ পাঠা ত্রিফলা দেবদারু চ| শ্বদংষ্ট্রা খদিরো নিম্বো হরিদ্রে ত্বক্চ বত্সকাত্||১২|| রসমেষাং যথাদোষং প্রাতঃ প্রাতঃ পিবন্নরঃ| সন্তর্পণকৃতৈঃ সর্বৈর্ব্যাধিভিঃ সম্প্রমুচ্যতে||১৩|| এভিশ্চোদ্বর্তনোদ্ধর্ষস্নানযোগোপযোজিতৈঃ| ত্বগ্দোষাঃ প্রশমং যান্তি তথা স্নেহোপসংহিতৈঃ||১৪|| কুষ্ঠং গোমেদকো হিঙ্গু ক্রৌঞ্চাস্থি ত্র্যূষণং বচা| বৃষকৈলে শ্বদংষ্ট্রা চ খরাহ্বা চাশ্মভেদকঃ||১৫|| তক্রেণ দধিমণ্ডেন বদরাম্লরসেন বা| মূত্রকৃচ্ছ্রং প্রমেহং চ পীতমেতদ্ব্যপোহতি||১৬|| তক্রাভযাপ্রযোগৈশ্চ ত্রিফলাযাস্তথৈব চ| অরিষ্টানাং প্রযোগৈশ্চ যান্তি মেহাদযঃ শমম্||১৭|| ত্র্যূষণং ত্রিফলা ক্ষৌদ্রং ক্রিমিঘ্নমজমোদকঃ| মন্থোঽযং সক্তবস্তৈলং হিতো লোহোদকাপ্লুতঃ||১৮|| ব্যোষং বিডঙ্গং শিগ্রূণি ত্রিফলাং কটুরোহিণীম্| বৃহত্যৌ দ্বে হরিদ্রে দ্বে পাঠামতিবিষাং স্থিরাম্||১৯|| হিঙ্গু কেবুকমূলানি যবানীধান্যচিত্রকান্| সৌবর্চলমজাজীং চ হপুষাং চেতি চূর্ণযেত্||২০|| চূর্ণতৈলঘৃতক্ষৌদ্রভাগাঃ স্যুর্মানতঃ সমাঃ| সক্তূনাং ষোডশগুণো ভাগঃ সন্তর্পণং পিবেত্||২১|| প্রযোগাদস্য শাম্যন্তি রোগাঃ সন্তর্পণোত্থিতাঃ| প্রমেহা মূঢবাতাশ্চ কুষ্ঠান্যর্শাংসি কামলাঃ||২২|| প্লীহা পাণ্ড্বামযঃ শোফো মূত্রকৃচ্ছ্রমরোচকঃ| হৃদ্রোগো রাজযক্ষ্মা চ কাসঃ শ্বাসো গলগ্রহঃ||২৩|| ক্রিমযো গ্রহণীদোষাঃ শ্বৈত্র্যং স্থৌল্যমতীব চ| নরাণাং দীপ্যতে চাগ্নিঃ স্মৃতির্বুদ্ধিশ্চ বর্ধতে||২৪|| ব্যাযামনিত্যো জীর্ণাশী যবগোধূমভোজনঃ| সন্তর্পণকৃতৈর্দোষৈঃ স্থৌল্যং মুক্ত্বা বিমুচ্যতে||২৫|| উক্তং সন্তর্পণোত্থানামপতর্পণমৌষধম্|২৬|
शस्तमुल्लेखनं तत्र विरेको रक्तमोक्षणम्| व्यायामश्चोपवासश्च धूमाश्च स्वेदनानि च||८|| सक्षौद्रश्चाभयाप्राशः प्रायो रूक्षान्नसेवनम्| चूर्णप्रदेहा ये चोक्ताः कण्डूकोठविनाशनाः||९|| त्रिफलारग्वधं पाठां सप्तपर्णं सवत्सकम्| मुस्तं समदनं निम्बं जलेनोत्क्वथितं पिबेत्||१०|| तेन मेहादयो यान्ति नाशमभ्यस्यतो ध्रुवम्| मात्राकालप्रयुक्तेन सन्तर्पणसमुत्थिताः||११|| मुस्तमारग्वधः पाठा त्रिफला देवदारु च| श्वदंष्ट्रा खदिरो निम्बो हरिद्रे त्वक्च वत्सकात्||१२|| रसमेषां यथादोषं प्रातः प्रातः पिबन्नरः| सन्तर्पणकृतैः सर्वैर्व्याधिभिः सम्प्रमुच्यते||१३|| एभिश्चोद्वर्तनोद्धर्षस्नानयोगोपयोजितैः| त्वग्दोषाः प्रशमं यान्ति तथा स्नेहोपसंहितैः||१४|| कुष्ठं गोमेदको हिङ्गु क्रौञ्चास्थि त्र्यूषणं वचा| वृषकैले श्वदंष्ट्रा च खराह्वा चाश्मभेदकः||१५|| तक्रेण दधिमण्डेन बदराम्लरसेन वा| मूत्रकृच्छ्रं प्रमेहं च पीतमेतद्व्यपोहति||१६|| तक्राभयाप्रयोगैश्च त्रिफलायास्तथैव च| अरिष्टानां प्रयोगैश्च यान्ति मेहादयः शमम्||१७|| त्र्यूषणं त्रिफला क्षौद्रं क्रिमिघ्नमजमोदकः| मन्थोऽयं सक्तवस्तैलं हितो लोहोदकाप्लुतः||१८|| व्योषं विडङ्गं शिग्रूणि त्रिफलां कटुरोहिणीम्| बृहत्यौ द्वे हरिद्रे द्वे पाठामतिविषां स्थिराम्||१९|| हिङ्गु केबुकमूलानि यवानीधान्यचित्रकान्| सौवर्चलमजाजीं च हपुषां चेति चूर्णयेत्||२०|| चूर्णतैलघृतक्षौद्रभागाः स्युर्मानतः समाः| सक्तूनां षोडशगुणो भागः सन्तर्पणं पिबेत्||२१|| प्रयोगादस्य शाम्यन्ति रोगाः सन्तर्पणोत्थिताः| प्रमेहा मूढवाताश्च कुष्ठान्यर्शांसि कामलाः||२२|| प्लीहा पाण्ड्वामयः शोफो मूत्रकृच्छ्रमरोचकः| हृद्रोगो राजयक्ष्मा च कासः श्वासो गलग्रहः||२३|| क्रिमयो ग्रहणीदोषाः श्वैत्र्यं स्थौल्यमतीव च| नराणां दीप्यते चाग्निः स्मृतिर्बुद्धिश्च वर्धते||२४|| व्यायामनित्यो जीर्णाशी यवगोधूमभोजनः| सन्तर्पणकृतैर्दोषैः स्थौल्यं मुक्त्वा विमुच्यते||२५|| उक्तं सन्तर्पणोत्थानामपतर्पणमौषधम्|२६|
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Adhikarana 4 (26-30) · Śloka 30
বক্ষ্যন্তে সৌষধাশ্চোর্ধ্বমপতর্পণজা গদাঃ||২৬|| দেহাগ্নিবলবর্ণৌজঃশুক্রমাংসপরিক্ষযঃ| জ্বরঃ কাসানুবন্ধশ্চ পার্শ্বশূলমরোচকঃ||২৭|| শ্রোত্রদৌর্বল্যমুন্মাদঃ প্রলাপো হৃদযব্যথা| বিণ্মূত্রসঙ্গ্রহঃ শূলং জঙ্ঘোরুত্রিকসংশ্রযম্||২৮|| পর্বাস্থিসন্ধিভেদশ্চ যে চান্যে বাতজা গদাঃ| ঊর্ধ্ববাতাদযঃ সর্বে জাযন্তে তেঽপতর্পণাত্||২৯|| তেষাং সন্তর্পণং তজ্জ্ঞৈঃ পুনরাখ্যাতমৌষধম্| যত্তদাত্বে সমর্থং স্যাদভ্যাসে বা তদিষ্যতে ||৩০||
वक्ष्यन्ते सौषधाश्चोर्ध्वमपतर्पणजा गदाः||२६|| देहाग्निबलवर्णौजःशुक्रमांसपरिक्षयः| ज्वरः कासानुबन्धश्च पार्श्वशूलमरोचकः||२७|| श्रोत्रदौर्बल्यमुन्मादः प्रलापो हृदयव्यथा| विण्मूत्रसङ्ग्रहः शूलं जङ्घोरुत्रिकसंश्रयम्||२८|| पर्वास्थिसन्धिभेदश्च ये चान्ये वातजा गदाः| ऊर्ध्ववातादयः सर्वे जायन्ते तेऽपतर्पणात्||२९|| तेषां सन्तर्पणं तज्ज्ञैः पुनराख्यातमौषधम्| यत्तदात्वे समर्थं स्यादभ्यासे वा तदिष्यते ||३०||
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Adhikarana 5 (31-38) · Śloka 38
সদ্যঃক্ষীণো হি সদ্যো বৈ তর্পণেনোপচীযতে| নর্তে সন্তর্পণাভ্যাসাচ্চিরক্ষীণস্তু পুষ্যতি||৩১|| দেহাগ্নিদোষভৈষজ্যমাত্রাকালানুবর্তিনা| কার্যমত্বরমাণেন ভেষজং চিরদুর্বলে||৩২|| হিতা মাংসরসাস্তস্মৈ পযাংসি চ ঘৃতানি চ| স্নানানি বস্তযোঽভ্যঙ্গাস্তর্পণাস্তর্পণাশ্চ যে||৩৩|| জ্বরকাসপ্রসক্তানাং কৃশানাং মূত্রকৃচ্ছ্রিণাম্| তৃষ্যতামূর্ধ্ববাতানাং বক্ষ্যন্তে তর্পণা হিতাঃ||৩৪|| শর্করাপিপ্পলীতৈলঘৃতক্ষৌদ্রৈঃ সমাংশকৈঃ| সক্তুদ্বিগুণিতো বৃষ্যস্তেষাং মন্থঃ প্রশস্যতে||৩৫|| সক্তবো মদিরা ক্ষৌদ্রং শর্করা চেতি তর্পণম্| পিবেন্মারুতবিণ্মূত্রকফপিত্তানুলোমনম্||৩৬|| ফাণিতং সক্তবঃ সর্পির্দধিমণ্ডোঽম্লকাঞ্জিকম্| তর্পণং মূত্রকৃচ্ছ্রঘ্নমুদাবর্তহরং পিবেত্||৩৭|| মন্থঃ খর্জূরমৃদ্বীকাবৃক্ষাম্লাম্লীকদাডিমৈঃ| পরূষকৈঃ সামলকৈর্যুক্তো মদ্যবিকারনুত্||৩৮||
सद्यःक्षीणो हि सद्यो वै तर्पणेनोपचीयते| नर्ते सन्तर्पणाभ्यासाच्चिरक्षीणस्तु पुष्यति||३१|| देहाग्निदोषभैषज्यमात्राकालानुवर्तिना| कार्यमत्वरमाणेन भेषजं चिरदुर्बले||३२|| हिता मांसरसास्तस्मै पयांसि च घृतानि च| स्नानानि बस्तयोऽभ्यङ्गास्तर्पणास्तर्पणाश्च ये||३३|| ज्वरकासप्रसक्तानां कृशानां मूत्रकृच्छ्रिणाम्| तृष्यतामूर्ध्ववातानां वक्ष्यन्ते तर्पणा हिताः||३४|| शर्करापिप्पलीतैलघृतक्षौद्रैः समांशकैः| सक्तुद्विगुणितो वृष्यस्तेषां मन्थः प्रशस्यते||३५|| सक्तवो मदिरा क्षौद्रं शर्करा चेति तर्पणम्| पिबेन्मारुतविण्मूत्रकफपित्तानुलोमनम्||३६|| फाणितं सक्तवः सर्पिर्दधिमण्डोऽम्लकाञ्जिकम्| तर्पणं मूत्रकृच्छ्रघ्नमुदावर्तहरं पिबेत्||३७|| मन्थः खर्जूरमृद्वीकावृक्षाम्लाम्लीकदाडिमैः| परूषकैः सामलकैर्युक्तो मद्यविकारनुत्||३८||
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Adhikarana 6 (39) · Śloka 39
স্বাদুরম্লো জলকৃতঃ সস্নেহো রূক্ষ এব বা| সদ্যঃ সন্তর্পণো মন্থঃ স্থৈর্যবর্ণবলপ্রদঃ||৩৯||
स्वादुरम्लो जलकृतः सस्नेहो रूक्ष एव वा| सद्यः सन्तर्पणो मन्थः स्थैर्यवर्णबलप्रदः||३९||
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Adhikarana 7 (40) · Śloka 40
তত্র শ্লোকঃ- সন্তর্পণোত্থা যে রোগা রোগা যে চাপতর্পণাত্| সন্তর্পণীযে তেঽধ্যাযে সৌষধাঃ পরিকীর্তিতাঃ||৪০||
तत्र श्लोकः- सन्तर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात्| सन्तर्पणीये तेऽध्याये सौषधाः परिकीर्तिताः||४०||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 23
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে সন্তর্পণীযো নাম ত্রযোবিংশোঽধ্যাযঃ||২৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने सन्तर्पणीयो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः||२३||
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