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24. vidhiśōṇitīyō'dhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো বিধিশোণিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातो विधिशोणितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

বিধিনা শোণিতং জাতং শুদ্ধং ভবতি দেহিনাম্| দেশকালৌকসাত্ম্যানাং বিধির্যঃ সম্প্রকাশিতঃ||৩||

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विधिना शोणितं जातं शुद्धं भवति देहिनाम्| देशकालौकसात्म्यानां विधिर्यः सम्प्रकाशितः||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তদ্বিশুদ্ধং হি রুধিরং বলবর্ণসুখাযুষা| যুনক্তি প্রাণিনং প্রাণঃ শোণিতং হ্যনুবর্ততে||৪||

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तद्विशुद्धं हि रुधिरं बलवर्णसुखायुषा| युनक्ति प्राणिनं प्राणः शोणितं ह्यनुवर्तते||४||

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Adhikarana 4 (5-10) · Śloka 10

প্রদুষ্টবহুতীক্ষ্ণোষ্ণৈর্মদ্যৈরন্যৈশ্চ তদ্বিধৈঃ| তথাঽতিলবণক্ষারৈরম্লৈঃ কটুভিরেব চ||৫|| কুলত্থমাষনিষ্পাবতিলতৈলনিষেবণৈঃ| পিণ্ডালুমূলকাদীনাং হরিতানাং চ সর্বশঃ||৬|| জলজানূপবৈলানাং প্রসহানাং চ সেবনাত্| দধ্যম্লমস্তুসুক্তানাং সুরাসৌবীরকস্য চ||৭|| বিরুদ্ধানামুপক্লিন্নপূতীনাং ভক্ষণেন চ| ভুক্ত্বা দিবা প্রস্বপতাং দ্রবস্নিগ্ধগুরূণি চ||৮|| অত্যাদানং তথা ক্রোধং ভজতাং চাতপানলৌ| ছর্দিবেগপ্রতীঘাতাত্ কালে চানবসেচনাত্||৯|| শ্রমাভিঘাতসন্তাপৈরজীর্ণাধ্যশনৈস্তথা| শরত্কালস্বভাবাচ্চ শোণিতং সম্প্রদুষ্যতি||১০||

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प्रदुष्टबहुतीक्ष्णोष्णैर्मद्यैरन्यैश्च तद्विधैः| तथाऽतिलवणक्षारैरम्लैः कटुभिरेव च||५|| कुलत्थमाषनिष्पावतिलतैलनिषेवणैः| पिण्डालुमूलकादीनां हरितानां च सर्वशः||६|| जलजानूपबैलानां प्रसहानां च सेवनात्| दध्यम्लमस्तुसुक्तानां सुरासौवीरकस्य च||७|| विरुद्धानामुपक्लिन्नपूतीनां भक्षणेन च| भुक्त्वा दिवा प्रस्वपतां द्रवस्निग्धगुरूणि च||८|| अत्यादानं तथा क्रोधं भजतां चातपानलौ| छर्दिवेगप्रतीघातात् काले चानवसेचनात्||९|| श्रमाभिघातसन्तापैरजीर्णाध्यशनैस्तथा| शरत्कालस्वभावाच्च शोणितं सम्प्रदुष्यति||१०||

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Adhikarana 5 (11-17) · Śloka 17

ততঃ শোণিতজা রোগাঃ প্রজাযন্তে পৃথগ্বিধাঃ| মুখপাকোঽক্ষিরাগশ্চ পূতিঘ্রাণাস্যগন্ধিতা||১১|| গুল্মোপকুশবীসর্পরক্তপিত্তপ্রমীলকাঃ| বিদ্রধী রক্তমেহশ্চ প্রদরো বাতশোণিতম্||১২|| বৈবর্ণ্যমগ্নিসাদশ্চ পিপাসা গুরুগাত্রতা| সন্তাপশ্চাতিদৌর্বল্যমরুচিঃ শিরসশ্চ রুক্||১৩|| বিদাহশ্চান্নপানস্য তিক্তাম্লোদ্গিরণং ক্লমঃ| ক্রোধপ্রচুরতা বুদ্ধেঃ সম্মোহো লবণাস্যতা||১৪|| স্বেদঃ শরীরদৌর্গন্ধ্যং মদঃ কম্পঃ স্বরক্ষযঃ| তন্দ্রানিদ্রাতিযোগশ্চ তমসশ্চাতিদর্শনম্||১৫|| কণ্ড্বরুঃকোঠপিডকাকুষ্ঠচর্মদলাদযঃ| বিকারাঃ সর্ব এবৈতে বিজ্ঞেযাঃ শোণিতাশ্রযাঃ||১৬|| শীতোষ্ণস্নিগ্ধরূক্ষাদ্যৈরুপক্রান্তাশ্চ যে গদাঃ| সম্যক্ সাধ্যা ন সিধ্যন্তি রক্তজাংস্তান্ বিভাবযেত্||১৭||

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ततः शोणितजा रोगाः प्रजायन्ते पृथग्विधाः| मुखपाकोऽक्षिरागश्च पूतिघ्राणास्यगन्धिता||११|| गुल्मोपकुशवीसर्परक्तपित्तप्रमीलकाः| विद्रधी रक्तमेहश्च प्रदरो वातशोणितम्||१२|| वैवर्ण्यमग्निसादश्च पिपासा गुरुगात्रता| सन्तापश्चातिदौर्बल्यमरुचिः शिरसश्च रुक्||१३|| विदाहश्चान्नपानस्य तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः| क्रोधप्रचुरता बुद्धेः सम्मोहो लवणास्यता||१४|| स्वेदः शरीरदौर्गन्ध्यं मदः कम्पः स्वरक्षयः| तन्द्रानिद्रातियोगश्च तमसश्चातिदर्शनम्||१५|| कण्ड्वरुःकोठपिडकाकुष्ठचर्मदलादयः| विकाराः सर्व एवैते विज्ञेयाः शोणिताश्रयाः||१६|| शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैरुपक्रान्ताश्च ये गदाः| सम्यक् साध्या न सिध्यन्ति रक्तजांस्तान् विभावयेत्||१७||

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Adhikarana 6 (18) · Śloka 18

কুর্যাচ্ছোণিতরোগেষু রক্তপিত্তহরীং ক্রিযাম্| বিরেকমুপবাসং চ স্রাবণং শোণিতস্য চ||১৮||

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कुर्याच्छोणितरोगेषु रक्तपित्तहरीं क्रियाम्| विरेकमुपवासं च स्रावणं शोणितस्य च||१८||

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Adhikarana 7 (19) · Śloka 19

বলদোষপ্রমাণাদ্বা বিশুদ্ধ্যা রুধিরস্য বা| রুধিরং স্রাবযেজ্জন্তোরাশযং প্রসমীক্ষ্য বা||১৯||

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बलदोषप्रमाणाद्वा विशुद्ध्या रुधिरस्य वा| रुधिरं स्रावयेज्जन्तोराशयं प्रसमीक्ष्य वा||१९||

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Adhikarana 8 (20-21) · Śloka 21

অরুণাভং ভবেদ্বাতাদ্বিশদং ফেনিলং তনু| পিত্তাত্ পীতাসিতং রক্তং স্ত্যাযত্যৌষ্ণ্যাচ্চিরেণ চ||২০|| ঈষত্পাণ্ডু কফাদ্দুষ্টং পিচ্ছিলং তন্তুমদ্ঘনম্| সংসৃষ্টলিঙ্গং সংসর্গাত্ত্রিলিঙ্গং সান্নিপাতিকম্||২১||

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अरुणाभं भवेद्वाताद्विशदं फेनिलं तनु| पित्तात् पीतासितं रक्तं स्त्यायत्यौष्ण्याच्चिरेण च||२०|| ईषत्पाण्डु कफाद्दुष्टं पिच्छिलं तन्तुमद्घनम्| संसृष्टलिङ्गं संसर्गात्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम्||२१||

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Adhikarana 9 (22) · Śloka 22

তপনীযেন্দ্রগোপাভং পদ্মালক্তকসন্নিভম্| গুঞ্জাফলসবর্ণং চ বিশুদ্ধং বিদ্ধি শোণিতম্||২২||

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तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तकसन्निभम्| गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम्||२२||

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Adhikarana 10 (23) · Śloka 23

নাত্যুষ্ণশীতং লঘু দীপনীযং রক্তেঽপনীতে হিতমন্নপানম্| তদা শরীরং হ্যনবস্থিতাসৃগগ্নির্বিশেষেণ চ রক্ষিতব্যঃ||২৩||

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नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमन्नपानम्| तदा शरीरं ह्यनवस्थितासृगग्निर्विशेषेण च रक्षितव्यः||२३||

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Adhikarana 11 (24) · Śloka 24

প্রসন্নবর্ণেন্দ্রিযমিন্দ্রিযার্থানিচ্ছন্তমব্যাহতপক্তৃবেগম্| সুখান্বিতং তু(পু)ষ্টিবলোপপন্নং বিশুদ্ধরক্তং পুরুষং বদন্তি||২৪||

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प्रसन्नवर्णेन्द्रियमिन्द्रियार्थानिच्छन्तमव्याहतपक्तृवेगम्| सुखान्वितं तु(पु)ष्टिबलोपपन्नं विशुद्धरक्तं पुरुषं वदन्ति||२४||

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Adhikarana 12 (25-29) · Śloka 29

যদা তু রক্তবাহীনি রসসঞ্জ্ঞাবহানি চ| পৃথক্ পৃথক্ সমস্তা বা স্রোতাংসি কুপিতা মলাঃ||২৫|| মলিনাহারশীলস্য রজোমোহাবৃতাত্মনঃ| প্রতিহত্যাবতিষ্ঠন্তে জাযন্তে ব্যাধযস্তদা||২৬|| মদমূর্চ্ছাযসন্ন্যাসাস্তেষাং বিদ্যাদ্বিচক্ষণঃ| যথোত্তরং বলাধিক্যং হেতুলিঙ্গোপশান্তিষু||২৭|| দুর্বলং চেতসঃ স্থানং যদা বাযুঃ প্রপদ্যতে| মনো বিক্ষোভযঞ্জন্তোঃ সঞ্জ্ঞাং সম্মোহযেত্তদা||২৮|| পিত্তমেবং কফশ্চৈবং মনো বিক্ষোভযন্নৃণাম্| সঞ্জ্ঞাং নযত্যাকুলতাং বিশেষশ্চাত্র বক্ষ্যতে||২৯||

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यदा तु रक्तवाहीनि रससञ्ज्ञावहानि च| पृथक् पृथक् समस्ता वा स्रोतांसि कुपिता मलाः||२५|| मलिनाहारशीलस्य रजोमोहावृतात्मनः| प्रतिहत्यावतिष्ठन्ते जायन्ते व्याधयस्तदा||२६|| मदमूर्च्छायसन्न्यासास्तेषां विद्याद्विचक्षणः| यथोत्तरं बलाधिक्यं हेतुलिङ्गोपशान्तिषु||२७|| दुर्बलं चेतसः स्थानं यदा वायुः प्रपद्यते| मनो विक्षोभयञ्जन्तोः सञ्ज्ञां सम्मोहयेत्तदा||२८|| पित्तमेवं कफश्चैवं मनो विक्षोभयन्नृणाम्| सञ्ज्ञां नयत्याकुलतां विशेषश्चात्र वक्ष्यते||२९||

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Adhikarana 13 (30-32) · Śloka 33

সক্তানল্পদ্রুতাভাষং চলস্খলিতচেষ্টিতম্ | বিদ্যাদ্বাতমদাবিষ্টং রূক্ষশ্যাবারুণাকৃতিম্||৩০|| সক্রোধপরুষাভাষং সম্প্রহারকলিপ্রিযম্| বিদ্যাত্ পিত্তমদাবিষ্টং রক্তপীতাসিতাকৃতিম্||৩১|| স্বল্পাসম্বদ্ধবচনং তন্দ্রালস্যসমন্বিতম্| বিদ্যাত্ কফমদাবিষ্টং পাণ্ডুং প্রধ্যানতত্পরম্||৩২|| সর্বাণ্যেতানি রূপাণি সন্নিপাতকৃতে মদে|৩৩|

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सक्तानल्पद्रुताभाषं चलस्खलितचेष्टितम् | विद्याद्वातमदाविष्टं रूक्षश्यावारुणाकृतिम्||३०|| सक्रोधपरुषाभाषं सम्प्रहारकलिप्रियम्| विद्यात् पित्तमदाविष्टं रक्तपीतासिताकृतिम्||३१|| स्वल्पासम्बद्धवचनं तन्द्रालस्यसमन्वितम्| विद्यात् कफमदाविष्टं पाण्डुं प्रध्यानतत्परम्||३२|| सर्वाण्येतानि रूपाणि सन्निपातकृते मदे|३३|

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Adhikarana 14 (33) · Śloka 33

জাযতে শাম্যতি ক্ষিপ্রং মদো মদ্যমদাকৃতিঃ||৩৩||

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जायते शाम्यति क्षिप्रं मदो मद्यमदाकृतिः||३३||

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Adhikarana 15 (34) · Śloka 34

যশ্চ মদ্যকৃতঃ প্রোক্তো বিষজো রৌধিরশ্চ যঃ| সর্ব এতে মদা নর্তে বাতপিত্তকফত্রযাত্||৩৪||

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यश्च मद्यकृतः प्रोक्तो विषजो रौधिरश्च यः| सर्व एते मदा नर्ते वातपित्तकफत्रयात्||३४||

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Adhikarana 16 (35-41) · Śloka 41

নীলং বা যদি বা কৃষ্ণমাকাশমথবাঽরুণম্| পশ্যংস্তমঃ প্রবিশতি শীঘ্রং চ প্রতিবুধ্যতে ||৩৫|| বেপথুশ্চাঙ্গমর্দশ্চ প্রপীডা হৃদযস্য চ| কার্শ্যং শ্যাবারুণা চ্ছাযামূর্চ্ছাযে বাতসম্ভবে||৩৬|| রক্তং হরিতবর্ণং বা বিযত্ পীতমথাপি বা| পশ্যংস্তমঃ প্রবিশতি সস্বেদঃ প্রতিবুধ্যতে||৩৭|| সপিপাসঃ সসন্তাপো রক্তপীতাকুলেক্ষণঃ| সম্ভিন্নবর্চাঃ পীতাভো মূর্চ্ছাযে পিত্তসম্ভবে||৩৮|| মেঘসঙ্কাশমাকাশমাবৃতং বা তমোঘনৈঃ| পশ্যংস্তমঃ প্রবিশতি চিরাচ্চ প্রতিবুধ্যতে||৩৯|| গুরুভিঃ প্রাবৃতৈরঙ্গৈর্যথৈবার্দ্রেণ চর্মণা| সপ্রসেকঃ সহৃল্লাসো মূর্চ্ছাযে কফসম্ভবে||৪০|| সর্বাকৃতিঃ সন্নিপাতাদপস্মার ইবাগতঃ| স জন্তুং পাতযত্যাশু বিনা বীভত্সচেষ্টিতৈঃ||৪১||

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नीलं वा यदि वा कृष्णमाकाशमथवाऽरुणम्| पश्यंस्तमः प्रविशति शीघ्रं च प्रतिबुध्यते ||३५|| वेपथुश्चाङ्गमर्दश्च प्रपीडा हृदयस्य च| कार्श्यं श्यावारुणा च्छायामूर्च्छाये वातसम्भवे||३६|| रक्तं हरितवर्णं वा वियत् पीतमथापि वा| पश्यंस्तमः प्रविशति सस्वेदः प्रतिबुध्यते||३७|| सपिपासः ससन्तापो रक्तपीताकुलेक्षणः| सम्भिन्नवर्चाः पीताभो मूर्च्छाये पित्तसम्भवे||३८|| मेघसङ्काशमाकाशमावृतं वा तमोघनैः| पश्यंस्तमः प्रविशति चिराच्च प्रतिबुध्यते||३९|| गुरुभिः प्रावृतैरङ्गैर्यथैवार्द्रेण चर्मणा| सप्रसेकः सहृल्लासो मूर्च्छाये कफसम्भवे||४०|| सर्वाकृतिः सन्निपातादपस्मार इवागतः| स जन्तुं पातयत्याशु विना बीभत्सचेष्टितैः||४१||

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Adhikarana 17 (42-53) · Śloka 53

দোষেষু মদমূর্চ্ছাযাঃ কৃতবেগেষু দেহিনাম্| স্বযমেবোপশাম্যন্তি সন্ন্যাসো নৌষধৈর্বিনা||৪২|| বাগ্দেহমনসাং চেষ্টামাক্ষিপ্যাতিবলা মলাঃ| সন্ন্যস্যন্ত্যবলং জন্তুং প্রাণাযতনসংশ্রিতাঃ||৪৩|| স না সন্ন্যাসসন্ন্যস্তঃ কাষ্ঠীভূতো মৃতোপমঃ| প্রাণৈর্বিযুজ্যতে শীঘ্রং মুক্ত্বা সদ্যঃফলাঃ ক্রিযাঃ||৪৪|| দুর্গেঽম্ভসি যথা মজ্জদ্ভাজনং ত্বরযা বুধঃ| গৃহ্ণীযাত্তলমপ্রাপ্তং তথা সন্ন্যাসপীডিতম্||৪৫|| অঞ্জনান্যবপীডাশ্চ ধূমাঃ প্রধমনানি চ| সূচীভিস্তোদনং শস্তং দাহঃ পীডা নখান্তরে||৪৬|| লুঞ্চনং কেশলোম্নাং চ দন্তৈর্দশনমেব চ| আত্মগুপ্তাবঘর্ষশ্চ হিতং তস্যাববোধনে||৪৭|| সম্মূর্চ্ছিতানি তীক্ষ্ণানি মদ্যানি বিবিধানি চ| প্রভূতকটুযুক্তানি তস্যাস্যে গালযেন্মুহুঃ||৪৮|| মাতুলুঙ্গরসং তদ্বন্মহৌষধসমাযুতম্| তদ্বত্সৌবর্চলং দদ্যাদ্যুক্তং মদ্যাম্লকাঞ্জিকৈঃ||৪৯|| হিঙ্গূষণসমাযুক্তং যাবত্ সঞ্জ্ঞাপ্রবোধনম্| প্রবুদ্ধসঞ্জ্ঞমন্নৈশ্চ লঘুভিস্তমুপাচরেত্||৫০|| বিস্মাপনৈঃ স্মারণৈশ্চ প্রিযশ্রুতিভিরেব চ| পটুভির্গীতবাদিত্রশব্দৈশ্চিত্রৈশ্চ দর্শনৈঃ||৫১|| স্রংসনোল্লেখনৈর্ধূমৈরঞ্জনৈঃ কবলগ্রহৈঃ| শোণিতস্যাবসেকৈশ্চ ব্যাযামোদ্ঘর্ষণৈস্তথা||৫২|| প্রবুদ্ধসঞ্জ্ঞং মতিমাননুবন্ধমুপক্রমেত্| তস্য সংরক্ষিতব্যং হি মনঃ প্রলযহেতুতঃ||৫৩||

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दोषेषु मदमूर्च्छायाः कृतवेगेषु देहिनाम्| स्वयमेवोपशाम्यन्ति सन्न्यासो नौषधैर्विना||४२|| वाग्देहमनसां चेष्टामाक्षिप्यातिबला मलाः| सन्न्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनसंश्रिताः||४३|| स ना सन्न्याससन्न्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः| प्राणैर्वियुज्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलाः क्रियाः||४४|| दुर्गेऽम्भसि यथा मज्जद्भाजनं त्वरया बुधः| गृह्णीयात्तलमप्राप्तं तथा सन्न्यासपीडितम्||४५|| अञ्जनान्यवपीडाश्च धूमाः प्रधमनानि च| सूचीभिस्तोदनं शस्तं दाहः पीडा नखान्तरे||४६|| लुञ्चनं केशलोम्नां च दन्तैर्दशनमेव च| आत्मगुप्तावघर्षश्च हितं तस्यावबोधने||४७|| सम्मूर्च्छितानि तीक्ष्णानि मद्यानि विविधानि च| प्रभूतकटुयुक्तानि तस्यास्ये गालयेन्मुहुः||४८|| मातुलुङ्गरसं तद्वन्महौषधसमायुतम्| तद्वत्सौवर्चलं दद्याद्युक्तं मद्याम्लकाञ्जिकैः||४९|| हिङ्गूषणसमायुक्तं यावत् सञ्ज्ञाप्रबोधनम्| प्रबुद्धसञ्ज्ञमन्नैश्च लघुभिस्तमुपाचरेत्||५०|| विस्मापनैः स्मारणैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च| पटुभिर्गीतवादित्रशब्दैश्चित्रैश्च दर्शनैः||५१|| स्रंसनोल्लेखनैर्धूमैरञ्जनैः कवलग्रहैः| शोणितस्यावसेकैश्च व्यायामोद्घर्षणैस्तथा||५२|| प्रबुद्धसञ्ज्ञं मतिमाननुबन्धमुपक्रमेत्| तस्य संरक्षितव्यं हि मनः प्रलयहेतुतः||५३||

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Adhikarana 18 (54-58) · Śloka 58

স্নেহস্বেদোপপন্নানাং যথাদোষং যথাবলম্| পঞ্চ কর্মাণি কুর্বীত মূর্চ্ছাযেষু মদেষু চ||৫৪|| অষ্টাবিংশত্যৌষধস্য তথা তিক্তস্য সর্পিষঃ| প্রযোগঃ শস্যতে তদ্বন্মহতঃ ষট্পলস্য বা||৫৫|| ত্রিফলাযাঃ প্রযোগো বা সঘৃতক্ষৌদ্রশর্করঃ| শিলাজতুপ্রযোগো বা প্রযোগঃ পযসোঽপি বা||৫৬|| পিপ্পলীনাং প্রযোগো বা পযসা চিত্রকস্য বা| রসাযনানাং কৌম্ভস্য সর্পিষো বা প্রশস্যতে||৫৭|| রক্তাবসেকাচ্ছাস্ত্রাণাং সতাং সত্ত্ববতামপি| সেবনান্মদমূর্চ্ছাযাঃ প্রশাম্যন্তি শরীরিণাম্||৫৮||

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स्नेहस्वेदोपपन्नानां यथादोषं यथाबलम्| पञ्च कर्माणि कुर्वीत मूर्च्छायेषु मदेषु च||५४|| अष्टाविंशत्यौषधस्य तथा तिक्तस्य सर्पिषः| प्रयोगः शस्यते तद्वन्महतः षट्पलस्य वा||५५|| त्रिफलायाः प्रयोगो वा सघृतक्षौद्रशर्करः| शिलाजतुप्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा||५६|| पिप्पलीनां प्रयोगो वा पयसा चित्रकस्य वा| रसायनानां कौम्भस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते||५७|| रक्तावसेकाच्छास्त्राणां सतां सत्त्ववतामपि| सेवनान्मदमूर्च्छायाः प्रशाम्यन्ति शरीरिणाम्||५८||

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Adhikarana 19 (59-60) · Śloka 60

তত্র শ্লোকৌ- বিশুদ্ধং চাবিশুদ্ধং চ শোণিতং তস্য হেতবঃ| রক্তপ্রদোষজা রোগাস্তেষু রোগেষু চৌষধম্||৫৯|| মদমূর্চ্ছাযসন্ন্যাসহেতুলক্ষণভেষজম্| বিধিশোণিতকেঽধ্যাযে সর্বমেতত্ প্রকাশিতম্||৬০||

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तत्र श्लोकौ- विशुद्धं चाविशुद्धं च शोणितं तस्य हेतवः| रक्तप्रदोषजा रोगास्तेषु रोगेषु चौषधम्||५९|| मदमूर्च्छायसन्न्यासहेतुलक्षणभेषजम्| विधिशोणितकेऽध्याये सर्वमेतत् प्रकाशितम्||६०||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 6

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে বিধিশোণিতীযো নাম চতুর্বিংশোঽধ্যাযঃ||২৪|| সমাপ্তো যোজনাচতুষ্কঃ||৬||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने विधिशोणितीयो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः||२४|| समाप्तो योजनाचतुष्कः||६||

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24. vidhiśōṇitīyō'dhyāyaḥ — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi