Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো লঙ্ঘনবৃংহণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो लङ्घनबृंहणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো লঙ্ঘনবৃংহণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो लङ्घनबृंहणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-8) · Śloka 8
তপঃস্বাধ্যাযনিরতানাত্রেযঃ শিষ্যসত্তমান্| ষডগ্নিবেশপ্রমুখানুক্তবান্ পরিচোদযন্||৩|| লঙ্ঘনং বৃংহণং কালে রূক্ষণং স্নেহনং তথা| স্বেদনং স্তম্ভনং চৈব জানীতে যঃ স বৈ ভিষক্||৪|| তমুক্তবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ হ||৫|| ভগবঁল্লঙ্ঘনং কিংস্বিল্লঙ্ঘনীযাশ্চ কীদৃশাঃ| বৃংহণং বৃংহণীযাশ্চ রূক্ষণীযাশ্চ রূক্ষণম্||৬|| কে স্নেহাঃ স্নেহনীযাশ্চ স্বেদাঃ স্বেদ্যাশ্চ কে মতাঃ| স্তম্ভনং স্তম্ভনীযাশ্চ বক্তুমর্হসি তদ্গুরো!||৭|| লঙ্ঘনপ্রভৃতীনাং চ ষণ্ণামেষাং সমাসতঃ| কৃতাকৃতাতিবৃত্তানাং লক্ষণং বক্তুমর্হসি||৮||
तपःस्वाध्यायनिरतानात्रेयः शिष्यसत्तमान्| षडग्निवेशप्रमुखानुक्तवान् परिचोदयन्||३|| लङ्घनं बृंहणं काले रूक्षणं स्नेहनं तथा| स्वेदनं स्तम्भनं चैव जानीते यः स वै भिषक्||४|| तमुक्तवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच ह||५|| भगवँल्लङ्घनं किंस्विल्लङ्घनीयाश्च कीदृशाः| बृंहणं बृंहणीयाश्च रूक्षणीयाश्च रूक्षणम्||६|| के स्नेहाः स्नेहनीयाश्च स्वेदाः स्वेद्याश्च के मताः| स्तम्भनं स्तम्भनीयाश्च वक्तुमर्हसि तद्गुरो!||७|| लङ्घनप्रभृतीनां च षण्णामेषां समासतः| कृताकृतातिवृत्तानां लक्षणं वक्तुमर्हसि||८||
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Adhikarana 3 (9-17) · Śloka 17
তদগ্নিবেশস্য বচো নিশম্য গুরুরব্রবীত্| যত্ কিঞ্চিল্লাঘবকরং দেহে তল্লঙ্ঘনং স্মৃতম্||৯|| বৃহত্ত্বং যচ্ছরীরস্য জনযেত্তচ্চ বৃংহণম্| রৌক্ষ্যং খরত্বং বৈশদ্যং যত্ কুর্যাত্তদ্ধি রূক্ষণম্||১০|| স্নেহনং স্নেহবিষ্যন্দমার্দবক্লেদকারকম্ | স্তম্ভগৌরবশীতঘ্নং স্বেদনং স্বেদকারকম্||১১|| স্তম্ভনং স্তম্ভযতি যদ্গতিমন্তং চলং ধ্রুবম্| লঘূষ্ণতীক্ষ্ণবিশদং রূক্ষং সূক্ষ্মং খরং সরম্||১২|| কঠিনং চৈব যদ্দ্রব্যং প্রাযস্তল্লঙ্ঘনং স্মৃতম্| গুরু শীতং মৃদু স্নিগ্ধং বহলং স্থূলপিচ্ছিলম্||১৩|| প্রাযো মন্দং স্থিরং শ্লক্ষ্ণং দ্রব্যং বৃংহণমুচ্যতে| রূক্ষং লঘু খরং তীক্ষ্ণমুষ্ণং স্থিরমপিচ্ছিলম্||১৪|| প্রাযশঃ কঠিনং চৈব যদ্দ্রব্যং তদ্ধি রূক্ষণম্| দ্রবং সূক্ষ্মং সরং স্নিগ্ধং পিচ্ছিলং গুরু শীতলম্| প্রাযো মন্দং মৃদু চ যদ্দ্রব্যং তত্স্নেহনং মতম্||১৫|| উষ্ণং তীক্ষ্ণং সরং স্নিগ্ধং রূক্ষং সূক্ষ্মং দ্রবং স্থিরম্| দ্রব্যং গুরু চ যত্ প্রাযস্তদ্ধি স্বেদনমুচ্যতে||১৬|| শীতং মন্দং মৃদু শ্লক্ষ্ণং রূক্ষং সূক্ষ্মং দ্রবং স্থিরম্| যদ্দ্রব্যং লঘু চোদ্দিষ্টং প্রাযস্তত্ স্তম্ভনং স্মৃতম্||১৭||
तदग्निवेशस्य वचो निशम्य गुरुरब्रवीत्| यत् किञ्चिल्लाघवकरं देहे तल्लङ्घनं स्मृतम्||९|| बृहत्त्वं यच्छरीरस्य जनयेत्तच्च बृंहणम्| रौक्ष्यं खरत्वं वैशद्यं यत् कुर्यात्तद्धि रूक्षणम्||१०|| स्नेहनं स्नेहविष्यन्दमार्दवक्लेदकारकम् | स्तम्भगौरवशीतघ्नं स्वेदनं स्वेदकारकम्||११|| स्तम्भनं स्तम्भयति यद्गतिमन्तं चलं ध्रुवम्| लघूष्णतीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं सरम्||१२|| कठिनं चैव यद्द्रव्यं प्रायस्तल्लङ्घनं स्मृतम्| गुरु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं स्थूलपिच्छिलम्||१३|| प्रायो मन्दं स्थिरं श्लक्ष्णं द्रव्यं बृंहणमुच्यते| रूक्षं लघु खरं तीक्ष्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम्||१४|| प्रायशः कठिनं चैव यद्द्रव्यं तद्धि रूक्षणम्| द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम्| प्रायो मन्दं मृदु च यद्द्रव्यं तत्स्नेहनं मतम्||१५|| उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम्| द्रव्यं गुरु च यत् प्रायस्तद्धि स्वेदनमुच्यते||१६|| शीतं मन्दं मृदु श्लक्ष्णं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम्| यद्द्रव्यं लघु चोद्दिष्टं प्रायस्तत् स्तम्भनं स्मृतम्||१७||
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Adhikarana 4 (18) · Śloka 18
চতুষ্প্রকারা সংশুদ্ধিঃ পিপাসা মারুতাতপৌ| পাচনান্যুপবাসশ্চ ব্যাযামশ্চেতি লঙ্ঘনম্||১৮||
चतुष्प्रकारा संशुद्धिः पिपासा मारुतातपौ| पाचनान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लङ्घनम्||१८||
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Adhikarana 5 (19-24) · Śloka 24
প্রভূতশ্লেষ্মপিত্তাস্রমলাঃ সংসৃষ্টমারুতাঃ| বৃহচ্ছরীরা বলিনো লঙ্ঘনীযা বিশুদ্ধিভিঃ||১৯|| যেষাং মধ্যবলা রোগাঃ কফপিত্তসমুত্থিতাঃ| বম্যতীসারহৃদ্রোগবিসূচ্যলসকজ্বরাঃ||২০|| বিবন্ধগৌরবোদ্গারহৃল্লাসারোচকাদযঃ| পাচনৈস্তান্ ভিষক্ প্রাজ্ঞঃ প্রাযেণাদাবুপাচরেত্||২১|| এত এব যথোদ্দিষ্টা যেষামল্পবলা গদাঃ| পিপাসানিগ্রহৈস্তেষামুপবাসৈশ্চ তাঞ্জযেত্||২২|| রোগাঞ্জযেন্মধ্যবলান্ ব্যাযামাতপমারুতৈঃ| বলিনাং কিং পুনর্যেষাং রোগাণামবরং বলম্||২৩|| ত্বগ্দোষিণাং প্রমীঢানাং স্নিগ্ধাভিষ্যন্দিবৃংহিণাম্| শিশিরে লঙ্ঘনং শস্তমপি বাতবিকারিণাম্||২৪||
प्रभूतश्लेष्मपित्तास्रमलाः संसृष्टमारुताः| बृहच्छरीरा बलिनो लङ्घनीया विशुद्धिभिः||१९|| येषां मध्यबला रोगाः कफपित्तसमुत्थिताः| वम्यतीसारहृद्रोगविसूच्यलसकज्वराः||२०|| विबन्धगौरवोद्गारहृल्लासारोचकादयः| पाचनैस्तान् भिषक् प्राज्ञः प्रायेणादावुपाचरेत्||२१|| एत एव यथोद्दिष्टा येषामल्पबला गदाः| पिपासानिग्रहैस्तेषामुपवासैश्च ताञ्जयेत्||२२|| रोगाञ्जयेन्मध्यबलान् व्यायामातपमारुतैः| बलिनां किं पुनर्येषां रोगाणामवरं बलम्||२३|| त्वग्दोषिणां प्रमीढानां स्निग्धाभिष्यन्दिबृंहिणाम्| शिशिरे लङ्घनं शस्तमपि वातविकारिणाम्||२४||
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Adhikarana 6 (25-28) · Śloka 28
অদিগ্ধবিদ্ধমক্লিষ্টং বযস্থং সাত্ম্যচারিণাম্| মৃগমত্স্যবিহঙ্গানাং মাংসং বৃংহণমুচ্যতে||২৫|| ক্ষীণাঃ ক্ষতাঃ কৃশা বৃদ্ধা দুর্বলা নিত্যমধ্বগাঃ| স্ত্রীমদ্যনিত্যা গ্রীষ্মে চ বৃংহণীযা নরাঃ স্মৃতাঃ||২৬|| শোষার্শোগ্রহণীদোষৈর্ব্যাধিভিঃ কর্শিতাশ্চ যে| তেষাং ক্রব্যাদমাংসানাং বৃংহণা লঘবো রসাঃ||২৭|| স্নানমুত্সাদনং স্বপ্নো মধুরাঃ স্নেহবস্তযঃ| শর্করাক্ষীরসর্পীংষি সর্বেষাং বিদ্ধি বৃংহণম্||২৮||
अदिग्धविद्धमक्लिष्टं वयस्थं सात्म्यचारिणाम्| मृगमत्स्यविहङ्गानां मांसं बृंहणमुच्यते||२५|| क्षीणाः क्षताः कृशा वृद्धा दुर्बला नित्यमध्वगाः| स्त्रीमद्यनित्या ग्रीष्मे च बृंहणीया नराः स्मृताः||२६|| शोषार्शोग्रहणीदोषैर्व्याधिभिः कर्शिताश्च ये| तेषां क्रव्यादमांसानां बृंहणा लघवो रसाः||२७|| स्नानमुत्सादनं स्वप्नो मधुराः स्नेहबस्तयः| शर्कराक्षीरसर्पींषि सर्वेषां विद्धि बृंहणम्||२८||
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Adhikarana 7 (29-31) · Śloka 31
কটুতিক্তকষাযাণাং সেবনং স্ত্রীষ্বসংযমঃ| খলিপিণ্যাকতক্রাণাং মধ্বাদীনাং চ রূক্ষণম্||২৯|| অভিষ্যণ্ণা মহাদোষা মর্মস্থা ব্যাধযশ্চ যে| ঊরুস্তম্ভপ্রভৃতযো রূক্ষণীযা নিদর্শিতাঃ||৩০|| স্নেহাঃ স্নেহযিতব্যাশ্চ স্বেদাঃ স্বেদ্যাশ্চ যে নরাঃ| স্নেহাধ্যাযে মযোক্তাস্তে স্বেদাখ্যে চ সবিস্তরম্||৩১||
कटुतिक्तकषायाणां सेवनं स्त्रीष्वसंयमः| खलिपिण्याकतक्राणां मध्वादीनां च रूक्षणम्||२९|| अभिष्यण्णा महादोषा मर्मस्था व्याधयश्च ये| ऊरुस्तम्भप्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः||३०|| स्नेहाः स्नेहयितव्याश्च स्वेदाः स्वेद्याश्च ये नराः| स्नेहाध्याये मयोक्तास्ते स्वेदाख्ये च सविस्तरम्||३१||
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Adhikarana 8 (32-33) · Śloka 33
দ্রবং তন্বসরং যাবচ্ছীতীকরণমৌষধম্| স্বাদু তিক্তং কষাযং চ স্তম্ভনং সর্বমেব তত্||৩২|| পিত্তক্ষারাগ্নিদগ্ধা যে বম্যতীসারপীডিতাঃ| বিষস্বেদাতিযোগার্তাঃ স্তম্ভনীযা নিদর্শিতাঃ||৩৩||
द्रवं तन्वसरं यावच्छीतीकरणमौषधम्| स्वादु तिक्तं कषायं च स्तम्भनं सर्वमेव तत्||३२|| पित्तक्षाराग्निदग्धा ये वम्यतीसारपीडिताः| विषस्वेदातियोगार्ताः स्तम्भनीया निदर्शिताः||३३||
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Adhikarana 9 (34-37) · Śloka 37
বাতমূত্রপুরীষাণাং বিসর্গে গাত্রলাঘবে| হৃদযোদ্গারকণ্ঠাস্যশুদ্ধৌ তন্দ্রাক্লমে গতে||৩৪|| স্বেদে জাতে রুচৌ চৈব ক্ষুত্পিপাসাসহোদযে| কৃতং লঙ্ঘনমাদেশ্যং নির্ব্যথে চান্তরাত্মনি||৩৫|| পর্বভেদোঽঙ্গমর্দশ্চ কাসঃ শোষো মুখস্য চ| ক্ষুত্প্রণাশোঽরুচিস্তৃষ্ণা দৌর্বল্যং শ্রোত্রনেত্রযোঃ||৩৬|| মনসঃ সম্ভ্রমোঽভীক্ষ্ণমূর্ধ্ববাতস্তমো হৃদি| দেহাগ্নিবলনাশশ্চ লঙ্ঘনেঽতিকৃতে ভবেত্||৩৭||
वातमूत्रपुरीषाणां विसर्गे गात्रलाघवे| हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धौ तन्द्राक्लमे गते||३४|| स्वेदे जाते रुचौ चैव क्षुत्पिपासासहोदये| कृतं लङ्घनमादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मनि||३५|| पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च कासः शोषो मुखस्य च| क्षुत्प्रणाशोऽरुचिस्तृष्णा दौर्बल्यं श्रोत्रनेत्रयोः||३६|| मनसः सम्भ्रमोऽभीक्ष्णमूर्ध्ववातस्तमो हृदि| देहाग्निबलनाशश्च लङ्घनेऽतिकृते भवेत्||३७||
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Adhikarana 10 (38) · Śloka 39
বলং পুষ্ট্যুপলম্ভশ্চ কার্শ্যদোষবিবর্জনম্| লক্ষণং বৃংহিতে স্থৌল্যমতি চাত্যর্থবৃংহিতে||৩৮|| কৃতাতিকৃতলিঙ্গং যল্লঙ্ঘিতে তদ্ধি রূক্ষিতে |৩৯|
बलं पुष्ट्युपलम्भश्च कार्श्यदोषविवर्जनम्| लक्षणं बृंहिते स्थौल्यमति चात्यर्थबृंहिते||३८|| कृतातिकृतलिङ्गं यल्लङ्घिते तद्धि रूक्षिते |३९|
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Adhikarana 11 (39-40) · Śloka 40
স্তম্ভিতঃ স্যাদ্বলে লব্ধে যথোক্তৈশ্চামযৈর্জিতৈঃ||৩৯|| শ্যাবতা স্তব্ধগাত্রত্বমুদ্বেগো হনুসঙ্গ্রহঃ| হৃদ্বর্চোনিগ্রহশ্চ স্যাদতিস্তম্ভিতলক্ষণম্||৪০||
स्तम्भितः स्याद्बले लब्धे यथोक्तैश्चामयैर्जितैः||३९|| श्यावता स्तब्धगात्रत्वमुद्वेगो हनुसङ्ग्रहः| हृद्वर्चोनिग्रहश्च स्यादतिस्तम्भितलक्षणम्||४०||
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Adhikarana 12 (41-42) · Śloka 42
লক্ষণং চাকৃতানাং স্যাত্ ষণ্ণামেষাং সমাসতঃ| তদৌষধানাং ধাতূনামশমো বৃদ্ধিরেব চ||৪১|| ইতি ষট্ সর্বরোগাণাং প্রোক্তাঃ সম্যগুপক্রমাঃ| সাধ্যানাং সাধনে সিদ্ধা মাত্রাকালানুরোধিনঃ||৪২||
लक्षणं चाकृतानां स्यात् षण्णामेषां समासतः| तदौषधानां धातूनामशमो वृद्धिरेव च||४१|| इति षट् सर्वरोगाणां प्रोक्ताः सम्यगुपक्रमाः| साध्यानां साधने सिद्धा मात्राकालानुरोधिनः||४२||
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Adhikarana 13 (43) · Śloka 43
ভবতি চাত্র- দোষাণাং বহুসংসর্গাত্ সঙ্কীর্যন্তে হ্যুপক্রমাঃ| ষট্ত্বং তু নাতিবর্তন্তে ত্রিত্বং বাতাদযো যথা||৪৩||
भवति चात्र- दोषाणां बहुसंसर्गात् सङ्कीर्यन्ते ह्युपक्रमाः| षट्त्वं तु नातिवर्तन्ते त्रित्वं वातादयो यथा||४३||
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Adhikarana 14 (44) · Śloka 44
তত্র শ্লোকাঃ- ইত্যস্মিঁলঙ্ঘনাধ্যাযে ব্যাখ্যাতাঃ ষডুপক্রমাঃ| যথাপ্রশ্নং ভগবতা চিকিত্সা যৈঃ প্রবর্ততে||৪৪||
तत्र श्लोकाः- इत्यस्मिँलङ्घनाध्याये व्याख्याताः षडुपक्रमाः| यथाप्रश्नं भगवता चिकित्सा यैः प्रवर्तते||४४||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 22
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে লঙ্ঘনবৃংহণীযো নাম দ্বাবিংশোঽধ্যাযঃ||২২||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने लङ्घनबृंहणीयो नाम द्वाविंशोऽध्यायः||२२||
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