Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্রোতসাং বিমানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः स्रोतसां विमानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্রোতসাং বিমানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः स्रोतसां विमानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
যাবন্তঃ পুরুষে মূর্তিমন্তো ভাববিশেষাস্তাবন্ত এবাস্মিন্ স্রোতসাং প্রকারবিশেষাঃ| সর্বে হি ভাবা পুরুষে নান্তরেণ স্রোতাংস্যভিনির্বর্তন্তে, ক্ষযং বাঽপ্যভিগচ্ছন্তি| স্রোতাংসি খলু পরিণামমাপদ্যমানানাং ধাতূনামভিবাহীনি ভবন্ত্যযনার্থেন||৩||
यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां प्रकारविशेषाः| सर्वे हि भावा पुरुषे नान्तरेण स्रोतांस्यभिनिर्वर्तन्ते, क्षयं वाऽप्यभिगच्छन्ति| स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनामभिवाहीनि भवन्त्ययनार्थेन||३||
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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
অপি চৈকে স্রোতসামেব সমুদযং পুরুষমিচ্ছন্তি, সর্বগতত্বাত্ সর্বসরত্বাচ্চ দোষপ্রকোপণপ্রশমনানাম্| ন ত্বেতদেবং, যস্য হি স্রোতাংসি, যচ্চ বহন্তি, যচ্চাবহন্তি, যত্র চাবস্থিতানি, সর্বং তদন্যত্তেভ্যঃ||৪|| অতিবহুত্বাত্ খলু কেচিদপরিসঙ্খ্যেযান্যাচক্ষতে স্রোতাংসি, পরিসঙ্খ্যেযানি পুনরন্যে||৫||
अपि चैके स्रोतसामेव समुदयं पुरुषमिच्छन्ति, सर्वगतत्वात् सर्वसरत्वाच्च दोषप्रकोपणप्रशमनानाम्| न त्वेतदेवं, यस्य हि स्रोतांसि, यच्च वहन्ति, यच्चावहन्ति, यत्र चावस्थितानि, सर्वं तदन्यत्तेभ्यः||४|| अतिबहुत्वात् खलु केचिदपरिसङ्ख्येयान्याचक्षते स्रोतांसि, परिसङ्ख्येयानि पुनरन्ये||५||
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Adhikarana 4 (6-7) · Śloka 7
তেষাং তু খলু স্রোতসাং যথাস্থূলং কতিচিত্প্রকারান্মূলতশ্চ প্রকোপবিজ্ঞানতশ্চানুব্যাখ্যাস্যামঃ; যে ভবিষ্যন্ত্যলমনুক্তার্থজ্ঞানায জ্ঞানবতাং, বিজ্ঞানায চাজ্ঞানবতাম্||৬|| তদ্যথা- প্রাণোদকান্নরসরুধিরমাংসমেদোস্থিমজ্জশুক্রমূত্রপুরীষস্বেদবহানীতি; বাতপিত্তশ্লেষ্মণাং পুনঃ সর্বশরীরচরাণাং সর্বাণি স্রোতাংস্যযনভূতানি, তদ্বদতীন্দ্রিযাণাং পুনঃ সত্ত্বাদীনাং কেবলং চেতনাবচ্ছরীরমযনভূতমধিষ্ঠানভূতং চ| তদেতত্ স্রোতসাং প্রকৃতিভূতত্বান্ন বিকারৈরুপসৃজ্যতে শরীরম্||৭||
तेषां तु खलु स्रोतसां यथास्थूलं कतिचित्प्रकारान्मूलतश्च प्रकोपविज्ञानतश्चानुव्याख्यास्यामः; ये भविष्यन्त्यलमनुक्तार्थज्ञानाय ज्ञानवतां, विज्ञानाय चाज्ञानवताम्||६|| तद्यथा- प्राणोदकान्नरसरुधिरमांसमेदोस्थिमज्जशुक्रमूत्रपुरीषस्वेदवहानीति; वातपित्तश्लेष्मणां पुनः सर्वशरीरचराणां सर्वाणि स्रोतांस्ययनभूतानि, तद्वदतीन्द्रियाणां पुनः सत्त्वादीनां केवलं चेतनावच्छरीरमयनभूतमधिष्ठानभूतं च| तदेतत् स्रोतसां प्रकृतिभूतत्वान्न विकारैरुपसृज्यते शरीरम्||७||
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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8
তত্র প্রাণবহানাং স্রোতসাং হৃদযং মূলং মহাস্রোতশ্চ, প্রদুষ্টানাং তু খল্বেষামিদং বিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- অতিসৃষ্টমতিবদ্ধং কুপিতমল্পাল্পমভীক্ষ্ণং বা সশব্দশূলমুচ্ছ্বসন্তং দৃষ্ট্বা প্রাণবহান্যস্য স্রোতাংসি প্রদুষ্টানীতি বিদ্যাত্| উদকবহানাং স্রোতসাং তালুমূলং ক্লোম চ, প্রদুষ্টানাং তু খল্বেষামিদং বিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- জিহ্বাতাল্বোষ্ঠকণ্ঠক্লোমশোষং পিপাসাং চাতিপ্রবৃদ্ধাং দৃষ্ট্বোদকবহান্যস্য স্রোতাংসি প্রদুষ্টানীতি বিদ্যাত্| অন্নবহানাং স্রোতসামামাশযো মূলং বামং চ পার্শ্বং, প্রদুষ্টানাং তু খল্বেষামিদং বিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- অনন্নাভিলষণমরোচকবিপাকৌ ছর্দিং চ দৃষ্ট্বাঽন্নবহান্যস্য স্রোতাংসি প্রদুষ্টানীতি বিদ্যাত্| রসবহানাং স্রোতসাং হৃদযং মূলং দশ চ ধমন্যঃ| শোণিতবহানাং স্রোতসাং যকৃন্মূলং প্লীহা চ| মাংসবহানাং চ স্রোতসাং স্নাযুর্মূলং ত্বক্ চ| মেদোবহানাং স্রোতসাং বৃক্কৌ মূলং বপাবহনং চ| অস্থিবহানাং স্রোতসাং মেদো মূলং জঘনং চ| মজ্জবহানাং স্রোতসামস্থীনি মূলং সন্ধযশ্চ| শুক্রবহানাং স্রোতসাং বৃষণৌ মূলং শেফশ্চ| প্রদুষ্টানাং তু খল্বেষাং রসাদিবহস্রোতসাং বিজ্ঞানান্যুক্তানি বিবিধাশিতপীতীযে; যান্যেব হি ধাতূনাং প্রদোষবিজ্ঞানানি তান্যেব যথাস্বং প্রদুষ্টানাং ধাতুস্রোতসাম্| মূত্রবহানাং স্রোতসাং বস্তির্মূলং বঙ্ক্ষণৌ চ, প্রদুষ্টানাং তু খল্বেষামিদং বিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- অতিসৃষ্টমতিবদ্ধং প্রকুপিতমল্পাল্পমভীক্ষ্ণং বা বহলং সশূলং মূত্রযন্তং দৃষ্ট্বা মূত্রবহান্যস্য স্রোতাংসি প্রদুষ্টানীতি বিদ্যাত্| পুরীষবহানাং স্রোতসাং পক্বাশযো মূলং স্থূলগুদং চ, প্রদুষ্টানাং তু খল্বেষামিদং বিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- কৃচ্ছ্রেণাল্পাল্পং সশব্দশূলমতিদ্রবমতিগ্রথিতমতিবহু চোপবিশন্তং দৃষ্ট্বা পুরীষবহান্যস্য স্রোতাংসি প্রদুষ্টানীতি বিদ্যাত্| স্বেদবহানাং স্রোতসাং মেদো মূলং লোমকূপাশ্চ, প্রদুষ্টানাং তু খল্বেষামিদং বিশেষবিজ্ঞানং ভবতি; তদ্যথা- অস্বেদনমতিস্বেদনং পারুষ্যমতিশ্লক্ষ্ণতামঙ্গস্য পরিদাহং লোমহর্ষং চ দৃষ্ট্বা স্বেদবহান্যস্য স্রোতাংসি প্রদুষ্টানীতি বিদ্যাত্||৮||
तत्र प्राणवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं महास्रोतश्च, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पाल्पमभीक्ष्णं वा सशब्दशूलमुच्छ्वसन्तं दृष्ट्वा प्राणवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात्| उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- जिह्वाताल्वोष्ठकण्ठक्लोमशोषं पिपासां चातिप्रवृद्धां दृष्ट्वोदकवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात्| अन्नवहानां स्रोतसामामाशयो मूलं वामं च पार्श्वं, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- अनन्नाभिलषणमरोचकविपाकौ छर्दिं च दृष्ट्वाऽन्नवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात्| रसवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं दश च धमन्यः| शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च| मांसवहानां च स्रोतसां स्नायुर्मूलं त्वक् च| मेदोवहानां स्रोतसां वृक्कौ मूलं वपावहनं च| अस्थिवहानां स्रोतसां मेदो मूलं जघनं च| मज्जवहानां स्रोतसामस्थीनि मूलं सन्धयश्च| शुक्रवहानां स्रोतसां वृषणौ मूलं शेफश्च| प्रदुष्टानां तु खल्वेषां रसादिवहस्रोतसां विज्ञानान्युक्तानि विविधाशितपीतीये; यान्येव हि धातूनां प्रदोषविज्ञानानि तान्येव यथास्वं प्रदुष्टानां धातुस्रोतसाम्| मूत्रवहानां स्रोतसां बस्तिर्मूलं वङ्क्षणौ च, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- अतिसृष्टमतिबद्धं प्रकुपितमल्पाल्पमभीक्ष्णं वा बहलं सशूलं मूत्रयन्तं दृष्ट्वा मूत्रवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात्| पुरीषवहानां स्रोतसां पक्वाशयो मूलं स्थूलगुदं च, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- कृच्छ्रेणाल्पाल्पं सशब्दशूलमतिद्रवमतिग्रथितमतिबहु चोपविशन्तं दृष्ट्वा पुरीषवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात्| स्वेदवहानां स्रोतसां मेदो मूलं लोमकूपाश्च, प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा- अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमतिश्लक्ष्णतामङ्गस्य परिदाहं लोमहर्षं च दृष्ट्वा स्वेदवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात्||८||
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Adhikarana 6 (9) · Śloka 9
স্রোতাংসি, সিরাঃ, ধমন্যঃ, রসাযন্যঃ, রসবাহিন্যঃ, নাড্যঃ, পন্থানঃ, মার্গাঃ, শরীরচ্ছিদ্রাণি, সংবৃতাসংবৃতানি, স্থানানি, আশযাঃ, নিকেতাশ্চেতি শরীরধাত্ববকাশানাং লক্ষ্যালক্ষ্যাণাং নামানি ভবন্তি| তেষাং প্রকোপাত্ স্থানস্থাশ্চৈব মার্গগাশ্চ শরীরধাতবঃ প্রকোপমাপদ্যন্তে, ইতরেষাং প্রকোপাদিতরাণি চ| স্রোতাংসি স্রোতাংস্যেব, ধাতবশ্চ ধাতূনেব প্রদূষযন্তি প্রদুষ্টাঃ| তেষাং সর্বেষামেব বাতপিত্তশ্লেষ্মাণঃ প্রদুষ্টা দূষযিতারো ভবন্তি, দোষস্বভাবাদিতি||৯||
स्रोतांसि, सिराः, धमन्यः, रसायन्यः, रसवाहिन्यः, नाड्यः, पन्थानः, मार्गाः, शरीरच्छिद्राणि, संवृतासंवृतानि, स्थानानि, आशयाः, निकेताश्चेति शरीरधात्ववकाशानां लक्ष्यालक्ष्याणां नामानि भवन्ति| तेषां प्रकोपात् स्थानस्थाश्चैव मार्गगाश्च शरीरधातवः प्रकोपमापद्यन्ते, इतरेषां प्रकोपादितराणि च| स्रोतांसि स्रोतांस्येव, धातवश्च धातूनेव प्रदूषयन्ति प्रदुष्टाः| तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणः प्रदुष्टा दूषयितारो भवन्ति, दोषस्वभावादिति||९||
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Adhikarana 7 (10-22) · Śloka 22
ভবন্তি চাত্র- ক্ষযাত্ সন্ধারণাদ্রৌক্ষ্যাদ্ব্যাযামাত্ ক্ষুধিতস্য চ| প্রাণবাহীনি দুষ্যন্তি স্রোতাংস্যন্যৈশ্চ দারুণৈঃ||১০|| ঔষ্ণ্যাদামাদ্ভযাত্ পানাদতিশুষ্কান্নসেবনাত্| অম্বুবাহীনি দুষ্যন্তি তৃষ্ণাযাশ্চাতিপীডনাত্||১১|| অতিমাত্রস্য চাকালে চাহিতস্য চ ভোজনাত্| অন্নবাহীনি দুষ্যন্তি বৈগুণ্যাত্ পাবকস্য চ||১২|| গুরুশীতমতিস্নিগ্ধমতিমাত্রং সমশ্নতাম্| রসবাহীনি দুষ্যন্তি চিন্ত্যানাং চাতিচিন্তনাত্||১৩|| বিদাহীন্যন্নপানানি স্নিগ্ধোষ্ণানি দ্রবাণি চ| রক্তবাহীনি দুষ্যন্তি ভজতাং চাতপানলৌ||১৪|| অভিষ্যন্দীনি ভোজ্যানি স্থূলানি চ গুরূণি চ| মাংসবাহীনি দুষ্যন্তি ভুক্ত্বা চ স্বপতাং দিবা||১৫|| অব্যাযামাদ্দিবাস্বপ্নান্মেদ্যানাং চাতিভক্ষণাত্| মেদোবাহীনি দুষ্যন্তি বারুণ্যাশ্চাতিসেবনাত্||১৬|| ব্যাযামাদতিসঙ্ক্ষোভাদস্থ্নামতিবিঘট্টনাত্| অস্থিবাহীনি দুষ্যন্তি বাতলানাং চ সেবনাত্||১৭|| উত্পেষাদত্যভিষ্যন্দাদভিঘাতাত্ প্রপীডনাত্| মজ্জবাহীনি দুষ্যন্তি বিরুদ্ধানাং চ সেবনাত্||১৮|| অকালযোনিগমনান্নিগ্রহাদতিমৈথুনাত্| শুক্রবাহীনি দুষ্যন্তি শস্ত্রক্ষারাগ্নিভিস্তথা||১৯|| মূত্রিতোদকভক্ষ্যস্ত্রীসেবনান্মূত্রনিগ্রহাত্| মূত্রবাহীনি দুষ্যন্তি ক্ষীণস্যাভিক্ষতস্য চ||২০|| সন্ধারণাদত্যশনাদজীর্ণাধ্যশনাত্তথা| বর্চোবাহীনি দুষ্যন্তি দুর্বলাগ্নেঃ কৃশস্য চ||২১|| ব্যাযামাদতিসন্তাপাচ্ছীতোষ্ণাক্রমসেবনাত্ | স্বেদবাহীনি দুষ্যন্তি ক্রোধশোকভযৈস্তথা||২২||
भवन्ति चात्र- क्षयात् सन्धारणाद्रौक्ष्याद्व्यायामात् क्षुधितस्य च| प्राणवाहीनि दुष्यन्ति स्रोतांस्यन्यैश्च दारुणैः||१०|| औष्ण्यादामाद्भयात् पानादतिशुष्कान्नसेवनात्| अम्बुवाहीनि दुष्यन्ति तृष्णायाश्चातिपीडनात्||११|| अतिमात्रस्य चाकाले चाहितस्य च भोजनात्| अन्नवाहीनि दुष्यन्ति वैगुण्यात् पावकस्य च||१२|| गुरुशीतमतिस्निग्धमतिमात्रं समश्नताम्| रसवाहीनि दुष्यन्ति चिन्त्यानां चातिचिन्तनात्||१३|| विदाहीन्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि द्रवाणि च| रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चातपानलौ||१४|| अभिष्यन्दीनि भोज्यानि स्थूलानि च गुरूणि च| मांसवाहीनि दुष्यन्ति भुक्त्वा च स्वपतां दिवा||१५|| अव्यायामाद्दिवास्वप्नान्मेद्यानां चातिभक्षणात्| मेदोवाहीनि दुष्यन्ति वारुण्याश्चातिसेवनात्||१६|| व्यायामादतिसङ्क्षोभादस्थ्नामतिविघट्टनात्| अस्थिवाहीनि दुष्यन्ति वातलानां च सेवनात्||१७|| उत्पेषादत्यभिष्यन्दादभिघातात् प्रपीडनात्| मज्जवाहीनि दुष्यन्ति विरुद्धानां च सेवनात्||१८|| अकालयोनिगमनान्निग्रहादतिमैथुनात्| शुक्रवाहीनि दुष्यन्ति शस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा||१९|| मूत्रितोदकभक्ष्यस्त्रीसेवनान्मूत्रनिग्रहात्| मूत्रवाहीनि दुष्यन्ति क्षीणस्याभिक्षतस्य च||२०|| सन्धारणादत्यशनादजीर्णाध्यशनात्तथा| वर्चोवाहीनि दुष्यन्ति दुर्बलाग्नेः कृशस्य च||२१|| व्यायामादतिसन्तापाच्छीतोष्णाक्रमसेवनात् | स्वेदवाहीनि दुष्यन्ति क्रोधशोकभयैस्तथा||२२||
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Adhikarana 8 (23) · Śloka 23
আহারশ্চ বিহারশ্চ যঃ স্যাদ্দোষগুণৈঃ সমঃ| ধাতুভির্বিগুণশ্চাপি স্রোতসাং স প্রদূষকঃ||২৩||
आहारश्च विहारश्च यः स्याद्दोषगुणैः समः| धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसां स प्रदूषकः||२३||
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Adhikarana 9 (24) · Śloka 24
অতিপ্রবৃত্তিঃ সঙ্গো বা সিরাণাং গ্রন্থযোঽপি বা| বিমার্গগমনং চাপি স্রোতসাং দুষ্টিলক্ষণম্||২৪||
अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा| विमार्गगमनं चापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम्||२४||
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Adhikarana 10 (25) · Śloka 25
স্বধাতুসমবর্ণানি বৃত্তস্থূলান্যণূনি চ| স্রোতাংসি দীর্ঘাণ্যাকৃত্যা প্রতানসদৃশানি চ||২৫||
स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च| स्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च||२५||
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Adhikarana 11 (26-28) · Śloka 28
প্রাণোদকান্নবাহানাং দুষ্টানাং শ্বাসিকী ক্রিযা| কার্যা তৃষ্ণোপশমনী তথৈবামপ্রদোষিকী||২৬|| বিবিধাশিতপীতীযে রসাদীনাং যদৌষধম্| রসাদিস্রোতসাং কুর্যাত্তদ্যথাস্বমুপক্রমম্||২৭|| মূত্রবিট্স্বেদবাহানাং চিকিত্সা মৌত্রকৃচ্ছ্রিকী| তথাঽতিসারিকী কার্যা তথা জ্বরচিকিত্সিকী||২৮||
प्राणोदकान्नवाहानां दुष्टानां श्वासिकी क्रिया| कार्या तृष्णोपशमनी तथैवामप्रदोषिकी||२६|| विविधाशितपीतीये रसादीनां यदौषधम्| रसादिस्रोतसां कुर्यात्तद्यथास्वमुपक्रमम्||२७|| मूत्रविट्स्वेदवाहानां चिकित्सा मौत्रकृच्छ्रिकी| तथाऽतिसारिकी कार्या तथा ज्वरचिकित्सिकी||२८||
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Adhikarana 12 (29-31) · Śloka 31
তত্র শ্লোকাঃ- ত্রযোদশানাং মূলানি স্রোতসাং দুষ্টিলক্ষণম্| সামান্যং নামপর্যাযাঃ কোপনানি পরস্পরম্||২৯|| দোষহেতুঃ পৃথক্ত্বেন ভেষজোদ্দেশ এব চ| স্রোতোবিমানে নির্দিষ্টস্তথা চাদৌ বিনিশ্চযঃ||৩০|| কেবলং বিদিতং যস্য শরীরং সর্বভাবতঃ| শারীরাঃ সর্বরোগাশ্চ স কর্মসু ন মুহ্যতি||৩১||
तत्र श्लोकाः- त्रयोदशानां मूलानि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम्| सामान्यं नामपर्यायाः कोपनानि परस्परम्||२९|| दोषहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च| स्रोतोविमाने निर्दिष्टस्तथा चादौ विनिश्चयः||३०|| केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः| शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति||३१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 5
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে বিমানস্থানে স্রোতোবিমানং নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ||৫||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने स्रोतोविमानं नाम पञ्चमोऽध्यायः||५||
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