Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দ্বিব্রণীযচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो द्विव्रणीयचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দ্বিব্রণীযচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो द्विव्रणीयचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4
পরাবরজ্ঞমাত্রেযং গতমানমদব্যথম্| অগ্নিবেশো গুরুং কালে বিনযাদিদমব্রবীত্||৩|| ভগবন্! পূর্বমুদ্দিষ্টৌ দ্বৌ ব্রণৌ রোগসঙ্গ্রহে| তযোর্লিঙ্গং চিকিত্সাং চ বক্তুমর্হসি শর্মদ!||৪||
परावरज्ञमात्रेयं गतमानमदव्यथम्| अग्निवेशो गुरुं काले विनयादिदमब्रवीत्||३|| भगवन्! पूर्वमुद्दिष्टौ द्वौ व्रणौ रोगसङ्ग्रहे| तयोर्लिङ्गं चिकित्सां च वक्तुमर्हसि शर्मद!||४||
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Adhikarana 3 (5-8) · Śloka 8
ইত্যগ্নিবেশস্য বচো নিশম্য গুরুরব্রবীত্| যৌ ব্রণৌ পূর্বমুদ্দিষ্টৌ নিজশ্চাগন্তুরেব চ||৫|| শ্রূযতাং বিধিবত্ সৌম্য! তযোর্লিঙ্গং চ ভেষজম্| নিজঃ শরীরদোষোত্থ আগন্তুর্বাহ্যহেতুজঃ||৬|| বধবন্ধপ্রপতনাদ্দংষ্ট্রাদন্তনখক্ষতাত্| আগন্তবো ব্রণাস্তদ্বদ্বিষস্পর্শাগ্নিশস্ত্রজাঃ||৭|| মন্ত্রাগদপ্রলেপাদ্যৈর্ভেষজৈর্হেতুভিশ্চ তে| লিঙ্গৈকদেশৈর্নির্দিষ্টা বিপরীতা নিজৈর্ব্রণৈঃ ||৮||
इत्यग्निवेशस्य वचो निशम्य गुरुरब्रवीत्| यौ व्रणौ पूर्वमुद्दिष्टौ निजश्चागन्तुरेव च||५|| श्रूयतां विधिवत् सौम्य! तयोर्लिङ्गं च भेषजम्| निजः शरीरदोषोत्थ आगन्तुर्बाह्यहेतुजः||६|| वधबन्धप्रपतनाद्दंष्ट्रादन्तनखक्षतात्| आगन्तवो व्रणास्तद्वद्विषस्पर्शाग्निशस्त्रजाः||७|| मन्त्रागदप्रलेपाद्यैर्भेषजैर्हेतुभिश्च ते| लिङ्गैकदेशैर्निर्दिष्टा विपरीता निजैर्व्रणैः ||८||
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Adhikarana 4 (9) · Śloka 9
ব্রণানাং নিজহেতূনামাগন্তূনামশাম্যতাম্| কুর্যাদ্দোষবলাপেক্ষী নিজানামৌষধং যথা||৯||
व्रणानां निजहेतूनामागन्तूनामशाम्यताम्| कुर्याद्दोषबलापेक्षी निजानामौषधं यथा||९||
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Adhikarana 5 (10) · Śloka 10
যথাস্বৈর্হেতুভির্দুষ্টা বাতপিত্তকফা নৃণাম্| বহির্মার্গং সমাশ্রিত্য জনযন্তি নিজান্ ব্রণান্||১০||
यथास्वैर्हेतुभिर्दुष्टा वातपित्तकफा नृणाम्| बहिर्मार्गं समाश्रित्य जनयन्ति निजान् व्रणान्||१०||
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Adhikarana 6 (11-16) · Śloka 16
স্তব্ধঃ কঠিনসংস্পর্শো মন্দস্রাবোঽতিতীব্ররুক্ | তুদ্যতে স্ফুরতি শ্যাবো ব্রণো মারুতসম্ভবঃ||১১|| সম্পূরণৈঃ স্নেহপানৈঃ স্নিগ্ধৈঃ স্বেদোপনাহনৈঃ| প্রদেহৈঃ পরিষেকৈশ্চ বাতব্রণমুপাচরেত্||১২|| তৃষ্ণামোহজ্বরস্বে(ক্লে)দদাহদুষ্ট্যবদারণৈঃ| ব্রণং পিত্তকৃতং বিদ্যাদ্গন্ধৈঃ স্রাবৈশ্চ পূতিকৈঃ||১৩|| শীতলৈর্মধুরৈস্তিক্তৈঃ প্রদেহপরিষেচনৈঃ| সর্পিষ্পানৈর্বিরেকৈশ্চ পৈত্তিকং শমযেদ্ব্রণম্||১৪|| বহুপিচ্ছো গুরুঃ স্নিগ্ধঃ স্তিমিতো মন্দবেদনঃ| পাণ্ডুবর্ণোঽল্পসঙ্ক্লেদশ্চিরকারী কফব্রণঃ||১৫|| কষাযকটুরূক্ষোষ্ণৈঃ প্রদেহপরিষেচনৈঃ| কফব্রণং প্রশমযেত্তথা লঙ্ঘনপাচনৈঃ ||১৬||
स्तब्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्रावोऽतितीव्ररुक् | तुद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मारुतसम्भवः||११|| सम्पूरणैः स्नेहपानैः स्निग्धैः स्वेदोपनाहनैः| प्रदेहैः परिषेकैश्च वातव्रणमुपाचरेत्||१२|| तृष्णामोहज्वरस्वे(क्ले)ददाहदुष्ट्यवदारणैः| व्रणं पित्तकृतं विद्याद्गन्धैः स्रावैश्च पूतिकैः||१३|| शीतलैर्मधुरैस्तिक्तैः प्रदेहपरिषेचनैः| सर्पिष्पानैर्विरेकैश्च पैत्तिकं शमयेद्व्रणम्||१४|| बहुपिच्छो गुरुः स्निग्धः स्तिमितो मन्दवेदनः| पाण्डुवर्णोऽल्पसङ्क्लेदश्चिरकारी कफव्रणः||१५|| कषायकटुरूक्षोष्णैः प्रदेहपरिषेचनैः| कफव्रणं प्रशमयेत्तथा लङ्घनपाचनैः ||१६||
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Adhikarana 7 (17-19) · Śloka 19
তৌ দ্বৌ নানাত্বভেদেন নিরুক্তা বিংশতির্ব্রণাঃ| তেষাং পরীক্ষা ত্রিবিধা, প্রদুষ্টা দ্বাদশ স্মৃতাঃ||১৭|| স্থানান্যষ্টৌ তথা গন্ধাঃ, পরিস্রাবাশ্চতুর্দশ| ষোডশোপদ্রবা দোষাশ্চত্বারো বিংশতিস্তথা||১৮|| তথা চোপক্রমাঃ সিদ্ধাঃ ষট্ত্রিংশত্ সমুদাহৃতাঃ| বিভজ্যমানাঞ্ছৃণু মে সর্বানেতান্ যথেরিতান্||১৯||
तौ द्वौ नानात्वभेदेन निरुक्ता विंशतिर्व्रणाः| तेषां परीक्षा त्रिविधा, प्रदुष्टा द्वादश स्मृताः||१७|| स्थानान्यष्टौ तथा गन्धाः, परिस्रावाश्चतुर्दश| षोडशोपद्रवा दोषाश्चत्वारो विंशतिस्तथा||१८|| तथा चोपक्रमाः सिद्धाः षट्त्रिंशत् समुदाहृताः| विभज्यमानाञ्छृणु मे सर्वानेतान् यथेरितान्||१९||
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Adhikarana 8 (20-21) · Śloka 21
কৃত্যোত্কৃত্যস্তথা দুষ্টোঽদুষ্টো মর্মস্থিতো ন চ| সংবৃতো দারুণঃ স্রাবী সবিষো বিষমস্থিতঃ||২০|| উত্সঙ্গ্যুত্সন্ন এষাং চ ব্রণান্ বিদ্যাদ্বিপর্যযাত্| ইতি নানাত্বভেদেন নিরুক্তা বিংশতির্ব্রণাঃ||২১||
कृत्योत्कृत्यस्तथा दुष्टोऽदुष्टो मर्मस्थितो न च| संवृतो दारुणः स्रावी सविषो विषमस्थितः||२०|| उत्सङ्ग्युत्सन्न एषां च व्रणान् विद्याद्विपर्ययात्| इति नानात्वभेदेन निरुक्ता विंशतिर्व्रणाः||२१||
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Adhikarana 9 (22-23) · Śloka 23
দর্শনপ্রশ্নসংস্পর্শৈঃ পরীক্ষা ত্রিবিধা স্মৃতা| বযোবর্ণশরীরাণামিন্দ্রিযাণাং চ দর্শনাত্||২২|| হেত্বর্তিসাত্ম্যাগ্নিবলং পরীক্ষ্যং বচনাদ্বুধৈঃ| স্পর্শান্মার্দবশৈত্যে চ পরীক্ষ্যে সবিপর্যযে||২৩||
दर्शनप्रश्नसंस्पर्शैः परीक्षा त्रिविधा स्मृता| वयोवर्णशरीराणामिन्द्रियाणां च दर्शनात्||२२|| हेत्वर्तिसात्म्याग्निबलं परीक्ष्यं वचनाद्बुधैः| स्पर्शान्मार्दवशैत्ये च परीक्ष्ये सविपर्यये||२३||
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Adhikarana 10 (24-25) · Śloka 25
শ্বেতোঽবসন্নবর্ত্মাঽতিস্থূলবর্ত্মাঽতিপিঞ্জরঃ | নীলঃশ্যাবোঽতিপিডকো রক্তঃ কৃষ্ণোঽতিপূতিকঃ||২৪|| রোপ্যঃ কুম্ভীমুখশ্চেতি প্রদুষ্টা দ্বাদশ ব্রণাঃ| চতুর্বিংশতিরুদ্দিষ্টা দোষাঃ কল্পান্তরেণ বৈ||২৫||
श्वेतोऽवसन्नवर्त्माऽतिस्थूलवर्त्माऽतिपिञ्जरः | नीलःश्यावोऽतिपिडको रक्तः कृष्णोऽतिपूतिकः||२४|| रोप्यः कुम्भीमुखश्चेति प्रदुष्टा द्वादश व्रणाः| चतुर्विंशतिरुद्दिष्टा दोषाः कल्पान्तरेण वै||२५||
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Adhikarana 11 (26) · Śloka 26
ত্বক্সিরামাংসমেদোঽস্থিস্নাযুমর্মান্তরাশ্রযাঃ| ব্রণস্থানানি নির্দিষ্টান্যষ্টাবেতানি সঙ্গ্রহে||২৬||
त्वक्सिरामांसमेदोऽस्थिस्नायुमर्मान्तराश्रयाः| व्रणस्थानानि निर्दिष्टान्यष्टावेतानि सङ्ग्रहे||२६||
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Adhikarana 12 (27) · Śloka 27
সর্পিস্তৈলবসাপূযরক্তশ্যাবাম্লপূতিকাঃ| ব্রণানাং ব্রণগন্ধজ্ঞৈরষ্টৌ গন্ধাঃ প্রকীর্তিতাঃ||২৭||
सर्पिस्तैलवसापूयरक्तश्यावाम्लपूतिकाः| व्रणानां व्रणगन्धज्ञैरष्टौ गन्धाः प्रकीर्तिताः||२७||
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Adhikarana 13 (28-30) · Śloka 31
লসীকাজলপূযাসৃগ্ঘারিদ্রারুণপিঞ্জরাঃ| কষাযনীলহরিতস্নিগ্ধরূক্ষসিতাসিতাঃ||২৮|| ইতি রূপৈঃ সমুদ্দিষ্টা ব্রণস্রাবাশ্চতুর্দশ| বিসর্পঃ পক্ষঘাতশ্চ সিরাস্তম্ভোঽপতানকঃ||২৯|| মোহোন্মাদব্রণরুজো জ্বরস্তৃষ্ণা হনুগ্রহঃ| কাসশ্ছর্দিরতীসারো হিক্কা শ্বাসঃ সবেপথুঃ||৩০|| ষোডশোপদ্রবাঃ প্রোক্তা ব্রণানাং ব্রণচিন্তকৈঃ|৩১|
लसीकाजलपूयासृग्घारिद्रारुणपिञ्जराः| कषायनीलहरितस्निग्धरूक्षसितासिताः||२८|| इति रूपैः समुद्दिष्टा व्रणस्रावाश्चतुर्दश| विसर्पः पक्षघातश्च सिरास्तम्भोऽपतानकः||२९|| मोहोन्मादव्रणरुजो ज्वरस्तृष्णा हनुग्रहः| कासश्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः||३०|| षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणानां व्रणचिन्तकैः|३१|
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Adhikarana 14 (31-35) · Śloka 35
স্নাযুক্লেদাত্সিরাক্লেদাদ্গাম্ভীর্যাত্কৃমিভক্ষণাত্ ||৩১|| অস্থিভেদাত্ সশল্যত্বাত্ সবিষত্বাচ্চ সর্পণাত্| নখকাষ্ঠপ্রভেদাচ্চ চর্মলোমাতিঘট্টনাত্ ||৩২|| মিথ্যাবন্ধাদতি স্নেহাদতিভৈষজ্যকর্ষণাত্| অজীর্ণাদতিভুক্তাচ্চ বিরুদ্ধাসাত্ম্যভোজনাত্||৩৩|| শোকাত্ ক্রোধাদ্দিবাস্বপ্নাদ্ব্যাযামান্মৈথুনাত্তথা| ব্রণা ন প্রশমং যান্তি নিষ্ক্রিযত্বাচ্চ দেহিনাম্||৩৪|| পরিস্রাবাচ্চ গন্ধাচ্চ দোষাচ্চোপদ্রবৈঃ সহ| ব্রণানাং বহুদোষাণাং কৃচ্ছ্রত্বং চোপজাযতে||৩৫||
स्नायुक्लेदात्सिराक्लेदाद्गाम्भीर्यात्कृमिभक्षणात् ||३१|| अस्थिभेदात् सशल्यत्वात् सविषत्वाच्च सर्पणात्| नखकाष्ठप्रभेदाच्च चर्मलोमातिघट्टनात् ||३२|| मिथ्याबन्धादति स्नेहादतिभैषज्यकर्षणात्| अजीर्णादतिभुक्ताच्च विरुद्धासात्म्यभोजनात्||३३|| शोकात् क्रोधाद्दिवास्वप्नाद्व्यायामान्मैथुनात्तथा| व्रणा न प्रशमं यान्ति निष्क्रियत्वाच्च देहिनाम्||३४|| परिस्रावाच्च गन्धाच्च दोषाच्चोपद्रवैः सह| व्रणानां बहुदोषाणां कृच्छ्रत्वं चोपजायते||३५||
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Adhikarana 15 (36-37) · Śloka 37
ত্বঙ্মাংসজঃ সুখে দেশে তরুণস্যানুপদ্রবঃ| ধীমতোঽভিনবঃ কালে সুখসাধ্যঃ স্মৃতো ব্রণঃ||৩৬|| গুণৈরন্যতমৈর্হীনস্ততঃ কৃচ্ছ্রো ব্রণঃ স্মৃতঃ| সর্বৈর্বিহীনো বিজ্ঞেযস্ত্বসাধ্যো নিরুপক্রমঃ ||৩৭||
त्वङ्मांसजः सुखे देशे तरुणस्यानुपद्रवः| धीमतोऽभिनवः काले सुखसाध्यः स्मृतो व्रणः||३६|| गुणैरन्यतमैर्हीनस्ततः कृच्छ्रो व्रणः स्मृतः| सर्वैर्विहीनो विज्ञेयस्त्वसाध्यो निरुपक्रमः ||३७||
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Adhikarana 16 (38) · Śloka 39
ব্রণানামাদিতঃ কার্যং যথাসন্নং বিশোধনম্| ঊর্ধ্বভাগৈরধোভাগৈঃ শস্ত্রৈর্বস্তিভিরেব চ||৩৮|| সদ্যঃ শুদ্ধশরীরাণাং প্রশমং যান্তি হি ব্রণাঃ|৩৯|
व्रणानामादितः कार्यं यथासन्नं विशोधनम्| ऊर्ध्वभागैरधोभागैः शस्त्रैर्बस्तिभिरेव च||३८|| सद्यः शुद्धशरीराणां प्रशमं यान्ति हि व्रणाः|३९|
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Adhikarana 17 (39-43) · Śloka 43
যথাক্রমমতশ্চোর্ধ্বং শৃণু সর্বানুপক্রমান্||৩৯|| শোফঘ্নং ষড্বিধং চৈব শস্ত্রকর্মাবপীডনম্| নির্বাপণং সসন্ধানং স্বেদঃ শমনমেষণম্||৪০|| শোধনৌ রোপণীযৌ চ কষাযৌ সপ্রলেপনৌ| দ্বে তৈলে তদ্গুণে পত্রং ছাদনে দ্বে চ বন্ধনে||৪১|| ভোজ্যমুত্সাদনং দাহো দ্বিবিধঃ সাবসাদনঃ| কাঠিন্যমার্দবকরে ধূপনালেপনে শুভে||৪২|| ব্রণাবচূর্ণনং বর্ণ্যং রোপণং লোমরোহণম্| ইতি ষট্ত্রিংশদুদ্দিষ্টা ব্রণানাং সমুপক্রমাঃ||৪৩||
यथाक्रममतश्चोर्ध्वं शृणु सर्वानुपक्रमान्||३९|| शोफघ्नं षड्विधं चैव शस्त्रकर्मावपीडनम्| निर्वापणं ससन्धानं स्वेदः शमनमेषणम्||४०|| शोधनौ रोपणीयौ च कषायौ सप्रलेपनौ| द्वे तैले तद्गुणे पत्रं छादने द्वे च बन्धने||४१|| भोज्यमुत्सादनं दाहो द्विविधः सावसादनः| काठिन्यमार्दवकरे धूपनालेपने शुभे||४२|| व्रणावचूर्णनं वर्ण्यं रोपणं लोमरोहणम्| इति षट्त्रिंशदुद्दिष्टा व्रणानां समुपक्रमाः||४३||
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Adhikarana 18 (44-48) · Śloka 48
পূর্বরূপং ভিষগ্বুদ্ধ্বা ব্রণানাং শোফমাদিতঃ| রক্তাবসেচনং কুর্যাদজাতব্রণশান্তযে||৪৪|| শোধযেদ্বহুদোষাংস্তু স্বল্পদোষান্ বিলঙ্ঘযেত্| পূর্বং কষাযসর্পির্ভির্জযেদ্বা মারুতোত্তরান্||৪৫|| ন্যগ্রোধোদুম্বরাশ্বত্থপ্লক্ষবেতসবল্কলৈঃ| সসর্পিষ্কৈঃ প্রলেপঃ স্যাচ্ছোফনির্বাপণঃ পরম্||৪৬|| বিজযা মধুকং বীরা বিসগ্রন্থিঃ শতাবরী| নীলোত্পলং নাগপুষ্পং প্রদেহঃ স্যাত্ সচন্দনঃ||৪৭|| সক্তবো মধুকং সর্পিঃ প্রদেহঃ স্যাত্ সশর্করঃ| অবিদাহীনি চান্নানি শোফে ভেষজমুত্তমম্||৪৮||
पूर्वरूपं भिषग्बुद्ध्वा व्रणानां शोफमादितः| रक्तावसेचनं कुर्यादजातव्रणशान्तये||४४|| शोधयेद्बहुदोषांस्तु स्वल्पदोषान् विलङ्घयेत्| पूर्वं कषायसर्पिर्भिर्जयेद्वा मारुतोत्तरान्||४५|| न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षवेतसवल्कलैः| ससर्पिष्कैः प्रलेपः स्याच्छोफनिर्वापणः परम्||४६|| विजया मधुकं वीरा बिसग्रन्थिः शतावरी| नीलोत्पलं नागपुष्पं प्रदेहः स्यात् सचन्दनः||४७|| सक्तवो मधुकं सर्पिः प्रदेहः स्यात् सशर्करः| अविदाहीनि चान्नानि शोफे भेषजमुत्तमम्||४८||
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Adhikarana 19 (49-54) · Śloka 54
স চেদেবমুপক্রান্তঃ শোফো ন প্রশমং ব্রজেত্| তস্যোপনাহৈঃ পক্বস্য পাটনং হিতমুচ্যতে||৪৯|| তৈলেন সর্পিষা বাঽপি তাভ্যাং বা সক্তুপিণ্ডিকা| সুখোষ্ণা শোফপাকার্থমুপনাহঃ প্রশস্যতে||৫০|| সতিলা সাতসীবীজা দধ্যম্লা সক্তুপিণ্ডিকা| সকিণ্বকুষ্ঠলবণা শস্তা স্যাদুপনাহনে||৫১|| রুগ্দাহরাগতোদৈশ্চ বিদগ্ধং শোফমাদিশেত্| জলবস্তিসমস্পর্শং সম্পক্বং পীডিতোন্নতম্||৫২|| উমাঽথো গুগ্গুলুঃ সৌধং পযো দক্ষকপোতযোঃ| বিট্ পলাশভবঃ ক্ষারো হেমক্ষীরী মুকূলকঃ||৫৩|| ইত্যুক্তো ভেষজগণঃ পক্বশোথপ্রভেদনঃ| সুকুমারস্য, কৃচ্ছ্রস্য শস্ত্রং তু পরমুচ্যতে||৫৪||
स चेदेवमुपक्रान्तः शोफो न प्रशमं व्रजेत्| तस्योपनाहैः पक्वस्य पाटनं हितमुच्यते||४९|| तैलेन सर्पिषा वाऽपि ताभ्यां वा सक्तुपिण्डिका| सुखोष्णा शोफपाकार्थमुपनाहः प्रशस्यते||५०|| सतिला सातसीबीजा दध्यम्ला सक्तुपिण्डिका| सकिण्वकुष्ठलवणा शस्ता स्यादुपनाहने||५१|| रुग्दाहरागतोदैश्च विदग्धं शोफमादिशेत्| जलबस्तिसमस्पर्शं सम्पक्वं पीडितोन्नतम्||५२|| उमाऽथो गुग्गुलुः सौधं पयो दक्षकपोतयोः| विट् पलाशभवः क्षारो हेमक्षीरी मुकूलकः||५३|| इत्युक्तो भेषजगणः पक्वशोथप्रभेदनः| सुकुमारस्य, कृच्छ्रस्य शस्त्रं तु परमुच्यते||५४||
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Adhikarana 20 (55) · Śloka 55
পাটনং ব্যধনং চৈব ছেদনং লেপনং তথা| প্রচ্ছনং সীবনং চৈব ষড্বিধং শস্ত্রকর্ম তত্||৫৫||
पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेपनं तथा| प्रच्छनं सीवनं चैव षड्विधं शस्त्रकर्म तत्||५५||
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Adhikarana 21 (56-60) · Śloka 61
নাডীব্রণাঃ পক্বশোথাস্তথা ক্ষতগুদোদরম্| অন্তঃশল্যাশ্চ যে শোফাঃ পাট্যাস্তে তদ্বিধাশ্চ যে||৫৬|| দকোদরাণি সম্পক্বা গুল্মা যে যে চ রক্তজাঃ| ব্যধ্যাঃ শোণিতরোগাশ্চ বিসর্পপিডকাদযঃ||৫৭|| উদ্বৃত্তান্ স্থূলপর্যন্তানুত্সন্নান্ কঠিণান্ ব্রণান্| অর্শঃপ্রভৃত্যধীমাংসং ছেদনেনোপপাদযেত্||৫৮|| কিলাসানি সকুষ্ঠানি লিখেল্লেখ্যানি বুদ্ধিমান্| বাতাসৃগ্গ্রন্থিপিডকাঃ সকোঠা রক্তমণ্ডলম্||৫৯|| কুষ্ঠান্যভিহতং চাঙ্গং শোথাংশ্চ প্রচ্ছযেদ্ভিষক্| সীব্যং কুক্ষ্যুদরাদ্যং তু গম্ভীরং যদ্বিপাটিতম্||৬০|| ইতি ষড্বিধমুদ্দিষ্টং শস্ত্রকর্ম মনীষিভিঃ|৬১|
नाडीव्रणाः पक्वशोथास्तथा क्षतगुदोदरम्| अन्तःशल्याश्च ये शोफाः पाट्यास्ते तद्विधाश्च ये||५६|| दकोदराणि सम्पक्वा गुल्मा ये ये च रक्तजाः| व्यध्याः शोणितरोगाश्च विसर्पपिडकादयः||५७|| उद्वृत्तान् स्थूलपर्यन्तानुत्सन्नान् कठिणान् व्रणान्| अर्शःप्रभृत्यधीमांसं छेदनेनोपपादयेत्||५८|| किलासानि सकुष्ठानि लिखेल्लेख्यानि बुद्धिमान्| वातासृग्ग्रन्थिपिडकाः सकोठा रक्तमण्डलम्||५९|| कुष्ठान्यभिहतं चाङ्गं शोथांश्च प्रच्छयेद्भिषक्| सीव्यं कुक्ष्युदराद्यं तु गम्भीरं यद्विपाटितम्||६०|| इति षड्विधमुद्दिष्टं शस्त्रकर्म मनीषिभिः|६१|
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Adhikarana 22 (61-62) · Śloka 62
সূক্ষ্মাননাঃ কোষবন্তো যে ব্রণাস্তান্প্রপীডযেত্||৬১|| কলাযাশ্চ মসূরাশ্চ গোধূমাঃ সহরেণবঃ| কল্কীকৃতাঃ প্রশস্যন্তে নিঃস্নেহা ব্রণপীডনে||৬২||
सूक्ष्माननाः कोषवन्तो ये व्रणास्तान्प्रपीडयेत्||६१|| कलायाश्च मसूराश्च गोधूमाः सहरेणवः| कल्कीकृताः प्रशस्यन्ते निःस्नेहा व्रणपीडने||६२||
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Adhikarana 23 (63-64) · Śloka 65
শাল্মলীত্বগ্বলামূলং তথা ন্যগ্রোধপল্লবাঃ| ন্যগ্রোধাদিকমুদ্দিষ্টং বলাদিকমথাপি বা||৬৩|| আলেপনং নির্বপণং তদ্বিদ্যাত্তৈশ্চ সেচনম্| সর্পিষা শতধৌতেন পযসা মধুকাম্বুনা||৬৪|| নির্বাপযেত্ সুশীতেন রক্তপিত্তোত্তরান্ ব্রণান্|৬৫|
शाल्मलीत्वग्बलामूलं तथा न्यग्रोधपल्लवाः| न्यग्रोधादिकमुद्दिष्टं बलादिकमथापि वा||६३|| आलेपनं निर्वपणं तद्विद्यात्तैश्च सेचनम्| सर्पिषा शतधौतेन पयसा मधुकाम्बुना||६४|| निर्वापयेत् सुशीतेन रक्तपित्तोत्तरान् व्रणान्|६५|
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Adhikarana 24 (65-67) · Śloka 68
লম্বানি ব্রণমাংসানি প্রলিপ্য মধুসর্পিষা||৬৫|| সন্দধীত সমং বৈদ্যো বন্ধনৈশ্চোপপাদযেত্| তান্সমান্সুস্থিতাঞ্জ্ঞাত্বা ফলিনীলোধ্রকট্ফলৈঃ||৬৬|| সমঙ্গাধাতকীযুক্তৈশ্চূর্ণিতৈরবচূর্ণযেত্| পঞ্চবল্কলচূর্ণৈর্বা শুক্তিচূর্ণসমাযুতৈঃ||৬৭|| ধাতকীলোধ্রচূর্ণৈর্বা তথা রোহন্তি তে ব্রণাঃ|৬৮|
लम्बानि व्रणमांसानि प्रलिप्य मधुसर्पिषा||६५|| सन्दधीत समं वैद्यो बन्धनैश्चोपपादयेत्| तान्समान्सुस्थिताञ्ज्ञात्वा फलिनीलोध्रकट्फलैः||६६|| समङ्गाधातकीयुक्तैश्चूर्णितैरवचूर्णयेत्| पञ्चवल्कलचूर्णैर्वा शुक्तिचूर्णसमायुतैः||६७|| धातकीलोध्रचूर्णैर्वा तथा रोहन्ति ते व्रणाः|६८|
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Adhikarana 25 (68-71) · Śloka 72
অস্থিভগ্নং চ্যুতং সন্ধিং সন্দধীত সমং পুনঃ||৬৮|| সমেন সমমঙ্গেন কৃত্বাঽন্যেন বিচক্ষণঃ| স্থিরৈঃ কবলিকাবন্ধৈঃ কুশিকাভিশ্চ সংস্থিতম্||৬৯|| পট্টৈঃ প্রভূতসর্পিষ্কৈর্বধ্নীযাদচলং সুখম্| অবিদাহিভিরন্নৈশ্চ পৈষ্টিকৈস্তমুপাচরেত্||৭০|| গ্লানির্হি ন হিতা তস্য সন্ধিবিশ্লেষকারিকা| বিচ্যুতাভিহতাঙ্গানাং বিসর্পাদীনুপদ্রবান্||৭১|| উপাচরেদ্যথাকালং কালজ্ঞঃ স্বাচ্চিকিত্সিতাত্|৭২|
अस्थिभग्नं च्युतं सन्धिं सन्दधीत समं पुनः||६८|| समेन सममङ्गेन कृत्वाऽन्येन विचक्षणः| स्थिरैः कवलिकाबन्धैः कुशिकाभिश्च संस्थितम्||६९|| पट्टैः प्रभूतसर्पिष्कैर्बध्नीयादचलं सुखम्| अविदाहिभिरन्नैश्च पैष्टिकैस्तमुपाचरेत्||७०|| ग्लानिर्हि न हिता तस्य सन्धिविश्लेषकारिका| विच्युताभिहताङ्गानां विसर्पादीनुपद्रवान्||७१|| उपाचरेद्यथाकालं कालज्ञः स्वाच्चिकित्सितात्|७२|
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Adhikarana 26 (72-79) · Śloka 79
শুষ্কা মহারুজঃ স্তব্ধা যে ব্রণা মারুতোত্তরাঃ| স্বেদ্যাঃ সঙ্করকল্পেন তে স্যুঃ কৃশরপাযসৈঃ||৭২|| গ্রাম্যবৈলাম্বুজানূপৈর্বৈশবারৈশ্চ সংস্কৃতৈঃ| উত্কারিকাভিশ্চোষ্ণাভিঃ সুখী স্যাদ্ব্রণিতস্তথা||৭৩|| সদাহা বেদনাবন্তো যে ব্রণা মারুতোত্তরাঃ| তেষামুমাং তিলাংশ্চৈব ভৃষ্টান্ পযসি নির্বৃতান্||৭৪|| তেনৈব পযসা পিষ্ট্বা কুর্যাদালেপনং ভিষক্| বলা গুডূচী মধুকং পৃশ্নিপর্ণী শতাবরী||৭৫|| জীবন্তী শর্করা ক্ষীরং তৈলং মত্স্যবসা ঘৃতম্| সংসিদ্ধা সমধূচ্ছিষ্টা শূলঘ্নী স্নেহশর্করা||৭৬|| দ্বিপঞ্চমূলক্বথিতেনাম্ভসা পযসাঽথবা | সর্পিষা বা সতৈলেন কোষ্ণেন পরিষেচযেত্||৭৭|| যবচূর্ণং সমধুকং সতিলং সহ সর্পিষা| দদ্যাদালেপনং কোষ্ণং দাহশূলোপশান্তযে||৭৮|| উপনাহশ্চ কর্তব্যঃ সতিলো মুদ্গপাযসঃ| রুগ্দাহযোঃ প্রশমনো ব্রণেষ্বেষ বিধির্হিতঃ||৭৯||
शुष्का महारुजः स्तब्धा ये व्रणा मारुतोत्तराः| स्वेद्याः सङ्करकल्पेन ते स्युः कृशरपायसैः||७२|| ग्राम्यबैलाम्बुजानूपैर्वैशवारैश्च संस्कृतैः| उत्कारिकाभिश्चोष्णाभिः सुखी स्याद्व्रणितस्तथा||७३|| सदाहा वेदनावन्तो ये व्रणा मारुतोत्तराः| तेषामुमां तिलांश्चैव भृष्टान् पयसि निर्वृतान्||७४|| तेनैव पयसा पिष्ट्वा कुर्यादालेपनं भिषक्| बला गुडूची मधुकं पृश्निपर्णी शतावरी||७५|| जीवन्ती शर्करा क्षीरं तैलं मत्स्यवसा घृतम्| संसिद्धा समधूच्छिष्टा शूलघ्नी स्नेहशर्करा||७६|| द्विपञ्चमूलक्वथितेनाम्भसा पयसाऽथवा | सर्पिषा वा सतैलेन कोष्णेन परिषेचयेत्||७७|| यवचूर्णं समधुकं सतिलं सह सर्पिषा| दद्यादालेपनं कोष्णं दाहशूलोपशान्तये||७८|| उपनाहश्च कर्तव्यः सतिलो मुद्गपायसः| रुग्दाहयोः प्रशमनो व्रणेष्वेष विधिर्हितः||७९||
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Adhikarana 27 (80-82) · Śloka 82
সূক্ষ্মাননা বহুস্রাবাঃ কোষবন্তশ্চ যে ব্রণাঃ| ন চ মর্মাশ্রিতাস্তেষামেষণং হিতমুচ্যতে||৮০|| দ্বিবিধামেষণীং বিদ্যান্মৃদ্বীং চ কঠিনামপি| ঔদ্ভিদৈর্মৃদুভির্নালৈর্লোহানাং বা শলাকযা||৮১|| গম্ভীরে মাংসলে দেশে পাট্যং লৌহশলাকযা| এষ্যং বিদ্যাদ্ব্রণং নালৈর্বিপরীতমতো ভিষক্||৮২||
सूक्ष्मानना बहुस्रावाः कोषवन्तश्च ये व्रणाः| न च मर्माश्रितास्तेषामेषणं हितमुच्यते||८०|| द्विविधामेषणीं विद्यान्मृद्वीं च कठिनामपि| औद्भिदैर्मृदुभिर्नालैर्लोहानां वा शलाकया||८१|| गम्भीरे मांसले देशे पाट्यं लौहशलाकया| एष्यं विद्याद्व्रणं नालैर्विपरीतमतो भिषक्||८२||
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Adhikarana 28 (83-85) · Śloka 85
পূতিগন্ধান্ বিবর্ণাংশ্চ বহুস্রাবান্মহারুজঃ| ব্রণানশুদ্ধান্ বিজ্ঞায শোধনৈঃ সমুপাচরেত্||৮৩|| ত্রিফলা খদিরো দার্বী ন্যগ্রোধাদির্বলা কুশঃ| নিম্বকোলকপত্রাণি কষাযাঃ শোধনা মতাঃ||৮৪|| তিলকল্কঃ সলবণো দ্বে হরিদ্রে ত্রিবৃদ্ধৃতম্| মধুকং নিম্বপত্রাণি প্রলেপো ব্রণশোধনঃ||৮৫||
पूतिगन्धान् विवर्णांश्च बहुस्रावान्महारुजः| व्रणानशुद्धान् विज्ञाय शोधनैः समुपाचरेत्||८३|| त्रिफला खदिरो दार्वी न्यग्रोधादिर्बला कुशः| निम्बकोलकपत्राणि कषायाः शोधना मताः||८४|| तिलकल्कः सलवणो द्वे हरिद्रे त्रिवृद्धृतम्| मधुकं निम्बपत्राणि प्रलेपो व्रणशोधनः||८५||
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Adhikarana 29 (86-94) · Śloka 94
নাতিরক্তো নাতিপাণ্ডুর্নাতিশ্যাবো ন চাতিরুক্| ন চোত্সন্নো ন চোত্সঙ্গী শুদ্ধো রোপ্যঃ পরং ব্রণঃ||৮৬|| ন্যগ্রোধোদুম্বরাশ্বত্থকদম্বপ্লক্ষবেতসাঃ| করবীরার্ককুটজাঃ কষাযা ব্রণরোপণাঃ||৮৭|| চন্দনং পদ্মকিঞ্জল্কং দার্বীত্বঙ্নীলমুত্পলম্| মেদে মূর্বা সমঙ্গা চ যষ্ট্যাহ্বং ব্রণরোপণম্||৮৮|| প্রপৌণ্ডরীকং জীবন্তী গোজিহ্বা ধাতকী বলা| রোপণং সতিলং দদ্যাত্ প্রলেপং সঘৃতং ব্রণে||৮৯|| কম্পিল্লকং বিডঙ্গানি বত্সকং ত্রিফলাং বলাম্| পটোলং পিচুমর্দং চ লোধ্রং মুস্তং প্রিযঙ্গুকম্||৯০|| খদিরং ধাতকীং সর্জমেলামগুরুচন্দনে| পিষ্ট্বা সাধ্যং ভবেত্তৈলং তত্ পরং ব্রণরোপণম্||৯১|| প্রপৌণ্ডরীকং মধুকং কাকোল্যৌ দ্বে চ চন্দনে| সিদ্ধমেতৈঃ সমৈস্তৈলং পরং স্যাদ্ব্রণরোপণম্||৯২|| দূর্বাস্বরসসিদ্ধং বা তৈলং কম্পিল্লকেন বা| দার্বীত্বচশ্চ কল্কেন প্রধানং ব্রণরোপণম্||৯৩|| যেনৈব বিধিনা তৈলং ঘৃতং তেনৈব সাধযেত্| রক্তপিত্তোত্তরং দৃষ্ট্বা রোপণীযং ব্রণং ভিষক্||৯৪||
नातिरक्तो नातिपाण्डुर्नातिश्यावो न चातिरुक्| न चोत्सन्नो न चोत्सङ्गी शुद्धो रोप्यः परं व्रणः||८६|| न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थकदम्बप्लक्षवेतसाः| करवीरार्ककुटजाः कषाया व्रणरोपणाः||८७|| चन्दनं पद्मकिञ्जल्कं दार्वीत्वङ्नीलमुत्पलम्| मेदे मूर्वा समङ्गा च यष्ट्याह्वं व्रणरोपणम्||८८|| प्रपौण्डरीकं जीवन्ती गोजिह्वा धातकी बला| रोपणं सतिलं दद्यात् प्रलेपं सघृतं व्रणे||८९|| कम्पिल्लकं विडङ्गानि वत्सकं त्रिफलां बलाम्| पटोलं पिचुमर्दं च लोध्रं मुस्तं प्रियङ्गुकम्||९०|| खदिरं धातकीं सर्जमेलामगुरुचन्दने| पिष्ट्वा साध्यं भवेत्तैलं तत् परं व्रणरोपणम्||९१|| प्रपौण्डरीकं मधुकं काकोल्यौ द्वे च चन्दने| सिद्धमेतैः समैस्तैलं परं स्याद्व्रणरोपणम्||९२|| दूर्वास्वरससिद्धं वा तैलं कम्पिल्लकेन वा| दार्वीत्वचश्च कल्केन प्रधानं व्रणरोपणम्||९३|| येनैव विधिना तैलं घृतं तेनैव साधयेत्| रक्तपित्तोत्तरं दृष्ट्वा रोपणीयं व्रणं भिषक्||९४||
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Adhikarana 30 (95-96) · Śloka 96
কদম্বার্জুননিম্বানাং পাটল্যাঃ পিপ্পলস্য চ| ব্রণপ্রচ্ছাদনে বিদ্বান্ পত্রাণ্যর্কস্য চাদিশেত্||৯৫|| বার্ক্ষোঽথবাঽঽজিনঃ ক্ষৌমঃ পট্টো ব্রণহিতঃ স্মৃতঃ| বন্ধশ্চ দ্বিবিধঃ শস্তো ব্রণানাং সব্যদক্ষিণঃ||৯৬||
कदम्बार्जुननिम्बानां पाटल्याः पिप्पलस्य च| व्रणप्रच्छादने विद्वान् पत्राण्यर्कस्य चादिशेत्||९५|| वार्क्षोऽथवाऽऽजिनः क्षौमः पट्टो व्रणहितः स्मृतः| बन्धश्च द्विविधः शस्तो व्रणानां सव्यदक्षिणः||९६||
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Adhikarana 31 (97-100) · Śloka 100
লবণাম্লকটূষ্ণানি বিদাহীনি গুরূণি চ| বর্জযেদন্নপানানি ব্রণী মৈথুনমেব চ||৯৭|| নাতিশীতগুরুস্নিগ্ধমবিদাহি যথাব্রণম্| অন্নপানং ব্রণহিতং হিতং চাস্বপনং দিবা||৯৮|| স্তন্যানি জীবনীযানি বৃংহণীযানি যানি চ| উত্সাদনার্থং নিম্নানাং ব্রণানাং তানি কল্পযেত্||৯৯|| ভূর্জগ্রন্থ্যশ্মকাসীসমধোভাগানি গুগ্গুলুঃ| ব্রণাবসাদনং তদ্বত্ কলবিঙ্ককপোতবিট্||১০০||
लवणाम्लकटूष्णानि विदाहीनि गुरूणि च| वर्जयेदन्नपानानि व्रणी मैथुनमेव च||९७|| नातिशीतगुरुस्निग्धमविदाहि यथाव्रणम्| अन्नपानं व्रणहितं हितं चास्वपनं दिवा||९८|| स्तन्यानि जीवनीयानि बृंहणीयानि यानि च| उत्सादनार्थं निम्नानां व्रणानां तानि कल्पयेत्||९९|| भूर्जग्रन्थ्यश्मकासीसमधोभागानि गुग्गुलुः| व्रणावसादनं तद्वत् कलविङ्ककपोतविट्||१००||
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Adhikarana 32 (101-106) · Śloka 106
রুধিরেঽতিপ্রবৃত্তে তু চ্ছিন্নে চ্ছেদ্যেঽধিমাংসকে| কফগ্রন্থিষু গণ্ডেষু বাতস্তম্ভানিলার্তিষু||১০১|| গূঢপূযলসীকেষু গম্ভীরেষু স্থিরেষু চ| কপ্তেষু চাঙ্গদেশেষু কর্মাগ্নেঃ সম্প্রশস্যতে||১০২|| মধূচ্ছিষ্টেন তৈলেন মজ্জক্ষৌদ্রবসাঘৃতৈঃ| তপ্তৈর্বা বিবিধৈর্লোহৈর্দহেদ্দাহবিশেষবিত্||১০৩|| রূক্ষাণাং সুকুমারাণাং গম্ভীরান্মারুতোত্তরান্| দহেত্ স্নেহমধূচ্ছিষ্টৈর্লোহৈঃ ক্ষৌদ্রৈস্ততোঽন্যথা||১০৪|| বালদুর্বলবৃদ্ধানাং গর্ভিণ্যা রক্তপিত্তিনাম্| তৃষ্ণাজ্বরপরীতানামবলানাং বিষাদিনাম্||১০৫|| নাগ্নিকর্মোপদেষ্টব্যং স্নাযুমর্মব্রণেষু চ| সবিষেষু চ শল্যেষু নেত্রকুষ্ঠব্রণেষু চ||১০৬||
रुधिरेऽतिप्रवृत्ते तु च्छिन्ने च्छेद्येऽधिमांसके| कफग्रन्थिषु गण्डेषु वातस्तम्भानिलार्तिषु||१०१|| गूढपूयलसीकेषु गम्भीरेषु स्थिरेषु च| कप्तेषु चाङ्गदेशेषु कर्माग्नेः सम्प्रशस्यते||१०२|| मधूच्छिष्टेन तैलेन मज्जक्षौद्रवसाघृतैः| तप्तैर्वा विविधैर्लोहैर्दहेद्दाहविशेषवित्||१०३|| रूक्षाणां सुकुमाराणां गम्भीरान्मारुतोत्तरान्| दहेत् स्नेहमधूच्छिष्टैर्लोहैः क्षौद्रैस्ततोऽन्यथा||१०४|| बालदुर्बलवृद्धानां गर्भिण्या रक्तपित्तिनाम्| तृष्णाज्वरपरीतानामबलानां विषादिनाम्||१०५|| नाग्निकर्मोपदेष्टव्यं स्नायुमर्मव्रणेषु च| सविषेषु च शल्येषु नेत्रकुष्ठव्रणेषु च||१०६||
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Adhikarana 33 (107-109) · Śloka 109
রোগদোষবলাপেক্ষী মাত্রাকালাগ্নিকোবিদঃ| শস্ত্রকর্মাগ্নিকৃত্যেষু ক্ষারমপ্যবচারযেত্||১০৭|| কঠিনত্বং ব্রণা যান্তি গন্ধৈঃ সারৈশ্চ ধূপিতাঃ| সর্পির্মজ্জবসাধূপৈঃ শৈথিল্যং যান্তি হি ব্রণাঃ||১০৮|| রুজঃ স্রাবাশ্চ গন্ধাশ্চ কৃমযশ্চ ব্রণাশ্রিতাঃ| শৈথিল্যং মার্দবং চাপি ধূপনেনোপশাম্যতি||১০৯||
रोगदोषबलापेक्षी मात्राकालाग्निकोविदः| शस्त्रकर्माग्निकृत्येषु क्षारमप्यवचारयेत्||१०७|| कठिनत्वं व्रणा यान्ति गन्धैः सारैश्च धूपिताः| सर्पिर्मज्जवसाधूपैः शैथिल्यं यान्ति हि व्रणाः||१०८|| रुजः स्रावाश्च गन्धाश्च कृमयश्च व्रणाश्रिताः| शैथिल्यं मार्दवं चापि धूपनेनोपशाम्यति||१०९||
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Adhikarana 34 (110-112) · Śloka 112
লোধ্রন্যগ্রোধশুঙ্গানি খদিরস্ত্রিফলা ঘৃতম্| প্রলেপো ব্রণশৈথিল্যসৌকুমার্যপ্রসাধনঃ||১১০|| সরুজঃ কঠিনাঃ স্তব্ধা নিরাস্রাবাশ্চ যে ব্রণাঃ| যবচূর্ণৈঃ সসর্পিষ্কৈর্বহুশস্তান্ প্রলেপযেত্||১১১|| মুদ্গষষ্টিকশালীনাং পাযসৈর্বা যথাক্রমম্| সঘৃতৈর্জীবনীযৈর্বা তর্পযেত্তানভীক্ষ্ণশঃ||১১২||
लोध्रन्यग्रोधशुङ्गानि खदिरस्त्रिफला घृतम्| प्रलेपो व्रणशैथिल्यसौकुमार्यप्रसाधनः||११०|| सरुजः कठिनाः स्तब्धा निरास्रावाश्च ये व्रणाः| यवचूर्णैः ससर्पिष्कैर्बहुशस्तान् प्रलेपयेत्||१११|| मुद्गषष्टिकशालीनां पायसैर्वा यथाक्रमम्| सघृतैर्जीवनीयैर्वा तर्पयेत्तानभीक्ष्णशः||११२||
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Adhikarana 35 (113-119) · Śloka 119
ককুভোদুম্বরাশ্বত্থলোধ্রজাম্ববকট্ফলৈঃ| ত্বচমাশ্বেব গৃহ্ণন্তি ত্বক্চূর্ণৈশ্চূর্ণিতা ব্রণাঃ||১১৩|| মনঃশিলৈলা মঞ্জিষ্ঠা লাক্ষা চ রজনীদ্বযম্| প্রলেপঃ সঘৃতক্ষৌদ্রস্ত্বগ্বিশুদ্ধিকরঃ পরঃ||১১৪|| অযোরজঃ সকাসীসং ত্রিফলাকুসুমানি চ| করোতি লেপঃ কৃষ্ণত্বং সদ্য এব নবত্বচি||১১৫|| কালীযকনতাম্রাস্থিহেমকান্তারসোত্তমৈঃ | লেপঃ সগোমযরসঃ সবর্ণীকরণঃ পরঃ||১১৬|| ধ্যামকাশ্বত্থনিচুলমূলং লাক্ষা সগৈরিকা| সহেমশ্চামৃতাসঙ্গঃ কাসীসং চেতি বর্ণকৃত্||১১৭|| চতুষ্পদানাং ত্বগ্লোমখুরশৃঙ্গাস্থিভস্মনা| তৈলাক্তা চূর্ণিতা ভূমির্ভবেল্লোমবতী পুনঃ||১১৮|| ষোডশোপদ্রবা যে চ ব্রণানাং পরিকীর্তিতাঃ| তেষাং চিকিত্সা নির্দিষ্টা যথাস্বং স্বে চিকিত্সিতে||১১৯||
ककुभोदुम्बराश्वत्थलोध्रजाम्बवकट्फलैः| त्वचमाश्वेव गृह्णन्ति त्वक्चूर्णैश्चूर्णिता व्रणाः||११३|| मनःशिलैला मञ्जिष्ठा लाक्षा च रजनीद्वयम्| प्रलेपः सघृतक्षौद्रस्त्वग्विशुद्धिकरः परः||११४|| अयोरजः सकासीसं त्रिफलाकुसुमानि च| करोति लेपः कृष्णत्वं सद्य एव नवत्वचि||११५|| कालीयकनताम्रास्थिहेमकान्तारसोत्तमैः | लेपः सगोमयरसः सवर्णीकरणः परः||११६|| ध्यामकाश्वत्थनिचुलमूलं लाक्षा सगैरिका| सहेमश्चामृतासङ्गः कासीसं चेति वर्णकृत्||११७|| चतुष्पदानां त्वग्लोमखुरशृङ्गास्थिभस्मना| तैलाक्ता चूर्णिता भूमिर्भवेल्लोमवती पुनः||११८|| षोडशोपद्रवा ये च व्रणानां परिकीर्तिताः| तेषां चिकित्सा निर्दिष्टा यथास्वं स्वे चिकित्सिते||११९||
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Adhikarana 36 (120-121) · Śloka 121
তত্র শ্লোকৌ- দ্বৌ ব্রণৌ ব্রণভেদাশ্চ পরীক্ষা দুষ্টিরেব চ| স্থানানি গন্ধাঃ স্রাবাশ্চ সোপসর্গাঃ ক্রিযাশ্চ যাঃ||১২০|| ব্রণাধিকারে সপ্রশ্নমেতন্নবকমুক্তবান্| মুনির্ব্যাসসমাসাভ্যামগ্নিবেশায ধীমতে||১২১||
तत्र श्लोकौ- द्वौ व्रणौ व्रणभेदाश्च परीक्षा दुष्टिरेव च| स्थानानि गन्धाः स्रावाश्च सोपसर्गाः क्रियाश्च याः||१२०|| व्रणाधिकारे सप्रश्नमेतन्नवकमुक्तवान्| मुनिर्व्याससमासाभ्यामग्निवेशाय धीमते||१२१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 25
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে দৃঢবলসম্পূরিতে চিকিত্সাস্থানে দ্বিব্রণীযচিকিত্সিতং নাম পঞ্চবিংশোঽধ্যাযঃ||২৫||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते दृढबलसम्पूरिते चिकित्सास्थाने द्विव्रणीयचिकित्सितं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः||२५||
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