Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কুষ্ঠচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
View original
अथातः कुष्ठचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কুষ্ঠচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः कुष्ठचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
হেতুং দ্রব্যং লিঙ্গং কুষ্ঠানামাশ্রযং প্রশমনং চ| শৃণ্বগ্নিবেশ! সম্যগ্বিশেষতঃ স্পর্শনঘ্নানাম্||৩||
हेतुं द्रव्यं लिङ्गं कुष्ठानामाश्रयं प्रशमनं च| शृण्वग्निवेश! सम्यग्विशेषतः स्पर्शनघ्नानाम्||३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 3 (4-8) · Śloka 8
বিরোধীন্যন্নপানানি দ্রবস্নিগ্ধগুরূণি চ| ভজতামাগতাং ছর্দিং বেগাংশ্চান্যান্প্রতিঘ্নতাম্||৪|| ব্যাযামমতিসন্তাপমতিভুক্ত্বোপসেবিনাম্| শীতোষ্ণলঙ্ঘনাহারান্ ক্রমং মুক্ত্বা নিষেবিণাম্||৫|| ঘর্মশ্রমভযার্তানাং দ্রুতং শীতাম্বুসেবিনাম্| অজীর্ণাধ্যশিনাং চৈব পঞ্চকর্মাপচারিণাম্||৬|| নবান্নদধিমত্স্যাতিলবণাম্লনিষেবিণাম্| মাষমূলকপিষ্টান্নতিলক্ষীরগুডাশিনাম্||৭|| ব্যবাযং চাপ্যজীর্ণেঽন্নে নিদ্রাং চ ভজতাং দিবা| বিপ্রান্ গুরূন্ ধর্ষযতাং পাপং কর্ম চ কুর্বতাম্||৮||
विरोधीन्यन्नपानानि द्रवस्निग्धगुरूणि च| भजतामागतां छर्दिं वेगांश्चान्यान्प्रतिघ्नताम्||४|| व्यायाममतिसन्तापमतिभुक्त्वोपसेविनाम्| शीतोष्णलङ्घनाहारान् क्रमं मुक्त्वा निषेविणाम्||५|| घर्मश्रमभयार्तानां द्रुतं शीताम्बुसेविनाम्| अजीर्णाध्यशिनां चैव पञ्चकर्मापचारिणाम्||६|| नवान्नदधिमत्स्यातिलवणाम्लनिषेविणाम्| माषमूलकपिष्टान्नतिलक्षीरगुडाशिनाम्||७|| व्यवायं चाप्यजीर्णेऽन्ने निद्रां च भजतां दिवा| विप्रान् गुरून् धर्षयतां पापं कर्म च कुर्वताम्||८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 4 (9-10) · Śloka 10
বাতাদযস্ত্রযো দুষ্টাস্ত্বগ্রক্তং মাংসমম্বু চ| দূষযন্তি স কুষ্ঠানাং সপ্তকো দ্রব্যসঙ্গ্রহঃ||৯|| অতঃ কুষ্ঠানি জাযন্তে সপ্ত চৈকাদশৈব চ| ন চৈকদোষজং কিঞ্চিত্ কুষ্ঠং সমুপলভ্যতে||১০||
वातादयस्त्रयो दुष्टास्त्वग्रक्तं मांसमम्बु च| दूषयन्ति स कुष्ठानां सप्तको द्रव्यसङ्ग्रहः||९|| अतः कुष्ठानि जायन्ते सप्त चैकादशैव च| न चैकदोषजं किञ्चित् कुष्ठं समुपलभ्यते||१०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 5 (11-12) · Śloka 12
স্পর্শাজ্ঞত্বমতিস্বেদো ন বা বৈবর্ণ্যমুন্নতিঃ| কোঠানাং লোমহর্ষশ্চ কণ্ডূস্তোদঃ শ্রমঃ ক্লমঃ||১১|| ব্রণানামধিকং শূলং শীঘ্রোত্পত্তিশ্চিরস্থিতিঃ| দাহঃ সুপ্তাঙ্গতা চেতি কুষ্ঠলক্ষণমগ্রজম্||১২||
स्पर्शाज्ञत्वमतिस्वेदो न वा वैवर्ण्यमुन्नतिः| कोठानां लोमहर्षश्च कण्डूस्तोदः श्रमः क्लमः||११|| व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः| दाहः सुप्ताङ्गता चेति कुष्ठलक्षणमग्रजम्||१२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 6 (13-20) · Śloka 20
অত ঊর্ধ্বমষ্টাদশানাং কুষ্ঠানাং কপালোদুম্বরমণ্ডলর্ষ্যজিহ্বপুণ্ডরীকসিধ্মকাকণকৈককুষ্ঠচর্মাখ্য- কিটিমবিপাদিকালসকদদ্রুচর্মদলপামাবিস্ফোটকশতারুর্বিচর্চিকানাং লক্ষণান্যুপদেক্ষ্যামঃ||১৩|| কৃষ্ণারুণকপালাভং যদ্রূক্ষং পরুষং তনু| কাপালং তোদবহুলং তত্কুষ্ঠং বিষমং স্মৃতম্||১৪|| দাহকণ্ডূরুজারাগপরীতং লোমপিঞ্জরম্| উদুম্বরফলাভাসং কুষ্ঠমৌদুম্বরং বিদুঃ||১৫|| শ্বেতং রক্তং স্থিরং স্ত্যানং স্নিগ্ধমুত্সন্নমণ্ডলম্| কৃচ্ছ্রমন্যোন্যসংসক্তং কুষ্ঠং মণ্ডলমুচ্যতে||১৬|| কর্কশং রক্তপর্যন্তমন্তঃ শ্যাবং সবেদনম্| যদৃষ্যজিহ্বাসংস্থানমৃষ্যজিহ্বং তদুচ্যতে||১৭|| সশ্বেতং রক্তপর্যন্তং পুণ্ডরীকদলোপমম্| সোত্সেধং চ সদাহং চ পুণ্ডরীকং তদুচ্যতে||১৮|| শ্বেতং তাম্রং তনু চ যদ্রজো ঘৃষ্টং বিমুঞ্চতি| অলাবূপুষ্পবর্ণং তত্ সিধ্মং প্রাযেণ চোরসি||১৯|| যত্ কাকণন্তিকাবর্ণমপাকং তীব্রবেদনম্| ত্রিদোষলিঙ্গং তত্ কুষ্ঠং কাকণং নৈব সিধ্যতি||২০|| ইতি সপ্তমহাকুষ্ঠানি|
अत ऊर्ध्वमष्टादशानां कुष्ठानां कपालोदुम्बरमण्डलर्ष्यजिह्वपुण्डरीकसिध्मकाकणकैककुष्ठचर्माख्य- किटिमविपादिकालसकदद्रुचर्मदलपामाविस्फोटकशतारुर्विचर्चिकानां लक्षणान्युपदेक्ष्यामः||१३|| कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु| कापालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम्||१४|| दाहकण्डूरुजारागपरीतं लोमपिञ्जरम्| उदुम्बरफलाभासं कुष्ठमौदुम्बरं विदुः||१५|| श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमण्डलम्| कृच्छ्रमन्योन्यसंसक्तं कुष्ठं मण्डलमुच्यते||१६|| कर्कशं रक्तपर्यन्तमन्तः श्यावं सवेदनम्| यदृष्यजिह्वासंस्थानमृष्यजिह्वं तदुच्यते||१७|| सश्वेतं रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम्| सोत्सेधं च सदाहं च पुण्डरीकं तदुच्यते||१८|| श्वेतं ताम्रं तनु च यद्रजो घृष्टं विमुञ्चति| अलाबूपुष्पवर्णं तत् सिध्मं प्रायेण चोरसि||१९|| यत् काकणन्तिकावर्णमपाकं तीव्रवेदनम्| त्रिदोषलिङ्गं तत् कुष्ठं काकणं नैव सिध्यति||२०|| इति सप्तमहाकुष्ठानि|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 7 (21-26) · Śloka 26
অস্বেদনং মহাবাস্তু যন্মত্স্যশকলোপমম্| তদেককুষ্টং, চর্মাখ্যং বহলং হস্তিচর্মবত্||২১|| শ্যাবং কিণখরস্পর্শং পরুষং কিটিমং স্মৃতম্| বৈপাদিকং পাণিপাদস্ফুটনং তীব্রবেদনম্||২২|| কণ্ডূমদ্ভিঃ সরাগৈশ্চ গণ্ডৈরলসকং চিতম্| সকণ্ডূরাগপিডকং দদ্রুমণ্ডলমুদ্গতম্||২৩|| রক্তং সকণ্ডু সস্ফোটং সরুগ্দলতি চাপি যত্| তচ্চর্মদলমাখ্যাতং সংস্পর্শাসহমুচ্যতে||২৪|| পামাশ্বেতারুণশ্যাবাঃ কণ্ডূলাঃ পিডকা ভৃশম্| স্ফোটাঃ শ্বেতারুণাভাসো বিস্ফোটাঃ স্যুস্তনুত্বচঃ||২৫|| রক্তং শ্যাবং সদাহার্তি শতারুঃ স্যাদ্বহুব্রণম্| সকণ্ডূঃ পিডকা শ্যাবা বহুস্রাবা বিচর্চিকা||২৬|| ইত্যেকাদশ ক্ষুদ্রকুষ্ঠানি|
अस्वेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम्| तदेककुष्टं, चर्माख्यं बहलं हस्तिचर्मवत्||२१|| श्यावं किणखरस्पर्शं परुषं किटिमं स्मृतम्| वैपादिकं पाणिपादस्फुटनं तीव्रवेदनम्||२२|| कण्डूमद्भिः सरागैश्च गण्डैरलसकं चितम्| सकण्डूरागपिडकं दद्रुमण्डलमुद्गतम्||२३|| रक्तं सकण्डु सस्फोटं सरुग्दलति चापि यत्| तच्चर्मदलमाख्यातं संस्पर्शासहमुच्यते||२४|| पामाश्वेतारुणश्यावाः कण्डूलाः पिडका भृशम्| स्फोटाः श्वेतारुणाभासो विस्फोटाः स्युस्तनुत्वचः||२५|| रक्तं श्यावं सदाहार्ति शतारुः स्याद्बहुव्रणम्| सकण्डूः पिडका श्यावा बहुस्रावा विचर्चिका||२६|| इत्येकादश क्षुद्रकुष्ठानि|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 8 (27-30) · Śloka 30
বাতেঽধিকতরে কুষ্ঠং কাপালং মণ্ডলং কফে| পিত্তে ত্বৌদুম্বরং বিদ্যাত্ কাকণং তু ত্রদোষজম্||২৭|| বাতপিত্তে শ্লেষ্মপিত্তে বাতশ্লেষ্মণি চাধিকে| ঋষ্যজিহ্বং পুণ্ডরীকং সিধ্মকুষ্ঠং চ জাযতে||২৮|| চর্মাখ্যমেককুষ্ঠং চ কিটিমং সবিপাদিকম্| কুষ্ঠং চালসকং জ্ঞেযং প্রাযো বাতকফাধিকম্||২৯|| পামা শতারুর্বিস্ফোটং দদ্রুশ্চর্মদলং তথা| পিত্তশ্লেষ্মাধিকং প্রাযঃ কফপ্রাযা বিচর্চিকা||৩০||
वातेऽधिकतरे कुष्ठं कापालं मण्डलं कफे| पित्ते त्वौदुम्बरं विद्यात् काकणं तु त्रदोषजम्||२७|| वातपित्ते श्लेष्मपित्ते वातश्लेष्मणि चाधिके| ऋष्यजिह्वं पुण्डरीकं सिध्मकुष्ठं च जायते||२८|| चर्माख्यमेककुष्ठं च किटिमं सविपादिकम्| कुष्ठं चालसकं ज्ञेयं प्रायो वातकफाधिकम्||२९|| पामा शतारुर्विस्फोटं दद्रुश्चर्मदलं तथा| पित्तश्लेष्माधिकं प्रायः कफप्राया विचर्चिका||३०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 9 (31-32) · Śloka 32
সর্বং ত্রিদোষজং কুষ্ঠং দোষাণাং তু বলাবলম্| যথাস্বৈর্লক্ষণৈর্বুদ্ধ্বা কুষ্ঠানাং ক্রিযতে ক্রিযা||৩১|| দোষস্য যস্য পশ্যেত্ কুষ্ঠেষু বিশেষলিঙ্গমদ্রিক্তম্| তস্যৈব শমং কুর্যাত্ততঃ পরং চানুবন্ধস্য||৩২||
सर्वं त्रिदोषजं कुष्ठं दोषाणां तु बलाबलम्| यथास्वैर्लक्षणैर्बुद्ध्वा कुष्ठानां क्रियते क्रिया||३१|| दोषस्य यस्य पश्येत् कुष्ठेषु विशेषलिङ्गमद्रिक्तम्| तस्यैव शमं कुर्यात्ततः परं चानुबन्धस्य||३२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 10 (33) · Śloka 33
কুষ্ঠবিশেষৈর্দোষা দোষবিশেষৈঃ পুনশ্চ কুষ্ঠানি| জ্ঞাযন্তে তৈর্হেতুর্হেতুস্তাংশ্চ প্রকাশযতি||৩৩||
कुष्ठविशेषैर्दोषा दोषविशेषैः पुनश्च कुष्ठानि| ज्ञायन्ते तैर्हेतुर्हेतुस्तांश्च प्रकाशयति||३३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 11 (34-36) · Śloka 36
রৌক্ষ্যং শোষস্তোদঃ শূলং সঙ্কোচনং তথাঽঽযামঃ| পারুষ্যং খরভাবো হর্ষঃ শ্যাবারুণত্বং চ||৩৪|| কুষ্ঠেষু বাতলিঙ্গং, দাহো রাগঃ পরিস্রবঃ পাকঃ| বিস্রো গন্ধঃ ক্লেদস্তথাঽঙ্গপতনং চ পিত্তকৃতম্||৩৫|| শ্বৈত্যং শৈত্যং কণ্ডূঃ স্থৈর্যং চোত্সেধগৌরবস্নেহাঃ| কুষ্ঠেষু তু কফলিঙ্গং জন্তুভিরভিভক্ষণং ক্লেদঃ||৩৬||
रौक्ष्यं शोषस्तोदः शूलं सङ्कोचनं तथाऽऽयामः| पारुष्यं खरभावो हर्षः श्यावारुणत्वं च||३४|| कुष्ठेषु वातलिङ्गं, दाहो रागः परिस्रवः पाकः| विस्रो गन्धः क्लेदस्तथाऽङ्गपतनं च पित्तकृतम्||३५|| श्वैत्यं शैत्यं कण्डूः स्थैर्यं चोत्सेधगौरवस्नेहाः| कुष्ठेषु तु कफलिङ्गं जन्तुभिरभिभक्षणं क्लेदः||३६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 12 (37-38) · Śloka 38
সর্বৈর্লিঙ্গৈর্যুক্তং মতিমান্ বিবর্জযেদবলম্| তৃষ্ণাদাহপরীতং শান্তাগ্নিং জন্তুভির্জগ্ধম্||৩৭|| বাতকফপ্রবলং যদ্যদেকদোষোল্বণং ন তত্ কৃচ্ছ্রম্| কফপিত্ত-বাতপিত্তপ্রবলানি তু কৃচ্ছ্রসাধ্যানি||৩৮||
सर्वैर्लिङ्गैर्युक्तं मतिमान् विवर्जयेदबलम्| तृष्णादाहपरीतं शान्ताग्निं जन्तुभिर्जग्धम्||३७|| वातकफप्रबलं यद्यदेकदोषोल्बणं न तत् कृच्छ्रम्| कफपित्त-वातपित्तप्रबलानि तु कृच्छ्रसाध्यानि||३८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 13 (39-42) · Śloka 42
বাতোত্তরেষু সর্পির্বমনং শ্লেষ্মোত্তরেষু কুষ্ঠেষু| পিত্তোত্তরেষু মোক্ষো রক্তস্য বিরেচনং চাগ্রে||৩৯|| বমনবিরেচনযোগাঃ কল্পোক্তাঃ কুষ্ঠিনাং প্রযোক্তব্যাঃ| প্রচ্ছনমল্পে কুষ্ঠে মহতি চ শস্তং সিরাব্যধনম্||৪০|| বহুদোষঃ সংশোধ্যঃ কুষ্ঠী বহুশোঽনুরক্ষতা প্রাণান্| দোষে হ্যতিমাত্রহৃতে বাযুর্হন্যাদবলমাশু||৪১|| স্নেহস্য পানমিষ্টং শুদ্ধে কোষ্ঠে প্রবাহিতে রক্তে| বাযুর্হি শুদ্ধকোষ্ঠং কুষ্ঠিনমবলং বিশতি শীঘ্রম্||৪২||
वातोत्तरेषु सर्पिर्वमनं श्लेष्मोत्तरेषु कुष्ठेषु| पित्तोत्तरेषु मोक्षो रक्तस्य विरेचनं चाग्रे||३९|| वमनविरेचनयोगाः कल्पोक्ताः कुष्ठिनां प्रयोक्तव्याः| प्रच्छनमल्पे कुष्ठे महति च शस्तं सिराव्यधनम्||४०|| बहुदोषः संशोध्यः कुष्ठी बहुशोऽनुरक्षता प्राणान्| दोषे ह्यतिमात्रहृते वायुर्हन्यादबलमाशु||४१|| स्नेहस्य पानमिष्टं शुद्धे कोष्ठे प्रवाहिते रक्ते| वायुर्हि शुद्धकोष्ठं कुष्ठिनमबलं विशति शीघ्रम्||४२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 14 (43-49) · Śloka 49
দোষোত্ক্লিষ্টে হৃদযে বাম্যঃ কুষ্ঠেষু চোর্ধ্বভাগেষু| কুটজফলমদনমধুকৈঃ সপটোলৈর্নিম্বরসযুক্তৈঃ||৪৩|| শীতরসঃ পক্বরসো মধূনি মধুকং চ বমনানি| কুষ্ঠেষু ত্রিবৃতা দন্তী ত্রিফলা চ বিরেচনে শস্তা||৪৪|| সৌবীরকং তুষোদকমালোডনমাসবাশ্চ সীধূনি| শংসন্ত্যধোহরাণাং যথাবিরেকং ক্রমশ্চেষ্টঃ||৪৫|| দার্বীবৃহতীসেব্যৈঃ পটোলপিচুমর্দমদনকৃতমালৈঃ| সস্নেহৈরাস্থাপ্যঃ কুষ্ঠী সকলিঙ্গযবমুস্তৈঃ||৪৬|| বাতোল্বণং বিরিক্তং নিরূঢমনুবাসনার্হমালক্ষ্য| ফলমধুকনিম্বকুটজৈঃ সপটোলৈঃ সাধযেত্স্নেহম্||৪৭|| সৈন্ধবদন্তীমরিচং ফণিজ্ঝকঃ পিপ্পলী করঞ্জফলম্| নস্যং স্যাত্সবিডঙ্গং ক্রিমিকুষ্ঠকফপ্রকোপঘ্নম্ ||৪৮|| বৈরেচনিকৈর্ধূমৈঃ শ্লোকস্থানেরিতৈঃ প্রশাম্যন্তি| কৃমযঃ কুষ্ঠকিলাসাঃ প্রযোজিতৈরুত্তমাঙ্গস্থাঃ||৪৯||
दोषोत्क्लिष्टे हृदये वाम्यः कुष्ठेषु चोर्ध्वभागेषु| कुटजफलमदनमधुकैः सपटोलैर्निम्बरसयुक्तैः||४३|| शीतरसः पक्वरसो मधूनि मधुकं च वमनानि| कुष्ठेषु त्रिवृता दन्ती त्रिफला च विरेचने शस्ता||४४|| सौवीरकं तुषोदकमालोडनमासवाश्च सीधूनि| शंसन्त्यधोहराणां यथाविरेकं क्रमश्चेष्टः||४५|| दार्वीबृहतीसेव्यैः पटोलपिचुमर्दमदनकृतमालैः| सस्नेहैरास्थाप्यः कुष्ठी सकलिङ्गयवमुस्तैः||४६|| वातोल्बणं विरिक्तं निरूढमनुवासनार्हमालक्ष्य| फलमधुकनिम्बकुटजैः सपटोलैः साधयेत्स्नेहम्||४७|| सैन्धवदन्तीमरिचं फणिज्झकः पिप्पली करञ्जफलम्| नस्यं स्यात्सविडङ्गं क्रिमिकुष्ठकफप्रकोपघ्नम् ||४८|| वैरेचनिकैर्धूमैः श्लोकस्थानेरितैः प्रशाम्यन्ति| कृमयः कुष्ठकिलासाः प्रयोजितैरुत्तमाङ्गस्थाः||४९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 15 (50-53) · Śloka 53
স্থিরকঠিনমণ্ডলানাং স্বিন্নানাং প্রস্তরপ্রণাডীভিঃ| কূর্চৈর্বিঘট্টিতানাং রক্তোত্ক্লেশোঽপনেতব্যঃ||৫০|| আনূপবারিজানাং মাংসানাং পোট্টলৈঃ সুখোষ্ণৈশ্চ| স্বিন্নোত্সন্নং বিলিখেত্ কুষ্ঠং তীক্ষ্ণেন শস্ত্রেণ||৫১|| রুধিরাগমার্থমথবা শৃঙ্গালাবূনি যোজযেত্ কুষ্ঠে| প্রচ্ছিতমল্পং কুষ্ঠং বিরেচযেদ্বা জলৌকোভিঃ||৫২|| যে লেপাঃ কুষ্ঠানাং যুজ্যন্তে নির্হৃতাস্রদোষাণাম্| সংশোধিতাশযানাং সদ্যঃ সিদ্ধির্ভবেত্তেষাম্||৫৩||
स्थिरकठिनमण्डलानां स्विन्नानां प्रस्तरप्रणाडीभिः| कूर्चैर्विघट्टितानां रक्तोत्क्लेशोऽपनेतव्यः||५०|| आनूपवारिजानां मांसानां पोट्टलैः सुखोष्णैश्च| स्विन्नोत्सन्नं विलिखेत् कुष्ठं तीक्ष्णेन शस्त्रेण||५१|| रुधिरागमार्थमथवा शृङ्गालाबूनि योजयेत् कुष्ठे| प्रच्छितमल्पं कुष्ठं विरेचयेद्वा जलौकोभिः||५२|| ये लेपाः कुष्ठानां युज्यन्ते निर्हृतास्रदोषाणाम्| संशोधिताशयानां सद्यः सिद्धिर्भवेत्तेषाम्||५३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 16 (54-57) · Śloka 57
যেষু ন শস্ত্রং ক্রমতে স্পর্শেন্দ্রিযনাশনানি যানি স্যুঃ| তেষু নিপাত্যঃ ক্ষারো রক্তং দোষং চ বিস্রাব্য||৫৪|| পাষাণকঠিনপরুষে সুপ্তে কুষ্ঠে স্থিরে পুরাণে চ| পীতাগদস্য কার্যো বিষৈঃ প্রদেহোঽগদৈশ্চানু||৫৫|| স্তব্ধানি সুপ্তসুপ্তান্যস্বেদনকণ্ডুলানি কুষ্ঠানি| কূর্চৈর্দন্তীত্রিবৃতাকরবীরকরঞ্জকুটজানাম্||৫৬|| জাত্যর্কনিম্বজৈর্বা পত্রৈঃ শস্ত্রৈঃ সমুদ্রফেনৈর্বা| ঘৃষ্টানি গোমযৈর্বা ততঃ প্রদেহৈঃ প্রদেহ্যানি||৫৭||
येषु न शस्त्रं क्रमते स्पर्शेन्द्रियनाशनानि यानि स्युः| तेषु निपात्यः क्षारो रक्तं दोषं च विस्राव्य||५४|| पाषाणकठिनपरुषे सुप्ते कुष्ठे स्थिरे पुराणे च| पीतागदस्य कार्यो विषैः प्रदेहोऽगदैश्चानु||५५|| स्तब्धानि सुप्तसुप्तान्यस्वेदनकण्डुलानि कुष्ठानि| कूर्चैर्दन्तीत्रिवृताकरवीरकरञ्जकुटजानाम्||५६|| जात्यर्कनिम्बजैर्वा पत्रैः शस्त्रैः समुद्रफेनैर्वा| घृष्टानि गोमयैर्वा ततः प्रदेहैः प्रदेह्यानि||५७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 17 (58-59) · Śloka 59
মারুতকফকুষ্ঠঘ্নং কর্মোক্তং পিত্তকুষ্ঠিনাং কার্যম্| কফপিত্তরক্তহরণং তিক্তকষাযৈঃ প্রশমনং চ||৫৮|| সর্পীংষি তিক্তকানি চ যচ্চান্যদ্রক্তপিত্তনুত্ কর্ম| বাহ্যাভ্যন্তরমগ্র্যং তত্ কার্যং পিত্তকুষ্ঠেষু||৫৯||
मारुतकफकुष्ठघ्नं कर्मोक्तं पित्तकुष्ठिनां कार्यम्| कफपित्तरक्तहरणं तिक्तकषायैः प्रशमनं च||५८|| सर्पींषि तिक्तकानि च यच्चान्यद्रक्तपित्तनुत् कर्म| बाह्याभ्यन्तरमग्र्यं तत् कार्यं पित्तकुष्ठेषु||५९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 18 (60-64) · Śloka 64
দোষাধিক্যবিভাগাদিত্যেতত্ কর্ম কুষ্ঠনুত্ প্রোক্তম্| বক্ষ্যামি কুষ্ঠশমনং প্রাযস্ত্বগ্দোষসামান্যাত্||৬০|| দার্বী রসাঞ্জনং বা গোমূত্রেণ প্রবাধতে কুষ্ঠম্| অভযা প্রযোজিতা বা মাসং সব্যোষগুডতৈলা||৬১|| মূলং পটোলস্য তথা গবাক্ষ্যাঃ পৃথক্ পলাংশং ত্রিফলাত্বচশ্চ | স্যাত্ত্রাযমাণা কটুরোহিণী চ ভাগার্ধিকা নাগরপাদযুক্তা||৬২|| পলং তথৈষাং সহ চূর্ণিতানাং জলে শৃতং দোষহরং পিবেন্না| জীর্ণে রসৈর্ধন্বমৃগদ্বিজানাং পুরাণশাল্যোদনমাদদীত||৬৩|| কুষ্ঠানি শোফং গ্রহণীপ্রদোষমর্শাংসি কৃচ্ছ্রাণি হলীমকং চ| ষড্রাত্রযোগেন নিহন্তি চৈষ হৃদ্বস্তিশূলং বিষমজ্বরং চ||৬৪||
दोषाधिक्यविभागादित्येतत् कर्म कुष्ठनुत् प्रोक्तम्| वक्ष्यामि कुष्ठशमनं प्रायस्त्वग्दोषसामान्यात्||६०|| दार्वी रसाञ्जनं वा गोमूत्रेण प्रबाधते कुष्ठम्| अभया प्रयोजिता वा मासं सव्योषगुडतैला||६१|| मूलं पटोलस्य तथा गवाक्ष्याः पृथक् पलांशं त्रिफलात्वचश्च | स्यात्त्रायमाणा कटुरोहिणी च भागार्धिका नागरपादयुक्ता||६२|| पलं तथैषां सह चूर्णितानां जले शृतं दोषहरं पिबेन्ना| जीर्णे रसैर्धन्वमृगद्विजानां पुराणशाल्योदनमाददीत||६३|| कुष्ठानि शोफं ग्रहणीप्रदोषमर्शांसि कृच्छ्राणि हलीमकं च| षड्रात्रयोगेन निहन्ति चैष हृद्बस्तिशूलं विषमज्वरं च||६४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 19 (65-69) · Śloka 69
মুস্তং ব্যোষং ত্রিফলা মঞ্জিষ্ঠা দারু পঞ্চমূল্যৌ দ্বে| সপ্তচ্ছদনিম্বত্বক্ সবিশালশ্চিত্রকো মূর্বা||৬৫|| চূর্ণং তর্পণভাগৈর্নবভিঃ সংযোজিতং সমধ্বাজ্যম্ | সিদ্ধং কুষ্ঠনিবর্হণমেতত্ প্রাযোগিকং ভক্ষ্যম্||৬৬|| শ্বযথুং সপাণ্ডুরোগং শ্বিত্রং গ্রহণীপ্রদোষমর্শাংসি| ব্রঘ্নভগন্দরপিডকাকণ্ডূকোঠাংশ্চ বিনিহন্তি||৬৭|| ইতি মুস্তাদিচূর্ণম্| ত্রিফলাতিবিষাকটুকানিম্বকলিঙ্গকবচাপটোলানাম্| মাগধিকারজনীদ্বযপদ্মকমূর্বাবিশালানাম্||৬৮|| ভূনিম্বপলাশানাং দদ্যাদ্বিপলং ততস্ত্রিবৃদ্দ্বিগুণা| তস্যাশ্চ পুনর্ব্রাহ্মী তচ্চূর্ণং সুপ্তিনুত্ পরমম্||৬৯||
मुस्तं व्योषं त्रिफला मञ्जिष्ठा दारु पञ्चमूल्यौ द्वे| सप्तच्छदनिम्बत्वक् सविशालश्चित्रको मूर्वा||६५|| चूर्णं तर्पणभागैर्नवभिः संयोजितं समध्वाज्यम् | सिद्धं कुष्ठनिबर्हणमेतत् प्रायोगिकं भक्ष्यम्||६६|| श्वयथुं सपाण्डुरोगं श्वित्रं ग्रहणीप्रदोषमर्शांसि| ब्रघ्नभगन्दरपिडकाकण्डूकोठांश्च विनिहन्ति||६७|| इति मुस्तादिचूर्णम्| त्रिफलातिविषाकटुकानिम्बकलिङ्गकवचापटोलानाम्| मागधिकारजनीद्वयपद्मकमूर्वाविशालानाम्||६८|| भूनिम्बपलाशानां दद्याद्विपलं ततस्त्रिवृद्द्विगुणा| तस्याश्च पुनर्ब्राह्मी तच्चूर्णं सुप्तिनुत् परमम्||६९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 20 (70-72) · Śloka 72
লেলীতকপ্রযোগো রসেন জাত্যাঃ সমাক্ষিকঃ পরমঃ| সপ্তদশকুষ্ঠঘাতী মাক্ষিকধাতুশ্চ মূত্রেণ||৭০|| শ্রেষ্ঠং গন্ধকযোগাত্ সুবর্ণমাক্ষিকপ্রযোগাদ্বা| সর্বব্যাধিনিবর্হণমদ্যাত্ কুষ্ঠী রসং চ নিগৃহীতম্||৭১|| বজ্রশিলাজতুসহিতং সহিতং বা যোগরাজেন| সর্বব্যাধিপ্রশমনমদ্যাত্কুষ্ঠী নিগৃহ্য নিত্যং চ||৭২||
लेलीतकप्रयोगो रसेन जात्याः समाक्षिकः परमः| सप्तदशकुष्ठघाती माक्षिकधातुश्च मूत्रेण||७०|| श्रेष्ठं गन्धकयोगात् सुवर्णमाक्षिकप्रयोगाद्वा| सर्वव्याधिनिबर्हणमद्यात् कुष्ठी रसं च निगृहीतम्||७१|| वज्रशिलाजतुसहितं सहितं वा योगराजेन| सर्वव्याधिप्रशमनमद्यात्कुष्ठी निगृह्य नित्यं च||७२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 21 (73-75) · Śloka 75
খদিরসুরদারুসারং শ্রপযিত্বা তদ্রসেন তোযার্থঃ| ক্ষৌদ্রপ্রস্থে কার্যঃ কার্যে তে চাষ্টপলিকে চ||৭৩|| তত্রাশ্চূর্ণানামষ্টপলং প্রক্ষিপেত্তথাঽমূনি| ত্রিফলৈলে ত্বঙ্মরিচং পত্রং কনকং চ কর্ষাংশম্||৭৪|| মত্স্যণ্ডিকা মধুসমা তন্মাসং জাতমাযসে ভাণ্ডে| মধ্বাসবমাচরতঃ কুষ্ঠকিলাসে শমং যাতঃ||৭৫|| ইতি মধ্বাসবঃ|
खदिरसुरदारुसारं श्रपयित्वा तद्रसेन तोयार्थः| क्षौद्रप्रस्थे कार्यः कार्ये ते चाष्टपलिके च||७३|| तत्राश्चूर्णानामष्टपलं प्रक्षिपेत्तथाऽमूनि| त्रिफलैले त्वङ्मरिचं पत्रं कनकं च कर्षांशम्||७४|| मत्स्यण्डिका मधुसमा तन्मासं जातमायसे भाण्डे| मध्वासवमाचरतः कुष्ठकिलासे शमं यातः||७५|| इति मध्वासवः|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 22 (76-80) · Śloka 80
খদিরকষাযদ্রোণং কুম্ভে ঘৃতভাবিতে সমাবাপ্য| দ্রব্যাণি চূর্ণিতানি চ ষট্পলিকান্যত্র দেযানি||৭৬|| ত্রিফলাব্যোষবিডঙ্গরজনীমুস্তাটরূষকেন্দ্রযবাঃ| সৌবর্ণী চ তথা ত্বক্ ছিন্নরুহা চেতি তন্মাসম্||৭৭|| নিদধীত ধান্যমধ্যে প্রাতঃ প্রাতঃ পিবেত্ততো যুক্ত্যা| মাসেন মহাকুষ্ঠং হন্ত্যেবাল্পং তু পক্ষেণ||৭৮|| অর্শঃশ্বাসভগন্দরকাসকিলাসপ্রমেহশোষাংশ্চ| না ভবতি কনকবর্ণঃ পীত্বাঽরিষ্টং কনকবিন্দুম্||৭৯|| ইতি কনকবিন্দ্বরিষ্টম্| কুষ্ঠেষ্বনিলকফকৃতেষ্বেবং পেযস্তথাঽপি পৈত্তেষু| কৃতমালক্বাথশ্চাপ্যেষ বিশেষাত্ কফকৃতেষু||৮০||
खदिरकषायद्रोणं कुम्भे घृतभाविते समावाप्य| द्रव्याणि चूर्णितानि च षट्पलिकान्यत्र देयानि||७६|| त्रिफलाव्योषविडङ्गरजनीमुस्ताटरूषकेन्द्रयवाः| सौवर्णी च तथा त्वक् छिन्नरुहा चेति तन्मासम्||७७|| निदधीत धान्यमध्ये प्रातः प्रातः पिबेत्ततो युक्त्या| मासेन महाकुष्ठं हन्त्येवाल्पं तु पक्षेण||७८|| अर्शःश्वासभगन्दरकासकिलासप्रमेहशोषांश्च| ना भवति कनकवर्णः पीत्वाऽरिष्टं कनकबिन्दुम्||७९|| इति कनकबिन्द्वरिष्टम्| कुष्ठेष्वनिलकफकृतेष्वेवं पेयस्तथाऽपि पैत्तेषु| कृतमालक्वाथश्चाप्येष विशेषात् कफकृतेषु||८०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 23 (81) · Śloka 81
ত্রিফলাসবশ্চ গৌডঃ সচিত্রকঃ কুষ্ঠরোগবিনিহন্তা| ক্রমুকদশমূলদন্তীবরাঙ্গমধুযোগসংযুক্তঃ||৮১||
त्रिफलासवश्च गौडः सचित्रकः कुष्ठरोगविनिहन्ता| क्रमुकदशमूलदन्तीवराङ्गमधुयोगसंयुक्तः||८१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 24 (82-83) · Śloka 83
লঘূনি চান্নানি হিতানি বিদ্যাত্ কুষ্ঠেষু শাকনি চ তিক্তকানি| ভল্লাতকৈঃ সত্রিফলৈঃ সনিম্বৈর্যুক্তানি চান্নানি ঘৃতানি চৈব||৮২|| পুরাণধান্যান্যথ জাঙ্গলানি মাংসানি মুদ্গাশ্চ পটোলযুক্তাঃ| শস্তা, ন গুর্বম্লপযোদধীনি নানূপমত্স্যা ন গুডস্তিলাশ্চ||৮৩||
लघूनि चान्नानि हितानि विद्यात् कुष्ठेषु शाकनि च तिक्तकानि| भल्लातकैः सत्रिफलैः सनिम्बैर्युक्तानि चान्नानि घृतानि चैव||८२|| पुराणधान्यान्यथ जाङ्गलानि मांसानि मुद्गाश्च पटोलयुक्ताः| शस्ता, न गुर्वम्लपयोदधीनि नानूपमत्स्या न गुडस्तिलाश्च||८३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 25 (84-96) · Śloka 96
এলা কুষ্ঠং দার্বী শতপুষ্পা চিত্রকো বিডঙ্গশ্চ| কুষ্ঠালেপনমিষ্টং রসাঞ্জনং চাভযা চৈব||৮৪|| চিত্রকমেলাং বিম্বীং বৃষকং ত্রিবৃদর্কনাগরকম্| চূর্ণীকৃতমষ্টাহং ভাবযিতব্যং পলাশস্য||৮৫|| ক্ষারেণ গবাং মূত্রস্রুতেন তেনাস্য মণ্ডলান্যাশু| ভিদ্যন্তে বিলযন্তি চ লিপ্তান্যর্কাভিতপ্তানি||৮৬|| মাংসী মরিচং লবণং রজনী তগরং সুধা গৃহাদ্ধূমঃ| মূত্রং পিত্তং ক্ষারঃ পালাশঃ কুষ্ঠহা লেপঃ||৮৭|| ত্রপু সীসমযশ্চূর্ণং মণ্ডলনুত্ ফল্গুচিত্রকৌ বৃহতী| গোধারসঃ সলবণো দারু চ মূত্রং চ মণ্ডলনুত্||৮৮|| কদলীপলাশপাটলিনিচুলক্ষারাম্ভসা প্রসন্নেন| মাংসেষু তোযকার্যং কার্যং পিষ্টে চ কিণ্বে চ||৮৯|| তৈর্মেদকঃ সুজাতঃ কিণ্বৈর্জনিতং প্রলেপনং শস্তম্| মণ্ডলকুষ্ঠবিনাশনমাতপসংস্থং কৃমিঘ্নং চ||৯০|| মুস্তং মদনং ত্রিফলা করঞ্জ আরগ্বধকলিঙ্গযবাঃ| দার্বী সসপ্তপর্ণা স্নানং সিদ্ধার্থকং নাম||৯১|| এষ কষাযো বমনং বিরেচনং বর্ণকস্তথোদ্ঘর্ষঃ| ত্বগ্দোষকুষ্ঠশোফপ্রবাধনঃ পাণ্ডুরোগঘ্নঃ||৯২|| কুষ্ঠং করঞ্জবীজান্যেডগজঃ কুষ্ঠসূদনো লেপঃ| প্রপুন্নাডবীজসৈন্ধবরসাঞ্জনকপিত্থলোধ্রাশ্চ||৯৩|| শ্বেতকরবীরমূলং কুটজকরঞ্জযোঃ ফলং ত্বচো দার্ব্যাঃ| সুমনঃপ্রবালযুক্তো লেপঃ কুষ্ঠাপহঃ সিদ্ধঃ||৯৪|| লোধ্রস্য ধাতকীনাং বত্সকবীজস্য নক্তমালস্য| কল্কশ্চ মালতীনাং কুষ্ঠেষূন্মর্দনালেপৌ||৯৫|| শৈরীষী ত্বক্ পুষ্পং কার্পাস্যা রাজবৃক্ষপত্রাণি| পিষ্টা চ কাকমাচী চতুর্বিধঃ কুষ্ঠনুল্লেপঃ||৯৬|| ইতি লেপাঃ|
एला कुष्ठं दार्वी शतपुष्पा चित्रको विडङ्गश्च| कुष्ठालेपनमिष्टं रसाञ्जनं चाभया चैव||८४|| चित्रकमेलां बिम्बीं वृषकं त्रिवृदर्कनागरकम्| चूर्णीकृतमष्टाहं भावयितव्यं पलाशस्य||८५|| क्षारेण गवां मूत्रस्रुतेन तेनास्य मण्डलान्याशु| भिद्यन्ते विलयन्ति च लिप्तान्यर्काभितप्तानि||८६|| मांसी मरिचं लवणं रजनी तगरं सुधा गृहाद्धूमः| मूत्रं पित्तं क्षारः पालाशः कुष्ठहा लेपः||८७|| त्रपु सीसमयश्चूर्णं मण्डलनुत् फल्गुचित्रकौ बृहती| गोधारसः सलवणो दारु च मूत्रं च मण्डलनुत्||८८|| कदलीपलाशपाटलिनिचुलक्षाराम्भसा प्रसन्नेन| मांसेषु तोयकार्यं कार्यं पिष्टे च किण्वे च||८९|| तैर्मेदकः सुजातः किण्वैर्जनितं प्रलेपनं शस्तम्| मण्डलकुष्ठविनाशनमातपसंस्थं कृमिघ्नं च||९०|| मुस्तं मदनं त्रिफला करञ्ज आरग्वधकलिङ्गयवाः| दार्वी ससप्तपर्णा स्नानं सिद्धार्थकं नाम||९१|| एष कषायो वमनं विरेचनं वर्णकस्तथोद्घर्षः| त्वग्दोषकुष्ठशोफप्रबाधनः पाण्डुरोगघ्नः||९२|| कुष्ठं करञ्जबीजान्येडगजः कुष्ठसूदनो लेपः| प्रपुन्नाडबीजसैन्धवरसाञ्जनकपित्थलोध्राश्च||९३|| श्वेतकरवीरमूलं कुटजकरञ्जयोः फलं त्वचो दार्व्याः| सुमनःप्रवालयुक्तो लेपः कुष्ठापहः सिद्धः||९४|| लोध्रस्य धातकीनां वत्सकबीजस्य नक्तमालस्य| कल्कश्च मालतीनां कुष्ठेषून्मर्दनालेपौ||९५|| शैरीषी त्वक् पुष्पं कार्पास्या राजवृक्षपत्राणि| पिष्टा च काकमाची चतुर्विधः कुष्ठनुल्लेपः||९६|| इति लेपाः|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 26 (97-101) · Śloka 101
দার্ব্যা রসাঞ্জনস্য চ নিম্বপটোলস্য খদিরসারস্য| আরগ্বধবৃক্ষকযোস্ত্রিফলাযাঃ সপ্তপর্ণস্য||৯৭|| ইতি ষট্ কষাযযোগাঃ কুষ্ঠঘ্নাঃ সপ্তমশ্চ তিনিশস্য| স্নানে পানে চ হিতাস্তথাঽষ্টমশ্চাশ্বমারস্য||৯৮|| আলেপনং প্রঘর্ষণমবচূর্ণনমেত এব চ কষাযাঃ| তৈলঘৃতপাকযোগে চেষ্যন্তে কুষ্ঠশান্ত্যর্থম্||৯৯|| ত্রিফলা নিম্বপটোলং মঞ্জিষ্ঠা রোহিণী বচা রজনী| এষ কষাযোঽভ্যস্তো নিহন্তি কফপিত্তজং কুষ্ঠম্||১০০|| এতৈরেব চ সর্পিঃ সিদ্ধং বাতোল্বণং জযতি কুষ্ঠম্| এষ চ কল্পো দিষ্টঃ খদিরাসনদারুনিম্বানাম্||১০১||
दार्व्या रसाञ्जनस्य च निम्बपटोलस्य खदिरसारस्य| आरग्वधवृक्षकयोस्त्रिफलायाः सप्तपर्णस्य||९७|| इति षट् कषाययोगाः कुष्ठघ्नाः सप्तमश्च तिनिशस्य| स्नाने पाने च हितास्तथाऽष्टमश्चाश्वमारस्य||९८|| आलेपनं प्रघर्षणमवचूर्णनमेत एव च कषायाः| तैलघृतपाकयोगे चेष्यन्ते कुष्ठशान्त्यर्थम्||९९|| त्रिफला निम्बपटोलं मञ्जिष्ठा रोहिणी वचा रजनी| एष कषायोऽभ्यस्तो निहन्ति कफपित्तजं कुष्ठम्||१००|| एतैरेव च सर्पिः सिद्धं वातोल्बणं जयति कुष्ठम्| एष च कल्पो दिष्टः खदिरासनदारुनिम्बानाम्||१०१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 27 (102-104) · Śloka 104
কুষ্ঠার্কতুত্থকট্ফলমূলকবীজানি রোহিণী কটুকা| কুটজফলোত্পলমুস্তং বৃহতীকরবীরকাসীসম্||১০২|| এডগজনিম্বপাঠা দুরালভা চিত্রকো বিডঙ্গশ্চ| তিক্তালাবুকবীজং কম্পিল্লকসর্ষপৌ বচা দার্বী||১০৩|| এতৈস্তৈলং সিদ্ধং কুষ্ঠঘ্নং যোগ এষ চালেপঃ| উদ্বর্তনং প্রঘর্ষণমবচূর্ণনমেষ এবেষ্টঃ||১০৪||
कुष्ठार्कतुत्थकट्फलमूलकबीजानि रोहिणी कटुका| कुटजफलोत्पलमुस्तं बृहतीकरवीरकासीसम्||१०२|| एडगजनिम्बपाठा दुरालभा चित्रको विडङ्गश्च| तिक्तालाबुकबीजं कम्पिल्लकसर्षपौ वचा दार्वी||१०३|| एतैस्तैलं सिद्धं कुष्ठघ्नं योग एष चालेपः| उद्वर्तनं प्रघर्षणमवचूर्णनमेष एवेष्टः||१०४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 28 (105) · Śloka 105
শ্বেতকরবীরকরসো গোমূত্রং চিত্রকো বিডঙ্গশ্চ| কুষ্ঠেষু তৈলযোগঃ সিদ্ধোঽযং সম্মতো ভিষজাম্||১০৫|| ইতি শ্বেতকরবীরাদ্যং তৈলম্|
श्वेतकरवीरकरसो गोमूत्रं चित्रको विडङ्गश्च| कुष्ठेषु तैलयोगः सिद्धोऽयं सम्मतो भिषजाम्||१०५|| इति श्वेतकरवीराद्यं तैलम्|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 29 (106-107) · Śloka 107
শ্বেতকরবীরপল্লবমূলত্বগ্বত্সকো বিডঙ্গশ্চ| কুষ্ঠার্কমূলসর্ষপশিগ্রুত্বগ্রোহিণী কটুকা||১০৬|| এতৈস্তৈলং সিদ্ধং কল্কৈঃ পাদাংশিকৈর্গবাং মূত্রম্| দত্ত্বা তৈলচতুর্গুণমভ্যঙ্গাত্ কুষ্ঠকণ্ডূঘ্নম্||১০৭|| ইতি শ্বেতকরবীরপল্লবাদ্যং তৈলম্|
श्वेतकरवीरपल्लवमूलत्वग्वत्सको विडङ्गश्च| कुष्ठार्कमूलसर्षपशिग्रुत्वग्रोहिणी कटुका||१०६|| एतैस्तैलं सिद्धं कल्कैः पादांशिकैर्गवां मूत्रम्| दत्त्वा तैलचतुर्गुणमभ्यङ्गात् कुष्ठकण्डूघ्नम्||१०७|| इति श्वेतकरवीरपल्लवाद्यं तैलम्|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 30 (108-110) · Śloka 110
তিক্তালাবুকবীজং দ্বে তুত্থে রোচনা হরিদ্রে দ্বে| বৃহতীফলমেরণ্ডঃ সবিশালশ্চিত্রকো মূর্বা||১০৮|| কাসীসহিঙ্গুশিগ্রুত্র্যূষণসুরদারুতুম্বুরুবিডঙ্গম্| লাঙ্গালকং কুটজত্বক্ কটুকাখ্যা রোহিণী চৈব||১০৯|| সর্ষপতৈলং কল্কৈরেতৈর্মূত্রে চতুর্গুণে সাধ্যম্| কণ্ডূকুষ্ঠবিনাশনমভ্যঙ্গান্মারুতকফহন্তৃ||১১০|| ইতি তিক্তেক্ষ্বাক্বাদিতৈলম্|
तिक्तालाबुकबीजं द्वे तुत्थे रोचना हरिद्रे द्वे| बृहतीफलमेरण्डः सविशालश्चित्रको मूर्वा||१०८|| कासीसहिङ्गुशिग्रुत्र्यूषणसुरदारुतुम्बुरुविडङ्गम्| लाङ्गालकं कुटजत्वक् कटुकाख्या रोहिणी चैव||१०९|| सर्षपतैलं कल्कैरेतैर्मूत्रे चतुर्गुणे साध्यम्| कण्डूकुष्ठविनाशनमभ्यङ्गान्मारुतकफहन्तृ||११०|| इति तिक्तेक्ष्वाक्वादितैलम्|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 31 (111-116) · Śloka 116
কনকক্ষীরী শৈলা ভার্গী দন্ত্যাঃ ফলানি মূলং চ| জাতীপ্রবালসর্ষপলশুনবিডঙ্গং করঞ্জত্বক্||১১১|| সপ্তচ্ছদার্কপল্লবমূলত্বঙ্নিম্বচিত্রকাস্ফোতাঃ| গুঞ্জৈরণ্ডং বৃহতীমূলকসুরসার্জকফলানি||১১২|| কুষ্ঠং পাঠা মুস্তং তুম্বুরুমূর্বাবচাঃ সষড্গ্রন্থাঃ | এডগজকুটজশিগ্রুত্র্যূষণভল্লাতকক্ষবকাঃ||১১৩|| হরিতালমবাক্পুষ্পী তুত্থং কম্পিল্লকোঽমৃতাসঞ্জ্ঞঃ| সৌরাষ্ট্রী কাসীসং দার্বীত্বক্ সর্জিকালবণম্||১১৪|| কল্কৈরেতৈস্তৈলং করবীরকমূলপল্লবকষাযে| সার্ষপমথবা তৈলং গোমূত্রচতুর্গুণং সাধ্যম্||১১৫|| স্থাপ্যং কটুকালাবুনি তত্সিদ্ধং তেন মণ্ডলান্যাশু| ভিন্দ্যাদ্ভিষগভ্যঙ্গাত্কৃমীংশ্চ কণ্ডূং চ বিনিহন্যাত্||১১৬|| ইতি কনকক্ষীরীতৈলম্|
कनकक्षीरी शैला भार्गी दन्त्याः फलानि मूलं च| जातीप्रवालसर्षपलशुनविडङ्गं करञ्जत्वक्||१११|| सप्तच्छदार्कपल्लवमूलत्वङ्निम्बचित्रकास्फोताः| गुञ्जैरण्डं बृहतीमूलकसुरसार्जकफलानि||११२|| कुष्ठं पाठा मुस्तं तुम्बुरुमूर्वावचाः सषड्ग्रन्थाः | एडगजकुटजशिग्रुत्र्यूषणभल्लातकक्षवकाः||११३|| हरितालमवाक्पुष्पी तुत्थं कम्पिल्लकोऽमृतासञ्ज्ञः| सौराष्ट्री कासीसं दार्वीत्वक् सर्जिकालवणम्||११४|| कल्कैरेतैस्तैलं करवीरकमूलपल्लवकषाये| सार्षपमथवा तैलं गोमूत्रचतुर्गुणं साध्यम्||११५|| स्थाप्यं कटुकालाबुनि तत्सिद्धं तेन मण्डलान्याशु| भिन्द्याद्भिषगभ्यङ्गात्कृमींश्च कण्डूं च विनिहन्यात्||११६|| इति कनकक्षीरीतैलम्|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 32 (117-118) · Śloka 118
কুষ্ঠং তমালপত্রং মরিচং সমনঃশিলং সকাসীসম্| তৈলেন যুক্তমুষিতং সপ্তাহং ভাজনে তাম্রে||১১৭|| তেনালিপ্তং সিধ্মং সপ্তাহাহ্যেতি তিষ্ঠতো ঘর্মে| মাসান্নবং কিলাসং স্নানং মুক্ত্বা বিশুদ্ধতনোঃ||১১৮|| ইতি সিধ্মে লেপঃ|
कुष्ठं तमालपत्रं मरिचं समनःशिलं सकासीसम्| तैलेन युक्तमुषितं सप्ताहं भाजने ताम्रे||११७|| तेनालिप्तं सिध्मं सप्ताहाह्येति तिष्ठतो घर्मे| मासान्नवं किलासं स्नानं मुक्त्वा विशुद्धतनोः||११८|| इति सिध्मे लेपः|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 33 (119) · Śloka 119
সর্ষপকরঞ্জকোষাতকীনাং তৈলান্যথেঙ্গুদীনাং চ| কুষ্ঠেষু হিতান্যাহুস্তৈলং যচ্চাপি খদিরসারস্য||১১৯||
सर्षपकरञ्जकोषातकीनां तैलान्यथेङ्गुदीनां च| कुष्ठेषु हितान्याहुस्तैलं यच्चापि खदिरसारस्य||११९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 34 (120-134) · Śloka 134
জীবন্তী মঞ্জিষ্ঠা দার্বী কম্পিল্লকঃ পযস্তুত্থম্| এষ ঘৃততৈলপাকঃ সিদ্ধঃ সিদ্ধে চ সর্জরসঃ||১২০|| দেযঃ সমধূচ্ছিষ্টো বিপাদিকা তেন শাম্যতেঽভ্যক্তা| চর্মৈককুষ্ঠকিটিমং কুষ্ঠং শাম্যত্যলসকং চ||১২১|| ইতি বিপাদিকাহরঘৃততৈলে| কিণ্বং বরাহরুধিরং পৃথ্বীকা সৈন্ধবং চ লেপঃ স্যাত্| লেপো যোজ্যঃ কুস্তুম্বুরূণি কুষ্ঠং চ মণ্ডলনুত্||১২২|| পূতীকদারুজটিলাঃ পক্বসুরা ক্ষৌদ্রমুদ্গপর্ণ্যৌ চ| লেপঃ সকাকনাসো মণ্ডলকুষ্ঠাপহঃ সিদ্ধঃ||১২৩|| চিত্রকশোভাঞ্জনকৌ গুডূচ্যপামার্গদেবদারূণি| খদিরো ধবশ্চ লেপঃ শ্যামা দন্তী দ্রবন্তী চ||১২৪|| লাক্ষারসাঞ্জনৈলাঃ পুনর্নবা চেতি কুষ্ঠিনো লেপাঃ| দধিমণ্ডযুতাঃ সর্বে দেযাঃ ষণ্মারুতকফকুষ্ঠঘ্নাঃ||১২৫|| এডগজকুষ্ঠসৈন্ধবসৌবীরকসর্ষপৈঃ কৃমিঘ্নৈশ্চ| কৃমিকুষ্ঠমণ্ডলাখ্যং দদ্রূকুষ্ঠং চ শমমুপৈতি||১২৬|| এডগজঃ সর্জরসো মূলকবীজং চ সিধ্মকুষ্ঠানাম্| কাঞ্জিকযুক্তং তু পৃথঙ্মতমিদমুদ্বর্তনং লেপাঃ||১২৭|| বাসা তিফলা পানে স্নানে চোদ্বর্তনে প্রলেপে চ| বৃহতীসেব্যপটোলাঃ সসারিবা রোহিণী চৈব||১২৮|| খদিরাবঘাতককুভরোহীতকলোধ্রকুটজধবনিম্বাঃ| সপ্তচ্ছদকরবীরাঃ শস্যন্তে স্নানপানেষু||১২৯|| জলবাপ্যলোহকেশরপত্রপ্লবচন্দনং মৃণালানি| ভাগোত্তরাণি সিদ্ধং প্রলেপনং পিত্তকফকুষ্ঠে||১৩০|| যষ্ট্যাহ্বলোধ্রপদ্মকপটোলপিচুমর্দচন্দনরসাশ্চ| স্নানে পানে চ হিতাঃ সুশীতলাঃ পিত্তকুষ্ঠিভ্যঃ||১৩১|| আলেপনং প্রিযঙ্গুর্হরেণুকা বত্সকস্য চ ফলানি| সাতিবিষা চ সসেব্যা সচন্দনা রোহিণী কটুকা||১৩২|| তিক্তঘৃতৈর্ধৌতঘৃতৈরভ্যঙ্গো দহ্যমানকুষ্ঠেষু| তৈলৈশ্চন্দনমধুকপ্রপৌণ্ডরীকোত্পলযুতৈশ্চ||১৩৩|| ক্লেদে প্রপততি চাঙ্গে দাহে বিস্ফোটকে সচর্মদলে| শীতাঃ প্রদেহসেকা ব্যধো বিরেকো ঘৃতং তিক্তম্||১৩৪||
जीवन्ती मञ्जिष्ठा दार्वी कम्पिल्लकः पयस्तुत्थम्| एष घृततैलपाकः सिद्धः सिद्धे च सर्जरसः||१२०|| देयः समधूच्छिष्टो विपादिका तेन शाम्यतेऽभ्यक्ता| चर्मैककुष्ठकिटिमं कुष्ठं शाम्यत्यलसकं च||१२१|| इति विपादिकाहरघृततैले| किण्वं वराहरुधिरं पृथ्वीका सैन्धवं च लेपः स्यात्| लेपो योज्यः कुस्तुम्बुरूणि कुष्ठं च मण्डलनुत्||१२२|| पूतीकदारुजटिलाः पक्वसुरा क्षौद्रमुद्गपर्ण्यौ च| लेपः सकाकनासो मण्डलकुष्ठापहः सिद्धः||१२३|| चित्रकशोभाञ्जनकौ गुडूच्यपामार्गदेवदारूणि| खदिरो धवश्च लेपः श्यामा दन्ती द्रवन्ती च||१२४|| लाक्षारसाञ्जनैलाः पुनर्नवा चेति कुष्ठिनो लेपाः| दधिमण्डयुताः सर्वे देयाः षण्मारुतकफकुष्ठघ्नाः||१२५|| एडगजकुष्ठसैन्धवसौवीरकसर्षपैः कृमिघ्नैश्च| कृमिकुष्ठमण्डलाख्यं दद्रूकुष्ठं च शममुपैति||१२६|| एडगजः सर्जरसो मूलकबीजं च सिध्मकुष्ठानाम्| काञ्जिकयुक्तं तु पृथङ्मतमिदमुद्वर्तनं लेपाः||१२७|| वासा तिफला पाने स्नाने चोद्वर्तने प्रलेपे च| बृहतीसेव्यपटोलाः ससारिवा रोहिणी चैव||१२८|| खदिरावघातककुभरोहीतकलोध्रकुटजधवनिम्बाः| सप्तच्छदकरवीराः शस्यन्ते स्नानपानेषु||१२९|| जलवाप्यलोहकेशरपत्रप्लवचन्दनं मृणालानि| भागोत्तराणि सिद्धं प्रलेपनं पित्तकफकुष्ठे||१३०|| यष्ट्याह्वलोध्रपद्मकपटोलपिचुमर्दचन्दनरसाश्च| स्नाने पाने च हिताः सुशीतलाः पित्तकुष्ठिभ्यः||१३१|| आलेपनं प्रियङ्गुर्हरेणुका वत्सकस्य च फलानि| सातिविषा च ससेव्या सचन्दना रोहिणी कटुका||१३२|| तिक्तघृतैर्धौतघृतैरभ्यङ्गो दह्यमानकुष्ठेषु| तैलैश्चन्दनमधुकप्रपौण्डरीकोत्पलयुतैश्च||१३३|| क्लेदे प्रपतति चाङ्गे दाहे विस्फोटके सचर्मदले| शीताः प्रदेहसेका व्यधो विरेको घृतं तिक्तम्||१३४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 35 (135) · Śloka 135
খদিরঘৃতং নিম্বঘৃতং দার্বীঘৃতমুত্তমং পটোলঘৃতম্| কুষ্ঠেষু রক্তপিত্তপ্রবলেষু ভিষগ্জিতং সিদ্ধম্||১৩৫||
खदिरघृतं निम्बघृतं दार्वीघृतमुत्तमं पटोलघृतम्| कुष्ठेषु रक्तपित्तप्रबलेषु भिषग्जितं सिद्धम्||१३५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 36 (136-139) · Śloka 139
ত্রিফলাত্বচোঽর্ধপলিকাঃ পটোলপত্রং চ কার্ষিকাঃ শেষাঃ| কটুরোহিণী সনিম্বা যষ্ট্যাহ্বা ত্রাযমাণা চ||১৩৬|| এষ কষাযঃ সাধ্যো দত্ত্বা দ্বিপলং মসূরবিদলানাম্| সলিলাঢকেঽষ্টভাগে শেষে পূতো রসো গ্রাহ্যঃ||১৩৭|| তে চ কষাযেঽষ্টপলে চতুষ্পলং সর্পিষশ্চ পক্তব্যম্| যাবত্স্যাদষ্টপলং শেষং পেযং ততঃ কোষ্ণম্||১৩৮|| তদ্বাতপিত্তকুষ্ঠং বীসর্পং বাতশোণিতং প্রবলম্| জ্বরদাহগুল্মবিদ্রধিবিভ্রমবিস্ফোটকান্ হন্তি||১৩৯||
त्रिफलात्वचोऽर्धपलिकाः पटोलपत्रं च कार्षिकाः शेषाः| कटुरोहिणी सनिम्बा यष्ट्याह्वा त्रायमाणा च||१३६|| एष कषायः साध्यो दत्त्वा द्विपलं मसूरविदलानाम्| सलिलाढकेऽष्टभागे शेषे पूतो रसो ग्राह्यः||१३७|| ते च कषायेऽष्टपले चतुष्पलं सर्पिषश्च पक्तव्यम्| यावत्स्यादष्टपलं शेषं पेयं ततः कोष्णम्||१३८|| तद्वातपित्तकुष्ठं वीसर्पं वातशोणितं प्रबलम्| ज्वरदाहगुल्मविद्रधिविभ्रमविस्फोटकान् हन्ति||१३९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 37 (140-143) · Śloka 143
নিম্বপটোলং দার্বীং দুরালভাং তিক্তরোহিণীং ত্রিফলাম্| কুর্যাদর্ধদলাংশং পর্পটকং ত্রাযমাণাং চ||১৪০|| সলিলাঢকসিদ্ধানাং রসেঽষ্টভাগস্থিতে ক্ষিপেত্ পূতে| চন্দনকিরাততিক্তকমাগধিকাস্ত্রাযমাণাং চ||১৪১|| মুস্তং বত্সকবীজং কল্কীকৃত্যার্ধকার্ষিকান্ ভাগান্| নবসর্পিষশ্চ ষট্পলমেতত্সিদ্ধং ঘৃতং পেযম্||১৪২|| কুষ্ঠজ্বরগুল্মার্শোগ্রহণীপাণ্ড্বামযশ্বযথুহারি| পামাবিসর্পপিডকাকণ্ডূমদগণ্ডনুত্সিদ্ধম্||১৪৩|| ইতি তিক্তষট্পলকং ঘৃতম্|
निम्बपटोलं दार्वीं दुरालभां तिक्तरोहिणीं त्रिफलाम्| कुर्यादर्धदलांशं पर्पटकं त्रायमाणां च||१४०|| सलिलाढकसिद्धानां रसेऽष्टभागस्थिते क्षिपेत् पूते| चन्दनकिराततिक्तकमागधिकास्त्रायमाणां च||१४१|| मुस्तं वत्सकबीजं कल्कीकृत्यार्धकार्षिकान् भागान्| नवसर्पिषश्च षट्पलमेतत्सिद्धं घृतं पेयम्||१४२|| कुष्ठज्वरगुल्मार्शोग्रहणीपाण्ड्वामयश्वयथुहारि| पामाविसर्पपिडकाकण्डूमदगण्डनुत्सिद्धम्||१४३|| इति तिक्तषट्पलकं घृतम्|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 38 (144-150) · Śloka 150
সপ্তচ্ছদং প্রতিবিষাং শম্পাকং তিক্তরোহিণীং পাঠাম্| মুস্তমুশীরং ত্রিফলাং পটোলপিচুমর্দপর্পটকম্||১৪৪|| ধন্বযবাসং চন্দনমুপকুল্যাং পদ্মকং হরিদ্রে দ্বে| ষড্গ্রন্থাং সবিশালাং শতাবরীং সারিবে চোভে||১৪৫|| বত্সকবীজং যাসং মূর্বামমৃতাং কিরাততিক্তং চ| কল্কান্ কুর্যান্মতিমান্যষ্ট্যাহ্বং ত্রাযমাণাং চ||১৪৬|| কল্কশ্চাতুর্ভাগো জলমষ্টগুণং রসোঽমৃতফলানাম্| দ্বিগুণো ঘৃতাত্প্রদেযস্তত্সর্পিঃ পাযযেত্সিদ্ধম্||১৪৭|| কুষ্ঠানি রক্তপিত্তপ্রবলান্যর্শাংসি রক্তবাহীনি| বীসর্পমম্লপিত্তং বাতাসৃক্ পাণ্ডুরোগং চ||১৪৮|| বিস্ফোটকান্সপামানুন্মাদং কামলাং জ্বরং কণ্ডূম্| হৃদ্রোগগুল্মপিডকা অসৃগ্দরং গণ্দমালাং চ||১৪৯|| হন্যাদেতত্ সর্পিঃ পীতং কালে যথাবলং সদ্যঃ| যোগশতৈরপ্যজিতান্মহাবিকারান্মহাতিক্তম্||১৫০|| ইতি মহাতিক্তকং ঘৃতম্|
सप्तच्छदं प्रतिविषां शम्पाकं तिक्तरोहिणीं पाठाम्| मुस्तमुशीरं त्रिफलां पटोलपिचुमर्दपर्पटकम्||१४४|| धन्वयवासं चन्दनमुपकुल्यां पद्मकं हरिद्रे द्वे| षड्ग्रन्थां सविशालां शतावरीं सारिवे चोभे||१४५|| वत्सकबीजं यासं मूर्वाममृतां किराततिक्तं च| कल्कान् कुर्यान्मतिमान्यष्ट्याह्वं त्रायमाणां च||१४६|| कल्कश्चातुर्भागो जलमष्टगुणं रसोऽमृतफलानाम्| द्विगुणो घृतात्प्रदेयस्तत्सर्पिः पाययेत्सिद्धम्||१४७|| कुष्ठानि रक्तपित्तप्रबलान्यर्शांसि रक्तवाहीनि| वीसर्पमम्लपित्तं वातासृक् पाण्डुरोगं च||१४८|| विस्फोटकान्सपामानुन्मादं कामलां ज्वरं कण्डूम्| हृद्रोगगुल्मपिडका असृग्दरं गण्दमालां च||१४९|| हन्यादेतत् सर्पिः पीतं काले यथाबलं सद्यः| योगशतैरप्यजितान्महाविकारान्महातिक्तम्||१५०|| इति महातिक्तकं घृतम्|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 39 (151) · Śloka 151
দোষে হৃতেঽপনীতে রক্তে বাহ্যান্তরে কৃতে শমনে | স্নেহে চ কালযুক্তে ন কুষ্ঠমনুবর্ততে সাধ্যম্||১৫১||
दोषे हृतेऽपनीते रक्ते बाह्यान्तरे कृते शमने | स्नेहे च कालयुक्ते न कुष्ठमनुवर्तते साध्यम्||१५१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 40 (152-156) · Śloka 156
খদিরস্য তুলাঃ পঞ্চ শিংশপাসনযোস্তুলে| তুলার্ধাঃ সর্ব এবৈতে করঞ্জারিষ্টবেতসাঃ||১৫২|| পর্পটঃ কুটজশ্চৈব বৃষঃ কৃমিহরস্তথা| হরিদ্রে কৃতমালশ্চ গুডূচী ত্রিফলা ত্রিবৃত্||১৫৩|| সপ্তপর্ণশ্চ সঙ্ক্ষুণ্ণা দশদ্রোণেষু বারিণঃ| অষ্টভাগাবশেষং তু কষাযমবতারযেত্||১৫৪|| ধাত্রীরসং চ তুল্যাংশং সর্পিষশ্চাঢকং পচেত্| মহাতিক্তককল্কৈস্তু যথোক্তৈঃ পলসম্মিতৈঃ||১৫৫|| নিহন্তি সর্বকুষ্ঠানি পানাভ্যঙ্গনিষেবণাত্| মহাখদিরমিত্যেতত্ পরং কুষ্ঠবিকারনুত্||১৫৬|| ইতি মহাখদিরং ঘৃতম্|
खदिरस्य तुलाः पञ्च शिंशपासनयोस्तुले| तुलार्धाः सर्व एवैते करञ्जारिष्टवेतसाः||१५२|| पर्पटः कुटजश्चैव वृषः कृमिहरस्तथा| हरिद्रे कृतमालश्च गुडूची त्रिफला त्रिवृत्||१५३|| सप्तपर्णश्च सङ्क्षुण्णा दशद्रोणेषु वारिणः| अष्टभागावशेषं तु कषायमवतारयेत्||१५४|| धात्रीरसं च तुल्यांशं सर्पिषश्चाढकं पचेत्| महातिक्तककल्कैस्तु यथोक्तैः पलसम्मितैः||१५५|| निहन्ति सर्वकुष्ठानि पानाभ्यङ्गनिषेवणात्| महाखदिरमित्येतत् परं कुष्ठविकारनुत्||१५६|| इति महाखदिरं घृतम्|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 41 (157-161) · Śloka 161
প্রপতত্সু লসীকাপ্রস্রুতেষু গাত্রেষু জন্তুজগ্ধেষু| মূত্রং নিম্ববিডঙ্গে স্নানং পানং প্রদেহশ্চ||১৫৭|| বৃষকুটজসপ্তপর্ণাঃ করবীরকরঞ্জনিম্বখদিরাশ্চ| স্নানে পানে লেপে ক্রিমিকুষ্ঠনুদঃ সগোমূত্রাঃ||১৫৮|| পানাহারবিধানে প্রসেচনে ধূপনে প্রদেহে চ| কৃমিনাশনং বিডঙ্গং বিশিষ্যতে কুষ্ঠহা খদিরঃ||১৫৯|| এডগজঃ সবিডঙ্গো মূলান্যারগ্বধস্য কুষ্ঠানাম্| উদ্দালনং শ্বদন্তা গোশ্ববরাহোষ্ট্রদন্তাশ্চ||১৬০|| এদগজঃ সবিডঙ্গো দ্বে চ নিশে রাজবৃক্ষমূলং চ| কুষ্ঠোদ্দালনমগ্র্যং সপিপ্পলীপাকলং যোজ্যম্||১৬১||
प्रपतत्सु लसीकाप्रस्रुतेषु गात्रेषु जन्तुजग्धेषु| मूत्रं निम्बविडङ्गे स्नानं पानं प्रदेहश्च||१५७|| वृषकुटजसप्तपर्णाः करवीरकरञ्जनिम्बखदिराश्च| स्नाने पाने लेपे क्रिमिकुष्ठनुदः सगोमूत्राः||१५८|| पानाहारविधाने प्रसेचने धूपने प्रदेहे च| कृमिनाशनं विडङ्गं विशिष्यते कुष्ठहा खदिरः||१५९|| एडगजः सविडङ्गो मूलान्यारग्वधस्य कुष्ठानाम्| उद्दालनं श्वदन्ता गोश्ववराहोष्ट्रदन्ताश्च||१६०|| एदगजः सविडङ्गो द्वे च निशे राजवृक्षमूलं च| कुष्ठोद्दालनमग्र्यं सपिप्पलीपाकलं योज्यम्||१६१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 42 (162-172) · Śloka 172
শ্বিত্রাণাং সবিশেষং যোক্তব্যং সর্বতো বিশুদ্ধানাম্| শ্বিত্রে স্রংসনমগ্র্যং মলপূরস ইষ্যতে সগুডঃ||১৬২|| তং পীত্বা সুস্নিগ্ধো যথাবলং সূর্যপাদসন্তাপম্| সংসেবেত বিরিক্তস্ত্র্যহং পিপাসুঃ পিবেত্ পেযাম্||১৬৩|| শ্বিত্রেঽঙ্গে যে স্ফোটা জাযন্তে কণ্টকেন তান্ভিন্দ্যাত্| স্ফোটেষু বিস্রুতেষু প্রাতঃ প্রাতঃ পিবেত্ পক্ষম্||১৬৪|| মলপূমসনং প্রিযঙ্গুং শতপুষ্পাং চাম্ভসা সমুত্ক্বাথ্য| পালাশং বা ক্ষারং যথাবলং ফাণিতোপেতম্||১৬৫|| যচ্চান্যত্ কুষ্ঠঘ্নং শ্বিত্রাণাং সর্বমেব তচ্ছস্তম্| খদিরোদকসংযুক্তং খদিরোদকপানগ্র্যং বা||১৬৬|| সমনঃশিলং বিডঙ্গং কাসীসং রোচনাং কনকপুষ্পীম্| শ্বিত্রাণাং প্রশমার্থং সসৈন্ধবং লেপনং দদ্যাত্||১৬৭|| কদলীক্ষারযুতং বা খরাস্থি দগ্ধং গবাং রুধিরযুক্তম্| হস্তিমদাধ্যুষিতং বা মালত্যাঃ কোরকক্ষারম্||১৬৮|| নীলোত্পলং সকুষ্ঠং সসৈন্ধবং হস্তিমূত্রপিষ্টং বা| মূলকবীজাবল্গুজলেপঃ পিষ্টো গবাং মূত্রে||১৬৯|| কাকোদুম্বরিকা বা সাবল্গুজচিত্রকা গবাং মূত্রে| পিষ্টা মনঃশিলা বা সংযুক্তা বর্হিপিত্তেন||১৭০|| লেপঃ কিলাসহন্তা বীজান্যাবল্গুজানি লাক্ষা চ| গোপিত্তমঞ্জনে দ্বে পিপ্পল্যঃ কাললোহরজঃ||১৭১|| শুদ্ধ্যা শোণিতমোক্ষৈর্বিরূক্ষণৈর্ভক্ষণৈশ্চ সক্তূনাম্| শ্বিত্রং কস্যচিদেব প্রণশ্যতি ক্ষীণপাপস্য||১৭২||
श्वित्राणां सविशेषं योक्तव्यं सर्वतो विशुद्धानाम्| श्वित्रे स्रंसनमग्र्यं मलपूरस इष्यते सगुडः||१६२|| तं पीत्वा सुस्निग्धो यथाबलं सूर्यपादसन्तापम्| संसेवेत विरिक्तस्त्र्यहं पिपासुः पिबेत् पेयाम्||१६३|| श्वित्रेऽङ्गे ये स्फोटा जायन्ते कण्टकेन तान्भिन्द्यात्| स्फोटेषु विस्रुतेषु प्रातः प्रातः पिबेत् पक्षम्||१६४|| मलपूमसनं प्रियङ्गुं शतपुष्पां चाम्भसा समुत्क्वाथ्य| पालाशं वा क्षारं यथाबलं फाणितोपेतम्||१६५|| यच्चान्यत् कुष्ठघ्नं श्वित्राणां सर्वमेव तच्छस्तम्| खदिरोदकसंयुक्तं खदिरोदकपानग्र्यं वा||१६६|| समनःशिलं विडङ्गं कासीसं रोचनां कनकपुष्पीम्| श्वित्राणां प्रशमार्थं ससैन्धवं लेपनं दद्यात्||१६७|| कदलीक्षारयुतं वा खरास्थि दग्धं गवां रुधिरयुक्तम्| हस्तिमदाध्युषितं वा मालत्याः कोरकक्षारम्||१६८|| नीलोत्पलं सकुष्ठं ससैन्धवं हस्तिमूत्रपिष्टं वा| मूलकबीजावल्गुजलेपः पिष्टो गवां मूत्रे||१६९|| काकोदुम्बरिका वा सावल्गुजचित्रका गवां मूत्रे| पिष्टा मनःशिला वा संयुक्ता बर्हिपित्तेन||१७०|| लेपः किलासहन्ता बीजान्यावल्गुजानि लाक्षा च| गोपित्तमञ्जने द्वे पिप्पल्यः काललोहरजः||१७१|| शुद्ध्या शोणितमोक्षैर्विरूक्षणैर्भक्षणैश्च सक्तूनाम्| श्वित्रं कस्यचिदेव प्रणश्यति क्षीणपापस्य||१७२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 43 (173-176) · Śloka 176
দারুণং চারুণং শ্বিত্রং কিলাসং নামভিস্ত্রিভিঃ| বিজ্ঞেযং ত্রিবিধং তচ্চ ত্রিদোষং প্রাযশশ্চ তত্||১৭৩|| দোষে রক্তাশ্রিতে রক্তং তাম্রং মাংসসমাশ্রিতে| শ্বেতং মেদঃশ্রিতে শ্বিত্রং গুরু তচ্চোত্তরোত্তরম্||১৭৪|| যত্ পরস্পরতোঽভিন্নং বহু যদ্রক্তলোমবত্| যচ্চ বর্ষগণোত্পন্নং তচ্ছ্বিত্রং নৈব সিধ্যতি||১৭৫|| অরক্তলোম তনু যত্ পাণ্ডু নাতিচিরোত্থিতম্| মধ্যাবকাশে চোচ্ছূনং শ্বিত্রং তত্সাধ্যমুচ্যতে||১৭৬||
दारुणं चारुणं श्वित्रं किलासं नामभिस्त्रिभिः| विज्ञेयं त्रिविधं तच्च त्रिदोषं प्रायशश्च तत्||१७३|| दोषे रक्ताश्रिते रक्तं ताम्रं मांससमाश्रिते| श्वेतं मेदःश्रिते श्वित्रं गुरु तच्चोत्तरोत्तरम्||१७४|| यत् परस्परतोऽभिन्नं बहु यद्रक्तलोमवत्| यच्च वर्षगणोत्पन्नं तच्छ्वित्रं नैव सिध्यति||१७५|| अरक्तलोम तनु यत् पाण्डु नातिचिरोत्थितम्| मध्यावकाशे चोच्छूनं श्वित्रं तत्साध्यमुच्यते||१७६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 44 (177) · Śloka 177
বচাংস্যতথ্যানি কৃতঘ্নভাবো নিন্দা সুরাণাং গুরুধর্ষণং চ| পাপক্রিযা পূর্বকৃতং চ কর্ম হেতুঃ কিলাসস্য বিরোধি চান্নম্||১৭৭||
वचांस्यतथ्यानि कृतघ्नभावो निन्दा सुराणां गुरुधर्षणं च| पापक्रिया पूर्वकृतं च कर्म हेतुः किलासस्य विरोधि चान्नम्||१७७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 45 (178-180) · Śloka 180
তত্র শ্লোকাঃ- হেতুর্দ্রব্যং লিঙ্গং বিবিধং যে যেষু চাধিকা দোষাঃ| কুষ্ঠেষু দোষলিঙ্গং সমাসতো দোষনির্দেশঃ||১৭৮|| সাধ্যমসাধ্যং কৃচ্ছ্রং কুষ্ঠং কুষ্ঠাপহাশ্চ যে যোগাঃ| সিদ্ধাঃ কিলাসহেতুর্লিঙ্গং গুরুলাঘবং তথা শান্তিঃ||১৭৯|| ইতি সঙ্গ্রহঃ প্রণীতো মহর্ষিণা কুষ্ঠনাশনেঽধ্যাযে| স্মৃতিবুদ্ধিবর্ঘনার্থং শিষ্যায হুতাশবেশায||১৮০||
तत्र श्लोकाः- हेतुर्द्रव्यं लिङ्गं विविधं ये येषु चाधिका दोषाः| कुष्ठेषु दोषलिङ्गं समासतो दोषनिर्देशः||१७८|| साध्यमसाध्यं कृच्छ्रं कुष्ठं कुष्ठापहाश्च ये योगाः| सिद्धाः किलासहेतुर्लिङ्गं गुरुलाघवं तथा शान्तिः||१७९|| इति सङ्ग्रहः प्रणीतो महर्षिणा कुष्ठनाशनेऽध्याये| स्मृतिबुद्धिवर्घनार्थं शिष्याय हुताशवेशाय||१८०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana puShpikA · Śloka 7
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সিতস্থানে কুষ্ঠচিকিত্সিতং নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ||৭||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने कुष्ठचिकित्सितं नाम सप्तमोऽध्यायः||७||
🔊 Audio coming soon