Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো রাজযক্ষ্মচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो राजयक्ष्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো রাজযক্ষ্মচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो राजयक्ष्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-12) · Śloka 12
দিবৌকসাং কথযতামৃষিভির্বৈ শ্রুতা কথা| কামব্যসনসংযুক্তা পৌরাণী শশিনং প্রতি||৩|| রোহিণ্যামতিসক্তস্য শরীরং নানুরক্ষতঃ| আজগামাল্পতামিন্দোর্দেহঃ স্নেহপরিক্ষযাত্||৪|| দুহিতৄণামসম্ভোগাচ্ছেষাণাং চ প্রজাপতেঃ| ক্রোধো নিঃশ্বাসরূপেণ মূর্তিমান্ নিঃসৃতো মুখাত্||৫|| প্রজাপতের্হি দুহিতৄরষ্টাবিংশতিমংশুমান্| ভার্যার্থং প্রতিজগ্রাহ ন চ সর্বাস্ববর্তত||৬|| গুরুণা তমবধ্যাতং ভার্যাস্বসমবর্তিনম্| রজঃপরীতমবলং যক্ষ্মা শশিনমাবিশত্||৭|| সোঽভিভূতোঽতিমহতা গুরুক্রোধেন নিষ্প্রভঃ| দেবদেবর্ষিসহিতো জগাম শরণং গুরুম্||৮|| অথ চন্দ্রমসঃ শুদ্ধাং মতিং বুদ্ধ্বা প্রজাপতিঃ| প্রসাদং কৃতবান্ সোমস্ততোঽশ্বিভ্যাং চিকিত্সিতঃ||৯|| স বিমুক্তগ্রহশ্চন্দ্রো বিররাজ বিশেষতঃ| ওজসা বর্ধিতোঽশ্বিভ্যাং শুদ্ধং সত্ত্বমবাপ চ||১০|| ক্রোধো যক্ষ্মা জ্বরো রোগ একার্থো দুঃখসঞ্জ্ঞকঃ| যস্মাত্ স রাজ্ঞঃ প্রাগাসীদ্রাজযক্ষ্মা ততো মতঃ||১১|| স যক্ষ্মা হুঙ্কৃতোঽশ্বিভ্যাং মানুষং লোকমাগতঃ| লব্ধ্বা চতুর্বিধং হেতুং সমাবিশতি মানবান্||১২||
दिवौकसां कथयतामृषिभिर्वै श्रुता कथा| कामव्यसनसंयुक्ता पौराणी शशिनं प्रति||३|| रोहिण्यामतिसक्तस्य शरीरं नानुरक्षतः| आजगामाल्पतामिन्दोर्देहः स्नेहपरिक्षयात्||४|| दुहितॄणामसम्भोगाच्छेषाणां च प्रजापतेः| क्रोधो निःश्वासरूपेण मूर्तिमान् निःसृतो मुखात्||५|| प्रजापतेर्हि दुहितॄरष्टाविंशतिमंशुमान्| भार्यार्थं प्रतिजग्राह न च सर्वास्ववर्तत||६|| गुरुणा तमवध्यातं भार्यास्वसमवर्तिनम्| रजःपरीतमबलं यक्ष्मा शशिनमाविशत्||७|| सोऽभिभूतोऽतिमहता गुरुक्रोधेन निष्प्रभः| देवदेवर्षिसहितो जगाम शरणं गुरुम्||८|| अथ चन्द्रमसः शुद्धां मतिं बुद्ध्वा प्रजापतिः| प्रसादं कृतवान् सोमस्ततोऽश्विभ्यां चिकित्सितः||९|| स विमुक्तग्रहश्चन्द्रो विरराज विशेषतः| ओजसा वर्धितोऽश्विभ्यां शुद्धं सत्त्वमवाप च||१०|| क्रोधो यक्ष्मा ज्वरो रोग एकार्थो दुःखसञ्ज्ञकः| यस्मात् स राज्ञः प्रागासीद्राजयक्ष्मा ततो मतः||११|| स यक्ष्मा हुङ्कृतोऽश्विभ्यां मानुषं लोकमागतः| लब्ध्वा चतुर्विधं हेतुं समाविशति मानवान्||१२||
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Adhikarana 3 (13) · Śloka 13
অযথাবলমারম্ভং বেগসন্ধারণং ক্ষযম্| যক্ষ্মণঃ কারণং বিদ্যাচ্চতুর্থং বিষমাশনম্||১৩||
अयथाबलमारम्भं वेगसन्धारणं क्षयम्| यक्ष्मणः कारणं विद्याच्चतुर्थं विषमाशनम्||१३||
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Adhikarana 4 (14-19) · Śloka 19
যুদ্ধাধ্যযনভারাধ্বলঙ্ঘনপ্লবনাদিভিঃ| পতনৈরভিঘাতৈর্বা সাহসৈর্বা তথাঽপরৈঃ||১৪|| অযথাবলমারম্ভৈর্জন্তোরুরসি বিক্ষতে| বাযুঃ প্রকুপিতো দোষাবুদীর্যোভৌ প্রধাবতি||১৫|| স শিরঃস্থঃ শিরঃশূলং করোতি গলমাশ্রিতঃ| কণ্ঠোদ্ধ্বংসং চ কাসং চ স্বরভেদমরোচকম্||১৬|| পার্শ্বশূলং চ পার্শ্বস্থো বর্চোভেদং গুদে স্থিতঃ| জৃম্ভাং জ্বরং চ সন্ধিস্থ উরঃস্থশ্চোরসো রুজম্||১৭|| ক্ষণনাদুরসঃ কাসাত্ কফং ষ্ঠীবেত্ সশোণিতম্| জর্জরেণোরসা কৃচ্ছ্রমুরঃশূলাতিপীডিতঃ||১৮|| ইতি সাহসিকো যক্ষ্মা রূপৈরেতৈঃ প্রপদ্যতে| একাদশভিরাত্মজ্ঞো ভজেত্তস্মান্ন সাহসম্||১৯||
युद्धाध्ययनभाराध्वलङ्घनप्लवनादिभिः| पतनैरभिघातैर्वा साहसैर्वा तथाऽपरैः||१४|| अयथाबलमारम्भैर्जन्तोरुरसि विक्षते| वायुः प्रकुपितो दोषावुदीर्योभौ प्रधावति||१५|| स शिरःस्थः शिरःशूलं करोति गलमाश्रितः| कण्ठोद्ध्वंसं च कासं च स्वरभेदमरोचकम्||१६|| पार्श्वशूलं च पार्श्वस्थो वर्चोभेदं गुदे स्थितः| जृम्भां ज्वरं च सन्धिस्थ उरःस्थश्चोरसो रुजम्||१७|| क्षणनादुरसः कासात् कफं ष्ठीवेत् सशोणितम्| जर्जरेणोरसा कृच्छ्रमुरःशूलातिपीडितः||१८|| इति साहसिको यक्ष्मा रूपैरेतैः प्रपद्यते| एकादशभिरात्मज्ञो भजेत्तस्मान्न साहसम्||१९||
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Adhikarana 5 (20-23) · Śloka 23
হ্রীমত্ত্বাদ্বা ঘৃণিত্বাদ্বা ভযাদ্বা বেগমাগতম্| বাতমূত্রপুরীষাণাং নিগৃহ্ণাতি যদা নরঃ||২০|| তদা বেগপ্রতীঘাতাত্ কফপিত্তে সমীরযন্| ঊর্ধ্বং তির্যগধশ্চৈব বিকারান্ কুরুতেঽনিলঃ||২১|| প্রতিশ্যাযং চ কাসং চ স্বরভেদমরোচকম্| পার্শ্বশূলং শিরঃশূলং জ্বরমংসাবমর্দনম্||২২|| অঙ্গমর্দং মুহুশ্ছর্দিং বর্চোভেদং ত্রিলক্ষণম্| রূপাণ্যেকাদশৈতানি যক্ষ্মা যৈরুচ্যতে মহান্||২৩||
ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम्| वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः||२०|| तदा वेगप्रतीघातात् कफपित्ते समीरयन्| ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव विकारान् कुरुतेऽनिलः||२१|| प्रतिश्यायं च कासं च स्वरभेदमरोचकम्| पार्श्वशूलं शिरःशूलं ज्वरमंसावमर्दनम्||२२|| अङ्गमर्दं मुहुश्छर्दिं वर्चोभेदं त्रिलक्षणम्| रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मा यैरुच्यते महान्||२३||
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Adhikarana 6 (24-27) · Śloka 27
ঈর্ষ্যোত্কণ্ঠাভযত্রাসক্রোধশোকাতিকর্শনাত্| অতিব্যবাযানশনাচ্ছুক্রমোজশ্চ হীযতে||২৪|| ততঃ স্নেহক্ষযাদ্বাযুর্বৃদ্ধো দোষাবুদীরযন্| প্রতিশ্যাযং জ্বরং কাসমঙ্গমর্দং শিরোরুজম্||২৫|| শ্বাসং বিড্ভেদমরুচিং পার্শ্বশূলং স্বরক্ষযম্| করোতি চাংসসন্তাপমেকাদশগদানিমান্ ||২৬|| লিঙ্গান্যাবেদযন্ত্যেতান্যেকাদশ মহাগদম্| সম্প্রাপ্তং রাজযক্ষ্মাণং ক্ষযাত্ প্রাণক্ষযপ্রদম্||২৭||
ईर्ष्योत्कण्ठाभयत्रासक्रोधशोकातिकर्शनात्| अतिव्यवायानशनाच्छुक्रमोजश्च हीयते||२४|| ततः स्नेहक्षयाद्वायुर्वृद्धो दोषावुदीरयन्| प्रतिश्यायं ज्वरं कासमङ्गमर्दं शिरोरुजम्||२५|| श्वासं विड्भेदमरुचिं पार्श्वशूलं स्वरक्षयम्| करोति चांससन्तापमेकादशगदानिमान् ||२६|| लिङ्गान्यावेदयन्त्येतान्येकादश महागदम्| सम्प्राप्तं राजयक्ष्माणं क्षयात् प्राणक्षयप्रदम्||२७||
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Adhikarana 7 (28-32) · Śloka 32
বিবিধান্যন্নপানানি বৈষম্যেণ সমশ্নতঃ| জনযন্ত্যামযান্ ঘোরান্বিষমান্মারুতাদযঃ||২৮|| স্রোতাংসি রুধিরাদীনাং বৈষম্যাদ্বিষমং গতাঃ| রুদ্ধ্বা রোগায কল্পন্তে পুষ্যন্তি চ ন ধাতবঃ||২৯|| প্রতিশ্যাযং প্রসেকং চ কাসং ছর্দিমরোচকম্| জ্বরমংসাভিতাপং চ ছর্দনং রুধিরস্য চ||৩০|| পার্শ্বশূলং শিরঃশূলং স্বরভেদমথাপি চ| কফপিত্তানিলকৃতং লিঙ্গং বিদ্যাদ্যথাক্রমম্||৩১|| ইতি ব্যাধিসমূহস্য রোগরাজস্য হেতুজম্| রূপমেকাদশবিধং হেতুশ্চোক্তশ্চতুর্বিধঃ||৩২||
विविधान्यन्नपानानि वैषम्येण समश्नतः| जनयन्त्यामयान् घोरान्विषमान्मारुतादयः||२८|| स्रोतांसि रुधिरादीनां वैषम्याद्विषमं गताः| रुद्ध्वा रोगाय कल्पन्ते पुष्यन्ति च न धातवः||२९|| प्रतिश्यायं प्रसेकं च कासं छर्दिमरोचकम्| ज्वरमंसाभितापं च छर्दनं रुधिरस्य च||३०|| पार्श्वशूलं शिरःशूलं स्वरभेदमथापि च| कफपित्तानिलकृतं लिङ्गं विद्याद्यथाक्रमम्||३१|| इति व्याधिसमूहस्य रोगराजस्य हेतुजम्| रूपमेकादशविधं हेतुश्चोक्तश्चतुर्विधः||३२||
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Adhikarana 8 (33-37) · Śloka 38
পূর্বরূপং প্রতিশ্যাযো দৌর্বল্যং দোষদর্শনম্| অদোষেষ্বপি ভাবেষু কাযে বীভত্সদর্শনম্||৩৩|| ঘৃণিত্বমশ্নতশ্চাপি বলমাংসপরিক্ষযঃ| স্ত্রীমদ্যমাংসপ্রিযতা প্রিযতা চাবগুণ্ঠনে||৩৪|| মক্ষিকাঘুণকেশানাং তৃণানাং পতনানি চ| প্রাযোঽন্নপানে কেশানাং নখানাং চাভিবর্ধনম্||৩৫|| পতত্রিভিঃ পতঙ্গৈশ্চ শ্বাপদৈশ্চাভিধর্ষণম্| স্বপ্নে কেশাস্থিরাশীনাং ভস্মনশ্চাধিরোহণম্||৩৬|| জলাশযানাং শৈলানাং বনানাং জ্যোতিষামপি| শুষ্যতাং ক্ষীযমাণানাং পততাং যচ্চ দর্শনম্||৩৭|| প্রাগ্রূপং বহুরূপস্য তজ্জ্ঞেযং রাজযক্ষ্মণঃ|৩৮|
पूर्वरूपं प्रतिश्यायो दौर्बल्यं दोषदर्शनम्| अदोषेष्वपि भावेषु काये बीभत्सदर्शनम्||३३|| घृणित्वमश्नतश्चापि बलमांसपरिक्षयः| स्त्रीमद्यमांसप्रियता प्रियता चावगुण्ठने||३४|| मक्षिकाघुणकेशानां तृणानां पतनानि च| प्रायोऽन्नपाने केशानां नखानां चाभिवर्धनम्||३५|| पतत्रिभिः पतङ्गैश्च श्वापदैश्चाभिधर्षणम्| स्वप्ने केशास्थिराशीनां भस्मनश्चाधिरोहणम्||३६|| जलाशयानां शैलानां वनानां ज्योतिषामपि| शुष्यतां क्षीयमाणानां पततां यच्च दर्शनम्||३७|| प्राग्रूपं बहुरूपस्य तज्ज्ञेयं राजयक्ष्मणः|३८|
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Adhikarana 9 (38-47) · Śloka 47
রূপং ত্বস্য যথোদ্দেশং নির্দেক্ষ্যামি সভেষজম্||৩৮|| যথাস্বেনোষ্মণা পাকং শারীরা যান্তি ধাতবঃ| স্রোতসা চ যথাস্বেন ধাতুঃ পুষ্যতি ধাতুতঃ||৩৯|| স্রোতসাং সন্নিরোধাচ্চ রক্তাদীনাং চ সঙ্ক্ষযাত্| ধাতূষ্মণাং চাপচযাদ্রাজযক্ষ্মা প্রবর্ততে||৪০|| তস্মিন্ কালে পচত্যগ্নির্যদন্নং কোষ্ঠসংশ্রিতম্| মলীভবতি তত্ প্রাযঃ কল্পতে কিঞ্চিদোজসে||৪১|| তস্মাত্ পুরীষং সংরক্ষ্যং বিশেষাদ্রাজযক্ষ্মিণঃ| সর্বধাতুক্ষযার্তস্য বলং তস্য হি বিড্বলম্||৪২|| রসঃ স্রোতঃসু রুদ্ধেষু স্বস্থানস্থো বিদহ্যতে | স ঊর্ধ্বং কাসবেগেন বহুরূপঃ প্রবর্ততে||৪৩|| জাযন্তে ব্যাধযশ্চাতঃ ষডেকাদশ বা পুনঃ| যেষাং সঙ্ঘাতযোগেন রাজযক্ষ্মেতি কথ্যতে||৪৪|| কাসোংঽসতাপো বৈস্বর্যং জ্বরঃ পার্শ্বশিরোরুজা| ছর্দনং রক্তকফযোঃ শ্বাসবর্চোগদোঽরুচিঃ||৪৫|| রূপাণ্যেকাদশৈতানি যক্ষ্মণঃ ষডিমানি বা| কাসো জ্বরঃ পার্শ্বশূলং স্বরবর্চোগদোঽরুচিঃ||৪৬|| সর্বৈরর্ধৈস্ত্রিভির্বাঽপি লিঙ্গৈর্মাংসবলক্ষযে| যুক্তো বর্জ্যশ্চিকিত্স্যস্তু সর্বরূপোঽপ্যতোঽন্যথা||৪৭||
रूपं त्वस्य यथोद्देशं निर्देक्ष्यामि सभेषजम्||३८|| यथास्वेनोष्मणा पाकं शारीरा यान्ति धातवः| स्रोतसा च यथास्वेन धातुः पुष्यति धातुतः||३९|| स्रोतसां सन्निरोधाच्च रक्तादीनां च सङ्क्षयात्| धातूष्मणां चापचयाद्राजयक्ष्मा प्रवर्तते||४०|| तस्मिन् काले पचत्यग्निर्यदन्नं कोष्ठसंश्रितम्| मलीभवति तत् प्रायः कल्पते किञ्चिदोजसे||४१|| तस्मात् पुरीषं संरक्ष्यं विशेषाद्राजयक्ष्मिणः| सर्वधातुक्षयार्तस्य बलं तस्य हि विड्बलम्||४२|| रसः स्रोतःसु रुद्धेषु स्वस्थानस्थो विदह्यते | स ऊर्ध्वं कासवेगेन बहुरूपः प्रवर्तते||४३|| जायन्ते व्याधयश्चातः षडेकादश वा पुनः| येषां सङ्घातयोगेन राजयक्ष्मेति कथ्यते||४४|| कासोंऽसतापो वैस्वर्यं ज्वरः पार्श्वशिरोरुजा| छर्दनं रक्तकफयोः श्वासवर्चोगदोऽरुचिः||४५|| रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मणः षडिमानि वा| कासो ज्वरः पार्श्वशूलं स्वरवर्चोगदोऽरुचिः||४६|| सर्वैरर्धैस्त्रिभिर्वाऽपि लिङ्गैर्मांसबलक्षये| युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा||४७||
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Adhikarana 10 (48-50) · Śloka 50
ঘ্রাণমূলে স্থিতঃ শ্লেষ্মা রুধিরং পিত্তমেব বা| মারুতাধ্মাতশিরসো মারুতং শ্যাযতে প্রতি||৪৮|| প্রতিশ্যাযস্ততো ঘোরো জাযতে দেহকর্শনঃ| তস্য রূপং শিরঃশূলং গৌরবং ঘ্রাণবিপ্লবঃ||৪৯|| জ্বরঃ কাসঃ কফোত্ক্লেশঃ স্বরভেদোঽরুচিঃ ক্লমঃ| ইন্দ্রিযাণামসামর্থ্যং যক্ষ্মা চাতঃ প্রজাযতে||৫০||
घ्राणमूले स्थितः श्लेष्मा रुधिरं पित्तमेव वा| मारुताध्मातशिरसो मारुतं श्यायते प्रति||४८|| प्रतिश्यायस्ततो घोरो जायते देहकर्शनः| तस्य रूपं शिरःशूलं गौरवं घ्राणविप्लवः||४९|| ज्वरः कासः कफोत्क्लेशः स्वरभेदोऽरुचिः क्लमः| इन्द्रियाणामसामर्थ्यं यक्ष्मा चातः प्रजायते||५०||
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Adhikarana 11 (51) · Śloka 51
পিচ্ছিলং বহলং বিস্রং হরিতং শ্বেতপীতকম্| কাসমানো রসং যক্ষ্মী নিষ্ঠীবতি কফানুগম্||৫১||
पिच्छिलं बहलं विस्रं हरितं श्वेतपीतकम्| कासमानो रसं यक्ष्मी निष्ठीवति कफानुगम्||५१||
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Adhikarana 12 (52) · Śloka 52
অংসপার্শ্বাভিতাপশ্চ সন্তাপঃ করপাদযোঃ| জ্বরঃ সর্বাঙ্গগশ্চেতি লক্ষণং রাজযক্ষ্মণঃ||৫২||
अंसपार्श्वाभितापश्च सन्तापः करपादयोः| ज्वरः सर्वाङ्गगश्चेति लक्षणं राजयक्ष्मणः||५२||
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Adhikarana 13 (53-56) · Śloka 56
বাতাত্পিত্তাত্কফাদ্রক্তাত্ কাসবেগাত্ সপীনসাত্| স্বরভেদো ভবেদ্বাতাদ্রূক্ষঃ ক্ষামশ্চলঃ স্বরঃ||৫৩|| তালুকণ্ঠপরিপ্লোষঃ পিত্তাদ্বক্তুমসূযতে| কফাদ্ভেদো বিবদ্ধশ্চ স্বরঃ খুরখুরাযতে ||৫৪|| সন্নো রক্তবিবদ্ধত্বাত্ স্বরঃ কৃচ্ছ্রাত্ প্রবর্ততে| কাসাতিবেগাত্ কষণঃ পীনসাত্কফবাতিকঃ||৫৫|| পার্শ্বশূলং ত্বনিযতং সঙ্কোচাযামলক্ষণম্| শিরঃশূলং সসন্তাপং যক্ষ্মিণঃ স্যাত্সগৌরবম্||৫৬||
वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात् कासवेगात् सपीनसात्| स्वरभेदो भवेद्वाताद्रूक्षः क्षामश्चलः स्वरः||५३|| तालुकण्ठपरिप्लोषः पित्ताद्वक्तुमसूयते| कफाद्भेदो विबद्धश्च स्वरः खुरखुरायते ||५४|| सन्नो रक्तविबद्धत्वात् स्वरः कृच्छ्रात् प्रवर्तते| कासातिवेगात् कषणः पीनसात्कफवातिकः||५५|| पार्श्वशूलं त्वनियतं सङ्कोचायामलक्षणम्| शिरःशूलं ससन्तापं यक्ष्मिणः स्यात्सगौरवम्||५६||
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Adhikarana 14 (57) · Śloka 57
অভিসন্নে শরীরে তু যক্ষ্মিণো বিষমাশনাত্| কণ্ঠাত্প্রবর্ততে রক্তং শ্লেষ্মা চোত্ক্লিষ্টসঞ্চিতঃ||৫৭||
अभिसन्ने शरीरे तु यक्ष्मिणो विषमाशनात्| कण्ठात्प्रवर्तते रक्तं श्लेष्मा चोत्क्लिष्टसञ्चितः||५७||
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Adhikarana 15 (58-59) · Śloka 59
রক্তং বিবদ্ধমার্গত্বান্মাংসাদীন্নানুপদ্যতে | আমাশযস্থমুত্ক্লিষ্টং বহুত্বাত্ কণ্ঠমেতি চ||৫৮|| বাতশ্লেষ্মবিবদ্ধত্বাদুরসঃ শ্বাসমৃচ্ছতি| দোষৈরুপহতে চাগ্নৌ সপিচ্ছমতিসার্যতে||৫৯||
रक्तं विबद्धमार्गत्वान्मांसादीन्नानुपद्यते | आमाशयस्थमुत्क्लिष्टं बहुत्वात् कण्ठमेति च||५८|| वातश्लेष्मविबद्धत्वादुरसः श्वासमृच्छति| दोषैरुपहते चाग्नौ सपिच्छमतिसार्यते||५९||
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Adhikarana 16 (60-61) · Śloka 61
পৃথগ্দোষৈঃ সমস্তৈর্বা জিহ্বাহৃদযসংশ্রিতৈঃ| জাযতেঽরুচিরাহারে দ্বিষ্টৈরর্থৈশ্চ মানসৈঃ||৬০|| কষাযতিক্তমধুরৈর্বিদ্যান্মুখরসৈঃ ক্রমাত্| বাতাদ্যৈররুচিং জাতাং মানসীং দোষদর্শনাত্||৬১||
पृथग्दोषैः समस्तैर्वा जिह्वाहृदयसंश्रितैः| जायतेऽरुचिराहारे द्विष्टैरर्थैश्च मानसैः||६०|| कषायतिक्तमधुरैर्विद्यान्मुखरसैः क्रमात्| वाताद्यैररुचिं जातां मानसीं दोषदर्शनात्||६१||
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Adhikarana 17 (62) · Śloka 62
অরোচকাত্ কাসবেগাদ্দোষোত্ক্লেশাদ্ভযাদপি| ছর্দির্যা সা বিকারাণামন্যেষামপ্যুপদ্রবঃ||৬২||
अरोचकात् कासवेगाद्दोषोत्क्लेशाद्भयादपि| छर्दिर्या सा विकाराणामन्येषामप्युपद्रवः||६२||
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Adhikarana 18 (63-64) · Śloka 64
সর্বস্ত্রিদোষজো যক্ষ্মা দোষাণাং তু বলাবলম্| পরীক্ষ্যাবস্থিকং বৈদ্যঃ শোষিণং সমুপাচরেত্||৬৩|| প্রতিশ্যাযে শিরঃশূলে কাসে শ্বাসে স্বরক্ষযে| পার্শ্বশূলে চ বিবিধাঃ ক্রিযাঃ সাধারণীঃ শৃণু||৬৪||
सर्वस्त्रिदोषजो यक्ष्मा दोषाणां तु बलाबलम्| परीक्ष्यावस्थिकं वैद्यः शोषिणं समुपाचरेत्||६३|| प्रतिश्याये शिरःशूले कासे श्वासे स्वरक्षये| पार्श्वशूले च विविधाः क्रियाः साधारणीः शृणु||६४||
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Adhikarana 19 (65-70) · Śloka 70
পীনসে স্বেদমভ্যঙ্গং ধূমমালেপনানি চ| পরিষেকাবগাহাংশ্চ যাবকং বাট্যমেব চ||৬৫|| লবণাম্লকটূষ্ণাংশ্চ রসান্ স্নেহোপবৃংহিতান্| লাবতিত্তিরিদক্ষাণাং বর্তকানাং চ কল্পযেত্||৬৬|| সপিপ্পলীকং সযবং সকুলত্থং সনাগরম্| দাডিমামলকোপেতং স্নিগ্ধমাজং রসং পিবেত্||৬৭|| তেন ষড্বিনিবর্তন্তে বিকারাঃ পীনসাদযঃ| মূলকানাং কুলত্থানাং যূষৈর্বা সূপকল্পিতৈঃ ||৬৮|| যবগোধূমশাল্যন্নৈর্যথাসাত্ম্যমুপাচরেত্| পিবেত্প্রসাদং বারুণ্যা জলং বা পাঞ্চমূলিকম্||৬৯|| ধান্যনাগরসিদ্ধং বা তামলক্যাঽথবা শৃতম্| পর্ণিনীভিশ্চতসৃভিস্তেন চান্নানি কল্পযেত্||৭০||
पीनसे स्वेदमभ्यङ्गं धूममालेपनानि च| परिषेकावगाहांश्च यावकं वाट्यमेव च||६५|| लवणाम्लकटूष्णांश्च रसान् स्नेहोपबृंहितान्| लावतित्तिरिदक्षाणां वर्तकानां च कल्पयेत्||६६|| सपिप्पलीकं सयवं सकुलत्थं सनागरम्| दाडिमामलकोपेतं स्निग्धमाजं रसं पिबेत्||६७|| तेन षड्विनिवर्तन्ते विकाराः पीनसादयः| मूलकानां कुलत्थानां यूषैर्वा सूपकल्पितैः ||६८|| यवगोधूमशाल्यन्नैर्यथासात्म्यमुपाचरेत्| पिबेत्प्रसादं वारुण्या जलं वा पाञ्चमूलिकम्||६९|| धान्यनागरसिद्धं वा तामलक्याऽथवा शृतम्| पर्णिनीभिश्चतसृभिस्तेन चान्नानि कल्पयेत्||७०||
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Adhikarana 20 (71-76) · Śloka 76
কৃশরোত্কারিকামাষকুলত্থযবপাযসৈঃ| সঙ্করস্বেদবিধিনা কণ্ঠং পার্শ্বমুরঃ শিরঃ||৭১|| স্বেদযেত্ পত্রভঙ্গেণ শিরশ্চ পরিষেচযেত্| বলাগুডূচীমধুকশৃতৈর্বা বারিভিঃ সুখৈঃ||৭২|| বস্তমত্স্যশিরোভির্বা নাডীস্বেদং প্রযোজযেত্| কণ্ঠে শিরসি পার্শ্বে চ পযোভির্বা সবাতিকৈঃ||৭৩|| ঔদকানূপমাংসানি সলিলং পাঞ্চমূলিকম্| সস্নেহমারনালং বা নাডীস্বেদে প্রযোজযেত্||৭৪|| জীবন্ত্যাঃ শতপুষ্পাযা বলাযা মধুকস্য চ| বচাযা বেশবারস্য বিদার্যা মূলকস্য চ||৭৫|| ঔদকানূপমাংসানামুপনাহাঃ সুসংস্কৃতাঃ| শস্যন্তে সচতুঃস্নেহাঃ শিরঃপার্শ্বাংসশূলিনাম্||৭৬||
कृशरोत्कारिकामाषकुलत्थयवपायसैः| सङ्करस्वेदविधिना कण्ठं पार्श्वमुरः शिरः||७१|| स्वेदयेत् पत्रभङ्गेण शिरश्च परिषेचयेत्| बलागुडूचीमधुकशृतैर्वा वारिभिः सुखैः||७२|| बस्तमत्स्यशिरोभिर्वा नाडीस्वेदं प्रयोजयेत्| कण्ठे शिरसि पार्श्वे च पयोभिर्वा सवातिकैः||७३|| औदकानूपमांसानि सलिलं पाञ्चमूलिकम्| सस्नेहमारनालं वा नाडीस्वेदे प्रयोजयेत्||७४|| जीवन्त्याः शतपुष्पाया बलाया मधुकस्य च| वचाया वेशवारस्य विदार्या मूलकस्य च||७५|| औदकानूपमांसानामुपनाहाः सुसंस्कृताः| शस्यन्ते सचतुःस्नेहाः शिरःपार्श्वांसशूलिनाम्||७६||
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Adhikarana 21 (77-81) · Śloka 81
শতপুষ্পা সমধুকং কুষ্ঠং তগরচন্দনে| আলেপনং স্যাত্ সঘৃতং শিরঃপার্শ্বাংসশূলনুত্||৭৭|| বলা রাস্না তিলাঃ সর্পির্মধুকং নীলমুত্পলম্| পলঙ্কষা দেবদারু চন্দনং কেশরং ঘৃতম্||৭৮|| বীরা বলা বিদারী চ কৃষ্ণগন্ধা পুনর্নবা| শতাবরী পযস্যা চ কত্তৃণং মধুকং ঘৃতম্||৭৯|| চত্বার এতে শ্লোকার্ধৈঃ প্রদেহাঃ পরিকীর্তিতাঃ| শস্তাঃ সংসৃষ্টদোষাণাং শিরঃপার্শ্বাংসশূলিনাম্||৮০|| নাবনং ধূমপানানি স্নেহাশ্চৌত্তরভক্তিকাঃ| তৈলান্যভ্যঙ্গযোগীনি বস্তিকর্ম তথা পরম্||৮১||
शतपुष्पा समधुकं कुष्ठं तगरचन्दने| आलेपनं स्यात् सघृतं शिरःपार्श्वांसशूलनुत्||७७|| बला रास्ना तिलाः सर्पिर्मधुकं नीलमुत्पलम्| पलङ्कषा देवदारु चन्दनं केशरं घृतम्||७८|| वीरा बला विदारी च कृष्णगन्धा पुनर्नवा| शतावरी पयस्या च कत्तृणं मधुकं घृतम्||७९|| चत्वार एते श्लोकार्धैः प्रदेहाः परिकीर्तिताः| शस्ताः संसृष्टदोषाणां शिरःपार्श्वांसशूलिनाम्||८०|| नावनं धूमपानानि स्नेहाश्चौत्तरभक्तिकाः| तैलान्यभ्यङ्गयोगीनि बस्तिकर्म तथा परम्||८१||
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Adhikarana 22 (82-86) · Śloka 86
শৃঙ্গালাবুজলৌকোভিঃ প্রদুষ্টং ব্যধনেন বা| শিরঃপার্শ্বাংসশূলেষু রুধিরং তস্য নির্হরেত্||৮২|| প্রদেহঃ সঘৃতশ্চেষ্টঃ পদ্মকোশীরচন্দনৈঃ| দূর্বামধুকমঞ্জিষ্ঠাকেশরৈর্বা ঘৃতাপ্লুতৈঃ||৮৩|| প্রপৌণ্ডরীকনির্গুণ্ডীপদ্মকেশরমুত্পলম্ | কশেরুকাঃ পযস্যা চ সসর্পিষ্কং প্রলেপনম্||৮৪|| চন্দনাদ্যেন তৈলেন শতধৌতেন সর্পিষা| অভ্যঙ্গঃ, পযসা সেকঃ শস্তশ্চ মধুকাম্বুনা||৮৫|| মাহেন্দ্রেণ সুশীতেন চন্দনাদিশৃতেন বা| পরিষেকঃ প্রযোক্তব্য ইতি সংশমনী ক্রিযা||৮৬||
शृङ्गालाबुजलौकोभिः प्रदुष्टं व्यधनेन वा| शिरःपार्श्वांसशूलेषु रुधिरं तस्य निर्हरेत्||८२|| प्रदेहः सघृतश्चेष्टः पद्मकोशीरचन्दनैः| दूर्वामधुकमञ्जिष्ठाकेशरैर्वा घृताप्लुतैः||८३|| प्रपौण्डरीकनिर्गुण्डीपद्मकेशरमुत्पलम् | कशेरुकाः पयस्या च ससर्पिष्कं प्रलेपनम्||८४|| चन्दनाद्येन तैलेन शतधौतेन सर्पिषा| अभ्यङ्गः, पयसा सेकः शस्तश्च मधुकाम्बुना||८५|| माहेन्द्रेण सुशीतेन चन्दनादिशृतेन वा| परिषेकः प्रयोक्तव्य इति संशमनी क्रिया||८६||
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Adhikarana 23 (87-88) · Śloka 88
দোষাধিকানাং বমনং শস্যতে সবিরেচনম্| স্নেহস্বেদোপপন্নানাং সস্নেহং যন্ন কর্শনম্||৮৭|| শোষী মুঞ্চতি গাত্রাণি পুরীষস্রংসনাদপি| অবলাপেক্ষিণীং মাত্রাং কিং পুনর্যো বিরিচ্যতে||৮৮||
दोषाधिकानां वमनं शस्यते सविरेचनम्| स्नेहस्वेदोपपन्नानां सस्नेहं यन्न कर्शनम्||८७|| शोषी मुञ्चति गात्राणि पुरीषस्रंसनादपि| अबलापेक्षिणीं मात्रां किं पुनर्यो विरिच्यते||८८||
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Adhikarana 24 (89-102) · Śloka 102
যোগান্ সংশুদ্ধকোষ্ঠানাং কাসে শ্বাসে স্বরক্ষযে| শিরঃপার্শ্বাংসশূলেষু সিদ্ধানেতান্প্রযোজযেত্||৮৯|| বলাবিদারিগন্ধাদ্যৈর্বিদার্যা মধুকেন বা| সিদ্ধং সলবণং সর্পির্নস্যং স্যাত্স্বর্যমুত্তমম্||৯০|| প্রপৌণ্ডরীকং মধুকং পিপ্পলী বৃহতী বলা| ক্ষীরং সর্পিশ্চ তত্সিদ্ধং স্বর্যং স্যান্নাবনং পরম্||৯১|| শিরঃপার্শ্বাংসশূলঘ্নং কাসশ্বাসনিবর্হণম্| প্রযুজ্যমানং বহুশো ঘৃতং চৌত্তরভক্তিকম্||৯২|| দশমূলেন পযসা সিদ্ধং মাংসরসেন চ| বলাগর্ভং ঘৃতং সদ্যো রোগানেতান্ প্রবাধতে||৯৩|| ভক্তস্যোপরি মধ্যে বা যথাগ্ন্যভ্যবচারিতম্| রাস্নাঘৃতং বা সক্ষীরং সক্ষীরং বা বলাঘৃতম্||৯৪|| লেহান্ কাসাপহান্ স্বর্যাঞ্ শ্বাসহিক্কানিবর্হণান্| শিরঃপার্শ্বাংসশূলঘ্নান্ স্নেহাংশ্চাতঃ পরং শৃণু||৯৫|| ঘৃতং খর্জূরমৃদ্বীকাশর্করাক্ষৌদ্রসংযুতম্ | সপিপ্পলীকং বৈস্বর্যকাসশ্বাসজ্বরাপহম্||৯৬|| দশমূলশৃতাত্ ক্ষীরাত্ সর্পির্যদুদিযান্নবম্| সপিপ্পলীকং সক্ষৌদ্রং তত্ পরং স্বরবোধনম্||৯৭|| শিরঃপার্শ্বাংসশূলঘ্নং কাসশ্বাসজ্বরাপহম্| পঞ্চভিঃ পঞ্চমূলৈর্বা শৃতাদ্যদুদিযাদ্ঘৃতম্||৯৮|| পঞ্চানাং পঞ্চমূলানাং রসে ক্ষীরচতুর্গুণে| সিদ্ধং সর্পির্জযত্যেতদ্যক্ষ্মণঃ সপ্তকং বলম্||৯৯|| খর্জূরং পিপ্পলী দ্রাক্ষা পথ্যা শৃঙ্গী দুরালভা| ত্রিফলা পিপ্পলী মুস্তং শৃঙ্গাটগুডশর্করাঃ||১০০|| বীরা শটী পুষ্করাখ্যং সুরসঃ শর্করা গুডঃ| নাগরং চিত্রকো লাজাঃ পিপ্পল্যামলকং গুডঃ||১০১|| শ্লোকার্ধৈর্বিহিতানেতাংল্লিহ্যান্না মধুসর্পিষা| কাসশ্বাসাপহান্স্বর্যান্পার্শ্বশূলাপহাংস্তথা||১০২||
योगान् संशुद्धकोष्ठानां कासे श्वासे स्वरक्षये| शिरःपार्श्वांसशूलेषु सिद्धानेतान्प्रयोजयेत्||८९|| बलाविदारिगन्धाद्यैर्विदार्या मधुकेन वा| सिद्धं सलवणं सर्पिर्नस्यं स्यात्स्वर्यमुत्तमम्||९०|| प्रपौण्डरीकं मधुकं पिप्पली बृहती बला| क्षीरं सर्पिश्च तत्सिद्धं स्वर्यं स्यान्नावनं परम्||९१|| शिरःपार्श्वांसशूलघ्नं कासश्वासनिबर्हणम्| प्रयुज्यमानं बहुशो घृतं चौत्तरभक्तिकम्||९२|| दशमूलेन पयसा सिद्धं मांसरसेन च| बलागर्भं घृतं सद्यो रोगानेतान् प्रबाधते||९३|| भक्तस्योपरि मध्ये वा यथाग्न्यभ्यवचारितम्| रास्नाघृतं वा सक्षीरं सक्षीरं वा बलाघृतम्||९४|| लेहान् कासापहान् स्वर्याञ् श्वासहिक्कानिबर्हणान्| शिरःपार्श्वांसशूलघ्नान् स्नेहांश्चातः परं शृणु||९५|| घृतं खर्जूरमृद्वीकाशर्कराक्षौद्रसंयुतम् | सपिप्पलीकं वैस्वर्यकासश्वासज्वरापहम्||९६|| दशमूलशृतात् क्षीरात् सर्पिर्यदुदियान्नवम्| सपिप्पलीकं सक्षौद्रं तत् परं स्वरबोधनम्||९७|| शिरःपार्श्वांसशूलघ्नं कासश्वासज्वरापहम्| पञ्चभिः पञ्चमूलैर्वा शृताद्यदुदियाद्घृतम्||९८|| पञ्चानां पञ्चमूलानां रसे क्षीरचतुर्गुणे| सिद्धं सर्पिर्जयत्येतद्यक्ष्मणः सप्तकं बलम्||९९|| खर्जूरं पिप्पली द्राक्षा पथ्या शृङ्गी दुरालभा| त्रिफला पिप्पली मुस्तं शृङ्गाटगुडशर्कराः||१००|| वीरा शटी पुष्कराख्यं सुरसः शर्करा गुडः| नागरं चित्रको लाजाः पिप्पल्यामलकं गुडः||१०१|| श्लोकार्धैर्विहितानेतांल्लिह्यान्ना मधुसर्पिषा| कासश्वासापहान्स्वर्यान्पार्श्वशूलापहांस्तथा||१०२||
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Adhikarana 25 (103-104) · Śloka 104
সিতোপলাং তুগাক্ষীরীং পিপ্পলীং বহুলাং ত্বচম্| অন্ত্যাদূর্ধ্বং দ্বিগুণিতং লেহযেন্মধুসর্পিষা||১০৩|| চূর্ণিতং প্রাশযেদ্বা তচ্ছ্বাসকাসকফাতুরম্ | সুপ্তজিহ্বারোচকিনমল্পাগ্নিং পার্শ্বশূলিনম্||১০৪||
सितोपलां तुगाक्षीरीं पिप्पलीं बहुलां त्वचम्| अन्त्यादूर्ध्वं द्विगुणितं लेहयेन्मधुसर्पिषा||१०३|| चूर्णितं प्राशयेद्वा तच्छ्वासकासकफातुरम् | सुप्तजिह्वारोचकिनमल्पाग्निं पार्श्वशूलिनम्||१०४||
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Adhikarana 26 (105) · Śloka 105
হস্তপাদাঙ্গদাহেষু জ্বরে রক্তে তথোর্ধ্বগে| বাসাঘৃতং শতাবর্যা সিদ্ধং বা পরমং হিতম্||১০৫||
हस्तपादाङ्गदाहेषु ज्वरे रक्ते तथोर्ध्वगे| वासाघृतं शतावर्या सिद्धं वा परमं हितम्||१०५||
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Adhikarana 27 (106-110) · Śloka 110
দুরালভাং শ্বদংষ্ট্রাং চ চতস্রঃ পর্ণিনীর্বলাম্| ভাগান্পলোন্মিতান্ কৃত্বা পলং পর্পটকস্য চ||১০৬|| পচেদ্দশগুণে তোযে দশভাগাবশেষিতে| রসে সুপূতে দ্রব্যাণামেষাং কল্কান্ সমাবপেত্||১০৭|| শট্যাঃ পুষ্করমূলস্য পিপ্পলীত্রাযমাণযোঃ| তামলক্যাঃ কিরাতানাং তিক্তস্য কুটজস্য চ||১০৮|| ফলানাং সারিবাযাশ্চ সুপিষ্টান্ কর্ষসম্মিতান্| ততস্তেন ঘৃতপ্রস্থং ক্ষীরদ্বিগুণিতং পচেত্||১০৯|| জ্বরং দাহং ভ্রমং কাসমংসপার্শ্বশিরোরুজম্| তৃষ্ণাং ছর্দিমতীসারমেতত্ সর্পির্ব্যপোহতি||১১০||
दुरालभां श्वदंष्ट्रां च चतस्रः पर्णिनीर्बलाम्| भागान्पलोन्मितान् कृत्वा पलं पर्पटकस्य च||१०६|| पचेद्दशगुणे तोये दशभागावशेषिते| रसे सुपूते द्रव्याणामेषां कल्कान् समावपेत्||१०७|| शट्याः पुष्करमूलस्य पिप्पलीत्रायमाणयोः| तामलक्याः किरातानां तिक्तस्य कुटजस्य च||१०८|| फलानां सारिवायाश्च सुपिष्टान् कर्षसम्मितान्| ततस्तेन घृतप्रस्थं क्षीरद्विगुणितं पचेत्||१०९|| ज्वरं दाहं भ्रमं कासमंसपार्श्वशिरोरुजम्| तृष्णां छर्दिमतीसारमेतत् सर्पिर्व्यपोहति||११०||
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Adhikarana 28 (111-113) · Śloka 113
জীবন্তীং মধুকং দ্রাক্ষাং ফলানি কুটজস্য চ| শটীং পুষ্করমূলং চ ব্যাঘ্রীং গোক্ষুরকং বলাম্||১১১|| নীলোত্পলং তামলকীং ত্রাযমাণাং দুরালভাম্| পিপ্পলীং চ সমং পিষ্ট্বা ঘৃতং বৈদ্যো বিপাচযেত্||১১২|| এতদ্ব্যাধিসমূহস্য রোগেশস্য সমুত্থিতম্| রূপমেকাদশবিধং সর্পিরগ্র্যং ব্যপোহতি||১১৩||
जीवन्तीं मधुकं द्राक्षां फलानि कुटजस्य च| शटीं पुष्करमूलं च व्याघ्रीं गोक्षुरकं बलाम्||१११|| नीलोत्पलं तामलकीं त्रायमाणां दुरालभाम्| पिप्पलीं च समं पिष्ट्वा घृतं वैद्यो विपाचयेत्||११२|| एतद्व्याधिसमूहस्य रोगेशस्य समुत्थितम्| रूपमेकादशविधं सर्पिरग्र्यं व्यपोहति||११३||
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Adhikarana 29 (114-116) · Śloka 116
বলাং স্থিরাং পৃশ্নিপর্ণীং বৃহতীং সনিদিগ্ধিকাম্| সাধযিত্বা রসে তস্মিন্পযো গব্যং সনাগরম্||১১৪|| দ্রাক্ষাখর্জূরসর্পির্ভিঃ পিপ্পল্যা চ শৃতং সহ| সক্ষৌদ্রং জ্বরকাসঘ্নং স্বর্যং চৈতত্ প্রযোজযেত্||১১৫|| আজস্য পযসশ্চৈবং প্রযোগো জাঙ্গলা রসাঃ| যূষার্থে চণকা মুদ্গা মকুষ্ঠাশ্চোপকল্পিতাঃ||১১৬||
बलां स्थिरां पृश्निपर्णीं बृहतीं सनिदिग्धिकाम्| साधयित्वा रसे तस्मिन्पयो गव्यं सनागरम्||११४|| द्राक्षाखर्जूरसर्पिर्भिः पिप्पल्या च शृतं सह| सक्षौद्रं ज्वरकासघ्नं स्वर्यं चैतत् प्रयोजयेत्||११५|| आजस्य पयसश्चैवं प्रयोगो जाङ्गला रसाः| यूषार्थे चणका मुद्गा मकुष्ठाश्चोपकल्पिताः||११६||
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Adhikarana 30 (117-133) · Śloka 134
জ্বরাণাং শমনীযো যঃ পূর্বমুক্তঃ ক্রিযাবিধিঃ| যক্ষ্মিণাং জ্বরদাহেষু সসর্পিষ্কঃ প্রশস্যতে||১১৭|| কফপ্রসেকে বলবাঞ্ শ্লৈষ্মিকশ্ছর্দযেন্নরঃ| পযসা ফলযুক্তেন মাধুকেন রসেন বা||১১৮|| সর্পিষ্মত্যা যবাগ্বা বা বমনীযোপসিদ্ধযা| বান্তোঽন্নকালে লঘ্বন্নমাদদীত সদীপনম্||১১৯|| যবগোধূমমাধ্বীকসিধ্বরিষ্টসুরাসবান্| জাঙ্গলানি চ শূল্যানি সেবমানঃ কফং জযেত্||১২০|| শ্লেষ্মণোঽতিপ্রসেকেন বাযুঃ শ্লেষ্মাণমস্যতি| কফপ্রসেকং তং বিদ্বান্ স্নিগ্ধোষ্ণেনৈব নির্জযেত্||১২১|| ক্রিযা কফপ্রসেকে যা বম্যাং সৈব প্রশস্যতে| হৃদ্যানি চান্নপানানি বাতঘ্নানি লঘূনি চ||১২২|| প্রাযেণোপহতাগ্নিত্বাত্ সপিচ্ছমতিসার্যতে| প্রাপ্নোতি চাস্যবৈরস্যং ন চান্নমভিনন্দতি||১২৩|| তস্যাগ্নিদীপনান্ যোগানতীসারনিবর্হণান্| বক্ত্রশুদ্ধিকরান্ কুর্যাদরুচিপ্রতিবাধকান্||১২৪|| সনাগরানিন্দ্রযবান্ পাযযেত্তণ্ডুলাম্বুনা| সিদ্ধাং যবাগূং জীর্ণে চ চাঙ্গেরীতক্রদাডিমৈঃ||১২৫|| পাঠা বিল্বং যমানী চ পাতব্যং তক্রসংযুতম্| দুরালভা শৃঙ্গবেরং পাঠা চ সুরযা সহ||১২৬|| জম্ব্বাম্রমধ্যং বিল্বং চ সকপিত্থং সনাগরম্| পেযামণ্ডেন পাতব্যমতীসারনিবৃত্তযে||১২৭|| এতানেব চ যোগাংস্ত্রীন্ পাঠাদীন্ কারযেত্ খডান্| সসূপ্যধান্যান্সস্নেহান্ সাম্লান্সঙ্গ্রহণান্ পরম্||১২৮|| বেতসার্জুনজম্বূনাং মৃণালীকৃষ্ণগন্ধযোঃ| শ্রীপর্ণ্যা মদযন্ত্যাশ্চ যূথিকাযাশ্চ পল্লবান্||১২৯|| মাতুলুঙ্গস্য ধাতক্যা দাডিমস্য চ কারযেত্| স্নেহাম্ললবণোপেতান্ খডান্ সাঙ্গ্রাহিকান্ পরম্||১৩০|| চাঙ্গের্যাশ্চুক্রিকাযাশ্চ দুগ্ধিকাযাশ্চ কারযেত্| খডান্দধিসরোপেতান্ সসর্পিষ্কান্সদাডিমান্||১৩১|| মাংসানাং লঘুপাকানাং রসাঃ সাঙ্গ্রাহিকৈর্যুতাঃ| ব্যঞ্জনার্থং প্রশস্যন্তে ভোজ্যার্থং রক্তশালযঃ||১৩২|| স্থিরাদিপঞ্চমূলেন পানে শস্তং শৃতং জলম্| তক্রং সুরা সচুক্রীকা দাডিমস্যাথবা রসঃ||১৩৩|| ইত্যুক্তং ভিন্নশকৃতাং দীপনং গ্রাহি ভেষজম্|১৩৪|
ज्वराणां शमनीयो यः पूर्वमुक्तः क्रियाविधिः| यक्ष्मिणां ज्वरदाहेषु ससर्पिष्कः प्रशस्यते||११७|| कफप्रसेके बलवाञ् श्लैष्मिकश्छर्दयेन्नरः| पयसा फलयुक्तेन माधुकेन रसेन वा||११८|| सर्पिष्मत्या यवाग्वा वा वमनीयोपसिद्धया| वान्तोऽन्नकाले लघ्वन्नमाददीत सदीपनम्||११९|| यवगोधूममाध्वीकसिध्वरिष्टसुरासवान्| जाङ्गलानि च शूल्यानि सेवमानः कफं जयेत्||१२०|| श्लेष्मणोऽतिप्रसेकेन वायुः श्लेष्माणमस्यति| कफप्रसेकं तं विद्वान् स्निग्धोष्णेनैव निर्जयेत्||१२१|| क्रिया कफप्रसेके या वम्यां सैव प्रशस्यते| हृद्यानि चान्नपानानि वातघ्नानि लघूनि च||१२२|| प्रायेणोपहताग्नित्वात् सपिच्छमतिसार्यते| प्राप्नोति चास्यवैरस्यं न चान्नमभिनन्दति||१२३|| तस्याग्निदीपनान् योगानतीसारनिबर्हणान्| वक्त्रशुद्धिकरान् कुर्यादरुचिप्रतिबाधकान्||१२४|| सनागरानिन्द्रयवान् पाययेत्तण्डुलाम्बुना| सिद्धां यवागूं जीर्णे च चाङ्गेरीतक्रदाडिमैः||१२५|| पाठा बिल्वं यमानी च पातव्यं तक्रसंयुतम्| दुरालभा शृङ्गवेरं पाठा च सुरया सह||१२६|| जम्ब्वाम्रमध्यं बिल्वं च सकपित्थं सनागरम्| पेयामण्डेन पातव्यमतीसारनिवृत्तये||१२७|| एतानेव च योगांस्त्रीन् पाठादीन् कारयेत् खडान्| ससूप्यधान्यान्सस्नेहान् साम्लान्सङ्ग्रहणान् परम्||१२८|| वेतसार्जुनजम्बूनां मृणालीकृष्णगन्धयोः| श्रीपर्ण्या मदयन्त्याश्च यूथिकायाश्च पल्लवान्||१२९|| मातुलुङ्गस्य धातक्या दाडिमस्य च कारयेत्| स्नेहाम्ललवणोपेतान् खडान् साङ्ग्राहिकान् परम्||१३०|| चाङ्गेर्याश्चुक्रिकायाश्च दुग्धिकायाश्च कारयेत्| खडान्दधिसरोपेतान् ससर्पिष्कान्सदाडिमान्||१३१|| मांसानां लघुपाकानां रसाः साङ्ग्राहिकैर्युताः| व्यञ्जनार्थं प्रशस्यन्ते भोज्यार्थं रक्तशालयः||१३२|| स्थिरादिपञ्चमूलेन पाने शस्तं शृतं जलम्| तक्रं सुरा सचुक्रीका दाडिमस्याथवा रसः||१३३|| इत्युक्तं भिन्नशकृतां दीपनं ग्राहि भेषजम्|१३४|
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Adhikarana 31 (134-140) · Śloka 140
পরং মুখস্য বৈরস্যনাশনং রোচনং শৃণু ||১৩৪|| দ্বৌ কালৌ দন্তপবনং ভক্ষযেন্মুখধাবনম্| তদ্বত্ প্রক্ষালযেদাস্যং ধারযেত্ কবলগ্রহান্||১৩৫|| পিবেদ্ধূমং ততো মৃষ্টমদ্যাদ্দীপনপাচনম্| ভেষজং পানমন্নং চ হিতমিষ্টোপকল্পিতম্||১৩৬|| ত্বঙ্মুস্তমেলা ধান্যানি মুস্তমামলকং ত্বচম্| দার্বীত্বচো যবানী চ তেজোহ্বা পিপ্পলী তথা||১৩৭|| যবানী তিন্তিডীকং চ পঞ্চৈতে মুখধাবনাঃ| শ্লোকপাদেষ্বভিহিতা রোচনা মুখশোধনাঃ||১৩৮|| গুটিকাং ধারযেদাস্যে চূর্ণৈর্বা শোধযেন্মুখম্| এষামালোডিতানাং বা ধারযেত্ কবলগ্রহান্||১৩৯|| সুরামাধ্বীকসীধূনাং তৈলস্য মধুসর্পিষোঃ| কবলান্ ধারযেদিষ্টান্ ক্ষীরস্যেক্ষুরসস্য চ||১৪০||
परं मुखस्य वैरस्यनाशनं रोचनं शृणु ||१३४|| द्वौ कालौ दन्तपवनं भक्षयेन्मुखधावनम्| तद्वत् प्रक्षालयेदास्यं धारयेत् कवलग्रहान्||१३५|| पिबेद्धूमं ततो मृष्टमद्याद्दीपनपाचनम्| भेषजं पानमन्नं च हितमिष्टोपकल्पितम्||१३६|| त्वङ्मुस्तमेला धान्यानि मुस्तमामलकं त्वचम्| दार्वीत्वचो यवानी च तेजोह्वा पिप्पली तथा||१३७|| यवानी तिन्तिडीकं च पञ्चैते मुखधावनाः| श्लोकपादेष्वभिहिता रोचना मुखशोधनाः||१३८|| गुटिकां धारयेदास्ये चूर्णैर्वा शोधयेन्मुखम्| एषामालोडितानां वा धारयेत् कवलग्रहान्||१३९|| सुरामाध्वीकसीधूनां तैलस्य मधुसर्पिषोः| कवलान् धारयेदिष्टान् क्षीरस्येक्षुरसस्य च||१४०||
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Adhikarana 32 (141-144) · Śloka 144
যবানীং তিন্তিডীকং চ নাগরং সাম্লবেতসম্| দাডিমং বদরং চাম্লং কার্ষিকং চোপকল্পযেত্||১৪১|| ধান্যসৌবর্চলাজাজীবরাঙ্গং চার্ধকার্ষিকম্| পিপ্পলীনাং শতং চৈকং দ্বে শতে মরিচস্য চ||১৪২|| শর্করাযাশ্চ চত্বারি পলান্যেকত্র চূর্ণযেত্| জিহ্বাবিশোধনং হৃদ্যং তচ্চূর্ণং ভক্তরোচনম্||১৪৩|| হৃত্প্লীহপার্শ্বশূলঘ্নং বিবন্ধানাহনাশনম্| কাসশ্বাসহরং গ্রাহি গ্রহণ্যর্শোবিকারনুত্||১৪৪|| ইতি যবানীষাডবম্|
यवानीं तिन्तिडीकं च नागरं साम्लवेतसम्| दाडिमं बदरं चाम्लं कार्षिकं चोपकल्पयेत्||१४१|| धान्यसौवर्चलाजाजीवराङ्गं चार्धकार्षिकम्| पिप्पलीनां शतं चैकं द्वे शते मरिचस्य च||१४२|| शर्करायाश्च चत्वारि पलान्येकत्र चूर्णयेत्| जिह्वाविशोधनं हृद्यं तच्चूर्णं भक्तरोचनम्||१४३|| हृत्प्लीहपार्श्वशूलघ्नं विबन्धानाहनाशनम्| कासश्वासहरं ग्राहि ग्रहण्यर्शोविकारनुत्||१४४|| इति यवानीषाडवम्|
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Adhikarana 33 (145-148) · Śloka 148
তালীশপত্রং মরিচং নাগরং পিপ্পলী শুভা| যথোত্তরং ভাগবৃদ্ধ্যা ত্বগেলে চার্ধভাগিকে||১৪৫|| পিপ্পল্যষ্টগুণা চাত্র প্রদেযা সিতশর্করা| কাসশ্বাসারুচিহরং তচ্চূর্ণং দীপনং পরম্||১৪৬|| হৃত্পাণ্ডুগ্রহণীদোষশোষপ্লীহজ্বরাপহম্| বম্যতীসারশূলঘ্নং মূঢবাতানুলোমনম্||১৪৭|| কল্পযেদ্গুটিকাং চৈতচ্চূর্ণং পক্ত্বা সিতোপলাম্| গুটিকা হ্যগ্নিসংযোগাচ্চূর্ণাল্লঘুতরাঃ স্মৃতাঃ||১৪৮|| ইতি তালীশাদ্যং চূর্ণং গুটিকাশ্চ|
तालीशपत्रं मरिचं नागरं पिप्पली शुभा| यथोत्तरं भागवृद्ध्या त्वगेले चार्धभागिके||१४५|| पिप्पल्यष्टगुणा चात्र प्रदेया सितशर्करा| कासश्वासारुचिहरं तच्चूर्णं दीपनं परम्||१४६|| हृत्पाण्डुग्रहणीदोषशोषप्लीहज्वरापहम्| वम्यतीसारशूलघ्नं मूढवातानुलोमनम्||१४७|| कल्पयेद्गुटिकां चैतच्चूर्णं पक्त्वा सितोपलाम्| गुटिका ह्यग्निसंयोगाच्चूर्णाल्लघुतराः स्मृताः||१४८|| इति तालीशाद्यं चूर्णं गुटिकाश्च|
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Adhikarana 34 (149-172) · Śloka 172
শুষ্যতাং ক্ষীণমাংসানাং কল্পিতানি বিধানবিত্| দদ্যান্মাংসাদমাংসানি বৃংহণানি বিশেষতঃ||১৪৯|| শোষিণে বার্হিণং দদ্যাদ্বর্হিশব্দেন চাপরান্| গৃধ্রানুলূকাংশ্চাষাংশ্চ বিধিবত্ সূপকল্পিতান্||১৫০|| কাকাংস্তিত্তিরিশব্দেন বর্মিশব্দেন চোরগান্| ভৃষ্টান্ মত্স্যান্ত্রশব্দেন দদ্যাদ্গণ্ডূপদানপি||১৫১|| লোপাকান্ স্থূলনকুলান্ বিডালাংশ্চোপকল্পিতান্| শৃগালশাবাংশ্চ ভিষক্ শশশব্দেন দাপযেত্||১৫২|| সিংহানৃক্ষাংস্তরক্ষূংশ্চ ব্যাঘ্রানেবংবিধাংস্তথা| মাংসাদান্ মৃগশব্দেন দদ্যান্মাংসাভিবৃদ্ধযে||১৫৩|| গজখড্গিতুরঙ্গাণাং বেশবারীকৃতং ভিষক্| দদ্যান্মহিষশব্দেন মাংসং মাংসাভিবৃদ্ধযে||১৫৪|| মাংসেনোপচিতাঙ্গানাং মাংসং মাংসকরং পরম্| তীক্ষ্ণোষ্ণলাঘবাচ্ছস্তং বিশেষান্মৃগপক্ষিণাম্||১৫৫|| মাংসানি যান্যনভ্যাসাদনিষ্টানি প্রযোজযেত্| তেষূপধা, সুখং ভোক্তুং তথা শক্যানি তানি হি||১৫৬|| জানঞ্জুগুপ্সন্নৈবাদ্যাজ্জগ্ধং বা পুনরুল্লিখেত্| তস্মাচ্ছদ্মোপসিদ্ধানি মাংসান্যেতানি দাপযেত্||১৫৭|| বর্হিতিত্তিরিদক্ষাণাং হংসানাং শূকরোষ্ট্রযোঃ| খরগোমহিষাণাং চ মাংসং মাংসকরং পরম্||১৫৮|| যোনিরষ্টবিধা চোক্তা মাংসানামন্নপানিকে| তাং পরীক্ষ্য ভিষগ্বিদ্বান্ দদ্যান্মাংসানি শোষিণে||১৫৯|| প্রসহা ভূশযানূপবারিজা বারিচারিণঃ| আহারার্থং প্রদাতব্যা মাত্রযা বাতশোষিণে||১৬০|| প্রতুদা বিষ্কিরাশ্চৈব ধন্বজাশ্চ মৃগদ্বিজাঃ| কফপিত্তপরীতানাং প্রযোজ্যাঃ শোষরোগিণাম্||১৬১|| বিধিবত্সূপসিদ্ধানি মনোজ্ঞানি মৃদূনি চ| রসবন্তি সুগন্ধীনি মাংসান্যেতানি ভক্ষযেত্||১৬২|| মাংসমেবাশ্নতঃ শোষো মাধ্বীকং পিবতোঽপি চ| নিযতানল্পচিত্তস্য চিরং কাযে ন তিষ্ঠতি||১৬৩|| বারুণীমণ্ডনিত্যস্য বহির্মার্জনসেবিনঃ| অবিধারিতবেগস্য যক্ষ্মা ন লভতেঽন্তরম্||১৬৪|| প্রসন্নাং বারুণীং সীধুমরিষ্টানাসবান্মধু| যথার্হমনুপানার্থং পিবেন্মাংসানি ভক্ষযন্||১৬৫|| মদ্যং তৈক্ষ্ণ্যৌষ্ণ্যবৈশদ্যসূক্ষ্মত্বাত্ স্রোতসাং মুখম্| প্রমথ্য বিবৃণোত্যাশু তন্মোক্ষাত্ সপ্ত ধাতবঃ||১৬৬|| পুষ্যন্তি ধাতুপোষাচ্চ শীঘ্রং শোষঃ প্রশাম্যতি| মাংসাদমাংসস্বরসে সিদ্ধং সর্পিঃ প্রযোজযেত্||১৬৭|| সক্ষৌদ্রং, পযসা সিদ্ধং সর্পির্দশগুণেন বা| সিদ্ধং মধুরকৈর্দ্রব্যৈর্দশমূলকষাযকৈঃ||১৬৮|| ক্ষীরমাংসরসোপেতৈর্ঘৃতং শোষহরং পরম্| পিপ্পলীপিপ্পলীমূলচব্যচিত্রকনাগরৈঃ||১৬৯|| সযাবশূকৈঃ সক্ষীরৈঃ স্রোতসাং শোধনং ঘৃতম্| রাস্নাবলাগোক্ষুরকস্থিরাবর্ষাভুসাধিতম্||১৭০|| জীবন্তীপিপ্পলীগর্ভং সক্ষীরং শোষনুদ্ঘৃতম্| যবাগ্বা বা পিবেন্মাত্রাং লিহ্যাদ্বা মধুনা সহ||১৭১|| সিদ্ধানাং সর্পিষামেষামদ্যাদন্নেন বা সহ| শুষ্যতামেষ নির্দিষ্টো বিধিরাভ্যবহারিকঃ||১৭২||
शुष्यतां क्षीणमांसानां कल्पितानि विधानवित्| दद्यान्मांसादमांसानि बृंहणानि विशेषतः||१४९|| शोषिणे बार्हिणं दद्याद्बर्हिशब्देन चापरान्| गृध्रानुलूकांश्चाषांश्च विधिवत् सूपकल्पितान्||१५०|| काकांस्तित्तिरिशब्देन वर्मिशब्देन चोरगान्| भृष्टान् मत्स्यान्त्रशब्देन दद्याद्गण्डूपदानपि||१५१|| लोपाकान् स्थूलनकुलान् बिडालांश्चोपकल्पितान्| शृगालशावांश्च भिषक् शशशब्देन दापयेत्||१५२|| सिंहानृक्षांस्तरक्षूंश्च व्याघ्रानेवंविधांस्तथा| मांसादान् मृगशब्देन दद्यान्मांसाभिवृद्धये||१५३|| गजखड्गितुरङ्गाणां वेशवारीकृतं भिषक्| दद्यान्महिषशब्देन मांसं मांसाभिवृद्धये||१५४|| मांसेनोपचिताङ्गानां मांसं मांसकरं परम्| तीक्ष्णोष्णलाघवाच्छस्तं विशेषान्मृगपक्षिणाम्||१५५|| मांसानि यान्यनभ्यासादनिष्टानि प्रयोजयेत्| तेषूपधा, सुखं भोक्तुं तथा शक्यानि तानि हि||१५६|| जानञ्जुगुप्सन्नैवाद्याज्जग्धं वा पुनरुल्लिखेत्| तस्माच्छद्मोपसिद्धानि मांसान्येतानि दापयेत्||१५७|| बर्हितित्तिरिदक्षाणां हंसानां शूकरोष्ट्रयोः| खरगोमहिषाणां च मांसं मांसकरं परम्||१५८|| योनिरष्टविधा चोक्ता मांसानामन्नपानिके| तां परीक्ष्य भिषग्विद्वान् दद्यान्मांसानि शोषिणे||१५९|| प्रसहा भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः| आहारार्थं प्रदातव्या मात्रया वातशोषिणे||१६०|| प्रतुदा विष्किराश्चैव धन्वजाश्च मृगद्विजाः| कफपित्तपरीतानां प्रयोज्याः शोषरोगिणाम्||१६१|| विधिवत्सूपसिद्धानि मनोज्ञानि मृदूनि च| रसवन्ति सुगन्धीनि मांसान्येतानि भक्षयेत्||१६२|| मांसमेवाश्नतः शोषो माध्वीकं पिबतोऽपि च| नियतानल्पचित्तस्य चिरं काये न तिष्ठति||१६३|| वारुणीमण्डनित्यस्य बहिर्मार्जनसेविनः| अविधारितवेगस्य यक्ष्मा न लभतेऽन्तरम्||१६४|| प्रसन्नां वारुणीं सीधुमरिष्टानासवान्मधु| यथार्हमनुपानार्थं पिबेन्मांसानि भक्षयन्||१६५|| मद्यं तैक्ष्ण्यौष्ण्यवैशद्यसूक्ष्मत्वात् स्रोतसां मुखम्| प्रमथ्य विवृणोत्याशु तन्मोक्षात् सप्त धातवः||१६६|| पुष्यन्ति धातुपोषाच्च शीघ्रं शोषः प्रशाम्यति| मांसादमांसस्वरसे सिद्धं सर्पिः प्रयोजयेत्||१६७|| सक्षौद्रं, पयसा सिद्धं सर्पिर्दशगुणेन वा| सिद्धं मधुरकैर्द्रव्यैर्दशमूलकषायकैः||१६८|| क्षीरमांसरसोपेतैर्घृतं शोषहरं परम्| पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः||१६९|| सयावशूकैः सक्षीरैः स्रोतसां शोधनं घृतम्| रास्नाबलागोक्षुरकस्थिरावर्षाभुसाधितम्||१७०|| जीवन्तीपिप्पलीगर्भं सक्षीरं शोषनुद्घृतम्| यवाग्वा वा पिबेन्मात्रां लिह्याद्वा मधुना सह||१७१|| सिद्धानां सर्पिषामेषामद्यादन्नेन वा सह| शुष्यतामेष निर्दिष्टो विधिराभ्यवहारिकः||१७२||
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Adhikarana 35 (173-178) · Śloka 179
বহিঃস্পর্শনমাশ্রিত্য বক্ষ্যতেঽতঃ পরং বিধিঃ| স্নেহক্ষীরাম্বুকোষ্ঠেষু স্বভ্যক্তমবগাহযেত্||১৭৩|| স্রোতোবিবন্ধমোক্ষার্থং বলপুষ্ট্যর্থমেব চ| উত্তীর্ণং মিশ্রকৈঃস্নেহৈঃ পুনরাক্তৈঃ সুখৈঃ করৈঃ||১৭৪|| মৃদ্নীযাত্ সুখমাসীনং সুখং চোত্সাদযেন্নরম্| জীবন্তীং শতবীর্যাং চ বিকসাং সপুনর্নবাম্||১৭৫|| অশ্বগন্ধামপামার্গং তর্কারীং মধুকং বলাম্| বিদারীং সর্ষপং কুষ্ঠং তণ্ডুলানতসীফলম্||১৭৬|| মাষাংস্তিলাংশ্চ কিণ্বং চ সর্বমেকত্র চূর্ণযেত্| যবচূর্ণত্রিগুণিতং দধ্না যুক্তং সমাক্ষিকম্||১৭৭|| এতদুত্সাদনং কার্যং পুষ্টিবর্ণবলপ্রদম্| গৌরসর্ষপকল্কেন কল্কৈশ্চাপি সুগন্ধিভিঃ||১৭৮|| স্নাযাদৃতুসুখৈস্তোযৈর্জীবনীযৌষধৈঃ শৃতৈঃ|১৭৯|
बहिःस्पर्शनमाश्रित्य वक्ष्यतेऽतः परं विधिः| स्नेहक्षीराम्बुकोष्ठेषु स्वभ्यक्तमवगाहयेत्||१७३|| स्रोतोविबन्धमोक्षार्थं बलपुष्ट्यर्थमेव च| उत्तीर्णं मिश्रकैःस्नेहैः पुनराक्तैः सुखैः करैः||१७४|| मृद्नीयात् सुखमासीनं सुखं चोत्सादयेन्नरम्| जीवन्तीं शतवीर्यां च विकसां सपुनर्नवाम्||१७५|| अश्वगन्धामपामार्गं तर्कारीं मधुकं बलाम्| विदारीं सर्षपं कुष्ठं तण्डुलानतसीफलम्||१७६|| माषांस्तिलांश्च किण्वं च सर्वमेकत्र चूर्णयेत्| यवचूर्णत्रिगुणितं दध्ना युक्तं समाक्षिकम्||१७७|| एतदुत्सादनं कार्यं पुष्टिवर्णबलप्रदम्| गौरसर्षपकल्केन कल्कैश्चापि सुगन्धिभिः||१७८|| स्नायादृतुसुखैस्तोयैर्जीवनीयौषधैः शृतैः|१७९|
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Adhikarana 36 (179-189) · Śloka 189
গন্ধৈঃ সমাল্যৈর্বাসোভির্ভূষণৈশ্চ বিভূষিতঃ||১৭৯|| স্পৃশ্যান্ সংস্পৃশ্য সম্পূজ্য দেবতাঃ সভিষগ্দ্বিজাঃ| ইষ্টবর্ণরসস্পর্শগন্ধবত্ পানভোজনম্||১৮০|| ইষ্টমিষ্টৈরুপহিতং সুখমদ্যাত্ সুখপ্রদম্| সমাতীতানি ধান্যানি কল্পনীযানি শুষ্যতাম্||১৮১|| লঘূন্যহীনবীর্যাণি স্বাদূনি গন্ধবন্তি চ| যানি প্রহর্ষকারীণি তানি পথ্যতমানি হি||১৮২|| যচ্চোপদেক্ষ্যতে পথ্যং ক্ষতক্ষীণচিকিত্সিতে| যক্ষ্মিণস্তত্ প্রযোক্তব্যং বলমাংসাভিবৃদ্ধযে||১৮৩|| অভ্যঙ্গোত্সাদনৈশ্চৈব বাসোভিরহতৈঃ প্রিযৈঃ| যথর্তুবিহিতৈঃ স্নানৈরবগাহৈর্বিমার্জনৈঃ||১৮৪|| বস্তিভিঃ ক্ষীরসর্পির্ভির্মাংসৈর্মাংসরসৌদনৈঃ| ইষ্টৈর্মদ্যৈর্মনোজ্ঞানাং গন্ধানামুপসেবনৈঃ||১৮৫|| সুহৃদাং রমণীযানাং প্রমদানাং চ দর্শনৈঃ| গীতবাদিত্রশব্দৈশ্চ প্রিযশ্রুতিভিরেব চ||১৮৬|| হর্ষণাশ্বাসনৈর্নিত্যং গুরূণাং সমুপাসনৈঃ| ব্রহ্মচর্যেণ দানেন তপসা দেবতার্চনৈঃ||১৮৭|| সত্যেনাচারযোগেন মঙ্গল্যৈরপ্যহিংসযা| বৈদ্যবিপ্রার্চনাচ্চৈব রোগরাজো নিবর্ততে||১৮৮|| যযা প্রযুক্তযা চেষ্ট্যা রাজযক্ষ্মা পুরা জিতঃ| তাং বেদবিহিতামিষ্টিমারোগ্যার্থী প্রযোজযেত্||১৮৯||
गन्धैः समाल्यैर्वासोभिर्भूषणैश्च विभूषितः||१७९|| स्पृश्यान् संस्पृश्य सम्पूज्य देवताः सभिषग्द्विजाः| इष्टवर्णरसस्पर्शगन्धवत् पानभोजनम्||१८०|| इष्टमिष्टैरुपहितं सुखमद्यात् सुखप्रदम्| समातीतानि धान्यानि कल्पनीयानि शुष्यताम्||१८१|| लघून्यहीनवीर्याणि स्वादूनि गन्धवन्ति च| यानि प्रहर्षकारीणि तानि पथ्यतमानि हि||१८२|| यच्चोपदेक्ष्यते पथ्यं क्षतक्षीणचिकित्सिते| यक्ष्मिणस्तत् प्रयोक्तव्यं बलमांसाभिवृद्धये||१८३|| अभ्यङ्गोत्सादनैश्चैव वासोभिरहतैः प्रियैः| यथर्तुविहितैः स्नानैरवगाहैर्विमार्जनैः||१८४|| बस्तिभिः क्षीरसर्पिर्भिर्मांसैर्मांसरसौदनैः| इष्टैर्मद्यैर्मनोज्ञानां गन्धानामुपसेवनैः||१८५|| सुहृदां रमणीयानां प्रमदानां च दर्शनैः| गीतवादित्रशब्दैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च||१८६|| हर्षणाश्वासनैर्नित्यं गुरूणां समुपासनैः| ब्रह्मचर्येण दानेन तपसा देवतार्चनैः||१८७|| सत्येनाचारयोगेन मङ्गल्यैरप्यहिंसया| वैद्यविप्रार्चनाच्चैव रोगराजो निवर्तते||१८८|| यया प्रयुक्तया चेष्ट्या राजयक्ष्मा पुरा जितः| तां वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत्||१८९||
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Adhikarana 37 (190-191) · Śloka 191
তত্র শ্লোকৌ- প্রাগুত্পত্তির্নিমিত্তানি প্রাগ্রূপং রূপসঙ্গ্রহঃ| সমাসাদ্ ব্যাসতশ্চোক্তং ভেষজং রাজযক্ষ্মণঃ||১৯০|| নামহেতুরসাধ্যত্বং সাধ্যত্বং কৃচ্ছ্রসাধ্যতা| ইত্যুক্তঃ সঙ্গ্রহঃ কৃত্স্নো রাজযক্ষ্মচিকিত্সিতে||১৯১||
तत्र श्लोकौ- प्रागुत्पत्तिर्निमित्तानि प्राग्रूपं रूपसङ्ग्रहः| समासाद् व्यासतश्चोक्तं भेषजं राजयक्ष्मणः||१९०|| नामहेतुरसाध्यत्वं साध्यत्वं कृच्छ्रसाध्यता| इत्युक्तः सङ्ग्रहः कृत्स्नो राजयक्ष्मचिकित्सिते||१९१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 8
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানে রাজযক্ষ্মচিকিত্সিতং নামাষ্টমোঽধ্যাযঃ||৮||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने राजयक्ष्मचिकित्सितं नामाष्टमोऽध्यायः||८||
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