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12. pramēhacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ প্রমেহচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः प्रमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

নির্মোহমানানুশযো নিরাশঃ পুনর্বসুর্জ্ঞানতপোবিশালঃ| কালেঽগ্নিবেশায সহেতুলিঙ্গানুবাচ মেহাঞ্শমনং চ তেষাম্||৩||

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निर्मोहमानानुशयो निराशः पुनर्वसुर्ज्ञानतपोविशालः| कालेऽग्निवेशाय सहेतुलिङ्गानुवाच मेहाञ्शमनं च तेषाम्||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

আস্যাসুখং স্বপ্নসুখং দধীনি গ্রাম্যৌদকানূপরসাঃ পযাংসি| নবান্নপানং গুডবৈকৃতং চ প্রমেহহেতুঃ কফকৃচ্চ সর্বম্||৪||

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आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि| नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम्||४||

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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 6

মেদশ্চ মাংসং চ শরীরজং চ ক্লেদং কফো বস্তিগতং প্রদূষ্য| করোতি মেহান্ সমুদীর্ণমুষ্ণৈস্তানেব পিত্তং পরিদূষ্য চাপি||৫|| ক্ষীণেষু দোষেষ্ববকৃষ্য বস্তৌ ধাতূন্ প্রমেহাননিলঃ করোতি| দোষো হি বস্তিং সমুপেত্য মূত্রং সন্দূষ্য মেহাঞ্জনযেদ্যথাস্বম্||৬||

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मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतं प्रदूष्य| करोति मेहान् समुदीर्णमुष्णैस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि||५|| क्षीणेषु दोषेष्ववकृष्य बस्तौ धातून् प्रमेहाननिलः करोति| दोषो हि बस्तिं समुपेत्य मूत्रं सन्दूष्य मेहाञ्जनयेद्यथास्वम्||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

সাধ্যাঃ কফোত্থা দশ, পিত্তজাঃ ষট্ যাপ্যা, ন সাধ্যঃ পবনাচ্চতুষ্কঃ| সমক্রিযত্বাদ্বিষমক্রিযত্বান্মহাত্যযত্বাচ্চ যথাক্রমং তে||৭||

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साध्याः कफोत्था दश, पित्तजाः षट् याप्या, न साध्यः पवनाच्चतुष्कः| समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

কফঃ সপিত্তঃ পবনশ্চ দোষা মেদোঽস্রশুক্রাম্বুবসালসীকাঃ| মজ্জা রসৌজঃ পিশিতং চ দূষ্যাঃ প্রমেহিণাং, বিংশতিরেব মেহাঃ||৮||

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कफः सपित्तः पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः| मज्जा रसौजः पिशितं च दूष्याः प्रमेहिणां, विंशतिरेव मेहाः||८||

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Adhikarana 7 (9-11) · Śloka 11

জলোপমং চেক্ষুরসোপমং বা ঘনং ঘনং চোপরি বিপ্রসন্নম্| শুক্লং সশুক্রং শিশিরং শনৈর্বা লালেব বা বালুকযা যুতং বা||৯|| বিদ্যাত্ প্রমেহান্ কফজান্ দশৈতান্ ক্ষারোপমং কালমথাপি নীলম্| হারিদ্রমাঞ্জিষ্ঠমথাপি রক্তমেতান্ প্রমেহান্ ষডুশন্তি পিত্তাত্||১০|| মজ্জৌজসা বা বসযাঽন্বিতং বা লসীকযা বা সততং বিবদ্ধম্| চতুর্বিধং মূত্রযতীহ বাতাচ্ছেষেষু ধাতুষ্বপকর্ষিতেষু||১১||

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जलोपमं चेक्षुरसोपमं वा घनं घनं चोपरि विप्रसन्नम्| शुक्लं सशुक्रं शिशिरं शनैर्वा लालेव वा वालुकया युतं वा||९|| विद्यात् प्रमेहान् कफजान् दशैतान् क्षारोपमं कालमथापि नीलम्| हारिद्रमाञ्जिष्ठमथापि रक्तमेतान् प्रमेहान् षडुशन्ति पित्तात्||१०|| मज्जौजसा वा वसयाऽन्वितं वा लसीकया वा सततं विबद्धम्| चतुर्विधं मूत्रयतीह वाताच्छेषेषु धातुष्वपकर्षितेषु||११||

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Adhikarana 8 (12) · Śloka 12

বর্ণং রসং স্পর্শমথাপি গন্ধং যথাস্বদোষং ভজতে প্রমেহঃ| শ্যাবারুণো বাতকৃতঃ সশূলো মজ্জাদিসাদ্গুণ্যমুপৈত্যসাধ্যঃ||১২||

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वर्णं रसं स्पर्शमथापि गन्धं यथास्वदोषं भजते प्रमेहः| श्यावारुणो वातकृतः सशूलो मज्जादिसाद्गुण्यमुपैत्यसाध्यः||१२||

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Adhikarana 9 (13-14) · Śloka 14

স্বেদোঽঙ্গগন্ধঃ শিথিলাঙ্গতা চ শয্যাসনস্বপ্নসুখে রতিশ্চ| হৃন্নেত্রজিহ্বাশ্রবণোপদেহো ঘনাঙ্গতা কেশনখাতিবৃদ্ধিঃ||১৩|| শীতপ্রিযত্বং গলতালুশোষো মাধুর্যমাস্যে করপাদদাহঃ| ভবিষ্যতো মেহগদস্য রূপং মূত্রেঽভিধাবন্তি পিপীলিকাশ্চ||১৪||

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स्वेदोऽङ्गगन्धः शिथिलाङ्गता च शय्यासनस्वप्नसुखे रतिश्च| हृन्नेत्रजिह्वाश्रवणोपदेहो घनाङ्गता केशनखातिवृद्धिः||१३|| शीतप्रियत्वं गलतालुशोषो माधुर्यमास्ये करपाददाहः| भविष्यतो मेहगदस्य रूपं मूत्रेऽभिधावन्ति पिपीलिकाश्च||१४||

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Adhikarana 10 (15-17) · Śloka 17

স্থূলঃ প্রমেহী বলবানিহৈকঃ কৃশস্তথৈকঃ পরিদুর্বলশ্চ| সম্বৃংহণং তত্র কৃশস্য কার্যং সংশোধনং দোষবলাধিকস্য||১৫|| স্নিগ্ধস্য যোগা বিবিধাঃ প্রযোজ্যাঃ কল্পোপদিষ্টা মলশোধনায | ঊর্ধ্বং তথাঽধশ্চ মলেঽপনীতে মেহেষু সন্তর্পণমেব কার্যম্||১৬|| গুল্মঃ ক্ষযো মেহনবস্তিশূলং মূত্রগ্রহশ্চাপ্যপতর্পণেন| প্রমেহিণঃ স্যুঃ, পরিতর্পণানি কার্যাণি তস্য প্রসমীক্ষ্য বহ্নিম্||১৭||

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स्थूलः प्रमेही बलवानिहैकः कृशस्तथैकः परिदुर्बलश्च| सम्बृंहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषबलाधिकस्य||१५|| स्निग्धस्य योगा विविधाः प्रयोज्याः कल्पोपदिष्टा मलशोधनाय | ऊर्ध्वं तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम्||१६|| गुल्मः क्षयो मेहनबस्तिशूलं मूत्रग्रहश्चाप्यपतर्पणेन| प्रमेहिणः स्युः, परितर्पणानि कार्याणि तस्य प्रसमीक्ष्य वह्निम्||१७||

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Adhikarana 11 (18-24) · Śloka 24

সংশোধনং নার্হতি যঃ প্রমেহী তস্য ক্রিযা সংশমনী প্রযোজ্যা| মন্থাঃ কষাযা যবচূর্ণলেহাঃ প্রমেহশান্ত্যৈ লঘবশ্চ ভক্ষ্যাঃ||১৮|| যে বিষ্কিরা যে প্রতুদা বিহঙ্গাস্তেষাং রসৈর্জাঙ্গলজৈর্মনোজ্ঞৈঃ| যবৌদনং রূক্ষমথাপি বাট্যমদ্যাত্ সসক্তূনপি চাপ্যপূপান্||১৯|| মুদ্গাদিযূষৈরথ তিক্তশাকৈঃ পুরাণশাল্যোদনমাদদীত| দন্তীঙ্গুদীতৈলযুতং প্রমেহী তথাঽতসীসর্ষপতৈলযুক্তম্||২০|| সষষ্টিকং স্যাত্তৃণধান্যমন্নং যবপ্রধানস্তু ভবেত্ প্রমেহী| যবস্য ভক্ষ্যান্ বিবিধাংস্তথাঽদ্যাত্ কফপ্রমেহী মধুসম্প্রযুক্তান্||২১|| নিশিস্থিতানাং ত্রিফলাকষাযে স্যুস্তর্পণাঃ ক্ষৌদ্রযুতা যবানাম্| তান্ সীধুযুক্তান্ প্রপিবেত্ প্রমেহী প্রাযোগিকান্মেহবধার্থমেব||২২|| যে শ্লেষ্মমেহে বিহিতাঃ কষাযাস্তৈর্ভাবিতানাং চ পৃথগ্যবানাম্| সক্তূনপূপান্ সগুডান্ সধানান্ ভক্ষ্যাংস্তথাঽন্যান্ বিবিধাংশ্চ খাদেত্||২৩|| খরাশ্বগোহংসপৃষদ্ভৃতানাং তথা যবানাং বিবিধাশ্চ ভক্ষ্যাঃ| দেযাস্তথা বেণুযবা যবানাং কল্পেন গোধূমমযাশ্চ ভক্ষ্যাঃ||২৪||

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संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया संशमनी प्रयोज्या| मन्थाः कषाया यवचूर्णलेहाः प्रमेहशान्त्यै लघवश्च भक्ष्याः||१८|| ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषां रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः| यवौदनं रूक्षमथापि वाट्यमद्यात् ससक्तूनपि चाप्यपूपान्||१९|| मुद्गादियूषैरथ तिक्तशाकैः पुराणशाल्योदनमाददीत| दन्तीङ्गुदीतैलयुतं प्रमेही तथाऽतसीसर्षपतैलयुक्तम्||२०|| सषष्टिकं स्यात्तृणधान्यमन्नं यवप्रधानस्तु भवेत् प्रमेही| यवस्य भक्ष्यान् विविधांस्तथाऽद्यात् कफप्रमेही मधुसम्प्रयुक्तान्||२१|| निशिस्थितानां त्रिफलाकषाये स्युस्तर्पणाः क्षौद्रयुता यवानाम्| तान् सीधुयुक्तान् प्रपिबेत् प्रमेही प्रायोगिकान्मेहवधार्थमेव||२२|| ये श्लेष्ममेहे विहिताः कषायास्तैर्भावितानां च पृथग्यवानाम्| सक्तूनपूपान् सगुडान् सधानान् भक्ष्यांस्तथाऽन्यान् विविधांश्च खादेत्||२३|| खराश्वगोहंसपृषद्भृतानां तथा यवानां विविधाश्च भक्ष्याः| देयास्तथा वेणुयवा यवानां कल्पेन गोधूममयाश्च भक्ष्याः||२४||

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Adhikarana 12 (25) · Śloka 25

সংশোধনোল্লেখনলঙ্ঘনানি কালে প্রযুক্তানি কফপ্রমেহান্| জযন্তি পিত্তপ্রভবান্ বিরেকঃ সন্তর্পণঃ সংশমনো বিধিশ্চ||২৫||

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संशोधनोल्लेखनलङ्घनानि काले प्रयुक्तानि कफप्रमेहान्| जयन्ति पित्तप्रभवान् विरेकः सन्तर्पणः संशमनो विधिश्च||२५||

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Adhikarana 13 (26-34) · Śloka 34

দার্বীং সুরাহ্বাং ত্রিফলাং সমুস্তাং কষাযমুত্ক্বাথ্য পিবেত্ প্রমেহী| ক্ষৌদ্রেণ যুক্তামথবা হরিদ্রাং পিবেদ্রসেনামলকীফলানাম্||২৬|| হরীতকীকট্ফলমুস্তলোধ্রং পাঠাবিডঙ্গার্জুনধন্বনাশ্চ| উভে হরিদ্রে তগরং বিডঙ্গং কদম্বশালার্জুনদীপ্যকাশ্চ||২৭|| দার্বী বিডঙ্গং খদিরো ধবশ্চ সুরাহ্বকুষ্ঠাগুরুচন্দনানি| দার্ব্যগ্নিমন্থৌ ত্রিফলা সপাঠা পাঠা চ মূর্বা চ তথা শ্বদংষ্ট্রা||২৮|| যবান্যুশীরাণ্যভযাগুডূচীচব্যাভযাচিত্রকসপ্তপর্ণাঃ| পাদৈঃ কষাযাঃ কফমেহিনাং তে দশোপদিষ্টা মধুসম্প্রযুক্তাঃ||২৯|| উশীরলোধ্রাঞ্জনচন্দনানামুশীরমুস্তামলকাভযানাম্| পটোলনিম্বামলকামৃতানাং মুস্তাভযাপদ্মকবৃক্ষকাণাম্||৩০|| লোধ্রাম্বুকালীযকধাতকীনাং নিম্বার্জুনাম্রাতনিশোত্পলানাম্| শিরীষসর্জার্জুনকেশরাণাং প্রিযঙ্গুপদ্মোত্পলকিংশুকানাম্||৩১|| অশ্বত্থপাঠাসনবেতসানাং কটঙ্কটের্যুত্পলমুস্তকানাম্| পৈত্তেষু মেহেষু দশ প্রদিষ্টাঃ পাদৈঃ কষাযা মধুসম্প্রযুক্তাঃ||৩২|| সর্বেষু মেহেষু মতৌ তু পূর্বৌ কষাযযোগৌ বিহিতাস্তু সর্বে| মন্থস্য পানে যবভাবনাযাং স্যুর্ভোজনে পানবিধৌ পৃথক্ চ||৩৩|| সিদ্ধানি তৈলানি ঘৃতানি চৈব দেযানি মেহেষ্বনিলাত্মকেষু| মেদঃ কফশ্চৈব কষাযযোগৈঃ স্নেহৈশ্চ বাযুঃ শমমেতি তেষাম্||৩৪||

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दार्वीं सुराह्वां त्रिफलां समुस्तां कषायमुत्क्वाथ्य पिबेत् प्रमेही| क्षौद्रेण युक्तामथवा हरिद्रां पिबेद्रसेनामलकीफलानाम्||२६|| हरीतकीकट्फलमुस्तलोध्रं पाठाविडङ्गार्जुनधन्वनाश्च| उभे हरिद्रे तगरं विडङ्गं कदम्बशालार्जुनदीप्यकाश्च||२७|| दार्वी विडङ्गं खदिरो धवश्च सुराह्वकुष्ठागुरुचन्दनानि| दार्व्यग्निमन्थौ त्रिफला सपाठा पाठा च मूर्वा च तथा श्वदंष्ट्रा||२८|| यवान्युशीराण्यभयागुडूचीचव्याभयाचित्रकसप्तपर्णाः| पादैः कषायाः कफमेहिनां ते दशोपदिष्टा मधुसम्प्रयुक्ताः||२९|| उशीरलोध्राञ्जनचन्दनानामुशीरमुस्तामलकाभयानाम्| पटोलनिम्बामलकामृतानां मुस्ताभयापद्मकवृक्षकाणाम्||३०|| लोध्राम्बुकालीयकधातकीनां निम्बार्जुनाम्रातनिशोत्पलानाम्| शिरीषसर्जार्जुनकेशराणां प्रियङ्गुपद्मोत्पलकिंशुकानाम्||३१|| अश्वत्थपाठासनवेतसानां कटङ्कटेर्युत्पलमुस्तकानाम्| पैत्तेषु मेहेषु दश प्रदिष्टाः पादैः कषाया मधुसम्प्रयुक्ताः||३२|| सर्वेषु मेहेषु मतौ तु पूर्वौ कषाययोगौ विहितास्तु सर्वे| मन्थस्य पाने यवभावनायां स्युर्भोजने पानविधौ पृथक् च||३३|| सिद्धानि तैलानि घृतानि चैव देयानि मेहेष्वनिलात्मकेषु| मेदः कफश्चैव कषाययोगैः स्नेहैश्च वायुः शममेति तेषाम्||३४||

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Adhikarana 14 (35-36) · Śloka 36

কম্পিল্লসপ্তচ্ছদশালজানি বৈভীতরৌহীতককৌটজানি| কপিত্থপুষ্পাণি চ চূর্ণিতানি ক্ষৌদ্রেণ লিহ্যাত্ কফপিত্তমেহী||৩৫|| পিবেদ্রসেনামলকস্য চাপি কল্কীকৃতান্যক্ষসমানি কালে| জীর্ণে চ ভুঞ্জীত পুরাণমন্নং মেহী রসৈর্জাঙ্গলজৈর্মনোজ্ঞৈঃ||৩৬||

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कम्पिल्लसप्तच्छदशालजानि बैभीतरौहीतककौटजानि| कपित्थपुष्पाणि च चूर्णितानि क्षौद्रेण लिह्यात् कफपित्तमेही||३५|| पिबेद्रसेनामलकस्य चापि कल्कीकृतान्यक्षसमानि काले| जीर्णे च भुञ्जीत पुराणमन्नं मेही रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः||३६||

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Adhikarana 15 (37-40) · Śloka 40

দৃষ্ট্বাঽনুবন্ধং পবনাত্ কফস্য পিত্তস্য বা স্নেহবিধির্বিকল্প্যঃ| তৈলং কফে স্যাত্ স্বকষাযসিদ্ধং পিত্তে ঘৃতং পিত্তহরৈঃ কষাযৈঃ||৩৭|| ত্রিকণ্টকাশ্মন্তকসোমবল্কৈর্ভল্লাতকৈঃ সাতিবিষৈঃ সলোধ্রৈঃ| বচাপটোলার্জুননিম্বমুস্তৈর্হরিদ্রযা পদ্মকদীপ্যকৈশ্চ||৩৮|| মঞ্জিষ্ঠযা চাগুরুচন্দনৈশ্চ সর্বৈঃ সমস্তৈঃ কফবাতজেষু| মেহেষু তৈলং বিপচেদ্, ঘৃতং তু পৈত্তেষু, মিশ্রং ত্রিষু লক্ষণেষু||৩৯|| ফলত্রিকং দারুনিশাং বিশালাং মুস্তাং চ নিঃক্বাথ্য নিশাং সকল্কাম্| পিবেত্ কষাযং মধুসম্প্রযুক্তং সর্বপ্রমেহেষু সমুদ্ধতেষু||৪০||

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दृष्ट्वाऽनुबन्धं पवनात् कफस्य पित्तस्य वा स्नेहविधिर्विकल्प्यः| तैलं कफे स्यात् स्वकषायसिद्धं पित्ते घृतं पित्तहरैः कषायैः||३७|| त्रिकण्टकाश्मन्तकसोमवल्कैर्भल्लातकैः सातिविषैः सलोध्रैः| वचापटोलार्जुननिम्बमुस्तैर्हरिद्रया पद्मकदीप्यकैश्च||३८|| मञ्जिष्ठया चागुरुचन्दनैश्च सर्वैः समस्तैः कफवातजेषु| मेहेषु तैलं विपचेद्, घृतं तु पैत्तेषु, मिश्रं त्रिषु लक्षणेषु||३९|| फलत्रिकं दारुनिशां विशालां मुस्तां च निःक्वाथ्य निशां सकल्काम्| पिबेत् कषायं मधुसम्प्रयुक्तं सर्वप्रमेहेषु समुद्धतेषु||४०||

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Adhikarana 16 (41-44) · Śloka 44

লোধ্রং শটীং পুষ্করমূলমেলাং মূর্বাং বিডঙ্গং ত্রিফলাং যমানীম্| চব্যং প্রিযঙ্গুং ক্রমুকং বিশালাং কিরাততিক্তং কটুরোহিণীং চ||৪১|| ভার্ঙ্গীং নতং চিত্রকপিপ্পলীনাং মূলং সকুষ্ঠাতিবিষং সপাঠম্| কলিঙ্গকন্ কেশরমিন্দ্রসাহ্বাং নখং সপত্রং মরিচং প্লবং চ||৪২|| দ্রোণেঽম্ভসঃ কর্ষসমানি পক্ত্বা পূতে চতুর্ভাগজলাবশেষে| রসেঽর্ধভাগং মধুনঃ প্রদায পক্ষং নিধেযো ঘৃতভাজনস্থঃ||৪৩|| মধ্বাসবোঽযং কফপিত্তমেহান্ ক্ষিপ্রং নিহন্যাদ্দ্বিপলপ্রযোগাত্| পাণ্ড্বামযার্শাংস্যরুচিং গ্রহণ্যা দোষং কিলাসং বিবিধং চ কুষ্ঠম্||৪৪|| ইতি মধ্বাসবঃ|

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लोध्रं शटीं पुष्करमूलमेलां मूर्वां विडङ्गं त्रिफलां यमानीम्| चव्यं प्रियङ्गुं क्रमुकं विशालां किराततिक्तं कटुरोहिणीं च||४१|| भार्ङ्गीं नतं चित्रकपिप्पलीनां मूलं सकुष्ठातिविषं सपाठम्| कलिङ्गकन् केशरमिन्द्रसाह्वां नखं सपत्रं मरिचं प्लवं च||४२|| द्रोणेऽम्भसः कर्षसमानि पक्त्वा पूते चतुर्भागजलावशेषे| रसेऽर्धभागं मधुनः प्रदाय पक्षं निधेयो घृतभाजनस्थः||४३|| मध्वासवोऽयं कफपित्तमेहान् क्षिप्रं निहन्याद्द्विपलप्रयोगात्| पाण्ड्वामयार्शांस्यरुचिं ग्रहण्या दोषं किलासं विविधं च कुष्ठम्||४४|| इति मध्वासवः|

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Adhikarana 17 (45) · Śloka 45

ক্বাথঃ স এবাষ্টপলং চ দন্ত্যা ভল্লাতকানাং চ চতুষ্পলং স্যাত্| সিতোপলা ত্বষ্টপলা বিশেষঃ ক্ষৌদ্রং চ তাবত্ পৃথগাসবৌ তৌ||৪৫||

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क्वाथः स एवाष्टपलं च दन्त्या भल्लातकानां च चतुष्पलं स्यात्| सितोपला त्वष्टपला विशेषः क्षौद्रं च तावत् पृथगासवौ तौ||४५||

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Adhikarana 18 (46-48) · Śloka 48

সারোদকং বাঽথ কুশোদকং বা মধূদকং বা ত্রিফলারসং বা| সীধুং পিবেদ্বা নিগদং প্রমেহী মাধ্বীকমগ্র্যং চিরসংস্থিতং বা||৪৬|| মাংসানি শূল্যানি মৃগদ্বিজানাং খাদেদ্যবানাং বিবিধাংশ্চ ভক্ষ্যান্| সংশোধনারিষ্টকষাযলেহৈঃ সন্তর্পণোত্থাঞ্ শমযেত্ প্রমেহান্||৪৭|| ভৃষ্টান্ যবান্ ভক্ষযতঃ প্রযোগাচ্ছুষ্কাংশ্চ সক্তূন্ন ভবন্তি মেহাঃ| শ্বিত্রং চ কৃচ্ছ্রং কফজং চ কুষ্ঠং তথৈব মুদ্গামলকপ্রযোগান্||৪৮||

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सारोदकं वाऽथ कुशोदकं वा मधूदकं वा त्रिफलारसं वा| सीधुं पिबेद्वा निगदं प्रमेही माध्वीकमग्र्यं चिरसंस्थितं वा||४६|| मांसानि शूल्यानि मृगद्विजानां खादेद्यवानां विविधांश्च भक्ष्यान्| संशोधनारिष्टकषायलेहैः सन्तर्पणोत्थाञ् शमयेत् प्रमेहान्||४७|| भृष्टान् यवान् भक्षयतः प्रयोगाच्छुष्कांश्च सक्तून्न भवन्ति मेहाः| श्वित्रं च कृच्छ्रं कफजं च कुष्ठं तथैव मुद्गामलकप्रयोगान्||४८||

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Adhikarana 19 (49) · Śloka 49

সন্তর্পণোত্থেষু গদেষু যোগা মেদস্বিনাং যে চ মযোপদিষ্টাঃ| বিরূক্ষণার্থং কফপিত্তজেষু সিদ্ধাঃ প্রমেহেষ্বপি তে প্রযোজ্যাঃ||৪৯||

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सन्तर्पणोत्थेषु गदेषु योगा मेदस्विनां ये च मयोपदिष्टाः| विरूक्षणार्थं कफपित्तजेषु सिद्धाः प्रमेहेष्वपि ते प्रयोज्याः||४९||

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Adhikarana 20 (50) · Śloka 50

ব্যাযামযোগৈর্বিবিধৈঃ প্রগাঢৈরুদ্বর্তনৈঃ স্নানজলাবসেকৈঃ| সেব্যত্বগেলাগুরুচন্দনাদ্যৈর্বিলেপনৈশ্চাশু ন সন্তি মেহাঃ||৫০||

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व्यायामयोगैर्विविधैः प्रगाढैरुद्वर्तनैः स्नानजलावसेकैः| सेव्यत्वगेलागुरुचन्दनाद्यैर्विलेपनैश्चाशु न सन्ति मेहाः||५०||

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Adhikarana 21 (51) · Śloka 51

ক্লেদশ্চ মেদশ্চ কফশ্চ বৃদ্ধঃ প্রমেহহেতুঃ প্রসমীক্ষ্য তস্মাত্| বৈদ্যেন পূর্বং কফপিত্তজেষু মেহেষু কার্যাণ্যপতর্পণানি||৫১||

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क्लेदश्च मेदश्च कफश्च वृद्धः प्रमेहहेतुः प्रसमीक्ष्य तस्मात्| वैद्येन पूर्वं कफपित्तजेषु मेहेषु कार्याण्यपतर्पणानि||५१||

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Adhikarana 22 (52) · Śloka 52

যা বাতমেহান্ প্রতি পূর্বমুক্তা বাতোল্বণানাং বিহিতা ক্রিযা সা| বাযুর্হি মেহেষ্বতিকর্শিতানাং কুপ্যত্যসাধ্যান্ প্রতি নাস্তি চিন্তা||৫২||

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या वातमेहान् प्रति पूर्वमुक्ता वातोल्बणानां विहिता क्रिया सा| वायुर्हि मेहेष्वतिकर्शितानां कुप्यत्यसाध्यान् प्रति नास्ति चिन्ता||५२||

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Adhikarana 23 (53) · Śloka 53

যৈর্হেতুভির্যে প্রভবন্তি মেহাস্তেষু প্রমেহেষু ন তে নিষেব্যাঃ| হেতোরসেবা বিহিতা যথৈব জাতস্য রোগস্য ভবেচ্চিকিত্সা||৫৩||

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यैर्हेतुभिर्ये प्रभवन्ति मेहास्तेषु प्रमेहेषु न ते निषेव्याः| हेतोरसेवा विहिता यथैव जातस्य रोगस्य भवेच्चिकित्सा||५३||

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Adhikarana 24 (54) · Śloka 54

হারিদ্রবর্ণং রুধিরং চ মূত্রং বিনা প্রমেহস্য হি পূর্বরূপৈঃ| যো মূত্রযেত্তং ন বদেত্ প্রমেহং রক্তস্য পিত্তস্য হি স প্রকোপঃ||৫৪||

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हारिद्रवर्णं रुधिरं च मूत्रं विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूपैः| यो मूत्रयेत्तं न वदेत् प्रमेहं रक्तस्य पित्तस्य हि स प्रकोपः||५४||

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Adhikarana 25 (55) · Śloka 55

দৃষ্ট্বা প্রমেহং মধুরং সপিচ্ছং মধূপমং স্যাদ্দ্বিবিধো বিচারঃ| ক্ষীণেষু দোষেষ্বনিলাত্মকঃ স্যাত্ সন্তর্পণাদ্বা কফসম্ভবঃ স্যাত্||৫৫||

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दृष्ट्वा प्रमेहं मधुरं सपिच्छं मधूपमं स्याद्द्विविधो विचारः| क्षीणेषु दोषेष्वनिलात्मकः स्यात् सन्तर्पणाद्वा कफसम्भवः स्यात्||५५||

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Adhikarana 26 (56) · Śloka 56

সপূর্বরূপাঃ কফপিত্তমেহাঃ ক্রমেণ যে বাতকৃতাশ্চ মেহাঃ| সাধ্যা ন তে, পিত্তকৃতাস্তু যাপ্যাঃ, সাধ্যাস্তু মেদো যদি ন প্রদুষ্টম্||৫৬||

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सपूर्वरूपाः कफपित्तमेहाः क्रमेण ये वातकृताश्च मेहाः| साध्या न ते, पित्तकृतास्तु याप्याः, साध्यास्तु मेदो यदि न प्रदुष्टम्||५६||

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Adhikarana 27 (57) · Śloka 57

জাতঃ প্রমেহী মধুমেহিনো বা ন সাধ্য উক্তঃ স হি বীজদোষাত্| যে চাপি কেচিত্ কুলজা বিকারা ভবন্তি তাংশ্চ প্রবদন্ত্যসাধ্যান্||৫৭||

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जातः प्रमेही मधुमेहिनो वा न साध्य उक्तः स हि बीजदोषात्| ये चापि केचित् कुलजा विकारा भवन्ति तांश्च प्रवदन्त्यसाध्यान्||५७||

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Adhikarana 28 (58) · Śloka 58

প্রমেহিণাং যাঃ পিডকা মযোক্তা রোগাধিকারে পৃথগেব সপ্ত| তাঃ শল্যবিদ্ভিঃ কুশলৈশ্চিকিত্স্যাঃ শস্ত্রেণ সংশোধনরোপণৈশ্চ||৫৮||

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प्रमेहिणां याः पिडका मयोक्ता रोगाधिकारे पृथगेव सप्त| ताः शल्यविद्भिः कुशलैश्चिकित्स्याः शस्त्रेण संशोधनरोपणैश्च||५८||

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Adhikarana 29 (59-61) · Śloka 61

তত্র শ্লোকাঃ- হেতুর্দোষো দূষ্যং মেহানাং সাধ্যতানুরূপশ্চ| মেহী দ্বিবিধস্ত্রিবিধং ভিষগ্জিতমতিক্ষপণদোষঃ||৫৯|| আদ্যা যবান্নবিকৃতির্মন্থা মেহাপহাঃ কষাযাশ্চ| তৈলঘৃতলেহযোগা ভক্ষ্যাঃ প্রবরাসবাঃ সিদ্ধাঃ||৬০|| ব্যাযামবিধির্বিবিধঃ স্নানান্যুদ্বর্তনানি গন্ধাশ্চ| মেহানাং প্রশমার্থং চিকিত্সিতে দিষ্টমেতাবত্||৬১||

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तत्र श्लोकाः- हेतुर्दोषो दूष्यं मेहानां साध्यतानुरूपश्च| मेही द्विविधस्त्रिविधं भिषग्जितमतिक्षपणदोषः||५९|| आद्या यवान्नविकृतिर्मन्था मेहापहाः कषायाश्च| तैलघृतलेहयोगा भक्ष्याः प्रवरासवाः सिद्धाः||६०|| व्यायामविधिर्विविधः स्नानान्युद्वर्तनानि गन्धाश्च| मेहानां प्रशमार्थं चिकित्सिते दिष्टमेतावत्||६१||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 6

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সিতস্থানে প্রমেহচিকিত্সিতং নাম ষষ্ঠোঽধ্যাযঃ||৬||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने प्रमेहचिकित्सितं नाम षष्ठोऽध्यायः||६||

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