Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত আযুর্বেদসমুত্থানীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथात आयुर्वेदसमुत्थानीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত আযুর্বেদসমুত্থানীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथात आयुर्वेदसमुत्थानीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ঋষযঃ খলু কদাচিচ্ছালীনা যাযাবরাশ্চ গ্রাম্যৌষধ্যাহারাঃ সন্তঃ সাম্পন্নিকা মন্দচেষ্টা নাতিকল্যাশ্চ প্রাযেণ বভূবুঃ| তে সর্বাসামিতিকর্তব্যতানামসমর্থাঃ সন্তো গ্রাম্যবাসকৃতমাত্মদোষং মত্বা পূর্বনিবাসমপগতগ্রাম্যদোষং শিবং পুণ্যমুদারং মেধ্যমগম্যমসুকৃতিভির্গঙ্গাপ্রভবমমরগন্ধর্বকিন্নরানুচরিতমনেকরত্ননিচযমচিন্ত্যাদ্ভুতপ্রভাবং ব্রহ্মর্ষিশিদ্ধচারণানুচরিতং দিব্যতীর্থৌষধিপ্রভবমতিশরণ্যং হিমবন্তমমরাধিপতিগুপ্তং জগ্মুর্ভৃগ্বঙ্গিরোঽত্রিবসিষ্ঠকশ্যপাগস্ত্যপুলস্ত্যবামদেবাসিতগৌতমপ্রভৃতযো মহর্ষযঃ||৩||
ऋषयः खलु कदाचिच्छालीना यायावराश्च ग्राम्यौषध्याहाराः सन्तः साम्पन्निका मन्दचेष्टा नातिकल्याश्च प्रायेण बभूवुः| ते सर्वासामितिकर्तव्यतानामसमर्थाः सन्तो ग्राम्यवासकृतमात्मदोषं मत्वा पूर्वनिवासमपगतग्राम्यदोषं शिवं पुण्यमुदारं मेध्यमगम्यमसुकृतिभिर्गङ्गाप्रभवममरगन्धर्वकिन्नरानुचरितमनेकरत्ननिचयमचिन्त्याद्भुतप्रभावं ब्रह्मर्षिशिद्धचारणानुचरितं दिव्यतीर्थौषधिप्रभवमतिशरण्यं हिमवन्तममराधिपतिगुप्तं जग्मुर्भृग्वङ्गिरोऽत्रिवसिष्ठकश्यपागस्त्यपुलस्त्यवामदेवासितगौतमप्रभृतयो महर्षयः||३||
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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
তানিন্দ্রঃ সহস্রদৃগমরগুরুরব্রবীত্- স্বাগতং ব্রহ্মবিদাং জ্ঞানতপোধনানাং ব্রহ্মর্ষীণাম্| অস্তি ননু বো গ্লানিরপ্রভাবত্বং বৈস্বর্যং বৈবর্ণ্যং চ গ্রাম্যবাসকৃতমসুখমসুখানুবন্ধং চ; গ্রাম্যো হি বাসো মূলমশস্তানাং, তত্ কৃতঃ পুণ্যকৃদ্ভিরনুগ্রহঃ প্রজানাং, স্বশরীরমবেক্ষিতুং কালঃ কালশ্চাযমাযুর্বেদোপদেশস্য ব্রহ্মর্ষীণাম্; আত্মনঃ প্রজানাং চানুগ্রহার্থমাযুর্বেদমশ্বিনৌ মহ্যং প্রাযচ্ছতাং, প্রজাপতিরশ্বিভ্যাং, প্রজাপতযে ব্রহ্মা, প্রজানামল্পমাযুর্জরাব্যাধিবহুলমসুখমসুখানুবন্ধমল্পত্বাদল্পতপোদমনিযমদানাধ্যযনসঞ্চযং মত্বা পুণ্যতমমাযুঃপ্রকর্ষকরং জরাব্যাধিপ্রশমনমূর্জস্করমমৃতং শিবং শরণ্যমুদারং ভবন্তো মত্তঃ শ্রোতুমর্হতাথোপধারযিতুং প্রকাশযিতুং চ প্রজানুগ্রহার্থমার্ষং ব্রহ্ম চ প্রতি মৈত্রীং কারুণ্যমাত্মনশ্চানুত্তমং পুণ্যমুদারং ব্রাহ্মমক্ষযং কর্মেতি||৪|| তচ্ছ্রুত্বা বিবুধপতিবচনমৃষযঃ সর্ব এবামরবরমৃগ্ভিস্তুষ্টুবুঃ, প্রহৃষ্টাশ্চ তদ্বচনমভিননন্দুশ্চেতি||৫||
तानिन्द्रः सहस्रदृगमरगुरुरब्रवीत्- स्वागतं ब्रह्मविदां ज्ञानतपोधनानां ब्रह्मर्षीणाम्| अस्ति ननु वो ग्लानिरप्रभावत्वं वैस्वर्यं वैवर्ण्यं च ग्राम्यवासकृतमसुखमसुखानुबन्धं च; ग्राम्यो हि वासो मूलमशस्तानां, तत् कृतः पुण्यकृद्भिरनुग्रहः प्रजानां, स्वशरीरमवेक्षितुं कालः कालश्चायमायुर्वेदोपदेशस्य ब्रह्मर्षीणाम्; आत्मनः प्रजानां चानुग्रहार्थमायुर्वेदमश्विनौ मह्यं प्रायच्छतां, प्रजापतिरश्विभ्यां, प्रजापतये ब्रह्मा, प्रजानामल्पमायुर्जराव्याधिबहुलमसुखमसुखानुबन्धमल्पत्वादल्पतपोदमनियमदानाध्ययनसञ्चयं मत्वा पुण्यतममायुःप्रकर्षकरं जराव्याधिप्रशमनमूर्जस्करममृतं शिवं शरण्यमुदारं भवन्तो मत्तः श्रोतुमर्हताथोपधारयितुं प्रकाशयितुं च प्रजानुग्रहार्थमार्षं ब्रह्म च प्रति मैत्रीं कारुण्यमात्मनश्चानुत्तमं पुण्यमुदारं ब्राह्ममक्षयं कर्मेति||४|| तच्छ्रुत्वा विबुधपतिवचनमृषयः सर्व एवामरवरमृग्भिस्तुष्टुवुः, प्रहृष्टाश्च तद्वचनमभिननन्दुश्चेति||५||
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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
অথেন্দ্রস্তদাযুর্বেদামৃতমৃষিভ্যঃ সঙ্ক্রম্যোবাচ- এতত্ সর্বমনুষ্ঠেযম্, অযং চ শিবঃ কালো রসাযনানাং, দিব্যাশ্চৌষধযো হিমবত্প্রভবাঃ প্রাপ্তবীর্যাঃ; তদ্যথা- ঐন্দ্রী, ব্রাহ্মী, পযস্যা, ক্ষীরপুষ্পী, শ্রাবণী, মহাশ্রাবণী, শতাবরী, বিদারী, জীবন্তী, পুনর্নবা, নাগবলা, স্থিরা, বচা, ছত্রা, অতিচ্ছত্রা, মেদা, মহামেদা, জীবনীযাশ্চান্যাঃ পযসা প্রযুক্তাঃ ষণ্মাসাত্ পরমাযুর্বযশ্চ তরুণমনামযত্বং স্বরবর্ণসম্পদমুপচযং মেধাং স্মৃতিমুত্তমবলমিষ্টাংশ্চাপরান্ ভাবানাবহন্তি সিদ্ধাঃ||৬|| (ইতীন্দ্রোক্তং রসাযনম্)|
अथेन्द्रस्तदायुर्वेदामृतमृषिभ्यः सङ्क्रम्योवाच- एतत् सर्वमनुष्ठेयम्, अयं च शिवः कालो रसायनानां, दिव्याश्चौषधयो हिमवत्प्रभवाः प्राप्तवीर्याः; तद्यथा- ऐन्द्री, ब्राह्मी, पयस्या, क्षीरपुष्पी, श्रावणी, महाश्रावणी, शतावरी, विदारी, जीवन्ती, पुनर्नवा, नागबला, स्थिरा, वचा, छत्रा, अतिच्छत्रा, मेदा, महामेदा, जीवनीयाश्चान्याः पयसा प्रयुक्ताः षण्मासात् परमायुर्वयश्च तरुणमनामयत्वं स्वरवर्णसम्पदमुपचयं मेधां स्मृतिमुत्तमबलमिष्टांश्चापरान् भावानावहन्ति सिद्धाः||६|| (इतीन्द्रोक्तं रसायनम्)|
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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
ব্রহ্মসুবর্চলা নামৌষধির্যা হিরণ্যক্ষীরা পুষ্করসদৃশপত্রা, আদিত্যপর্ণী নামৌষধির্যা ‘সূর্যকান্তা’ ইতি বিজ্ঞাযতে সুবর্ণক্ষীরা সূর্যমণ্ডলাকারপুষ্পা চ, নারীনামৌষধিঃ ‘অশ্ববলা’ ইতি বিজ্ঞাযতে যা বল্বজসদৃশপত্রা , কাষ্ঠগোধা নামৌষধির্গোধাকারা, সর্পানামৌষধিঃ সর্পাকারা, সোমো নামৌষধিরাজঃ পঞ্চদশপর্বা স সোম ইব হীযতে বর্ধতে চ, পদ্মা নামৌষধিঃ পদ্মাকারা পদ্মরক্তা পদ্মগন্ধা চ, অজা নামৌষধিঃ ‘অজশৃঙ্গী’ ইতি বিজ্ঞাযতে, নীলা নামৌষধিস্তু নীলক্ষীরা নীলপুষ্পা লতাপ্রতানবহুলেতি; আসামোষধীনাং যাং যামেবোপলভেত তস্যাস্তস্যাঃ স্বরসস্য সৌহিত্যং গত্বা স্নেহভাবিতাযামার্দ্রপলাশদ্রোণ্যাং সপিধানাযাং দিগ্বাসাঃ শযীত, তত্র প্রলীযতে, ষণ্মাসেন পুনঃ সম্ভবতি, তস্যাজং পযঃ প্রত্যবস্থাপনং; ষণ্মাসেন দেবতানুকারী ভবতি বযোবর্ণস্বরাকৃতিবলপ্রভাভিঃ, স্বযং চাস্য সর্ববাচোগতানি প্রাদুর্ভবন্তি, দিব্যং চাস্য চক্ষুঃ শ্রোত্রং চ ভবতি, গতির্যোজনসহস্রং দশবর্ষসহস্রাণ্যাযুরনুপদ্রবং চেতি||৭||
ब्रह्मसुवर्चला नामौषधिर्या हिरण्यक्षीरा पुष्करसदृशपत्रा, आदित्यपर्णी नामौषधिर्या ‘सूर्यकान्ता’ इति विज्ञायते सुवर्णक्षीरा सूर्यमण्डलाकारपुष्पा च, नारीनामौषधिः ‘अश्वबला’ इति विज्ञायते या बल्वजसदृशपत्रा , काष्ठगोधा नामौषधिर्गोधाकारा, सर्पानामौषधिः सर्पाकारा, सोमो नामौषधिराजः पञ्चदशपर्वा स सोम इव हीयते वर्धते च, पद्मा नामौषधिः पद्माकारा पद्मरक्ता पद्मगन्धा च, अजा नामौषधिः ‘अजशृङ्गी’ इति विज्ञायते, नीला नामौषधिस्तु नीलक्षीरा नीलपुष्पा लताप्रतानबहुलेति; आसामोषधीनां यां यामेवोपलभेत तस्यास्तस्याः स्वरसस्य सौहित्यं गत्वा स्नेहभावितायामार्द्रपलाशद्रोण्यां सपिधानायां दिग्वासाः शयीत, तत्र प्रलीयते, षण्मासेन पुनः सम्भवति, तस्याजं पयः प्रत्यवस्थापनं; षण्मासेन देवतानुकारी भवति वयोवर्णस्वराकृतिबलप्रभाभिः, स्वयं चास्य सर्ववाचोगतानि प्रादुर्भवन्ति, दिव्यं चास्य चक्षुः श्रोत्रं च भवति, गतिर्योजनसहस्रं दशवर्षसहस्राण्यायुरनुपद्रवं चेति||७||
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Adhikarana 6 (8-10) · Śloka 10
ভবন্তি চাত্র- দিব্যানামোষধীনাং যঃ প্রভাবঃ স ভবদ্বিধৈঃ| শক্যঃ সোঢুমশক্যস্তু স্যাত্ সোঢুমকৃতাত্মভিঃ||৮|| ওষধীনাং প্রভাবেণ তিষ্ঠতাং স্বে চ কর্মণি| ভবতাং নিখিলং শ্রেযঃ সর্বমেবোপপত্স্যতে||৯|| বানপ্রস্থৈর্গৃহস্থৈশ্চ প্রযতৈর্নিযতাত্মভিঃ| শক্যা ওষধযো হ্যেতাঃ সেবিতুং বিষযাভিজাঃ||১০||
भवन्ति चात्र- दिव्यानामोषधीनां यः प्रभावः स भवद्विधैः| शक्यः सोढुमशक्यस्तु स्यात् सोढुमकृतात्मभिः||८|| ओषधीनां प्रभावेण तिष्ठतां स्वे च कर्मणि| भवतां निखिलं श्रेयः सर्वमेवोपपत्स्यते||९|| वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च प्रयतैर्नियतात्मभिः| शक्या ओषधयो ह्येताः सेवितुं विषयाभिजाः||१०||
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Adhikarana 7 (11-12) · Śloka 12
যাস্তু ক্ষেত্রগুণৈস্তেষাং মধ্যমেন চ কর্মণা| মৃদুবীর্যতরাস্তাসাং বিধির্জ্ঞেযঃ স এব তু||১১|| পর্যেষ্টুং তাঃ প্রযোক্তুং বা যেঽসমর্থাঃ সুখার্থিনঃ| রসাযনবিধিস্তেষামযমন্যঃ প্রশস্যতে||১২||
यास्तु क्षेत्रगुणैस्तेषां मध्यमेन च कर्मणा| मृदुवीर्यतरास्तासां विधिर्ज्ञेयः स एव तु||११|| पर्येष्टुं ताः प्रयोक्तुं वा येऽसमर्थाः सुखार्थिनः| रसायनविधिस्तेषामयमन्यः प्रशस्यते||१२||
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Adhikarana 8 (13-26) · Śloka 26
বল্যানাং জীবনীযানাং বৃংহণীযাশ্চ যা দশ| বযসঃ স্থাপনানাং চ খদিরস্যাসনস্য চ||১৩|| খর্জূরাণাং মধূকানাং মুস্তানামুত্পলস্য চ| মৃদ্বীকানাং বিডঙ্গানাং বচাযাশ্চিত্রকস্য চ||১৪|| শতাবর্যাঃ পযস্যাযাঃ পিপ্পল্যা জোঙ্গকস্য চ| ঋধ্দ্যা নাগবলাযাশ্চ দ্বারদাযা ধবস্য চ||১৫|| ত্রিফলাকণ্টকার্যোশ্চ বিদার্যাশ্চন্দনস্য চ| ইক্ষূণাং শরমূলানাং শ্রীপর্ণ্যাস্তিনিশস্য চ||১৬|| রসাঃ পৃথক্ পৃথগ্গ্রাহ্যাঃ পলাশক্ষার এব চ| এষাং পলোন্মিতান্ ভাগান্ পযো গব্যং চতুর্গুণম্||১৭|| দ্বে পাত্রে তিলতৈলস্য দ্বে চ গব্যস্য সর্পিষঃ| তত্ সাধ্যং সর্বমেকত্র সুসিদ্ধং স্নেহমুদ্ধরেত্||১৮|| তত্রামলকচূর্ণানামাঢকং শতভাবিতম্| স্বরসেনৈব দাতব্যং ক্ষৌদ্রস্যাভিনবস্য চ||১৯|| শর্করাচূর্ণপাত্রং চ প্রস্থমেকং প্রদাপযেত্| তুগাক্ষীর্যাঃ সপিপ্পল্যাঃ স্থাপ্যং সম্মূর্চ্ছিতং চ তত্||২০|| সুচৌক্ষে মার্তিকে কুম্ভে মাসার্ধং ঘৃতভাবিতে| মাত্রামগ্নিসমাং তস্য তত ঊর্ধ্বং প্রযোজযেত্||২১|| হেমতাম্রপ্রবালানামযসঃ স্ফটিকস্য চ| মুক্তাবৈদূর্যশঙ্খানাং চূর্ণানাং রজতস্য চ||২২|| প্রক্ষিপ্য ষোডশীং মাত্রাং বিহাযাযাসমৈথুনম্| জীর্ণে জীর্ণে চ ভুঞ্জীত ষষ্টিকং ক্ষীরসর্পিষা||২৩|| সর্বরোগপ্রশমনং বৃষ্যমাযুষ্যমুত্তমম্| সত্ত্বস্মৃতিশরীরাগ্নিবুদ্ধীন্দ্রিযবলপ্রদম্||২৪|| পরমূর্জস্করং চৈব বর্ণস্বরকরং তথা| বিষালক্ষ্মীপ্রশমনং সর্ববাচোগতপ্রদম্||২৫|| সিদ্ধার্থতাং চাভিনবং বযশ্চ প্রজাপ্রিযত্বং চ যশশ্চ লোকে| প্রযোজ্যমিচ্ছদ্ভিরিদং যথাবদ্রসাযনং ব্রাহ্মমুদারবীর্যম্||২৬|| (ইতীন্দ্রোক্তরসাযনমপরম্)|
बल्यानां जीवनीयानां बृंहणीयाश्च या दश| वयसः स्थापनानां च खदिरस्यासनस्य च||१३|| खर्जूराणां मधूकानां मुस्तानामुत्पलस्य च| मृद्वीकानां विडङ्गानां वचायाश्चित्रकस्य च||१४|| शतावर्याः पयस्यायाः पिप्पल्या जोङ्गकस्य च| ऋध्द्या नागबलायाश्च द्वारदाया धवस्य च||१५|| त्रिफलाकण्टकार्योश्च विदार्याश्चन्दनस्य च| इक्षूणां शरमूलानां श्रीपर्ण्यास्तिनिशस्य च||१६|| रसाः पृथक् पृथग्ग्राह्याः पलाशक्षार एव च| एषां पलोन्मितान् भागान् पयो गव्यं चतुर्गुणम्||१७|| द्वे पात्रे तिलतैलस्य द्वे च गव्यस्य सर्पिषः| तत् साध्यं सर्वमेकत्र सुसिद्धं स्नेहमुद्धरेत्||१८|| तत्रामलकचूर्णानामाढकं शतभावितम्| स्वरसेनैव दातव्यं क्षौद्रस्याभिनवस्य च||१९|| शर्कराचूर्णपात्रं च प्रस्थमेकं प्रदापयेत्| तुगाक्षीर्याः सपिप्पल्याः स्थाप्यं सम्मूर्च्छितं च तत्||२०|| सुचौक्षे मार्तिके कुम्भे मासार्धं घृतभाविते| मात्रामग्निसमां तस्य तत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत्||२१|| हेमताम्रप्रवालानामयसः स्फटिकस्य च| मुक्तावैदूर्यशङ्खानां चूर्णानां रजतस्य च||२२|| प्रक्षिप्य षोडशीं मात्रां विहायायासमैथुनम्| जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा||२३|| सर्वरोगप्रशमनं वृष्यमायुष्यमुत्तमम्| सत्त्वस्मृतिशरीराग्निबुद्धीन्द्रियबलप्रदम्||२४|| परमूर्जस्करं चैव वर्णस्वरकरं तथा| विषालक्ष्मीप्रशमनं सर्ववाचोगतप्रदम्||२५|| सिद्धार्थतां चाभिनवं वयश्च प्रजाप्रियत्वं च यशश्च लोके| प्रयोज्यमिच्छद्भिरिदं यथावद्रसायनं ब्राह्ममुदारवीर्यम्||२६|| (इतीन्द्रोक्तरसायनमपरम्)|
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Adhikarana 9 (27-29) · Śloka 29
সমর্থানামরোগাণাং ধীমতাং নিযতাত্মনাম্| কুটীপ্রবেশঃ ক্ষণিনাং পরিচ্ছদবতাং হিতঃ||২৭|| অতোঽন্যথা তু যে তেষাং সৌর্যমারুতিকো বিধিঃ| তযোঃ শ্রেষ্ঠতরঃ পূর্বো বিধিঃ স তু সুদুষ্করঃ||২৮|| রসাযনবিধিভ্রংশাজ্জাযেরন্ ব্যাধযো যদি| যথাস্বমৌষধং তেষাং কার্যং মুক্ত্বা রসাযনম্||২৯||
समर्थानामरोगाणां धीमतां नियतात्मनाम्| कुटीप्रवेशः क्षणिनां परिच्छदवतां हितः||२७|| अतोऽन्यथा तु ये तेषां सौर्यमारुतिको विधिः| तयोः श्रेष्ठतरः पूर्वो विधिः स तु सुदुष्करः||२८|| रसायनविधिभ्रंशाज्जायेरन् व्याधयो यदि| यथास्वमौषधं तेषां कार्यं मुक्त्वा रसायनम्||२९||
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Adhikarana 10 (30-35) · Śloka 35
সত্যবাদিনমক্রোধং নিবৃত্তং মদ্যমৈথুনাত্| অহিংসকমনাযাসং প্রশান্তং প্রিযবাদিনম্||৩০|| জপশৌচপরং ধীরং দাননিত্যং তপস্বিনম্| দেবগোব্রাহ্মণাচার্যগুরুবৃদ্ধার্চনে রতম্||৩১|| আনৃশংস্যপরং নিত্যং নিত্যং করুণবেদিনম্ | সমজাগরণস্বপ্নং নিত্যং ক্ষীরঘৃতাশিনম্||৩২|| দেশকালপ্রমাণজ্ঞং যুক্তিজ্ঞমনহঙ্কৃতম্| শস্তাচারমসঙ্কীর্ণমধ্যাত্মপ্রবণেন্দ্রিযম্||৩৩|| উপাসিতারং বৃদ্ধানামাস্তিকানাং জিতাত্মনাম্| ধর্মশাস্ত্রপরং বিদ্যান্নরং নিত্যরসাযনম্||৩৪|| গুণৈরেতৈঃ সমুদিতৈঃ প্রযুঙ্ক্তে যো রসাযনম্| রসাযনগুণান্ সর্বান্ যথোক্তান্ স সমশ্নুতে||৩৫|| (ইত্যাচাররসাযনম্)|
सत्यवादिनमक्रोधं निवृत्तं मद्यमैथुनात्| अहिंसकमनायासं प्रशान्तं प्रियवादिनम्||३०|| जपशौचपरं धीरं दाननित्यं तपस्विनम्| देवगोब्राह्मणाचार्यगुरुवृद्धार्चने रतम्||३१|| आनृशंस्यपरं नित्यं नित्यं करुणवेदिनम् | समजागरणस्वप्नं नित्यं क्षीरघृताशिनम्||३२|| देशकालप्रमाणज्ञं युक्तिज्ञमनहङ्कृतम्| शस्ताचारमसङ्कीर्णमध्यात्मप्रवणेन्द्रियम्||३३|| उपासितारं वृद्धानामास्तिकानां जितात्मनाम्| धर्मशास्त्रपरं विद्यान्नरं नित्यरसायनम्||३४|| गुणैरेतैः समुदितैः प्रयुङ्क्ते यो रसायनम्| रसायनगुणान् सर्वान् यथोक्तान् स समश्नुते||३५|| (इत्याचाररसायनम्)|
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Adhikarana 11 (36-38) · Śloka 38
যথাস্থূলমনির্বাহ্য দোষাঞ্ছারীরমানসান্| রসাযনগুণৈর্জন্তুর্যুজ্যতে ন কদাচন||৩৬|| যোগা হ্যাযুঃপ্রকর্ষার্থা জরারোগনিবর্হণাঃ| মনঃশরীরশুদ্ধানাং সিধ্যন্তি প্রযতাত্মনাম্||৩৭|| তদেতন্ন ভবেদ্বাচ্যং সর্বমেব হতাত্মসু| অরুজেভ্যোঽদ্বিজাতিভ্যঃ শুশ্রূষা যেষু নাস্তি চ||৩৮||
यथास्थूलमनिर्वाह्य दोषाञ्छारीरमानसान्| रसायनगुणैर्जन्तुर्युज्यते न कदाचन||३६|| योगा ह्यायुःप्रकर्षार्था जरारोगनिबर्हणाः| मनःशरीरशुद्धानां सिध्यन्ति प्रयतात्मनाम्||३७|| तदेतन्न भवेद्वाच्यं सर्वमेव हतात्मसु| अरुजेभ्योऽद्विजातिभ्यः शुश्रूषा येषु नास्ति च||३८||
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Adhikarana 12 (39-51) · Śloka 51
যে রসাযনসংযোগা বৃষ্যযোগাশ্চ যে মতাঃ| যচ্চৌষধং বিকারাণাং সর্বং তদ্বৈদ্যসংশ্রযম্||৩৯|| প্রাণাচার্যং বুধস্তস্মাদ্ধীমন্তং বেদপারগম্| অশ্বিনাবিব দেবেন্দ্রঃ পূজযেদতিশক্তিতঃ||৪০|| অশ্বিনৌ দেবভিষজৌ যজ্ঞবাহাবিতি স্মৃতৌ| যজ্ঞস্য হি শিরশ্ছিন্নং পুনস্তাভ্যাং সমাহিতম্||৪১|| প্রশীর্ণা দশনাঃ পূষ্ণো নেত্রে নষ্টে ভগস্য চ| বজ্রিণশ্চ ভুজস্তম্ভস্তাভ্যামেব চিকিত্সিতঃ||৪২|| চিকিত্সিতশ্চ শীতাংশুর্গৃহীতো রাজযক্ষ্মণা| সোমাভিপতিতশ্চন্দ্রঃ কৃতস্তাভ্যাং পুনঃ সুখী||৪৩|| ভার্গবশ্চ্যবনঃ কামী বৃদ্ধঃ সন্ বিকৃতিং গতঃ| বীতবর্ণস্বরোপেতঃ কৃতস্তাভ্যাং পুনর্যুবা||৪৪|| এতৈশ্চান্যৈশ্চ বহুভিঃ কর্মভির্ভিষগুত্তমৌ| বভূবতুর্ভৃশং পূজ্যাবিন্দ্রাদীনাং মহাত্মনাম্||৪৫|| গ্রহাঃ স্তোত্রাণি মন্ত্রাণি তথা নানাহবীংষি চ| ধূম্রাশ্চ পশবস্তাভ্যাং প্রকল্প্যন্তে দ্বিজাতিভিঃ||৪৬|| প্রাতশ্চ সবনে সোমং শক্রোঽশ্বিভ্যাং সহাশ্নুতে| সৌত্রামণ্যাং চ ভগবানশ্বিভ্যাং সহ মোদতে||৪৭|| ইন্দ্রাগ্নী চাশ্বিনৌ চৈব স্তূযন্তে প্রাযশো দ্বিজৈঃ| স্তূযন্তে বেদবাক্যেষু ন তথাঽন্যা হি দেবতাঃ||৪৮|| অজরৈরমরৈস্তাবদ্বিবুধৈঃ সাধিপৈর্ধ্রুবৈঃ| পূজ্যেতে প্রযতৈরেবমশ্বিনৌ ভিষজাবিতি||৪৯|| মৃত্যুব্যাধিজরাবশ্যৈর্দুঃখপ্রাযৈঃ সুখার্থিভিঃ| কিং পুনর্ভিষজো মর্ত্যৈঃ পূজ্যাঃ স্যুর্নাতিশক্তিতঃ||৫০|| শীলবান্মতিমান্ যুক্তো দ্বিজাতিঃ শাস্ত্রপারগঃ| প্রাণিভির্গুরুবত্ পূজ্যঃ প্রাণাচার্যঃ স হি স্মৃতঃ||৫১||
ये रसायनसंयोगा वृष्ययोगाश्च ये मताः| यच्चौषधं विकाराणां सर्वं तद्वैद्यसंश्रयम्||३९|| प्राणाचार्यं बुधस्तस्माद्धीमन्तं वेदपारगम्| अश्विनाविव देवेन्द्रः पूजयेदतिशक्तितः||४०|| अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतौ| यज्ञस्य हि शिरश्छिन्नं पुनस्ताभ्यां समाहितम्||४१|| प्रशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च| वज्रिणश्च भुजस्तम्भस्ताभ्यामेव चिकित्सितः||४२|| चिकित्सितश्च शीतांशुर्गृहीतो राजयक्ष्मणा| सोमाभिपतितश्चन्द्रः कृतस्ताभ्यां पुनः सुखी||४३|| भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः| वीतवर्णस्वरोपेतः कृतस्ताभ्यां पुनर्युवा||४४|| एतैश्चान्यैश्च बहुभिः कर्मभिर्भिषगुत्तमौ| बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां महात्मनाम्||४५|| ग्रहाः स्तोत्राणि मन्त्राणि तथा नानाहवींषि च| धूम्राश्च पशवस्ताभ्यां प्रकल्प्यन्ते द्विजातिभिः||४६|| प्रातश्च सवने सोमं शक्रोऽश्विभ्यां सहाश्नुते| सौत्रामण्यां च भगवानश्विभ्यां सह मोदते||४७|| इन्द्राग्नी चाश्विनौ चैव स्तूयन्ते प्रायशो द्विजैः| स्तूयन्ते वेदवाक्येषु न तथाऽन्या हि देवताः||४८|| अजरैरमरैस्तावद्विबुधैः साधिपैर्ध्रुवैः| पूज्येते प्रयतैरेवमश्विनौ भिषजाविति||४९|| मृत्युव्याधिजरावश्यैर्दुःखप्रायैः सुखार्थिभिः| किं पुनर्भिषजो मर्त्यैः पूज्याः स्युर्नातिशक्तितः||५०|| शीलवान्मतिमान् युक्तो द्विजातिः शास्त्रपारगः| प्राणिभिर्गुरुवत् पूज्यः प्राणाचार्यः स हि स्मृतः||५१||
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Adhikarana 13 (52-54) · Śloka 54
বিদ্যাসমাপ্তৌ ভিষজো দ্বিতীযা জাতিরুচ্যতে| অশ্নুতে বৈদ্যশব্দং হি ন বৈদ্যঃ পূর্বজন্মনা||৫২|| বিদ্যাসমাপ্তৌ ব্রাহ্মং বা সত্ত্বমার্ষমথাপি বা| ধ্রুবমাবিশতি জ্ঞানাত্তস্মাদ্বৈদ্যো দ্বিজঃ স্মৃতঃ||৫৩|| নাভিধ্যাযেন্ন চাক্রোশেদহিতং ন সমাচরেত্| প্রাণাচার্যং বুধঃ কশ্চিদিচ্ছন্নাযুরনিত্বরম্||৫৪||
विद्यासमाप्तौ भिषजो द्वितीया जातिरुच्यते| अश्नुते वैद्यशब्दं हि न वैद्यः पूर्वजन्मना||५२|| विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सत्त्वमार्षमथापि वा| ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद्वैद्यो द्विजः स्मृतः||५३|| नाभिध्यायेन्न चाक्रोशेदहितं न समाचरेत्| प्राणाचार्यं बुधः कश्चिदिच्छन्नायुरनित्वरम्||५४||
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Adhikarana 14 (55-62) · Śloka 62
চিকিত্সিতস্তু সংশ্রুত্য যো বাঽসংশ্রুত্য মানবঃ| নোপাকরোতি বৈদ্যায নাস্তি তস্যেহ নিষ্কৃতিঃ||৫৫|| ভিষগপ্যাতুরান্ সর্বান্ স্বসুতানিব যত্নবান্| আবাধেভ্যো হি সংরক্ষেদিচ্ছন্ ধর্মমনুত্তমম্||৫৬|| ধর্মার্থং চার্থকামার্থমাযুর্বেদো মহর্ষিভিঃ| প্রকাশিতো ধর্মপরৈরিচ্ছদ্ভিঃ স্থানমক্ষরম্||৫৭|| নার্থার্থং নাপি কামার্থমথ ভূতদযাং প্রতি| বর্ততে যশ্চিকিত্সাযাং স সর্বমতিবর্ততে||৫৮|| কুর্বতে যে তু বৃত্ত্যর্থং চিকিত্সাপণ্যবিক্রযম্| তে হিত্বা কাঞ্চনং রাশিং পাংশুরাশিমুপাসতে||৫৯|| দারুণৈঃ কৃষ্যমাণানাং গদৈর্বৈবস্বতক্ষযম্| ছিত্ত্বা বৈবস্বতান্ পাশান্ জীবিতং যঃ প্রযচ্ছতি||৬০|| ধর্মার্থদাতা সদৃশস্তস্য নেহোপলভ্যতে| ন হি জীবিতদানাদ্ধি দানমন্যদ্বিশিষ্যতে||৬১|| পরো ভূতদযা ধর্ম ইতি মত্বা চিকিত্সযা| বর্ততে যঃ স সিদ্ধার্থঃ সুখমত্যন্তমশ্নুতে||৬২||
चिकित्सितस्तु संश्रुत्य यो वाऽसंश्रुत्य मानवः| नोपाकरोति वैद्याय नास्ति तस्येह निष्कृतिः||५५|| भिषगप्यातुरान् सर्वान् स्वसुतानिव यत्नवान्| आबाधेभ्यो हि संरक्षेदिच्छन् धर्ममनुत्तमम्||५६|| धर्मार्थं चार्थकामार्थमायुर्वेदो महर्षिभिः| प्रकाशितो धर्मपरैरिच्छद्भिः स्थानमक्षरम्||५७|| नार्थार्थं नापि कामार्थमथ भूतदयां प्रति| वर्तते यश्चिकित्सायां स सर्वमतिवर्तते||५८|| कुर्वते ये तु वृत्त्यर्थं चिकित्सापण्यविक्रयम्| ते हित्वा काञ्चनं राशिं पांशुराशिमुपासते||५९|| दारुणैः कृष्यमाणानां गदैर्वैवस्वतक्षयम्| छित्त्वा वैवस्वतान् पाशान् जीवितं यः प्रयच्छति||६०|| धर्मार्थदाता सदृशस्तस्य नेहोपलभ्यते| न हि जीवितदानाद्धि दानमन्यद्विशिष्यते||६१|| परो भूतदया धर्म इति मत्वा चिकित्सया| वर्तते यः स सिद्धार्थः सुखमत्यन्तमश्नुते||६२||
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Adhikarana 15 (63-64) · Śloka 64
তত্র শ্লোকৌ- আযুর্বেদসমুত্থানং দিব্যৌষধিবিধিং শুভম্| অমৃতাল্পান্তরগুণং সিদ্ধং রত্নরসাযনম্||৬৩|| সিদ্ধেভ্যো ব্রহ্মচারিভ্যো যদুবাচামরেশ্বরঃ| আযুর্বেদসমুত্থানে তত্ সর্বং সম্প্রকাশিতম্||৬৪||
तत्र श्लोकौ- आयुर्वेदसमुत्थानं दिव्यौषधिविधिं शुभम्| अमृताल्पान्तरगुणं सिद्धं रत्नरसायनम्||६३|| सिद्धेभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो यदुवाचामरेश्वरः| आयुर्वेदसमुत्थाने तत् सर्वं सम्प्रकाशितम्||६४||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 1
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সিতস্থানে রসাযনাধ্যাযে আযুর্বেদসমুত্থানীযো নাম রসাযনপাদশ্চতুর্থঃ||৪|| সমাপ্তশ্চাযং রসাযনাধ্যাযঃ||১||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने रसायनाध्याये आयुर्वेदसमुत्थानीयो नाम रसायनपादश्चतुर्थः||४|| समाप्तश्चायं रसायनाध्यायः||१||
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