Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ করপ্রচিতীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः करप्रचितीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ করপ্রচিতীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः करप्रचितीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-6) · Śloka 6
করপ্রচিতানাং যথোক্তগুণানামামলকানামুদ্ধৃতাস্থ্নাং শুষ্কচূর্ণিতানাং পুনর্মাঘে ফাল্গুনে বা মাসে ত্রিঃসপ্তকৃত্বঃ স্বরসপরিপীতানাং পুনঃ শুষ্কচূর্ণীকৃতানামাঢকমেকং গ্রাহযেত্, অথ জীবনীযানাং বৃংহণীযানাং স্তন্যজননানাং শুক্রজননানাং বযঃস্থাপনানাং ষড্বিরেচনশতাশ্রিতীযোক্তানামৌষধগণানাং চন্দনাগুরুধবতিনিশখদিরশিংশপাসনসারাণাং চাণুশঃ কৃত্তানামভযাবিভীতকপিপ্পলীবচাচব্যচিত্রকবিডঙ্গানাং চ সমস্তানামাঢকমেকং দশগুণেনাম্ভসা সাধযেত্, তস্মিন্নাঢকাবশেষে রসে সুপূতে তান্যামলকচূর্ণানি দত্ত্বা গোমযাগ্নিভির্বংশবিদলশরতেজনাগ্নিভির্বা সাধযেদ্যাবদপনযাদ্রসস্য, তমনুপদগ্ধমুপহৃত্যাযসীষু পাত্রীষ্বাস্তীর্য শোষযেত্, সুশুষ্কং তত্ কৃষ্ণাজিনস্যোপরি দৃষদি শ্লক্ষ্ণপিষ্টমযঃস্থাল্যাং নিধাপযেত্ সম্যক্, তচ্চূর্ণমযশ্চূর্ণাষ্টভাগসম্প্রযুক্তং মধুসর্পির্ভ্যামগ্নিবলমভিসমীক্ষ্য প্রযোজযেদিতি||৩|| ভবন্তি চাত্র- এতদ্রসাযনং পূর্বং বসিষ্ঠঃ কশ্যপোঽঙ্গিরাঃ| জমদগ্নির্ভরদ্বাজো ভৃগুরন্যে চ তদ্বিধাঃ||৪|| প্রযুজ্য প্রযতা মুক্তাঃ শ্রমব্যাধিজরাভযাত্| যাবদৈচ্ছংস্তপস্তেপুস্তত্প্রভাবান্মহাবলাঃ||৫|| ইদং রসাযনং চক্রে ব্রহ্মা বার্ষসহস্রিকম্| জরাব্যাধিপ্রশমনং বুদ্ধীন্দ্রিযবলপ্রদম্||৬|| (ইত্যামলকাযসং ব্রাহ্মরসাযনম্)|
करप्रचितानां यथोक्तगुणानामामलकानामुद्धृतास्थ्नां शुष्कचूर्णितानां पुनर्माघे फाल्गुने वा मासे त्रिःसप्तकृत्वः स्वरसपरिपीतानां पुनः शुष्कचूर्णीकृतानामाढकमेकं ग्राहयेत्, अथ जीवनीयानां बृंहणीयानां स्तन्यजननानां शुक्रजननानां वयःस्थापनानां षड्विरेचनशताश्रितीयोक्तानामौषधगणानां चन्दनागुरुधवतिनिशखदिरशिंशपासनसाराणां चाणुशः कृत्तानामभयाबिभीतकपिप्पलीवचाचव्यचित्रकविडङ्गानां च समस्तानामाढकमेकं दशगुणेनाम्भसा साधयेत्, तस्मिन्नाढकावशेषे रसे सुपूते तान्यामलकचूर्णानि दत्त्वा गोमयाग्निभिर्वंशविदलशरतेजनाग्निभिर्वा साधयेद्यावदपनयाद्रसस्य, तमनुपदग्धमुपहृत्यायसीषु पात्रीष्वास्तीर्य शोषयेत्, सुशुष्कं तत् कृष्णाजिनस्योपरि दृषदि श्लक्ष्णपिष्टमयःस्थाल्यां निधापयेत् सम्यक्, तच्चूर्णमयश्चूर्णाष्टभागसम्प्रयुक्तं मधुसर्पिर्भ्यामग्निबलमभिसमीक्ष्य प्रयोजयेदिति||३|| भवन्ति चात्र- एतद्रसायनं पूर्वं वसिष्ठः कश्यपोऽङ्गिराः| जमदग्निर्भरद्वाजो भृगुरन्ये च तद्विधाः||४|| प्रयुज्य प्रयता मुक्ताः श्रमव्याधिजराभयात्| यावदैच्छंस्तपस्तेपुस्तत्प्रभावान्महाबलाः||५|| इदं रसायनं चक्रे ब्रह्मा वार्षसहस्रिकम्| जराव्याधिप्रशमनं बुद्धीन्द्रियबलप्रदम्||६|| (इत्यामलकायसं ब्राह्मरसायनम्)|
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Adhikarana 3 (7-8) · Śloka 8
তপসা ব্রহ্মচর্যেণ ধ্যানেন প্রশমেন চ| রসাযনবিধানেন কালযুক্তেন চাযুষা||৭|| স্থিতা মহর্ষযঃ পূর্বং, নহি কিঞ্চিদ্রসাযনম্| গ্রাম্যানামন্যকার্যাণাং সিধ্যত্যপ্রযতাত্মনাম্||৮||
तपसा ब्रह्मचर्येण ध्यानेन प्रशमेन च| रसायनविधानेन कालयुक्तेन चायुषा||७|| स्थिता महर्षयः पूर्वं, नहि किञ्चिद्रसायनम्| ग्राम्यानामन्यकार्याणां सिध्यत्यप्रयतात्मनाम्||८||
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Adhikarana 4 (9-14) · Śloka 14
সংবত্সরং পযোবৃত্তির্গবাং মধ্যে বসেত্ সদা| সাবিত্রীং মনসা ধ্যাযন্ ব্রহ্মচারী যতেন্দ্রিযঃ||৯|| সংবত্সরান্তে পৌষীং বা মাঘীং বা ফাল্গুনীং তিথিম্| ত্র্যহোপবাসী শুক্লস্য প্রবিশ্যামলকীবনম্||১০|| বৃহত্ফলাঢ্যমারুহ্য দ্রুমং শাখাগতং ফলম্| গৃহীত্বা পাণিনা তিষ্ঠেজ্জপন্ ব্রহ্মামৃতাগমাত্||১১|| তদা হ্যবশ্যমমৃতং বসত্যামলকে ক্ষণম্| শর্করামধুকল্পানি স্নেহবন্তি মৃদূনি চ||১২|| ভবন্ত্যমৃতসংযোগাত্তানি যাবন্তি ভক্ষযেত্| জীবেদ্বর্ষসহস্রাণি তাবন্ত্যাগতযৌবনঃ||১৩|| সৌহিত্যমেষাং গত্বা তু ভবত্যমরসন্নিভঃ| স্বযং চাস্যোপতিষ্ঠন্তে শ্রীর্বেদা বাক্ চ রূপিণী||১৪|| (ইতি কেবলামলকরসাযনম্)|
संवत्सरं पयोवृत्तिर्गवां मध्ये वसेत् सदा| सावित्रीं मनसा ध्यायन् ब्रह्मचारी यतेन्द्रियः||९|| संवत्सरान्ते पौषीं वा माघीं वा फाल्गुनीं तिथिम्| त्र्यहोपवासी शुक्लस्य प्रविश्यामलकीवनम्||१०|| बृहत्फलाढ्यमारुह्य द्रुमं शाखागतं फलम्| गृहीत्वा पाणिना तिष्ठेज्जपन् ब्रह्मामृतागमात्||११|| तदा ह्यवश्यममृतं वसत्यामलके क्षणम्| शर्करामधुकल्पानि स्नेहवन्ति मृदूनि च||१२|| भवन्त्यमृतसंयोगात्तानि यावन्ति भक्षयेत्| जीवेद्वर्षसहस्राणि तावन्त्यागतयौवनः||१३|| सौहित्यमेषां गत्वा तु भवत्यमरसन्निभः| स्वयं चास्योपतिष्ठन्ते श्रीर्वेदा वाक् च रूपिणी||१४|| (इति केवलामलकरसायनम्)|
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Adhikarana 5 (15-23) · Śloka 23
ত্রিফলাযা রসে মূত্রে গবাং ক্ষারে চ লবণে| ক্রমেণ চেঙ্গুদীক্ষারে কিংশুকক্ষার এব চ||১৫|| তীক্ষ্ণাযসস্য পত্রাণি বহ্নিবর্ণানি সাধযেত্ | চতুরঙ্গুলদীর্ঘাণি তিলোত্সেধতনূনি চ||১৬|| জ্ঞাত্বা তান্যঞ্জনাভানি সূক্ষ্মচূর্ণানি কারযেত্| তানি চূর্ণানি মধুনা রসেনামলকস্য চ||১৭|| যুক্তানি লেহবত্ কুম্ভে স্থিতানি ঘৃতভাবিতে| সংবত্সরং নিধেযানি যবপল্লে তথৈব চ||১৮|| দদ্যাদালোডনং মাসে সর্বত্রালোডযন্ বুধঃ| সংবত্সরাত্যযে তস্য প্রযোগো মধুসর্পিষা||১৯|| প্রাতঃ প্রাতর্বলাপেক্ষী সাত্ম্যং জীর্ণে চ ভোজনম্| এষ এব চ লৌহানাং প্রযোগঃ সম্প্রকীর্তিতঃ||২০|| নাভিঘাতৈর্ন চাতঙ্কৈর্জরযা ন চ মৃত্যুনা| স ধৃষ্যঃ স্যাদ্গজপ্রাণঃ সদা চাতিবলেন্দ্রিযঃ||২১|| ধীমান্ যশস্বী বাক্সিদ্ধঃ শ্রুতধারী মহাধনঃ | ভবেত্ সমাং প্রযুঞ্জানো নরো লৌহরসাযনম্||২২|| অনেনৈব বিধানেন হেম্নশ্চ রজতস্য চ| আযুঃপ্রকর্ষকৃত্সিদ্ধঃ প্রযোগঃ সর্বরোগনুত্||২৩|| (ইতি লৌহাদিরসাযনম্)|
त्रिफलाया रसे मूत्रे गवां क्षारे च लवणे| क्रमेण चेङ्गुदीक्षारे किंशुकक्षार एव च||१५|| तीक्ष्णायसस्य पत्राणि वह्निवर्णानि साधयेत् | चतुरङ्गुलदीर्घाणि तिलोत्सेधतनूनि च||१६|| ज्ञात्वा तान्यञ्जनाभानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत्| तानि चूर्णानि मधुना रसेनामलकस्य च||१७|| युक्तानि लेहवत् कुम्भे स्थितानि घृतभाविते| संवत्सरं निधेयानि यवपल्ले तथैव च||१८|| दद्यादालोडनं मासे सर्वत्रालोडयन् बुधः| संवत्सरात्यये तस्य प्रयोगो मधुसर्पिषा||१९|| प्रातः प्रातर्बलापेक्षी सात्म्यं जीर्णे च भोजनम्| एष एव च लौहानां प्रयोगः सम्प्रकीर्तितः||२०|| नाभिघातैर्न चातङ्कैर्जरया न च मृत्युना| स धृष्यः स्याद्गजप्राणः सदा चातिबलेन्द्रियः||२१|| धीमान् यशस्वी वाक्सिद्धः श्रुतधारी महाधनः | भवेत् समां प्रयुञ्जानो नरो लौहरसायनम्||२२|| अनेनैव विधानेन हेम्नश्च रजतस्य च| आयुःप्रकर्षकृत्सिद्धः प्रयोगः सर्वरोगनुत्||२३|| (इति लौहादिरसायनम्)|
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Adhikarana 6 (24-29) · Śloka 29
ঐন্দ্রী মত্স্যাখ্যকো ব্রাহ্মী বচা ব্রহ্মসুবর্চলা| পিপ্পল্যো লবণং হেম শঙ্খপুষ্পী বিষং ঘৃতম্||২৪|| এষাং ত্রিযবকান্ ভাগান্ হেমসর্পির্বিষৈর্বিনা| দ্বৌ যবৌ তত্র হেম্নস্তু তিলং দদ্যাদ্বিষস্য চ||২৫|| সর্পিষশ্চ পলং দদ্যাত্তদৈকধ্যং প্রযোজযেত্| ঘৃতপ্রভূতং সক্ষৌদ্রং জীর্ণে চান্নং প্রশস্যতে||২৬|| জরাব্যাধিপ্রশমনং স্মৃতিমেধাকরং পরম্| আযুষ্যং পৌষ্টিকং ধন্যং স্বরবর্ণপ্রসাদনম্||২৭|| পরমোজস্করং চৈতত্ সিদ্ধমৈন্দ্রং রসাযনম্| নৈনত্ প্রসহতে কৃত্যা নালক্ষ্মীর্ন বিষং ন রুক্||২৮|| শ্বিত্রং সকুষ্ঠং জঠরাণি গুল্মাঃ প্লীহা পুরাণো বিষমজ্বরশ্চ| মেধাস্মৃতিজ্ঞানহরাশ্চ রোগাঃ শাম্যন্ত্যনেনাতিবলাশ্চ বাতাঃ||২৯|| (ইত্যৈন্দ্রং রসাযনম্)|
ऐन्द्री मत्स्याख्यको ब्राह्मी वचा ब्रह्मसुवर्चला| पिप्पल्यो लवणं हेम शङ्खपुष्पी विषं घृतम्||२४|| एषां त्रियवकान् भागान् हेमसर्पिर्विषैर्विना| द्वौ यवौ तत्र हेम्नस्तु तिलं दद्याद्विषस्य च||२५|| सर्पिषश्च पलं दद्यात्तदैकध्यं प्रयोजयेत्| घृतप्रभूतं सक्षौद्रं जीर्णे चान्नं प्रशस्यते||२६|| जराव्याधिप्रशमनं स्मृतिमेधाकरं परम्| आयुष्यं पौष्टिकं धन्यं स्वरवर्णप्रसादनम्||२७|| परमोजस्करं चैतत् सिद्धमैन्द्रं रसायनम्| नैनत् प्रसहते कृत्या नालक्ष्मीर्न विषं न रुक्||२८|| श्वित्रं सकुष्ठं जठराणि गुल्माः प्लीहा पुराणो विषमज्वरश्च| मेधास्मृतिज्ञानहराश्च रोगाः शाम्यन्त्यनेनातिबलाश्च वाताः||२९|| (इत्यैन्द्रं रसायनम्)|
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Adhikarana 7 (30-31) · Śloka 31
মণ্ডূকপর্ণ্যাঃ স্বরসঃ প্রযোজ্যঃ ক্ষীরেণ যষ্টীমধুকস্য চূর্ণম্| রসো গুডূচ্যাস্তু সমূলপুষ্প্যাঃ কল্কঃ প্রযোজ্যঃ খলু শঙ্খপুষ্প্যাঃ||৩০|| আযুঃপ্রদান্যামযনাশনানি বলাগ্নিবর্ণস্বরবর্ধনানি| মেধ্যানি চৈতানি রসাযনানি মেধ্যা বিশেষেণ চ শঙ্খপুষ্পী||৩১|| (ইতি মেধ্যরসাযনানি)|
मण्डूकपर्ण्याः स्वरसः प्रयोज्यः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम्| रसो गुडूच्यास्तु समूलपुष्प्याः कल्कः प्रयोज्यः खलु शङ्खपुष्प्याः||३०|| आयुःप्रदान्यामयनाशनानि बलाग्निवर्णस्वरवर्धनानि| मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या विशेषेण च शङ्खपुष्पी||३१|| (इति मेध्यरसायनानि)|
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Adhikarana 8 (32-35) · Śloka 35
পঞ্চাষ্টৌ সপ্ত দশ বা পিপ্পলীর্মধুসর্পিষা| রসাযনগুণান্বেষী সমামেকাং প্রযোজযেত্||৩২|| তিস্রস্তিস্রস্তু পূর্বাহ্ণে ভুক্ত্বাঽগ্রে ভোজনস্য চ| পিপ্পল্যঃ কিংশুকক্ষারভাবিতা ঘৃতভর্জিতাঃ||৩৩|| প্রযোজ্যা মধুসম্মিশ্রা রসাযনগুণৈষিণা| জেতুং কাসং ক্ষযং শোষং শ্বাসং হিক্কাং গলামযান্||৩৪|| অর্শাংসি গ্রহণীদোষং পাণ্ডুতাং বিষমজ্বরম্| বৈস্বর্যং পীনসং শোফং গুল্মং বাতবলাসকম্||৩৫|| (ইতি পিপ্পলীরসাযনম্)|
पञ्चाष्टौ सप्त दश वा पिप्पलीर्मधुसर्पिषा| रसायनगुणान्वेषी समामेकां प्रयोजयेत्||३२|| तिस्रस्तिस्रस्तु पूर्वाह्णे भुक्त्वाऽग्रे भोजनस्य च| पिप्पल्यः किंशुकक्षारभाविता घृतभर्जिताः||३३|| प्रयोज्या मधुसम्मिश्रा रसायनगुणैषिणा| जेतुं कासं क्षयं शोषं श्वासं हिक्कां गलामयान्||३४|| अर्शांसि ग्रहणीदोषं पाण्डुतां विषमज्वरम्| वैस्वर्यं पीनसं शोफं गुल्मं वातबलासकम्||३५|| (इति पिप्पलीरसायनम्)|
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Adhikarana 9 (36-40) · Śloka 40
ক্রমবৃদ্ধ্যা দশাহানি দশপৈপ্পলিকং দিনম্| বর্ধযেত্ পযসা সার্ধং তথৈবাপনযেত্ পুনঃ||৩৬|| জীর্ণে জীর্ণে চ ভুঞ্জীত ষষ্টিকং ক্ষীরসর্পিষা| পিপ্পলীনাং সহস্রস্য প্রযোগোঽযং রসাযনম্||৩৭|| পিষ্টাস্তা বলিভিঃ সেব্যাঃ, শৃতা মধ্যবলৈর্নরৈঃ| চূর্ণীকৃতা হ্রস্ববলৈর্যোজ্যা দোষামযান্ প্রতি||৩৮|| দশপৈপ্পলিকঃ শ্রেষ্ঠো মধ্যমঃ ষট্ প্রকীর্তিতঃ| প্রযোগো যস্ত্রিপর্যন্তঃ স কনীযান্ স চাবলৈঃ||৩৯|| বৃহণং স্বর্যমাযুষ্যং প্লীহোদরবিনাশনম্| বযসঃ স্থাপনং মেধ্যং পিপ্পলীনাং রসাযনম্||৪০|| (ইতি পিপ্পলীবর্ধমানং রসাযনম্)|
क्रमवृद्ध्या दशाहानि दशपैप्पलिकं दिनम्| वर्धयेत् पयसा सार्धं तथैवापनयेत् पुनः||३६|| जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा| पिप्पलीनां सहस्रस्य प्रयोगोऽयं रसायनम्||३७|| पिष्टास्ता बलिभिः सेव्याः, शृता मध्यबलैर्नरैः| चूर्णीकृता ह्रस्वबलैर्योज्या दोषामयान् प्रति||३८|| दशपैप्पलिकः श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्तितः| प्रयोगो यस्त्रिपर्यन्तः स कनीयान् स चाबलैः||३९|| बृहणं स्वर्यमायुष्यं प्लीहोदरविनाशनम्| वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीनां रसायनम्||४०|| (इति पिप्पलीवर्धमानं रसायनम्)|
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Adhikarana 10 (41-47) · Śloka 47
জরণান্তেঽভযামেকাং প্রাগ্ভুক্তাদ্ দ্বে বিভীতকে| ভুক্ত্বা তু মধুসর্পির্ভ্যাং চত্বার্যামলকানি চ||৪১|| প্রযোজযন্ সমামেকাং ত্রিফলাযা রসাযনম্| জীবেদ্বর্ষশতং পূর্ণমজরোঽব্যাধিরেব চ||৪২|| (ইতি ত্রিফলারসাযনম্)| ত্রৈফলেনাযসীং পাত্রীং কল্কেনালেপযেন্নবাম্| তমহোরাত্রিকং লেপং পিবেত্ ক্ষৌদ্রোদকাপ্লুতম্||৪৩|| প্রভূতস্নেহমশনং জীর্ণে তত্র প্রশস্যতে| অজরোঽরুক্ সমাভ্যাসাজ্জীবেচ্চৈব সমাঃ শতম্||৪৪|| (ইতি ত্রিফলারসাযনমপরম্)| মধুকেন তুগাক্ষীর্যা পিপ্পল্যা ক্ষৌদ্রসর্পিষা| ত্রিফলা সিতযা চাপি যুক্তা সিদ্ধং রসাযনম্||৪৫|| (ইতি ত্রিফলারসাযনমপরম্)| সর্বলৌহৈঃ সুবর্ণেন বচযা মধুসর্পিষা| বিডঙ্গপিপ্পলীভ্যাং চ ত্রিফলা লবণেন চ||৪৬|| সংবত্সরপ্রযোগেণ মেধাস্মৃতিবলপ্রদা| ভবত্যাযুঃপ্রদা ধন্যা জরারোগনিবর্হণী||৪৭|| (ইতি ত্রিফলারসাযনমপরম্)|
जरणान्तेऽभयामेकां प्राग्भुक्ताद् द्वे बिभीतके| भुक्त्वा तु मधुसर्पिर्भ्यां चत्वार्यामलकानि च||४१|| प्रयोजयन् समामेकां त्रिफलाया रसायनम्| जीवेद्वर्षशतं पूर्णमजरोऽव्याधिरेव च||४२|| (इति त्रिफलारसायनम्)| त्रैफलेनायसीं पात्रीं कल्केनालेपयेन्नवाम्| तमहोरात्रिकं लेपं पिबेत् क्षौद्रोदकाप्लुतम्||४३|| प्रभूतस्नेहमशनं जीर्णे तत्र प्रशस्यते| अजरोऽरुक् समाभ्यासाज्जीवेच्चैव समाः शतम्||४४|| (इति त्रिफलारसायनमपरम्)| मधुकेन तुगाक्षीर्या पिप्पल्या क्षौद्रसर्पिषा| त्रिफला सितया चापि युक्ता सिद्धं रसायनम्||४५|| (इति त्रिफलारसायनमपरम्)| सर्वलौहैः सुवर्णेन वचया मधुसर्पिषा| विडङ्गपिप्पलीभ्यां च त्रिफला लवणेन च||४६|| संवत्सरप्रयोगेण मेधास्मृतिबलप्रदा| भवत्यायुःप्रदा धन्या जरारोगनिबर्हणी||४७|| (इति त्रिफलारसायनमपरम्)|
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Adhikarana 11 (48-50) · Śloka 50
অনম্লং চ কষাযং চ কটু পাকে শিলাজতু| নাত্যুষ্ণশীতং ধাতুভ্যশ্চতুর্ভ্যস্তস্য সম্ভবঃ||৪৮|| হেম্নশ্চ রজতাত্তাম্রাদ্বরাত্ কৃষ্ণাযসাদপি| রসাযনং তদ্বিধিভিস্তদ্বৃষ্যং তচ্চ রোগনুত্||৪৯|| বাতপিত্তকফঘ্নৈশ্চ নির্যূহৈস্তত্ সুভাবিতম্| বীর্যোত্কর্ষং পরং যাতি সর্বৈরেকৈকশোঽপি বা||৫০||
अनम्लं च कषायं च कटु पाके शिलाजतु| नात्युष्णशीतं धातुभ्यश्चतुर्भ्यस्तस्य सम्भवः||४८|| हेम्नश्च रजतात्ताम्राद्वरात् कृष्णायसादपि| रसायनं तद्विधिभिस्तद्वृष्यं तच्च रोगनुत्||४९|| वातपित्तकफघ्नैश्च निर्यूहैस्तत् सुभावितम्| वीर्योत्कर्षं परं याति सर्वैरेकैकशोऽपि वा||५०||
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Adhikarana 12 (51-54) · Śloka 55
প্রক্ষিপ্তোদ্ধৃতমপ্যেনত্ পুনস্তত্ প্রক্ষিপেদ্রসে| কোষ্ণে সপ্তাহমেতেন বিধিনা তস্য ভাবনা||৫১|| পূর্বোক্তেন বিধানেন লোহৈশ্চূর্ণীকৃতৈঃ সহ| তত্ পীতং পযসা দদ্যাদ্দীর্ঘমাযুঃ সুখান্বিতম্||৫২|| জরাব্যাধিপ্রশমনং দেহদার্ঢ্যকরং পরম্| মেধাস্মৃতিকরং ধন্যং ক্ষীরাশী তত্ প্রযোজযেত্||৫৩|| প্রযোগঃ সপ্তসপ্তাহাস্ত্রযশ্চৈকশ্চ সপ্তকঃ| নির্দিষ্টস্ত্রিবিধস্তস্য পরো মধ্যোঽবরস্তথা||৫৪|| পলমর্ধপলং কর্ষো মাত্রা তস্য ত্রিধা মতা|৫৫|
प्रक्षिप्तोद्धृतमप्येनत् पुनस्तत् प्रक्षिपेद्रसे| कोष्णे सप्ताहमेतेन विधिना तस्य भावना||५१|| पूर्वोक्तेन विधानेन लोहैश्चूर्णीकृतैः सह| तत् पीतं पयसा दद्याद्दीर्घमायुः सुखान्वितम्||५२|| जराव्याधिप्रशमनं देहदार्ढ्यकरं परम्| मेधास्मृतिकरं धन्यं क्षीराशी तत् प्रयोजयेत्||५३|| प्रयोगः सप्तसप्ताहास्त्रयश्चैकश्च सप्तकः| निर्दिष्टस्त्रिविधस्तस्य परो मध्योऽवरस्तथा||५४|| पलमर्धपलं कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता|५५|
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Adhikarana 13 (55-61) · Śloka 61
জাতের্বিশেষং সবিধিং তস্য বক্ষ্যাম্যতঃ পরম্||৫৫|| হেমাদ্যাঃ সূর্যসন্তপ্তাঃ স্রবন্তি গিরিধাতবঃ| জত্বাভং মৃদু মৃত্স্নাচ্ছং যন্মলং তচ্ছিলাজতু||৫৬|| মধুরশ্চ সতিক্তশ্চ জপাপুষ্পনিভশ্চ যঃ| কটুর্বিপাকে শীতশ্চ স সুবর্ণস্য নিস্রবঃ||৫৭|| রূপ্যস্য কটুকঃ শ্বেতঃ শীতঃ স্বাদু বিপচ্যতে| তাম্রস্য বর্হিকণ্ঠাভস্তিক্তোষ্ণঃ পচ্যতে কটু||৫৮|| যস্তু গুগ্গুলুকাভাসস্তিক্তকো লবণান্বিতঃ| কটুর্বিপাকে শীতশ্চ সর্বশ্রেষ্ঠঃ স চাযসঃ||৫৯|| গোমূত্রগন্ধযঃ সর্বে সর্বকর্মসু যৌগিকাঃ| রসাযনপ্রযোগেষু পশ্চিমস্তু বিশিষ্যতে||৬০|| যথাক্রমং বাতপিত্তে শ্লেষ্মপিত্তে কফে ত্রিষু| বিশেষতঃ প্রশস্যন্তে মলা হেমাদিধাতুজাঃ||৬১||
जातेर्विशेषं सविधिं तस्य वक्ष्याम्यतः परम्||५५|| हेमाद्याः सूर्यसन्तप्ताः स्रवन्ति गिरिधातवः| जत्वाभं मृदु मृत्स्नाच्छं यन्मलं तच्छिलाजतु||५६|| मधुरश्च सतिक्तश्च जपापुष्पनिभश्च यः| कटुर्विपाके शीतश्च स सुवर्णस्य निस्रवः||५७|| रूप्यस्य कटुकः श्वेतः शीतः स्वादु विपच्यते| ताम्रस्य बर्हिकण्ठाभस्तिक्तोष्णः पच्यते कटु||५८|| यस्तु गुग्गुलुकाभासस्तिक्तको लवणान्वितः| कटुर्विपाके शीतश्च सर्वश्रेष्ठः स चायसः||५९|| गोमूत्रगन्धयः सर्वे सर्वकर्मसु यौगिकाः| रसायनप्रयोगेषु पश्चिमस्तु विशिष्यते||६०|| यथाक्रमं वातपित्ते श्लेष्मपित्ते कफे त्रिषु| विशेषतः प्रशस्यन्ते मला हेमादिधातुजाः||६१||
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Adhikarana 14 (62-66) · Śloka 66
শিলাজতুপ্রযোগেষু বিদাহীনি গুরূণি চ| বর্জযেত্ সর্বকালং তু কুলত্থান্ পরিবর্জযেত্||৬২|| তে হ্যত্যন্তবিরুদ্ধত্বাদশ্মনো ভেদনাঃ পরম্| লোকে দৃষ্টাস্ততস্তেষাং প্রযোগঃ প্রতিষিধ্যতে||৬৩|| পযাংসি তক্রাণি রসাঃ সযূষাস্তোযং সমূত্রা বিবিধাঃ কষাযাঃ| আলোডনার্থং গিরিজস্য শস্তাস্তে তে প্রযোজ্যাঃ প্রসমীক্ষ্য কার্যম্||৬৪|| ন সোঽস্তি রোগো ভুবি সাধ্যরূপঃ শিলাহ্বযং যং ন জযেত্ প্রসহ্য| তত্ কালযোগৈর্বিধিভিঃ প্রযুক্তং স্বস্থস্য চোর্জাং বিপুলাং দদাতি||৬৫|| (ইতি শিলাজতুরসাযনম্)| তত্র শ্লোকঃ- করপ্রচিতিকে পাদে দশ ষট্ চ মহর্ষিণা| রসাযনানাং সিদ্ধানাং সংযোগাঃ সমুদাহৃতাঃ||৬৬||
शिलाजतुप्रयोगेषु विदाहीनि गुरूणि च| वर्जयेत् सर्वकालं तु कुलत्थान् परिवर्जयेत्||६२|| ते ह्यत्यन्तविरुद्धत्वादश्मनो भेदनाः परम्| लोके दृष्टास्ततस्तेषां प्रयोगः प्रतिषिध्यते||६३|| पयांसि तक्राणि रसाः सयूषास्तोयं समूत्रा विविधाः कषायाः| आलोडनार्थं गिरिजस्य शस्तास्ते ते प्रयोज्याः प्रसमीक्ष्य कार्यम्||६४|| न सोऽस्ति रोगो भुवि साध्यरूपः शिलाह्वयं यं न जयेत् प्रसह्य| तत् कालयोगैर्विधिभिः प्रयुक्तं स्वस्थस्य चोर्जां विपुलां ददाति||६५|| (इति शिलाजतुरसायनम्)| तत्र श्लोकः- करप्रचितिके पादे दश षट् च महर्षिणा| रसायनानां सिद्धानां संयोगाः समुदाहृताः||६६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 3
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানে রসাযনাধ্যাযে করপ্রচিতীযো নাম রসাযনপাদস্তৃতীযঃ||৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने रसायनाध्याये करप्रचितीयो नाम रसायनपादस्तृतीयः||३||
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