Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ প্রাণকামীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः प्राणकामीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ প্রাণকামীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः प्राणकामीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
প্রাণকামাঃ শুশ্রূষধ্বমিদমুচ্যমানমমৃতমিবাপরমদিতিসুতহিতকরমচিন্ত্যাদ্ভুতপ্রভাবমাযুষ্যমারোগ্যকরং বযসঃ স্থাপনং নিদ্রাতন্দ্রাশ্রমক্লমালস্যদৌর্বল্যাপহরমনিলকফপিত্তসাম্যকরং স্থৈর্যকরমবদ্ধমাংসহরমন্তরগ্নিসন্ধুক্ষণং প্রভাবর্ণস্বরোত্তমকরং রসাযনবিধানম্| অনেন চ্যবনাদযো মহর্ষযঃ পুনর্যুবত্বমাপুর্নারীণাং চেষ্টতমা বভূবুঃ, স্থিরসমসুবিভক্তমাংসাঃ, সুসংহতস্থিরশরীরাঃ, সুপ্রসন্নবলবর্ণেন্দ্রিযাঃ, সর্বত্রাপ্রতিহতপরাক্রমাঃ, ক্লেশসহাশ্চ| সর্বে শরীরদোষা ভবন্তি গ্রাম্যাহারাদম্ললবণকটুকক্ষারশুষ্কশাকমাংসতিলপললপিষ্টান্নভোজিনাং বিরূঢনবশূকশমীধান্যবিরুদ্ধাসাত্ম্যরূক্ষক্ষারাভিষ্যন্দিভোজিনাং ক্লিন্নগুরুপূতিপর্যুষিতভোজিনাং বিষমাধ্যশনপ্রাযাণাং দিবাস্বপ্নস্ত্রীমদ্যনিত্যানাং বিষমাতিমাত্রব্যাযামসঙ্ক্ষোভিতশরীরাণাং ভযক্রোধশোকলোভমোহাযাসবহুলানাম্; অতোনিমিত্তং হি শিথিলীভবন্তি মাংসানি, বিমুচ্যন্তে সন্ধযঃ, বিদহ্যতে রক্তং, বিষ্যন্দতে চানল্পং মেদঃ, ন সন্ধীযতেঽস্থিষু মজ্জা, শুক্রং ন প্রবর্ততে, ক্ষযমুপৈত্যোজঃ; স এবম্ভূতো গ্লাযতি, সীদতি, নিদ্রাতন্দ্রালস্যসমন্বিতো নিরুত্সাহঃ শ্বসিতি, অসমর্থশ্চেষ্টানাং শারীরমানসীনাং, নষ্টস্মৃতিবুদ্ধিচ্ছাযো রোগাণামধিষ্ঠানভূতো ন সর্বমাযুরবাপ্নোতি| তস্মাদেতান্ দোষানবেক্ষমাণঃ সর্বান্ যথোক্তানহিতানপাস্যাহারবিহারান্ রসাযনানি প্রযোক্তুমর্হতীত্যুক্ত্বা ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেয উবাচ-||৩||
प्राणकामाः शुश्रूषध्वमिदमुच्यमानममृतमिवापरमदितिसुतहितकरमचिन्त्याद्भुतप्रभावमायुष्यमारोग्यकरं वयसः स्थापनं निद्रातन्द्राश्रमक्लमालस्यदौर्बल्यापहरमनिलकफपित्तसाम्यकरं स्थैर्यकरमबद्धमांसहरमन्तरग्निसन्धुक्षणं प्रभावर्णस्वरोत्तमकरं रसायनविधानम्| अनेन च्यवनादयो महर्षयः पुनर्युवत्वमापुर्नारीणां चेष्टतमा बभूवुः, स्थिरसमसुविभक्तमांसाः, सुसंहतस्थिरशरीराः, सुप्रसन्नबलवर्णेन्द्रियाः, सर्वत्राप्रतिहतपराक्रमाः, क्लेशसहाश्च| सर्वे शरीरदोषा भवन्ति ग्राम्याहारादम्ललवणकटुकक्षारशुष्कशाकमांसतिलपललपिष्टान्नभोजिनां विरूढनवशूकशमीधान्यविरुद्धासात्म्यरूक्षक्षाराभिष्यन्दिभोजिनां क्लिन्नगुरुपूतिपर्युषितभोजिनां विषमाध्यशनप्रायाणां दिवास्वप्नस्त्रीमद्यनित्यानां विषमातिमात्रव्यायामसङ्क्षोभितशरीराणां भयक्रोधशोकलोभमोहायासबहुलानाम्; अतोनिमित्तं हि शिथिलीभवन्ति मांसानि, विमुच्यन्ते सन्धयः, विदह्यते रक्तं, विष्यन्दते चानल्पं मेदः, न सन्धीयतेऽस्थिषु मज्जा, शुक्रं न प्रवर्तते, क्षयमुपैत्योजः; स एवम्भूतो ग्लायति, सीदति, निद्रातन्द्रालस्यसमन्वितो निरुत्साहः श्वसिति, असमर्थश्चेष्टानां शारीरमानसीनां, नष्टस्मृतिबुद्धिच्छायो रोगाणामधिष्ठानभूतो न सर्वमायुरवाप्नोति| तस्मादेतान् दोषानवेक्षमाणः सर्वान् यथोक्तानहितानपास्याहारविहारान् रसायनानि प्रयोक्तुमर्हतीत्युक्त्वा भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच-||३||
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Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6
আমলকানাং সুভূমিজানাং কালজানামনুপহতগন্ধবর্ণরসানামাপূর্ণরসপ্রমাণবীর্যাণাং স্বরসেন পুনর্নবাকল্কপাদসম্প্রযুক্তেন সর্পিষঃ সাধযেদাঢকম্, অতঃ পরং বিদারীস্বরসেন জীবন্তীকল্কসম্প্রযুক্তেন, অতঃ পরং চতুর্গুণেন পযসা বলাতিবলাকষাযেণ শতাবরীকল্কসংযুক্তেন; অনেন ক্রমেণৈকৈকং শতপাকং সহস্রপাকং বা শর্করাক্ষৌদ্রচতুর্ভাগসম্প্রযুক্তং সৌবর্ণে রাজতে মার্তিকে বা শুচৌ দৃঢে ঘৃতভাবিতে কুম্ভে স্থাপযেত্; তদ্যথোক্তেন বিধিনা যথাগ্নি প্রাতঃ প্রাতঃ প্রযোজযেত্, জীর্ণে চ ক্ষীরসর্পির্ভ্যাং শালিষষ্টিকমশ্নীযাত্| অস্য প্রযোগাদ্বর্ষশতং বযোঽজরং তিষ্ঠতি, শ্রুতমবতিষ্ঠতে, সর্বামযাঃ প্রশাম্যন্তি, অপ্রতিহতগতিঃ স্ত্রীষু, অপত্যবান্ ভবতীতি||৪|| ভবতশ্চাত্র- বৃহচ্ছরীরং গিরিসারসারং স্থিরেন্দ্রিযং চাতিবলেন্দ্রিযং চ| অধৃষ্যমন্যৈরতিকান্তরূপং প্রশস্তিপূজাসুখচিত্তভাক্ চ||৫|| বলং মহদ্বর্ণবিশুদ্ধিরগ্র্যা স্বরো ঘনৌঘস্তনিতানুকারী| ভবত্যপত্যং বিপুলং স্থিরং চ সমশ্নতো যোগমিমং নরস্য||৬|| (ইত্যামলকঘৃতম্)|
आमलकानां सुभूमिजानां कालजानामनुपहतगन्धवर्णरसानामापूर्णरसप्रमाणवीर्याणां स्वरसेन पुनर्नवाकल्कपादसम्प्रयुक्तेन सर्पिषः साधयेदाढकम्, अतः परं विदारीस्वरसेन जीवन्तीकल्कसम्प्रयुक्तेन, अतः परं चतुर्गुणेन पयसा बलातिबलाकषायेण शतावरीकल्कसंयुक्तेन; अनेन क्रमेणैकैकं शतपाकं सहस्रपाकं वा शर्कराक्षौद्रचतुर्भागसम्प्रयुक्तं सौवर्णे राजते मार्तिके वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेत्; तद्यथोक्तेन विधिना यथाग्नि प्रातः प्रातः प्रयोजयेत्, जीर्णे च क्षीरसर्पिर्भ्यां शालिषष्टिकमश्नीयात्| अस्य प्रयोगाद्वर्षशतं वयोऽजरं तिष्ठति, श्रुतमवतिष्ठते, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, अप्रतिहतगतिः स्त्रीषु, अपत्यवान् भवतीति||४|| भवतश्चात्र- बृहच्छरीरं गिरिसारसारं स्थिरेन्द्रियं चातिबलेन्द्रियं च| अधृष्यमन्यैरतिकान्तरूपं प्रशस्तिपूजासुखचित्तभाक् च||५|| बलं महद्वर्णविशुद्धिरग्र्या स्वरो घनौघस्तनितानुकारी| भवत्यपत्यं विपुलं स्थिरं च समश्नतो योगमिमं नरस्य||६|| (इत्यामलकघृतम्)|
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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
আমলকসহস্রং পিপ্পলীসহস্রসম্প্রযুক্তং পলাশতরুণক্ষারোদকোত্তরং তিষ্ঠেত্, তদনুগতক্ষারোদকমনাতপশুষ্কমনস্থি চূর্ণীকৃতং চতুর্গুণাভ্যাং মধুসর্পির্ভ্যাং সন্নীয শর্করাচূর্ণচতুর্ভাগসম্প্রযুক্তং ঘৃতভাজনস্থং ষণ্মাসান্ স্থাপযেদন্তর্ভূমেঃ| তস্যোত্তরকালমগ্নিবলসমাং মাত্রাং খাদেত্, পৌর্বাহ্ণিকঃ প্রযোগো নাপরাহ্ণিকঃ, সাত্ম্যাপেক্ষশ্চাহারবিধিঃ| অস্য প্রযোগাদ্বর্ষশতমজরং বযস্তিষ্ঠতীতি সমানং পূর্বেণ||৭|| (ইত্যামলকাবলেহঃ)|
आमलकसहस्रं पिप्पलीसहस्रसम्प्रयुक्तं पलाशतरुणक्षारोदकोत्तरं तिष्ठेत्, तदनुगतक्षारोदकमनातपशुष्कमनस्थि चूर्णीकृतं चतुर्गुणाभ्यां मधुसर्पिर्भ्यां सन्नीय शर्कराचूर्णचतुर्भागसम्प्रयुक्तं घृतभाजनस्थं षण्मासान् स्थापयेदन्तर्भूमेः| तस्योत्तरकालमग्निबलसमां मात्रां खादेत्, पौर्वाह्णिकः प्रयोगो नापराह्णिकः, सात्म्यापेक्षश्चाहारविधिः| अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण||७|| (इत्यामलकावलेहः)|
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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8
আমলকচূর্ণাঢকমেকবিংশতিরাত্রমামলকস্বরসপরিপীতং মধুঘৃতাঢকাভ্যাং দ্বাভ্যামেকীকৃতমষ্টভাগপিপ্পলীকং শর্করাচূর্ণচতুর্ভাগসম্প্রযুক্তং ঘৃতভাজনস্থং প্রাবৃষি ভস্মরাশৌ নিদধ্যাত্; তদ্বর্ষান্তে সাত্ম্যপথ্যাশী প্রযোজযেত্; অস্য প্রযোগাদ্বর্ষশতমজরমাযুস্তিষ্ঠতীতি সমানং পূর্বেণ||৮|| (ইত্যামলকচূর্ণম্)|
आमलकचूर्णाढकमेकविंशतिरात्रमामलकस्वरसपरिपीतं मधुघृताढकाभ्यां द्वाभ्यामेकीकृतमष्टभागपिप्पलीकं शर्कराचूर्णचतुर्भागसम्प्रयुक्तं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्मराशौ निदध्यात्; तद्वर्षान्ते सात्म्यपथ्याशी प्रयोजयेत्; अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण||८|| (इत्यामलकचूर्णम्)|
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Adhikarana 6 (9) · Śloka 9
বিডঙ্গতণ্ডুলচূর্ণানামাঢকমাঢকং পিপ্পলীতণ্ডুলানামধ্যর্ধাঢকং সিতোপলাযাঃ সর্পিস্তৈলমধ্বাঢকৈঃ ষড্ভিরেকীকৃতং ঘৃতভাজনস্থং প্রাবৃষি ভস্মরাশাবিতি সর্বং সমানং পূর্বেণ যাবদাশীঃ||৯|| (ইতি বিডঙ্গাবলেহঃ)|
विडङ्गतण्डुलचूर्णानामाढकमाढकं पिप्पलीतण्डुलानामध्यर्धाढकं सितोपलायाः सर्पिस्तैलमध्वाढकैः षड्भिरेकीकृतं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्मराशाविति सर्वं समानं पूर्वेण यावदाशीः||९|| (इति विडङ्गावलेहः)|
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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
যথোক্তগুণানামামলকানাং সহস্রমার্দ্রপলাশদ্রোণ্যাং সপিধানাযাং বাষ্পমনুদ্বমন্ত্যামারণ্যগোমযাগ্নিভিরুপস্বেদযেত্, তানি সুস্বিন্নশীতান্যুদ্ধৃতকুলকান্যাপোথ্যাঢকেন পিপ্পলীচূর্ণানামাঢকেন চ বিডঙ্গতণ্ডুলচূর্ণানামধ্যর্ধেন চাঢকেন শর্করাযা দ্বাভ্যাং দ্বাভ্যামাঢকাভ্যাং তৈলস্য মধুনঃ সর্পিষশ্চ সংযোজ্য শুচৌ দৃঢে ঘৃতভাবিতে কুম্ভে স্থাপযেদেকবিংশতিরাত্রম্, অত ঊর্ধ্বং প্রযোগঃ; অস্য প্রযোগাদ্বর্ষশতমজরমাযুস্তিষ্ঠতীতি সমানং পূর্বেণ||১০|| (ইত্যামলকাবলেহোঽপরঃ)|
यथोक्तगुणानामामलकानां सहस्रमार्द्रपलाशद्रोण्यां सपिधानायां बाष्पमनुद्वमन्त्यामारण्यगोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तानि सुस्विन्नशीतान्युद्धृतकुलकान्यापोथ्याढकेन पिप्पलीचूर्णानामाढकेन च विडङ्गतण्डुलचूर्णानामध्यर्धेन चाढकेन शर्कराया द्वाभ्यां द्वाभ्यामाढकाभ्यां तैलस्य मधुनः सर्पिषश्च संयोज्य शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेदेकविंशतिरात्रम्, अत ऊर्ध्वं प्रयोगः; अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायुस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण||१०|| (इत्यामलकावलेहोऽपरः)|
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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
ধন্বনি কুশাস্তীর্ণে স্নিগ্ধকৃষ্ণমধুরমৃত্তিকে সুবর্ণবর্ণমৃত্তিকে বা ব্যপগতবিষশ্বাপদপবনসলিলাগ্নিদোষে কর্ষণবল্মীকশ্মশানচৈত্যোষরাবসথবর্জিতে দেশে যথর্তুসুখপবনসলিলাদিত্যসেবিতে জাতান্যনুপহতান্যনধ্যারূঢান্যবালান্যজীর্ণান্যধিগতবীর্যাণি শীর্ণপুরাণপর্ণান্যসঞ্জাতান্যপর্ণানি তপসি তপস্যে বা মাসে শুচিঃ প্রযতঃ কৃতদেবার্চনঃ স্বস্তি বাচযিত্বা দ্বিজাতীন্ চলে সুমুহূর্তে নাগবলামূলান্যুদ্ধরেত্, তেষাং সুপ্রক্ষালিতানাং ত্বক্পিণ্ডমাম্রমাত্রমক্ষমাত্রং বা শ্লক্ষ্ণপিষ্টমালোড্য পযসা প্রাতঃ প্রযোজযেত্, চূর্ণীকৃতানি বা পিবেত্ পযসা, মধুসর্পির্ভ্যাং বা সংযোজ্য ভক্ষযেত্, জীর্ণে চ ক্ষীরসর্পির্ভ্যাং শালিষষ্টিকমশ্নীযাত্| সংবত্সরপ্রযোগাদস্য বর্ষশতমজরং বযস্তিষ্ঠতীতি সমানং পূর্বেণ||১১|| (ইতি নাগবলারসাযনম্)|
धन्वनि कुशास्तीर्णे स्निग्धकृष्णमधुरमृत्तिके सुवर्णवर्णमृत्तिके वा व्यपगतविषश्वापदपवनसलिलाग्निदोषे कर्षणवल्मीकश्मशानचैत्योषरावसथवर्जिते देशे यथर्तुसुखपवनसलिलादित्यसेविते जातान्यनुपहतान्यनध्यारूढान्यबालान्यजीर्णान्यधिगतवीर्याणि शीर्णपुराणपर्णान्यसञ्जातान्यपर्णानि तपसि तपस्ये वा मासे शुचिः प्रयतः कृतदेवार्चनः स्वस्ति वाचयित्वा द्विजातीन् चले सुमुहूर्ते नागबलामूलान्युद्धरेत्, तेषां सुप्रक्षालितानां त्वक्पिण्डमाम्रमात्रमक्षमात्रं वा श्लक्ष्णपिष्टमालोड्य पयसा प्रातः प्रयोजयेत्, चूर्णीकृतानि वा पिबेत् पयसा, मधुसर्पिर्भ्यां वा संयोज्य भक्षयेत्, जीर्णे च क्षीरसर्पिर्भ्यां शालिषष्टिकमश्नीयात्| संवत्सरप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण||११|| (इति नागबलारसायनम्)|
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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
বলাতিবলাচন্দনাগুরুধবতিনিশখদিরশিংশপাসনস্বরসাঃ পুনর্নবান্তাশ্চৌষধযো দশ নাগবলযা ব্যাখ্যাতাঃ| স্বরসানামলাভে ত্বযং স্বরসবিধিঃ- চূর্ণানামাঢকমাঢকমুদকস্যাহোরাত্রস্থিতং মৃদিতপূতং স্বরসবত্ প্রযোজ্যম্||১২||
बलातिबलाचन्दनागुरुधवतिनिशखदिरशिंशपासनस्वरसाः पुनर्नवान्ताश्चौषधयो दश नागबलया व्याख्याताः| स्वरसानामलाभे त्वयं स्वरसविधिः- चूर्णानामाढकमाढकमुदकस्याहोरात्रस्थितं मृदितपूतं स्वरसवत् प्रयोज्यम्||१२||
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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13
ভল্লাতকান্যনুপহতান্যনামযান্যাপূর্ণরসপ্রমাণবীর্যাণি পক্বজাম্ববপ্রকাশানি শুচৌ শুক্রে বা মাসে সঙ্গৃহ্য যবপল্লে মাষপল্লে বা নিধাপযেত্, তানি চতুর্মাসস্থিতানি সহসি সহস্যে বা মাসে প্রযোক্তুমারভেত শীতস্নিগ্ধমধুরোপস্কৃতশরীরঃ| পূর্বং দশভল্লাতকান্যাপোথ্যাষ্টগুণেনাম্ভসা সাধু সাধযেত্, তেষাং রসমষ্টভাগাবশেষং পূতং সপযস্কং পিবেত্ সর্পিষাঽন্তর্মুখমভ্যজ্য| তান্যেকৈকভল্লাতকোত্কর্ষাপকর্ষেণ দশভল্লাতকান্যাত্রিংশতঃ প্রযোজ্যানি, নাতঃ পরমুত্কর্ষঃ| প্রযোগবিধানেন সহস্রপর এব ভল্লাতকপ্রযোগঃ| জীর্ণে চ সসর্পিষা পযসা শালিষষ্টিকাশনমুপচারঃ, প্রযোগান্তে চ দ্বিস্তাবত্ পযসৈবোপচারঃ| তত্প্রযোগাদ্বর্ষশতমজরং বযস্তিষ্ঠতীতি সমানং পূর্বেণ||১৩|| (ইতি ভল্লাতকক্ষীরম্)|
भल्लातकान्यनुपहतान्यनामयान्यापूर्णरसप्रमाणवीर्याणि पक्वजाम्बवप्रकाशानि शुचौ शुक्रे वा मासे सङ्गृह्य यवपल्ले माषपल्ले वा निधापयेत्, तानि चतुर्मासस्थितानि सहसि सहस्ये वा मासे प्रयोक्तुमारभेत शीतस्निग्धमधुरोपस्कृतशरीरः| पूर्वं दशभल्लातकान्यापोथ्याष्टगुणेनाम्भसा साधु साधयेत्, तेषां रसमष्टभागावशेषं पूतं सपयस्कं पिबेत् सर्पिषाऽन्तर्मुखमभ्यज्य| तान्येकैकभल्लातकोत्कर्षापकर्षेण दशभल्लातकान्यात्रिंशतः प्रयोज्यानि, नातः परमुत्कर्षः| प्रयोगविधानेन सहस्रपर एव भल्लातकप्रयोगः| जीर्णे च ससर्पिषा पयसा शालिषष्टिकाशनमुपचारः, प्रयोगान्ते च द्विस्तावत् पयसैवोपचारः| तत्प्रयोगाद्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण||१३|| (इति भल्लातकक्षीरम्)|
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Adhikarana 11 (14) · Śloka 14
ভল্লাতকানাং জর্জরীকৃতানাং পিষ্টস্বেদনং পূরযিত্বা ভূমাবাকণ্ঠং নিখাতস্য স্নেহভাবিতস্য দৃঢস্যোপরি কুম্ভস্যারোপ্যোডুপেনাপিধায কৃষ্ণমৃত্তিকাবলিপ্তং গোমযাগ্নিভিরুপস্বেদযেত্; তেষাং যঃ স্বরসঃ কুম্ভং প্রপদ্যেত, তমষ্টভাগমধুসম্প্রযুক্তং দ্বিগুণঘৃতমদ্যাত্; তত্প্রযোগাদ্বর্ষশতমজরং বযস্তিষ্ঠতীতি সমানং পূর্বেণ||১৪|| (ইতি ভল্লাতকক্ষৌদ্রম্)|
भल्लातकानां जर्जरीकृतानां पिष्टस्वेदनं पूरयित्वा भूमावाकण्ठं निखातस्य स्नेहभावितस्य दृढस्योपरि कुम्भस्यारोप्योडुपेनापिधाय कृष्णमृत्तिकावलिप्तं गोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्; तेषां यः स्वरसः कुम्भं प्रपद्येत, तमष्टभागमधुसम्प्रयुक्तं द्विगुणघृतमद्यात्; तत्प्रयोगाद्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण||१४|| (इति भल्लातकक्षौद्रम्)|
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Adhikarana 12 (15) · Śloka 15
ভল্লাতকতৈলপাত্রং সপযস্কং মধুকেন কল্কেনাক্ষমাত্রেণ শতপাকং কুর্যাদিতি সমানং পূর্বেণ||১৫|| (ইতি ভল্লাতকতৈলম্)|
भल्लातकतैलपात्रं सपयस्कं मधुकेन कल्केनाक्षमात्रेण शतपाकं कुर्यादिति समानं पूर्वेण||१५|| (इति भल्लातकतैलम्)|
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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16
ভল্লাতকসর্পিঃ , ভল্লাতকক্ষীরং, ভল্লাতকক্ষৌদ্রং, গুডভল্লাতকং, ভল্লাতকযূষঃ, ভল্লাতকতৈলং, ভল্লাতকপললং, ভল্লাতকসক্তবঃ, ভল্লাতকলবণং, ভল্লাতকতর্পণম্, ইতি ভল্লাতকবিধানমুক্তং ভবতি||১৬||
भल्लातकसर्पिः , भल्लातकक्षीरं, भल्लातकक्षौद्रं, गुडभल्लातकं, भल्लातकयूषः, भल्लातकतैलं, भल्लातकपललं, भल्लातकसक्तवः, भल्लातकलवणं, भल्लातकतर्पणम्, इति भल्लातकविधानमुक्तं भवति||१६||
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Adhikarana 14 (17-22) · Śloka 22
ভবন্তি চাত্র- ভল্লাতকানি তীক্ষ্ণানি পাকীন্যগ্নিসমানি চ| ভবন্ত্যমৃতকল্পানি প্রযুক্তানি যথাবিধি||১৭|| এতে দশবিধাস্ত্বেষাং প্রযোগাঃ পরিকীর্তিতাঃ| রোগপ্রকৃতিসাত্ম্যজ্ঞস্তান্ প্রযোগান্ প্রকল্পযেত্||১৮|| কফজো ন স রোগোঽস্তি ন বিবন্ধোঽস্তি কশ্চন| যং ন ভল্লাতকং হন্যাচ্ছীঘ্রং মেধাগ্নিবর্ধনম্||১৯|| (ইতি ভল্লাতকবিধিঃ)| প্রাণকামাঃ পুরা জীর্ণাশ্চ্যবনাদ্যা মহর্ষযঃ| রসাযনৈঃ শিবৈরেতৈর্বভূবুরমিতাযুষঃ||২০|| ব্রাহ্মং তপো ব্রহ্মচর্যমধ্যাত্মধ্যানমেব চ| দীর্ঘাযুষো যথাকামং সম্ভৃত্য ত্রিদিবং গতাঃ||২১|| তস্মাদাযুঃপ্রকর্ষার্থং প্রাণকামৈঃ সুখার্থিভিঃ| রসাযনবিধিঃ সেব্যো বিধিবত্সুসমাহিতৈঃ||২২||
भवन्ति चात्र- भल्लातकानि तीक्ष्णानि पाकीन्यग्निसमानि च| भवन्त्यमृतकल्पानि प्रयुक्तानि यथाविधि||१७|| एते दशविधास्त्वेषां प्रयोगाः परिकीर्तिताः| रोगप्रकृतिसात्म्यज्ञस्तान् प्रयोगान् प्रकल्पयेत्||१८|| कफजो न स रोगोऽस्ति न विबन्धोऽस्ति कश्चन| यं न भल्लातकं हन्याच्छीघ्रं मेधाग्निवर्धनम्||१९|| (इति भल्लातकविधिः)| प्राणकामाः पुरा जीर्णाश्च्यवनाद्या महर्षयः| रसायनैः शिवैरेतैर्बभूवुरमितायुषः||२०|| ब्राह्मं तपो ब्रह्मचर्यमध्यात्मध्यानमेव च| दीर्घायुषो यथाकामं सम्भृत्य त्रिदिवं गताः||२१|| तस्मादायुःप्रकर्षार्थं प्राणकामैः सुखार्थिभिः| रसायनविधिः सेव्यो विधिवत्सुसमाहितैः||२२||
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Adhikarana 15 (23) · Śloka 23
তত্র শ্লোকঃ- রসাযনানাং সংযোগাঃ সিদ্ধা ভূতহিতৈষিণা| নির্দিষ্টাঃ প্রাণকামীযে সপ্তত্রিংশন্মহর্ষিণা ||২৩||
तत्र श्लोकः- रसायनानां संयोगाः सिद्धा भूतहितैषिणा| निर्दिष्टाः प्राणकामीये सप्तत्रिंशन्महर्षिणा ||२३||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 2
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানে রসাযনাধ্যাযে প্রাণকামীযো নাম রসাযনপাদো দ্বিতীযঃ||২||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने रसायनाध्याये प्राणकामीयो नाम रसायनपादो द्वितीयः||२||
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