Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত ইন্দ্রিযানীকমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथात इन्द्रियानीकमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত ইন্দ্রিযানীকমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथात इन्द्रियानीकमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4
ইন্দ্রিযাণি যথা জন্তোঃ পরীক্ষেত বিশেষবিত্| জ্ঞাতুমিচ্ছন্ ভিষঙ্মানমাযুষস্তন্নিবোধত ||৩|| অনুমানাত্ পরীক্ষেত দর্শনাদীনি তত্ত্বতঃ| অদ্ধা হি বিদিতং জ্ঞানমিন্দ্রিযাণামতীন্দ্রিযম্||৪||
इन्द्रियाणि यथा जन्तोः परीक्षेत विशेषवित्| ज्ञातुमिच्छन् भिषङ्मानमायुषस्तन्निबोधत ||३|| अनुमानात् परीक्षेत दर्शनादीनि तत्त्वतः| अद्धा हि विदितं ज्ञानमिन्द्रियाणामतीन्द्रियम्||४||
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Adhikarana 3 (5-6) · Śloka 6
স্বস্থেভ্যো বিকৃতং যস্য জ্ঞানমিন্দ্রিযসংশ্রযম্ | আলক্ষ্যেতানিমিত্তেন লক্ষণং মরণস্য তত্||৫|| ইত্যুক্তং লক্ষণং সম্যগিন্দ্রিযেষ্বশুভোদযম্| তদেব তু পুনর্ভূযো বিস্তরেণ নিবোধত||৬||
स्वस्थेभ्यो विकृतं यस्य ज्ञानमिन्द्रियसंश्रयम् | आलक्ष्येतानिमित्तेन लक्षणं मरणस्य तत्||५|| इत्युक्तं लक्षणं सम्यगिन्द्रियेष्वशुभोदयम्| तदेव तु पुनर्भूयो विस्तरेण निबोधत||६||
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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
ঘনীভূতমিবাকাশমাকাশমিব মেদিনীম্| বিগীতমুভযং হ্যেতত্ পশ্যন্ মরণমৃচ্ছতি||৭||
घनीभूतमिवाकाशमाकाशमिव मेदिनीम्| विगीतमुभयं ह्येतत् पश्यन् मरणमृच्छति||७||
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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8
যস্য দর্শনমাযাতি মারুতোঽম্বরগোচরঃ| অগ্নির্নাযাতি চাদীপ্তস্তস্যাযুঃক্ষযমাদিশেত্||৮||
यस्य दर्शनमायाति मारुतोऽम्बरगोचरः| अग्निर्नायाति चादीप्तस्तस्यायुःक्षयमादिशेत्||८||
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Adhikarana 6 (9) · Śloka 9
জলে সুবিমলে জালমজালাবততে নরঃ| স্থিতে গচ্ছতি বা দৃষ্ট্বা জীবিতাত্ পরিমুচ্যতে||৯||
जले सुविमले जालमजालावतते नरः| स्थिते गच्छति वा दृष्ट्वा जीवितात् परिमुच्यते||९||
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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
জাগ্রত্ পশ্যতি যঃ প্রেতান্ রক্ষাংসি বিবিধানি চ| অন্যদ্বাঽপ্যদ্ভুতং কিঞ্চিন্ন স জীবিতুমর্হতি||১০||
जाग्रत् पश्यति यः प्रेतान् रक्षांसि विविधानि च| अन्यद्वाऽप्यद्भुतं किञ्चिन्न स जीवितुमर्हति||१०||
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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
যোঽগ্নিং প্রকৃতিবর্ণস্থং নীলং পশ্যতি নিষ্প্রভম্| কৃষ্ণং বা যদি বা শুক্লং নিশাং ব্রজতি সপ্তমীম্||১১||
योऽग्निं प्रकृतिवर्णस्थं नीलं पश्यति निष्प्रभम्| कृष्णं वा यदि वा शुक्लं निशां व्रजति सप्तमीम्||११||
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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
মরীচীনসতো মেঘান্মেঘান্ বাঽপ্যসতোঽম্বরে| বিদ্যুতো বা বিনা মেঘৈঃ পশ্যন্ মরণমৃচ্ছতি||১২||
मरीचीनसतो मेघान्मेघान् वाऽप्यसतोऽम्बरे| विद्युतो वा विना मेघैः पश्यन् मरणमृच्छति||१२||
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Adhikarana 10 (13-18) · Śloka 18
মৃন্মযীমিব যঃ পাত্রীং কৃষ্ণাম্বরসমাবৃতাম্| আদিত্যমীক্ষতে শুদ্ধং চন্দ্রং বা ন স জীবতি||১৩|| অপর্বণি যদা পশ্যেত্ সূর্যাচন্দ্রমসোর্গ্রহম্| অব্যাধিতো ব্যাধিতো বা তদন্তং তস্য জীবিতম্||১৪|| নক্তং সূর্যমহশ্চন্দ্রমনগ্নৌ ধূমমুত্থিতম্| অগ্নিং বা নিষ্প্রভং রাত্রৌ দৃষ্ট্বা মরণমৃচ্ছতি||১৫|| প্রভাবতঃ প্রভাহীনান্নিষ্প্রভাংশ্চ প্রভাবতঃ| নরা বিলিঙ্গান্ পশ্যন্তি ভাবান্ ভাবাঞ্জিহাসবঃ ||১৬|| ব্যাকৃতীনি বিবর্ণানি বিসঙ্খ্যোপগতানি চ| বিনিমিত্তানি পশ্যন্তি রূপাণ্যাযুঃক্ষযে নরাঃ||১৭|| যশ্চ পশ্যত্যদৃশ্যান্ বৈ দৃশ্যান্ যশ্চ ন পশ্যতি| তাবুভৌ পশ্যতঃ ক্ষিপ্রং যমক্ষযমসংশযম্||১৮||
मृन्मयीमिव यः पात्रीं कृष्णाम्बरसमावृताम्| आदित्यमीक्षते शुद्धं चन्द्रं वा न स जीवति||१३|| अपर्वणि यदा पश्येत् सूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहम्| अव्याधितो व्याधितो वा तदन्तं तस्य जीवितम्||१४|| नक्तं सूर्यमहश्चन्द्रमनग्नौ धूममुत्थितम्| अग्निं वा निष्प्रभं रात्रौ दृष्ट्वा मरणमृच्छति||१५|| प्रभावतः प्रभाहीनान्निष्प्रभांश्च प्रभावतः| नरा विलिङ्गान् पश्यन्ति भावान् भावाञ्जिहासवः ||१६|| व्याकृतीनि विवर्णानि विसङ्ख्योपगतानि च| विनिमित्तानि पश्यन्ति रूपाण्यायुःक्षये नराः||१७|| यश्च पश्यत्यदृश्यान् वै दृश्यान् यश्च न पश्यति| तावुभौ पश्यतः क्षिप्रं यमक्षयमसंशयम्||१८||
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Adhikarana 11 (19-20) · Śloka 20
অশব্দস্য চ যঃ শ্রোতা শব্দান্ যশ্চ ন বুধ্যতে| দ্বাবপ্যেতৌ যথা প্রেতৌ তথা জ্ঞেযৌ বিজানতা ||১৯|| সংবৃত্যাঙ্গুলিভিঃ কর্ণৌ জ্বালাশব্দং য আতুরঃ| ন শৃণোতি গতাসুং তং বুদ্ধিমান্ পরিবর্জযেত্||২০||
अशब्दस्य च यः श्रोता शब्दान् यश्च न बुध्यते| द्वावप्येतौ यथा प्रेतौ तथा ज्ञेयौ विजानता ||१९|| संवृत्याङ्गुलिभिः कर्णौ ज्वालाशब्दं य आतुरः| न शृणोति गतासुं तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत्||२०||
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Adhikarana 12 (21) · Śloka 21
বিপর্যযেণ যো বিদ্যাদ্গন্ধানাং সাধ্বসাধুতাম্| ন বা তান্ সর্বশো বিদ্যাত্তং বিদ্যাদ্বিগতাযুষম্||২১||
विपर्ययेण यो विद्याद्गन्धानां साध्वसाधुताम्| न वा तान् सर्वशो विद्यात्तं विद्याद्विगतायुषम्||२१||
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Adhikarana 13 (22) · Śloka 22
যো রসান্ন বিজানাতি ন বা জানাতি তত্ত্বতঃ| মুখপাকাদৃতে পক্বং তমাহুঃ কুশলা নরম্||২২||
यो रसान्न विजानाति न वा जानाति तत्त्वतः| मुखपाकादृते पक्वं तमाहुः कुशला नरम्||२२||
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Adhikarana 14 (23) · Śloka 23
উষ্ণাঞ্ছীতান্ খরাঞ্ছ্লক্ষ্ণান্মৃদূনপি চ দারুণান্| স্পৃশ্যান্ স্পৃষ্ট্বা ততোঽন্যত্বং মুমূর্ষুস্তেষু মন্যতে||২৩||
उष्णाञ्छीतान् खराञ्छ्लक्ष्णान्मृदूनपि च दारुणान्| स्पृश्यान् स्पृष्ट्वा ततोऽन्यत्वं मुमूर्षुस्तेषु मन्यते||२३||
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Adhikarana 15 (24-25) · Śloka 25
অন্তরেণ তপস্তীব্রং যোগং বা বিধিপূর্বকম্| ইন্দ্রিযৈরধিকং পশ্যন্ পঞ্চত্বমধিগচ্ছতি||২৪|| ইন্দ্রিযাণামৃতে দৃষ্টেরিন্দ্রিযার্থানদোষজান্| নরঃ পশ্যতি যঃ কশ্চিদিন্দ্রিযৈর্ন স জীবতি||২৫||
अन्तरेण तपस्तीव्रं योगं वा विधिपूर्वकम्| इन्द्रियैरधिकं पश्यन् पञ्चत्वमधिगच्छति||२४|| इन्द्रियाणामृते दृष्टेरिन्द्रियार्थानदोषजान्| नरः पश्यति यः कश्चिदिन्द्रियैर्न स जीवति||२५||
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Adhikarana 16 (26) · Śloka 26
স্বস্থাঃ প্রজ্ঞাবিপর্যাসৈরিন্দ্রিযার্থেষু বৈকৃতম্| পশ্যন্তি যেঽসদ্বহুশস্তেষাং মরণমাদিশেত্||২৬||
स्वस्थाः प्रज्ञाविपर्यासैरिन्द्रियार्थेषु वैकृतम्| पश्यन्ति येऽसद्बहुशस्तेषां मरणमादिशेत्||२६||
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Adhikarana 17 (27) · Śloka 27
তত্র শ্লোকঃ- এতদিন্দ্রিযবিজ্ঞানং যঃ পশ্যতি যথাতথম্| মরণং জীবিতং চৈব স ভিষক্ জ্ঞাতুমর্হতি||২৭||
तत्र श्लोकः- एतदिन्द्रियविज्ञानं यः पश्यति यथातथम्| मरणं जीवितं चैव स भिषक् ज्ञातुमर्हति||२७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 4
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানে ইন্দ্রিযানীকমিন্দ্রিযং নাম চতুর্থোঽধ্যাযঃ||৪||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने इन्द्रियानीकमिन्द्रियं नाम चतुर्थोऽध्यायः||४||
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