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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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5. pūrvarūpīyamindriyam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ পূর্বরূপীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः पूर्वरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5

পূর্বরূপাণ্যসাধ্যানাং বিকারাণাং পৃথক্ পৃথক্| ভিন্নাভিন্নানি বক্ষ্যামো ভিষজাং জ্ঞানবৃদ্ধযে||৩|| পূর্বরূপাণি সর্বাণি জ্বরোক্তান্যতিমাত্রযা| যং বিশন্তি বিশত্যেনং মৃত্যুর্জ্বরপুরঃসরঃ||৪|| অন্যস্যাপি চ রোগস্য পূর্বরূপাণি যং নরম্| বিশন্ত্যনেন কল্পেন তস্যাপি মরণং ধ্রুবম্||৫||

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पूर्वरूपाण्यसाध्यानां विकाराणां पृथक् पृथक्| भिन्नाभिन्नानि वक्ष्यामो भिषजां ज्ञानवृद्धये||३|| पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यतिमात्रया| यं विशन्ति विशत्येनं मृत्युर्ज्वरपुरःसरः||४|| अन्यस्यापि च रोगस्य पूर्वरूपाणि यं नरम्| विशन्त्यनेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम्||५||

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Adhikarana 3 (6-9) · Śloka 9

পূর্বরূপৈকদেশাংস্তু বক্ষ্যামোঽন্যান্ সুদারুণান্| যে রোগাননুবধ্নন্তি মৃত্যুর্যৈরনুবধ্যতে ||৬|| বলং চ হীযতে যস্য প্রতিশ্যাযশ্চ বর্ধতে| তস্য নারীপ্রসক্তস্য শোষোঽন্তাযোপজাযতে||৭|| শ্বভিরুষ্ট্রৈঃ খরৈর্বাঽপি যাতি যো দক্ষিণাং দিশম্| স্বপ্নে যক্ষ্মাণমাসাদ্য জীবিতং স বিমুঞ্চতি||৮|| প্রেতৈঃ সহ পিবেন্মদ্যং স্বপ্নে যঃ কৃষ্যতে শুনা| সুঘোরং জ্বরমাসাদ্য জীবিতং স বিমুঞ্চতি||৯||

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पूर्वरूपैकदेशांस्तु वक्ष्यामोऽन्यान् सुदारुणान्| ये रोगाननुबध्नन्ति मृत्युर्यैरनुबध्यते ||६|| बलं च हीयते यस्य प्रतिश्यायश्च वर्धते| तस्य नारीप्रसक्तस्य शोषोऽन्तायोपजायते||७|| श्वभिरुष्ट्रैः खरैर्वाऽपि याति यो दक्षिणां दिशम्| स्वप्ने यक्ष्माणमासाद्य जीवितं स विमुञ्चति||८|| प्रेतैः सह पिबेन्मद्यं स्वप्ने यः कृष्यते शुना| सुघोरं ज्वरमासाद्य जीवितं स विमुञ्चति||९||

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Adhikarana 4 (10-11) · Śloka 11

লাক্ষারক্তাম্বরাভং যঃ পশ্যত্যম্বরমন্তিকাত্| স রক্তপিত্তমাসাদ্য তেনৈবান্তায নীযতে||১০|| রক্তস্রগ্রক্তসর্বাঙ্গো রক্তবাসা মুহুর্হসন্| যঃ স্বপ্নে হ্রিযতে নার্যা স রক্তং প্রাপ্য সীদতি||১১||

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लाक्षारक्ताम्बराभं यः पश्यत्यम्बरमन्तिकात्| स रक्तपित्तमासाद्य तेनैवान्ताय नीयते||१०|| रक्तस्रग्रक्तसर्वाङ्गो रक्तवासा मुहुर्हसन्| यः स्वप्ने ह्रियते नार्या स रक्तं प्राप्य सीदति||११||

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Adhikarana 5 (12-13) · Śloka 13

শূলাটোপান্ত্রকূজাশ্চ দৌর্বল্যং চাতিমাত্রযা| নখাদিষু চ বৈবর্ণ্যং গুল্মেনান্তকরো গ্রহঃ||১২|| লতা কণ্টকিনী যস্য দারুণা হৃদি জাযতে| স্বপ্নে গুল্মস্তমন্তায ক্রূরো বিশতি মানবম্||১৩||

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शूलाटोपान्त्रकूजाश्च दौर्बल्यं चातिमात्रया| नखादिषु च वैवर्ण्यं गुल्मेनान्तकरो ग्रहः||१२|| लता कण्टकिनी यस्य दारुणा हृदि जायते| स्वप्ने गुल्मस्तमन्ताय क्रूरो विशति मानवम्||१३||

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Adhikarana 6 (14-15) · Śloka 15

কাযেঽল্পমপি সংস্পৃষ্টং সুভৃশং যস্য দীর্যতে| ক্ষতানি চ ন রোহন্তি কুষ্ঠৈর্মৃত্যুর্হিনস্তি তম্||১৪|| নগ্নস্যাজ্যাবসিক্তস্য জুহ্বতোঽগ্নিমনর্চিষম্| পদ্মান্যুরসি জাযন্তে স্বপ্নে কুষ্ঠৈর্মরিষ্যতঃ||১৫||

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कायेऽल्पमपि संस्पृष्टं सुभृशं यस्य दीर्यते| क्षतानि च न रोहन्ति कुष्ठैर्मृत्युर्हिनस्ति तम्||१४|| नग्नस्याज्यावसिक्तस्य जुह्वतोऽग्निमनर्चिषम्| पद्मान्युरसि जायन्ते स्वप्ने कुष्ठैर्मरिष्यतः||१५||

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Adhikarana 7 (16-17) · Śloka 17

স্নাতানুলিপ্তগাত্রেঽপি যস্মিন্ গৃধ্নন্তি মক্ষিকাঃ| স প্রমেহেণ সংস্পর্শং প্রাপ্য তেনৈব হন্যতে||১৬|| স্নেহং বহুবিধং স্বপ্নে চণ্ডালৈঃ সহ যঃ পিবেত্| বধ্যতে স প্রমেহেণ স্পৃশ্যতেঽন্তায মানবঃ||১৭||

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स्नातानुलिप्तगात्रेऽपि यस्मिन् गृध्नन्ति मक्षिकाः| स प्रमेहेण संस्पर्शं प्राप्य तेनैव हन्यते||१६|| स्नेहं बहुविधं स्वप्ने चण्डालैः सह यः पिबेत्| बध्यते स प्रमेहेण स्पृश्यतेऽन्ताय मानवः||१७||

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Adhikarana 8 (18-23) · Śloka 23

ধ্যানাযাসৌ তথোদ্বেগৌ মোহশ্চাস্থানসম্ভবঃ| অরতির্বলহানিশ্চ মৃত্যুরুন্মাদপূর্বকঃ||১৮|| আহারদ্বেষিণং পশ্যন্ লুপ্তচিত্তমুদর্দিতম্| বিদ্যাদ্ধীরো মুমূর্ষুং তমুন্মাদেনাতিপাতিনা||১৯|| ক্রোধনং ত্রাসবহুলং সকৃত্প্রহসিতাননম্| মূর্চ্ছাপিপাসাবহুলং হন্ত্যুন্মাদঃ শরীরিণম্||২০|| নৃত্যন্ রক্ষোগণৈঃ সাকং যঃ স্বপ্নেঽম্ভসি সীদতি | স প্রাপ্য ভৃশমুন্মাদং যাতি লোকমতঃ পরম্||২১|| অসত্তমঃ পশ্যতি যঃ শৃণোত্যপ্যসতঃ স্বনান্| বহূন্ বহুবিধান্ জাগ্রত্ সোঽপস্মারেণ বধ্যতে||২২|| মত্তং নৃত্যন্তমাবিধ্য প্রেতো হরতি যং নরম্| স্বপ্নে হরতি তং মৃত্যুরপস্মারপুরঃসরঃ||২৩||

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ध्यानायासौ तथोद्वेगौ मोहश्चास्थानसम्भवः| अरतिर्बलहानिश्च मृत्युरुन्मादपूर्वकः||१८|| आहारद्वेषिणं पश्यन् लुप्तचित्तमुदर्दितम्| विद्याद्धीरो मुमूर्षुं तमुन्मादेनातिपातिना||१९|| क्रोधनं त्रासबहुलं सकृत्प्रहसिताननम्| मूर्च्छापिपासाबहुलं हन्त्युन्मादः शरीरिणम्||२०|| नृत्यन् रक्षोगणैः साकं यः स्वप्नेऽम्भसि सीदति | स प्राप्य भृशमुन्मादं याति लोकमतः परम्||२१|| असत्तमः पश्यति यः शृणोत्यप्यसतः स्वनान्| बहून् बहुविधान् जाग्रत् सोऽपस्मारेण बध्यते||२२|| मत्तं नृत्यन्तमाविध्य प्रेतो हरति यं नरम्| स्वप्ने हरति तं मृत्युरपस्मारपुरःसरः||२३||

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Adhikarana 9 (24-25) · Śloka 25

স্তভ্যেতে প্রতিবুদ্ধস্য হনূ মন্যে তথাঽক্ষিণী| যস্য তং বহিরাযামো গৃহীত্বা হন্ত্যসংশযম্||২৪|| শষ্কুলীর্বাঽপ্যপূপান্ বা স্বপ্নে খাদতি যো নরঃ| স চেত্তাদৃক্ ছর্দযতি প্রতিবুদ্ধো ন জীবতি||২৫||

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स्तभ्येते प्रतिबुद्धस्य हनू मन्ये तथाऽक्षिणी| यस्य तं बहिरायामो गृहीत्वा हन्त्यसंशयम्||२४|| शष्कुलीर्वाऽप्यपूपान् वा स्वप्ने खादति यो नरः| स चेत्तादृक् छर्दयति प्रतिबुद्धो न जीवति||२५||

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Adhikarana 10 (26) · Śloka 26

এতানি পূর্বরূপাণি যঃ সম্যগববুধ্যতে| স এষামনুবন্ধং চ ফলং চ জ্ঞাতুমর্হতি||২৬||

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एतानि पूर्वरूपाणि यः सम्यगवबुध्यते| स एषामनुबन्धं च फलं च ज्ञातुमर्हति||२६||

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Adhikarana 11 (27-40) · Śloka 40

ইমাংশ্চাপ্যপরান্ স্বপ্নান্ দারুণানুপলক্ষযেত্| ব্যাধিতানাং বিনাশায ক্লেশায মহতেঽপি বা||২৭|| যস্যোত্তমাঙ্গে জাযন্তে বংশগুল্মলতাদযঃ| বযাংসি চ বিলীযন্তে স্বপ্নে মৌণ্ড্যমিযাচ্চ যঃ||২৮|| গৃধ্রোলূকশ্বকাকাদ্যৈঃ স্বপ্নে যঃ পরিবার্যতে| রক্ষঃপ্রেতপিশাচস্ত্রীচণ্ডালদ্রবিডান্ধ্রকৈঃ ||২৯|| বংশবেত্রলতাপাশতৃণকণ্টকসঙ্কটে| সংসজ্জতি হি যঃ স্বপ্নে যো গচ্ছন্ প্রপতত্যপি||৩০|| ভূমৌ পাংশূপধানাযাং বল্মীকে বাঽথ ভস্মনি| শ্মশানাযতনে শ্বভ্রে স্বপ্নে যঃ প্রপতত্যপি ||৩১|| কলুষেঽম্ভসি পঙ্কে বা কূপে বা তমসাঽঽবৃতে| স্বপ্নে মজ্জতি শীঘ্রেণ স্রোতসা হ্রিযতে চ যঃ||৩২|| স্নেহপানং তথাঽভ্যঙ্গঃ প্রচ্ছর্দনবিরেচনে| হিরণ্যলাভঃ কলহঃ স্বপ্নে বন্ধপরাজযৌ||৩৩|| উপানদ্যুগনাশশ্চ প্রপাতঃ পাদচর্মণোঃ| হর্ষঃ স্বপ্নে প্রকুপিতৈঃ পিতৃভিশ্চাবভর্ত্সনম্||৩৪|| দন্তচন্দ্রার্কনক্ষত্রদেবতাদীপচক্ষুষাম্ | পতনং বা বিনাশো বা স্বপ্নে ভেদো নগস্য বা||৩৫|| রক্তপুষ্পং বনং ভূমিং পাপকর্মালযং চিতাম্| গুহান্ধকারসম্বাধং স্বপ্নে যঃ প্রবিশত্যপি||৩৬|| রক্তমালী হসন্নুচ্চৈর্দিগ্বাসা দক্ষিণাং দিশম্| দারুণামটবীং স্বপ্নে কপিযুক্তেন যাতি বা||৩৭|| কাষাযিণামসৌম্যানাং নগ্নানাং দণ্ডধারিণাম্| কৃষ্ণানাং রক্তনেত্রাণাং স্বপ্নে নেচ্ছন্তি দর্শনম্||৩৮|| কৃষ্ণা পাপা নিরাচারা দীর্ঘকেশনখস্তনী| বিরাগমাল্যবসনা স্বপ্নে কালনিশা মতা||৩৯|| ইত্যেতে দারুণাঃ স্বপ্না রোগী যৈর্যাতি পঞ্চতাম্| অরোগঃ সংশযং গত্বা কশ্চিদেব প্রমুচ্যতে||৪০||

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इमांश्चाप्यपरान् स्वप्नान् दारुणानुपलक्षयेत्| व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा||२७|| यस्योत्तमाङ्गे जायन्ते वंशगुल्मलतादयः| वयांसि च विलीयन्ते स्वप्ने मौण्ड्यमियाच्च यः||२८|| गृध्रोलूकश्वकाकाद्यैः स्वप्ने यः परिवार्यते| रक्षःप्रेतपिशाचस्त्रीचण्डालद्रविडान्ध्रकैः ||२९|| वंशवेत्रलतापाशतृणकण्टकसङ्कटे| संसज्जति हि यः स्वप्ने यो गच्छन् प्रपतत्यपि||३०|| भूमौ पांशूपधानायां वल्मीके वाऽथ भस्मनि| श्मशानायतने श्वभ्रे स्वप्ने यः प्रपतत्यपि ||३१|| कलुषेऽम्भसि पङ्के वा कूपे वा तमसाऽऽवृते| स्वप्ने मज्जति शीघ्रेण स्रोतसा ह्रियते च यः||३२|| स्नेहपानं तथाऽभ्यङ्गः प्रच्छर्दनविरेचने| हिरण्यलाभः कलहः स्वप्ने बन्धपराजयौ||३३|| उपानद्युगनाशश्च प्रपातः पादचर्मणोः| हर्षः स्वप्ने प्रकुपितैः पितृभिश्चावभर्त्सनम्||३४|| दन्तचन्द्रार्कनक्षत्रदेवतादीपचक्षुषाम् | पतनं वा विनाशो वा स्वप्ने भेदो नगस्य वा||३५|| रक्तपुष्पं वनं भूमिं पापकर्मालयं चिताम्| गुहान्धकारसम्बाधं स्वप्ने यः प्रविशत्यपि||३६|| रक्तमाली हसन्नुच्चैर्दिग्वासा दक्षिणां दिशम्| दारुणामटवीं स्वप्ने कपियुक्तेन याति वा||३७|| काषायिणामसौम्यानां नग्नानां दण्डधारिणाम्| कृष्णानां रक्तनेत्राणां स्वप्ने नेच्छन्ति दर्शनम्||३८|| कृष्णा पापा निराचारा दीर्घकेशनखस्तनी| विरागमाल्यवसना स्वप्ने कालनिशा मता||३९|| इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम्| अरोगः संशयं गत्वा कश्चिदेव प्रमुच्यते||४०||

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Adhikarana 12 (41-42) · Śloka 42

মনোবহানাং পূর্ণত্বাদ্দোষৈরতিবলৈস্ত্রিভিঃ| স্রোতসাং দারুণান্ স্বপ্নান্ কালে পশ্যতি দারুণে||৪১|| নাতিপ্রসুপ্তঃ পুরুষঃ সফলানফলাংস্তথা| ইন্দ্রিযেশেন মনসা স্বপ্নান্ পশ্যত্যনেকধা||৪২||

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मनोवहानां पूर्णत्वाद्दोषैरतिबलैस्त्रिभिः| स्रोतसां दारुणान् स्वप्नान् काले पश्यति दारुणे||४१|| नातिप्रसुप्तः पुरुषः सफलानफलांस्तथा| इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा||४२||

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Adhikarana 13 (43) · Śloka 43

দৃষ্টং শ্রুতানুভূতং চ প্রার্থিতং কল্পিতং তথা| ভাবিকং দোষজং চৈব স্বপ্নং সপ্তবিধং বিদুঃ||৪৩||

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दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं तथा| भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविधं विदुः||४३||

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Adhikarana 14 (44-47) · Śloka 47

তত্র পঞ্চবিধং পূর্বমফলং ভিষগাদিশেত্| দিবাস্বপ্নমতিহ্রস্বমতিদীর্ঘং চ বুদ্ধিমান্||৪৪|| দৃষ্টঃ প্রথমরাত্রে যঃ স্বপ্নঃ সোঽল্পফলো ভবেত্| ন স্বপেদ্যং পুনর্দৃষ্ট্বা স সদ্যঃ স্যান্মহাফলঃ||৪৫|| অকল্যাণমপি স্বপ্নং দৃষ্ট্বা তত্রৈব যঃ পুনঃ| পশ্যেত্ সৌম্যং শুভাকারং তস্য বিদ্যাচ্ছুভং ফলম্||৪৬|| তত্র শ্লোকঃ- পূর্বরূপাণ্যথ স্বপ্নান্ য ইমান্ বেত্তি দারুণান্| ন স মোহাদসাধ্যেষু কর্মাণ্যারভতে ভিষক্||৪৭||

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तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत्| दिवास्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं च बुद्धिमान्||४४|| दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफलो भवेत्| न स्वपेद्यं पुनर्दृष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः||४५|| अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः| पश्येत् सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम्||४६|| तत्र श्लोकः- पूर्वरूपाण्यथ स्वप्नान् य इमान् वेत्ति दारुणान्| न स मोहादसाध्येषु कर्माण्यारभते भिषक्||४७||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 5

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানে পূর্বরূপীযমিন্দ্রিযং নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ||৫||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पूर्वरूपीयमिन्द्रियं नाम पञ्चमोऽध्यायः||५||

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5. pūrvarūpīyamindriyam — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi