Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দন্তীদ্রবন্তীকল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो दन्तीद्रवन्तीकल्पं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দন্তীদ্রবন্তীকল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो दन्तीद्रवन्तीकल्पं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
দন্ত্যুদুম্বরপর্ণী স্যান্নিকুম্ভোঽথ মুকূলকঃ| দ্রবন্তী নামতশ্চিত্রা ন্যগ্রোধী মূষিকাহ্বযা||৩|| (তথা মূষিকপর্ণী চাপ্যুপচিত্রা চ শম্বরী| প্রত্যক্শ্রেণী সুতশ্রেণী দন্তী র(চ)ণ্ডা চ কীর্তিতা )|
दन्त्युदुम्बरपर्णी स्यान्निकुम्भोऽथ मुकूलकः| द्रवन्ती नामतश्चित्रा न्यग्रोधी मूषिकाह्वया||३|| (तथा मूषिकपर्णी चाप्युपचित्रा च शम्बरी| प्रत्यक्श्रेणी सुतश्रेणी दन्ती र(च)ण्डा च कीर्तिता )|
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তযোর্মূলানি সঙ্গৃহ্য স্থিরাণি বহলানি চ| হস্তিদন্তপ্রকারাণি শ্যাবতাম্রাণি বুদ্ধিমান্||৪||
तयोर्मूलानि सङ्गृह्य स्थिराणि बहलानि च| हस्तिदन्तप्रकाराणि श्यावताम्राणि बुद्धिमान्||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
পিপ্পলীমধুলিপ্তানি স্বেদযেন্মৃত্কুশান্তরে| শোষযেদাতপেঽগ্ন্যর্কৌ হতো হ্যেষাং বিকাশিতাম্||৫||
पिप्पलीमधुलिप्तानि स्वेदयेन्मृत्कुशान्तरे| शोषयेदातपेऽग्न्यर्कौ हतो ह्येषां विकाशिताम्||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তীক্ষ্ণোষ্ণান্যাশুকারীণি বিকাশীনি গুরূণি চ| বিলাযযন্তি দোষৌ দ্বৌ মারুতং কোপযন্তি চ||৬||
तीक्ष्णोष्णान्याशुकारीणि विकाशीनि गुरूणि च| विलाययन्ति दोषौ द्वौ मारुतं कोपयन्ति च||६||
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Adhikarana 6 (7-14) · Śloka 14
দধিতক্রসুরামণ্ডৈঃ পিণ্ডমক্ষসমং তযোঃ| প্রিযালকোলবদরপীলুশীধুভিরেব চ||৭|| পিবেদ্গুল্মোদরী দোষৈরভিখিন্নশ্চ যো নরঃ| গোমৃগাজরসৈঃ পাণ্ডুঃ কৃমিকোষ্ঠী ভগন্দরী||৮|| তযোঃ কল্কে কষাযে চ দশমূলরসাযুতে| কক্ষ্যালজীবিসর্পেষু দাহে চ বিপচেদ্ঘৃতম্||৯|| তৈলং মেহে চ গুল্মে চ সোদাবর্তে কফানিলে| চতুঃস্নেহং শকৃচ্ছুক্রবাতসঙ্গানিলার্তিষু||১০|| রসে দন্ত্যজশৃঙ্গযোশ্চ গুডক্ষৌদ্রঘৃতান্বিতঃ| লেহঃ সিদ্ধো বিরেকার্থে দাহসন্তাপমেহনুত্ ||১১|| বাততর্ষে জ্বরে পৈত্তে স্যাত্ স এবাজগন্ধযা| দন্তীদ্রবন্ত্যোর্মূলানি পচেদামলকীরসে||১২|| ত্রীংস্তু তস্য কষাযস্য ভাগৌ দ্বৌ ফাণিতস্য চ| তপ্তে সর্পিষি তৈলে বা ভর্জযেত্তত্র চাবপেত্||১৩|| কল্কং দন্তীদ্রবন্ত্যোশ্চ শ্যামাদীনাং চ ভাগশঃ| তত্সিদ্ধং প্রাশযেল্লেহং সুখং তেন বিরিচ্যতে||১৪||
दधितक्रसुरामण्डैः पिण्डमक्षसमं तयोः| प्रियालकोलबदरपीलुशीधुभिरेव च||७|| पिबेद्गुल्मोदरी दोषैरभिखिन्नश्च यो नरः| गोमृगाजरसैः पाण्डुः कृमिकोष्ठी भगन्दरी||८|| तयोः कल्के कषाये च दशमूलरसायुते| कक्ष्यालजीविसर्पेषु दाहे च विपचेद्घृतम्||९|| तैलं मेहे च गुल्मे च सोदावर्ते कफानिले| चतुःस्नेहं शकृच्छुक्रवातसङ्गानिलार्तिषु||१०|| रसे दन्त्यजशृङ्गयोश्च गुडक्षौद्रघृतान्वितः| लेहः सिद्धो विरेकार्थे दाहसन्तापमेहनुत् ||११|| वाततर्षे ज्वरे पैत्ते स्यात् स एवाजगन्धया| दन्तीद्रवन्त्योर्मूलानि पचेदामलकीरसे||१२|| त्रींस्तु तस्य कषायस्य भागौ द्वौ फाणितस्य च| तप्ते सर्पिषि तैले वा भर्जयेत्तत्र चावपेत्||१३|| कल्कं दन्तीद्रवन्त्योश्च श्यामादीनां च भागशः| तत्सिद्धं प्राशयेल्लेहं सुखं तेन विरिच्यते||१४||
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Adhikarana 7 (15-19) · Śloka 19
রসে চ দশমূলস্য তথা বৈভীতকে রসে| হরীতকীরসে চৈব লেহানেবং পচেত্ পৃথক্ ||১৫|| তযোর্বিল্বসমং চূর্ণং তদ্রসেনেব ভাবিতম্| অসৃষ্টে বিশি বাতোত্থে গুল্মে চাম্লযুতং শুভম্||১৬|| পাটযিত্বেক্ষুকাণ্ডং বা কল্কেনালিপ্য চান্তরা| স্বেদযিত্বা ততঃ খাদেত্ সুখং তেন বিরিচ্যতে||১৭|| মূলং দন্তীদ্রবন্ত্যোশ্চ সহ মুদ্গৈর্বিপাচযেত্| লাববর্তীরকাদ্যৈশ্চ তে রসাঃ স্যুর্বিরেচনে||১৮|| তযোর্বাঽপি কষাযেণ যবাগূং জাঙ্গলং রসম্| মাষযূষং চ সংস্কৃত্য দদ্যাত্তৈশ্চ বিরিচ্যতে||১৯||
रसे च दशमूलस्य तथा बैभीतके रसे| हरीतकीरसे चैव लेहानेवं पचेत् पृथक् ||१५|| तयोर्बिल्वसमं चूर्णं तद्रसेनेव भावितम्| असृष्टे विशि वातोत्थे गुल्मे चाम्लयुतं शुभम्||१६|| पाटयित्वेक्षुकाण्डं वा कल्केनालिप्य चान्तरा| स्वेदयित्वा ततः खादेत् सुखं तेन विरिच्यते||१७|| मूलं दन्तीद्रवन्त्योश्च सह मुद्गैर्विपाचयेत्| लाववर्तीरकाद्यैश्च ते रसाः स्युर्विरेचने||१८|| तयोर्वाऽपि कषायेण यवागूं जाङ्गलं रसम्| माषयूषं च संस्कृत्य दद्यात्तैश्च विरिच्यते||१९||
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Adhikarana 8 (20-35) · Śloka 35
তত্কষাযাত্ত্রযো ভাগা দ্বৌ সিতাযাস্তথৈব চ| একো গোধূমচূর্ণানাং কার্যা চোত্কারিকা শুভা||২০|| মোদকো বাঽস্য কল্পেন কার্যস্তচ্চ বিরেচনম্| তযোশ্চাপি কষাযেণ মদ্যান্যস্যোপকল্পযেত্||২১|| দন্তীক্বাথেন চালোড্য দন্তীতৈলেন সাধিতান্| গুডলাবণিকান্ ভক্ষ্যান্ বিবিধান্ ভক্ষযেন্নরঃ||২২|| দন্তীং দ্রবন্তীং মরিচং যবানীমুপকুঞ্চিকাম্| নাগরং হেমদুগ্ধাং চ চিত্রকং চেতি চূর্ণিতম্||২৩|| সপ্তাহং ভাবযেন্মূত্রে গবাং পাণিতলং ততঃ| পিবেত্ঘৃতেন জীর্ণে তু বিরিক্তশ্চাপি তর্পণম্||২৪|| সর্বরোগহরং মুখ্যং সর্বেষ্বৃতুষু যৌগিকম্| চূর্ণং তদনপাযিত্বাদ্বালবৃদ্ধেষু পূজিতম্||২৫|| দুর্ভক্তাজীর্ণপার্শ্বার্তিগুল্মপ্লীহোদরেষু চ| গণ্ডমালাসু বাতে চ পাণ্ডুরোগে চ শস্যতে||২৬|| পলং চিত্রকদন্ত্যোশ্চ হরীতক্যাশ্চ বিংশতিঃ| ত্রিবৃত্পিপ্পলিকর্ষৌ দ্বৌ গুডস্যাষ্টপলেন তত্||২৭|| বিনীয মোদকান্ কুর্যাদ্দশৈকং ভক্ষযেত্ততঃ| উষ্ণাম্বু চ পিবেচ্চানু দশমে দশমেঽহ্নি চ||২৮|| এতে নিষ্পরিহারাঃ স্যুঃ সর্বরোগনিবর্হণাঃ| গ্রহণীপাণ্ডুরোগার্শঃকণ্ডূকোঠানিলাপহাঃ||২৯|| দন্তীদ্বিপলনির্যূহো দ্রাক্ষার্ধপ্রস্থসাধিতঃ | বিরেচনং পিত্তকাসে পাণ্ডুরোগে চ শস্যতে||৩০|| দন্তীকল্কং সমগুডং শীতবারিযুতং পিবেত্| বিরেচনং মুখ্যতমং কামলাহরমুত্তমম্||৩১|| শ্যামাদন্তীরসে গৌডঃ পিপ্পলীফলচিত্রকৈঃ| লিপ্তেঽরিষ্টোঽনিলশ্লেষ্মপ্লীহপাণ্ডূদরাপহঃ||৩২|| তথা দন্তীদ্রবন্ত্যোশ্চ কষাযে সাজগন্ধযোঃ| গৌডঃ কার্যোঽঽজশৃঙ্গ্যা বা স বৈ সুখবিরেচনঃ||৩৩|| তচ্চূর্ণক্বাথমাষাম্বুকিণ্বতোযসমুদ্ভবা| মদিরা কফগুল্মাল্পবহ্নিপার্শ্বকটিগ্রহে||৩৪|| অজগন্ধাকষাযেণ সৌবীরকতুষোদকে| সুরাকম্পিল্লকে যোগৌ লোধ্রবচ্চ তযোঃ স্মৃতৌ||৩৫||
तत्कषायात्त्रयो भागा द्वौ सितायास्तथैव च| एको गोधूमचूर्णानां कार्या चोत्कारिका शुभा||२०|| मोदको वाऽस्य कल्पेन कार्यस्तच्च विरेचनम्| तयोश्चापि कषायेण मद्यान्यस्योपकल्पयेत्||२१|| दन्तीक्वाथेन चालोड्य दन्तीतैलेन साधितान्| गुडलावणिकान् भक्ष्यान् विविधान् भक्षयेन्नरः||२२|| दन्तीं द्रवन्तीं मरिचं यवानीमुपकुञ्चिकाम्| नागरं हेमदुग्धां च चित्रकं चेति चूर्णितम्||२३|| सप्ताहं भावयेन्मूत्रे गवां पाणितलं ततः| पिबेत्घृतेन जीर्णे तु विरिक्तश्चापि तर्पणम्||२४|| सर्वरोगहरं मुख्यं सर्वेष्वृतुषु यौगिकम्| चूर्णं तदनपायित्वाद्बालवृद्धेषु पूजितम्||२५|| दुर्भक्ताजीर्णपार्श्वार्तिगुल्मप्लीहोदरेषु च| गण्डमालासु वाते च पाण्डुरोगे च शस्यते||२६|| पलं चित्रकदन्त्योश्च हरीतक्याश्च विंशतिः| त्रिवृत्पिप्पलिकर्षौ द्वौ गुडस्याष्टपलेन तत्||२७|| विनीय मोदकान् कुर्याद्दशैकं भक्षयेत्ततः| उष्णाम्बु च पिबेच्चानु दशमे दशमेऽह्नि च||२८|| एते निष्परिहाराः स्युः सर्वरोगनिबर्हणाः| ग्रहणीपाण्डुरोगार्शःकण्डूकोठानिलापहाः||२९|| दन्तीद्विपलनिर्यूहो द्राक्षार्धप्रस्थसाधितः | विरेचनं पित्तकासे पाण्डुरोगे च शस्यते||३०|| दन्तीकल्कं समगुडं शीतवारियुतं पिबेत्| विरेचनं मुख्यतमं कामलाहरमुत्तमम्||३१|| श्यामादन्तीरसे गौडः पिप्पलीफलचित्रकैः| लिप्तेऽरिष्टोऽनिलश्लेष्मप्लीहपाण्डूदरापहः||३२|| तथा दन्तीद्रवन्त्योश्च कषाये साजगन्धयोः| गौडः कार्योऽऽजशृङ्ग्या वा स वै सुखविरेचनः||३३|| तच्चूर्णक्वाथमाषाम्बुकिण्वतोयसमुद्भवा| मदिरा कफगुल्माल्पवह्निपार्श्वकटिग्रहे||३४|| अजगन्धाकषायेण सौवीरकतुषोदके| सुराकम्पिल्लके योगौ लोध्रवच्च तयोः स्मृतौ||३५||
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Adhikarana 9 (36-40) · Śloka 40
তত্র শ্লোকাঃ- (দধ্যাদিষু ত্রযঃ পঞ্চ প্রিযালাদ্যৈস্ত্রযো রসে| স্নেহেষু বৈ ত্রযো লেহ্যাঃ ষট্ চূর্ণে ত্বেক এব চ||৩৬|| ইক্ষাবেকস্তথা মুদ্গমাংসানাং চ রসাস্ত্রযঃ| যবাগ্বাদৌ ত্রযশ্চৈব উক্ত উত্কারিকাবিধৌ||৩৭|| একশ্চ মোদকে মদ্যে চৈকস্তত্ক্বাথতৈলকে| চূর্ণমেকং পুনশ্চৈকো মোদকঃ পঞ্চ চাসবে||৩৮|| একঃ সৌবীরকেঽথৈকো যোগঃ স্যাত্তু তুষোদকে| একা সুরৈকঃ কম্পিল্লে তথা পঞ্চ ঘৃতে স্মৃতাঃ )||৩৯|| দন্তীদ্রবন্তীকল্পেঽস্মিন্ প্রোক্তাঃ ষোডশকাস্ত্রযঃ| নানাবিধানাং যোগানাং ভক্তিদোষামযান্প্রতি||৪০||
तत्र श्लोकाः- (दध्यादिषु त्रयः पञ्च प्रियालाद्यैस्त्रयो रसे| स्नेहेषु वै त्रयो लेह्याः षट् चूर्णे त्वेक एव च||३६|| इक्षावेकस्तथा मुद्गमांसानां च रसास्त्रयः| यवाग्वादौ त्रयश्चैव उक्त उत्कारिकाविधौ||३७|| एकश्च मोदके मद्ये चैकस्तत्क्वाथतैलके| चूर्णमेकं पुनश्चैको मोदकः पञ्च चासवे||३८|| एकः सौवीरकेऽथैको योगः स्यात्तु तुषोदके| एका सुरैकः कम्पिल्ले तथा पञ्च घृते स्मृताः )||३९|| दन्तीद्रवन्तीकल्पेऽस्मिन् प्रोक्ताः षोडशकास्त्रयः| नानाविधानां योगानां भक्तिदोषामयान्प्रति||४०||
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Adhikarana 10 (41-42) · Śloka 42
ত্রিশতং পঞ্চপঞ্চাশদ্যোগানাং বমনে স্মৃতম্| দ্বে শতে নবকাঃ পঞ্চ যোগানাং তু বিরেচনে||৪১|| ঊর্ধ্বানুলোমভাগানামিত্যুক্তানি শতানি ষট্| প্রাধান্যতঃ সমাশ্রিত্য দ্রব্যাণি দশ পঞ্চ চ||৪২||
त्रिशतं पञ्चपञ्चाशद्योगानां वमने स्मृतम्| द्वे शते नवकाः पञ्च योगानां तु विरेचने||४१|| ऊर्ध्वानुलोमभागानामित्युक्तानि शतानि षट्| प्राधान्यतः समाश्रित्य द्रव्याणि दश पञ्च च||४२||
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Adhikarana 11 (43-44) · Śloka 44
ভবন্তি চাত্র- যদ্ধি যেন প্রধানেন দ্রব্যং সমুপসৃজ্যতে| তত্সঞ্জ্ঞকঃ স যোগো বৈ ভবতীতি বিনিশ্চযঃ ||৪৩|| ফলাদীনাং প্রধানানাং গুণভূতাঃ সুরাদযঃ| তে হি তান্যনুবর্তন্তে মনুজেন্দ্রমিবেতরে||৪৪||
भवन्ति चात्र- यद्धि येन प्रधानेन द्रव्यं समुपसृज्यते| तत्सञ्ज्ञकः स योगो वै भवतीति विनिश्चयः ||४३|| फलादीनां प्रधानानां गुणभूताः सुरादयः| ते हि तान्यनुवर्तन्ते मनुजेन्द्रमिवेतरे||४४||
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Adhikarana 12 (45) · Śloka 45
বিরুদ্ধবীর্যমপ্যেষাং প্রধানানামবাধকম্| অধিকং তুল্যবীর্যে হি ক্রিযাসামর্থ্যমিষ্যতে ||৪৫||
विरुद्धवीर्यमप्येषां प्रधानानामबाधकम्| अधिकं तुल्यवीर्ये हि क्रियासामर्थ्यमिष्यते ||४५||
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Adhikarana 13 (46) · Śloka 46
ইষ্টবর্ণরসস্পর্শগন্ধার্থং প্রতি চামযম্| অতো বিরুদ্ধবীর্যাণাং প্রযোগ ইতি নিশ্চিতম্||৪৬||
इष्टवर्णरसस्पर्शगन्धार्थं प्रति चामयम्| अतो विरुद्धवीर्याणां प्रयोग इति निश्चितम्||४६||
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Adhikarana 14 (47) · Śloka 48
ভূযশ্চৈষাং বলাধানং কার্যং স্বরসভাবনৈঃ| সুভাবিতং হ্যল্পমপি দ্রব্যং স্যাদ্বহুকর্মকৃত্||৪৭|| স্বরসৈস্তুল্যবীর্যৈর্বা তস্মাদ্দ্রব্যাণি ভাবযেত্|৪৮|
भूयश्चैषां बलाधानं कार्यं स्वरसभावनैः| सुभावितं ह्यल्पमपि द्रव्यं स्याद्बहुकर्मकृत्||४७|| स्वरसैस्तुल्यवीर्यैर्वा तस्माद्द्रव्याणि भावयेत्|४८|
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Adhikarana 15 (48) · Śloka 49
অল্পস্যাপি মহার্থত্বং প্রভূতস্যাল্পকর্মতাম্||৪৮|| কুর্যাত্ সংযোগবিশ্লেষকালসংস্কারযুক্তিভিঃ|৪৯|
अल्पस्यापि महार्थत्वं प्रभूतस्याल्पकर्मताम्||४८|| कुर्यात् संयोगविश्लेषकालसंस्कारयुक्तिभिः|४९|
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Adhikarana 16 (49-50) · Śloka 50
প্রদেশমাত্রমেতাবদ্দ্রষ্টব্যমিহ ষট্শতম্||৪৯|| স্ববুদ্ধ্যৈবং সহস্রাণি কোটীর্বাঽপি প্রকল্পযেত্| বহুদ্রব্যবিকল্পত্বাদ্যোগসঙ্খ্যা ন বিদ্যতে||৫০||
प्रदेशमात्रमेतावद्द्रष्टव्यमिह षट्शतम्||४९|| स्वबुद्ध्यैवं सहस्राणि कोटीर्वाऽपि प्रकल्पयेत्| बहुद्रव्यविकल्पत्वाद्योगसङ्ख्या न विद्यते||५०||
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Adhikarana 17 (51-52) · Śloka 53
তীক্ষ্ণমধ্যমৃদূনাং তু তেষাং শৃণুত লক্ষণম্| সুখং ক্ষিপ্রং মহাবেগমসক্তং যত্ প্রবর্ততে||৫১|| নাতিগ্লানিকরং পাযৌ হৃদযে ন চ রুক্করম্| অন্তরাশযমক্ষিণ্বন্ কৃত্স্নং দোষং নিরস্যতি||৫২|| বিরেচনং নিরূহো বা তত্তীক্ষ্ণমিতি নির্দিশেত্|৫৩|
तीक्ष्णमध्यमृदूनां तु तेषां शृणुत लक्षणम्| सुखं क्षिप्रं महावेगमसक्तं यत् प्रवर्तते||५१|| नातिग्लानिकरं पायौ हृदये न च रुक्करम्| अन्तराशयमक्षिण्वन् कृत्स्नं दोषं निरस्यति||५२|| विरेचनं निरूहो वा तत्तीक्ष्णमिति निर्दिशेत्|५३|
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Adhikarana 18 (53-56) · Śloka 56
জলাগ্নিকীটৈরস্পৃষ্টং দেশকালগুণান্বিতম্||৫৩|| ঈষন্মাত্রাধিকৈর্যুক্তং তুল্যবীর্যৈঃ সুভাবিতম্| স্নেহস্বেদোপপন্নস্য তীক্ষ্ণত্বং যাতি ভেষজম্||৫৪|| কিঞ্চিদেভির্গুণৈর্হীনং পূর্বোক্তৈর্মাত্রযা তথা| স্নিগ্ধস্বিন্নস্য বা সম্যঙ্মধ্যং ভবতি ভেষজম্||৫৫|| মন্দবীর্যং বিরূক্ষস্য হীনমাত্রং তু ভেষজম্| অতুল্যবীর্যৈঃ সংযুক্তং মৃদু স্যান্মন্দবেগবত্||৫৬||
जलाग्निकीटैरस्पृष्टं देशकालगुणान्वितम्||५३|| ईषन्मात्राधिकैर्युक्तं तुल्यवीर्यैः सुभावितम्| स्नेहस्वेदोपपन्नस्य तीक्ष्णत्वं याति भेषजम्||५४|| किञ्चिदेभिर्गुणैर्हीनं पूर्वोक्तैर्मात्रया तथा| स्निग्धस्विन्नस्य वा सम्यङ्मध्यं भवति भेषजम्||५५|| मन्दवीर्यं विरूक्षस्य हीनमात्रं तु भेषजम्| अतुल्यवीर्यैः संयुक्तं मृदु स्यान्मन्दवेगवत्||५६||
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Adhikarana 19 (57) · Śloka 57
অকৃত্স্নদোষহরণাদশুদ্ধী তে বলীযসাম্| মধ্যাবরবলানাং তু প্রযোজ্যে সিদ্ধিমিচ্ছতা||৫৭||
अकृत्स्नदोषहरणादशुद्धी ते बलीयसाम्| मध्यावरबलानां तु प्रयोज्ये सिद्धिमिच्छता||५७||
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Adhikarana 20 (58) · Śloka 58
তীক্ষ্ণো মধ্যো মৃদুর্ব্যাধিঃ সর্বমধ্যাল্পলক্ষণঃ| তীক্ষ্ণাদীনি বলাবেক্ষী ভেষজান্যেষু যোজযেত্||৫৮||
तीक्ष्णो मध्यो मृदुर्व्याधिः सर्वमध्याल्पलक्षणः| तीक्ष्णादीनि बलावेक्षी भेषजान्येषु योजयेत्||५८||
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Adhikarana 21 (59) · Śloka 59
দেযং ত্বনির্হৃতে পূর্বং পীতে পশ্চাত্ পুনঃ পুনঃ| ভেষজং বমনার্থীযং প্রায আপিত্তদর্শনাত্||৫৯||
देयं त्वनिर्हृते पूर्वं पीते पश्चात् पुनः पुनः| भेषजं वमनार्थीयं प्राय आपित्तदर्शनात्||५९||
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Adhikarana 22 (60) · Śloka 60
বলত্রৈবিধ্যমালক্ষ্য দোষাণামাতুরস্য চ| পুনঃ প্রদদ্যাদ্ভৈষজ্যং সর্বশো বা বিবর্জযেত্||৬০||
बलत्रैविध्यमालक्ष्य दोषाणामातुरस्य च| पुनः प्रदद्याद्भैषज्यं सर्वशो वा विवर्जयेत्||६०||
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Adhikarana 23 (61) · Śloka 61
নির্হৃতে বাঽপি জীর্ণে বা দোষনির্হরণে বুধঃ| ভেষজেঽন্যত্প্রযুঞ্জীত প্রার্থযন্সিদ্ধিমুত্তমাম্||৬১||
निर्हृते वाऽपि जीर्णे वा दोषनिर्हरणे बुधः| भेषजेऽन्यत्प्रयुञ्जीत प्रार्थयन्सिद्धिमुत्तमाम्||६१||
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Adhikarana 24 (62) · Śloka 62
অপক্বং বমনং দোষং পচ্যমানং বিরেচনম্| নির্হরেদ্বমনস্যাতঃ পাকং ন প্রতিপালযেত্||৬২||
अपक्वं वमनं दोषं पच्यमानं विरेचनम्| निर्हरेद्वमनस्यातः पाकं न प्रतिपालयेत्||६२||
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Adhikarana 25 (63) · Śloka 63
পীতে প্রস্রংসনে দোষান্ন নির্হত্য জরাং গতে| বমিতে চৌষধে ধীরঃ পাযযেদৌষধং পুনঃ||৬৩||
पीते प्रस्रंसने दोषान्न निर्हत्य जरां गते| वमिते चौषधे धीरः पाययेदौषधं पुनः||६३||
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Adhikarana 26 (64-65) · Śloka 65
দীপ্তাগ্নিং বহুদোষং তু দৃঢস্নেহগুণং নরম্| দুঃশুদ্ধং তদহর্ভুক্তং শ্বোভূতে পাযযেত্ পুনঃ||৬৪|| দুর্বলো বহুদোষশ্চ দোষপাকেন যো নরঃ| বিরিচ্যতে শনৈর্ভোজ্যৈর্ভূযস্তমনুসারযেত্ ||৬৫||
दीप्ताग्निं बहुदोषं तु दृढस्नेहगुणं नरम्| दुःशुद्धं तदहर्भुक्तं श्वोभूते पाययेत् पुनः||६४|| दुर्बलो बहुदोषश्च दोषपाकेन यो नरः| विरिच्यते शनैर्भोज्यैर्भूयस्तमनुसारयेत् ||६५||
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Adhikarana 27 (66) · Śloka 66
বমনৈশ্চ বিরেকৈশ্চ বিশুদ্ধস্যাপ্রমাণতঃ | ভোজনান্তরপানাভ্যাং দোষশেষং শমং নযেত্||৬৬||
वमनैश्च विरेकैश्च विशुद्धस्याप्रमाणतः | भोजनान्तरपानाभ्यां दोषशेषं शमं नयेत्||६६||
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Adhikarana 28 (67) · Śloka 67
দুর্বলং শোধিতং পূর্বমল্পদোষং চ মানবম্| অপরিজ্ঞাতকোষ্ঠং চ পাযযেতৌষধং মৃদু||৬৭||
दुर्बलं शोधितं पूर्वमल्पदोषं च मानवम्| अपरिज्ञातकोष्ठं च पाययेतौषधं मृदु||६७||
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Adhikarana 29 (68) · Śloka 68
শ্রেযো মৃদ্বসকৃত্পীতমল্পবাধং নিরত্যযম্| ন চাতিতীক্ষ্ণং যত্ ক্ষিপ্রং জনযেত্প্রাণসংশযম্||৬৮||
श्रेयो मृद्वसकृत्पीतमल्पबाधं निरत्ययम्| न चातितीक्ष्णं यत् क्षिप्रं जनयेत्प्राणसंशयम्||६८||
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Adhikarana 30 (69) · Śloka 69
দুর্বলোঽপি মহাদোষো বিরেচ্যো বহুশোঽল্পশঃ| মৃদুভির্ভেষজৈর্দোষা হন্যুর্হ্যেনমনির্হৃতাঃ||৬৯||
दुर्बलोऽपि महादोषो विरेच्यो बहुशोऽल्पशः| मृदुभिर्भेषजैर्दोषा हन्युर्ह्येनमनिर्हृताः||६९||
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Adhikarana 31 (70-72) · Śloka 72
যস্যোর্ধ্বং কফসংসৃষ্টং পীতং যাত্যানুলোমিকম্| বমিতং কবলৈঃ শুদ্ধং লঙ্ঘিতং পাযযেত্তু তম্||৭০|| বিবদ্ধেঽল্পে চিরাদ্দোষে স্রবত্যুষ্ণং পিবেজ্জলম্| তেনাধ্মানং তৃষা চ্ছর্দির্বিবন্ধশ্চৈব শাম্যতি||৭১|| ভেষজং দোষরুদ্ধং চেন্নোর্ধ্বং নাধঃ প্রবর্ততে| সোদ্গারং সাঙ্গশূলং চ স্বেদং তত্রাবচারযেত্||৭২||
यस्योर्ध्वं कफसंसृष्टं पीतं यात्यानुलोमिकम्| वमितं कवलैः शुद्धं लङ्घितं पाययेत्तु तम्||७०|| विबद्धेऽल्पे चिराद्दोषे स्रवत्युष्णं पिबेज्जलम्| तेनाध्मानं तृषा च्छर्दिर्विबन्धश्चैव शाम्यति||७१|| भेषजं दोषरुद्धं चेन्नोर्ध्वं नाधः प्रवर्तते| सोद्गारं साङ्गशूलं च स्वेदं तत्रावचारयेत्||७२||
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Adhikarana 32 (73) · Śloka 73
সুবিরিক্তে তু সোদ্গারমাশ্বেবৌষধমুল্লিখেত্| অতিপ্রবর্তনং জীর্ণে সুশীতৈঃ স্তম্ভযেদ্ভিষক্||৭৩||
सुविरिक्ते तु सोद्गारमाश्वेवौषधमुल्लिखेत्| अतिप्रवर्तनं जीर्णे सुशीतैः स्तम्भयेद्भिषक्||७३||
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Adhikarana 33 (74) · Śloka 74
কদাচিচ্ছ্লেষ্মণা রুদ্ধং তিষ্ঠত্যুরসি ভেষজম্| ক্ষীণে শ্লেষ্মণি সাযাহ্নে রাত্রৌ বা তত্প্রবর্ততে||৭৪||
कदाचिच्छ्लेष्मणा रुद्धं तिष्ठत्युरसि भेषजम्| क्षीणे श्लेष्मणि सायाह्ने रात्रौ वा तत्प्रवर्तते||७४||
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Adhikarana 34 (75) · Śloka 75
রূক্ষানাহারযোর্জীর্ণে বিষ্টভ্যোর্ধ্বং গতেঽপি বা| বাযুনা ভেষজে ত্বন্যত্ সস্নেহলবণং পিবেত্||৭৫||
रूक्षानाहारयोर्जीर्णे विष्टभ्योर्ध्वं गतेऽपि वा| वायुना भेषजे त्वन्यत् सस्नेहलवणं पिबेत्||७५||
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Adhikarana 35 (76) · Śloka 76
তৃণ্মোহভ্রমমূর্চ্ছাযাঃ স্যুশ্চেজ্জীর্যতি ভেষজে| পিত্তঘ্নং স্বাদু শীতং চ ভেষজং তত্র শস্যতে||৭৬||
तृण्मोहभ्रममूर्च्छायाः स्युश्चेज्जीर्यति भेषजे| पित्तघ्नं स्वादु शीतं च भेषजं तत्र शस्यते||७६||
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Adhikarana 36 (77) · Śloka 77
লালাহৃল্লাসবিষ্টম্ভলোমহর্ষাঃ কফাবৃতে| ভেষজং তত্র তীক্ষ্ণোষ্ণং কট্বাদি কফনুদ্ধিতম্||৭৭||
लालाहृल्लासविष्टम्भलोमहर्षाः कफावृते| भेषजं तत्र तीक्ष्णोष्णं कट्वादि कफनुद्धितम्||७७||
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Adhikarana 37 (78) · Śloka 78
সুস্নিগ্ধং ক্রূরকোষ্ঠং চ লঙ্ঘযেদবিরেচিতম্| তেনাস্য স্নেহজঃ শ্লেষ্মা সঙ্গশ্চৈবোপশাম্যতি||৭৮||
सुस्निग्धं क्रूरकोष्ठं च लङ्घयेदविरेचितम्| तेनास्य स्नेहजः श्लेष्मा सङ्गश्चैवोपशाम्यति||७८||
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Adhikarana 38 (79-80) · Śloka 80
রূক্ষ-বহ্বনিল-ক্রূরকোষ্ঠ-ব্যাযামশালিনাম্ | দীপ্তাগ্নীনাং চ ভৈষজ্যমবিরিচ্যৈব জীর্যতি||৭৯|| তেভ্যো বস্তিং পুরা দত্ত্বা পশ্চাদ্দদ্যাদ্বিরেচনম্| বস্তিপ্রবর্তিতং দোষং হরেচ্ছীঘ্রং বিরেচনম্||৮০||
रूक्ष-बह्वनिल-क्रूरकोष्ठ-व्यायामशालिनाम् | दीप्ताग्नीनां च भैषज्यमविरिच्यैव जीर्यति||७९|| तेभ्यो बस्तिं पुरा दत्त्वा पश्चाद्दद्याद्विरेचनम्| बस्तिप्रवर्तितं दोषं हरेच्छीघ्रं विरेचनम्||८०||
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Adhikarana 39 (81-82) · Śloka 82
রূক্ষাশনাঃ কর্মনিত্যা যে নরা দীপ্তপাবকাঃ| তেষাং দোষাঃ ক্ষযং যান্তি কর্মবাতাতপাগ্নিভিঃ ||৮১|| বিরুদ্ধাধ্যশনাজীর্ণদোষানপি সহন্তি তে| স্নেহ্যাস্তে মারুতাদ্রক্ষ্যা নাব্যাধৌ তান্ বিশোধযেত্ ||৮২||
रूक्षाशनाः कर्मनित्या ये नरा दीप्तपावकाः| तेषां दोषाः क्षयं यान्ति कर्मवातातपाग्निभिः ||८१|| विरुद्धाध्यशनाजीर्णदोषानपि सहन्ति ते| स्नेह्यास्ते मारुताद्रक्ष्या नाव्याधौ तान् विशोधयेत् ||८२||
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Adhikarana 40 (83-85) · Śloka 85
নাতিস্নিগ্ধশরীরায দদ্যাত্ স্নেহবিরেচনম্| স্নেহোত্ক্লিষ্টশরীরায রূক্ষং দদ্যাদ্বিরেচনম্||৮৩|| এবং জ্ঞাত্বা বিধিং ধীরো দেশকালপ্রমাণবিত্| বিরেচনং বিরেচ্যেভ্যঃ প্রযচ্ছন্নাপরাধ্যতি||৮৪|| বিভ্রংশো বিষবদ্যস্য সম্যগ্যোগো যথাঽমৃতম্| কালেষ্ববশ্যং পেযং চ তস্মাদ্যত্নাত্ প্রযোজযেত্||৮৫||
नातिस्निग्धशरीराय दद्यात् स्नेहविरेचनम्| स्नेहोत्क्लिष्टशरीराय रूक्षं दद्याद्विरेचनम्||८३|| एवं ज्ञात्वा विधिं धीरो देशकालप्रमाणवित्| विरेचनं विरेच्येभ्यः प्रयच्छन्नापराध्यति||८४|| विभ्रंशो विषवद्यस्य सम्यग्योगो यथाऽमृतम्| कालेष्ववश्यं पेयं च तस्माद्यत्नात् प्रयोजयेत्||८५||
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Adhikarana 41 (86) · Śloka 86
দ্রব্যপ্রমাণং তু যদুক্তমস্মিন্মধ্যেষু তত্ কোষ্ঠবযোবলেষু| তন্মূলমালম্ব্য ভবেদ্বিকল্প্যং তেষাং বিকল্প্যোঽভ্যধিকোনভাবঃ||৮৬||
द्रव्यप्रमाणं तु यदुक्तमस्मिन्मध्येषु तत् कोष्ठवयोबलेषु| तन्मूलमालम्ब्य भवेद्विकल्प्यं तेषां विकल्प्योऽभ्यधिकोनभावः||८६||
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Adhikarana 42 (87-97) · Śloka 98
ষড্ ধ্বংশ্যস্তু মরীচিঃ স্যাত্ ষণ্মরীচ্যস্তু সর্ষপঃ| অষ্টৌ তে সর্ষপা রক্তাস্তণ্ডুলশ্চাপি তদ্দ্বযম্||৮৭|| ধান্যমাষো ভবেদেকো ধান্যমাষদ্বযং যবঃ| অণ্ডিকা তে তু চত্বারস্তাশ্চতস্রস্তু মাষকঃ||৮৮|| হেমশ্চ ধান্যকশ্চোক্তো ভবেচ্ছাণস্তু তে ত্রযঃ| শাণৌ দ্বৌ দ্রঙ্ক্ষণং বিদ্যাত্ কোলং বদরমেব চ||৮৯|| বিদ্যাদ্দ্বৌ দ্রঙ্ক্ষণৌ কর্ষং সুবর্ণং চাক্ষমেব চ| বিডালপদকং চৈব পিচুং পাণিতলং তথা||৯০|| তিন্দুকং চ বিজানীযাত্ কবলগ্রহমেব চ| দ্বে সুবর্ণে পলার্ধং স্যাচ্ছুক্তিরষ্টমিকা তথা||৯১|| দ্বে পলার্ধে পলং মুষ্টিঃ প্রকুঞ্চোঽথ চতুর্থিকা| বিল্বং ষোডশিকা চাম্রং দ্বে পলে প্রসৃতং বিদুঃ||৯২|| অষ্টমানং তু বিজ্ঞেযং কুডবৌ দ্বৌ তু মানিকা| পলং চতুর্গুণং বিদ্যাদঞ্জলিং কুডবং তথা||৯৩|| চত্বারঃ কুডবাঃ প্রস্থশ্চতুঃপ্রস্থমথাঢকম্| পাত্রং তদেব বিজ্ঞেযং কংসঃ প্রস্থাষ্টকং তথা||৯৪|| কংসশ্চতুর্গুণো দ্রোণশ্চার্মণং নল্বণং চ তত্| স এব কলশঃ খ্যাতো ঘটমুন্মানমেব চ||৯৫|| দ্রোণস্তু দ্বিগুণঃ শূর্পো বিজ্ঞেযঃ কুম্ভ এব চ| গোণীং শূর্পদ্বযং বিদ্যাত্ খারীং ভারং তথৈব চ||৯৬|| দ্বাত্রিংশতং বিজানীযাদ্বাহং শূর্পাণি বুদ্ধিমান্| তুলাং শতপলং বিদ্যাত্ পরিমাণবিশারদঃ||৯৭|| শুষ্কদ্রব্যেষ্বিদং মানমেবমাদি প্রকীর্তিতম্|৯৮|
षड् ध्वंश्यस्तु मरीचिः स्यात् षण्मरीच्यस्तु सर्षपः| अष्टौ ते सर्षपा रक्तास्तण्डुलश्चापि तद्द्वयम्||८७|| धान्यमाषो भवेदेको धान्यमाषद्वयं यवः| अण्डिका ते तु चत्वारस्ताश्चतस्रस्तु माषकः||८८|| हेमश्च धान्यकश्चोक्तो भवेच्छाणस्तु ते त्रयः| शाणौ द्वौ द्रङ्क्षणं विद्यात् कोलं बदरमेव च||८९|| विद्याद्द्वौ द्रङ्क्षणौ कर्षं सुवर्णं चाक्षमेव च| बिडालपदकं चैव पिचुं पाणितलं तथा||९०|| तिन्दुकं च विजानीयात् कवलग्रहमेव च| द्वे सुवर्णे पलार्धं स्याच्छुक्तिरष्टमिका तथा||९१|| द्वे पलार्धे पलं मुष्टिः प्रकुञ्चोऽथ चतुर्थिका| बिल्वं षोडशिका चाम्रं द्वे पले प्रसृतं विदुः||९२|| अष्टमानं तु विज्ञेयं कुडवौ द्वौ तु मानिका| पलं चतुर्गुणं विद्यादञ्जलिं कुडवं तथा||९३|| चत्वारः कुडवाः प्रस्थश्चतुःप्रस्थमथाढकम्| पात्रं तदेव विज्ञेयं कंसः प्रस्थाष्टकं तथा||९४|| कंसश्चतुर्गुणो द्रोणश्चार्मणं नल्वणं च तत्| स एव कलशः ख्यातो घटमुन्मानमेव च||९५|| द्रोणस्तु द्विगुणः शूर्पो विज्ञेयः कुम्भ एव च| गोणीं शूर्पद्वयं विद्यात् खारीं भारं तथैव च||९६|| द्वात्रिंशतं विजानीयाद्वाहं शूर्पाणि बुद्धिमान्| तुलां शतपलं विद्यात् परिमाणविशारदः||९७|| शुष्कद्रव्येष्विदं मानमेवमादि प्रकीर्तितम्|९८|
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Adhikarana 43 (98-99) · Śloka 99
দ্বিগুণং তদ্দ্রবেষ্বিষ্টং তথা সদ্যোদ্ধৃতেষু চ||৯৮|| যদ্ধি মানং তুলা প্রোক্তা পলং বা তত্ প্রযোজযেত্| অনুক্তে পরিমাণে তু তুল্যং মানং প্রকীর্তিতম্||৯৯||
द्विगुणं तद्द्रवेष्विष्टं तथा सद्योद्धृतेषु च||९८|| यद्धि मानं तुला प्रोक्ता पलं वा तत् प्रयोजयेत्| अनुक्ते परिमाणे तु तुल्यं मानं प्रकीर्तितम्||९९||
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Adhikarana 44 (100) · Śloka 100
দ্রবকার্যেঽপি চানুক্তে সর্বত্র সলিলং স্মৃতম্| যতশ্চ পাদনির্দেশশ্চতুর্ভাগস্ততশ্চ সঃ||১০০||
द्रवकार्येऽपि चानुक्ते सर्वत्र सलिलं स्मृतम्| यतश्च पादनिर्देशश्चतुर्भागस्ततश्च सः||१००||
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Adhikarana 45 (101) · Śloka 101
জলস্নেহৌষধানাং তু প্রমাণং যত্র নেরিতম্ | তত্র স্যাদৌষধাত্ স্নেহঃ স্নেহাত্তোযং চতুর্গুণম্||১০১||
जलस्नेहौषधानां तु प्रमाणं यत्र नेरितम् | तत्र स्यादौषधात् स्नेहः स्नेहात्तोयं चतुर्गुणम्||१०१||
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Adhikarana 46 (102-103) · Śloka 103
স্নেহপাকস্ত্রিধা জ্ঞেযো মৃদুর্মধ্যঃ খরস্তথা| তুল্যে কল্কেন নির্যাসে ভেষজানাং মৃদুঃ স্মৃতঃ||১০২|| সংযাব ইব নির্যাসে মধ্যো দর্বীং বিমুঞ্চতি| শীর্যমাণে তু নির্যাসে বর্তমানে খরস্তথা||১০৩||
स्नेहपाकस्त्रिधा ज्ञेयो मृदुर्मध्यः खरस्तथा| तुल्ये कल्केन निर्यासे भेषजानां मृदुः स्मृतः||१०२|| संयाव इव निर्यासे मध्यो दर्वीं विमुञ्चति| शीर्यमाणे तु निर्यासे वर्तमाने खरस्तथा||१०३||
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Adhikarana 47 (104) · Śloka 104
খরোঽভ্যঙ্গে স্মৃতঃ পাকো, মৃদুর্নস্তঃক্রিযাসু চ| মধ্যপাকং তু পানার্থে বস্তৌ চ বিনিযোজযেত্||১০৪||
खरोऽभ्यङ्गे स्मृतः पाको, मृदुर्नस्तःक्रियासु च| मध्यपाकं तु पानार्थे बस्तौ च विनियोजयेत्||१०४||
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Adhikarana 48 (105) · Śloka 105
মানং চ দ্বিবিধং প্রাহুঃ কালিঙ্গং মাগধং তথা| কালিঙ্গান্মাগধং শ্রেষ্ঠমেবং মানবিদো বিদুঃ||১০৫||
मानं च द्विविधं प्राहुः कालिङ्गं मागधं तथा| कालिङ्गान्मागधं श्रेष्ठमेवं मानविदो विदुः||१०५||
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Adhikarana 49 (106-107) · Śloka 107
তত্র শ্লোকৌ- কল্পার্থঃ শোধনং সঞ্জ্ঞা পৃথগ্ঘেতুঃ প্রবর্তনে| দেশাদীনাং ফলাদীনাং গুণা যোগশতানি ষট্||১০৬|| বিকল্পহেতুর্নামানি তীক্ষ্ণমধ্যাল্পলক্ষণম্| বিধিশ্চাবস্থিকো মানং স্নেহপাকশ্চ দর্শিতঃ||১০৭||
तत्र श्लोकौ- कल्पार्थः शोधनं सञ्ज्ञा पृथग्घेतुः प्रवर्तने| देशादीनां फलादीनां गुणा योगशतानि षट्||१०६|| विकल्पहेतुर्नामानि तीक्ष्णमध्याल्पलक्षणम्| विधिश्चावस्थिको मानं स्नेहपाकश्च दर्शितः||१०७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 12
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে কল্পস্থানে দন্তীদ্রবন্তীকল্পো নাম দ্বাদশোঽধ্যাযঃ||১২|| ইতি চরকসংহিতাযাং সপ্তমং কল্পস্থানং সম্পূর্ণম্|
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते कल्पस्थाने दन्तीद्रवन्तीकल्पो नाम द्वादशोऽध्यायः||१२|| इति चरकसंहितायां सप्तमं कल्पस्थानं सम्पूर्णम्|
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