Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো জাতিসূত্রীযং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
View original
अथातो जातिसूत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো জাতিসূত্রীযং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो जातिसूत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
স্ত্রীপুংসযোরব্যাপন্নশুক্রশোণিতগর্ভাশযযোঃ শ্রেযসীং প্রজামিচ্ছতোস্তদর্থাভিনির্বৃত্তিকরং কর্মোপদেক্ষ্যামঃ||৩||
स्त्रीपुंसयोरव्यापन्नशुक्रशोणितगर्भाशययोः श्रेयसीं प्रजामिच्छतोस्तदर्थाभिनिर्वृत्तिकरं कर्मोपदेक्ष्यामः||३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
অথাপ্যেতৌ স্ত্রীপুংসৌ স্নেহস্বেদাভ্যামুপপাদ্য, বমনবিরেচনাভ্যাং সংশোধ্য, ক্রমেণ প্রকৃতিমাপাদযেত্| সংশুদ্ধৌ চাস্থাপনানুবাসনাভ্যামুপাচরেত্; উপাচরেচ্চ মধুরৌষধসংস্কৃতাভ্যাং ঘৃতক্ষীরাভ্যাং পুরুষং, স্ত্রিযং তু তৈলমাষাভ্যাম্||৪||
अथाप्येतौ स्त्रीपुंसौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य, वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य, क्रमेण प्रकृतिमापादयेत्| संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुपाचरेत्; उपाचरेच्च मधुरौषधसंस्कृताभ्यां घृतक्षीराभ्यां पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमाषाभ्याम्||४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 4 (5-8) · Śloka 8
ততঃ পুষ্পাত্ প্রভৃতি ত্রিরাত্রমাসীত ব্রহ্মচারিণ্যধঃশাযিনী, পাণিভ্যামন্নমজর্জরপাত্রাদ্ভুঞ্জানা , ন চ কাঞ্চিন্মৃজামাপদ্যেত| ততশ্চতুর্থেঽহন্যেনামুত্সাদ্য সশিরস্কং স্নাপযিত্বা শুক্লানি বাসাংস্যাচ্ছাদযেত্ পুরুষং চ| ততঃ শুক্লবাসসৌ স্রগ্বিণৌ সুমনসাবন্যোন্যমভিকামৌ সংবসেযাতাং স্নানাত্ প্রভৃতি যুগ্মেষ্বহঃসু পুত্রকামৌ, অযুগ্মেষু দুহিতৃকামৌ||৫|| ন চ ন্যুব্জাং পার্শ্বগতাং বা সংসেবেত| ন্যুব্জাযা বাতো বলবান্ স যোনিং পীডযতি, পার্শ্বগতাযা দক্ষিণে পার্শ্বে শ্লেষ্মা স চ্যুতঃ পিদধাতি গর্ভাশযং, বামে পার্শ্বে পিত্তং তদস্যাঃ পীডিতং বিদহতি রক্তং শুক্রং চ, তস্মাদুত্তানা বীজং গৃহ্ণীযাত্; তথাহি যথাস্থানমবতিষ্ঠন্তে দোষাঃ| পর্যাপ্তে চৈনাং শীতোদকেন পরিষিঞ্চেত্| তত্রাত্যশিতা ক্ষুধিতা পিপাসিতা ভীতা বিমনাঃ শোকার্তা ক্রুদ্ধাঽন্যং চ পুমাংসমিচ্ছন্তী মৈথুনে চাতিকামা বা ন গর্ভং ধত্তে, বিগুণাং বা প্রজাং জনযতি| অতিবালামতিবৃদ্ধাং দীর্ঘরোগিণীমন্যেন বা বিকারেণোপসৃষ্টাং বর্জযেত্| পুরুষেঽপ্যেত এব দোষাঃ| অতঃ সর্বদোষবর্জিতৌ স্ত্রীপুরুষৌ সংসৃজ্যেযাতাম্||৬|| সঞ্জাতহর্ষৌ মৈথুনে চানুকূলাবিষ্টগন্ধং স্বাস্তীর্ণং সুখং শযনমুপকল্প্য মনোজ্ঞং হিতমশনমশিত্বা নাত্যশিতৌ দক্ষিণপাদেন পুমানারোহেত্ বামপাদেন স্ত্রী||৭|| তত্র মন্ত্রং প্রযুঞ্জীত- “অহিরসি আযুরসি সর্বতঃ প্রতিষ্ঠাঽসি ধাতা ত্বা দদতু বিধাতা ত্বা দধাতু ব্রহ্মবর্চসা ভব” ইতি| “ব্রহ্মা বৃহস্পতির্বিষ্ণুঃসোমঃসূর্যস্তথাঽশ্বিনৌ| ভগোঽথ মিত্রাবরুণৌ বীরং দদতু মে সুতম্” ইত্যুক্ত্বা সংবসেযাতাম্||৮||
ततः पुष्पात् प्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी, पाणिभ्यामन्नमजर्जरपात्राद्भुञ्जाना , न च काञ्चिन्मृजामापद्येत| ततश्चतुर्थेऽहन्येनामुत्साद्य सशिरस्कं स्नापयित्वा शुक्लानि वासांस्याच्छादयेत् पुरुषं च| ततः शुक्लवाससौ स्रग्विणौ सुमनसावन्योन्यमभिकामौ संवसेयातां स्नानात् प्रभृति युग्मेष्वहःसु पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृकामौ||५|| न च न्युब्जां पार्श्वगतां वा संसेवेत| न्युब्जाया वातो बलवान् स योनिं पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा स च्युतः पिदधाति गर्भाशयं, वामे पार्श्वे पित्तं तदस्याः पीडितं विदहति रक्तं शुक्रं च, तस्मादुत्ताना बीजं गृह्णीयात्; तथाहि यथास्थानमवतिष्ठन्ते दोषाः| पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत्| तत्रात्यशिता क्षुधिता पिपासिता भीता विमनाः शोकार्ता क्रुद्धाऽन्यं च पुमांसमिच्छन्ती मैथुने चातिकामा वा न गर्भं धत्ते, विगुणां वा प्रजां जनयति| अतिबालामतिवृद्धां दीर्घरोगिणीमन्येन वा विकारेणोपसृष्टां वर्जयेत्| पुरुषेऽप्येत एव दोषाः| अतः सर्वदोषवर्जितौ स्त्रीपुरुषौ संसृज्येयाताम्||६|| सञ्जातहर्षौ मैथुने चानुकूलाविष्टगन्धं स्वास्तीर्णं सुखं शयनमुपकल्प्य मनोज्ञं हितमशनमशित्वा नात्यशितौ दक्षिणपादेन पुमानारोहेत् वामपादेन स्त्री||७|| तत्र मन्त्रं प्रयुञ्जीत- “अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि धाता त्वा ददतु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मवर्चसा भव” इति| “ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुःसोमःसूर्यस्तथाऽश्विनौ| भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम्” इत्युक्त्वा संवसेयाताम्||८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 5 (9) · Śloka 9
সা চেদেবমাশাসীত- বৃহন্তমবদাতং হর্যক্ষমোজস্বিনং শুচিং সত্ত্বসম্পন্নং পুত্রমিচ্ছেযমিতি, শুদ্ধস্নানাত্ প্রভৃত্যস্যৈ মন্থমবদাতযবানাং মধুসর্পির্ভ্যাং সংসৃজ্য শ্বেতাযা গোঃ সরূপবত্সাযাঃ পযসাঽঽলোড্য রাজতে কাংস্যে বা পাত্রে কালে কালে সপ্তাহং সততং প্রযচ্ছেত্ পানায| প্রাতশ্চ শালিযবান্নবিকারান্ দধিমধুসর্পির্ভিঃ পযোভির্বা সংসৃজ্য ভুঞ্জীত, তথা সাযমবদাতশরণশযনাসনপানবসনভূষণা চ স্যাত্| সাযং প্রাতশ্চ শশ্বচ্ছ্বেতং মহান্তং বৃষভমাজানেযং বা হরিচন্দনাঙ্গদং পশ্যেত্| সৌম্যাভিশ্চৈনাং কথাভির্মনোনুকূলাভিরুপাসীত| সৌম্যাকৃতিবচনোপচারচেষ্টাংশ্চ স্ত্রীপুরুষানিতরানপি চেন্দ্রিযার্থানবদাতান্ পশ্যেত্| সহচর্যশ্চৈনাং প্রিযহিতাভ্যাং সততমুপচরেযুস্তথা ভর্তা| ন চ মিশ্রীভাবমাপদ্যেযাতামিতি| অনেন বিধিনা সপ্তরাত্রং স্থিত্বাঽষ্টমেঽহন্যাপ্লুত্যাদ্ভিঃ সশিরস্কং সহ ভর্ত্রা অহতানি বস্ত্রাণ্যাচ্ছাদযেদবদাতানি, অবদাতাশ্চ স্রজো ভূষণানি চ বিভৃযাত্||৯||
सा चेदेवमाशासीत- बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विनं शुचिं सत्त्वसम्पन्नं पुत्रमिच्छेयमिति, शुद्धस्नानात् प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिर्भ्यां संसृज्य श्वेताया गोः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा पात्रे काले काले सप्ताहं सततं प्रयच्छेत् पानाय| प्रातश्च शालियवान्नविकारान् दधिमधुसर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमवदातशरणशयनासनपानवसनभूषणा च स्यात्| सायं प्रातश्च शश्वच्छ्वेतं महान्तं वृषभमाजानेयं वा हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्| सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोनुकूलाभिरुपासीत| सौम्याकृतिवचनोपचारचेष्टांश्च स्त्रीपुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्| सहचर्यश्चैनां प्रियहिताभ्यां सततमुपचरेयुस्तथा भर्ता| न च मिश्रीभावमापद्येयातामिति| अनेन विधिना सप्तरात्रं स्थित्वाऽष्टमेऽहन्याप्लुत्याद्भिः सशिरस्कं सह भर्त्रा अहतानि वस्त्राण्याच्छादयेदवदातानि, अवदाताश्च स्रजो भूषणानि च बिभृयात्||९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 6 (10-14) · Śloka 14
তত ঋত্বিক্ প্রাগুত্তরস্যাং দিশ্যগারস্য প্রাগ্প্রবণমুদক্প্রবণং বা প্রদেশমভিসমীক্ষ্য, গোমযোদকাভ্যাং স্থণ্ডিলমুপলিপ্য, প্রোক্ষ্য চোদকেন, বেদীমস্মিন্ স্থাপযেত্| তাং পশ্চিমেনাহতবস্ত্রসঞ্চযে শ্বেতার্ষভে বাঽপ্যজিন উপবিশেদ্ ব্রাহ্মণপ্রযুক্তঃ, রাজন্যপ্রযুক্তস্তু বৈযাঘ্রে চর্মণ্যানডুহে বা, বৈশ্যপ্রযুক্তস্তু রৌরবে বাস্তে বা| তত্রোপবিষ্টঃ পালাশীভিরৈঙ্গুদীভিরৌদুম্বরীভির্মাধূকীভির্বা সমিদ্ভিরগ্নিমুপসমাধায, কুশৈঃ পরিস্তীর্য, পরিধিভিশ্চ পরিধায, লাজৈঃ শুক্লাভিশ্চ গন্ধবতীভিঃ সুমনোভিরুপকিরেত্| তত্র প্রণীযোদপাত্রং পবিত্রপূতমুপসংস্কৃত্য সর্পিরাজ্যার্থং যথোক্তবর্ণানাজানেযাদীন্ সমন্ততঃ স্থাপযেত্||১০|| ততঃ পুত্রকামা পশ্চিমতোঽগ্নিং দক্ষিণতো ব্রাহ্মণমুপবিশ্যান্বালভেত সহ ভর্ত্রা যথেষ্টং পুত্রমাশাসানা| ততস্তস্যা আশাসানাযা ঋত্বিক্ প্রজাপতিমভিনির্দিশ্য যোনৌ তস্যাঃ কামপরিপূরণার্থং কাম্যামিষ্টিং নির্বর্তযেদ্ ‘বিষ্ণুর্যোনিং কল্পযতু’ ইত্যনযর্চা| ততশ্চৈবাজ্যেন স্থালীপাকমভিঘার্য ত্রির্জুহুযাদ্যথাম্নাযম্| মন্ত্রোপমন্ত্রিতমুদপাত্রং তস্যৈ দদ্যাত্ সর্বোদকার্থান্ কুরুষ্বেতি| ততঃ সমাপ্তে কর্মণি পূর্বং দক্ষিণপাদমভিহরন্তী প্রদক্ষিণমগ্নিমনুপরিক্রামেত্ সহ ভর্ত্রা| ততো ব্রাহ্মণান্ স্বস্তি বাচযিত্বাঽঽজ্যশেষং প্রাশ্নীযাত্ পূর্বং পুমান্, পশ্চাত্ স্ত্রী; ন চোচ্ছিষ্টমবশেষযেত্| ততস্তৌ সহ সংবসেযাতামষ্টরাত্রং, তথাবিধপরিচ্ছদাবেব চ স্যাতাং , তথেষ্টপুত্রং জনযেতাম্||১১|| যা তু স্ত্রী শ্যামং লোহিতাক্ষং ব্যূঢোরস্কং মহাবাহুং চ পুত্রমাশাসীত, যা বা কৃষ্ণং কৃষ্ণমৃদুদীর্ঘকেশং শুক্লাক্ষং শুক্লদন্তং তেজস্বিনমাত্মবন্তম্; এষ এবানযোরপি হোমবিধিঃ| কিন্তু পরিবর্হো বর্ণবর্জং স্যাত্| পুত্রবর্ণানুরূপস্তু যথাশীরেব তযোঃ পরিবর্হোঽন্যঃ কার্যঃ স্যাত্||১২|| শূদ্রা তু নমস্কারমেব কুর্যাত্ (দেবাগ্নিদ্বিজগুরুতপস্বিসিদ্ধেভ্যঃ )||১৩|| যা যা চ যথাবিধং পুত্রমাশাসীত তস্যাস্তস্যাস্তাং তাং পুত্রাশিষমনুনিশম্য তাংস্তাঞ্জনপদান্মনসাঽনুপরিক্রামযেত্| ততো যা যা যেষাং যেষাং জনপদানাং মনুষ্যাণামনুরূপং পুত্রমাশাসীত সা সা তেষাং তেষাং জনপদানাং মনুষ্যাণামাহারবিহারোপচারপরিচ্ছদাননুবিধত্স্বেতি বাচ্যা স্যাত্| ইত্যেতত্ সর্বং পুত্রাশিষাং সমৃদ্ধিকরং কর্ম ব্যাখ্যাতং ভবতি||১৪||
तत ऋत्विक् प्रागुत्तरस्यां दिश्यगारस्य प्राग्प्रवणमुदक्प्रवणं वा प्रदेशमभिसमीक्ष्य, गोमयोदकाभ्यां स्थण्डिलमुपलिप्य, प्रोक्ष्य चोदकेन, वेदीमस्मिन् स्थापयेत्| तां पश्चिमेनाहतवस्त्रसञ्चये श्वेतार्षभे वाऽप्यजिन उपविशेद् ब्राह्मणप्रयुक्तः, राजन्यप्रयुक्तस्तु वैयाघ्रे चर्मण्यानडुहे वा, वैश्यप्रयुक्तस्तु रौरवे बास्ते वा| तत्रोपविष्टः पालाशीभिरैङ्गुदीभिरौदुम्बरीभिर्माधूकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय, कुशैः परिस्तीर्य, परिधिभिश्च परिधाय, लाजैः शुक्लाभिश्च गन्धवतीभिः सुमनोभिरुपकिरेत्| तत्र प्रणीयोदपात्रं पवित्रपूतमुपसंस्कृत्य सर्पिराज्यार्थं यथोक्तवर्णानाजानेयादीन् समन्ततः स्थापयेत्||१०|| ततः पुत्रकामा पश्चिमतोऽग्निं दक्षिणतो ब्राह्मणमुपविश्यान्वालभेत सह भर्त्रा यथेष्टं पुत्रमाशासाना| ततस्तस्या आशासानाया ऋत्विक् प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्याः कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टिं निर्वर्तयेद् ‘विष्णुर्योनिं कल्पयतु’ इत्यनयर्चा| ततश्चैवाज्येन स्थालीपाकमभिघार्य त्रिर्जुहुयाद्यथाम्नायम्| मन्त्रोपमन्त्रितमुदपात्रं तस्यै दद्यात् सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति| ततः समाप्ते कर्मणि पूर्वं दक्षिणपादमभिहरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् सह भर्त्रा| ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वाऽऽज्यशेषं प्राश्नीयात् पूर्वं पुमान्, पश्चात् स्त्री; न चोच्छिष्टमवशेषयेत्| ततस्तौ सह संवसेयातामष्टरात्रं, तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां , तथेष्टपुत्रं जनयेताम्||११|| या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहुं च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णं कृष्णमृदुदीर्घकेशं शुक्लाक्षं शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मवन्तम्; एष एवानयोरपि होमविधिः| किन्तु परिबर्हो वर्णवर्जं स्यात्| पुत्रवर्णानुरूपस्तु यथाशीरेव तयोः परिबर्होऽन्यः कार्यः स्यात्||१२|| शूद्रा तु नमस्कारमेव कुर्यात् (देवाग्निद्विजगुरुतपस्विसिद्धेभ्यः )||१३|| या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां तां पुत्राशिषमनुनिशम्य तांस्ताञ्जनपदान्मनसाऽनुपरिक्रामयेत्| ततो या या येषां येषां जनपदानां मनुष्याणामनुरूपं पुत्रमाशासीत सा सा तेषां तेषां जनपदानां मनुष्याणामाहारविहारोपचारपरिच्छदाननुविधत्स्वेति वाच्या स्यात्| इत्येतत् सर्वं पुत्राशिषां समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातं भवति||१४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 7 (15) · Śloka 15
ন খলু কেবলমেতদেব কর্ম বর্ণবৈশেষ্যকরং ভবতি| অপি তু তেজোধাতুরপ্যুদকান্তরিক্ষধাতুপ্রাযোঽবদাতবর্ণকরো ভবতি, পৃথিবীবাযুধাতুপ্রাযঃ কৃষ্ণবর্ণকরঃ, সমসর্বধাতুপ্রাযঃ শ্যামবর্ণকরঃ||১৫||
न खलु केवलमेतदेव कर्म वर्णवैशेष्यकरं भवति| अपि तु तेजोधातुरप्युदकान्तरिक्षधातुप्रायोऽवदातवर्णकरो भवति, पृथिवीवायुधातुप्रायः कृष्णवर्णकरः, समसर्वधातुप्रायः श्यामवर्णकरः||१५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 8 (16) · Śloka 16
সত্ত্ববৈশেষ্যকরাণি পুনস্তেষাং তেষাং প্রাণিনাং মাতাপিতৃসত্ত্বান্যন্তর্বত্ন্যাঃ শ্রুতযশ্চাভীক্ষ্ণং স্বোচিতং চ কর্ম সত্ত্ববিশেষাভ্যাসশ্চেতি||১৬||
सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्वत्न्याः श्रुतयश्चाभीक्ष्णं स्वोचितं च कर्म सत्त्वविशेषाभ्यासश्चेति||१६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 9 (17) · Śloka 17
যথোক্তেন বিধিনোপসংস্কৃতশরীরযোঃ স্ত্রীপুরুষযোর্মিশ্রীভাবমাপন্নযোঃ শুক্রং শোণিতেন সহ সংযোগং সমেত্যাব্যাপন্নমব্যাপন্নেন যোনাবনুপহতাযামপ্রদুষ্টে গর্ভাশযে গর্ভমভিনির্বর্তযত্যেকান্তেন| যথা- নির্মলে বাসসি সুপরিকল্পিতে রঞ্জনং সমুদিতগুণমুপনিপাতাদেব রাগমভিনির্বর্তযতি, তদ্বত্; যথা বা ক্ষীরং দধ্নাঽভিষুতমভিষবণাদ্বিহায স্বভাবমাপদ্যতে দধিভাবং, শুক্রং তদ্বত্||১৭||
यथोक्तेन विधिनोपसंस्कृतशरीरयोः स्त्रीपुरुषयोर्मिश्रीभावमापन्नयोः शुक्रं शोणितेन सह संयोगं समेत्याव्यापन्नमव्यापन्नेन योनावनुपहतायामप्रदुष्टे गर्भाशये गर्भमभिनिर्वर्तयत्येकान्तेन| यथा- निर्मले वाससि सुपरिकल्पिते रञ्जनं समुदितगुणमुपनिपातादेव रागमभिनिर्वर्तयति, तद्वत्; यथा वा क्षीरं दध्नाऽभिषुतमभिषवणाद्विहाय स्वभावमापद्यते दधिभावं, शुक्रं तद्वत्||१७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 10 (18) · Śloka 18
এবমভিনির্বর্তমানস্য গর্ভস্য স্ত্রীপুরুষত্বে হেতুঃ পূর্বমুক্তঃ| যথা হি বীজমনুপতপ্তমুপ্তং স্বাং স্বাং প্রকৃতিমনুবিধীযতে ব্রীহির্বা ব্রীহিত্বং যবো বা যবত্বং তথা স্ত্রীপুরুষাবপি যথোক্তং হেতুবিভাগমনুবিধীযেতে||১৮||
एवमभिनिर्वर्तमानस्य गर्भस्य स्त्रीपुरुषत्वे हेतुः पूर्वमुक्तः| यथा हि बीजमनुपतप्तमुप्तं स्वां स्वां प्रकृतिमनुविधीयते व्रीहिर्वा व्रीहित्वं यवो वा यवत्वं तथा स्त्रीपुरुषावपि यथोक्तं हेतुविभागमनुविधीयेते||१८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 11 (19) · Śloka 19
তযোঃ কর্মণা বেদোক্তেন বিবর্তনমুপদিশ্যতে প্রাগ্ব্যক্তীভাবাত্ প্রযুক্তেন সম্যক্| কর্মণাং হি দেশকালসম্পদুপেতানাং নিযতমিষ্টফলত্বং, তথেতরেষামিতরত্বম্| তস্মাদাপন্নগর্ভাং স্ত্রিযমভিসমীক্ষ্য প্রাগ্ব্যক্তীভাবাদ্গর্ভস্য পুংসবনমস্যৈ দদ্যাত্| গোষ্ঠে জাতস্য ন্যগ্রোধস্য প্রাগুত্তরাভ্যাং শাখাভ্যাং শুঙ্গে অনুপহতে আদায দ্বাভ্যাং ধান্যমাষাভ্যাং সম্পদুপেতাভ্যাং গৌরসর্ষপাভ্যাং বা সহ দধ্নি প্রক্ষিপ্য পুষ্যেণ পিবেত্, তথৈবাপরাঞ্জীবকর্ষভকাপামার্গসহচরকল্কাংশ্চ যুগপদেকৈকশো যথেষ্টং বাঽপ্যুপসংস্কৃত্য পযসা, কুড্যকীটকং মত্স্যকং বোদকাঞ্জলৌ প্রক্ষিপ্য পুষ্যেণ পিবেত্, তথা কনকমযান্ রাজতানাযসাংশ্চ পুরুষকানগ্নিবর্ণানণুপ্রমাণান্ দধ্নি পযস্যুদকাঞ্জলৌ বা প্রক্ষিপ্য পিবেদনবশেষতঃ পুষ্যেণ, পুষ্যেণৈব চ শালিপিষ্টস্য পচ্যমানস্যোষ্মাণমুপাঘ্রায তস্যৈব চ পিষ্টস্যোদকসংসৃষ্টস্য রসং দেহল্যামুপনিধায দক্ষিণে নাসাপুটে স্বযমাসিঞ্চেত্ পিচুনা| যচ্চান্যদপি ব্রাহ্মণা ব্রূযুরাপ্তা বা স্ত্রিযঃ পুংসবনমিষ্টং তচ্চানুষ্ঠেযম্| ইতি পুংসবনানি||১৯||
तयोः कर्मणा वेदोक्तेन विवर्तनमुपदिश्यते प्राग्व्यक्तीभावात् प्रयुक्तेन सम्यक्| कर्मणां हि देशकालसम्पदुपेतानां नियतमिष्टफलत्वं, तथेतरेषामितरत्वम्| तस्मादापन्नगर्भां स्त्रियमभिसमीक्ष्य प्राग्व्यक्तीभावाद्गर्भस्य पुंसवनमस्यै दद्यात्| गोष्ठे जातस्य न्यग्रोधस्य प्रागुत्तराभ्यां शाखाभ्यां शुङ्गे अनुपहते आदाय द्वाभ्यां धान्यमाषाभ्यां सम्पदुपेताभ्यां गौरसर्षपाभ्यां वा सह दध्नि प्रक्षिप्य पुष्येण पिबेत्, तथैवापराञ्जीवकर्षभकापामार्गसहचरकल्कांश्च युगपदेकैकशो यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य पयसा, कुड्यकीटकं मत्स्यकं वोदकाञ्जलौ प्रक्षिप्य पुष्येण पिबेत्, तथा कनकमयान् राजतानायसांश्च पुरुषकानग्निवर्णानणुप्रमाणान् दध्नि पयस्युदकाञ्जलौ वा प्रक्षिप्य पिबेदनवशेषतः पुष्येण, पुष्येणैव च शालिपिष्टस्य पच्यमानस्योष्माणमुपाघ्राय तस्यैव च पिष्टस्योदकसंसृष्टस्य रसं देहल्यामुपनिधाय दक्षिणे नासापुटे स्वयमासिञ्चेत् पिचुना| यच्चान्यदपि ब्राह्मणा ब्रूयुराप्ता वा स्त्रियः पुंसवनमिष्टं तच्चानुष्ठेयम्| इति पुंसवनानि||१९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 12 (20) · Śloka 20
অত ঊর্ধ্বং গর্ভস্থাপনানি ব্যাখ্যাস্যামঃ- ঐন্দ্রী ব্রাহ্মী শতবীর্যা সহস্রবীর্যাঽমোঘাঽব্যথা শিবাঽরিষ্টা বাট্যপুষ্পী বিষ্বক্সেনকান্তা চেত্যাসামোষধীনাং শিরসা দক্ষিণেন বা পাণিনা ধারণং, এতাভিশ্চৈব সিদ্ধস্য পযসঃ সর্পিষো বা পানম্, এতাভিশ্চৈব পুষ্যে পুষ্যে স্নানং, সদা চ তাঃ সমালভেত| তথা সর্বাসাং জীবনীযোক্তানামোষধীনাং সদোপযোগস্তৈস্তৈরুপযোগবিধিভিঃ| ইতি গর্ভস্থাপনানি ব্যাখ্যাতানি ভবন্তি||২০||
अत ऊर्ध्वं गर्भस्थापनानि व्याख्यास्यामः- ऐन्द्री ब्राह्मी शतवीर्या सहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथा शिवाऽरिष्टा वाट्यपुष्पी विष्वक्सेनकान्ता चेत्यासामोषधीनां शिरसा दक्षिणेन वा पाणिना धारणं, एताभिश्चैव सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानम्, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नानं, सदा च ताः समालभेत| तथा सर्वासां जीवनीयोक्तानामोषधीनां सदोपयोगस्तैस्तैरुपयोगविधिभिः| इति गर्भस्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति||२०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 13 (21) · Śloka 21
গর্ভোপঘাতকরাস্ত্বিমে ভাবা ভবন্তি; তদ্যথা- উত্কটবিষমকঠিনাসনসেবিন্যা বাতমূত্রপুরীষবেগানুপরুন্ধত্যা দারুণানুচিতব্যাযামসেবিন্যাস্তীক্ষ্ণোষ্ণাতিমাত্রসেবিন্যাঃ প্রমিতাশনসেবিন্যা গর্ভো ম্রিযতেঽন্তঃ কুক্ষেঃ, অকালে বা স্রংসতে, শোষী বা ভবতি; তথাঽভিঘাতপ্রপীডনৈঃ শ্বভ্রকূপপ্রপাতদেশাবলোকনৈর্বাঽভীক্ষ্ণং মাতুঃ প্রপতত্যকালেগর্ভঃ, তথাঽতিমাত্রসঙ্ক্ষোভিভির্যানৈর্যানেন, অপ্রিযাতিমাত্রশ্রবণৈর্বা| প্রততোত্তানশাযিন্যাঃ পুনর্গর্ভস্য নাভ্যাশ্রযা নাডী কণ্ঠমনুবেষ্টযতি, বিবৃতশাযিনী নক্তঞ্চারিণী চোন্মত্তং জনযতি, অপস্মারিণং পুনঃ কলিকলহশীলা, ব্যবাযশীলা দুর্বপুষমহ্রীকং স্ত্রৈণং বা, শোকনিত্যা ভীতমপচিতমল্পাযুষং বা, অভিধ্যাত্রী পরোপতাপিনমীর্ষ্যুং স্ত্রৈণং বা, স্তেনা ত্বাযাসবহুলমতিদ্রোহিণমকর্মশীলং বা, অমর্ষিণী চণ্ডমৌপধিকমসূযকং বা স্বপ্ননিত্যা তন্দ্রালুমবুধমল্পাগ্নিং বা, মদ্যনিত্যা পিপাসালুমল্পস্মৃতিমনবস্থিতচিত্তং বা, গোধামাংসপ্রাযা শার্করিণমশ্মরিণং শনৈর্মেহিণং বা, বরাহমাংসপ্রাযা রক্তাক্ষং ক্রথনমতিপরুষরোমাণং বা, মত্স্যমাংসনিত্যা চিরনিমেষং স্তব্ধাক্ষং বা, মধুরনিত্যা প্রমেহিণং মূকমতিস্থূলং বা, অম্লনিত্যা রক্তপিত্তিনং ত্বগক্ষিরোগিণং বা, লবণনিত্যা শীঘ্রবলীপলিতং খালিত্যরোগিণং বা, কটুকনিত্যা দুর্বলমল্পশুক্রমনপত্যং বা, তিক্তনিত্যা শোষিণমবলমনুপচিতং বা, কষাযনিত্যা শ্যাবমানাহিনমুদাবর্তিনং বা, যদ্যচ্চ যস্য যস্য ব্যাধের্নিদানমুক্তং তত্তদাসেবমানাঽন্তর্বত্নী তন্নিমিত্তবিকারবহুলমপত্যং জনযতি| পিতৃজাস্তু শুক্রদোষা মাতৃজৈরপচারৈর্ব্যাখ্যাতাঃ| ইতি গর্ভোপঘাতকরা ভাবা ভবন্ত্যুক্তাঃ | তস্মাদহিতানাহারবিহারান্ প্রজাসম্পদমিচ্ছন্তী স্ত্রী বিশেষেণ বর্জযেত্| সাধ্বাচারা চাত্মানমুপচরেদ্ধিতাভ্যামাহারবিহারাভ্যামিতি||২১||
गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्ति; तद्यथा- उत्कटविषमकठिनासनसेविन्या वातमूत्रपुरीषवेगानुपरुन्धत्या दारुणानुचितव्यायामसेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेविन्याः प्रमिताशनसेविन्या गर्भो म्रियतेऽन्तः कुक्षेः, अकाले वा स्रंसते, शोषी वा भवति; तथाऽभिघातप्रपीडनैः श्वभ्रकूपप्रपातदेशावलोकनैर्वाऽभीक्ष्णं मातुः प्रपतत्यकालेगर्भः, तथाऽतिमात्रसङ्क्षोभिभिर्यानैर्यानेन, अप्रियातिमात्रश्रवणैर्वा| प्रततोत्तानशायिन्याः पुनर्गर्भस्य नाभ्याश्रया नाडी कण्ठमनुवेष्टयति, विवृतशायिनी नक्तञ्चारिणी चोन्मत्तं जनयति, अपस्मारिणं पुनः कलिकलहशीला, व्यवायशीला दुर्वपुषमह्रीकं स्त्रैणं वा, शोकनित्या भीतमपचितमल्पायुषं वा, अभिध्यात्री परोपतापिनमीर्ष्युं स्त्रैणं वा, स्तेना त्वायासबहुलमतिद्रोहिणमकर्मशीलं वा, अमर्षिणी चण्डमौपधिकमसूयकं वा स्वप्ननित्या तन्द्रालुमबुधमल्पाग्निं वा, मद्यनित्या पिपासालुमल्पस्मृतिमनवस्थितचित्तं वा, गोधामांसप्राया शार्करिणमश्मरिणं शनैर्मेहिणं वा, वराहमांसप्राया रक्ताक्षं क्रथनमतिपरुषरोमाणं वा, मत्स्यमांसनित्या चिरनिमेषं स्तब्धाक्षं वा, मधुरनित्या प्रमेहिणं मूकमतिस्थूलं वा, अम्लनित्या रक्तपित्तिनं त्वगक्षिरोगिणं वा, लवणनित्या शीघ्रवलीपलितं खालित्यरोगिणं वा, कटुकनित्या दुर्बलमल्पशुक्रमनपत्यं वा, तिक्तनित्या शोषिणमबलमनुपचितं वा, कषायनित्या श्यावमानाहिनमुदावर्तिनं वा, यद्यच्च यस्य यस्य व्याधेर्निदानमुक्तं तत्तदासेवमानाऽन्तर्वत्नी तन्निमित्तविकारबहुलमपत्यं जनयति| पितृजास्तु शुक्रदोषा मातृजैरपचारैर्व्याख्याताः| इति गर्भोपघातकरा भावा भवन्त्युक्ताः | तस्मादहितानाहारविहारान् प्रजासम्पदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेण वर्जयेत्| साध्वाचारा चात्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहारविहाराभ्यामिति||२१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 14 (22-24) · Śloka 24
ব্যাধীংশ্চাস্যা মৃদুমধুরশিশিরসুখসুকুমারপ্রাযৈরৌষধাহারোপচারৈরুপচরেত্, ন চাস্যা বমনবিরেচনশিরোবিরেচনানি প্রযোজযেত্, ন রক্তমবসেচযেত্, সর্বকালং চ নাস্থাপনমনুবাসনং বা কুর্যাদন্যত্রাত্যযিকাদ্ব্যাধেঃ| অষ্টমং মাসমুপাদায বমনাদিসাধ্যেষু পুনর্বিকারেষ্বাত্যযিকেষু মৃদুভির্বমনাদিভিস্তদর্থকারিভির্বোপচারঃ স্যাত্| পূর্ণমিব তৈলপাত্রমসঙ্ক্ষোভযতাঽন্তর্বত্নী ভবত্যুপচর্যা||২২|| সা চেদপচারাদ্ দ্বযোস্ত্রিষু বা মাসেষু পুষ্পং পশ্যেন্নাস্যা গর্ভঃ স্থাস্যতীতি বিদ্যাত্; অজাতসারো হি তস্মিন্ কালে ভবতি গর্ভঃ||২৩|| সা চেচ্চতুষ্প্রভৃতিষু মাসেষু ক্রোধশোকাসূযের্ষ্যাভযত্রাসব্যবাযব্যাযামসঙ্ক্ষোভসন্ধারণবিষমাশনশযনস্থানক্ষুত্পিপাসাতিযোগাত্ কদাহারাদ্বা পুষ্পং পশ্যেত্, তস্যা গর্ভস্থাপনবিধিমুপদেক্ষ্যামঃ| পুষ্পদর্শনাদেবৈনাং ব্রূযাত্- শযনং তাবন্মৃদুসুখশিশিরাস্তরণসংস্তীর্ণমীষদবনতশিরস্কং প্রতিপদ্যস্বেতি| ততো যষ্টীমধুকসর্পির্ভ্যাং পরমশিশিরবারিণী সংস্থিতাভ্যাং পিচুমাপ্লাব্যোপস্থসমীপে স্থাপযেত্তস্যাঃ, তথা শতধৌতসহস্রধৌতাভ্যাং সর্পির্ভ্যামধোনাভেঃ সর্বতঃ প্রদিহ্যাত্, সর্বতশ্চ গব্যেন চৈনাং পযসা সুশীতেন মধুকাম্বুনা বা ন্যগ্রোধাদিকষাযেণ বা পরিষেচযেদধো নাভেঃ, উদকং বা সুশীতমবগাহযেত্, ক্ষীরিণাং কষাযদ্রুমাণাং চ স্বরসপরিপীতানি চেলানি গ্রাহযেত্, ন্যগ্রোধাদিশুঙ্গাসিদ্ধযোর্বাক্ষীরসর্পিষোঃ পিচুং গ্রাহযেত্, অতশ্চৈবাক্ষমাত্রং প্রাশযেত্, প্রাশযেদ্বা কেবলং ক্ষীরসর্পিঃ, পদ্মোত্পলকুমুদকিঞ্জল্কাংশ্চাস্যৈ সমধুশর্করান্ লেহার্থং দদ্যাত্, শৃঙ্গাটকপুষ্করবীজকশেরুকান্ ভক্ষ্ণার্থং, গন্ধপ্রিযঙ্গ্বসিতোত্পলশালূকোদুম্বরশলাটুন্যগ্রোধশুঙ্গানি বা পাযযেদেনামাজেন পযসা, পযসা চৈনাং বলাতিবলাশালিষষ্টিকেক্ষুমূলকাকোলীশৃতেন সমধুশর্করং রক্তশালীনামোদনং মৃদুসুরভিশীতলং ভোজযেত্, লাবকপিঞ্জলকুরঙ্গশম্বরশশহরিণৈণকালপুচ্ছকরসেন বা ঘৃতসুসংস্কৃতেন সুখশিশিরোপবাতদেশস্থাং ভোজযেত্, ক্রোধশোকাযাসব্যবাযব্যাযামেভ্যশ্চাভিরক্ষেত্, সৌম্যাভিশ্চৈনাং কথাভির্মনোনুকূলাভিরুপাসীত; তথাঽস্যা গর্ভস্তিষ্ঠতি||২৪||
व्याधींश्चास्या मृदुमधुरशिशिरसुखसुकुमारप्रायैरौषधाहारोपचारैरुपचरेत्, न चास्या वमनविरेचनशिरोविरेचनानि प्रयोजयेत्, न रक्तमवसेचयेत्, सर्वकालं च नास्थापनमनुवासनं वा कुर्यादन्यत्रात्ययिकाद्व्याधेः| अष्टमं मासमुपादाय वमनादिसाध्येषु पुनर्विकारेष्वात्ययिकेषु मृदुभिर्वमनादिभिस्तदर्थकारिभिर्वोपचारः स्यात्| पूर्णमिव तैलपात्रमसङ्क्षोभयताऽन्तर्वत्नी भवत्युपचर्या||२२|| सा चेदपचाराद् द्वयोस्त्रिषु वा मासेषु पुष्पं पश्येन्नास्या गर्भः स्थास्यतीति विद्यात्; अजातसारो हि तस्मिन् काले भवति गर्भः||२३|| सा चेच्चतुष्प्रभृतिषु मासेषु क्रोधशोकासूयेर्ष्याभयत्रासव्यवायव्यायामसङ्क्षोभसन्धारणविषमाशनशयनस्थानक्षुत्पिपासातियोगात् कदाहाराद्वा पुष्पं पश्येत्, तस्या गर्भस्थापनविधिमुपदेक्ष्यामः| पुष्पदर्शनादेवैनां ब्रूयात्- शयनं तावन्मृदुसुखशिशिरास्तरणसंस्तीर्णमीषदवनतशिरस्कं प्रतिपद्यस्वेति| ततो यष्टीमधुकसर्पिर्भ्यां परमशिशिरवारिणी संस्थिताभ्यां पिचुमाप्लाव्योपस्थसमीपे स्थापयेत्तस्याः, तथा शतधौतसहस्रधौताभ्यां सर्पिर्भ्यामधोनाभेः सर्वतः प्रदिह्यात्, सर्वतश्च गव्येन चैनां पयसा सुशीतेन मधुकाम्बुना वा न्यग्रोधादिकषायेण वा परिषेचयेदधो नाभेः, उदकं वा सुशीतमवगाहयेत्, क्षीरिणां कषायद्रुमाणां च स्वरसपरिपीतानि चेलानि ग्राहयेत्, न्यग्रोधादिशुङ्गासिद्धयोर्वाक्षीरसर्पिषोः पिचुं ग्राहयेत्, अतश्चैवाक्षमात्रं प्राशयेत्, प्राशयेद्वा केवलं क्षीरसर्पिः, पद्मोत्पलकुमुदकिञ्जल्कांश्चास्यै समधुशर्करान् लेहार्थं दद्यात्, शृङ्गाटकपुष्करबीजकशेरुकान् भक्ष्णार्थं, गन्धप्रियङ्ग्वसितोत्पलशालूकोदुम्बरशलाटुन्यग्रोधशुङ्गानि वा पाययेदेनामाजेन पयसा, पयसा चैनां बलातिबलाशालिषष्टिकेक्षुमूलकाकोलीशृतेन समधुशर्करं रक्तशालीनामोदनं मृदुसुरभिशीतलं भोजयेत्, लावकपिञ्जलकुरङ्गशम्बरशशहरिणैणकालपुच्छकरसेन वा घृतसुसंस्कृतेन सुखशिशिरोपवातदेशस्थां भोजयेत्, क्रोधशोकायासव्यवायव्यायामेभ्यश्चाभिरक्षेत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोनुकूलाभिरुपासीत; तथाऽस्या गर्भस्तिष्ठति||२४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 15 (25-26) · Śloka 26
যস্যাঃ পুনরামান্বযাত্ পুষ্পদর্শনং স্যাত্, প্রাযস্তস্যাস্তদ্গর্ভোপঘাতকরং ভবতি, বিরুদ্ধোপক্রমত্বাত্তযোঃ||২৫|| যস্যাঃ পুনরুষ্ণতীক্ষ্ণোপযোগাদ্গর্ভিণ্যা মহতি সঞ্জাতসারে গর্ভে পুষ্পদর্শনং স্যাদন্যো বা যোনিস্রাবস্তস্যা গর্ভো বৃদ্ধিং ন প্রাপ্নোতি নিঃস্রুতত্বাত্; স কালমবতিষ্ঠতেঽতিমাত্রং, তমুপবিষ্টকমিত্যাচক্ষতে কেচিত্| উপবাসব্রতকর্মপরাযাঃ পুনঃ কদাহারাযাঃ স্নেহদ্বেষিণ্যা বাতপ্রকোপণোক্তান্যাসেবমানাযা গর্ভো বৃদ্ধিং ন প্রাপ্নোতি পরিশুষ্কত্বাত্; স চাপি কালমবতিষ্ঠতেঽতিমাত্রম্ , অস্পন্দনশ্চ ভবতি, তং তু নাগোদরমিত্যাচক্ষতে||২৬||
यस्याः पुनरामान्वयात् पुष्पदर्शनं स्यात्, प्रायस्तस्यास्तद्गर्भोपघातकरं भवति, विरुद्धोपक्रमत्वात्तयोः||२५|| यस्याः पुनरुष्णतीक्ष्णोपयोगाद्गर्भिण्या महति सञ्जातसारे गर्भे पुष्पदर्शनं स्यादन्यो वा योनिस्रावस्तस्या गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति निःस्रुतत्वात्; स कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं, तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित्| उपवासव्रतकर्मपरायाः पुनः कदाहारायाः स्नेहद्वेषिण्या वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानाया गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति परिशुष्कत्वात्; स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रम् , अस्पन्दनश्च भवति, तं तु नागोदरमित्याचक्षते||२६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 16 (27-29) · Śloka 29
নার্যোস্তযোরুভযোরপি চিকিত্সিতবিশেষমুপদেক্ষ্যামঃ- ভৌতিকজীবনীযবৃংহণীযমধুরবাতহরসিদ্ধানাং সর্পিষাং পযসামামগর্ভাণাং চোপযোগো গর্ভবৃদ্ধিকরঃ; তথা সম্ভোজনমেতৈরেব সিদ্ধৈশ্চ ঘৃতাদিভিঃ সুভিক্ষাযাঃ , অভীক্ষ্ণং যানবাহনাপমার্জনাবজৃম্ভণৈরুপপাদনমিতি||২৭|| যস্যাঃ পুনর্গর্ভঃ প্রসুপ্তো ন স্পন্দতে তাং শ্যেনমত্স্যগবযশিখিতাম্রচূডতিত্তিরীণামন্যতমস্য সর্পিষ্মতা রসেন মাষযূষেণ বা প্রভূতসর্পিষা মূলকযূষেণ বা রক্তশালীনামোদনং মৃদুমধুরশীতলং ভোজযেত্| তৈলাভ্যঙ্গেন চাস্যা অভীক্ষ্ণমুদরবস্তিবঙ্ক্ষণোরুকটীপার্শ্বপৃষ্ঠপ্রদেশানীষদুষ্ণেনোপচরেত্||২৮|| যস্যাঃ পুনরুদাবর্তবিবন্ধঃ স্যাদষ্টমে মাসে ন চানুবাসনসাধ্যং মন্যেত ততস্তস্যাস্তদ্বিকারপ্রশমনমুপকল্পযেন্নিরূহম্| উদাবর্তো হ্যুপেক্ষিতঃ সহসা সগর্ভাং গর্ভিণীং গর্ভমথবাঽতিপাতযেত্| তত্র বীরণশালিষষ্টিককুশকাশেক্ষুবালিকাবেতসপরিব্যাধমূলানাং ভূতীকানন্তাকাশ্মর্যপরূষকমধুকমৃদ্বীকানাং চ পযসাঽর্ধোদকেনোদ্গময্য রসং প্রিযালবিভীতকমজ্জতিলকল্কসম্প্রযুক্তমীষল্লবণমনত্যুষ্ণং চ নিরূহং দদ্যাত্| ব্যপগতবিবন্ধাং চৈনাং সুখসলিলপরিষিক্তাঙ্গীং স্থৈর্যকরমবিদাহিনমাহারং ভুক্তবতীং সাযং মধুরকসিদ্ধেন তৈলেনানুবাসযেত্| ন্যুব্জাং ত্বেনামাস্থাপনানুবাসনাভ্যামুপচরেত্||২৯||
नार्योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सितविशेषमुपदेक्ष्यामः- भौतिकजीवनीयबृंहणीयमधुरवातहरसिद्धानां सर्पिषां पयसामामगर्भाणां चोपयोगो गर्भवृद्धिकरः; तथा सम्भोजनमेतैरेव सिद्धैश्च घृतादिभिः सुभिक्षायाः , अभीक्ष्णं यानवाहनापमार्जनावजृम्भणैरुपपादनमिति||२७|| यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते तां श्येनमत्स्यगवयशिखिताम्रचूडतित्तिरीणामन्यतमस्य सर्पिष्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा मूलकयूषेण वा रक्तशालीनामोदनं मृदुमधुरशीतलं भोजयेत्| तैलाभ्यङ्गेन चास्या अभीक्ष्णमुदरबस्तिवङ्क्षणोरुकटीपार्श्वपृष्ठप्रदेशानीषदुष्णेनोपचरेत्||२८|| यस्याः पुनरुदावर्तविबन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं मन्येत ततस्तस्यास्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम्| उदावर्तो ह्युपेक्षितः सहसा सगर्भां गर्भिणीं गर्भमथवाऽतिपातयेत्| तत्र वीरणशालिषष्टिककुशकाशेक्षुवालिकावेतसपरिव्याधमूलानां भूतीकानन्ताकाश्मर्यपरूषकमधुकमृद्वीकानां च पयसाऽर्धोदकेनोद्गमय्य रसं प्रियालबिभीतकमज्जतिलकल्कसम्प्रयुक्तमीषल्लवणमनत्युष्णं च निरूहं दद्यात्| व्यपगतविबन्धां चैनां सुखसलिलपरिषिक्ताङ्गीं स्थैर्यकरमविदाहिनमाहारं भुक्तवतीं सायं मधुरकसिद्धेन तैलेनानुवासयेत्| न्युब्जां त्वेनामास्थापनानुवासनाभ्यामुपचरेत्||२९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 17 (30) · Śloka 30
যস্যাঃ পুনরতিমাত্রদোষোপচযাদ্বা তীক্ষ্ণোষ্ণাতিমাত্রসেবনাদ্বা বাতমূত্রপুরীষবেগবিধারণৈর্বা বিষমাশ(স)নশযনস্থানসম্পীডনাভিঘাতৈর্বা ক্রোধশোকের্ষ্যাভযত্রাসাদিভির্বা সাহসৈর্বাঽপরৈঃ কর্মভিরন্তঃকুক্ষের্গর্ভো ম্রিযতে, তস্যাঃ স্তিমিতং স্তব্ধমুদরমাততং শীতমশ্মান্তর্গতমিব ভবত্যস্পন্দনো গর্ভঃ, শূলমধিকমুপজাযতে, ন চাব্যঃ প্রাদুর্ভবন্তি, যোনির্ন প্রস্রবতি, অক্ষিণী চাস্যাঃ স্রস্তে ভবতঃ, তাম্যতি, ব্যথতে, ভ্রমতে, শ্বসিতি, অরতিবহুলা চ ভবতি, ন চাস্যা বেগপ্রাদুর্ভাবো যথাবদুপলভ্যতে; ইত্যেবংলক্ষণাং স্ত্রিযং মৃতগর্ভেযমিতি বিদ্যাত্||৩০||
यस्याः पुनरतिमात्रदोषोपचयाद्वा तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेवनाद्वा वातमूत्रपुरीषवेगविधारणैर्वा विषमाश(स)नशयनस्थानसम्पीडनाभिघातैर्वा क्रोधशोकेर्ष्याभयत्रासादिभिर्वा साहसैर्वाऽपरैः कर्मभिरन्तःकुक्षेर्गर्भो म्रियते, तस्याः स्तिमितं स्तब्धमुदरमाततं शीतमश्मान्तर्गतमिव भवत्यस्पन्दनो गर्भः, शूलमधिकमुपजायते, न चाव्यः प्रादुर्भवन्ति, योनिर्न प्रस्रवति, अक्षिणी चास्याः स्रस्ते भवतः, ताम्यति, व्यथते, भ्रमते, श्वसिति, अरतिबहुला च भवति, न चास्या वेगप्रादुर्भावो यथावदुपलभ्यते; इत्येवंलक्षणां स्त्रियं मृतगर्भेयमिति विद्यात्||३०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 18 (31) · Śloka 31
তস্য গর্ভশল্যস্য জরাযুপ্রপাতনং কর্ম সংশমনমিত্যাহুরেকে, মন্ত্রাদিকমথর্ববেদবিহিতমিত্যেকে, পরিদৃষ্টকর্মণা শল্যহর্ত্রা হরণমিত্যেকে| ব্যপগতগর্ভশল্যাং তু স্ত্রিযমামগর্ভাং সুরাসীধ্বরিষ্টমধুমদিরাসবানামন্যতমমগ্রে সামর্থ্যতঃ পাযযেদ্গর্ভকোষ্ঠশুদ্ধ্যর্থমর্তিবিস্মরণার্থং প্রহর্ষণার্থং চ, অতঃ পরং সম্প্রীণনৈর্বলানুরক্ষিভিরস্নেহসম্প্রযুক্তৈর্যবাগ্বাদিভির্বা তত্কালযোগিভিরাহারৈরুপচরেদ্দোষধাতুক্লেদবিশোষণমাত্রং কালম্| অতঃ পরং স্নেহপানৈর্বস্তিভিরাহারবিধিভিশ্চ দীপনীযজীবনীযবৃংহণীযমধুরবাতহরসমাখ্যাতৈরুপচরেত্| পরিপক্বগর্ভশল্যাযাঃ পুনর্বিমুক্তগর্ভশল্যাযাস্তদহরেব স্নেহোপচারঃ স্যাত্||৩১||
तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म संशमनमित्याहुरेके, मन्त्रादिकमथर्ववेदविहितमित्येके, परिदृष्टकर्मणा शल्यहर्त्रा हरणमित्येके| व्यपगतगर्भशल्यां तु स्त्रियमामगर्भां सुरासीध्वरिष्टमधुमदिरासवानामन्यतममग्रे सामर्थ्यतः पाययेद्गर्भकोष्ठशुद्ध्यर्थमर्तिविस्मरणार्थं प्रहर्षणार्थं च, अतः परं सम्प्रीणनैर्बलानुरक्षिभिरस्नेहसम्प्रयुक्तैर्यवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहारैरुपचरेद्दोषधातुक्लेदविशोषणमात्रं कालम्| अतः परं स्नेहपानैर्बस्तिभिराहारविधिभिश्च दीपनीयजीवनीयबृंहणीयमधुरवातहरसमाख्यातैरुपचरेत्| परिपक्वगर्भशल्यायाः पुनर्विमुक्तगर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात्||३१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 19 (32) · Śloka 32
পরমতো নির্বিকারমাপ্যায্যমানস্য গর্ভস্য মাসে মাসে কর্মোপদেক্ষ্যামঃ| প্রথমে মাসে শঙ্কিতা চেদ্গর্ভমাপন্না ক্ষীরমনুপস্কৃতং মাত্রাবচ্ছীতং কালে কালে পিবেত্, সাত্ম্যমেব চ ভোজনং সাযং প্রাতশ্চ ভুঞ্জীত; দ্বিতীযে মাসে ক্ষীরমেব চ মধুরৌষধসিদ্ধং; তৃতীযে মাসে ক্ষীরং মধুসর্পির্ভ্যামুপসংসৃজ্য; চতুর্থে মাসে ক্ষীরনবনীতমক্ষমাত্রমশ্নীযাত্; পঞ্চমে মাসে ক্ষীরসর্পিঃ; ষষ্ঠে মাসে ক্ষীরসর্পির্মধুরৌষধসিদ্ধং; তদেব সপ্তমে মাসে| তত্র গর্ভস্য কেশা জাযমানা মাতুর্বিদাহং জনযন্তীতি স্ত্রিযো ভাষন্তে; তন্নেতি ভগবানাত্রেযঃ, কিন্তু গর্ভোত্পীডনাদ্বাতপিত্তশ্লেষ্মাণ উরঃ প্রাপ্য বিদাহং জনযন্তি, ততঃ কণ্ডূরুপজাযতে, কণ্ডূমূলা চ কিক্কিসাবাপ্তির্ভবতি| তত্র কোলোদকেন নবনীতস্য মধুরৌষধসিদ্ধস্য পাণিতলমাত্রং কালে কালেঽস্যৈ পানার্থং দদ্যাত্, চন্দনমৃণালকল্কৈশ্চাস্যাঃ স্তনোদরং বিমৃদ্গীযাত্, শিরীষধাতকীসর্ষপমধুকচূর্ণৈর্বা, কুটজার্জকবীজমুস্তহরিদ্রাকল্কৈর্বা, নিম্বকোলসুরসমঞ্জিষ্ঠাকল্কৈর্বা, পৃষতহরিণশশরুধিরযুতযা ত্রিফলযা বা; করবীরপত্রসিদ্ধেন তৈলেনাভ্যঙ্গঃ; পরিষেকঃ পুনর্মালতীমধুকসিদ্ধেনাম্ভসা; জাতকণ্ডূশ্চ কণ্ডূযনং বর্জযেত্ত্বগ্ভেদবৈরূপ্যপরিহারার্থম্, অসহ্যাযাং তু কণ্ড্বামুন্মর্দনোদ্ধর্ষণাভ্যাং পরিহারঃ স্যাত্; মধুরমাহারজাতং বাতহরমল্পমস্নেহলবণমল্পোদকানুপানং চ ভুঞ্জীত| অষ্টমে তু মাসে ক্ষীরযবাগূং সর্পিষ্মতীং কালে কালে পিবেত্; তন্নেতি ভদ্রকাপ্যঃ, পৈঙ্গল্যাবাধো হ্যস্যা গর্ভমাগচ্ছেদিতি; অস্ত্বত্র পৈঙ্গল্যাবাধ ইত্যাহ ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেযঃ, ন ত্বেবৈতন্ন কার্যম্; এবং কুর্বতী হ্যরোগাঽঽরোগ্যবলবর্ণস্বরসংহননসম্পদুপেতং জ্ঞাতীনামপি শ্রেষ্ঠমপত্যং জনযতি| নবমে তু খল্বেনাং মাসে মধুরৌষধসিদ্ধেন তৈলেনানুবাসযেত্| অতশ্চৈবাস্যাস্তৈলাত্ পিচুং যোনৌ প্রণযেদ্গর্ভস্থানমার্গস্নেহনার্থম্| যদিদং কর্ম প্রথমং মাসং সমুপাদাযোপদিষ্টমানবমান্মাসাত্তেন গর্ভিণ্যা গর্ভসমযে গর্ভধারিণীকুক্ষিকটীপার্শ্বপৃষ্ঠং মৃদূভবতি, বাতশ্চানুলোমঃ সম্পদ্যতে, মূত্রপুরীষে চ প্রকৃতিভূতে সুখেন মার্গমনুপদ্যেতে, চর্মনখানি চ মার্দবমুপযান্তি, বলবর্ণৌ চোপচীযেতে; পুত্রং চেষ্টং সম্পদুপেতং সুখিনং সুখেনৈষা কালে প্রজাযত ইতি||৩২||
परमतो निर्विकारमाप्याय्यमानस्य गर्भस्य मासे मासे कर्मोपदेक्ष्यामः| प्रथमे मासे शङ्किता चेद्गर्भमापन्ना क्षीरमनुपस्कृतं मात्रावच्छीतं काले काले पिबेत्, सात्म्यमेव च भोजनं सायं प्रातश्च भुञ्जीत; द्वितीये मासे क्षीरमेव च मधुरौषधसिद्धं; तृतीये मासे क्षीरं मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य; चतुर्थे मासे क्षीरनवनीतमक्षमात्रमश्नीयात्; पञ्चमे मासे क्षीरसर्पिः; षष्ठे मासे क्षीरसर्पिर्मधुरौषधसिद्धं; तदेव सप्तमे मासे| तत्र गर्भस्य केशा जायमाना मातुर्विदाहं जनयन्तीति स्त्रियो भाषन्ते; तन्नेति भगवानात्रेयः, किन्तु गर्भोत्पीडनाद्वातपित्तश्लेष्माण उरः प्राप्य विदाहं जनयन्ति, ततः कण्डूरुपजायते, कण्डूमूला च किक्किसावाप्तिर्भवति| तत्र कोलोदकेन नवनीतस्य मधुरौषधसिद्धस्य पाणितलमात्रं काले कालेऽस्यै पानार्थं दद्यात्, चन्दनमृणालकल्कैश्चास्याः स्तनोदरं विमृद्गीयात्, शिरीषधातकीसर्षपमधुकचूर्णैर्वा, कुटजार्जकबीजमुस्तहरिद्राकल्कैर्वा, निम्बकोलसुरसमञ्जिष्ठाकल्कैर्वा, पृषतहरिणशशरुधिरयुतया त्रिफलया वा; करवीरपत्रसिद्धेन तैलेनाभ्यङ्गः; परिषेकः पुनर्मालतीमधुकसिद्धेनाम्भसा; जातकण्डूश्च कण्डूयनं वर्जयेत्त्वग्भेदवैरूप्यपरिहारार्थम्, असह्यायां तु कण्ड्वामुन्मर्दनोद्धर्षणाभ्यां परिहारः स्यात्; मधुरमाहारजातं वातहरमल्पमस्नेहलवणमल्पोदकानुपानं च भुञ्जीत| अष्टमे तु मासे क्षीरयवागूं सर्पिष्मतीं काले काले पिबेत्; तन्नेति भद्रकाप्यः, पैङ्गल्याबाधो ह्यस्या गर्भमागच्छेदिति; अस्त्वत्र पैङ्गल्याबाध इत्याह भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः, न त्वेवैतन्न कार्यम्; एवं कुर्वती ह्यरोगाऽऽरोग्यबलवर्णस्वरसंहननसम्पदुपेतं ज्ञातीनामपि श्रेष्ठमपत्यं जनयति| नवमे तु खल्वेनां मासे मधुरौषधसिद्धेन तैलेनानुवासयेत्| अतश्चैवास्यास्तैलात् पिचुं योनौ प्रणयेद्गर्भस्थानमार्गस्नेहनार्थम्| यदिदं कर्म प्रथमं मासं समुपादायोपदिष्टमानवमान्मासात्तेन गर्भिण्या गर्भसमये गर्भधारिणीकुक्षिकटीपार्श्वपृष्ठं मृदूभवति, वातश्चानुलोमः सम्पद्यते, मूत्रपुरीषे च प्रकृतिभूते सुखेन मार्गमनुपद्येते, चर्मनखानि च मार्दवमुपयान्ति, बलवर्णौ चोपचीयेते; पुत्रं चेष्टं सम्पदुपेतं सुखिनं सुखेनैषा काले प्रजायत इति||३२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 20 (33) · Śloka 33
প্রাক্ চৈবাস্যা নবমান্মাসাত্ সূতিকাগারং কারযেদপহৃতাস্থিশর্করাকপালে দেশে প্রশস্তরূপরসগন্ধাযাং ভূমৌ প্রাগ্দ্বারমুদগ্দ্বারং বা বৈল্বানাং কাষ্ঠানাং তৈন্দুকৈঙ্গুদকানাং ভাল্লাতকানাং বার(রু)ণানাং খাদিরাণাং বা; যানি চান্যান্যপি ব্রাহ্মণাঃ শংসেযুরথর্ববেদবিদস্তেষাং; বসনালেপনাচ্ছাদনাপিধানসম্পদুপেতং বাস্তুবিদ্যাহৃদযযোগাগ্নিসলিলোদূখলবর্চঃস্থানস্নানভূমিমহানসমৃতুসুখং চ||৩৩||
प्राक् चैवास्या नवमान्मासात् सूतिकागारं कारयेदपहृतास्थिशर्कराकपाले देशे प्रशस्तरूपरसगन्धायां भूमौ प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा बैल्वानां काष्ठानां तैन्दुकैङ्गुदकानां भाल्लातकानां वार(रु)णानां खादिराणां वा; यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः शंसेयुरथर्ववेदविदस्तेषां; वसनालेपनाच्छादनापिधानसम्पदुपेतं वास्तुविद्याहृदययोगाग्निसलिलोदूखलवर्चःस्थानस्नानभूमिमहानसमृतुसुखं च||३३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 21 (34) · Śloka 34
তত্র সর্পিস্তৈলমধুসৈন্ধবসৌবর্চলকালবিড্লবণবিডঙ্গকুষ্ঠকিলিমনাগর- পিপ্পলীপিপ্পলীমূলহস্তিপিপ্পলীমণ্ডূকপর্ণ্যেলালাঙ্গলীবচাচব্যচিত্রকচিরবিল্ব- হিঙ্গুসর্ষপলশুনকতককণকণিকানীপাতসীবল্বজভূর্জকুলত্থমৈরেযসুরাসবাঃ সন্নিহিতাঃ স্যুঃ; তথাঽশ্মানৌ দ্বৌ, দ্বে কু(চ)ণ্ডমুসলে, দ্বে উদূখলে, খরবৃষভশ্চ , দ্বৌ চ তীক্ষ্ণৌ সূচীপিপ্পলকৌ সৌবর্ণরাজতৌ, শস্ত্রাণি চ তীক্ষ্ণাযসানি, দ্বৌ চ বিল্বমযৌ পর্যঙ্কৌ, তৈন্দুকৈঙ্গুদানি চ কাষ্ঠান্যগ্নিসন্ধুক্ষণানি, স্ত্রিযশ্চ বহ্ব্যো বহুশঃ প্রজাতাঃ সৌহার্দযুক্তাঃ সততমনুরক্তাঃ প্রদক্ষিণাচারাঃ প্রতিপত্তিকুশলাঃ প্রকৃতিবত্সলাস্ত্যক্তবিষাদাঃ ক্লেশসহিন্যোঽভিমতাঃ, ব্রাহ্মণাশ্চাথর্ববেদবিদঃ; যচ্চান্যদপি তত্র সমর্থং মন্যেত, যচ্চান্যচ্চ ব্রাহ্মণা ব্রূযুঃ স্ত্রিযশ্চ বৃদ্ধাস্তত্ কার্যম্||৩৪||
तत्र सर्पिस्तैलमधुसैन्धवसौवर्चलकालविड्लवणविडङ्गकुष्ठकिलिमनागर- पिप्पलीपिप्पलीमूलहस्तिपिप्पलीमण्डूकपर्ण्येलालाङ्गलीवचाचव्यचित्रकचिरबिल्व- हिङ्गुसर्षपलशुनकतककणकणिकानीपातसीबल्वजभूर्जकुलत्थमैरेयसुरासवाः सन्निहिताः स्युः; तथाऽश्मानौ द्वौ, द्वे कु(च)ण्डमुसले, द्वे उदूखले, खरवृषभश्च , द्वौ च तीक्ष्णौ सूचीपिप्पलकौ सौवर्णराजतौ, शस्त्राणि च तीक्ष्णायसानि, द्वौ च बिल्वमयौ पर्यङ्कौ, तैन्दुकैङ्गुदानि च काष्ठान्यग्निसन्धुक्षणानि, स्त्रियश्च बह्व्यो बहुशः प्रजाताः सौहार्दयुक्ताः सततमनुरक्ताः प्रदक्षिणाचाराः प्रतिपत्तिकुशलाः प्रकृतिवत्सलास्त्यक्तविषादाः क्लेशसहिन्योऽभिमताः, ब्राह्मणाश्चाथर्ववेदविदः; यच्चान्यदपि तत्र समर्थं मन्येत, यच्चान्यच्च ब्राह्मणा ब्रूयुः स्त्रियश्च वृद्धास्तत् कार्यम्||३४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 22 (35) · Śloka 35
ততঃ প্রবৃত্তে নবমে মাসে পুণ্যেঽহনি প্রশস্তনক্ষত্রযোগমুপগতে প্রশস্তে ভগবতি শশিনি কল্যাণে কল্যাণে চ করণে মৈত্রে মুহূর্তে শান্তিং হুত্বা গোব্রাহ্মণমগ্নিমুদকং চাদৌ প্রবেশ্য গোভ্যস্তৃণোদকং মধুলাজাংশ্চ প্রদায ব্রাহ্মণেভ্যোঽক্ষতান্ সুমনসো নান্দীমুখানি চ ফলানীষ্টানি দত্ত্বোদকপূর্বমাসনস্থেভ্যোঽভিবাদ্য পুনরাচম্য স্বস্তি বাচযেত্| ততঃ পুণ্যাহশব্দেন গোব্রাহ্মণং সমনুবর্তমানা প্রদক্ষিণং প্রবিশেত্ সূতিকাগারম্| তত্রস্থা চ প্রসবকালং প্রতীক্ষেত||৩৫||
ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्रयोगमुपगते प्रशस्ते भगवति शशिनि कल्याणे कल्याणे च करणे मैत्रे मुहूर्ते शान्तिं हुत्वा गोब्राह्मणमग्निमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यस्तृणोदकं मधुलाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणेभ्योऽक्षतान् सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानीष्टानि दत्त्वोदकपूर्वमासनस्थेभ्योऽभिवाद्य पुनराचम्य स्वस्ति वाचयेत्| ततः पुण्याहशब्देन गोब्राह्मणं समनुवर्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत् सूतिकागारम्| तत्रस्था च प्रसवकालं प्रतीक्षेत||३५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 23 (36-40) · Śloka 40
তস্যাস্তু খল্বিমানি লিঙ্গানি প্রজননকালমভিতো ভবন্তি; তদ্যথা- ক্লমো গাত্রাণাং, গ্লানিরাননস্য, অক্ষ্ণোঃ শৈথিল্যং, বিমুক্তবন্ধনত্বমিব বক্ষসঃ, কুক্ষেরবস্রংসনম্, অধোগুরুত্বং, বঙ্ক্ষণবস্তিকটীকুক্ষিপার্শ্বপৃষ্ঠনিস্তোদঃ, যোনেঃ প্রস্রবণম্, অনন্নাভিলাষশ্চেতি; ততোঽনন্তরমাবীনাং প্রাদুর্ভাবঃ, প্রসেকশ্চ গর্ভোদকস্য||৩৬|| আবীপ্রাদুর্ভাবে তু ভূমৌ শযনং বিদধ্যান্মৃদ্বাস্তরণোপপন্নম্| তদধ্যাসীত সা| তাং ততঃ সমন্ততঃ পরিবার্য যথোক্তগুণাঃ স্ত্রিযঃ পর্যুপাসীরন্নাশ্বাসযন্ত্যো বাগ্ভির্গ্রাহিণীযাভিঃ সান্ত্বনীযাভিশ্চ||৩৭|| সা চেদাবীভিঃ সঙ্ক্লিশ্যমানা ন প্রজাযেতাথৈনাং ব্রূযাত্- উত্তিষ্ঠ, মুসলমন্যতরং গৃহীষ্ব, অনেনৈতদুলূখলং ধান্যপূর্ণং মুহুর্মুহুরভিজহি মুহুর্মুহুরবজৃম্ভস্ব চঙ্ক্রমস্ব চান্তরাঽন্তরেতি; এবমুপদিশন্ত্যেকে| তন্নেত্যাহ ভগবানাত্রেযঃ| দারুণব্যাযামবর্জনং হি গর্ভিণ্যাঃ সততমুপদিশ্যতে, বিশেষতশ্চ প্রজননকালে প্রচলিতসর্বধাতুদোষাযাঃ সুকুমার্যা নার্যা মুসলব্যাযামসমীরিতো বাযুরন্তরং লব্ধ্বা প্রাণান্ হিংস্যাত্, দুষ্প্রতীকারতমা হি তস্মিন্ কালে বিশেষেণ ভবতি গর্ভিণী; তস্মান্মুসলগ্রহণং পরিহার্যমৃষযো মন্যন্তে, জৃম্ভণং চঙ্ক্রমণং চ পুনরনুষ্ঠেযমিতি| অথাস্যৈ দদ্যাত্ কুষ্ঠৈলালাঙ্গলিকীবচাচিত্রকচিরবিল্বচব্যচূর্ণমুপঘ্রাতুং, সা তন্মুহুর্মুহুরুপজিঘ্রেত্, তথা ভূর্জপত্রধূমং শিংশপাসারধূমং বা| তস্যাশ্চান্তরাঽন্তরা কটীপার্শ্বপৃষ্ঠসক্থিদেশানীষদুষ্ণেন তৈলেনাভ্যজ্যানুসুখমবমৃদ্নীযাত্ | অনেন কর্মণা গর্ভোঽবাক্ প্রতিপদ্যতে||৩৮|| স যদা জানীযাদ্বিমুচ্য হৃদযমুদরমস্যাস্ত্বাবিশতি, বস্তিশিরোঽবগৃহ্ণাতি, ত্বরযন্ত্যেনামাব্যঃ, পরিবর্ততেঽধো গর্ভ ইতি; অস্যামবস্থাযাং পর্যঙ্কমেনামারোপ্য প্রবাহযিতুমুপক্রমেত| কর্ণে চাস্যা মন্ত্রমিমমনুকূলা স্ত্রী জপেত্- ‘ক্ষিতির্জলং বিযত্তেজো বাযুর্বিষ্ণুঃ প্রজাপতিঃ| সগর্ভাং ত্বাং সদা পান্তু বৈশল্যং চ দিশন্তু তে| প্রসূষ্ব ত্বমবিক্লিষ্টমবিক্লিষ্টা শুভাননে!| কার্তিকেযদ্যুতিং পুত্রং কার্তিকেযাভিরক্ষিতম্’ ইতি||৩৯|| তাশ্চৈনাং যথোক্তগুণাঃ স্ত্রিযোঽনুশিষ্যুঃ- অনাগতাবীর্মা প্রবাহিষ্ঠাঃ; যা হ্যনাগতাবীঃ প্রবাহতে ব্যর্থমেবাস্যাস্তত্ কর্ম ভবতি, প্রজা চাস্যা বিকৃতা বিকৃতিমাপন্না চ, শ্বাসকাসশোষপ্লীহপ্রসক্তা বা ভবতি| যথা হি ক্ষবথূদ্গারবাতমূত্রপুরীষবেগান্ প্রযতমানোঽপ্যপ্রাপ্তকালান্ন লভতে কৃচ্ছ্রেণ বাঽপ্যবাপ্নোতি , তথাঽনাগতকালং গর্ভমপি প্রবাহমাণা; যথা চৈষামেব ক্ষবথ্বাদীনাং সন্ধারণমুপঘাতাযোপপদ্যতে, তথা প্রাপ্তকালস্য গর্ভস্যাপ্রবাহণমিতি| সা যথানির্দেশং কুরুষ্বেতি বক্তব্যা স্যাত্| তথা চ কুর্বতী শনৈঃ পূর্বং প্রবাহেত, ততোঽনন্তরং বলবত্তরম্| তস্যাং চ প্রবাহমাণাযাং স্ত্রিযঃ শব্দং কুর্যুঃ- ‘প্রজাতা প্রজাতা ধন্যং ধন্যং পুত্রম্’ ইতি| তথাঽস্যা হর্ষেণাপ্যায্যন্তে প্রাণাঃ||৪০||
तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति; तद्यथा- क्लमो गात्राणां, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्तबन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्रंसनम्, अधोगुरुत्वं, वङ्क्षणबस्तिकटीकुक्षिपार्श्वपृष्ठनिस्तोदः, योनेः प्रस्रवणम्, अनन्नाभिलाषश्चेति; ततोऽनन्तरमावीनां प्रादुर्भावः, प्रसेकश्च गर्भोदकस्य||३६|| आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम्| तदध्यासीत सा| तां ततः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पर्युपासीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीयाभिः सान्त्वनीयाभिश्च||३७|| सा चेदावीभिः सङ्क्लिश्यमाना न प्रजायेताथैनां ब्रूयात्- उत्तिष्ठ, मुसलमन्यतरं गृहीष्व, अनेनैतदुलूखलं धान्यपूर्णं मुहुर्मुहुरभिजहि मुहुर्मुहुरवजृम्भस्व चङ्क्रमस्व चान्तराऽन्तरेति; एवमुपदिशन्त्येके| तन्नेत्याह भगवानात्रेयः| दारुणव्यायामवर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलितसर्वधातुदोषायाः सुकुमार्या नार्या मुसलव्यायामसमीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा प्राणान् हिंस्यात्, दुष्प्रतीकारतमा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी; तस्मान्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनुष्ठेयमिति| अथास्यै दद्यात् कुष्ठैलालाङ्गलिकीवचाचित्रकचिरबिल्वचव्यचूर्णमुपघ्रातुं, सा तन्मुहुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिंशपासारधूमं वा| तस्याश्चान्तराऽन्तरा कटीपार्श्वपृष्ठसक्थिदेशानीषदुष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसुखमवमृद्नीयात् | अनेन कर्मणा गर्भोऽवाक् प्रतिपद्यते||३८|| स यदा जानीयाद्विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति, बस्तिशिरोऽवगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामाव्यः, परिवर्ततेऽधो गर्भ इति; अस्यामवस्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहयितुमुपक्रमेत| कर्णे चास्या मन्त्रमिममनुकूला स्त्री जपेत्- ‘क्षितिर्जलं वियत्तेजो वायुर्विष्णुः प्रजापतिः| सगर्भां त्वां सदा पान्तु वैशल्यं च दिशन्तु ते| प्रसूष्व त्वमविक्लिष्टमविक्लिष्टा शुभानने!| कार्तिकेयद्युतिं पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम्’ इति||३९|| ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः- अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः; या ह्यनागतावीः प्रवाहते व्यर्थमेवास्यास्तत् कर्म भवति, प्रजा चास्या विकृता विकृतिमापन्ना च, श्वासकासशोषप्लीहप्रसक्ता वा भवति| यथा हि क्षवथूद्गारवातमूत्रपुरीषवेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालान्न लभते कृच्छ्रेण वाऽप्यवाप्नोति , तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा; यथा चैषामेव क्षवथ्वादीनां सन्धारणमुपघातायोपपद्यते, तथा प्राप्तकालस्य गर्भस्याप्रवाहणमिति| सा यथानिर्देशं कुरुष्वेति वक्तव्या स्यात्| तथा च कुर्वती शनैः पूर्वं प्रवाहेत, ततोऽनन्तरं बलवत्तरम्| तस्यां च प्रवाहमाणायां स्त्रियः शब्दं कुर्युः- ‘प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्रम्’ इति| तथाऽस्या हर्षेणाप्याय्यन्ते प्राणाः||४०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 24 (41) · Śloka 41
যদা চ প্রজাতা স্যাত্তদৈবৈনামবেক্ষেত- কাচিদস্যা অপরা প্রপন্না ন বেতি| তস্যাশ্চেদপরা ন প্রপন্না স্যাদথৈনামন্যতমা স্ত্রী দক্ষিণেন পাণিনা নাভেরুপরিষ্টাদ্বলবন্নিপীড্য সব্যেন পাণিনা পৃষ্ঠত উপসঙ্গৃহ্য তাং সুনির্ধূতং নির্ধুনুযাত্| অথাস্যাঃ পার্ষ্ণ্যা শ্রোণীমাকোটযেত্| অস্যাঃ স্ফিচাবুপসঙ্গৃহ্য সুপীডিতং পীডযেত্| অথাস্যা বালবেণ্যা কণ্ঠতালু পরিমৃশেত্| ভূর্জপত্রকাচমণিসর্পনির্মোকৈশ্চাস্যা যোনিং ধূপযেত্| কুষ্ঠতালীসকল্কং বল্বজযূষে মৈরেযসুরামণ্ডে তীক্ষ্ণে কৌলত্থে ব যূষে মণ্ডূকপর্ণীপিপ্পলীসম্পাকে বা সম্প্লাব্য পাযযেদেনাম্| তথা সূক্ষ্মৈলাকিলিমকুষ্ঠনাগর বিডঙ্গপিপ্পলীকালাগুরুচব্যচিত্রকোপকুঞ্চিকাকল্কং খরবৃষভস্য বা জীবতো দক্ষিণং কর্ণমুত্কৃত্য দৃষদি জর্জরীকৃত্য বল্বজক্বাথাদীনামাপ্লাবনানামন্যতমে প্রক্ষিপ্যাপ্লাব্য মুহূর্তস্থিতমুদ্ধৃত্য তদাপ্লাবনং পাযযেদেনাম্| শতপুষ্পাকুষ্ঠমদনহিঙ্গুসিদ্ধস্য চৈনাং তৈলস্য পিচুং গ্রাহযেত্| অতশ্চৈবানুবাসযেত্| এতৈরেব চাপ্লাবনৈঃ ফলজীমূতেক্ষ্বাকুধামার্গবকুটজকৃতবেধনহস্তিপিপ্পল্যুপহিতৈরাস্থাপযেত্| তদাস্থাপনমস্যাঃ সহ বাতমূত্রপুরীষৈর্নির্হরত্যপরামাসক্তাং বাযোরেবাপ্রতিলোমগত্বাত্ | অপরাং হি বাতমূত্রপুরীষাণ্যন্যানি চান্তর্বহির্মার্গাণি সজ্জন্তি||৪১||
यदा च प्रजाता स्यात्तदैवैनामवेक्षेत- काचिदस्या अपरा प्रपन्ना न वेति| तस्याश्चेदपरा न प्रपन्ना स्यादथैनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन पाणिना नाभेरुपरिष्टाद्बलवन्निपीड्य सव्येन पाणिना पृष्ठत उपसङ्गृह्य तां सुनिर्धूतं निर्धुनुयात्| अथास्याः पार्ष्ण्या श्रोणीमाकोटयेत्| अस्याः स्फिचावुपसङ्गृह्य सुपीडितं पीडयेत्| अथास्या बालवेण्या कण्ठतालु परिमृशेत्| भूर्जपत्रकाचमणिसर्पनिर्मोकैश्चास्या योनिं धूपयेत्| कुष्ठतालीसकल्कं बल्वजयूषे मैरेयसुरामण्डे तीक्ष्णे कौलत्थे व यूषे मण्डूकपर्णीपिप्पलीसम्पाके वा सम्प्लाव्य पाययेदेनाम्| तथा सूक्ष्मैलाकिलिमकुष्ठनागर विडङ्गपिप्पलीकालागुरुचव्यचित्रकोपकुञ्चिकाकल्कं खरवृषभस्य वा जीवतो दक्षिणं कर्णमुत्कृत्य दृषदि जर्जरीकृत्य बल्वजक्वाथादीनामाप्लावनानामन्यतमे प्रक्षिप्याप्लाव्य मुहूर्तस्थितमुद्धृत्य तदाप्लावनं पाययेदेनाम्| शतपुष्पाकुष्ठमदनहिङ्गुसिद्धस्य चैनां तैलस्य पिचुं ग्राहयेत्| अतश्चैवानुवासयेत्| एतैरेव चाप्लावनैः फलजीमूतेक्ष्वाकुधामार्गवकुटजकृतवेधनहस्तिपिप्पल्युपहितैरास्थापयेत्| तदास्थापनमस्याः सह वातमूत्रपुरीषैर्निर्हरत्यपरामासक्तां वायोरेवाप्रतिलोमगत्वात् | अपरां हि वातमूत्रपुरीषाण्यन्यानि चान्तर्बहिर्मार्गाणि सज्जन्ति||४१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 25 (42-43) · Śloka 43
তস্যাস্তু খল্বপরাযাঃ প্রপতনার্থে কর্মণি ক্রিযমাণে জাতমাত্রস্যৈব কুমারস্য কার্যাণ্যেতানি কর্মাণি ভবন্তি; তদ্যথা- অশ্মনোঃ সঙ্ঘট্টনং কর্ণযোর্মূলে, শীতোদকেনোষ্ণোদকেন বা মুখপরিষেকঃ , তথা স ক্লেশবিহতান্ প্রাণান্ পুনর্লভেত| কৃষ্ণকপালিকাশূর্পেণ চৈনমভিনিষ্পুণীযুর্যদ্যচেষ্টঃ স্যাদ্ যাবত্ প্রাণানাং প্রত্যাগমনম্ (তত্তত্ সর্বমেব কার্যম্)| ততঃ প্রত্যাগতপ্রাণং প্রকৃতিভূতমভিসমীক্ষ্য স্নানোদকগ্রহণাভ্যামুপপাদযেত্||৪২|| অথাস্য তাল্বোষ্ঠকণ্ঠজিহ্বাপ্রমার্জনমারভেতাঙ্গুল্যা সুপরিলিখিতনখযা সুপ্রক্ষালিতোপধানকার্পাসসপিচুমত্যা| প্রথমং প্রমার্জিতাস্যস্য চাস্য শিরস্তালু কার্পাসপিচুনা স্নেহগর্ভেণ প্রতিসঞ্ছাদযেত্| ততোঽস্যানন্তরং সৈন্ধবোপহিতেন সর্পিষা কার্যং প্রচ্ছর্দনম্||৪৩||
तस्यास्तु खल्वपरायाः प्रपतनार्थे कर्मणि क्रियमाणे जातमात्रस्यैव कुमारस्य कार्याण्येतानि कर्माणि भवन्ति; तद्यथा- अश्मनोः सङ्घट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतोदकेनोष्णोदकेन वा मुखपरिषेकः , तथा स क्लेशविहतान् प्राणान् पुनर्लभेत| कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनिष्पुणीयुर्यद्यचेष्टः स्याद् यावत् प्राणानां प्रत्यागमनम् (तत्तत् सर्वमेव कार्यम्)| ततः प्रत्यागतप्राणं प्रकृतिभूतमभिसमीक्ष्य स्नानोदकग्रहणाभ्यामुपपादयेत्||४२|| अथास्य ताल्वोष्ठकण्ठजिह्वाप्रमार्जनमारभेताङ्गुल्या सुपरिलिखितनखया सुप्रक्षालितोपधानकार्पाससपिचुमत्या| प्रथमं प्रमार्जितास्यस्य चास्य शिरस्तालु कार्पासपिचुना स्नेहगर्भेण प्रतिसञ्छादयेत्| ततोऽस्यानन्तरं सैन्धवोपहितेन सर्पिषा कार्यं प्रच्छर्दनम्||४३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 26 (44) · Śloka 44
ততঃ কল্পনং নাড্যাঃ| অতস্তস্যাঃ কল্পনবিধিমুপদেক্ষ্যামঃ- নাভিবন্ধনাত্ প্রভৃত্যষ্টাঙ্গুলমভিজ্ঞানং কৃত্বা ছেদনাবকাশস্য দ্বযোরন্তরযোঃ শনৈর্গৃহীত্বা তীক্ষ্ণেন রৌক্মরাজতাযসানাং ছেদনানামন্যতমেনার্ধধারেণ ছেদযেত্| তামগ্রে সূত্রেণোপনিবধ্য কণ্ঠেঽস্য শিথিলমবসৃজেত্| তস্য চেন্নাভিঃ পচ্যেত, তাং লোধ্রমধুকপ্রিযঙ্গুসুরদারুহরিদ্রাকল্কসিদ্ধেন তৈলেনাভ্যজ্যাত্, এষামেব তৈলৌষধানাং চূর্ণেনাবচূর্ণযেত্| ইতি নাডীকল্পনবিধিরুক্তঃ সম্যক্||৪৪||
ततः कल्पनं नाड्याः| अतस्तस्याः कल्पनविधिमुपदेक्ष्यामः- नाभिबन्धनात् प्रभृत्यष्टाङ्गुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्गृहीत्वा तीक्ष्णेन रौक्मराजतायसानां छेदनानामन्यतमेनार्धधारेण छेदयेत्| तामग्रे सूत्रेणोपनिबध्य कण्ठेऽस्य शिथिलमवसृजेत्| तस्य चेन्नाभिः पच्येत, तां लोध्रमधुकप्रियङ्गुसुरदारुहरिद्राकल्कसिद्धेन तैलेनाभ्यज्यात्, एषामेव तैलौषधानां चूर्णेनावचूर्णयेत्| इति नाडीकल्पनविधिरुक्तः सम्यक्||४४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 27 (45) · Śloka 45
অসম্যক্কল্পনে হি নাড্যা আযামব্যাযামোত্তুণ্ডিতা-পিণ্ডলিকা-বিনামিকা-বিজৃম্ভিকাবাধেভ্যো ভযম্| তত্রাবিদাহিভির্বাতপিত্তপ্রশমনৈরভ্যঙ্গোত্সাদনপরিষেকৈঃ সর্পির্ভিশ্চোপক্রমেত গুরুলাঘবমভিসমীক্ষ্য||৪৫||
असम्यक्कल्पने हि नाड्या आयामव्यायामोत्तुण्डिता-पिण्डलिका-विनामिका-विजृम्भिकाबाधेभ्यो भयम्| तत्राविदाहिभिर्वातपित्तप्रशमनैरभ्यङ्गोत्सादनपरिषेकैः सर्पिर्भिश्चोपक्रमेत गुरुलाघवमभिसमीक्ष्य||४५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 28 (46) · Śloka 46
অতোঽনন্তরং জাতকর্ম কুমারস্য কার্যম্| তদ্যথা- মধুসর্পিষী মন্ত্রোপমন্ত্রিতে যথাম্নাযং প্রথমং প্রাশিতুং দদ্যাত্| স্তনমত ঊর্ধ্বমেতেনৈব বিধিনা দক্ষিণং পাতুং পুরস্তাত্ প্রযচ্ছেত্| অথাতঃ শীর্ষতঃ স্থাপযেদুদকুম্ভং মন্ত্রোপমন্ত্রিতম্||৪৬||
अतोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम्| तद्यथा- मधुसर्पिषी मन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथमं प्राशितुं दद्यात्| स्तनमत ऊर्ध्वमेतेनैव विधिना दक्षिणं पातुं पुरस्तात् प्रयच्छेत्| अथातः शीर्षतः स्थापयेदुदकुम्भं मन्त्रोपमन्त्रितम्||४६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 29 (47) · Śloka 47
অথাস্য রক্ষাং বিদধ্যাত্- আদানীখদিরকর্কন্ধুপীলুপরূষকশাখাভিরস্যা গৃহং সমন্ততঃ পরিবারযেত্| সর্বতশ্চ সূতিকাগারস্য সর্ষপাতসীতণ্ডুলকণকণিকাঃ প্রকিরেযুঃ| তথা তণ্ডুলবলিহোমঃ সততমুভযকালং ক্রিযেতানামকর্মণঃ | দ্বারে চ মুসলং দেহলীমনু তিরশ্চীনং ন্যসেত্| বচাকুষ্ঠক্ষৌমকহিঙ্গুসর্ষপাতসীলশুনকণকণিকানাং রক্ষোঘ্নসমাখ্যাতানাং চৌষধীনাং পোট্টলিকাং বদ্ধ্বা সূতিকাগারস্যোত্তরদেহল্যামবসৃজেত্, তথা সূতিকাযাঃ কণ্ঠে সপুত্রাযাঃ, স্থাল্যুদককুম্ভপর্যঙ্কেষ্বপি, তথৈব চ দ্বযোর্দ্বারপক্ষযোঃ| কণককণ্টকেন্ধনবানগ্নিস্তিন্দুককাষ্ঠেন্ধনশ্চাগ্নিঃ সূতিকাগারস্যাভ্যন্তরতো নিত্যং স্যাত্| স্ত্রিযশ্চৈনাং যথোক্তগুণাঃ সুহৃদশ্চানুশ্চানুজাগৃযুর্দশাহং দ্বাদশাহং বা| অনুপরতপ্রদানমঙ্গলাশীঃস্তুতিগীতবাদিত্রমন্নপানবিশদমনুরক্তপ্রহৃষ্টজনসম্পূর্ণং চ তদ্বেশ্ম কার্যম্| ব্রাহ্মণশ্চাথর্ববেদবিত্ সততমুভযকালং শান্তিং জুহুযাত্ স্বস্ত্যযনার্থং কুমারস্য তথা সূতিকাযাঃ| ইত্যেতদ্রক্ষাবিধানমুক্তম্||৪৭||
अथास्य रक्षां विदध्यात्- आदानीखदिरकर्कन्धुपीलुपरूषकशाखाभिरस्या गृहं समन्ततः परिवारयेत्| सर्वतश्च सूतिकागारस्य सर्षपातसीतण्डुलकणकणिकाः प्रकिरेयुः| तथा तण्डुलबलिहोमः सततमुभयकालं क्रियेतानामकर्मणः | द्वारे च मुसलं देहलीमनु तिरश्चीनं न्यसेत्| वचाकुष्ठक्षौमकहिङ्गुसर्षपातसीलशुनकणकणिकानां रक्षोघ्नसमाख्यातानां चौषधीनां पोट्टलिकां बद्ध्वा सूतिकागारस्योत्तरदेहल्यामवसृजेत्, तथा सूतिकायाः कण्ठे सपुत्रायाः, स्थाल्युदककुम्भपर्यङ्केष्वपि, तथैव च द्वयोर्द्वारपक्षयोः| कणककण्टकेन्धनवानग्निस्तिन्दुककाष्ठेन्धनश्चाग्निः सूतिकागारस्याभ्यन्तरतो नित्यं स्यात्| स्त्रियश्चैनां यथोक्तगुणाः सुहृदश्चानुश्चानुजागृयुर्दशाहं द्वादशाहं वा| अनुपरतप्रदानमङ्गलाशीःस्तुतिगीतवादित्रमन्नपानविशदमनुरक्तप्रहृष्टजनसम्पूर्णं च तद्वेश्म कार्यम्| ब्राह्मणश्चाथर्ववेदवित् सततमुभयकालं शान्तिं जुहुयात् स्वस्त्ययनार्थं कुमारस्य तथा सूतिकायाः| इत्येतद्रक्षाविधानमुक्तम्||४७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 30 (48) · Śloka 48
সূতিকাং তু খলু বুভুক্ষিতাং বিদিত্বা স্নেহং পাযযেত পরমযা শক্ত্যা সর্পিস্তৈলং বসাং মজ্জানং বা সাত্ম্যীভাবমভিসমীক্ষ্য পিপ্পলীপিপ্পলীমূলচব্যচিত্রকশৃঙ্গবেরচূর্ণসহিতম্| স্নেহং পীতবত্যাশ্চ সর্পিস্তৈলাভ্যামভ্যজ্য বেষ্টযেদুদরং মহতাঽচ্ছেন বাসসা; তথা তস্যা ন বাযুরুদরে বিকৃতিমুত্পাদযত্যনবকাশত্বাত্| জীর্ণে তু স্নেহে পিপ্পল্যাদিভিরেব সিদ্ধাং যবাগূং সুস্নিগ্ধাং দ্রবাং মাত্রশঃ পাযযেত্| উভযতঃকালং চোষ্ণোদকেন চ পরিষেচযেত্ প্রাক্ স্নেহযবাগূপানাভ্যাম্| এবং পঞ্চরাত্রং সপ্তরাত্রং বাঽনুপাল্য ক্রমেণাপ্যাযযেত্| স্বস্থবৃত্তমেতাবত্ সূতিকাযাঃ||৪৮||
सूतिकां तु खलु बुभुक्षितां विदित्वा स्नेहं पाययेत परमया शक्त्या सर्पिस्तैलं वसां मज्जानं वा सात्म्यीभावमभिसमीक्ष्य पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकशृङ्गवेरचूर्णसहितम्| स्नेहं पीतवत्याश्च सर्पिस्तैलाभ्यामभ्यज्य वेष्टयेदुदरं महताऽच्छेन वाससा; तथा तस्या न वायुरुदरे विकृतिमुत्पादयत्यनवकाशत्वात्| जीर्णे तु स्नेहे पिप्पल्यादिभिरेव सिद्धां यवागूं सुस्निग्धां द्रवां मात्रशः पाययेत्| उभयतःकालं चोष्णोदकेन च परिषेचयेत् प्राक् स्नेहयवागूपानाभ्याम्| एवं पञ्चरात्रं सप्तरात्रं वाऽनुपाल्य क्रमेणाप्याययेत्| स्वस्थवृत्तमेतावत् सूतिकायाः||४८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 31 (49) · Śloka 49
তস্যাস্তু খলু যো ব্যাধিরুত্পদ্যতে স কৃচ্ছ্রসাধ্যো ভবত্যসাধ্যো বা, গর্ভবৃদ্ধিক্ষযিতশিথিলসর্বধাতুত্বাত্, প্রবাহণবেদনাক্লেদনরক্তনিঃস্রুতিবিশেষশূন্যশরীরত্বাচ্চ; তস্মাত্তাং যথোক্তেন বিধিনোপচরেত্; ভৌতিকজীবনীযবৃংহণীযমধুরবাতহরসিদ্ধৈরভ্যঙ্গোত্সাদনপরিষেকাবগাহনান্নপানবিধিভির্বিশেষতশ্চোপচরেত্; বিশেষতো হি শূন্যশরীরাঃ স্ত্রিযঃ প্রজাতা ভবন্তি||৪৯||
तस्यास्तु खलु यो व्याधिरुत्पद्यते स कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वा, गर्भवृद्धिक्षयितशिथिलसर्वधातुत्वात्, प्रवाहणवेदनाक्लेदनरक्तनिःस्रुतिविशेषशून्यशरीरत्वाच्च; तस्मात्तां यथोक्तेन विधिनोपचरेत्; भौतिकजीवनीयबृंहणीयमधुरवातहरसिद्धैरभ्यङ्गोत्सादनपरिषेकावगाहनान्नपानविधिभिर्विशेषतश्चोपचरेत्; विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति||४९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 32 (50) · Śloka 50
দশমে ত্বহনি সপুত্রা স্ত্রী সর্বগন্ধৌষধৈর্গৌরসর্ষপলোধ্রৈশ্চ স্নাতা লঘ্বহতশুচিবস্ত্রং পরিধায পবিত্রেষ্টলঘুবিচিত্রভূষণবতী চ সংস্পৃশ্য মঙ্গলান্যুচিতামর্চযিত্বা চ দেবতাং শিখিনঃ শুক্লবাসসোঽব্যঙ্গাংশ্চ ব্রাহ্মণান্ স্বস্তি বাচযিত্বা কুমারমহতানাং চ বাসসাং সঞ্চযে প্রাক্শিরসমুদক্শিরসং বা সংবেশ্য দেবতাপূর্বং দ্বিজাতিভ্যঃ প্রণমতীত্যুক্ত্বা কুমারস্য পিতা দ্বে নামনী কারযেন্নাক্ষত্রিকং নামাভিপ্রাযিকং চ| তত্রাভিপ্রাযিকং ঘোষবদাদ্যন্তস্থান্তমূষ্মান্তং বাঽবৃদ্ধং ত্রিপুরুষানূকমনবপ্রতিষ্ঠিতং, নাক্ষাত্রিকং তু নক্ষত্রদেবতাসমানাখ্যং দ্ব্যক্ষরং চতুরক্ষরং বা||৫০||
दशमे त्वहनि सपुत्रा स्त्री सर्वगन्धौषधैर्गौरसर्षपलोध्रैश्च स्नाता लघ्वहतशुचिवस्त्रं परिधाय पवित्रेष्टलघुविचित्रभूषणवती च संस्पृश्य मङ्गलान्युचितामर्चयित्वा च देवतां शिखिनः शुक्लवाससोऽव्यङ्गांश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा कुमारमहतानां च वाससां सञ्चये प्राक्शिरसमुदक्शिरसं वा संवेश्य देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमतीत्युक्त्वा कुमारस्य पिता द्वे नामनी कारयेन्नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं च| तत्राभिप्रायिकं घोषवदाद्यन्तस्थान्तमूष्मान्तं वाऽवृद्धं त्रिपुरुषानूकमनवप्रतिष्ठितं, नाक्षात्रिकं तु नक्षत्रदेवतासमानाख्यं द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा||५०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 33 (51) · Śloka 51
বৃত্তে চ নামকর্মণি কুমারং পরীক্ষিতুমুপক্রমেতাযুষঃ প্রমাণজ্ঞানহেতোঃ| তত্রেমান্যাযুষ্মতাং কুমারাণাং লক্ষণানি ভবন্তি| তদ্যথা- একৈকজা মৃদবোঽল্পাঃ স্নিগ্ধাঃ সুবদ্ধমূলাঃ কৃষ্ণাঃ কেশাঃ প্রশস্যন্তে, স্থিরা বহলা ত্বক্, প্রকৃত্যাঽতিসম্পন্নমীষত্প্রমাণাতিবৃত্তমনুরূপমাতপত্রোপমং শিরঃ, ব্যূঢং দৃঢং সমং সুশ্লিষ্টশঙ্খসন্ধ্যূর্ধ্বব্যঞ্জনসম্পন্নমুপচিতং বলিভমর্ধচন্দ্রাকৃতি ললাটং, বহলৌ বিপুলসমপীঠৌ সমৌ নীচৈর্বৃদ্ধৌ পৃষ্ঠতোঽবনতৌ সুশ্লিষ্টকর্ণপুত্রকৌ মহাচ্ছিদ্রৌ কর্ণৌ, ঈষত্প্রলম্বিন্যাবসঙ্গতে সমে সংহতে মহত্যৌ ভ্রুবৌ, সমে সমাহিতদর্শনে ব্যক্তভাগবিভাগে বলবতী তেজসোপপন্নে স্বঙ্গাপাঙ্গে চক্ষুষী, ঋজ্বী মহোচ্ছ্বাসা বংশসম্পন্নেষদবনতাগ্রা নাসিকা, মহদৃজুসুনিবিষ্টদন্তমাস্যম্, আযামবিস্তারোপপন্না শ্লক্ষ্ণা তন্বী প্রকৃতিবর্ণযুক্তা জিহ্বা, শ্লক্ষ্ণং যুক্তোপচযমূষ্মোপপন্নং রক্তং তালু, মহানদীনঃ স্নিগ্ধোঽনুনাদী গম্ভীরসমুত্থো ধীরঃ স্বরঃ, নাতিস্থূলৌ নাতিকৃশৌ বিস্তারোপপন্নাবাস্যপ্রচ্ছাদনৌ রক্তাবোষ্ঠৌ, মহত্যৌ হনূ, বৃত্তা নাতিমহতী গ্রীবা, ব্যূঢমুপচিতমুরঃ, গূঢং জত্রু পৃষ্ঠবংশশ্চ, বিপ্রকৃষ্টান্তরৌ স্তনৌ, অসম্পাতিনী স্থিরে পার্শ্বে, বৃত্তপরিপূর্ণাযতৌ বাহূ সক্থিনী অঙ্গুলযশ্চ, মহদুপচিতং পাণিপাদং, স্থিরা বৃত্তাঃ স্নিগ্ধাস্তাম্রাস্তুঙ্গাঃ কূর্মাকারাঃ করজাঃ, প্রদক্ষিণাবর্তা সোত্সঙ্গা চ নাভিঃ, উরস্ত্রিভাগহীনা সমা সমুপচিতমাংসা কটী, বৃত্তৌ স্থিরোপচিতমাংসৌ নাত্যুন্নতৌ নাত্যবনতৌ স্ফিচৌ, অনুপূর্বং বৃত্তাবুপচযযুক্তাবূরূ, নাত্যুপচিতে নাত্যপচিতে এণীপদে প্রগূঢসিরাস্থিসন্ধী জঙ্ঘে, নাত্যুপচিতৌ নাত্যপচিতৌ গুল্ফৌ, পূর্বোপদিষ্টগুণৌ পাদৌ কূর্মাকারৌ, প্রকৃতিযুক্তানি বাতমূত্রপুরীষগুহ্যানি তথা স্বপ্রজাগরণাযাসস্মিতরুদিতস্তনগ্রহণানি, যচ্চ কিঞ্চিদন্যদপ্যনুক্তমস্তি তদপি সর্বং প্রকৃতিসম্পন্নমিষ্টং, বিপরীতং পুনরনিষ্টম্| ইতি দীর্ঘাযুর্লক্ষণানি||৫১||
वृत्ते च नामकर्मणि कुमारं परीक्षितुमुपक्रमेतायुषः प्रमाणज्ञानहेतोः| तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति| तद्यथा- एकैकजा मृदवोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला त्वक्, प्रकृत्याऽतिसम्पन्नमीषत्प्रमाणातिवृत्तमनुरूपमातपत्रोपमं शिरः, व्यूढं दृढं समं सुश्लिष्टशङ्खसन्ध्यूर्ध्वव्यञ्जनसम्पन्नमुपचितं वलिभमर्धचन्द्राकृति ललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ समौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽवनतौ सुश्लिष्टकर्णपुत्रकौ महाच्छिद्रौ कर्णौ, ईषत्प्रलम्बिन्यावसङ्गते समे संहते महत्यौ भ्रुवौ, समे समाहितदर्शने व्यक्तभागविभागे बलवती तेजसोपपन्ने स्वङ्गापाङ्गे चक्षुषी, ऋज्वी महोच्छ्वासा वंशसम्पन्नेषदवनताग्रा नासिका, महदृजुसुनिविष्टदन्तमास्यम्, आयामविस्तारोपपन्ना श्लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, श्लक्ष्णं युक्तोपचयमूष्मोपपन्नं रक्तं तालु, महानदीनः स्निग्धोऽनुनादी गम्भीरसमुत्थो धीरः स्वरः, नातिस्थूलौ नातिकृशौ विस्तारोपपन्नावास्यप्रच्छादनौ रक्तावोष्ठौ, महत्यौ हनू, वृत्ता नातिमहती ग्रीवा, व्यूढमुपचितमुरः, गूढं जत्रु पृष्ठवंशश्च, विप्रकृष्टान्तरौ स्तनौ, असम्पातिनी स्थिरे पार्श्वे, वृत्तपरिपूर्णायतौ बाहू सक्थिनी अङ्गुलयश्च, महदुपचितं पाणिपादं, स्थिरा वृत्ताः स्निग्धास्ताम्रास्तुङ्गाः कूर्माकाराः करजाः, प्रदक्षिणावर्ता सोत्सङ्गा च नाभिः, उरस्त्रिभागहीना समा समुपचितमांसा कटी, वृत्तौ स्थिरोपचितमांसौ नात्युन्नतौ नात्यवनतौ स्फिचौ, अनुपूर्वं वृत्तावुपचययुक्तावूरू, नात्युपचिते नात्यपचिते एणीपदे प्रगूढसिरास्थिसन्धी जङ्घे, नात्युपचितौ नात्यपचितौ गुल्फौ, पूर्वोपदिष्टगुणौ पादौ कूर्माकारौ, प्रकृतियुक्तानि वातमूत्रपुरीषगुह्यानि तथा स्वप्रजागरणायासस्मितरुदितस्तनग्रहणानि, यच्च किञ्चिदन्यदप्यनुक्तमस्ति तदपि सर्वं प्रकृतिसम्पन्नमिष्टं, विपरीतं पुनरनिष्टम्| इति दीर्घायुर्लक्षणानि||५१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 34 (52) · Śloka 52
অতো ধাত্রীপরীক্ষামুপদেক্ষ্যামঃ| অথ ব্রূযাত্- ধাত্রীমানয সমানবর্ণাং যৌবনস্থাং নিভৃতামনাতুরামব্যঙ্গামব্যসনামবিরূপামজুগুপ্সিতাং দেশজাতীযামক্ষুদ্রামক্ষুদ্রকর্মিণীং কুলে জাতাং বত্সলামরোগাং জীবদ্বত্সাং পুংবত্সাং দোগ্ধ্রীমপ্রমত্তামনুচ্চারশাযিনীমনন্ত্যাবসাযিনীং কুশলোপচারাং শুচিমশুচিদ্বেষিণীং স্তনস্তন্যসম্পদুপেতামিতি||৫২||
अतो धात्रीपरीक्षामुपदेक्ष्यामः| अथ ब्रूयात्- धात्रीमानय समानवर्णां यौवनस्थां निभृतामनातुरामव्यङ्गामव्यसनामविरूपामजुगुप्सितां देशजातीयामक्षुद्रामक्षुद्रकर्मिणीं कुले जातां वत्सलामरोगां जीवद्वत्सां पुंवत्सां दोग्ध्रीमप्रमत्तामनुच्चारशायिनीमनन्त्यावसायिनीं कुशलोपचारां शुचिमशुचिद्वेषिणीं स्तनस्तन्यसम्पदुपेतामिति||५२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 35 (53) · Śloka 53
তত্রেযং স্তনসম্পত্- নাত্যূর্ধ্বৌ নাতিলম্বাবনতিকৃশাবনতিপীনৌ যুক্তপিপ্পলকৌ সুখপ্রপানৌ চেতি (স্তনসম্পত্)||৫৩||
तत्रेयं स्तनसम्पत्- नात्यूर्ध्वौ नातिलम्बावनतिकृशावनतिपीनौ युक्तपिप्पलकौ सुखप्रपानौ चेति (स्तनसम्पत्)||५३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 36 (54-55) · Śloka 55
স্তন্যসম্পত্তু প্রকৃতিবর্ণগন্ধরসস্পর্শম্, উদপাত্রে চ দুহ্যমানমুদকং ব্যেতি প্রকৃতিভূতত্বাত্; তত্ পুষ্টিকরমারোগ্যকরং চেতি (স্তন্যসম্পত্)||৫৪|| অতোঽন্যথা ব্যাপন্নং জ্ঞেযম্| তস্য বিশেষাঃ- শ্যাবারুণবর্ণং কষাযানুরসং বিশদমনালক্ষ্যগন্ধং রূক্ষং দ্রবং ফেনিলং লঘ্বতৃপ্তিকরং কর্শনং বাতবিকারাণাং কর্তৃ বাতোপসৃষ্টং ক্ষীরমভিজ্ঞেযং ; কৃষ্ণনীলপীততাম্রাবভাসং তিক্তাম্লকটুকানুরসং কুণপরুধিরগন্ধি ভৃশোষ্ণং পিত্তবিকারাণাং কর্তৃ চ পিত্তোপসৃষ্টং ক্ষীরমভিজ্ঞেযম্, অত্যর্থশুক্লমতিমাধুর্যোপপন্নং লবণানুরসং ঘৃততৈলবসামজ্জগন্ধি পিচ্ছিলং তন্তুমদুকপাত্রেঽবসীদছ্লেষ্মবিকারাণাং কর্তৃ শ্লেষ্মোপসৃষ্টং ক্ষীরমভিজ্ঞেযম্||৫৫||
स्तन्यसम्पत्तु प्रकृतिवर्णगन्धरसस्पर्शम्, उदपात्रे च दुह्यमानमुदकं व्येति प्रकृतिभूतत्वात्; तत् पुष्टिकरमारोग्यकरं चेति (स्तन्यसम्पत्)||५४|| अतोऽन्यथा व्यापन्नं ज्ञेयम्| तस्य विशेषाः- श्यावारुणवर्णं कषायानुरसं विशदमनालक्ष्यगन्धं रूक्षं द्रवं फेनिलं लघ्वतृप्तिकरं कर्शनं वातविकाराणां कर्तृ वातोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयं ; कृष्णनीलपीतताम्रावभासं तिक्ताम्लकटुकानुरसं कुणपरुधिरगन्धि भृशोष्णं पित्तविकाराणां कर्तृ च पित्तोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम्, अत्यर्थशुक्लमतिमाधुर्योपपन्नं लवणानुरसं घृततैलवसामज्जगन्धि पिच्छिलं तन्तुमदुकपात्रेऽवसीदछ्लेष्मविकाराणां कर्तृ श्लेष्मोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम्||५५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 37 (56) · Śloka 56
তেষাং তু ত্রযাণামপি ক্ষীরদোষাণাং প্রতিবিশেষমভিসমীক্ষ্য যথাস্বং যথাদোষং চ বমনবিরেচনাস্থাপনানুবাসনানি বিভজ্য কৃতানি প্রশমনায ভবন্তি| পানাশনবিধিস্তু দুষ্টক্ষীরাযা যবগোধূমশালিষষ্টিকমুদ্গহরেণুককুলত্থসুরাসৌবীরকমৈরেযমেদকলশুনকরঞ্জপ্রাযঃ স্যাত্| ক্ষীরদোষবিশেষাংশ্চাবেক্ষ্যাবেক্ষ্য তত্তদ্বিধানং কার্যং স্যাত্| পাঠামহৌষধসুরদারুমুস্তমূর্বাগুডূচীবত্সকফলকিরাততিক্তককটুকরোহিণীসারিবাকষাযাণাং চ পানং প্রশস্যতে, তথাঽন্যেষাং তিক্তকষাযকটুকমধুরাণাং দ্রব্যাণাং প্রযোগঃ ক্ষীরবিকারবিশেষানভিসমীক্ষ্য মাত্রাং কালং চ| ইতি ক্ষীরবিশোধনানি||৫৬||
तेषां तु त्रयाणामपि क्षीरदोषाणां प्रतिविशेषमभिसमीक्ष्य यथास्वं यथादोषं च वमनविरेचनास्थापनानुवासनानि विभज्य कृतानि प्रशमनाय भवन्ति| पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यवगोधूमशालिषष्टिकमुद्गहरेणुककुलत्थसुरासौवीरकमैरेयमेदकलशुनकरञ्जप्रायः स्यात्| क्षीरदोषविशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात्| पाठामहौषधसुरदारुमुस्तमूर्वागुडूचीवत्सकफलकिराततिक्तककटुकरोहिणीसारिवाकषायाणां च पानं प्रशस्यते, तथाऽन्येषां तिक्तकषायकटुकमधुराणां द्रव्याणां प्रयोगः क्षीरविकारविशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां कालं च| इति क्षीरविशोधनानि||५६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 38 (57) · Śloka 57
ক্ষীরজননানি তু মদ্যানি সীধুবর্জ্যানি, গ্রাম্যানূপৌদকানি চ শাকধান্যমাংসানি, দ্রবমধুরাম্ললবণভূযিষ্ঠাশ্চাহারাঃ, ক্ষীরিণ্যশ্চৌষধযঃ, ক্ষীরপানমনাযাসশ্চ, বীরণষষ্টিকশালীক্ষুবালিকাদর্ভকুশকাশগুন্দ্রেত্কটমূলকষাযাণাং চ পানমিতি (ক্ষীরজননানি)||৫৭||
क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि, ग्राम्यानूपौदकानि च शाकधान्यमांसानि, द्रवमधुराम्ललवणभूयिष्ठाश्चाहाराः, क्षीरिण्यश्चौषधयः, क्षीरपानमनायासश्च, वीरणषष्टिकशालीक्षुवालिकादर्भकुशकाशगुन्द्रेत्कटमूलकषायाणां च पानमिति (क्षीरजननानि)||५७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 39 (58) · Śloka 58
ধাত্রী তু যদা স্বাদুবহুলশুদ্ধদুগ্ধা স্যাত্তদাস্নাতানুলিপ্তা শুক্লবস্ত্রং পরিধাযৈন্দ্রীং ব্রাহ্মীং শতবীর্যাং সহস্রবীর্যামমোঘামব্যথাং শিবামরিষ্টাং বাট্যপুষ্পীং বিষ্বক্সেনকান্তাং বা বিভ্রত্যোষধিং কুমারং প্রাঙ্মুখং প্রথমং দক্ষিণং স্তনং পাযযেত্| ইতি ধাত্রীকর্ম||৫৮||
धात्री तु यदा स्वादुबहुलशुद्धदुग्धा स्यात्तदास्नातानुलिप्ता शुक्लवस्त्रं परिधायैन्द्रीं ब्राह्मीं शतवीर्यां सहस्रवीर्याममोघामव्यथां शिवामरिष्टां वाट्यपुष्पीं विष्वक्सेनकान्तां वा बिभ्रत्योषधिं कुमारं प्राङ्मुखं प्रथमं दक्षिणं स्तनं पाययेत्| इति धात्रीकर्म||५८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 40 (59-60) · Śloka 60
অতোঽনন্তরং কুমারাগারবিধিমনুব্যাখ্যাস্যামঃ- বাস্তুবিদ্যাকুশলঃ প্রশস্তং রম্যমতমস্কং নিবাতং প্রবাতৈকদেশং দৃঢমপগতশ্বাপদপশুদংষ্ট্রিমূষিকপতঙ্গং সুবিভক্তসলিলোলূখলমূত্রবর্চঃস্থানস্নানভূমিমহানসমৃতুসুখং যথর্তুশযনাসনাস্তরণসম্পন্নং কুর্যাত্; তথা সুবিহিতরক্ষাবিধানবলিমঙ্গলহোমপ্রাযশ্চিত্তং শুচিবৃদ্ধবৈদ্যানুরক্তজনসম্পূর্ণম্| ইতি কুমারাগারবিধিঃ||৫৯|| শযনাসনাস্তরণপ্রাবরণানি কুমারস্য মৃদুলঘুশুচিসুগন্ধীনি স্যুঃ; স্বেদমলজন্তুমন্তি মূত্রপুরীষোপসৃষ্টানি চ বর্জ্যানি স্যুঃ; অসতি সম্ভবেঽন্যেষাং তান্যেব চ সুপ্রক্ষালিতোপধানানি সুধূপিতানি শুদ্ধশুষ্কাণ্যুপযোগং গচ্ছেযুঃ||৬০||
अतोऽनन्तरं कुमारागारविधिमनुव्याख्यास्यामः- वास्तुविद्याकुशलः प्रशस्तं रम्यमतमस्कं निवातं प्रवातैकदेशं दृढमपगतश्वापदपशुदंष्ट्रिमूषिकपतङ्गं सुविभक्तसलिलोलूखलमूत्रवर्चःस्थानस्नानभूमिमहानसमृतुसुखं यथर्तुशयनासनास्तरणसम्पन्नं कुर्यात्; तथा सुविहितरक्षाविधानबलिमङ्गलहोमप्रायश्चित्तं शुचिवृद्धवैद्यानुरक्तजनसम्पूर्णम्| इति कुमारागारविधिः||५९|| शयनासनास्तरणप्रावरणानि कुमारस्य मृदुलघुशुचिसुगन्धीनि स्युः; स्वेदमलजन्तुमन्ति मूत्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः; असति सम्भवेऽन्येषां तान्येव च सुप्रक्षालितोपधानानि सुधूपितानि शुद्धशुष्काण्युपयोगं गच्छेयुः||६०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 41 (61) · Śloka 61
ধূপনানি পুনর্বাসসাং শযনাস্তরণপ্রাবরণানাং চ যবসর্ষপাতসীহিঙ্গুগুগ্গুলুবচাচোরকবযঃস্থাগোলোমীজটিলাপলঙ্কষাশোকরোহিণীসর্পনির্মোকাণি ঘৃতযুক্তানি স্যুঃ||৬১||
धूपनानि पुनर्वाससां शयनास्तरणप्रावरणानां च यवसर्षपातसीहिङ्गुगुग्गुलुवचाचोरकवयःस्थागोलोमीजटिलापलङ्कषाशोकरोहिणीसर्पनिर्मोकाणि घृतयुक्तानि स्युः||६१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 42 (62) · Śloka 62
মণযশ্চ ধারণীযাঃ কুমারস্য খড্গরুরুগবযবৃষভাণাং জীবতামেব দক্ষিণেভ্যো বিষাণেভ্যোঽগ্রাণি গৃহীতানি স্যুঃ; ঐন্দ্র্যাদ্যাশ্চৌষধযো জীবকর্ষভকৌ চ, যানি চান্যান্যপি ব্রাহ্মণাঃ প্রশংসেযুরথর্ববেদবিদঃ||৬২||
मणयश्च धारणीयाः कुमारस्य खड्गरुरुगवयवृषभाणां जीवतामेव दक्षिणेभ्यो विषाणेभ्योऽग्राणि गृहीतानि स्युः; ऐन्द्र्याद्याश्चौषधयो जीवकर्षभकौ च, यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः प्रशंसेयुरथर्ववेदविदः||६२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 43 (63-66) · Śloka 66
ক্রীডনকানি খলু কুমারস্য বিচিত্রাণি ঘোষবন্ত্যভিরামাণি চাগুরূণি চাতীক্ষ্ণাগ্রাণি চানাস্য প্রবেশীনি চাপ্রাণহরাণি চাবিত্রাসনানি স্যুঃ||৬৩|| ন হ্যস্য বিত্রাসনং সাধু| তস্মাত্তস্মিন্ রুদত্যভুঞ্জানে বাঽন্যত্র বিধেযতামগচ্ছতি রাক্ষসপিশাচপূতনাদ্যানাং নামান্যাহ্বযতা কুমারস্য বিত্রাসনার্থং নামগ্রহণং ন কার্যং স্যাত্||৬৪|| যদি ত্বাতুর্যং কিঞ্চিত্ কুমারমাগচ্ছেত্ তত্ প্রকৃতিনিমিত্তপূর্বরূপলিঙ্গোপশযবিশেষৈস্তত্ত্বতোঽনুবুধ্য সর্ববিশেষানাতুরৌষধদেশকালাশ্রযানবেক্ষমাণশ্চিকিত্সিতুমারভেতৈনং মধুরমৃদুলঘুসুরভিশীতশঙ্করং কর্ম প্রবর্তযন্| এবংসাত্ম্যা হি কুমারা ভবন্তি| তথা তে শর্ম লভন্তে চিরায| অরোগে ত্বরোগবৃত্তমাতিষ্ঠেদ্দেশকালাত্মগুণবিপর্যযেণ বর্তমানঃ, ক্রমেণাসাত্ম্যানি পরিবর্ত্যোপযুঞ্জানঃ সর্বাণ্যহিতানি বর্জযেত্| তথা বলবর্ণশরীরাযুষাং সম্পদমবাপ্নোতীতি||৬৫|| এবমেনং কুমারমাযৌবনপ্রাপ্তের্ধর্মার্থকৌশলাগমনাচ্চানুপালযেত্||৬৬||
क्रीडनकानि खलु कुमारस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाणि चागुरूणि चातीक्ष्णाग्राणि चानास्य प्रवेशीनि चाप्राणहराणि चावित्रासनानि स्युः||६३|| न ह्यस्य वित्रासनं साधु| तस्मात्तस्मिन् रुदत्यभुञ्जाने वाऽन्यत्र विधेयतामगच्छति राक्षसपिशाचपूतनाद्यानां नामान्याह्वयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात्||६४|| यदि त्वातुर्यं किञ्चित् कुमारमागच्छेत् तत् प्रकृतिनिमित्तपूर्वरूपलिङ्गोपशयविशेषैस्तत्त्वतोऽनुबुध्य सर्वविशेषानातुरौषधदेशकालाश्रयानवेक्षमाणश्चिकित्सितुमारभेतैनं मधुरमृदुलघुसुरभिशीतशङ्करं कर्म प्रवर्तयन्| एवंसात्म्या हि कुमारा भवन्ति| तथा ते शर्म लभन्ते चिराय| अरोगे त्वरोगवृत्तमातिष्ठेद्देशकालात्मगुणविपर्ययेण वर्तमानः, क्रमेणासात्म्यानि परिवर्त्योपयुञ्जानः सर्वाण्यहितानि वर्जयेत्| तथा बलवर्णशरीरायुषां सम्पदमवाप्नोतीति||६५|| एवमेनं कुमारमायौवनप्राप्तेर्धर्मार्थकौशलागमनाच्चानुपालयेत्||६६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 44 (67-69) · Śloka 69
ইতি পুত্রাশিষাং সমৃদ্ধিকরং কর্ম ব্যাখ্যাতম্| তদাচরন্ যথোক্তৈর্বিধিভিঃ পূজাং যথেষ্টং লভতেঽনসূযক ইতি||৬৭|| তত্র শ্লোকৌ- পুত্রাশিষাং কর্ম সমৃদ্ধিকারকং যদুক্তমেতন্মহদর্থসংহিতম্| তদাচরন্ জ্ঞো বিধিভির্যথাতথং পূজাং যথেষ্টং লভতেঽনসূযকঃ||৬৮|| শরীরং চিন্ত্যতে সর্বং দৈবমানুষসম্পদা| সর্বভাবৈর্যতস্তস্মাচ্ছারীরং স্থানমুচ্যতে||৬৯||
इति पुत्राशिषां समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातम्| तदाचरन् यथोक्तैर्विधिभिः पूजां यथेष्टं लभतेऽनसूयक इति||६७|| तत्र श्लोकौ- पुत्राशिषां कर्म समृद्धिकारकं यदुक्तमेतन्महदर्थसंहितम्| तदाचरन् ज्ञो विधिभिर्यथातथं पूजां यथेष्टं लभतेऽनसूयकः||६८|| शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसम्पदा| सर्वभावैर्यतस्तस्माच्छारीरं स्थानमुच्यते||६९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana puShpikA · Śloka 8
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানে জাতিসূত্রীযং শারীরং নামাষ্টমোঽধ্যাযঃ||৮|| ইতি চরকসংহিতাযাং চথুর্থং শারীরস্থানং সম্পূর্ণম্|
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने जातिसूत्रीयं शारीरं नामाष्टमोऽध्यायः||८|| इति चरकसंहितायां चथुर्थं शारीरस्थानं सम्पूर्णम्|
🔊 Audio coming soon