Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতঃ শরীরসঙ্খ্যাশারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১||
ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
শরীরসঙ্খ্যামবযবশঃ কৃত্স্নং শরীরং প্রবিভজ্য সর্বশরীরসঙ্খ্যানপ্রমাণজ্ঞানহেতোর্ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশঃ পপ্রচ্ছ||৩||
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अथातः शरीरसङ्ख्याशारीरं व्याख्यास्यामः||१||
इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
शरीरसङ्ख्यामवयवशः कृत्स्नं शरीरं प्रविभज्य सर्वशरीरसङ्ख्यानप्रमाणज्ञानहेतोर्भगवन्तमात्रेयमग्निवेशः पप्रच्छ||३||
Adhikarana 2 (4) · Śloka 4
তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- শৃণু মত্তোঽগ্নিবেশ! সর্বশরীরমাচক্ষাণস্য যথা প্রশ্নমেকমনা যথাবত্|
শরীরে ষট্ ত্বচঃ; তদ্যথা- উদকধরা ত্বগ্বাহ্যা, দ্বিতীযা ত্বসৃগ্ধরা, তৃতীযা সিধ্মকিলাসসম্ভবাধিষ্ঠানা, চতুর্থী দদ্রূকুষ্ঠসম্ভবাধিষ্ঠানা, পঞ্চমী ত্বলজীবিদ্রধিসম্ভবাধিষ্ঠানা, ষষ্ঠী তু যস্যাং ছিন্নাযাং তাম্যত্যন্ধ ইব চ তমঃ প্রবিশতি যাং চাপ্যধিষ্ঠাযারূংষি জাযন্তে পর্বসু কৃষ্ণরক্তানি স্থূলমূলানি দুশ্চিকিত্স্যতমানি চ; ইতি ষট্ ত্বচঃ|
এতাঃ ষডঙ্গং শরীরমবতত্য তিষ্ঠন্তি||৪||
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तमुवाच भगवानात्रेयः- शृणु मत्तोऽग्निवेश! सर्वशरीरमाचक्षाणस्य यथा प्रश्नमेकमना यथावत्|
शरीरे षट् त्वचः; तद्यथा- उदकधरा त्वग्बाह्या, द्वितीया त्वसृग्धरा, तृतीया सिध्मकिलाससम्भवाधिष्ठाना, चतुर्थी दद्रूकुष्ठसम्भवाधिष्ठाना, पञ्चमी त्वलजीविद्रधिसम्भवाधिष्ठाना, षष्ठी तु यस्यां छिन्नायां ताम्यत्यन्ध इव च तमः प्रविशति यां चाप्यधिष्ठायारूंषि जायन्ते पर्वसु कृष्णरक्तानि स्थूलमूलानि दुश्चिकित्स्यतमानि च; इति षट् त्वचः|
एताः षडङ्गं शरीरमवतत्य तिष्ठन्ति||४||
Adhikarana 3 (5) · Śloka 5
তত্রাযং শরীরস্যাঙ্গবিভাগঃ; তদ্যথা- দ্বৌ বাহূ, দ্বে সক্থিনী, শিরোগ্রীবম্, অন্তরাধিঃ, ইতি ষডঙ্গমঙ্গম্||৫||
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तत्रायं शरीरस्याङ्गविभागः; तद्यथा- द्वौ बाहू, द्वे सक्थिनी, शिरोग्रीवम्, अन्तराधिः, इति षडङ्गमङ्गम्||५||
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
ত্রীণি সষষ্টীনি শতান্যস্থ্নাং সহ দন্তোলূখলনখেন |
তদ্যথা- দ্বাত্রিংশদ্দন্তাঃ, দ্বাত্রিংশদ্দন্তোলূখলানি, বিংশতির্নখাঃ, ষষ্টিঃ পাণিপাদাঙ্গুল্যস্থীনি, বিংশতিঃ পাণিপাদশলাকাঃ, চত্বারি পাণিপাদশলাকাধিষ্ঠানানি, দ্বে পার্ষ্ণ্যোরস্থিনী, চত্বারঃ পাদযোর্গুল্ফাঃ, দ্বৌ মণিকৌ হস্তযোঃ, চত্বার্যরত্ন্যোরস্থীনি, চত্বারি জঙ্ঘযোঃ, দ্বে জানুনী, দ্বে জানুকপালিকে, দ্বাবূরুনলকৌ, দ্বৌ বাহুনলকৌ, দ্বাবংসৌ, দ্বে অংসফলকে, দ্বাবক্ষকৌ, একং জত্রু, দ্বে তালুকে, দ্বে শ্রোণিফলকে, একং ভগাস্থি, পঞ্চচত্বারিংশত্ পৃষ্ঠগতান্যস্থীনি, পঞ্চদশ গ্রীবাযাং, চতুর্দশোরসি, দ্বযোঃ পার্শ্বযোশ্চতুর্বিংশতিঃ পর্শুকাঃ, তাবন্তি স্থালকানি, তাবন্তি চৈব স্থালকার্বুদানি, একং হন্বস্থি, দ্বে হনুমূলবন্ধনে, একাস্থি নাসিকাগণ্ডকূটললাটং, দ্বৌ শঙ্খৌ, চত্বারি শিরঃকপালানীতি; এবং ত্রীণি সষষ্টীনি শতান্যস্থ্নাং সহ দন্তোলূখলনখেনেতি||৬||
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त्रीणि सषष्टीनि शतान्यस्थ्नां सह दन्तोलूखलनखेन |
तद्यथा- द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, षष्टिः पाणिपादाङ्गुल्यस्थीनि, विंशतिः पाणिपादशलाकाः, चत्वारि पाणिपादशलाकाधिष्ठानानि, द्वे पार्ष्ण्योरस्थिनी, चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, द्वौ मणिकौ हस्तयोः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयोः, द्वे जानुनी, द्वे जानुकपालिके, द्वावूरुनलकौ, द्वौ बाहुनलकौ, द्वावंसौ, द्वे अंसफलके, द्वावक्षकौ, एकं जत्रु, द्वे तालुके, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पञ्चचत्वारिंशत् पृष्ठगतान्यस्थीनि, पञ्चदश ग्रीवायां, चतुर्दशोरसि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विंशतिः पर्शुकाः, तावन्ति स्थालकानि, तावन्ति चैव स्थालकार्बुदानि, एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, एकास्थि नासिकागण्डकूटललाटं, द्वौ शङ्खौ, चत्वारि शिरःकपालानीति; एवं त्रीणि सषष्टीनि शतान्यस्थ्नां सह दन्तोलूखलनखेनेति||६||
Adhikarana 5 (7-8) · Śloka 8
পঞ্চেন্দ্রিযাধিষ্ঠানানি; তদ্যথা- ত্বগ্, জিহ্বা, নাসিকা, অক্ষিণী, কর্ণৌ চ|
পঞ্চ বুদ্ধীন্দ্রিযাণি; তদ্যথা- স্পর্শনং, রসনং, ঘ্রাণং, দর্শনং, শ্রোত্রমিতি|
পঞ্চ কর্মেন্দ্রিযাণি; তদ্যথা- হস্তৌ, পাদৌ, পাযুঃ, উপস্থঃ, জিহ্বা চেতি||৭||
হৃদযং চেতনাধিষ্ঠানমেকম্||৮||
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पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि; तद्यथा- त्वग्, जिह्वा, नासिका, अक्षिणी, कर्णौ च|
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि; तद्यथा- स्पर्शनं, रसनं, घ्राणं, दर्शनं, श्रोत्रमिति|
पञ्च कर्मेन्द्रियाणि; तद्यथा- हस्तौ, पादौ, पायुः, उपस्थः, जिह्वा चेति||७||
हृदयं चेतनाधिष्ठानमेकम्||८||
Adhikarana 6 (9) · Śloka 9
দশ প্রাণাযতনানি; তদ্যথা- মূর্ধা, কণ্ঠঃ, হৃদযং, নাভিঃ, গুদং, বস্তিঃ, ওজঃ, শুক্রং, শোণিতং, মাংসমিতি|
তেষু ষট্ পূর্বাণি মর্মসঙ্খ্যাতানি||৯||
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दश प्राणायतनानि; तद्यथा- मूर्धा, कण्ठः, हृदयं, नाभिः, गुदं, बस्तिः, ओजः, शुक्रं, शोणितं, मांसमिति|
तेषु षट् पूर्वाणि मर्मसङ्ख्यातानि||९||
Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
পঞ্চদশ কোষ্ঠাঙ্গানি; তদ্যথা- নাভিশ্চ, হৃদযং চ, ক্লোম চ, যকৃচ্চ, প্লীহা চ, বৃক্কৌ চ, বস্তিশ্চ, পুরীষাধারশ্চ, আমাশযশ্চ, পক্বাশযশ্চ, উত্তরগুদং চ, অধরগুদং চ, ক্ষুদ্রান্ত্রং চ, স্থূলান্ত্রং চ, বপাবহনং চেতি||১০||
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पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि; तद्यथा- नाभिश्च, हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, प्लीहा च, वृक्कौ च, बस्तिश्च, पुरीषाधारश्च, आमाशयश्च, पक्वाशयश्च, उत्तरगुदं च, अधरगुदं च, क्षुद्रान्त्रं च, स्थूलान्त्रं च, वपावहनं चेति||१०||
Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
ষট্পঞ্চাশত্ প্রত্যঙ্গানি ষট্স্বঙ্গেষূপনিবদ্ধানি, যান্যপরিসঙ্খ্যাতানি পূর্বমঙ্গেষু পরিসঙ্খ্যাযমানেষু, তান্যন্যৈঃ পর্যাযৈরিহ প্রকাশ্যানি ভবন্তি|
তদ্যথা- দ্বে জঙ্ঘাপিণ্ডিকে, দ্বে ঊরুপিণ্ডিকে, দ্বৌ স্ফিচৌ, দ্বৌ বৃষণৌ, একং শেফঃ, দ্বে উখে, দ্বৌ বঙ্ক্ষণৌ, দ্বৌ কুকুন্দরৌ, একং বস্তিশীর্ষম্, একমুদরং, দ্বৌ স্তনৌ, দ্বৌ শ্লেষ্মভুবৌ , দ্বে বাহুপিণ্ডিকে, চিবুকমেকং, দ্বাবোষ্ঠৌ, দ্বে সৃক্কণ্যৌ, দ্বৌ দন্তবেষ্টকৌ, একং তালু, একা গলশুণ্ডিকা, দ্বে উপজিহ্বিকে, একা গোজিহ্বিকা, দ্বৌ গণ্ডৌ, দ্বে কর্ণশষ্কুলিকে, দ্বৌ কর্ণপুত্রকৌ, দ্বে অক্ষিকূটে, চত্বার্যক্ষিবর্ত্মানি, দ্বে অক্ষিকনীনিকে, দ্বে ভ্রুবৌ, একাঽবটুঃ, চত্বারি পাণিপাদহৃদযানি||১১||
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षट्पञ्चाशत् प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेषूपनिबद्धानि, यान्यपरिसङ्ख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसङ्ख्यायमानेषु, तान्यन्यैः पर्यायैरिह प्रकाश्यानि भवन्ति|
तद्यथा- द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरुपिण्डिके, द्वौ स्फिचौ, द्वौ वृषणौ, एकं शेफः, द्वे उखे, द्वौ वङ्क्षणौ, द्वौ कुकुन्दरौ, एकं बस्तिशीर्षम्, एकमुदरं, द्वौ स्तनौ, द्वौ श्लेष्मभुवौ , द्वे बाहुपिण्डिके, चिबुकमेकं, द्वावोष्ठौ, द्वे सृक्कण्यौ, द्वौ दन्तवेष्टकौ, एकं तालु, एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्विके, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ, द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वार्यक्षिवर्त्मानि, द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकाऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि||११||
Adhikarana 9 (12-13) · Śloka 13
নব মহন্তি ছিদ্রাণি- সপ্ত শিরসি, দ্বে চাধঃ||১২||
এতাবদ্দৃশ্যং শক্যমপি নির্দেষ্টুম্||১৩||
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नव महन्ति छिद्राणि- सप्त शिरसि, द्वे चाधः||१२||
एतावद्दृश्यं शक्यमपि निर्देष्टुम्||१३||
Adhikarana 10 (14) · Śloka 14
অনির্দেশ্যমতঃ পরং তর্ক্যমেব|
তদ্যথা- নব স্নাযুশতানি, সপ্ত সিরাশতানি, দ্বে ধমনীশতে, চত্বারি পেশীশতানি, সপ্তোত্তরং মর্মশতং, দ্বে সন্ধিশতে, একোনত্রিংশত্সহস্রাণি নব চ শতানি ষট্পঞ্চাশত্কানি সিরাধমনীনামণুশঃ প্রবিভজ্যমানানাং মুখাগ্রপরিমাণং, তাবন্তি চৈব কেশশ্মশ্রুলোমানীতি|
এতদ্যথাবত্সঙ্খ্যাতং ত্বক্প্রভৃতি দৃশ্যং, তর্ক্যমতঃ পরম্|
এতদুভযমপি ন বিকল্পতে, প্রকৃতিভাবাচ্ছরীরস্য||১৪||
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अनिर्देश्यमतः परं तर्क्यमेव|
तद्यथा- नव स्नायुशतानि, सप्त सिराशतानि, द्वे धमनीशते, चत्वारि पेशीशतानि, सप्तोत्तरं मर्मशतं, द्वे सन्धिशते, एकोनत्रिंशत्सहस्राणि नव च शतानि षट्पञ्चाशत्कानि सिराधमनीनामणुशः प्रविभज्यमानानां मुखाग्रपरिमाणं, तावन्ति चैव केशश्मश्रुलोमानीति|
एतद्यथावत्सङ्ख्यातं त्वक्प्रभृति दृश्यं, तर्क्यमतः परम्|
एतदुभयमपि न विकल्पते, प्रकृतिभावाच्छरीरस्य||१४||
Adhikarana 11 (15) · Śloka 15
যত্ত্বঞ্জলিসঙ্খ্যেযং তদুপদেক্ষ্যামঃ; তত্ পরং প্রমাণমভিজ্ঞেযং, তচ্চ বৃদ্ধিহ্রাসযোগি, তর্ক্যমেব|
তদ্যথা- দশোদকস্যাঞ্জলযঃ শরীরে স্বেনাঞ্জলিপ্রমাণেন, যত্তু প্রচ্যবমানং পুরীষমনুবধ্নাত্যতিযোগেন তথা মূত্রং রুধিরমন্যাংশ্চ শরীরধাতূন্, যত্তু সর্বশরীরচরং বাহ্যা ত্বগ্বিভর্তি, যত্তু ত্বগন্তরে ব্রণগতং লসীকাশব্দং লভতে, যচ্চোষ্মণাঽনুবদ্ধং লোমকূপেভ্যো নিষ্পতত্ স্বেদশব্দমবাপ্নোতি, তদুদকং দশাঞ্জলিপ্রমাণং; নবাঞ্জলযঃ পূর্বস্যাহারপরিণামধাতোঃ, যং ‘রস’ ইত্যাচক্ষতে; অষ্টৌ শোণিতস্য, সপ্ত পুরীষস্য, ষট্ শ্লেষ্মণঃ, পঞ্চ পিত্তস্য, চত্বারো মূত্রস্য, ত্রযো বসাযাঃ, দ্বৌ মেদসঃ, একো মজ্জাযাঃ, মস্তিষ্কস্যার্ধাঞ্জলিঃ, শুক্রস্য তাবদেব প্রমাণং, তাবদেব শ্লৈষ্মিকস্যৌজস ইতি|
এতচ্ছরীরতত্ত্বমুক্তম্||১৫||
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यत्त्वञ्जलिसङ्ख्येयं तदुपदेक्ष्यामः; तत् परं प्रमाणमभिज्ञेयं, तच्च वृद्धिह्रासयोगि, तर्क्यमेव|
तद्यथा- दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेनाञ्जलिप्रमाणेन, यत्तु प्रच्यवमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून्, यत्तु सर्वशरीरचरं बाह्या त्वग्बिभर्ति, यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्धं लोमकूपेभ्यो निष्पतत् स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणं; नवाञ्जलयः पूर्वस्याहारपरिणामधातोः, यं ‘रस’ इत्याचक्षते; अष्टौ शोणितस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसायाः, द्वौ मेदसः, एको मज्जायाः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य तावदेव प्रमाणं, तावदेव श्लैष्मिकस्यौजस इति|
एतच्छरीरतत्त्वमुक्तम्||१५||
Adhikarana 12 (16) · Śloka 16
তত্র যদ্বিশেষতঃ স্থূলং স্থিরং মূর্তিমদ্গুরুখরকঠিনমঙ্গং নখাস্থিদন্তমাংসচর্মবর্চঃকেশশ্মশ্রুলোমকণ্ডরাদি তত্ পার্থিবং গন্ধো ঘ্রাণং চ; যদ্দ্রবসরমন্দস্নিগ্ধমৃদুপিচ্ছিলং রসরুধিরবসাকফপিত্তমূত্রস্বেদাদি তদাপ্যং রসো রসনং চ; যত্ পিত্তমূষ্মা চ যো যা চ ভাঃ শরীরে তত্ সর্বমাগ্নেযং রূপং দর্শনং চ; যদুচ্ছ্বাসপ্রশ্বাসোন্মেষনিমেষাকুঞ্চনপ্রসারণগমনপ্রেরণধারণাদি তদ্বাযবীযং স্পর্শঃ স্পর্শনং চ; যদ্বিবিক্তং যদুচ্যতে মহান্তি চাণূনি স্রোতাংসি তদান্তরীক্ষং শব্দঃ শ্রোত্রং চ; যত্ প্রযোক্তৃ তত্ প্রধানং বুদ্ধির্মনশ্চ|
ইতি শরীরাবযবসঙ্খ্যা যথাস্থূলভেদেনাবযবানাং নির্দিষ্টা||১৬||
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तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद्गुरुखरकठिनमङ्गं नखास्थिदन्तमांसचर्मवर्चःकेशश्मश्रुलोमकण्डरादि तत् पार्थिवं गन्धो घ्राणं च; यद्द्रवसरमन्दस्निग्धमृदुपिच्छिलं रसरुधिरवसाकफपित्तमूत्रस्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च; यत् पित्तमूष्मा च यो या च भाः शरीरे तत् सर्वमाग्नेयं रूपं दर्शनं च; यदुच्छ्वासप्रश्वासोन्मेषनिमेषाकुञ्चनप्रसारणगमनप्रेरणधारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च; यद्विविक्तं यदुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च; यत् प्रयोक्तृ तत् प्रधानं बुद्धिर्मनश्च|
इति शरीरावयवसङ्ख्या यथास्थूलभेदेनावयवानां निर्दिष्टा||१६||
Adhikarana 13 (17) · Śloka 17
শরীরাবযবাস্তু পরমাণুভেদেনাপরিসঙ্খ্যেযা ভবন্তি, অতিবহুত্বাদতিসৌক্ষ্ম্যাদতীন্দ্রিযত্বাচ্চ|
তেষাং সংযোগবিভাগে পরমাণূনাং কারণং বাযুঃ কর্মস্বভাবশ্চ||১৭||
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शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेनापरिसङ्ख्येया भवन्ति, अतिबहुत्वादतिसौक्ष्म्यादतीन्द्रियत्वाच्च|
तेषां संयोगविभागे परमाणूनां कारणं वायुः कर्मस्वभावश्च||१७||
Adhikarana 14 (18) · Śloka 18
তদেতচ্ছরীরং সঙ্খ্যাতমনেকাবযবং দৃষ্টমেকত্বেন সঙ্গঃ, পৃথক্ত্বেনাপবর্গঃ|
তত্র প্রধানমসক্তং সর্বসত্তানিবৃত্তৌ নিবর্ততে ইতি||১৮||
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तदेतच्छरीरं सङ्ख्यातमनेकावयवं दृष्टमेकत्वेन सङ्गः, पृथक्त्वेनापवर्गः|
तत्र प्रधानमसक्तं सर्वसत्तानिवृत्तौ निवर्तते इति||१८||
Adhikarana 15 (19-20) · Śloka 20
তত্র শ্লোকৌ- শরীরসঙ্খ্যাং যো বেদ সর্বাবযবশো ভিষক্|
তদজ্ঞাননিমিত্তেন স মোহেন ন যুজ্যতে||১৯||
অমূঢো মোহমূলৈশ্চ ন দোষৈরভিভূযতে|
নির্দোষো নিঃস্পৃহঃ শান্তঃ প্রশাম্যত্যপুনর্ভবঃ||২০||
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तत्र श्लोकौ- शरीरसङ्ख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक्|
तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते||१९||
अमूढो मोहमूलैश्च न दोषैरभिभूयते|
निर्दोषो निःस्पृहः शान्तः प्रशाम्यत्यपुनर्भवः||२०||
Adhikarana puShpikA · Śloka 7
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানে শরীরসঙ্খ্যাশারীরং নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ||৭||
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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरसङ्ख्याशारीरं नाम सप्तमोऽध्यायः||७||