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19. aṣṭōdarīyō'dhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতোঽষ্টোদরীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातोऽष्टोदरीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

ইহ খল্বষ্টাবুদরাণি, অষ্টৌ মূত্রাঘাতাঃ, অষ্টৌ ক্ষীরদোষাঃ, অষ্টৌ রেতোদোষাঃ; সপ্ত কুষ্ঠানি, সপ্ত পিডকাঃ, সপ্ত বীসর্পাঃ; ষডতীসারাঃ, ষডুদাবর্তাঃ; পঞ্চ গুল্মাঃ, পঞ্চ প্লীহদোষাঃ, পঞ্চ কাসাঃ, পঞ্চ শ্বাসাঃ, পঞ্চ হিক্কাঃ, পঞ্চ তৃষ্ণাঃ, পঞ্চ ছর্দযঃ, পঞ্চ ভক্তস্যানশনস্থানানি, পঞ্চ শিরোরোগাঃ, পঞ্চ হৃদ্রোগাঃ, পঞ্চ পাণ্ডুরোগাঃ, পঞ্চোন্মাদাঃ, চত্বারোঽপস্মারাঃ, চত্বারোঽক্ষিরোগাঃ, চত্বারঃ কর্ণরোগাঃ, চত্বারঃ প্রতিশ্যাযাঃ, চত্বারো মুখরোগাঃ, চত্বারো গ্রহণীদোষাঃ, চত্বারো মদাঃ, চত্বারো মূর্চ্ছাযাঃ, চত্বারঃ শোষাঃ, চত্বারি ক্লৈব্যানি; ত্রযঃ শোফাঃ, ত্রীণি কিলাসানি, ত্রিবিধং লোহিতপিত্তং; দ্বৌ জ্বরৌ, দ্বৌ ব্রণৌ, দ্বাবাযামৌ, দ্বে গৃধ্রস্যৌ, দ্বে কামলে, দ্বিবিধমামং, দ্বিবিধং বাতরক্তং, দ্বিবিধান্যর্শাংসি; এক ঊরুস্তম্ভঃ, একঃ সন্ন্যাসঃ, একো মহাগদঃ; বিংশতিঃ ক্রিমিজাতযঃ, বিংশতিঃ প্রমেহাঃ, বিংশতির্যোনিব্যাপদঃ; ইত্যষ্টচত্বারিংশদ্রোগাধিকরণান্যস্মিন্ সঙ্গ্রহে সমুদ্দিষ্টানি||৩||

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इह खल्वष्टावुदराणि, अष्टौ मूत्राघाताः, अष्टौ क्षीरदोषाः, अष्टौ रेतोदोषाः; सप्त कुष्ठानि, सप्त पिडकाः, सप्त वीसर्पाः; षडतीसाराः, षडुदावर्ताः; पञ्च गुल्माः, पञ्च प्लीहदोषाः, पञ्च कासाः, पञ्च श्वासाः, पञ्च हिक्काः, पञ्च तृष्णाः, पञ्च छर्दयः, पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानि, पञ्च शिरोरोगाः, पञ्च हृद्रोगाः, पञ्च पाण्डुरोगाः, पञ्चोन्मादाः, चत्वारोऽपस्माराः, चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायाः, चत्वारो मुखरोगाः, चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छायाः, चत्वारः शोषाः, चत्वारि क्लैब्यानि; त्रयः शोफाः, त्रीणि किलासानि, त्रिविधं लोहितपित्तं; द्वौ ज्वरौ, द्वौ व्रणौ, द्वावायामौ, द्वे गृध्रस्यौ, द्वे कामले, द्विविधमामं, द्विविधं वातरक्तं, द्विविधान्यर्शांसि; एक ऊरुस्तम्भः, एकः सन्न्यासः, एको महागदः; विंशतिः क्रिमिजातयः, विंशतिः प्रमेहाः, विंशतिर्योनिव्यापदः; इत्यष्टचत्वारिंशद्रोगाधिकरणान्यस्मिन् सङ्ग्रहे समुद्दिष्टानि||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

এতানি যথোদ্দেশমভিনির্দেক্ষ্যামঃ- অষ্টাবুদরাণীতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতপ্লীহবদ্ধচ্ছিদ্রদকোদরাণি, অষ্টৌ মূত্রাঘাতা ইতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতাশ্মরীশর্করাশুক্রশোণিতজাঃ, অষ্টৌ ক্ষীরদোষা ইতি বৈবর্ণ্যং বৈগন্ধ্যং বৈরস্যং পৈচ্ছিল্যং ফেনসঙ্ঘাতো রৌক্ষ্যং গৌরবমতিস্নেহশ্চ, অষ্টৌ রেতোদোষা ইতি তনু শুষ্কং ফেনিলমশ্বেতং পূত্যতিপিচ্ছলমন্যধাতূপহিতমবসাদি চ (১); সপ্ত কুষ্ঠানীতি কপালোদুম্বরমণ্ডলর্ষ্যজিহ্বপুণ্ডরীকসিধ্মকাকণানি, সপ্ত পিডকা ইতি শরাবিকা কচ্ছপিকা জালিনী সর্ষপ্যলজী বিনতা বিদ্রধী চ, সপ্ত বিসর্পা ইতি বাতপিত্তকফাগ্নিকর্দমকগ্রন্থিসন্নিপাতাখ্যাঃ (২); ষডতীসারা ইতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতভযশোকজাঃ, ষডুদাবর্তা ইতি বাতমূত্রপুরীষশুক্রচ্ছর্দিক্ষবথুজাঃ (৩); পঞ্চ গুল্মা ইতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতশোণিতজাঃ, পঞ্চ প্লীহদোষা ইতি গুল্মৈর্ব্যাখ্যাতাঃ, পঞ্চ কাসা ইতি বাতপিত্তকফক্ষতক্ষযজাঃ, পঞ্চ শ্বাসা ইতি মহোর্ধ্বচ্ছিন্নতমকক্ষুদ্রাঃ, পঞ্চ হিক্কা ইতি মহতী গম্ভীরা ব্যপেতা ক্ষুদ্রাঽন্নজা চ, পঞ্চ তৃষ্ণা ইতি বাতপিত্তামক্ষযোপসর্গাত্মিকাঃ, পঞ্চ ছর্দয ইতি দ্বিষ্টার্থসংযোগজা বাতপিত্তকফসন্নিপাতোদ্রেকোত্থাশ্চ , পঞ্চ ভক্তস্যানশনস্থানানীতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতদ্বেষাঃ, পঞ্চ শিরোরোগা ইতি পূর্বোদ্দেশমভিসমস্য বাতপিত্তকফসন্নিপাতক্রিমিজাঃ, পঞ্চ হৃদ্রোগা ইতি শিরোরোগৈর্ব্যাখ্যাতাঃ, পঞ্চ পাণ্ডুরোগা ইতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতমৃদ্ভক্ষণজাঃ, পঞ্চোন্মাদা ইতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতাগন্তুনিমিত্তাঃ (৪); চত্বারোঽপস্মারা ইতি বাতপিত্তকফসন্নিপাতনিমিত্তাঃ, চত্বারোঽক্ষিরোগাশ্চত্বারঃ কর্ণরোগাশ্চত্বারঃ প্রতিশ্যাযাশ্চত্বারো মুখরোগাশ্চত্বারো গ্রহণীদোষাশ্চত্বারো মদাশ্চত্বারো মূর্চ্ছাযা ইত্যপস্মারৈর্ব্যাখ্যাতাঃ, চত্বারঃ শোষা ইতি সাহসসন্ধারণক্ষযবিষমাশনজাঃ, চত্বারি ক্লৈব্যানীতি বীজোপঘাতাদ্ধ্বজভঙ্গাজ্জরাযাঃ শুক্রক্ষযাচ্চ (৫); ত্রযঃ শোথা ইতি বাতপিত্তশ্লেষ্মনিমিত্তাঃ, ত্রীণি কিলাসানীতি রক্ততাম্রশুক্লানি, ত্রিবিধং লোহিতপিত্তমিতি ঊর্ধ্বভাগমধোভাগমুভযভাগং চ (৬); দ্বৌ জ্বরাবিতি উষ্ণাভিপ্রাযঃ শীতসমুত্থশ্চ শীতাভিপ্রাযশ্চোষ্ণসমুত্থঃ, দ্বৌ ব্রণাবিতি নিজশ্চাগন্তুজশ্চ, দ্বাবাযামাবিতি বাহ্যশ্চাভ্যন্তরশ্চ, দ্বে গৃধ্রস্যাবিতি বাতাদ্বাতকফাচ্চ, দ্বে কামলে ইতি কোষ্ঠাশ্রযা শাখাশ্রযা চ, দ্বিবিধমামমিতি অলসকো বিসূচিকা চ, দ্বিবিধং বাতরক্তমিতি গম্ভীরমুত্তানং চ, দ্বিবিধান্যর্শাংসীতি শুষ্কাণ্যার্দ্রাণি চ (৭); এক ঊরুস্তম্ভ ইত্যামত্রিদোষসমুত্থঃ, একঃ সন্ন্যাস ইতি ত্রিদোষাত্মকো মনঃশরীরাধিষ্ঠানঃ, একো মহাগদ ইতি অতত্ত্বাভিনিবেশঃ (৮); বিংশতিঃ ক্রিমিজাতয ইতি যূকা পিপীলিকাশ্চেতি দ্বিবিধা বহির্মলজাঃ, কেশাদা লোমাদা লোমদ্বীপাঃ সৌরসা ঔদুম্বরা জন্তুমাতরশ্চেতি ষট্ শোণিতজাঃ, অন্ত্রাদা উদরাবেষ্টা হৃদযাদাশ্চুরবো দর্ভপুষ্পাঃ সৌগন্ধিকা মহাগুদাশ্চেতি সপ্ত কফজাঃ, ককেরুকা মকেরুকা লেলিহাঃ সশূলকাঃ সৌসুরাদাশ্চেতি পঞ্চ পুরীষজাঃ; বিংশতিঃ প্রমেহা ইত্যুদকমেহশ্চেক্ষুবালিকারসমেহশ্চ সান্দ্রমেহশ্চ সান্দ্রপ্রসাদমেহশ্চ শুক্লমেহশ্চ শুক্রমেহশ্চ শীতমেহশ্চ শনৈর্মেহশ্চ সিকতামেহশ্চ লালামেহশ্চেতি দশ শ্লেষ্মনিমিত্তাঃ, ক্ষারমেহশ্চ কালমেহশ্চ নীলমেহশ্চ লোহিতমেহশ্চ মঞ্জিষ্ঠামেহশ্চ হরিদ্রামেহশ্চেতি ষট্ পিত্তনিমিত্তাঃ, বসামেহশ্চ মজ্জামেহশ্চ হস্তিমেহশ্চ মধুমেহশ্চেতি চত্বারো বাতনিমিত্তাঃ, ইতি বিংশতিঃ প্রমেহাঃ; বিংশতির্যোনিব্যাপদ ইতি বাতিকী পৈত্তিকী শ্লেষ্মিকী সান্নিপাতিকী চেতি চতস্রো দোষজাঃ, দোষদূষ্যসংসর্গপ্রকৃতিনির্দেশৈরবশিষ্টাঃ ষোডশ নির্দিশ্যন্তে, তদ্যথা- রক্তযোনিশ্চারজস্কা চাচরণা চাতিচরণা চ প্রাক্চরণা চোপপ্লুতা চ পরিপ্লুতা চোদাবর্তিনী চ কর্ণিনী চ পুত্রঘ্নী চান্তর্মুখী চ সূচীমুখী চ শুষ্কা চ বামিনী চ ষণ্ঢযোনিশ্চ মহাযোনিশ্চেতি বিংশতির্যোনিব্যাপদো ভবন্তি (৯); কেবলশ্চাযমুদ্দেশো যথোদ্দেশমভিনির্দিষ্টো ভবতি||৪||

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एतानि यथोद्देशमभिनिर्देक्ष्यामः- अष्टावुदराणीति वातपित्तकफसन्निपातप्लीहबद्धच्छिद्रदकोदराणि, अष्टौ मूत्राघाता इति वातपित्तकफसन्निपाताश्मरीशर्कराशुक्रशोणितजाः, अष्टौ क्षीरदोषा इति वैवर्ण्यं वैगन्ध्यं वैरस्यं पैच्छिल्यं फेनसङ्घातो रौक्ष्यं गौरवमतिस्नेहश्च, अष्टौ रेतोदोषा इति तनु शुष्कं फेनिलमश्वेतं पूत्यतिपिच्छलमन्यधातूपहितमवसादि च (१); सप्त कुष्ठानीति कपालोदुम्बरमण्डलर्ष्यजिह्वपुण्डरीकसिध्मकाकणानि, सप्त पिडका इति शराविका कच्छपिका जालिनी सर्षप्यलजी विनता विद्रधी च, सप्त विसर्पा इति वातपित्तकफाग्निकर्दमकग्रन्थिसन्निपाताख्याः (२); षडतीसारा इति वातपित्तकफसन्निपातभयशोकजाः, षडुदावर्ता इति वातमूत्रपुरीषशुक्रच्छर्दिक्षवथुजाः (३); पञ्च गुल्मा इति वातपित्तकफसन्निपातशोणितजाः, पञ्च प्लीहदोषा इति गुल्मैर्व्याख्याताः, पञ्च कासा इति वातपित्तकफक्षतक्षयजाः, पञ्च श्वासा इति महोर्ध्वच्छिन्नतमकक्षुद्राः, पञ्च हिक्का इति महती गम्भीरा व्यपेता क्षुद्राऽन्नजा च, पञ्च तृष्णा इति वातपित्तामक्षयोपसर्गात्मिकाः, पञ्च छर्दय इति द्विष्टार्थसंयोगजा वातपित्तकफसन्निपातोद्रेकोत्थाश्च , पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानीति वातपित्तकफसन्निपातद्वेषाः, पञ्च शिरोरोगा इति पूर्वोद्देशमभिसमस्य वातपित्तकफसन्निपातक्रिमिजाः, पञ्च हृद्रोगा इति शिरोरोगैर्व्याख्याताः, पञ्च पाण्डुरोगा इति वातपित्तकफसन्निपातमृद्भक्षणजाः, पञ्चोन्मादा इति वातपित्तकफसन्निपातागन्तुनिमित्ताः (४); चत्वारोऽपस्मारा इति वातपित्तकफसन्निपातनिमित्ताः, चत्वारोऽक्षिरोगाश्चत्वारः कर्णरोगाश्चत्वारः प्रतिश्यायाश्चत्वारो मुखरोगाश्चत्वारो ग्रहणीदोषाश्चत्वारो मदाश्चत्वारो मूर्च्छाया इत्यपस्मारैर्व्याख्याताः, चत्वारः शोषा इति साहससन्धारणक्षयविषमाशनजाः, चत्वारि क्लैब्यानीति बीजोपघाताद्ध्वजभङ्गाज्जरायाः शुक्रक्षयाच्च (५); त्रयः शोथा इति वातपित्तश्लेष्मनिमित्ताः, त्रीणि किलासानीति रक्तताम्रशुक्लानि, त्रिविधं लोहितपित्तमिति ऊर्ध्वभागमधोभागमुभयभागं च (६); द्वौ ज्वराविति उष्णाभिप्रायः शीतसमुत्थश्च शीताभिप्रायश्चोष्णसमुत्थः, द्वौ व्रणाविति निजश्चागन्तुजश्च, द्वावायामाविति बाह्यश्चाभ्यन्तरश्च, द्वे गृध्रस्याविति वाताद्वातकफाच्च, द्वे कामले इति कोष्ठाश्रया शाखाश्रया च, द्विविधमाममिति अलसको विसूचिका च, द्विविधं वातरक्तमिति गम्भीरमुत्तानं च, द्विविधान्यर्शांसीति शुष्काण्यार्द्राणि च (७); एक ऊरुस्तम्भ इत्यामत्रिदोषसमुत्थः, एकः सन्न्यास इति त्रिदोषात्मको मनःशरीराधिष्ठानः, एको महागद इति अतत्त्वाभिनिवेशः (८); विंशतिः क्रिमिजातय इति यूका पिपीलिकाश्चेति द्विविधा बहिर्मलजाः, केशादा लोमादा लोमद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा जन्तुमातरश्चेति षट् शोणितजाः, अन्त्रादा उदरावेष्टा हृदयादाश्चुरवो दर्भपुष्पाः सौगन्धिका महागुदाश्चेति सप्त कफजाः, ककेरुका मकेरुका लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति पञ्च पुरीषजाः; विंशतिः प्रमेहा इत्युदकमेहश्चेक्षुबालिकारसमेहश्च सान्द्रमेहश्च सान्द्रप्रसादमेहश्च शुक्लमेहश्च शुक्रमेहश्च शीतमेहश्च शनैर्मेहश्च सिकतामेहश्च लालामेहश्चेति दश श्लेष्मनिमित्ताः, क्षारमेहश्च कालमेहश्च नीलमेहश्च लोहितमेहश्च मञ्जिष्ठामेहश्च हरिद्रामेहश्चेति षट् पित्तनिमित्ताः, वसामेहश्च मज्जामेहश्च हस्तिमेहश्च मधुमेहश्चेति चत्वारो वातनिमित्ताः, इति विंशतिः प्रमेहाः; विंशतिर्योनिव्यापद इति वातिकी पैत्तिकी श्लेष्मिकी सान्निपातिकी चेति चतस्रो दोषजाः, दोषदूष्यसंसर्गप्रकृतिनिर्देशैरवशिष्टाः षोडश निर्दिश्यन्ते, तद्यथा- रक्तयोनिश्चारजस्का चाचरणा चातिचरणा च प्राक्चरणा चोपप्लुता च परिप्लुता चोदावर्तिनी च कर्णिनी च पुत्रघ्नी चान्तर्मुखी च सूचीमुखी च शुष्का च वामिनी च षण्ढयोनिश्च महायोनिश्चेति विंशतिर्योनिव्यापदो भवन्ति (९); केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

সর্ব এব নিজা বিকারা নান্যত্র বাতপিত্তকফেভ্যো নির্বর্তন্তে, যথাহি- শকুনিঃ সর্বং দিবসমপি পরিপতন্ স্বাং ছাযাং নাতিবর্ততে, তথা স্বধাতুবৈষম্যনিমিত্তাঃ সর্বে বিকারা বাতপিত্তকফান্নাতিবর্তন্তে| বাতপিত্তশ্লেষ্মণাং পুনঃ স্থানসংস্থানপ্রকৃতিবিশেষানভিসমীক্ষ্য তদাত্মকানপি চ সর্ববিকারাং স্তানেবোপদিশন্তি বুদ্ধিমন্তঃ||৫||

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सर्व एव निजा विकारा नान्यत्र वातपित्तकफेभ्यो निर्वर्तन्ते, यथाहि- शकुनिः सर्वं दिवसमपि परिपतन् स्वां छायां नातिवर्तते, तथा स्वधातुवैषम्यनिमित्ताः सर्वे विकारा वातपित्तकफान्नातिवर्तन्ते| वातपित्तश्लेष्मणां पुनः स्थानसंस्थानप्रकृतिविशेषानभिसमीक्ष्य तदात्मकानपि च सर्वविकारां स्तानेवोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

ভবতশ্চাত্র- স্বধাতুবৈষম্যনিমিত্তজা যে বিকারসঙ্ঘা বহবঃ শরীরে| ন তে পৃথক্ পিত্তকফানিলেভ্য আগন্তবস্ত্বেব ততো বিশিষ্টাঃ||৬||

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भवतश्चात्र- स्वधातुवैषम्यनिमित्तजा ये विकारसङ्घा बहवः शरीरे| न ते पृथक् पित्तकफानिलेभ्य आगन्तवस्त्वेव ततो विशिष्टाः||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

আগন্তুরন্বেতি নিজং বিকারং নিজস্তথাঽঽগন্তুমপি প্রবৃদ্ধঃ| তত্রানুবন্ধং প্রকৃতিং চ সম্যগ্ জ্ঞাত্বা ততঃ কর্ম সমারভেত||৭||

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आगन्तुरन्वेति निजं विकारं निजस्तथाऽऽगन्तुमपि प्रवृद्धः| तत्रानुबन्धं प्रकृतिं च सम्यग् ज्ञात्वा ततः कर्म समारभेत||७||

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Adhikarana 7 (8-9) · Śloka 9

তত্র শ্লোকৌ- বিংশকাশ্চৈককাশ্চৈব ত্রিকাশ্চোক্তাস্ত্রযস্ত্রযঃ| দ্বিকাশ্চাষ্টৌ, চতুষ্কাশ্চ দশ, দ্বাদশ পঞ্চকাঃ||৮|| চত্বারশ্চাষ্টকা বর্গাঃ, ষট্কৌ দ্বৌ, সপ্তকাস্ত্রযঃ| অষ্টোদরীযে রোগাণাং রোগাধ্যাযে প্রকাশিতাঃ||৯||

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तत्र श्लोकौ- विंशकाश्चैककाश्चैव त्रिकाश्चोक्तास्त्रयस्त्रयः| द्विकाश्चाष्टौ, चतुष्काश्च दश, द्वादश पञ्चकाः||८|| चत्वारश्चाष्टका वर्गाः, षट्कौ द्वौ, सप्तकास्त्रयः| अष्टोदरीये रोगाणां रोगाध्याये प्रकाशिताः||९||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 19

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানেঽষ্টোদরীযো নামোনবিংশোঽধ্যাযঃ||১৯||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थानेऽष्टोदरीयो नामोनविंशोऽध्यायः||१९||

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