Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্ত্রিশোথীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातस्त्रिशोथीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্ত্রিশোথীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातस्त्रिशोथीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ত্রযঃ শোথা ভবন্তি বাতপিত্তশ্লেষ্মনিমিত্তাঃ, তে পুনর্দ্বিবিধা নিজাগন্তুভেদেন||৩||
त्रयः शोथा भवन्ति वातपित्तश्लेष्मनिमित्ताः, ते पुनर्द्विविधा निजागन्तुभेदेन||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তত্রাগন্তবশ্ছেদনভেদনক্ষণনভঞ্জনপিচ্ছনোত্পেষণপ্রহারবধবন্ধনবেষ্টনব্যধনপীডনাদিভির্বা ভল্লাতকপুষ্পফলরসাত্মগুপ্তাশূকক্রিমিশূকাহিতপত্রলতাগুল্মসংস্পর্শনৈর্বা স্বেদনপরিসর্পণাবমূত্রণৈর্বা বিষিণাং সবিষপ্রাণিদংষ্ট্রাদন্তবিষাণনখনিপাতৈর্বা সাগরবিষবাতহিমদহনসংস্পর্শনৈর্বা শোথাঃ সমুপজাযন্তে||৪||
तत्रागन्तवश्छेदनभेदनक्षणनभञ्जनपिच्छनोत्पेषणप्रहारवधबन्धनवेष्टनव्यधनपीडनादिभिर्वा भल्लातकपुष्पफलरसात्मगुप्ताशूकक्रिमिशूकाहितपत्रलतागुल्मसंस्पर्शनैर्वा स्वेदनपरिसर्पणावमूत्रणैर्वा विषिणां सविषप्राणिदंष्ट्रादन्तविषाणनखनिपातैर्वा सागरविषवातहिमदहनसंस्पर्शनैर्वा शोथाः समुपजायन्ते||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তে পুনর্যথাস্বং হেতুব্যঞ্জনৈরাদাবুপলভ্যন্তে নিজব্যঞ্জনৈকদেশবিপরীতৈঃ; বন্ধমন্ত্রাগদপ্রলেপপ্রতাপনির্বাপণাদিভিশ্চোপক্রমৈরুপক্রম্যমাণাঃ প্রশান্তিমাপদ্যন্তে||৫||
ते पुनर्यथास्वं हेतुव्यञ्जनैरादावुपलभ्यन्ते निजव्यञ्जनैकदेशविपरीतैः; बन्धमन्त्रागदप्रलेपप्रतापनिर्वापणादिभिश्चोपक्रमैरुपक्रम्यमाणाः प्रशान्तिमापद्यन्ते||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
নিজাঃ পুনঃ স্নেহস্বেদবমনবিরেচনাস্থাপনানুবাসনশিরোবিরেচনানামযথাবত্প্রযোগান্মিথ্যাসংসর্জনাদ্বা ছর্দ্যলসকবিসূচিকাশ্বাসকাসাতিসারশোষপাণ্ডুরোগোদরজ্বরপ্রদরভগন্দরার্শোবিকারাতিকর্শনৈর্বা কুষ্ঠকণ্ডূপিডকাদিভির্বা ছর্দিক্ষবথূদ্গারশুক্রবাতমূত্রপুরীষবেগধারণৈর্বা কর্মরোগোপবাসাধ্বকর্শিতস্য বা সহসাঽতিগুর্বম্ললবণপিষ্টান্নফলশাকরাগদধিহরিতকমদ্যমন্দকবিরূঢনবশূকশমীধান্যানূপৌদক- পিশিতোপযোগান্মৃত্পঙ্কলোষ্টভক্ষণাল্লবণাতিভক্ষণাদ্গর্ভসম্পীডনাদামগর্ভপ্রপতনাত্ প্রজাতানাং চ মিথ্যোপচারাদুদীর্ণদোষত্বাচ্চ শোফাঃ প্রাদুর্ভবন্তি; ইত্যুক্তঃ সামান্যো হেতুঃ||৬||
निजाः पुनः स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनानुवासनशिरोविरेचनानामयथावत्प्रयोगान्मिथ्यासंसर्जनाद्वा छर्द्यलसकविसूचिकाश्वासकासातिसारशोषपाण्डुरोगोदरज्वरप्रदरभगन्दरार्शोविकारातिकर्शनैर्वा कुष्ठकण्डूपिडकादिभिर्वा छर्दिक्षवथूद्गारशुक्रवातमूत्रपुरीषवेगधारणैर्वा कर्मरोगोपवासाध्वकर्शितस्य वा सहसाऽतिगुर्वम्ललवणपिष्टान्नफलशाकरागदधिहरितकमद्यमन्दकविरूढनवशूकशमीधान्यानूपौदक- पिशितोपयोगान्मृत्पङ्कलोष्टभक्षणाल्लवणातिभक्षणाद्गर्भसम्पीडनादामगर्भप्रपतनात् प्रजातानां च मिथ्योपचारादुदीर्णदोषत्वाच्च शोफाः प्रादुर्भवन्ति; इत्युक्तः सामान्यो हेतुः||६||
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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8
অযং ত্বত্র বিশেষঃ- শীতরূক্ষলঘুবিশদশ্রমোপবাসাতিকর্শনক্ষপণাদিভির্বাযুঃ প্রকুপিতস্ত্বঙ্মাংসশোণিতাদীন্যভিভূয শোফং জনযতি; স ক্ষিপ্রোত্থানপ্রশমো ভবতি, তথা শ্যামারুণবর্ণঃ প্রকৃতিবর্ণো বা, চলঃ স্পন্দনঃ খরপরুষভিন্নত্বগ্রোমা ছিদ্যত ইব ভিদ্যত ইব পীড্যত ইব সূচীভিরিব তুদ্যতে পিপীলিকাভিরিব সংসৃপ্যতে সর্ষপকল্কাবলিপ্ত ইব চিমিচিমাযতে সঙ্কুচ্যত আযম্যত ইবেতি বাতশোথঃ (১); উষ্ণতীক্ষ্ণকটুকক্ষারলবণাম্লাজীর্ণভোজনৈরগ্ন্যাতপপ্রতাপৈশ্চ পিত্তং প্রকুপিতং ত্বঙ্মাংসশোণিতান্যভিভূয শোথং জনযতি; স ক্ষিপ্রোত্থানপ্রশমো ভবতি, কৃষ্ণপীতনীলতাম্রাবভাস উষ্ণো মৃদুঃ কপিলতাম্ররোমা উষ্যতে দূযতে ধূপ্যতে ঊষ্মাযতে স্বিদ্যতে ক্লিদ্যতে ন চ স্পর্শমুষ্ণং চ সুষূযত ইতি পিত্তশোথঃ (২); গুরুমধুরশীতস্নিগ্ধৈরতিস্বপ্নাব্যাযামাদিভিশ্চ শ্লেষ্মা প্রকুপিতস্ত্বঙ্মাংসশোণিতাদীন্যভিভূয শোথং জনযতি; স কৃচ্ছ্রোত্থানপ্রশমো ভবতি, পাণ্ডুশ্বেতাবভাসো গুরুঃ স্নিগ্ধঃ শ্লক্ষ্ণঃ স্থিরঃ স্ত্যানঃ শুক্লাগ্ররোমা স্পর্শোষ্ণসহশ্চেতি শ্লেষ্মশোথঃ (৩); যথাস্বকারণাকৃতিসংসর্গাদ্দ্বিদোষজাস্ত্রযঃ শোথা ভবন্তি; যথাস্বকারণাকৃতিসন্নিপাতাত্ সান্নিপাতিক একঃ; এবং সপ্তবিধো ভেদঃ||৭|| প্রকৃতিভিস্তাভিস্তাভির্ভিদ্যমানো দ্বিবিধস্ত্রিবিধশ্চতুর্বিধঃ সপ্তবিধোঽষ্টবিধশ্চ শোথ উপলভ্যতে, পুনশ্চৈক এবোত্সেধসামান্যাত্||৮||
अयं त्वत्र विशेषः- शीतरूक्षलघुविशदश्रमोपवासातिकर्शनक्षपणादिभिर्वायुः प्रकुपितस्त्वङ्मांसशोणितादीन्यभिभूय शोफं जनयति; स क्षिप्रोत्थानप्रशमो भवति, तथा श्यामारुणवर्णः प्रकृतिवर्णो वा, चलः स्पन्दनः खरपरुषभिन्नत्वग्रोमा छिद्यत इव भिद्यत इव पीड्यत इव सूचीभिरिव तुद्यते पिपीलिकाभिरिव संसृप्यते सर्षपकल्कावलिप्त इव चिमिचिमायते सङ्कुच्यत आयम्यत इवेति वातशोथः (१); उष्णतीक्ष्णकटुकक्षारलवणाम्लाजीर्णभोजनैरग्न्यातपप्रतापैश्च पित्तं प्रकुपितं त्वङ्मांसशोणितान्यभिभूय शोथं जनयति; स क्षिप्रोत्थानप्रशमो भवति, कृष्णपीतनीलताम्रावभास उष्णो मृदुः कपिलताम्ररोमा उष्यते दूयते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यते क्लिद्यते न च स्पर्शमुष्णं च सुषूयत इति पित्तशोथः (२); गुरुमधुरशीतस्निग्धैरतिस्वप्नाव्यायामादिभिश्च श्लेष्मा प्रकुपितस्त्वङ्मांसशोणितादीन्यभिभूय शोथं जनयति; स कृच्छ्रोत्थानप्रशमो भवति, पाण्डुश्वेतावभासो गुरुः स्निग्धः श्लक्ष्णः स्थिरः स्त्यानः शुक्लाग्ररोमा स्पर्शोष्णसहश्चेति श्लेष्मशोथः (३); यथास्वकारणाकृतिसंसर्गाद्द्विदोषजास्त्रयः शोथा भवन्ति; यथास्वकारणाकृतिसन्निपातात् सान्निपातिक एकः; एवं सप्तविधो भेदः||७|| प्रकृतिभिस्ताभिस्ताभिर्भिद्यमानो द्विविधस्त्रिविधश्चतुर्विधः सप्तविधोऽष्टविधश्च शोथ उपलभ्यते, पुनश्चैक एवोत्सेधसामान्यात्||८||
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Adhikarana 7 (9-15) · Śloka 15
ভবন্তি চাত্র- শূযন্তে যস্য গাত্রাণি স্বপন্তীব রুজন্তি চ| পীডিতান্যুন্নমন্ত্যাশু বাতশোথং তমাদিশেত্||৯|| যশ্চাপ্যরুণবর্ণাভঃ শোথো নক্তং প্রণশ্যতি| স্নেহোষ্ণমর্দনাভ্যাং চ প্রণশ্যেত্ স চ বাতিকঃ||১০|| যঃ পিপাসাজ্বরার্তস্য দূযতেঽথ বিদহ্যতে| স্বিদ্যতি ক্লিদ্যতে গন্ধী স পৈত্তঃ স্বযথুঃ স্মৃতঃ||১১|| যঃ পীতনেত্রবক্ত্রত্বক্ পূর্বং মধ্যাত্ প্রশূযতে| তনুত্বক্ চাতিসারী চ পিত্তশোথঃ স উচ্যতে||১২|| শীতঃ সক্তগতির্যস্তু কণ্ডূমান্ পাণ্ডুরেব চ| নিপীডিতো নোন্নমতি শ্বযথুঃ স কফাত্মকঃ||১৩|| যস্য শস্ত্রকুশচ্ছিন্নাচ্ছোণিতং ন প্রবর্ততে| কৃচ্ছ্রেণ পিচ্ছা স্রবতি স চাপি কফসম্ভবঃ||১৪|| নিদানাকৃতিসংসর্গাচ্ছ্বযথুঃ স্যাদ্দ্বিদোষজঃ| সর্বাকৃতিঃ সন্নিপাতাচ্ছোথো ব্যামিশ্রহেতুজঃ||১৫||
भवन्ति चात्र- शूयन्ते यस्य गात्राणि स्वपन्तीव रुजन्ति च| पीडितान्युन्नमन्त्याशु वातशोथं तमादिशेत्||९|| यश्चाप्यरुणवर्णाभः शोथो नक्तं प्रणश्यति| स्नेहोष्णमर्दनाभ्यां च प्रणश्येत् स च वातिकः||१०|| यः पिपासाज्वरार्तस्य दूयतेऽथ विदह्यते| स्विद्यति क्लिद्यते गन्धी स पैत्तः स्वयथुः स्मृतः||११|| यः पीतनेत्रवक्त्रत्वक् पूर्वं मध्यात् प्रशूयते| तनुत्वक् चातिसारी च पित्तशोथः स उच्यते||१२|| शीतः सक्तगतिर्यस्तु कण्डूमान् पाण्डुरेव च| निपीडितो नोन्नमति श्वयथुः स कफात्मकः||१३|| यस्य शस्त्रकुशच्छिन्नाच्छोणितं न प्रवर्तते| कृच्छ्रेण पिच्छा स्रवति स चापि कफसम्भवः||१४|| निदानाकृतिसंसर्गाच्छ्वयथुः स्याद्द्विदोषजः| सर्वाकृतिः सन्निपाताच्छोथो व्यामिश्रहेतुजः||१५||
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Adhikarana 8 (16-17) · Śloka 17
যস্তু পাদাভিনির্বৃত্তঃ শোথঃ সর্বাঙ্গগো ভবেত্| জন্তোঃ স চ সুকষ্টঃ স্যাত্ প্রসৃতঃ স্ত্রীমুখাচ্চ যঃ||১৬|| যশ্চাপি গুহ্যপ্রভবঃ স্ত্রিযা বা পুরুষস্য বা| স চ কষ্টতমো জ্ঞেযো যস্য চ স্যুরুপদ্রবাঃ||১৭||
यस्तु पादाभिनिर्वृत्तः शोथः सर्वाङ्गगो भवेत्| जन्तोः स च सुकष्टः स्यात् प्रसृतः स्त्रीमुखाच्च यः||१६|| यश्चापि गुह्यप्रभवः स्त्रिया वा पुरुषस्य वा| स च कष्टतमो ज्ञेयो यस्य च स्युरुपद्रवाः||१७||
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Adhikarana 9 (18) · Śloka 18
ছর্দিঃ শ্বাসোঽরুচিস্তৃষ্ণা জ্বরোঽতীসার এব চ| সপ্তকোঽযং সদৌর্বল্যঃ শোফোপদ্রবসঙ্গ্রহঃ||১৮||
छर्दिः श्वासोऽरुचिस्तृष्णा ज्वरोऽतीसार एव च| सप्तकोऽयं सदौर्बल्यः शोफोपद्रवसङ्ग्रहः||१८||
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Adhikarana 10 (19-36) · Śloka 36
যস্য শ্লেষ্মা প্রকুপিতো জিহ্বামূলেঽবতিষ্ঠতে| আশু সঞ্জনযেচ্ছোথং জাযতেঽস্যোপজিহ্বিকা||১৯|| যস্য শ্লেষ্মা প্রকুপিতঃ কাকলে ব্যবতিষ্ঠতে| আশু সঞ্জনযেচ্ছোফং করোতি গলশুণ্ডিকাম্||২০|| যস্য শ্লেষ্মা প্রকুপিতো গলবাহ্যেঽবতিষ্ঠতে| শনৈঃ সঞ্জনযেচ্ছোফং গলগণ্ডোঽস্য জাযতে||২১|| যস্য শ্লেষ্মা প্রকুপিতস্তিষ্ঠত্যন্তর্গলে স্থিরঃ| আশু সঞ্জনযেচ্ছোফং জাযতেঽস্য গলগ্রহঃ||২২|| যস্য পিত্তং প্রকুপিতং সরক্তং ত্বচি সর্পতি| শোফং সরাগং জনযেদ্বিসর্পস্তস্য জাযতে||২৩|| যস্য পিত্তং প্রকুপিতং ত্বচি রক্তেঽবতিষ্ঠতে| শোথং সরাগং জনযেত্ পিডকা তস্য জাযতে||২৪|| যস্য প্রকুপিতং পিত্তং শোণিতং প্রাপ্য শুষ্যতি| তিলকা পিপ্লবো ব্যঙ্গা নীলিকা তস্য জাযতে||২৫|| যস্য পিত্তং প্রকুপিতং শঙ্খযোরবতিষ্ঠতে| শ্বযথুঃ শঙ্খকো নাম দারুণস্তস্য জাযতে||২৬|| যস্য পিত্তং প্রকুপিতং কর্ণমূলেঽবতিষ্ঠতে| জ্বরান্তে দুর্জযোঽন্তায শোথস্তস্যোপজাযতে||২৭|| বাতঃ প্লীহানমুদ্ধূয কুপিতো যস্য তিষ্ঠতি| শনৈঃ পরিতুদন্ পার্শ্বং প্লীহা তস্যাভিবর্ধতে||২৮|| যস্য বাযুঃ প্রকুপিতো গুল্মস্থানেঽবতিষ্ঠতে| শোফং সশূলং জনযন্ গুল্মস্তস্যোপজাযতে||২৯|| যস্য বাযুঃ প্রকুপিতঃ শোফশূলকরশ্চরন্| বঙ্ক্ষণাদ্বৃষণৌ যাতি বৃদ্ধিস্তস্যোপজাযতে||৩০|| যস্য বাতঃ প্রকুপিতস্ত্বঙ্মাংসান্তরমাশ্রিতঃ| শোথং সঞ্জনযেত্ কুক্ষাবুদরং তস্য জাযতে||৩১|| যস্য বাতঃ প্রকুপিতঃ কুক্ষিমাশ্রিত্য তিষ্ঠতি| নাধো ব্রজতি নাপ্যূর্ধ্বমানাহস্তস্য জাযতে||৩২|| রোগাশ্চোত্সেধসামান্যদধিমাংসার্বুদাদযঃ| বিশিষ্টা নামরূপাভ্যাং নির্দেশ্যাঃ শোথসঙ্গ্রহে||৩৩|| বাতপিত্তকফা যস্য যুগপত্ কুপিতাস্ত্রযঃ| জিহ্বামূলেঽবতিষ্ঠন্তে বিদহন্তঃ সমুচ্ছ্রিতাঃ||৩৪|| জনযন্তি ভৃশং শোথং বেদনাশ্চ পৃথগ্বিধাঃ| তং শীঘ্রকারিণং রোগং রোহিণীতি বিনির্দিশেত্||৩৫|| ত্রিরাত্রং পরমং তস্য জন্তোর্ভবতি জীবিতম্| কুশলেন ত্বনুক্রান্তঃ ক্ষিপ্রং সম্পদ্যতে সুখী||৩৬||
यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो जिह्वामूलेऽवतिष्ठते| आशु सञ्जनयेच्छोथं जायतेऽस्योपजिह्विका||१९|| यस्य श्लेष्मा प्रकुपितः काकले व्यवतिष्ठते| आशु सञ्जनयेच्छोफं करोति गलशुण्डिकाम्||२०|| यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो गलबाह्येऽवतिष्ठते| शनैः सञ्जनयेच्छोफं गलगण्डोऽस्य जायते||२१|| यस्य श्लेष्मा प्रकुपितस्तिष्ठत्यन्तर्गले स्थिरः| आशु सञ्जनयेच्छोफं जायतेऽस्य गलग्रहः||२२|| यस्य पित्तं प्रकुपितं सरक्तं त्वचि सर्पति| शोफं सरागं जनयेद्विसर्पस्तस्य जायते||२३|| यस्य पित्तं प्रकुपितं त्वचि रक्तेऽवतिष्ठते| शोथं सरागं जनयेत् पिडका तस्य जायते||२४|| यस्य प्रकुपितं पित्तं शोणितं प्राप्य शुष्यति| तिलका पिप्लवो व्यङ्गा नीलिका तस्य जायते||२५|| यस्य पित्तं प्रकुपितं शङ्खयोरवतिष्ठते| श्वयथुः शङ्खको नाम दारुणस्तस्य जायते||२६|| यस्य पित्तं प्रकुपितं कर्णमूलेऽवतिष्ठते| ज्वरान्ते दुर्जयोऽन्ताय शोथस्तस्योपजायते||२७|| वातः प्लीहानमुद्धूय कुपितो यस्य तिष्ठति| शनैः परितुदन् पार्श्वं प्लीहा तस्याभिवर्धते||२८|| यस्य वायुः प्रकुपितो गुल्मस्थानेऽवतिष्ठते| शोफं सशूलं जनयन् गुल्मस्तस्योपजायते||२९|| यस्य वायुः प्रकुपितः शोफशूलकरश्चरन्| वङ्क्षणाद्वृषणौ याति वृद्धिस्तस्योपजायते||३०|| यस्य वातः प्रकुपितस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः| शोथं सञ्जनयेत् कुक्षावुदरं तस्य जायते||३१|| यस्य वातः प्रकुपितः कुक्षिमाश्रित्य तिष्ठति| नाधो व्रजति नाप्यूर्ध्वमानाहस्तस्य जायते||३२|| रोगाश्चोत्सेधसामान्यदधिमांसार्बुदादयः| विशिष्टा नामरूपाभ्यां निर्देश्याः शोथसङ्ग्रहे||३३|| वातपित्तकफा यस्य युगपत् कुपितास्त्रयः| जिह्वामूलेऽवतिष्ठन्ते विदहन्तः समुच्छ्रिताः||३४|| जनयन्ति भृशं शोथं वेदनाश्च पृथग्विधाः| तं शीघ्रकारिणं रोगं रोहिणीति विनिर्दिशेत्||३५|| त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जीवितम्| कुशलेन त्वनुक्रान्तः क्षिप्रं सम्पद्यते सुखी||३६||
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Adhikarana 11 (37-41) · Śloka 41
সন্তি হ্যেবংবিধা রোগাঃ সাধ্যা দারুণসম্মতাঃ| যে হন্যুরনুপক্রান্তা মিথ্যাচারেণ বা পুনঃ||৩৭|| সাধ্যাশ্চাপ্যপরে সন্তি ব্যাধযো মৃদুসম্মতাঃ| যত্নাযত্নকৃতং যেষু কর্ম সিধ্যত্যসংশযম্||৩৮|| অসাধ্যাশ্চাপরে সন্তি ব্যাধযো যাপ্যসঞ্জ্ঞিতাঃ| সুসাধ্বপি কৃতং যেষু কর্ম যাত্রাকরং ভবেত্||৩৯|| সন্তি চাপ্যপরে রোগা যেষু কর্ম ন সিধ্যতি| অপি যত্নকৃতং বালৈর্ন তান্ বিদ্বানুপাচরেত্||৪০|| সাধ্যাশ্চৈবাপ্যসাধ্যাশ্চ ব্যাধযো দ্বিবিধাঃ স্মৃতাঃ| মৃদুদারুণভেদেন তে ভবন্তি চতুর্বিধাঃ||৪১||
सन्ति ह्येवंविधा रोगाः साध्या दारुणसम्मताः| ये हन्युरनुपक्रान्ता मिथ्याचारेण वा पुनः||३७|| साध्याश्चाप्यपरे सन्ति व्याधयो मृदुसम्मताः| यत्नायत्नकृतं येषु कर्म सिध्यत्यसंशयम्||३८|| असाध्याश्चापरे सन्ति व्याधयो याप्यसञ्ज्ञिताः| सुसाध्वपि कृतं येषु कर्म यात्राकरं भवेत्||३९|| सन्ति चाप्यपरे रोगा येषु कर्म न सिध्यति| अपि यत्नकृतं बालैर्न तान् विद्वानुपाचरेत्||४०|| साध्याश्चैवाप्यसाध्याश्च व्याधयो द्विविधाः स्मृताः| मृदुदारुणभेदेन ते भवन्ति चतुर्विधाः||४१||
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Adhikarana 12 (42-43) · Śloka 43
ত এবাপরিসঙ্খ্যেযা ভিদ্যমানা ভবন্তি হি| রুজাবর্ণসমুত্থানস্থানসংস্থাননামভিঃ ||৪২|| ব্যবস্থাকরণং তেষাং যথাস্থূলেষু সঙ্গ্রহঃ| তথা প্রকৃতিসামান্যং বিকারেষূপদিশ্যতে||৪৩||
त एवापरिसङ्ख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि| रुजावर्णसमुत्थानस्थानसंस्थाननामभिः ||४२|| व्यवस्थाकरणं तेषां यथास्थूलेषु सङ्ग्रहः| तथा प्रकृतिसामान्यं विकारेषूपदिश्यते||४३||
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Adhikarana 13 (44-47) · Śloka 47
বিকারনামাকুশলো ন জিহ্রীযাত্ কদাচন| ন হি সর্ববিকারাণাং নামতোঽস্তি ধ্রুবা স্থিতিঃ||৪৪|| স এব কুপিতো দোষঃ সমুত্থানবিশেষতঃ| স্থানান্তরগতশ্চৈব জনযত্যামযান্ বহূন্ ||৪৫|| তস্মাদ্বিকারপ্রকৃতীরধিষ্ঠানান্তরাণি চ| সমুত্থানবিশেষাংশ্চ বুদ্ধ্বা কর্ম সমাচরেত্||৪৬|| যো হ্যেতত্ত্রিতযং জ্ঞাত্বা কর্মাণ্যারভতে ভিষক্| জ্ঞানপূর্বং যথান্যাযং স কর্মসু ন মুহ্যতি||৪৭||
विकारनामाकुशलो न जिह्रीयात् कदाचन| न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः||४४|| स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः| स्थानान्तरगतश्चैव जनयत्यामयान् बहून् ||४५|| तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च| समुत्थानविशेषांश्च बुद्ध्वा कर्म समाचरेत्||४६|| यो ह्येतत्त्रितयं ज्ञात्वा कर्माण्यारभते भिषक्| ज्ञानपूर्वं यथान्यायं स कर्मसु न मुह्यति||४७||
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Adhikarana 14 (48) · Śloka 48
নিত্যাঃ প্রাণভৃতাং দেহে বাতপিত্তকফাস্ত্রযঃ| বিকৃতাঃ প্রকৃতিস্থা বা তান্ বুভুত্সেত পণ্ডিতঃ||৪৮||
नित्याः प्राणभृतां देहे वातपित्तकफास्त्रयः| विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुभुत्सेत पण्डितः||४८||
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Adhikarana 15 (49-51) · Śloka 51
উত্সাহোচ্ছ্বাসনিঃ শ্বাসচেষ্টা ধাতুগতিঃ সমা| সমো মোক্ষো গতিমতাং বাযোঃ কর্মাবিকারজম্||৪৯|| দর্শনং পক্তিরূষ্মা চ ক্ষুত্তৃষ্ণা দেহমার্দবম্| প্রভা প্রসাদো মেধা চ পিত্তকর্মাবিকারজম্||৫০|| স্নেহো বন্ধঃ স্থিরত্বং চ গৌরবং বৃষতা বলম্| ক্ষমা ধৃতিরলোভশ্চ কফকর্মাবিকারজম্||৫১||
उत्साहोच्छ्वासनिः श्वासचेष्टा धातुगतिः समा| समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम्||४९|| दर्शनं पक्तिरूष्मा च क्षुत्तृष्णा देहमार्दवम्| प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम्||५०|| स्नेहो बन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम्| क्षमा धृतिरलोभश्च कफकर्माविकारजम्||५१||
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Adhikarana 16 (52) · Śloka 52
বাতে পিত্তে কফে চৈব ক্ষীণে লক্ষণমুচ্যতে| কর্মণঃ প্রাকৃতাদ্ধানির্বৃদ্ধির্বাঽপি বিরোধিনাম্||৫২||
वाते पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते| कर्मणः प्राकृताद्धानिर्वृद्धिर्वाऽपि विरोधिनाम्||५२||
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Adhikarana 17 (53) · Śloka 53
দোষপ্রকৃতিবৈশেষ্যং নিযতং বৃদ্ধিলক্ষণম্| দোষাণাং প্রকৃতির্হানির্বৃদ্ধিশ্চৈবং পরীক্ষ্যতে||৫৩||
दोषप्रकृतिवैशेष्यं नियतं वृद्धिलक्षणम्| दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्वृद्धिश्चैवं परीक्ष्यते||५३||
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Adhikarana 18 (54-56) · Śloka 56
তত্র শ্লোকাঃ- সঙ্খ্যাং নিমিত্তং রূপাণি শোথানাং সাধ্যতাং ন চ| তেষাং তেষাং বিকারাণাং শোথাংস্তাংস্তাংশ্চ পূর্বজান্||৫৪|| বিধিভেদং বিকারাণাং ত্রিবিধং বোধ্যসঙ্গ্রহম্| প্রাকৃতং কর্ম দোষাণাং লক্ষণং হানিবৃদ্ধিষু||৫৫|| বীতমোহরজোদোষলোভমানমদস্পৃহঃ| ব্যাখ্যাতবাংস্ত্রিশোথীযে রোগাধ্যাযে পুনর্বসুঃ||৫৬||
तत्र श्लोकाः- सङ्ख्यां निमित्तं रूपाणि शोथानां साध्यतां न च| तेषां तेषां विकाराणां शोथांस्तांस्तांश्च पूर्वजान्||५४|| विधिभेदं विकाराणां त्रिविधं बोध्यसङ्ग्रहम्| प्राकृतं कर्म दोषाणां लक्षणं हानिवृद्धिषु||५५|| वीतमोहरजोदोषलोभमानमदस्पृहः| व्याख्यातवांस्त्रिशोथीये रोगाध्याये पुनर्वसुः||५६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 18
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে ত্রিশোথীযো নামাষ্টাদশোঽধ্যাযঃ||১৮||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने त्रिशोथीयो नामाष्टादशोऽध्यायः||१८||
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