Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ক্ষীণবলীযং বাজীকরণচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः क्षीणबलीयं वाजीकरणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ক্ষীণবলীযং বাজীকরণচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः क्षीणबलीयं वाजीकरणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5
কল্যস্যোদগ্রবযসো বাজীকরণসেবিনঃ | সর্বেষ্বৃতুষ্বহরহর্ব্যবাযো ন নিবারিতঃ ||৩|| স্থবিরাণাং রিরংসূনাং স্ত্রীণাং বাল্লভ্যমিচ্ছতাম্ | যোষিত্প্রসঙ্গাত্ ক্ষীণানাং ক্লীবানামল্পরেতসাম্ ||৪|| বিলাসিনামর্থবতাং রূপযৌবনশালিনাম্ | নৃণাং চ বহুভার্যাণাং যোগা বাজীকরা হিতাঃ ||৫||
कल्यस्योदग्रवयसो वाजीकरणसेविनः | सर्वेष्वृतुष्वहरहर्व्यवायो न निवारितः ||३|| स्थविराणां रिरंसूनां स्त्रीणां वाल्लभ्यमिच्छताम् | योषित्प्रसङ्गात् क्षीणानां क्लीबानामल्परेतसाम् ||४|| विलासिनामर्थवतां रूपयौवनशालिनाम् | नृणां च बहुभार्याणां योगा वाजीकरा हिताः ||५||
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Adhikarana 3 (6-8) · Śloka 10
সেবমানো যদৌচিত্যাদ্বাজীবাত্যর্থবেগবান্ | নারীস্তর্পযতে তেন বাজীকরণমুচ্যতে ||৬|| ভোজনানি বিচিত্রাণি পানানি বিবিধানি চ | বাচঃ শ্রোত্রানুগামিন্যস্ত্বচঃ স্পর্শসুখাস্তথা ||৭|| যামিনী সেন্দুতিলকা কামিনী নবযৌবনা | গীতং শ্রোত্রমনোহারি তাম্বূলং মদিরাঃ স্রজঃ ||৮|| গন্ধা মনোজ্ঞা রূপাণি চিত্রাণ্যুপবনানি চ | মনসশ্চাপ্রতীঘাতো বাজীকুর্বন্তি মানবম্ |১০|
सेवमानो यदौचित्याद्वाजीवात्यर्थवेगवान् | नारीस्तर्पयते तेन वाजीकरणमुच्यते ||६|| भोजनानि विचित्राणि पानानि विविधानि च | वाचः श्रोत्रानुगामिन्यस्त्वचः स्पर्शसुखास्तथा ||७|| यामिनी सेन्दुतिलका कामिनी नवयौवना | गीतं श्रोत्रमनोहारि ताम्बूलं मदिराः स्रजः ||८|| गन्धा मनोज्ञा रूपाणि चित्राण्युपवनानि च | मनसश्चाप्रतीघातो वाजीकुर्वन्ति मानवम् |१०|
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Adhikarana 4 (9-15) · Śloka 15
তৈস্তৈর্ভাবৈরহৃদ্যৈস্তু রিরংসোর্মনসি ক্ষতে ||৯|| দ্বেষ্যস্ত্রীসম্প্রযোগাচ্চ ক্লৈব্যং তন্মানসং স্মৃতম্ | কটুকাম্লোষ্ণলবণৈরতিমাত্রোপসেবিতৈঃ ||১০|| সৌম্যধাতুক্ষযো দৃষ্টঃ ক্লৈব্যং তদপরং স্মৃতম্ | অতিব্যবাযশীলো যো ন চ বাজীক্রিযারতঃ ||১১|| ধ্বজভঙ্গমবাপ্নোতি তচ্ছুক্রক্ষযহেতুকম্ | মহতা মেঢ্ররোগেণ মর্মচ্ছেদেন বা পুনঃ ||১২|| ক্লৈব্যমেতচ্চতুর্থং স্যান্নৃণাং পুংস্ত্বোপঘাতজম্ | জন্মপ্রভৃতি যঃ ক্লীবঃ ক্লৈব্যং তত্ সহজং স্মৃতম্ ||১৩|| বলিনঃ ক্ষুব্ধমনসো নিরোধাদ্ ব্রহ্মচর্যতঃ | ষষ্ঠং ক্লৈব্যং মতং তত্তু খরশুক্রনিমিত্তজম্ ||১৪|| অসাধ্যং সহজং ক্লৈব্যং মর্মচ্ছেদাচ্চ যদ্ভবেত্ | সাধ্যানামিতরেষাং তু কার্যো হেতুবিপর্যযঃ ||১৫||
तैस्तैर्भावैरहृद्यैस्तु रिरंसोर्मनसि क्षते ||९|| द्वेष्यस्त्रीसम्प्रयोगाच्च क्लैब्यं तन्मानसं स्मृतम् | कटुकाम्लोष्णलवणैरतिमात्रोपसेवितैः ||१०|| सौम्यधातुक्षयो दृष्टः क्लैब्यं तदपरं स्मृतम् | अतिव्यवायशीलो यो न च वाजीक्रियारतः ||११|| ध्वजभङ्गमवाप्नोति तच्छुक्रक्षयहेतुकम् | महता मेढ्ररोगेण मर्मच्छेदेन वा पुनः ||१२|| क्लैब्यमेतच्चतुर्थं स्यान्नृणां पुंस्त्वोपघातजम् | जन्मप्रभृति यः क्लीबः क्लैब्यं तत् सहजं स्मृतम् ||१३|| बलिनः क्षुब्धमनसो निरोधाद् ब्रह्मचर्यतः | षष्ठं क्लैब्यं मतं तत्तु खरशुक्रनिमित्तजम् ||१४|| असाध्यं सहजं क्लैब्यं मर्मच्छेदाच्च यद्भवेत् | साध्यानामितरेषां तु कार्यो हेतुविपर्ययः ||१५||
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Adhikarana 5 (16-17) · Śloka 18
বিধির্বাজীকরো যস্তু তং প্রবক্ষ্যাম্যতঃ পরম্ | তিলমাষবিদারীণাং শালীনাং চূর্ণমেব বা ||১৬|| পৌণ্ড্রকেক্ষুরসৈরার্দ্রং মর্দিতং সৈন্ধবান্বিতম্ | বরাহমেদসা যুক্তাং ঘৃতেনোত্কারিকাং পচেত্ ||১৭|| তাং ভক্ষযিত্বা পুরুষো গচ্ছেত্তু প্রমদাশতম্ |১৮|
विधिर्वाजीकरो यस्तु तं प्रवक्ष्याम्यतः परम् | तिलमाषविदारीणां शालीनां चूर्णमेव वा ||१६|| पौण्ड्रकेक्षुरसैरार्द्रं मर्दितं सैन्धवान्वितम् | वराहमेदसा युक्तां घृतेनोत्कारिकां पचेत् ||१७|| तां भक्षयित्वा पुरुषो गच्छेत्तु प्रमदाशतम् |१८|
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Adhikarana 6 (18-19) · Śloka 19
বস্তাণ্ডসিদ্ধে পযসি ভাবিতানসকৃত্তিলান্ ||১৮|| শিশুমারবসাপক্বাঃ শষ্কুল্যস্তিস্তৈলৈঃ কৃতাঃ | যঃ খাদেত্ স পুমান্ গচ্ছেত্ স্ত্রীণাং শতমপূর্ববত্ ||১৯||
बस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्तिलान् ||१८|| शिशुमारवसापक्वाः शष्कुल्यस्तिस्तैलैः कृताः | यः खादेत् स पुमान् गच्छेत् स्त्रीणां शतमपूर्ववत् ||१९||
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Adhikarana 7 (20) · Śloka 20
পিপ্পলীলবণোপেতে বস্তাণ্ডে ক্ষীরসর্পিষি | সাধিতে ভক্ষযেদ্যস্তু স গচ্ছেত্ প্রমদাশতম্ ||২০||
पिप्पलीलवणोपेते बस्ताण्डे क्षीरसर्पिषि | साधिते भक्षयेद्यस्तु स गच्छेत् प्रमदाशतम् ||२०||
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Adhikarana 8 (21-22) · Śloka 22
পিপ্পলীমাষশালীনাং যবগোধূমযোস্তথা | চূর্ণভাগৈঃ সমৈস্তৈস্তু ঘৃতে পূপলিকাং পচেত্ ||২১|| তাং ভক্ষযিত্বা পীত্বা তু শর্করামধুরং পযঃ | নরশ্চটকবদ্গচ্ছেদ্দশবারান্নিরন্তরম্ ||২২||
पिप्पलीमाषशालीनां यवगोधूमयोस्तथा | चूर्णभागैः समैस्तैस्तु घृते पूपलिकां पचेत् ||२१|| तां भक्षयित्वा पीत्वा तु शर्करामधुरं पयः | नरश्चटकवद्गच्छेद्दशवारान्निरन्तरम् ||२२||
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Adhikarana 9 (23-24) · Śloka 25
বিদার্যাঃ সুকৃতং চূর্ণং স্বরসেনৈব ভাবিতম্ | সর্পির্মধুযুতং লীঢ্বা দশ স্ত্রীরধিগচ্ছতি ||২৩|| এবমামলকং চূর্ণং স্বরসেনৈব ভাবিতম্ | শর্করামধুসর্পির্ভির্যুক্তং লীঢ্বা পযঃ পিবেত্ ||২৪|| এতেনাশীতিবর্ষোঽপি যুবেব পরিহৃষ্যতি |২৫|
विदार्याः सुकृतं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् | सर्पिर्मधुयुतं लीढ्वा दश स्त्रीरधिगच्छति ||२३|| एवमामलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् | शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीढ्वा पयः पिबेत् ||२४|| एतेनाशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति |२५|
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Adhikarana 10 (25-26) · Śloka 27
পিপ্পলীলবণোপেতে বস্তাণ্ডে ঘৃতসাধিতে ||২৫|| শিশুমারস্য বা খাদেত্তে তু বাজীকরে ভৃশম্ | কুলীরকূর্মনক্রাণামণ্ডান্যেবং তু ভক্ষযেত্ ||২৬|| মহিষর্ষভবস্তানাং পিবেচ্ছুক্রাণি বা নরঃ |২৭|
पिप्पलीलवणोपेते बस्ताण्डे घृतसाधिते ||२५|| शिशुमारस्य वा खादेत्ते तु वाजीकरे भृशम् | कुलीरकूर्मनक्राणामण्डान्येवं तु भक्षयेत् ||२६|| महिषर्षभबस्तानां पिबेच्छुक्राणि वा नरः |२७|
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Adhikarana 11 (27-36) · Śloka 36
অশ্বত্থফলমূলত্বক্শুঙ্গাসিদ্ধং পযো নরঃ ||২৭|| পীত্বা সশর্করাক্ষৌদ্রং কুলিঙ্গ ইব হৃষ্যতি | বিদারিমূলকল্কং তু শৃতেন পযসা নরঃ ||২৮|| উডুম্বরসমং পীত্বা বৃদ্ধোঽপি তরুণাযতে | মাষাণাং পলমেকং তু সংযুক্তং ক্ষৌদ্রসর্পিষা ||২৯|| অবলিহ্য পযঃ পীত্বা তেন বাজী ভবেন্নরঃ | ক্ষীরপক্বাংস্তু গোধূমানাত্মগুপ্তাফলৈঃ সহ ||৩০|| শীতান্ ঘৃতযুতান্ খাদেত্ততঃ পশ্চাত্ পযঃ পিবেত্ | নক্রমূষিকমণ্ডূকচটকাণ্ডকৃতং ঘৃতম্ ||৩১|| পাদাভ্যঙ্গেন কুরুতে বলং ভূমিং তু ন স্পৃশেত্ | যাবত্ স্পৃশতি নো ভূমিং তাবদ্গচ্ছেন্নিরন্তরম্ ||৩২|| স্বযঙ্গুপ্তেক্ষুরকযোঃ ফলচূর্ণং সশর্করম্ | ধারোষ্ণেন নরঃ পীত্বা পযসা ন ক্ষযং ব্রজেত্ ||৩৩|| উচ্চটাচূর্ণমপ্যেবং ক্ষীরেণোত্তমমিষ্যতে | শতাবর্যুচ্চটাচূর্ণং পেযমেবং বলার্থিনা | স্বযঙ্গুপ্তাফলৈর্যুক্তং মাষসূপং পিবেন্নরঃ ||৩৪|| গুপ্তাফলং গোক্ষুরকাচ্চ বীজং তথোচ্চটাং গোপযসা বিপাচ্য | খজাহতং শর্করযা চ যুক্তং পীত্বা নরো হৃষ্যতি সর্বরাত্রম্ ||৩৫|| মাষান্ বিদারীমপি সোচ্চটাং চ ক্ষীরে গবাং ক্ষৌদ্রঘৃতোপপন্নাম্ | পীত্বা নরঃ শর্করযা সুযুক্তাং কুলিঙ্গবদ্ধৃষ্যতি সর্বরাত্রম্ ||৩৬||
अश्वत्थफलमूलत्वक्शुङ्गासिद्धं पयो नरः ||२७|| पीत्वा सशर्कराक्षौद्रं कुलिङ्ग इव हृष्यति | विदारिमूलकल्कं तु शृतेन पयसा नरः ||२८|| उडुम्बरसमं पीत्वा वृद्धोऽपि तरुणायते | माषाणां पलमेकं तु संयुक्तं क्षौद्रसर्पिषा ||२९|| अवलिह्य पयः पीत्वा तेन वाजी भवेन्नरः | क्षीरपक्वांस्तु गोधूमानात्मगुप्ताफलैः सह ||३०|| शीतान् घृतयुतान् खादेत्ततः पश्चात् पयः पिबेत् | नक्रमूषिकमण्डूकचटकाण्डकृतं घृतम् ||३१|| पादाभ्यङ्गेन कुरुते बलं भूमिं तु न स्पृशेत् | यावत् स्पृशति नो भूमिं तावद्गच्छेन्निरन्तरम् ||३२|| स्वयङ्गुप्तेक्षुरकयोः फलचूर्णं सशर्करम् | धारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा न क्षयं व्रजेत् ||३३|| उच्चटाचूर्णमप्येवं क्षीरेणोत्तममिष्यते | शतावर्युच्चटाचूर्णं पेयमेवं बलार्थिना | स्वयङ्गुप्ताफलैर्युक्तं माषसूपं पिबेन्नरः ||३४|| गुप्ताफलं गोक्षुरकाच्च बीजं तथोच्चटां गोपयसा विपाच्य | खजाहतं शर्करया च युक्तं पीत्वा नरो हृष्यति सर्वरात्रम् ||३५|| माषान् विदारीमपि सोच्चटां च क्षीरे गवां क्षौद्रघृतोपपन्नाम् | पीत्वा नरः शर्करया सुयुक्तां कुलिङ्गवद्धृष्यति सर्वरात्रम् ||३६||
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Adhikarana 12 (37-38) · Śloka 38
গৃষ্টীনাং বৃদ্ধবত্সানাং মাষপর্ণভৃতাং গবাম্ | যত্ ক্ষীরং তত্ প্রশংসন্তি বলকামেষু জন্তুষু ||৩৭|| ক্ষীরমাংসগণাঃ সর্বে কাকোল্যাদিশ্চ পূজিতঃ | বাজীকরণহেতোর্হি তস্মাত্তত্তু প্রযোজযেত্ ||৩৮||
गृष्टीनां वृद्धवत्सानां माषपर्णभृतां गवाम् | यत् क्षीरं तत् प्रशंसन्ति बलकामेषु जन्तुषु ||३७|| क्षीरमांसगणाः सर्वे काकोल्यादिश्च पूजितः | वाजीकरणहेतोर्हि तस्मात्तत्तु प्रयोजयेत् ||३८||
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Adhikarana 13 (39) · Śloka 39
এতে বাজীকরা যোগাঃ প্রীত্যপত্যবলপ্রদাঃ | সেব্যা বিশুদ্ধোপচিতদেহৈঃ কালাদ্যপেক্ষযা ||৩৯||
एते वाजीकरा योगाः प्रीत्यपत्यबलप्रदाः | सेव्या विशुद्धोपचितदेहैः कालाद्यपेक्षया ||३९||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 26
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং ক্ষীণবলীযবাজীকরণচিকিত্সিতং নাম ষড্বিংশোঽধ্যাযঃ ||২৬||
इति सुश्रुतसंहितायां क्षीणबलीयवाजीकरणचिकित्सितं नाम षड्विंशोऽध्यायः ||२६||
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