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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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27. sarvōpaghātaśamanīyarasāyanam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ সর্বোপঘাতশমনীযং রসাযনং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः सर्वोपघातशमनीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5

পূর্বে বযসি মধ্যে বা মনুষ্যস্য রসাযনম্ | প্রযুঞ্জীত ভিষক্ প্রাজ্ঞঃ স্নিগ্ধশুদ্ধতনোঃ সদা ||৩|| নাবিশুদ্ধশরীরস্য যুক্তো রাসাযনো বিধিঃ | ন ভাতি বাসসি ক্লিষ্টে রঙ্গযোগ ইবাহিতঃ ||৪|| শরীরস্যোপঘাতা যে দোষজা মানসাস্তথা | উপদিষ্টাঃ প্রদেশেষু তেষাং বক্ষ্যামি বারণম্ ||৫||

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पूर्वे वयसि मध्ये वा मनुष्यस्य रसायनम् | प्रयुञ्जीत भिषक् प्राज्ञः स्निग्धशुद्धतनोः सदा ||३|| नाविशुद्धशरीरस्य युक्तो रासायनो विधिः | न भाति वाससि क्लिष्टे रङ्गयोग इवाहितः ||४|| शरीरस्योपघाता ये दोषजा मानसास्तथा | उपदिष्टाः प्रदेशेषु तेषां वक्ष्यामि वारणम् ||५||

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Adhikarana 3 (6) · Śloka 6

শীতোদকং পযঃ ক্ষৌদ্রং সর্পিরিত্যেকশো দ্বিশঃ | ত্রিশঃ সমস্তমথবা প্রাক্ পীতং স্থাপযেদ্বযঃ ||৬||

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शीतोदकं पयः क्षौद्रं सर्पिरित्येकशो द्विशः | त्रिशः समस्तमथवा प्राक् पीतं स्थापयेद्वयः ||६||

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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7

তত্র বিডঙ্গতণ্ডুলচূর্ণমাহৃত্য যষ্টীমধুকমধুযুক্তং যথাবলং শীততোযেনোপযুঞ্জীত শীততোযং চানুপিবেদেবমহরহর্মাসং, তদেব মধুযুক্তং ভল্লাতকক্বাথেন বা, মধুদ্রাক্ষাক্বাথযুক্তং বা, মধ্বামলকরসাভ্যাং বা, গুডূচীক্বাথেন বা, এবমেতে পঞ্চ প্রযোগা ভবন্তি; জীর্ণে মুদ্গামলকযূষেণালবণেনাল্পস্নেহেন ঘৃতবন্তমোদনমশ্নীযাত্; এতে খল্বর্শাংসি ক্ষপযন্তি, কৃমীনুপঘ্নন্তি, গ্রহণধারণশক্তিং জনযন্তি, মাসে মাসে চ প্রযোগে বর্ষশতং বর্ষশতমাযুষোঽভিবৃদ্ধির্ভবতি ||৭||

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तत्र विडङ्गतण्डुलचूर्णमाहृत्य यष्टीमधुकमधुयुक्तं यथाबलं शीततोयेनोपयुञ्जीत शीततोयं चानुपिबेदेवमहरहर्मासं, तदेव मधुयुक्तं भल्लातकक्वाथेन वा, मधुद्राक्षाक्वाथयुक्तं वा, मध्वामलकरसाभ्यां वा, गुडूचीक्वाथेन वा, एवमेते पञ्च प्रयोगा भवन्ति; जीर्णे मुद्गामलकयूषेणालवणेनाल्पस्नेहेन घृतवन्तमोदनमश्नीयात्; एते खल्वर्शांसि क्षपयन्ति, कृमीनुपघ्नन्ति, ग्रहणधारणशक्तिं जनयन्ति, मासे मासे च प्रयोगे वर्षशतं वर्षशतमायुषोऽभिवृद्धिर्भवति ||७||

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Adhikarana 5 (8-10) · Śloka 10

বিডঙ্গতণ্ডুলানাং দ্রোণং পিষ্টপচনে পিষ্টবদুপস্বেদ্য বিগতকষাযং স্বিন্নমবতার্য দৃষদি পিষ্টমাযসে দৃঢে কুম্ভে মধূদকোত্তরং প্রাবৃষি ভস্মরাশাবন্তর্গৃহে চতুরো মাসান্নিদধ্যাত্, বর্ষাবিগমে চোদ্ধৃত্যোপসংস্কৃতশরীরঃ সহস্রসম্পাতাভিহুতং কৃত্বা প্রাতঃ- প্রাতর্যথাবলমুপযুঞ্জীত, জীর্ণে মুদ্গামলকযূষেণালবণেন ঘৃতবন্তমোদনমশ্নীযাত্, পাংশুশয্যাযাং শযীত, তস্য মাসাদূর্ধ্বং সর্বাঙ্গেভ্যঃ কৃমযো নিষ্ক্রামন্তি, তানণুতৈলেনাভ্যক্তস্য বংশবিদলেনাপহরেত্, দ্বিতীযে পিপীলিকাস্তৃতীযে যূকাস্তথৈবাপহরেত্, চতুর্থে দন্তনখরোমাণ্যবশীর্যন্তে; পঞ্চমে প্রশস্তগুণলক্ষণানি জাযন্তে, অমানুষং চাদিত্যপ্রকাশং বপুরধিগচ্ছতি, দূরাচ্ছ্রবণানি দর্শনা নিচাস্য ভবন্তি, রজস্তমসী চাপোহ্য সত্ত্বমধিতিষ্ঠতি, শ্রুতনিগাদ্যপূর্বোত্পাদী গজবলোঽশ্বজবঃ পুনর্যুবাঽষ্টৌ বর্ষশতান্যাযুরবাপ্নোতি; তস্যাণুতৈলমভ্যঙ্গার্থে, অজকর্ণকষাযমুত্সাদনার্থে, সোশীরং কূপোদকং স্নানার্থে, চন্দনমুপলেপনার্থে, ভল্লাতকবিধানবদাহারঃ পরিহারশ্চ ||৮|| কাশ্মর্যাণাং নিষ্কুলীকৃতানামেষ এব কল্পঃ পাংশুশয্যাভোজনবর্জং; অত্র হি পযসা শৃতেন ভোক্তব্যং, সমানমন্যত্ পূর্বেণাশিষশ্চ | শোণিতপিত্তনিমিত্তেষু বিকারেষ্বেতেষামুপযোগঃ ||৯|| যথোক্তমাগারং প্রবিশ্য বলামূলার্ধপলং পলং বা পযসাঽঽলোড্য পিবেত্, জীর্ণে পযঃ সর্পিরোদন ইত্যাহারঃ, এবং দ্বাদশরাত্রমুপযুজ্য দ্বাদশ বর্ষাণি বযস্তিষ্ঠতি; এবং দিবসশতমুপযুজ্য বর্ষশতং বযস্তিষ্ঠতি | এবমেবাতিবলানাগবলাবিদারীশতাবরীণামুপযোগঃ | বিশেষতস্ত্বতিবলামুদকেন, নাগবলাচূর্ণং মধুনা, বিদারীচূর্ণং ক্ষীরেণ, শতাবরীমপ্যেবং, পূর্বেণান্যত্ সমানমাশিষশ্চ সমাঃ | এতাস্ত্বৌষধযো বলকামানাং শোষিণাং রক্তপিত্তোপসৃষ্টানাং শোণিতং ছর্দযতাং বিরিচ্যমানানাং চোপদিশ্যন্তে ||১০||

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विडङ्गतण्डुलानां द्रोणं पिष्टपचने पिष्टवदुपस्वेद्य विगतकषायं स्विन्नमवतार्य दृषदि पिष्टमायसे दृढे कुम्भे मधूदकोत्तरं प्रावृषि भस्मराशावन्तर्गृहे चतुरो मासान्निदध्यात्, वर्षाविगमे चोद्धृत्योपसंस्कृतशरीरः सहस्रसम्पाताभिहुतं कृत्वा प्रातः- प्रातर्यथाबलमुपयुञ्जीत, जीर्णे मुद्गामलकयूषेणालवणेन घृतवन्तमोदनमश्नीयात्, पांशुशय्यायां शयीत, तस्य मासादूर्ध्वं सर्वाङ्गेभ्यः कृमयो निष्क्रामन्ति, तानणुतैलेनाभ्यक्तस्य वंशविदलेनापहरेत्, द्वितीये पिपीलिकास्तृतीये यूकास्तथैवापहरेत्, चतुर्थे दन्तनखरोमाण्यवशीर्यन्ते; पञ्चमे प्रशस्तगुणलक्षणानि जायन्ते, अमानुषं चादित्यप्रकाशं वपुरधिगच्छति, दूराच्छ्रवणानि दर्शना निचास्य भवन्ति, रजस्तमसी चापोह्य सत्त्वमधितिष्ठति, श्रुतनिगाद्यपूर्वोत्पादी गजबलोऽश्वजवः पुनर्युवाऽष्टौ वर्षशतान्यायुरवाप्नोति; तस्याणुतैलमभ्यङ्गार्थे, अजकर्णकषायमुत्सादनार्थे, सोशीरं कूपोदकं स्नानार्थे, चन्दनमुपलेपनार्थे, भल्लातकविधानवदाहारः परिहारश्च ||८|| काश्मर्याणां निष्कुलीकृतानामेष एव कल्पः पांशुशय्याभोजनवर्जं; अत्र हि पयसा शृतेन भोक्तव्यं, समानमन्यत् पूर्वेणाशिषश्च | शोणितपित्तनिमित्तेषु विकारेष्वेतेषामुपयोगः ||९|| यथोक्तमागारं प्रविश्य बलामूलार्धपलं पलं वा पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, एवं द्वादशरात्रमुपयुज्य द्वादश वर्षाणि वयस्तिष्ठति; एवं दिवसशतमुपयुज्य वर्षशतं वयस्तिष्ठति | एवमेवातिबलानागबलाविदारीशतावरीणामुपयोगः | विशेषतस्त्वतिबलामुदकेन, नागबलाचूर्णं मधुना, विदारीचूर्णं क्षीरेण, शतावरीमप्येवं, पूर्वेणान्यत् समानमाशिषश्च समाः | एतास्त्वौषधयो बलकामानां शोषिणां रक्तपित्तोपसृष्टानां शोणितं छर्दयतां विरिच्यमानानां चोपदिश्यन्ते ||१०||

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Adhikarana 6 (11) · Śloka 11

বারাহীমূলতুলাচূর্ণং কৃত্বা ততো মাত্রাং মধুযুক্তাং পযসাঽঽলোড্য পিবেত্, জীর্ণে পযঃ সর্পিরোদন ইত্যাহারঃ, প্রতিষেধোঽত্র পূর্ববত্ ; প্রযোগমিমমুপসেবমানো বর্ষশতমাযুরবাপ্নোতি স্ত্রীষু চাক্ষযতাম্, এতেনৈব চূর্ণেন পযোঽবচূর্ণ্য শৃতশীতমভিমথ্যাজ্যমুত্পাদ্য মধুযুতমুপযুঞ্জীত সাযম্প্রাতরেককালং বা, জীর্ণে পযঃ সর্পিরোদন ইত্যাহারঃ, এবং মাসমুপযুজ্য বর্ষশতাযুর্ভবতি ||১১||

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वाराहीमूलतुलाचूर्णं कृत्वा ततो मात्रां मधुयुक्तां पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, प्रतिषेधोऽत्र पूर्ववत् ; प्रयोगमिममुपसेवमानो वर्षशतमायुरवाप्नोति स्त्रीषु चाक्षयताम्, एतेनैव चूर्णेन पयोऽवचूर्ण्य शृतशीतमभिमथ्याज्यमुत्पाद्य मधुयुतमुपयुञ्जीत सायम्प्रातरेककालं वा, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, एवं मासमुपयुज्य वर्षशतायुर्भवति ||११||

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Adhikarana 7 (12-13) · Śloka 13

চক্ষুঃকামঃ প্রাণকামো বা বীজকসারাগ্নিমন্থমূলং নিষ্ক্বাথ্য মাষপ্রস্থং সাধযেত্, তস্মিন্ সিধ্যতি চিত্রকমূলানামক্ষমাত্রং কল্কং দদ্যাদামলকরসচতুর্থভাগং, ততঃ স্বিন্নমবতার্য সহস্রসম্পাতাভিহুতং কৃত্বা শীতীভূতং মধুসর্পির্ভ্যাং সংসৃজ্যোপযুঞ্জীত যথাবলং, যথাসাত্ম্যং চ লবণং পরিহরন্ ভক্ষযেত্ | জীর্ণে মুদ্গামলকযূষেণালবণেন ঘৃতবন্তমোদনমশ্নীযাত্ পযসা বা মাসত্রযম্; এবমাভ্যাং প্রযোগাভ্যাং চক্ষুঃ সৌপর্ণং ভবত্যনল্পবলঃ স্ত্রীষু চাক্ষযো বর্ষশতাযুর্ভবতীতি ||১২|| ভবতি চাত্র- পযসা সহ সিদ্ধানি নরঃ শণফলানি যঃ | ভক্ষযেত্ পযসা সার্ধং বযস্তস্য ন শীর্যতে ||১৩||

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चक्षुःकामः प्राणकामो वा बीजकसाराग्निमन्थमूलं निष्क्वाथ्य माषप्रस्थं साधयेत्, तस्मिन् सिध्यति चित्रकमूलानामक्षमात्रं कल्कं दद्यादामलकरसचतुर्थभागं, ततः स्विन्नमवतार्य सहस्रसम्पाताभिहुतं कृत्वा शीतीभूतं मधुसर्पिर्भ्यां संसृज्योपयुञ्जीत यथाबलं, यथासात्म्यं च लवणं परिहरन् भक्षयेत् | जीर्णे मुद्गामलकयूषेणालवणेन घृतवन्तमोदनमश्नीयात् पयसा वा मासत्रयम्; एवमाभ्यां प्रयोगाभ्यां चक्षुः सौपर्णं भवत्यनल्पबलः स्त्रीषु चाक्षयो वर्षशतायुर्भवतीति ||१२|| भवति चात्र- पयसा सह सिद्धानि नरः शणफलानि यः | भक्षयेत् पयसा सार्धं वयस्तस्य न शीर्यते ||१३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 27

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে সর্বোপঘাতশমনীযং রসাযনচিকিত্সিতং নাম সপ্তবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৭||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने सर्वोपघातशमनीयं रसायनचिकित्सितं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ||२७||

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27. sarvōpaghātaśamanīyarasāyanam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi