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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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25. miśrakacikitsitam

Adhikarana 1 (1-12) · Śloka 12

অথাতো মিশ্রকচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| পাল্যামযাস্তু বিস্রাব্যা ইত্যুক্তং প্রাঙ্নিবোধ তান্ | পরিপোটস্তথোত্পাত উন্মন্থো দুঃখবর্ধনঃ ||৩|| পঞ্চমঃ পরিলেহী চ কর্ণপাল্যাং গদাঃ স্মৃতাঃ | সৌকুমার্যাচ্চিরোত্সৃষ্টে সহসাঽভিপ্রবর্ধিতে ||৪|| কর্ণশোফো ভবেত্ পাল্যাং সরুজঃ পরিপোটবান্ | কৃষ্ণারুণনিভঃ স্তব্ধঃ স বাতাত্ পরিপোটকঃ ||৫|| গুর্বাভরণসংযোগাত্তাডনাদ্ধর্ষণাদপি | শোফঃ পাল্যাং ভবেচ্ছ্যাবো দাহপাকরুনান্বিতঃ ||৬|| রক্তো বা রক্তপিত্তাভ্যামুত্পাতঃ স গদো মতঃ | বলাদ্বর্ধযতঃ কর্ণং পাল্যাং বাযুঃ প্রকুপ্যতি ||৭|| গৃহীত্বা সকফং কুর্যাচ্ছোফং তদ্বর্ণবেদনম্ | উন্মন্থকঃ সকণ্ডূকো বিকারঃ কফবাতজঃ ||৮|| বর্ধমানে যদা কর্ণে কণ্ডূদাহরুগন্বিতঃ | শোফো ভবতি পাকশ্চ ত্বক্স্থোঽসৌ দুঃখবর্ধনঃ ||৯|| কফাসৃক্কৃমযঃ কুর্যুঃ সর্ষপাভা বিকারিণীঃ | স্রাবিণীঃ পিডকাঃ পাল্যাং কণ্ডূদাহরুগন্বিতাঃ ||১০|| কফাসৃক্কৃমিসম্ভূতঃ স বিসর্পন্নিতস্ততঃ | লিহ্যাত্ সশষ্কুলীং পালীং পরিলেহীতি স স্মৃতঃ ||১১|| পাল্যামযা হ্যমী ঘোরা নরস্যাপ্রতিকারিণঃ | মিথ্যাহারবিহারস্য পালিং হিংস্যুরুপেক্ষিতাঃ ||১২||

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अथातो मिश्रकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| पाल्यामयास्तु विस्राव्या इत्युक्तं प्राङ्निबोध तान् | परिपोटस्तथोत्पात उन्मन्थो दुःखवर्धनः ||३|| पञ्चमः परिलेही च कर्णपाल्यां गदाः स्मृताः | सौकुमार्याच्चिरोत्सृष्टे सहसाऽभिप्रवर्धिते ||४|| कर्णशोफो भवेत् पाल्यां सरुजः परिपोटवान् | कृष्णारुणनिभः स्तब्धः स वातात् परिपोटकः ||५|| गुर्वाभरणसंयोगात्ताडनाद्धर्षणादपि | शोफः पाल्यां भवेच्छ्यावो दाहपाकरुनान्वितः ||६|| रक्तो वा रक्तपित्ताभ्यामुत्पातः स गदो मतः | बलाद्वर्धयतः कर्णं पाल्यां वायुः प्रकुप्यति ||७|| गृहीत्वा सकफं कुर्याच्छोफं तद्वर्णवेदनम् | उन्मन्थकः सकण्डूको विकारः कफवातजः ||८|| वर्धमाने यदा कर्णे कण्डूदाहरुगन्वितः | शोफो भवति पाकश्च त्वक्स्थोऽसौ दुःखवर्धनः ||९|| कफासृक्कृमयः कुर्युः सर्षपाभा विकारिणीः | स्राविणीः पिडकाः पाल्यां कण्डूदाहरुगन्विताः ||१०|| कफासृक्कृमिसम्भूतः स विसर्पन्नितस्ततः | लिह्यात् सशष्कुलीं पालीं परिलेहीति स स्मृतः ||११|| पाल्यामया ह्यमी घोरा नरस्याप्रतिकारिणः | मिथ्याहारबिहारस्य पालिं हिंस्युरुपेक्षिताः ||१२||

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Adhikarana 2 (13-27) · Śloka 28

তস্মাদাশু ভিষক্ তেষু স্নেহাদিক্রমমাচরেত্ | তথাঽভ্যঙ্গপরীষেকপ্রদেহাসৃগ্বিমোক্ষণম্ ||১৩|| সামান্যতো বিশেষাচ্চ বক্ষ্যাম্যভ্যঞ্জনং প্রতি | খরমঞ্জরিযষ্ট্যাহ্বসৈন্ধবামরদারুভিঃ ||১৪|| সুপিষ্টৈঃ সাশ্বগন্ধৈশ্চ মূলকাবল্গুজৈঃ ফলৈঃ | সর্পিস্তৈলবসামজ্জমধূচ্ছিষ্টানি পাচযেত্ ||১৫|| সক্ষীরাণ্যথ তৈঃ পালিং প্রদিহ্যাত্ পরিপোটকে | মঞ্জিষ্ঠাতিলযষ্ট্যাহ্বসারিবোত্পলপদ্মকৈঃ ||১৬|| সরোধ্রৈঃ সকদম্বৈশ্চ বলাজম্ব্বাম্রপল্লবৈঃ | সিদ্ধং ধান্যাম্লসংযুক্তং তৈলমুত্পাতনাশনম্ ||১৭|| তালপত্র্যশ্বগন্ধার্কবাকুচীফলসৈন্ধবৈঃ | তৈলং কুলীরগোধাভ্যাং বসযা সহ পাচিতম্ ||১৮|| সরলালাঙ্গলীভ্যাং চ হিতমুন্মন্থনাশনম্ | তথাঽশ্মন্তকজম্ব্বাম্রপত্রক্বাথেন সেচনম্ ||১৯|| প্রপৌণ্ডরীকমধুকমঞ্জিষ্ঠারজনীদ্বযৈঃ | চূর্ণৈরুদ্বর্তনৈঃ পালীং তৈলাক্তামবচূর্ণযেত্ ||২০|| লাক্ষাবিডঙ্গকল্কেন তৈলং পক্ত্বাঽবচারযেত্ | স্বিন্নাং গোমযপিণ্ডেন প্রদিহ্যাত্ পরিলেহিকে ||২১|| পিষ্টৈর্বিডঙ্গৈরথবা ত্রিবৃচ্ছ্যামার্কসংযুতৈঃ | করঞ্জেঙ্গুদিবীজৈর্বা কুটজারগ্বধাযুতৈঃ ||২২|| সর্বৈর্বা সার্ষপং তৈলং সিদ্ধং মরিচসংযুতম্ | সনিম্বপত্রৈরভ্যঙ্গে মধূচ্ছিষ্টান্বিতং হিতম্ ||২৩|| পালীষু ব্যাধিযুক্তাসু তন্বীষু কঠিনাসু চ | পুষ্ট্যর্থং মার্দবার্থং চ কুর্যাদভ্যঞ্জনং ত্বিদম্ ||২৪|| লোপাকানূপমজ্জানং বসাং তৈলং নবং ঘৃতম্ | পচেদ্দশগুণং ক্ষীরমাবাপ্য মধুরং গণম্ ||২৫|| অপামার্গাশ্বগন্ধে চ তথা লাক্ষারসং শুভম্ | তত্সিদ্ধং পরিপূতং চ স্বনুগুপ্তং নিধাপযেত্ ||২৬|| তেনাভ্যঞ্জ্যাত্ সদা পালীং সুস্বিন্নামতিমর্দিতাম্ | এতেন পাল্যো বর্ধন্তে নিরুজো নিরুপদ্রবাঃ ||২৭|| মৃদ্ব্যঃ পুষ্টাঃ সমাঃ স্নিগ্ধা জাযন্তে ভূষণক্ষমাঃ |২৮|

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तस्मादाशु भिषक् तेषु स्नेहादिक्रममाचरेत् | तथाऽभ्यङ्गपरीषेकप्रदेहासृग्विमोक्षणम् ||१३|| सामान्यतो विशेषाच्च वक्ष्याम्यभ्यञ्जनं प्रति | खरमञ्जरियष्ट्याह्वसैन्धवामरदारुभिः ||१४|| सुपिष्टैः साश्वगन्धैश्च मूलकावल्गुजैः फलैः | सर्पिस्तैलवसामज्जमधूच्छिष्टानि पाचयेत् ||१५|| सक्षीराण्यथ तैः पालिं प्रदिह्यात् परिपोटके | मञ्जिष्ठातिलयष्ट्याह्वसारिवोत्पलपद्मकैः ||१६|| सरोध्रैः सकदम्बैश्च बलाजम्ब्वाम्रपल्लवैः | सिद्धं धान्याम्लसंयुक्तं तैलमुत्पातनाशनम् ||१७|| तालपत्र्यश्वगन्धार्कबाकुचीफलसैन्धवैः | तैलं कुलीरगोधाभ्यां वसया सह पाचितम् ||१८|| सरलालाङ्गलीभ्यां च हितमुन्मन्थनाशनम् | तथाऽश्मन्तकजम्ब्वाम्रपत्रक्वाथेन सेचनम् ||१९|| प्रपौण्डरीकमधुकमञ्जिष्ठारजनीद्वयैः | चूर्णैरुद्वर्तनैः पालीं तैलाक्तामवचूर्णयेत् ||२०|| लाक्षाविडङ्गकल्केन तैलं पक्त्वाऽवचारयेत् | स्विन्नां गोमयपिण्डेन प्रदिह्यात् परिलेहिके ||२१|| पिष्टैर्विडङ्गैरथवा त्रिवृच्छ्यामार्कसंयुतैः | करञ्जेङ्गुदिबीजैर्वा कुटजारग्वधायुतैः ||२२|| सर्वैर्वा सार्षपं तैलं सिद्धं मरिचसंयुतम् | सनिम्बपत्रैरभ्यङ्गे मधूच्छिष्टान्वितं हितम् ||२३|| पालीषु व्याधियुक्तासु तन्वीषु कठिनासु च | पुष्ट्यर्थं मार्दवार्थं च कुर्यादभ्यञ्जनं त्विदम् ||२४|| लोपाकानूपमज्जानं वसां तैलं नवं घृतम् | पचेद्दशगुणं क्षीरमावाप्य मधुरं गणम् ||२५|| अपामार्गाश्वगन्धे च तथा लाक्षारसं शुभम् | तत्सिद्धं परिपूतं च स्वनुगुप्तं निधापयेत् ||२६|| तेनाभ्यञ्ज्यात् सदा पालीं सुस्विन्नामतिमर्दिताम् | एतेन पाल्यो वर्धन्ते निरुजो निरुपद्रवाः ||२७|| मृद्व्यः पुष्टाः समाः स्निग्धा जायन्ते भूषणक्षमाः |२८|

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Adhikarana 3 (28-31) · Śloka 31

নীলীদলং ভৃঙ্গরজোঽর্জুনত্বক্ পিণ্ডীতকং কৃষ্ণমযোরজশ্চ | বীজোদ্ভবং সাহচরং চ পুষ্পং পথ্যাক্ষধাত্রীসহিতং বিচূর্ণ্য ||২৮|| একীকৃতং সর্বমিদং প্রমায পঙ্কেন তুল্যং নলিনীভবেন | সংযোজ্য পক্ষং কলশে নিধায লৌহে ঘটে সদ্মনি সাপিধানে ||২৯|| অনেন তৈলং বিপচেদ্বিমিশ্রং রসেন ভৃঙ্গত্রিফলাভ বেন | আসন্নপাকে চ পরীক্ষণার্থং পত্রং বলাকাভবমাক্ষিপেচ্চ ||৩০|| ভবেদ্যদা তদ্ভ্রমরাঙ্গনীলং তদা বিপক্বং বিনিধায পাত্রে | কৃষ্ণাযসে মাসমবস্থিতং তদভ্যঙ্গযোগাত্ পলিতানি হন্যাত্ ||৩১||

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नीलीदलं भृङ्गरजोऽर्जुनत्वक् पिण्डीतकं कृष्णमयोरजश्च | बीजोद्भवं साहचरं च पुष्पं पथ्याक्षधात्रीसहितं विचूर्ण्य ||२८|| एकीकृतं सर्वमिदं प्रमाय पङ्केन तुल्यं नलिनीभवेन | संयोज्य पक्षं कलशे निधाय लौहे घटे सद्मनि सापिधाने ||२९|| अनेन तैलं विपचेद्विमिश्रं रसेन भृङ्गत्रिफलाभ वेन | आसन्नपाके च परीक्षणार्थं पत्रं बलाकाभवमाक्षिपेच्च ||३०|| भवेद्यदा तद्भ्रमराङ्गनीलं तदा विपक्वं विनिधाय पात्रे | कृष्णायसे मासमवस्थितं तदभ्यङ्गयोगात् पलितानि हन्यात् ||३१||

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Adhikarana 4 (32-37) · Śloka 37

সৈরীযজম্ব্বর্জুনকাশ্মরীজং পুষ্পং তিলান্মার্কবচূতবীজে | পুনর্নবে কর্দমকণ্টকার্যৌ কাসীসপিণ্ডীতকবীজসারম্ ||৩২|| ফলত্রযং লোহরজোঽঞ্জনং চ যষ্ট্যাহ্বযং নীরজসারিবে চ | পিষ্ট্বাঽথ সর্বং সহ মোদযন্ত্যা সারাম্ভসা বীজকসম্ভবেন ||৩৩|| সারাম্ভসঃ সপ্তভিরেব পশ্চাত্ প্রস্থৈঃ সমালোড্য দশাহগুপ্তম্ | লৌহে সুপাত্রে বিনিধায তৈলমক্ষোদ্ভবং তচ্চ পচেত্ প্রযত্নাত্ ||৩৪|| পক্বং চ লৌহেঽভিনবে নিধায নস্যং বিদধ্যাত্ পরিশুদ্ধকাযঃ | অভ্যঙ্গযোগৈশ্চ নিযুজ্যমানং ভুঞ্জীত মাষান্ কৃশরামথো বা ||৩৫|| মাসোপরিষ্টাদ্ধনকুঞ্চিতাগ্রাঃ কেশা ভবন্তি ভ্রমরাঞ্জনাভাঃ | কেশাস্তথাঽন্যে খলতৌ ভবেযুর্জরা ন চৈনং সহসাঽভ্যুপৈতি ||৩৬|| বলং পরং সম্ভবতীন্দ্রিযাণাং ভবেচ্চ বক্ত্রং বলিভির্বিমুক্তম্ | নাকামিনেঽনর্থিনি নাকৃতায নৈবারযে তৈলমিদং প্রদেযম্ ||৩৭||

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सैरीयजम्ब्वर्जुनकाश्मरीजं पुष्पं तिलान्मार्कवचूतबीजे | पुनर्नवे कर्दमकण्टकार्यौ कासीसपिण्डीतकबीजसारम् ||३२|| फलत्रयं लोहरजोऽञ्जनं च यष्ट्याह्वयं नीरजसारिवे च | पिष्ट्वाऽथ सर्वं सह मोदयन्त्या साराम्भसा बीजकसम्भवेन ||३३|| साराम्भसः सप्तभिरेव पश्चात् प्रस्थैः समालोड्य दशाहगुप्तम् | लौहे सुपात्रे विनिधाय तैलमक्षोद्भवं तच्च पचेत् प्रयत्नात् ||३४|| पक्वं च लौहेऽभिनवे निधाय नस्यं विदध्यात् परिशुद्धकायः | अभ्यङ्गयोगैश्च नियुज्यमानं भुञ्जीत माषान् कृशरामथो वा ||३५|| मासोपरिष्टाद्धनकुञ्चिताग्राः केशा भवन्ति भ्रमराञ्जनाभाः | केशास्तथाऽन्ये खलतौ भवेयुर्जरा न चैनं सहसाऽभ्युपैति ||३६|| बलं परं सम्भवतीन्द्रियाणां भवेच्च वक्त्रं वलिभिर्विमुक्तम् | नाकामिनेऽनर्थिनि नाकृताय नैवारये तैलमिदं प्रदेयम् ||३७||

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Adhikarana 5 (38-42) · Śloka 42

লাক্ষা রোধ্রং দ্বে হরিদ্রে শিলালে কুষ্ঠং নাগং গৈরিকা বর্ণকাশ্চ | মঞ্জিষ্ঠোগ্রা স্যাত্ সুরাষ্ট্রোদ্ভবা চ পত্তঙ্গং বৈ রোচনা চাঞ্জনং চ ||৩৮|| হেমাঙ্গত্বক্ পাণ্ডুপত্রং বটস্য কালীযং স্যাত্ পদ্মকং পদ্মমধ্যম্ | রক্তং শ্বেতং চন্দনং পারদং চ কাকোল্যাদিঃ ক্ষীরপিষ্টশ্চ বর্গঃ ||৩৯|| মেদো মজ্জা সিক্থকং গোঘৃতং চ দুগ্ধং ক্বাথঃ ক্ষীরিণাং চ দ্রুমাণাম্ | এতত্ সর্বং পক্বমৈকধ্যতস্তু বক্ত্রাভ্যঙ্গে সর্পিরুক্তং প্রধানম্ ||৪০|| হন্যাদ্ ব্যঙ্গং নীলিকাং চাতিবৃদ্ধাং বক্ত্রে জাতাঃ স্ফোটিকাশ্চাপি কাশ্চিত্ | পদ্মাকারং নির্বলীকং চ বক্ত্রং কুর্যাদেতত্ পীনগণ্ডং মনোজ্ঞম্ ||৪১|| রাজ্ঞামেতদ্যোষিতাং চাপি নিত্যং কুর্যাদ্বৈদ্যস্তত্সমানাং নৃণাং চ | কুষ্ঠঘ্নং বৈ সর্পিরেতত্ প্রধানং যেষাং পাদে সন্তি বৈপাদিকাশ্চ ||৪২||

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लाक्षा रोध्रं द्वे हरिद्रे शिलाले कुष्ठं नागं गैरिका वर्णकाश्च | मञ्जिष्ठोग्रा स्यात् सुराष्ट्रोद्भवा च पत्तङ्गं वै रोचना चाञ्जनं च ||३८|| हेमाङ्गत्वक् पाण्डुपत्रं वटस्य कालीयं स्यात् पद्मकं पद्ममध्यम् | रक्तं श्वेतं चन्दनं पारदं च काकोल्यादिः क्षीरपिष्टश्च वर्गः ||३९|| मेदो मज्जा सिक्थकं गोघृतं च दुग्धं क्वाथः क्षीरिणां च द्रुमाणाम् | एतत् सर्वं पक्वमैकध्यतस्तु वक्त्राभ्यङ्गे सर्पिरुक्तं प्रधानम् ||४०|| हन्याद् व्यङ्गं नीलिकां चातिवृद्धां वक्त्रे जाताः स्फोटिकाश्चापि काश्चित् | पद्माकारं निर्वलीकं च वक्त्रं कुर्यादेतत् पीनगण्डं मनोज्ञम् ||४१|| राज्ञामेतद्योषितां चापि नित्यं कुर्याद्वैद्यस्तत्समानां नृणां च | कुष्ठघ्नं वै सर्पिरेतत् प्रधानं येषां पादे सन्ति वैपादिकाश्च ||४२||

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Adhikarana 6 (43) · Śloka 43

হরীতকীচূর্ণমরিষ্টপত্রং চূতত্বচং দাডিমপুষ্পবৃন্তম্ | পত্রং চ দদ্যান্মদযন্তিকাযা লেপোঽঙ্গরাগো নরদেবযোগ্যঃ ||৪৩||

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हरीतकीचूर्णमरिष्टपत्रं चूतत्वचं दाडिमपुष्पवृन्तम् | पत्रं च दद्यान्मदयन्तिकाया लेपोऽङ्गरागो नरदेवयोग्यः ||४३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 25

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মিশ্রকচিকিত্সিতং নাম পঞ্চবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৫||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मिश्रकचिकित्सितं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ||२५||

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