Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মেধাযুষ্কামীযং রসাযনচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो मेधायुष्कामीयं रसायनचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মেধাযুষ্কামীযং রসাযনচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो मेधायुष्कामीयं रसायनचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4
মেধাযুঃকামঃ শ্বেতাবল্গুজফলান্যাতপপরিশুষ্কাণ্যাদায সূক্ষ্মচূর্ণানি কৃত্বা গুডেন সহালোড্য স্নেহকুম্ভে সপ্তরাত্রং ধান্যরাশৌ নিদধ্যাত্, সপ্তরাত্রাদুদ্ধৃত্য হৃতদোষস্য যথাবলং পিণ্ডং প্রযচ্ছেদনুদিতে সূর্যে, উষ্ণোদকং চানুপিবেত্; ভল্লাতকবিধানবচ্চাগারপ্রবেশঃ, জীর্ণৌষধশ্চাপরাহ্ণে হিমাভিরদ্ভিঃ পরিষিক্তগাত্রঃ শালীনাং ষষ্টিকানাং চ পযসা শর্করামধুরেণৌদনমশ্নীযাত্; এবং ষণ্মাসানুপযুজ্য বিগতপাপ্মা বলবর্ণোপেতঃ শ্রুতনিগাদী স্মৃতিমানরোগো বর্ষশতাযুর্ভবতি | কুষ্ঠিনং পাণ্ডুরোগিণমুদরিণং বা কৃষ্ণাযা গোর্মূত্রেণালোড্যার্ধপলিকং পিণ্ডং বিগতলৌহিত্যে সবিতরি পাযযেত্, পরাহ্ণে চালবণেনামলকযূষেণ সর্পিষ্মন্তমোদনমশ্নীযাত্, এবং মাসমুপযুজ্য স্মৃতিমানরোগো বর্ষশতাযুর্ভবতি | এষ এবোপযোগশ্চিত্রকমূলানাং রজন্যাশ্চ; চিত্রকমূলে বিশেষো দ্বিপলিকং পিণ্ডং পরং প্রমাণং, শেষং পূর্ববত্ ||৩|| হৃতদোষ এব প্রতিসংসৃষ্টভক্তো যথাক্রমমাগারং প্রবিশ্য মণ্ডূকপর্ণীস্বরসমাদায সহস্রসম্পাতাভিহুতং কৃত্বা যথাবলং পযসাঽঽলোড্য পিবেত্ পযোঽনুপানং বা, তস্যাং জীর্ণাযাং যবান্নং পযসোপযুঞ্জীত; তিলৈর্বা সহ ভক্ষযেত্ত্রীন্ মাসান্ পযোঽনুপানং, জীর্ণে পযঃ সর্পিরোদন ইত্যাহারঃ; এবমুপযুঞ্জানো ব্রহ্মবর্চসী শ্রুতনিগাদী ভবতি বর্ষশতমাযুরবাপ্নোতি | ত্রিরাত্রোপোষিতশ্চ ত্রিরাত্রমেনাং ভক্ষযেত্, ত্রিরাত্রাদূর্ধ্বং পযঃ সর্পিরিতি চোপযুঞ্জীত | বিল্বমাত্রং পিণ্ডং বা পযসাঽঽলোড্য পিবেত্, এবং দ্বাদশরাত্রমুপযুজ্য মেধাবী বর্ষশতাযুর্ভবতি ||৪||
मेधायुःकामः श्वेतावल्गुजफलान्यातपपरिशुष्काण्यादाय सूक्ष्मचूर्णानि कृत्वा गुडेन सहालोड्य स्नेहकुम्भे सप्तरात्रं धान्यराशौ निदध्यात्, सप्तरात्रादुद्धृत्य हृतदोषस्य यथाबलं पिण्डं प्रयच्छेदनुदिते सूर्ये, उष्णोदकं चानुपिबेत्; भल्लातकविधानवच्चागारप्रवेशः, जीर्णौषधश्चापराह्णे हिमाभिरद्भिः परिषिक्तगात्रः शालीनां षष्टिकानां च पयसा शर्करामधुरेणौदनमश्नीयात्; एवं षण्मासानुपयुज्य विगतपाप्मा बलवर्णोपेतः श्रुतनिगादी स्मृतिमानरोगो वर्षशतायुर्भवति | कुष्ठिनं पाण्डुरोगिणमुदरिणं वा कृष्णाया गोर्मूत्रेणालोड्यार्धपलिकं पिण्डं विगतलौहित्ये सवितरि पाययेत्, पराह्णे चालवणेनामलकयूषेण सर्पिष्मन्तमोदनमश्नीयात्, एवं मासमुपयुज्य स्मृतिमानरोगो वर्षशतायुर्भवति | एष एवोपयोगश्चित्रकमूलानां रजन्याश्च; चित्रकमूले विशेषो द्विपलिकं पिण्डं परं प्रमाणं, शेषं पूर्ववत् ||३|| हृतदोष एव प्रतिसंसृष्टभक्तो यथाक्रममागारं प्रविश्य मण्डूकपर्णीस्वरसमादाय सहस्रसम्पाताभिहुतं कृत्वा यथाबलं पयसाऽऽलोड्य पिबेत् पयोऽनुपानं वा, तस्यां जीर्णायां यवान्नं पयसोपयुञ्जीत; तिलैर्वा सह भक्षयेत्त्रीन् मासान् पयोऽनुपानं, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहारः; एवमुपयुञ्जानो ब्रह्मवर्चसी श्रुतनिगादी भवति वर्षशतमायुरवाप्नोति | त्रिरात्रोपोषितश्च त्रिरात्रमेनां भक्षयेत्, त्रिरात्रादूर्ध्वं पयः सर्पिरिति चोपयुञ्जीत | बिल्वमात्रं पिण्डं वा पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, एवं द्वादशरात्रमुपयुज्य मेधावी वर्षशतायुर्भवति ||४||
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Adhikarana 3 (5-6) · Śloka 6
হৃতদোষ এবাগারং প্রবিশ্য প্রতিসংসৃষ্টভক্তো ব্রাহ্মীস্বরসমাদায সহস্রসম্পাতাভিহুতং কৃত্বা যথাবলমুপযুঞ্জীত, জীর্ণৌষধশ্চাপরাহ্ণে যবাগূমলবণাং পিবেত্, ক্ষীরসাত্ম্যো বা পযসা ভুঞ্জীত, এবং সপ্তরাত্রমুপযুজ্য ব্রহ্মবর্চসী মেধাবী ভবতি, দ্বিতীযং সপ্তরাত্রমুপযুজ্য গ্রন্থমীপ্সিতমুত্পাদযতি নষ্টং চাস্য প্রাদুর্ভবতি, তৃতীযং সপ্তরাত্রমুপযুজ্য দ্বিরুচ্চারিতং শতমপ্যবধারযতি, এবমেকবিংশতিরাত্রমুপযুজ্যালক্ষ্মীরপক্রামতি; মূর্তিমতী চৈনং বাগ্দেব্যনুপ্রবিশতি, সর্বাশ্চৈনং শ্রুতয উপতিষ্ঠন্তি, শ্রুতধরঃ পঞ্চবর্ষশতাযুর্ভবতি ||৫|| ব্রাহ্মীস্বরসপ্রস্থদ্বযে ঘৃতপ্রস্থং বিডঙ্গতণ্ডুলানাং কুডবং দ্বে দ্বে পলে বচামৃতযোর্দ্বাদশ হরীতক্যামলকবিভীতকানি শ্লক্ষ্ণপিষ্টান্যাবাপ্যৈকধ্যং সাধযিত্বা স্বনুগুপ্তং নিদধ্যাত্, ততঃ পূর্ববিধানেন মাত্রাং যথাবলমুপযুঞ্জীত, জীর্ণে পযঃ সর্পিরোদন ইত্যাহারঃ, পূর্ববচ্চাত্র পরীহারঃ, এতেনোর্ধ্বমধস্তির্যক্ কৃমযো নিষ্ক্রামন্তি, অলক্ষ্মীরপক্রামতি, পুষ্করবর্ণঃ স্থিরবযাঃ শ্রুতনিগাদী ত্রিবর্ষশতাযুর্ভবতি; এতদেব কুষ্ঠবিষমজ্বরাপস্মারোন্মাদবিষভূতগ্রহেষ্বন্যেষু চ মহাব্যাধিষু সংশোধনমাদিশন্তি ||৬||
हृतदोष एवागारं प्रविश्य प्रतिसंसृष्टभक्तो ब्राह्मीस्वरसमादाय सहस्रसम्पाताभिहुतं कृत्वा यथाबलमुपयुञ्जीत, जीर्णौषधश्चापराह्णे यवागूमलवणां पिबेत्, क्षीरसात्म्यो वा पयसा भुञ्जीत, एवं सप्तरात्रमुपयुज्य ब्रह्मवर्चसी मेधावी भवति, द्वितीयं सप्तरात्रमुपयुज्य ग्रन्थमीप्सितमुत्पादयति नष्टं चास्य प्रादुर्भवति, तृतीयं सप्तरात्रमुपयुज्य द्विरुच्चारितं शतमप्यवधारयति, एवमेकविंशतिरात्रमुपयुज्यालक्ष्मीरपक्रामति; मूर्तिमती चैनं वाग्देव्यनुप्रविशति, सर्वाश्चैनं श्रुतय उपतिष्ठन्ति, श्रुतधरः पञ्चवर्षशतायुर्भवति ||५|| ब्राह्मीस्वरसप्रस्थद्वये घृतप्रस्थं विडङ्गतण्डुलानां कुडवं द्वे द्वे पले वचामृतयोर्द्वादश हरीतक्यामलकबिभीतकानि श्लक्ष्णपिष्टान्यावाप्यैकध्यं साधयित्वा स्वनुगुप्तं निदध्यात्, ततः पूर्वविधानेन मात्रां यथाबलमुपयुञ्जीत, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, पूर्ववच्चात्र परीहारः, एतेनोर्ध्वमधस्तिर्यक् कृमयो निष्क्रामन्ति, अलक्ष्मीरपक्रामति, पुष्करवर्णः स्थिरवयाः श्रुतनिगादी त्रिवर्षशतायुर्भवति; एतदेव कुष्ठविषमज्वरापस्मारोन्मादविषभूतग्रहेष्वन्येषु च महाव्याधिषु संशोधनमादिशन्ति ||६||
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Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8
হৃতদোষ এবাগারং প্রবিশ্য হৈমবত্যা বচাযাঃ পিণ্ডমামলকমাত্রমভিহুতং পযসাঽঽলোড্য পিবেত্, জীর্ণে পযঃ সর্পিরোদন ইত্যাহারঃ, এবং দ্বাদশরাত্র মুপযুঞ্জীত, ততোঽস্য শ্রোত্রং বিব্রিযতে, দ্বিরভ্যাসাত্ স্মৃতিমান্ ভবতি, ত্রিরভ্যাসাচ্ছ্রুতমাদত্তে, চতুর্দ্বাদশরাত্রমুপযুজ্য সর্বং তরতি কিল্বিষং, তার্ক্ষ্যদর্শনমুত্পদ্যতে, শতাযুশ্চ ভবতি | দ্বে দ্বে পলে ইত রস্যা বচাযা নিষ্ক্বাথ্য পিবেত্ পযসা, সমানং ভোজনং, সমাঃ পূর্বেণাশিষশ্চ ||৭|| বচাশতপাকং বা সর্পির্দ্রোণমুপযুজ্য পঞ্চবর্ষশতাযুর্ভবতি, গলগণ্ডাপচীশ্লীপদস্বরভেদাংশ্চাপহন্তীতি ||৮||
हृतदोष एवागारं प्रविश्य हैमवत्या वचायाः पिण्डमामलकमात्रमभिहुतं पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, एवं द्वादशरात्र मुपयुञ्जीत, ततोऽस्य श्रोत्रं विव्रियते, द्विरभ्यासात् स्मृतिमान् भवति, त्रिरभ्यासाच्छ्रुतमादत्ते, चतुर्द्वादशरात्रमुपयुज्य सर्वं तरति किल्बिषं, तार्क्ष्यदर्शनमुत्पद्यते, शतायुश्च भवति | द्वे द्वे पले इत रस्या वचाया निष्क्वाथ्य पिबेत् पयसा, समानं भोजनं, समाः पूर्वेणाशिषश्च ||७|| वचाशतपाकं वा सर्पिर्द्रोणमुपयुज्य पञ्चवर्षशतायुर्भवति, गलगण्डापचीश्लीपदस्वरभेदांश्चापहन्तीति ||८||
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Adhikarana 5 (9-13) · Śloka 13
অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি আযুষ্কামরসাযনম্ | মন্ত্রৌষধসমাযুক্তং সংবত্সরফলপ্রদম্ ||৯|| বিল্বস্য চূর্ণং পুষ্যে তু হুতং বারান্ সহস্রশঃ | শ্রীসূক্তেন নরঃ কল্যে সসুবর্ণং দিনে দিনে ||১০|| সর্পির্মধুযুতং লিহ্যাদলক্ষ্মীনাশনং পরম্ | ত্বচং বিহায বিল্বস্য মূলক্বাথং দিনে দিনে ||১১|| প্রাশ্নীযাত্ পযসা সার্ধং স্নাত্বা হুত্বা সমাহিতঃ | দশসাহস্রমাযুষ্যং স্মৃতং যুক্তরথং ভবেত্ ||১২|| হুত্বা বিসানাং ক্বাথং তু মধুলাজৈশ্চ সংযুতম্ | অমোঘং শতসাহস্রং যুক্তং যুক্তরথং স্মৃতম্ ||১৩||
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आयुष्कामरसायनम् | मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सरफलप्रदम् ||९|| बिल्वस्य चूर्णं पुष्ये तु हुतं वारान् सहस्रशः | श्रीसूक्तेन नरः कल्ये ससुवर्णं दिने दिने ||१०|| सर्पिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम् | त्वचं विहाय बिल्वस्य मूलक्वाथं दिने दिने ||११|| प्राश्नीयात् पयसा सार्धं स्नात्वा हुत्वा समाहितः | दशसाहस्रमायुष्यं स्मृतं युक्तरथं भवेत् ||१२|| हुत्वा बिसानां क्वाथं तु मधुलाजैश्च संयुतम् | अमोघं शतसाहस्रं युक्तं युक्तरथं स्मृतम् ||१३||
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Adhikarana 6 (14-16) · Śloka 16
সুবর্ণং পদ্মবীজানি মধু লাজাঃ প্রিযঙ্গবঃ | গব্যেন পযসা পীতমলক্ষ্মীং প্রতিষেধযেত্ ||১৪|| নীলোত্পলদলক্বাথো গব্যেন পযসা শৃতঃ | সসুবর্ণস্তিলৈঃ সার্ধমলক্ষ্মীনাশনঃ স্মৃতঃ ||১৫|| গব্যং পযঃ সুবর্ণং চ মধূচ্ছিষ্টং চ মাক্ষিকম্ | পীতং শতসহস্রাভিহুতং যুক্তরথং স্মৃতম্ ||১৬||
सुवर्णं पद्मबीजानि मधु लाजाः प्रियङ्गवः | गव्येन पयसा पीतमलक्ष्मीं प्रतिषेधयेत् ||१४|| नीलोत्पलदलक्वाथो गव्येन पयसा शृतः | ससुवर्णस्तिलैः सार्धमलक्ष्मीनाशनः स्मृतः ||१५|| गव्यं पयः सुवर्णं च मधूच्छिष्टं च माक्षिकम् | पीतं शतसहस्राभिहुतं युक्तरथं स्मृतम् ||१६||
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Adhikarana 7 (17-19) · Śloka 19
বচাঘৃতসুবর্ণং চ বিল্বচূর্ণমিতি ত্রযম্ | মেধ্যমাযুষ্যমারোগ্যপুষ্টিসৌভাগ্যবর্ধনম্ ||১৭|| বাসামূলতুলাক্বাথে তৈলমাবাপ্য সাধিতম্ | হুত্বা সহস্রমশ্নীযান্মেধ্যমাযুষ্যমুচ্যতে ||১৮|| যাবকাংস্তাবকান্ খাদেদভিভূয যবাংস্তথা | পিপ্পলীমধুসংযুক্তান্ শিক্ষা চরণবদ্ভবেত্ ||১৯||
वचाघृतसुवर्णं च बिल्वचूर्णमिति त्रयम् | मेध्यमायुष्यमारोग्यपुष्टिसौभाग्यवर्धनम् ||१७|| वासामूलतुलाक्वाथे तैलमावाप्य साधितम् | हुत्वा सहस्रमश्नीयान्मेध्यमायुष्यमुच्यते ||१८|| यावकांस्तावकान् खादेदभिभूय यवांस्तथा | पिप्पलीमधुसंयुक्तान् शिक्षा चरणवद्भवेत् ||१९||
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Adhikarana 8 (20-26) · Śloka 26
মধ্বামলকচূর্ণানি সুবর্ণমিতি চ ত্রযম্ | প্রাশ্যারিষ্টগৃহীতোঽপি মুচ্যতে প্রাণসংশযাত্ ||২০|| শতাবরীঘৃতং সম্যগুপযুক্তং দিনে দিনে | সক্ষৌদ্রং সসুবর্ণং চ নরেন্দ্রং স্থাপযেদ্বশে ||২১|| গোচন্দনা মোহনিকা মধুকং মাক্ষিকং মধু | সুবর্ণমিতি সংযোগঃ পেযঃ সৌভাগ্যমিচ্ছতা ||২২|| পদ্মনীলোত্পলক্বাথে যষ্টীমধুকসংযুতে | সর্পিরাসাদিতং গব্যং সসুবর্ণং সদা পিবেত্ ||২৩|| পযশ্চানুপিবেত্ সিদ্ধং তেষামেব সমুদ্ভবে | অলক্ষ্মীঘ্নং সদাঽঽযুষ্যং রাজ্যায সুভগায চ ||২৪|| যত্র নোদীরিতো মন্ত্রো যোগেষ্বেতেষু সাধনে | শব্দিতা তত্র সর্বত্র গাযত্রী ত্রিপদা ভবেত্ ||২৫|| পাপ্মানং নাশযন্ত্যেতা দদ্যুশ্চৌষধযঃ শ্রিযম্ | কুর্যুর্নাগবলং চাপি মনুষ্যমমরোপমম্ ||২৬||
मध्वामलकचूर्णानि सुवर्णमिति च त्रयम् | प्राश्यारिष्टगृहीतोऽपि मुच्यते प्राणसंशयात् ||२०|| शतावरीघृतं सम्यगुपयुक्तं दिने दिने | सक्षौद्रं ससुवर्णं च नरेन्द्रं स्थापयेद्वशे ||२१|| गोचन्दना मोहनिका मधुकं माक्षिकं मधु | सुवर्णमिति संयोगः पेयः सौभाग्यमिच्छता ||२२|| पद्मनीलोत्पलक्वाथे यष्टीमधुकसंयुते | सर्पिरासादितं गव्यं ससुवर्णं सदा पिबेत् ||२३|| पयश्चानुपिबेत् सिद्धं तेषामेव समुद्भवे | अलक्ष्मीघ्नं सदाऽऽयुष्यं राज्याय सुभगाय च ||२४|| यत्र नोदीरितो मन्त्रो योगेष्वेतेषु साधने | शब्दिता तत्र सर्वत्र गायत्री त्रिपदा भवेत् ||२५|| पाप्मानं नाशयन्त्येता दद्युश्चौषधयः श्रियम् | कुर्युर्नागबलं चापि मनुष्यममरोपमम् ||२६||
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Adhikarana 9 (27-28) · Śloka 28
সততাধ্যযনং বাদঃ পরতন্ত্রাবলোকনম্ | তদ্বিদ্যাচার্যসেবা চ বুদ্ধিমেধাকরো গু(গ)ণঃ ||২৭|| আযুষ্যং ভোজনং জীর্ণে বেগানাং চাবিধারণম্ | ব্রহ্মচর্যমহিংসা চ সাহসানাং চ বর্জনম্ ||২৮||
सतताध्ययनं वादः परतन्त्रावलोकनम् | तद्विद्याचार्यसेवा च बुद्धिमेधाकरो गु(ग)णः ||२७|| आयुष्यं भोजनं जीर्णे वेगानां चाविधारणम् | ब्रह्मचर्यमहिंसा च साहसानां च वर्जनम् ||२८||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 28
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মেধাযুষ্কামীযং রসাযনং নামাষ্টাবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৮||
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मेधायुष्कामीयं रसायनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ||२८||
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