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29. svabhāvavyādhipratiṣēdhanīyarasāyanam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ স্বভাবব্যাধিপ্রতিষেধনীযং রসাযনং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-9) · Śloka 9

ব্রহ্মাদযোঽসৃজন্ পূর্বমমৃতং সোমসঞ্জ্ঞিতম্ | জরামৃত্যুবিনাশায বিধানং তস্য বক্ষ্যতে ||৩|| এক এব খলু ভগবান্ সোমঃ স্থাননামাকৃতিবীর্যবিশেষৈশ্চতুর্বিংশতিধা ভিদ্যতে ||৪|| তদ্যথা- অংশুমান্ মুঞ্জবাংশ্চৈব চন্দ্রমা রজতপ্রভঃ | দূর্বাসোমঃ কনীযাংশ্চ শ্বেতাক্ষঃ কনকপ্রভঃ ||৫|| প্রতানবাংস্তালবৃন্তঃ করবীরোংঽশবানপি | স্বযম্প্রভো মহাসোমো যশ্চাপি গরুডাহৃতঃ ||৬|| গাযত্রস্ত্রৈষ্টুভঃ পাঙ্ক্তো জাগতঃ শাক্বরস্তথা | অগ্নিষ্টোমো রৈবতশ্চ যথোক্ত ইতি সঞ্জ্ঞিতঃ ||৭|| গাযত্র্যা ত্রিপদা যুক্তো যশ্চোডুপতিরুচ্যতে | এতে সোমাঃ সমাখ্যাতা বেদোক্তৈর্নামভিঃ শুভৈঃ ||৮|| সর্বেষামেব চৈতেষামেকো বিধিরুপাসনে | সর্বে তুল্যগুণাশ্চৈব বিধানং তেষু বক্ষ্যতে ||৯||

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ब्रह्मादयोऽसृजन् पूर्वममृतं सोमसञ्ज्ञितम् | जरामृत्युविनाशाय विधानं तस्य वक्ष्यते ||३|| एक एव खलु भगवान् सोमः स्थाननामाकृतिवीर्यविशेषैश्चतुर्विंशतिधा भिद्यते ||४|| तद्यथा- अंशुमान् मुञ्जवांश्चैव चन्द्रमा रजतप्रभः | दूर्वासोमः कनीयांश्च श्वेताक्षः कनकप्रभः ||५|| प्रतानवांस्तालवृन्तः करवीरोंऽशवानपि | स्वयम्प्रभो महासोमो यश्चापि गरुडाहृतः ||६|| गायत्रस्त्रैष्टुभः पाङ्क्तो जागतः शाक्वरस्तथा | अग्निष्टोमो रैवतश्च यथोक्त इति सञ्ज्ञितः ||७|| गायत्र्या त्रिपदा युक्तो यश्चोडुपतिरुच्यते | एते सोमाः समाख्याता वेदोक्तैर्नामभिः शुभैः ||८|| सर्वेषामेव चैतेषामेको विधिरुपासने | सर्वे तुल्यगुणाश्चैव विधानं तेषु वक्ष्यते ||९||

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Adhikarana 3 (10-12) · Śloka 12

অতোঽন্যতমং সোমমুপযুযুক্ষুঃ সর্বোপকরণপরিচারকোপেতঃ প্রশস্তে দেশে ত্রিবৃতমাগারং কারযিত্বা হৃতদোষঃ প্রতিসংসৃষ্টভক্তঃ প্রশস্তেষু তিথিকরণমুহূর্তনক্ষত্রেষু অংশুমন্তমাদাযাধ্বরকল্পেনাহৃতমভিষুতমভিহুতং চান্তরাগারে কৃতমঙ্গলস্বস্তিবাচনঃ সোমকন্দং সুবর্ণসূচ্যা বিদার্য পযো গৃহ্ণীযাত্ সৌবর্ণে (রাজতে বা ) পাত্রেঽঞ্জলিমাত্রং, ততঃ সকৃদেবোপযুঞ্জীত নাখাদযন্, তত উপস্পৃশ্য শেষমপ্স্ববসাদ্য যমনিযমাভ্যামাত্মানং সংযোজ্য বাগ্যতোঽভ্যন্তরতঃ সুহৃদ্ভিরুপাস্যমানো বিহরেত্ ||১০|| রসাযনং পীতবাংস্তু নিবাতে তন্মনাঃ শুচিঃ | আসীত তিষ্ঠেত্ ক্রামেচ্চ ন কথঞ্চন সংবিশেত্ ||১১|| সাযং বা ভুক্তবানুপশ্রুতশান্তিঃ কুশশয্যাযাং কৃষ্ণাজিনোত্তরাযাং সুহৃদ্ভিরুপাস্যমানঃ শযীত, তৃষিতো বা শীতোদকমাত্রাং পিবেত্ (অশনাযিতো বা ক্ষারং); ততঃ প্রাতরুত্থাযোপশ্রুতশান্তিঃ কৃতমঙ্গলো গাং স্পৃষ্ট্বা তথৈবাসীত, তস্য জীর্ণে সোমে ছর্দিরুত্পদ্যতে, ততঃ শোণিতাক্তং কৃমিব্যামিশ্রং ছর্দিতবতে সাযং শৃতশীতং ক্ষীরং বিতরেত্; ততস্তৃতীযেঽহনি কৃমিব্যামিশ্রমতিসার্যতে, স তেনানিষ্টপ্রতিগ্রহভুক্তপ্রভৃতিভির্বিশেষৈর্বিনির্মুক্তঃ শুদ্ধতনুর্ভবতি, ততঃ সাযং স্নাতায পূর্ববদেব ক্ষীরং বিতরেত্, ক্ষৌমবস্ত্রাস্তৃতাযাং চৈনং শয্যাযাং শাযযেত্; ততশ্চতুর্থেঽহনি তস্য শ্বযথুরুত্পদ্যতে, ততঃ সর্বাঙ্গেভ্যঃ কৃমযো নিষ্ক্রামন্তি, তদহশ্চ শয্যাযাং পাংশুভিরবকীর্যমাণঃ শযীত, ততঃ সাযং পূর্ববদেব ক্ষীরং বিতরেত্; এবং পঞ্চমষষ্ঠযোর্দিবসযোর্বর্তেত, কেবলমুভযকালমস্মৈ ক্ষীরং বিতরেত্; ততঃ সপ্তমেঽহনি নির্মাংসস্ত্বগস্থিভূতঃ কেবলং সোমপরিগ্রহাদেবোচ্ছ্বসিতি, তদহশ্চ ক্ষীরেণ সুখোষ্ণেন পরিষিচ্য তিলমধুকচন্দনানুলিপ্তদেহং পযঃ পাযযেত্; ততোঽষ্টমেঽহনি প্রাতরেব ক্ষীরপরিষিক্তং চন্দনপ্রদিগ্ধগাত্রং পযঃ পাযযিত্বা পাংশুশয্যাং সমুত্সৃজ্য ক্ষৌমবস্ত্রাস্তৃতাযাং শয্যাযাং শাযযেত্, ততোঽস্য মাংসমাপ্যায্যতে, ত্বক্ চাবদলতি, দন্তনখরোমাণি চাস্য পতন্তি, তস্য নবমদিবসাত্ প্রভৃত্যণুতৈলাভ্যঙ্গঃ সোমবল্ককষাযপরিষেকঃ; ততো দশমেঽহন্যেতদেব বিতরেত্, ততোঽস্য ত্বক্ স্থিরতামুপৈতি; এবমেকাদশদ্বাদশযোর্বর্তেত; ততস্ত্রযোদশাত্ প্রভৃতি সোমবল্ককষাযপরিষেকঃ, এবমাষোডশাদ্বর্তেত; ততঃ সপ্তদশাষ্টাদশযোর্দিবসযোর্দশনা জাযন্তে শিখরিণঃ স্নিগ্ধবজ্রবৈদূর্যস্ফটিকপ্রকাশাঃ সমাঃ স্থিরাঃ সহিষ্ণবঃ, তদা প্রভৃতি চানবৈঃ শালিতণ্ডুলৈঃ ক্ষীরযবাগূমুপসেবেত যাবত্ পঞ্চর্বিশতিরিতি; ততোঽস্মৈ দদ্যাচ্ছাল্যোদনং মৃদূভযকালং পযসা, ততোঽস্য নখা জাযন্তে বিদ্রুমেন্দ্রগোপকতরুণাদিত্যপ্রকাশাঃ, স্থিরাঃ স্নিগ্ধা লক্ষণসম্পন্নাঃ কেশাশ্চ সূক্ষ্মা জাযন্তে, ত্বক্ চ নীলোত্পলাতসীপুষ্পবৈদূর্যপ্রকাশা; ঊর্ধ্বং চ মাসাত্ কেশান্ বাপযেত্, বাপযিত্বা চোশীরচন্দনকৃষ্ণতিলকল্কৈঃ শিরঃ প্রদিহ্যাত্ পযসা বা স্নাপযেত্; ততোঽস্যানন্তরং সপ্তরাত্রাত্ কেশা জাযন্তে ভ্রমরাঞ্জননিভাঃ কুঞ্চিতাঃ স্থিরাঃ স্নিগ্ধাঃ; ততস্ত্রিরাত্রাত্ প্রথমাবসথপরিসরান্নিষ্ক্রম্য মুহূর্তং স্থিত্বা পুনরেবান্তঃ প্রবিশেত্, ততোঽস্য বলাতৈলমভ্যঙ্গার্থেঽবচার্যং, যবপিষ্টমুদ্বর্তনার্থে, সুখোষ্ণং চ পযঃ পরিষেকার্থে, অজকর্ণকষাযমুত্সাদনার্থে, সোশীরং কূপোদকং স্নানার্থে, চন্দনমনুলেপার্থে, আমলকরসবিমিশ্রাশ্চাস্য যূষসূপবিকল্পাঃ, ক্ষীরমধুকসিদ্ধং চ কৃষ্ণতিলমবচারণার্থে, এবং দশরাত্রং; ততোঽন্যদ্দশরাত্রং দ্বিতীযে পরিসরে বর্তেত; ততস্তৃতীযে পরিসরে স্থিরীকুর্বন্নাত্মানমন্যদ্দশরাত্রমাসীত, কিঞ্চিদাতপপবনান্ বা সেবেত, পুনশ্চান্তঃ প্রবিশেত্, ন চাত্মানমাদর্শেঽপ্সু বা নিরীক্ষেত রূপশালিত্বাত্; ততোঽন্যদ্দশরাত্রং ক্রোধাদীন্ পরিহরেত্ , এবং সর্বেষামুপযোগবিকল্পঃ | বিশেষতস্তু বল্লীপ্রতানক্ষুপকাদযঃ সোমা ব্রাহ্মণক্ষত্রিযবৈশ্যৈর্ভক্ষযিতব্যাঃ | তেষাং তু প্রমাণমর্ধচতুষ্কমুষ্টযঃ ||১২||

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अतोऽन्यतमं सोममुपयुयुक्षुः सर्वोपकरणपरिचारकोपेतः प्रशस्ते देशे त्रिवृतमागारं कारयित्वा हृतदोषः प्रतिसंसृष्टभक्तः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु अंशुमन्तमादायाध्वरकल्पेनाहृतमभिषुतमभिहुतं चान्तरागारे कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनः सोमकन्दं सुवर्णसूच्या विदार्य पयो गृह्णीयात् सौवर्णे (राजते वा ) पात्रेऽञ्जलिमात्रं, ततः सकृदेवोपयुञ्जीत नाखादयन्, तत उपस्पृश्य शेषमप्स्ववसाद्य यमनियमाभ्यामात्मानं संयोज्य वाग्यतोऽभ्यन्तरतः सुहृद्भिरुपास्यमानो विहरेत् ||१०|| रसायनं पीतवांस्तु निवाते तन्मनाः शुचिः | आसीत तिष्ठेत् क्रामेच्च न कथञ्चन संविशेत् ||११|| सायं वा भुक्तवानुपश्रुतशान्तिः कुशशय्यायां कृष्णाजिनोत्तरायां सुहृद्भिरुपास्यमानः शयीत, तृषितो वा शीतोदकमात्रां पिबेत् (अशनायितो वा क्षारं); ततः प्रातरुत्थायोपश्रुतशान्तिः कृतमङ्गलो गां स्पृष्ट्वा तथैवासीत, तस्य जीर्णे सोमे छर्दिरुत्पद्यते, ततः शोणिताक्तं कृमिव्यामिश्रं छर्दितवते सायं शृतशीतं क्षीरं वितरेत्; ततस्तृतीयेऽहनि कृमिव्यामिश्रमतिसार्यते, स तेनानिष्टप्रतिग्रहभुक्तप्रभृतिभिर्विशेषैर्विनिर्मुक्तः शुद्धतनुर्भवति, ततः सायं स्नाताय पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्, क्षौमवस्त्रास्तृतायां चैनं शय्यायां शाययेत्; ततश्चतुर्थेऽहनि तस्य श्वयथुरुत्पद्यते, ततः सर्वाङ्गेभ्यः कृमयो निष्क्रामन्ति, तदहश्च शय्यायां पांशुभिरवकीर्यमाणः शयीत, ततः सायं पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्; एवं पञ्चमषष्ठयोर्दिवसयोर्वर्तेत, केवलमुभयकालमस्मै क्षीरं वितरेत्; ततः सप्तमेऽहनि निर्मांसस्त्वगस्थिभूतः केवलं सोमपरिग्रहादेवोच्छ्वसिति, तदहश्च क्षीरेण सुखोष्णेन परिषिच्य तिलमधुकचन्दनानुलिप्तदेहं पयः पाययेत्; ततोऽष्टमेऽहनि प्रातरेव क्षीरपरिषिक्तं चन्दनप्रदिग्धगात्रं पयः पाययित्वा पांशुशय्यां समुत्सृज्य क्षौमवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत्, ततोऽस्य मांसमाप्याय्यते, त्वक् चावदलति, दन्तनखरोमाणि चास्य पतन्ति, तस्य नवमदिवसात् प्रभृत्यणुतैलाभ्यङ्गः सोमवल्ककषायपरिषेकः; ततो दशमेऽहन्येतदेव वितरेत्, ततोऽस्य त्वक् स्थिरतामुपैति; एवमेकादशद्वादशयोर्वर्तेत; ततस्त्रयोदशात् प्रभृति सोमवल्ककषायपरिषेकः, एवमाषोडशाद्वर्तेत; ततः सप्तदशाष्टादशयोर्दिवसयोर्दशना जायन्ते शिखरिणः स्निग्धवज्रवैदूर्यस्फटिकप्रकाशाः समाः स्थिराः सहिष्णवः, तदा प्रभृति चानवैः शालितण्डुलैः क्षीरयवागूमुपसेवेत यावत् पञ्चर्विशतिरिति; ततोऽस्मै दद्याच्छाल्योदनं मृदूभयकालं पयसा, ततोऽस्य नखा जायन्ते विद्रुमेन्द्रगोपकतरुणादित्यप्रकाशाः, स्थिराः स्निग्धा लक्षणसम्पन्नाः केशाश्च सूक्ष्मा जायन्ते, त्वक् च नीलोत्पलातसीपुष्पवैदूर्यप्रकाशा; ऊर्ध्वं च मासात् केशान् वापयेत्, वापयित्वा चोशीरचन्दनकृष्णतिलकल्कैः शिरः प्रदिह्यात् पयसा वा स्नापयेत्; ततोऽस्यानन्तरं सप्तरात्रात् केशा जायन्ते भ्रमराञ्जननिभाः कुञ्चिताः स्थिराः स्निग्धाः; ततस्त्रिरात्रात् प्रथमावसथपरिसरान्निष्क्रम्य मुहूर्तं स्थित्वा पुनरेवान्तः प्रविशेत्, ततोऽस्य बलातैलमभ्यङ्गार्थेऽवचार्यं, यवपिष्टमुद्वर्तनार्थे, सुखोष्णं च पयः परिषेकार्थे, अजकर्णकषायमुत्सादनार्थे, सोशीरं कूपोदकं स्नानार्थे, चन्दनमनुलेपार्थे, आमलकरसविमिश्राश्चास्य यूषसूपविकल्पाः, क्षीरमधुकसिद्धं च कृष्णतिलमवचारणार्थे, एवं दशरात्रं; ततोऽन्यद्दशरात्रं द्वितीये परिसरे वर्तेत; ततस्तृतीये परिसरे स्थिरीकुर्वन्नात्मानमन्यद्दशरात्रमासीत, किञ्चिदातपपवनान् वा सेवेत, पुनश्चान्तः प्रविशेत्, न चात्मानमादर्शेऽप्सु वा निरीक्षेत रूपशालित्वात्; ततोऽन्यद्दशरात्रं क्रोधादीन् परिहरेत् , एवं सर्वेषामुपयोगविकल्पः | विशेषतस्तु वल्लीप्रतानक्षुपकादयः सोमा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैर्भक्षयितव्याः | तेषां तु प्रमाणमर्धचतुष्कमुष्टयः ||१२||

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Adhikarana 4 (13) · Śloka 13

অংশুমন্তং সৌবর্ণে পাত্রেঽভিষুণুযাত্, চন্দ্রমসং রাজতে; তাবুপযুজ্যাষ্টগুণমৈশ্বর্যমবাপ্যেশানং দেবমনুপ্রবিশতি, শেষাংস্তু তাম্রমযে মৃন্মযে বা রোহিতে বা চর্মণি বিততে; শূদ্রবর্জং ত্রিভির্বর্ণৈঃ সোমা উপযোক্তব্যাঃ | ততশ্চতুর্থে মাসে পৌর্ণমাস্যাং শুচৌ দেশে ব্রাহ্মণানর্চযিত্বা কৃতমঙ্গলো নিষ্ক্রম্য যথোক্তং ব্রজেদিতি ||১৩||

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अंशुमन्तं सौवर्णे पात्रेऽभिषुणुयात्, चन्द्रमसं राजते; तावुपयुज्याष्टगुणमैश्वर्यमवाप्येशानं देवमनुप्रविशति, शेषांस्तु ताम्रमये मृन्मये वा रोहिते वा चर्मणि वितते; शूद्रवर्जं त्रिभिर्वर्णैः सोमा उपयोक्तव्याः | ततश्चतुर्थे मासे पौर्णमास्यां शुचौ देशे ब्राह्मणानर्चयित्वा कृतमङ्गलो निष्क्रम्य यथोक्तं व्रजेदिति ||१३||

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Adhikarana 5 (14-19) · Śloka 19

ওষধীনাং পতিং সোমমুপযুজ্য বিচক্ষণঃ | দশবর্ষসহস্রাণি নবাং ধারযতে তনুম্ ||১৪|| নাগ্নির্ন তোযং ন বিষং ন শস্ত্রং নাস্ত্রমেব চ | তস্যালমাযুঃক্ষপণে সমর্থানি ভবন্তি হি ||১৫|| ভদ্রাণাং ষষ্টিবর্ষাণাং প্রস্রুতানামনেকধা | কুঞ্জরাণাং সহস্রস্য বলং সমধিগচ্ছতি ||১৬|| ক্ষীরোদং শক্রসদনমুত্তরাংশ্চ কুরূনপি | যত্রেচ্ছতি স গন্তুং বা তত্রাপ্রতিহতা গতিঃ ||১৭|| কন্দর্প ইব রূপেণ কান্ত্যা চন্দ্র ইবাপরঃ | প্রহ্লাদযতি ভূতানাং মনাংসি স মহাদ্যুতিঃ ||১৮|| সাঙ্গোপাঙ্গাংশ্চ নিখিলান্ বেদান্ বিন্দতি তত্ত্বতঃ | চরত্যমোঘসঙ্কল্পো দেববচ্চাখিলং জগত্ ||১৯||

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ओषधीनां पतिं सोममुपयुज्य विचक्षणः | दशवर्षसहस्राणि नवां धारयते तनुम् ||१४|| नाग्निर्न तोयं न विषं न शस्त्रं नास्त्रमेव च | तस्यालमायुःक्षपणे समर्थानि भवन्ति हि ||१५|| भद्राणां षष्टिवर्षाणां प्रस्रुतानामनेकधा | कुञ्जराणां सहस्रस्य बलं समधिगच्छति ||१६|| क्षीरोदं शक्रसदनमुत्तरांश्च कुरूनपि | यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ||१७|| कन्दर्प इव रूपेण कान्त्या चन्द्र इवापरः | प्रह्लादयति भूतानां मनांसि स महाद्युतिः ||१८|| साङ्गोपाङ्गांश्च निखिलान् वेदान् विन्दति तत्त्वतः | चरत्यमोघसङ्कल्पो देववच्चाखिलं जगत् ||१९||

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Adhikarana 6 (20-26) · Śloka 26

সর্বেষামেব সোমানাং পত্রাণি দশ পঞ্চ চ | তানি শুক্লে চ কৃষ্ণে চ জাযন্তে নিপতন্তি চ ||২০|| একৈকং জাযতে পত্রং সোমস্যাহরহস্তদা | শুক্লস্য পৌর্ণমাস্যাং তু ভবেত্ পঞ্চদশচ্ছদঃ ||২১|| শীর্যতে পত্রমেকৈকং দিবসে দিবসে পুনঃ | কৃষ্ণপক্ষক্ষযে চাপি লতা ভবতি কেবলা ||২২|| অংশুমানাজ্যগন্ধস্তু কন্দবান্ রজতপ্রভঃ | কদল্যাকারকন্দস্তু মুঞ্জবাংল্লশুনচ্ছদঃ ||২৩|| চন্দ্রমাঃ কনকাভাসো জলে চরতি সর্বদা | গরুডাহৃতনামা চ শ্বেতাক্ষশ্চাপি পাণ্ডুরৌ ||২৪|| সর্পনির্মোকসদৃশৌ তৌ বৃক্ষাগ্রাবলম্বিনৌ | তথাঽন্যে মণ্ডলৈশ্চিত্রৈশ্চিত্রিতা ইব ভান্তি তে ||২৫|| সর্ব এব তু বিজ্ঞেযাঃ সোমাঃ পঞ্চদশচ্ছদাঃ | ক্ষীরকন্দলতাবন্তঃ পত্রৈর্নানাবিধৈঃ স্মৃতাঃ ||২৬||

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सर्वेषामेव सोमानां पत्राणि दश पञ्च च | तानि शुक्ले च कृष्णे च जायन्ते निपतन्ति च ||२०|| एकैकं जायते पत्रं सोमस्याहरहस्तदा | शुक्लस्य पौर्णमास्यां तु भवेत् पञ्चदशच्छदः ||२१|| शीर्यते पत्रमेकैकं दिवसे दिवसे पुनः | कृष्णपक्षक्षये चापि लता भवति केवला ||२२|| अंशुमानाज्यगन्धस्तु कन्दवान् रजतप्रभः | कदल्याकारकन्दस्तु मुञ्जवांल्लशुनच्छदः ||२३|| चन्द्रमाः कनकाभासो जले चरति सर्वदा | गरुडाहृतनामा च श्वेताक्षश्चापि पाण्डुरौ ||२४|| सर्पनिर्मोकसदृशौ तौ वृक्षाग्रावलम्बिनौ | तथाऽन्ये मण्डलैश्चित्रैश्चित्रिता इव भान्ति ते ||२५|| सर्व एव तु विज्ञेयाः सोमाः पञ्चदशच्छदाः | क्षीरकन्दलतावन्तः पत्रैर्नानाविधैः स्मृताः ||२६||

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Adhikarana 7 (27-31) · Śloka 31

হিমবত্যর্বুদে সহ্যে মহেন্দ্রে মলযে তথা | শ্রীপর্বতে দেবগিরৌ গিরৌ দেবসহে তথা ||২৭|| পারিযাত্রে চ বিন্ধ্যে চ দেবসুন্দে হদে তথা | উত্তরেণ বিতস্তাযাঃ প্রবৃদ্ধা যে মহীধরাঃ ||২৮|| পঞ্চ তেষামধো মধ্যে সিন্ধুনামা মহানদঃ | হঠবত্ প্লবতে তত্র চন্দ্রমাঃ সোমসত্তমঃ ||২৯|| তস্যোদ্দেশেষু চাপ্যস্তি মুঞ্জবানংশুমানপি | কাশ্মীরেষু সরো দিব্যং নাম্না ক্ষুদ্রকমানসম্ ||৩০|| গাযত্রস্ত্রৈষ্টুভঃ পাঙ্ক্তো জাগতঃ শাক্বরস্তথা | অত্র সন্ত্যপরে চাপি সোমাঃ সোমসমপ্রভাঃ ||৩১||

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हिमवत्यर्बुदे सह्ये महेन्द्रे मलये तथा | श्रीपर्वते देवगिरौ गिरौ देवसहे तथा ||२७|| पारियात्रे च विन्ध्ये च देवसुन्दे हदे तथा | उत्तरेण वितस्तायाः प्रवृद्धा ये महीधराः ||२८|| पञ्च तेषामधो मध्ये सिन्धुनामा महानदः | हठवत् प्लवते तत्र चन्द्रमाः सोमसत्तमः ||२९|| तस्योद्देशेषु चाप्यस्ति मुञ्जवानंशुमानपि | काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ||३०|| गायत्रस्त्रैष्टुभः पाङ्क्तो जागतः शाक्वरस्तथा | अत्र सन्त्यपरे चापि सोमाः सोमसमप्रभाः ||३१||

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Adhikarana 8 (32) · Śloka 32

যৈশ্চাত্র মন্দভাগ্যৈস্তে ভিষজশ্চাপমানিতাঃ | ন তান্ পশ্যন্ত্যধর্মিষ্ঠাঃ কৃতঘ্নাশ্চাপি মানবাঃ | ভেষজদ্বেষিণশ্চাপি ব্রাহ্মণদ্বেষিণস্তথা ||৩২||

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यैश्चात्र मन्दभाग्यैस्ते भिषजश्चापमानिताः | न तान् पश्यन्त्यधर्मिष्ठाः कृतघ्नाश्चापि मानवाः | भेषजद्वेषिणश्चापि ब्राह्मणद्वेषिणस्तथा ||३२||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 29

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে স্বভাবব্যাধিপ্রতিষেধনীযং রসাযনচিকিত্সিতং নামৈকোনত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||২৯||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीयं रसायनचिकित्सितं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ||२९||

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29. svabhāvavyādhipratiṣēdhanīyarasāyanam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi