Adhikarana 1 (1-9) · Śloka 10
অথাতো মুখরোগচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
চতুর্বিধেন স্নেহেন মধূচ্ছিষ্টযুতেন চ |
বাতজেঽভ্যঞ্জনং কুর্যান্নাডীস্বেদং চ বুদ্ধিমান্ ||৩||
বিদধ্যাদোষ্ঠকোপে তু সাল্বণং চোপনাহনে |
মস্তিষ্কে চৈব নস্যে চ তৈলং বাতহরং হিতম্ ||৪||
শ্রীবেষ্টকং সর্জরসং সুরদারু সগুগ্গুলু |
যষ্টীমধুকচূর্ণং তু বিদধ্যাত্ প্রতিসারণম্ ||৫||
পিত্তরক্তাভিঘাতোত্থং জলৌকোভিরুপাচরেত্ |
পিত্তবিদ্রধিবচ্চাপি ক্রিযাং কুর্যাদশেষতঃ ||৬||
শিরোবিরেচনং ধূমঃ স্বেদঃ কবল এব চ |
হৃতে রক্তে প্রযোক্তব্যমোষ্ঠকোপে কফাত্মকে ||৭||
ত্র্যূষণং স্বর্জিকাক্ষারো যবক্ষারো বিডং তথা |
ক্ষৌদ্রযুক্তং বিধাতব্যমেতচ্চ প্রতিসারণম্ ||৮||
মেদোজে স্বেদিতে ভিন্নে শোধিতে জ্বলনো হিতঃ |
প্রিযঙ্গুত্রিফলালোধ্রং সক্ষৌদ্রং প্রতিসারণম্ ||৯||
এতদোষ্ঠপ্রকোপানাং সাধ্যানাং কর্ম কীর্তিতম্ |১০|
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अथातो मुखरोगचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
चतुर्विधेन स्नेहेन मधूच्छिष्टयुतेन च |
वातजेऽभ्यञ्जनं कुर्यान्नाडीस्वेदं च बुद्धिमान् ||३||
विदध्यादोष्ठकोपे तु साल्वणं चोपनाहने |
मस्तिष्के चैव नस्ये च तैलं वातहरं हितम् ||४||
श्रीवेष्टकं सर्जरसं सुरदारु सगुग्गुलु |
यष्टीमधुकचूर्णं तु विदध्यात् प्रतिसारणम् ||५||
पित्तरक्ताभिघातोत्थं जलौकोभिरुपाचरेत् |
पित्तविद्रधिवच्चापि क्रियां कुर्यादशेषतः ||६||
शिरोविरेचनं धूमः स्वेदः कवल एव च |
हृते रक्ते प्रयोक्तव्यमोष्ठकोपे कफात्मके ||७||
त्र्यूषणं स्वर्जिकाक्षारो यवक्षारो विडं तथा |
क्षौद्रयुक्तं विधातव्यमेतच्च प्रतिसारणम् ||८||
मेदोजे स्वेदिते भिन्ने शोधिते ज्वलनो हितः |
प्रियङ्गुत्रिफलालोध्रं सक्षौद्रं प्रतिसारणम् ||९||
एतदोष्ठप्रकोपानां साध्यानां कर्म कीर्तितम् |१०|
Adhikarana 2 (10-13) · Śloka 14
দন্তমূলগতানাং তু রোগাণাং কর্ম বক্ষ্যতে ||১০||
শীতাদে হৃতরক্তে তু তোযে নাগরসর্ষপান্ |
নিষ্ক্বাথ্য ত্রিফলাং মুস্তং গণ্ডূষঃ সরসাঞ্জনঃ ||১১||
প্রিযঙ্গবশ্চ মুস্তং চ ত্রিফলা চ প্রলেপনম্ |
নস্যং চ ত্রিফলাসিদ্ধং মধুকোত্পলপদ্মকৈঃ ||১২||
দন্তপুপ্পুটকে কার্যং তরুণে রক্তমোক্ষণম্ |
সপঞ্চলবণঃ ক্ষারঃ সক্ষৌদ্রঃ প্রতিসারণম্ ||১৩||
হিতঃ শিরোবিরেকশ্চ নস্যং স্নিগ্ধং চ ভোজনম্ |১৪|
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दन्तमूलगतानां तु रोगाणां कर्म वक्ष्यते ||१०||
शीतादे हृतरक्ते तु तोये नागरसर्षपान् |
निष्क्वाथ्य त्रिफलां मुस्तं गण्डूषः सरसाञ्जनः ||११||
प्रियङ्गवश्च मुस्तं च त्रिफला च प्रलेपनम् |
नस्यं च त्रिफलासिद्धं मधुकोत्पलपद्मकैः ||१२||
दन्तपुप्पुटके कार्यं तरुणे रक्तमोक्षणम् |
सपञ्चलवणः क्षारः सक्षौद्रः प्रतिसारणम् ||१३||
हितः शिरोविरेकश्च नस्यं स्निग्धं च भोजनम् |१४|
Adhikarana 3 (14-18) · Śloka 18
বিস্রাবিতে দন্তবেষ্টে ব্রণাংস্তু প্রতিসারযেত্ ||১৪||
রোধ্রপত্তঙ্গযষ্ট্যাহ্বলাক্ষাচূর্ণৈর্মধূত্তরৈঃ |
গণ্ডূষে ক্ষীরিণো যোজ্যাঃ সক্ষৌদ্রঘৃতশর্করাঃ ||১৫||
কাকোল্যাদৌ দশক্ষীরসিদ্ধং সর্পিশ্চ নস্যতঃ |
শৌষিরে হৃতরক্তে তু রোধ্রমুস্তরসাঞ্জনৈঃ ||১৬||
সক্ষৌদ্রৈঃ শস্যতে লেপো গণ্ডূষে ক্ষীরিণো হিতাঃ |
সারিবোত্পলযষ্ট্যাহ্বসাবরাগুরুচন্দনৈঃ ||১৭||
ক্ষীরে দশগুণে সিদ্ধং সর্পির্নস্যে চ পূজিতম্ |
ক্রিযাং পরিদরে কুর্যাচ্ছীতাদোক্তাং বিচক্ষণঃ ||১৮||
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विस्राविते दन्तवेष्टे व्रणांस्तु प्रतिसारयेत् ||१४||
रोध्रपत्तङ्गयष्ट्याह्वलाक्षाचूर्णैर्मधूत्तरैः |
गण्डूषे क्षीरिणो योज्याः सक्षौद्रघृतशर्कराः ||१५||
काकोल्यादौ दशक्षीरसिद्धं सर्पिश्च नस्यतः |
शौषिरे हृतरक्ते तु रोध्रमुस्तरसाञ्जनैः ||१६||
सक्षौद्रैः शस्यते लेपो गण्डूषे क्षीरिणो हिताः |
सारिवोत्पलयष्ट्याह्वसावरागुरुचन्दनैः ||१७||
क्षीरे दशगुणे सिद्धं सर्पिर्नस्ये च पूजितम् |
क्रियां परिदरे कुर्याच्छीतादोक्तां विचक्षणः ||१८||
Adhikarana 4 (19-23) · Śloka 23
সংশোধ্যোভযতঃ কার্যং শিরশ্চোপকুশে তথা |
কাকোদুম্বরিকাগোজীপত্রৈর্বিস্রাবযেদসৃক্ ||১৯||
ক্ষৌদ্রযুক্তৈশ্চ লবণৈঃ সব্যোষৈঃ প্রতিসারযেত্ |
পিপ্পলীঃ সর্ষপাঞ্ শ্বেতান্নাগরং নৈচুলং ফলম্ ||২০||
সুখোদকেন সংসৃজ্য কবলং চাপি ধারযেত্ |
ঘৃতং মধুরকৈঃ সিদ্ধং হিতং কবলনস্যযোঃ ||২১||
শস্ত্রেণ দন্তবৈদর্ভে দন্তমূলানি শোধযেত্ |
ততঃ ক্ষারং প্রযুঞ্জীত ক্রিযাঃ সর্বাশ্চ শীতলাঃ ||২২||
উদ্ধৃত্যাধিকদন্তং তু ততোঽগ্নিমবচারযেত্ |
কৃমিদন্তকবচ্চাপি বিধিঃ কার্যো বিজানতা ||২৩||
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संशोध्योभयतः कार्यं शिरश्चोपकुशे तथा |
काकोदुम्बरिकागोजीपत्रैर्विस्रावयेदसृक् ||१९||
क्षौद्रयुक्तैश्च लवणैः सव्योषैः प्रतिसारयेत् |
पिप्पलीः सर्षपाञ् श्वेतान्नागरं नैचुलं फलम् ||२०||
सुखोदकेन संसृज्य कवलं चापि धारयेत् |
घृतं मधुरकैः सिद्धं हितं कवलनस्ययोः ||२१||
शस्त्रेण दन्तवैदर्भे दन्तमूलानि शोधयेत् |
ततः क्षारं प्रयुञ्जीत क्रियाः सर्वाश्च शीतलाः ||२२||
उद्धृत्याधिकदन्तं तु ततोऽग्निमवचारयेत् |
कृमिदन्तकवच्चापि विधिः कार्यो विजानता ||२३||
Adhikarana 5 (24-25) · Śloka 25
ছিত্ত্বাঽধিমাংসং সক্ষৌদ্রৈরেভিশ্চূর্ণৈরুপাচরেত্ |
বচাতেজোবতীপাঠাস্বর্জিকাযাবশূকজৈঃ ||২৪||
ক্ষৌদ্রদ্বিতীযাঃ পিপ্পল্যঃ কবলশ্চাত্র কীর্তিতঃ |
পটোলত্রিফলানিম্বকষাযশ্চাত্র ধাবনে |
হিতঃ শিরোবিরৈকশ্চ ধূমো বৈরেচনশ্চ যঃ ||২৫||
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छित्त्वाऽधिमांसं सक्षौद्रैरेभिश्चूर्णैरुपाचरेत् |
वचातेजोवतीपाठास्वर्जिकायावशूकजैः ||२४||
क्षौद्रद्वितीयाः पिप्पल्यः कवलश्चात्र कीर्तितः |
पटोलत्रिफलानिम्बकषायश्चात्र धावने |
हितः शिरोविरैकश्च धूमो वैरेचनश्च यः ||२५||
Adhikarana 6 (26-33) · Śloka 33
সামান্যং কর্ম নাডীনাং বিশেষং চাত্র মে শৃণু |
নাডীব্রণহরং কর্ম দন্তনাডীষু কারযেত্ ||২৬||
যং দন্তমভিজাযেত নাডী তং দন্তমুদ্ধরেত্ |
ছিত্ত্বা মাংসানি শস্ত্রেণ যদি নোপরিজো ভবেত্ ||২৭||
শোধযিত্বা দহেচ্চাপি ক্ষারেণ জ্বলনেন বা |
ভিনত্ত্যুপেক্ষিতে দন্তে হনুকাস্থি গতির্ধ্রুবম্ ||২৮||
সমূলং দশনং তস্মাদুদ্ধরেদ্ভগ্নমস্থিরম্ |
উদ্ধৃতে তূত্তরে দন্তে সমূলে স্থিরবন্ধনে ||২৯||
রক্তাতিযোগাত্ পূর্বোক্তা রোগা ঘোরা ভবন্তি হি |
কাণঃ সঞ্জাযতে জন্তুরর্দিতং চাস্য জাযতে ||৩০||
চলমপ্যুত্তরং দন্তমতো নাপহরেদ্ভিষক্ |
ধাবনে জাতিমদনস্বাদুকণ্টকখাদিরম্ ||৩১||
কষাযং জাতিমদনকটুকস্বাদুকণ্টকৈঃ |
যষ্ট্যাহ্বরোধ্রমঞ্জিষ্ঠাখদিরৈশ্চাপি যত্ কৃতম্ ||৩২||
তৈলং সংশোধনং তদ্ধি হন্যাদ্দন্তগতাং গতিম্ |
কীর্তিতা দন্তমূলে তু ক্রিযা দন্তেষু বক্ষ্যতে ||৩৩||
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सामान्यं कर्म नाडीनां विशेषं चात्र मे शृणु |
नाडीव्रणहरं कर्म दन्तनाडीषु कारयेत् ||२६||
यं दन्तमभिजायेत नाडी तं दन्तमुद्धरेत् |
छित्त्वा मांसानि शस्त्रेण यदि नोपरिजो भवेत् ||२७||
शोधयित्वा दहेच्चापि क्षारेण ज्वलनेन वा |
भिनत्त्युपेक्षिते दन्ते हनुकास्थि गतिर्ध्रुवम् ||२८||
समूलं दशनं तस्मादुद्धरेद्भग्नमस्थिरम् |
उद्धृते तूत्तरे दन्ते समूले स्थिरबन्धने ||२९||
रक्तातियोगात् पूर्वोक्ता रोगा घोरा भवन्ति हि |
काणः सञ्जायते जन्तुरर्दितं चास्य जायते ||३०||
चलमप्युत्तरं दन्तमतो नापहरेद्भिषक् |
धावने जातिमदनस्वादुकण्टकखादिरम् ||३१||
कषायं जातिमदनकटुकस्वादुकण्टकैः |
यष्ट्याह्वरोध्रमञ्जिष्ठाखदिरैश्चापि यत् कृतम् ||३२||
तैलं संशोधनं तद्धि हन्याद्दन्तगतां गतिम् |
कीर्तिता दन्तमूले तु क्रिया दन्तेषु वक्ष्यते ||३३||
Adhikarana 7 (34-40) · Śloka 41
স্নেহানাং কবলাঃ কোষ্ণাঃ সর্পিষস্ত্রৈবৃতস্য বা |
নির্যূহাশ্চানিলঘ্নানাং দন্তহর্ষপ্রমর্দনাঃ ||৩৪||
স্নৈহিকশ্চ হিতো ধূমো নস্যং স্নিগ্ধং চ ভোজনম্ |
রসো রসযবাগ্বশ্চ ক্ষীরং সন্তানিকা ঘৃতম্ ||৩৫||
শিরোবস্তির্হিতশ্চাপি ক্রমো যশ্চানিলাপহঃ |
অহিংসন্ দন্তমূলানি শর্করামুদ্ধরেদ্ভিষক্ ||৩৬||
লাক্ষাচূর্ণৈর্মধুযুতৈস্ততস্তাঃ প্রতিসারযেত্ |
দন্তহর্ষক্রিযাং চাপি কুর্যান্নিরবশেষতঃ ||৩৭||
কপালিকা কৃচ্ছ্রতমা তত্রাপ্যেষা ক্রিযা হিতা |
জযেদ্বিস্রাবণৈঃ স্বিন্নমচলং কৃমিদন্তকম্ ||৩৮||
তথাঽবপীডৈর্বাতঘ্নৈঃ স্নেহগণ্ডূষধারণৈঃ |
ভদ্রদার্বাদিবর্ষাভূলেপৈঃ স্নিগ্ধৈশ্চ ভোজনৈঃ ||৩৯||
চলমুদ্ধৃত্য চ স্থানং বিদহেত্ সুষিরস্য চ |
ততো বিদারীযষ্ট্যাহ্বশৃঙ্গাটককসেরুকৈঃ ||৪০||
তৈলং দশগুণে ক্ষীরে সিদ্ধং নস্যে হিতং ভবেত্ |৪১|
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स्नेहानां कवलाः कोष्णाः सर्पिषस्त्रैवृतस्य वा |
निर्यूहाश्चानिलघ्नानां दन्तहर्षप्रमर्दनाः ||३४||
स्नैहिकश्च हितो धूमो नस्यं स्निग्धं च भोजनम् |
रसो रसयवाग्वश्च क्षीरं सन्तानिका घृतम् ||३५||
शिरोबस्तिर्हितश्चापि क्रमो यश्चानिलापहः |
अहिंसन् दन्तमूलानि शर्करामुद्धरेद्भिषक् ||३६||
लाक्षाचूर्णैर्मधुयुतैस्ततस्ताः प्रतिसारयेत् |
दन्तहर्षक्रियां चापि कुर्यान्निरवशेषतः ||३७||
कपालिका कृच्छ्रतमा तत्राप्येषा क्रिया हिता |
जयेद्विस्रावणैः स्विन्नमचलं कृमिदन्तकम् ||३८||
तथाऽवपीडैर्वातघ्नैः स्नेहगण्डूषधारणैः |
भद्रदार्वादिवर्षाभूलेपैः स्निग्धैश्च भोजनैः ||३९||
चलमुद्धृत्य च स्थानं विदहेत् सुषिरस्य च |
ततो विदारीयष्ट्याह्वशृङ्गाटककसेरुकैः ||४०||
तैलं दशगुणे क्षीरे सिद्धं नस्ये हितं भवेत् |४१|
Adhikarana 8 (41-42) · Śloka 43
হনুমোক্ষে সমুদ্দিষ্টাং কুর্যাচ্চার্দিতবত্ ক্রিযাম্ ||৪১||
ফলান্যম্লানি শীতাম্বু রূক্ষান্নং দন্তধাবনম্ |
তথাঽতিকঠিনান্ ভক্ষ্যান্ দন্তরোগী বিবর্জযেত্ ||৪২||
সাধ্যানাং দন্তরোগণাং চিকিত্সিতমুদীরিতম্ |৪৩|
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हनुमोक्षे समुद्दिष्टां कुर्याच्चार्दितवत् क्रियाम् ||४१||
फलान्यम्लानि शीताम्बु रूक्षान्नं दन्तधावनम् |
तथाऽतिकठिनान् भक्ष्यान् दन्तरोगी विवर्जयेत् ||४२||
साध्यानां दन्तरोगणां चिकित्सितमुदीरितम् |४३|
Adhikarana 9 (43-48) · Śloka 49
জিহ্বাগতানাং সাধ্যানাং কর্ম বক্ষ্যামি সিদ্ধযে ||৪৩||
ওষ্ঠপ্রকোপেঽনিলজে যদুক্তং প্রাক্ চিকিত্সিতম্ |
কণ্টকেষ্বনিলোত্থেষু তত্ কার্যং ভিষজা ভবেত্ ||৪৪||
পিত্তজেষু বিঘৃষ্টেষু নিঃসৃতে দুষ্টশোণিতে |
প্রতিসারণগণ্ডূষং নস্যং চ মধুরং হিতম্ ||৪৫||
কণ্টকেষু কফোত্থেষু লিখিতেষ্বসৃজঃ ক্ষযে |
পিপ্পল্যাদির্মধুযুতঃ কার্যস্তু প্রতিসারণে ||৪৬||
গৃহ্ণীযাত্ কবলাংশ্চাপি গৌরসর্ষপসৈন্ধবৈঃ |
পটোলনিম্ববার্তাকুক্ষারযূষৈশ্চ ভোজযেত্ ||৪৭||
উপজিহ্বাং তু সংলিখ্য ক্ষারেণ প্রতিসারযেত্ |
শিরোবিরেকগণ্ডূষধূমৈশ্চৈনমুপাচরেত্ ||৪৮||
জিহ্বাগতানাং কর্মোক্তং... |৪৯|
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जिह्वागतानां साध्यानां कर्म वक्ष्यामि सिद्धये ||४३||
ओष्ठप्रकोपेऽनिलजे यदुक्तं प्राक् चिकित्सितम् |
कण्टकेष्वनिलोत्थेषु तत् कार्यं भिषजा भवेत् ||४४||
पित्तजेषु विघृष्टेषु निःसृते दुष्टशोणिते |
प्रतिसारणगण्डूषं नस्यं च मधुरं हितम् ||४५||
कण्टकेषु कफोत्थेषु लिखितेष्वसृजः क्षये |
पिप्पल्यादिर्मधुयुतः कार्यस्तु प्रतिसारणे ||४६||
गृह्णीयात् कवलांश्चापि गौरसर्षपसैन्धवैः |
पटोलनिम्बवार्ताकुक्षारयूषैश्च भोजयेत् ||४७||
उपजिह्वां तु संलिख्य क्षारेण प्रतिसारयेत् |
शिरोविरेकगण्डूषधूमैश्चैनमुपाचरेत् ||४८||
जिह्वागतानां कर्मोक्तं... |४९|
Adhikarana 10 (49-58) · Śloka 59
... তালব্যানাং প্রবক্ষ্যতে |
অঙ্গুষ্ঠাঙ্গুলিসন্দংশেনাকৃষ্য গলশুণ্ডিকাম্ ||৪৯||
ছেদযেন্মণ্ডলাগ্রেণ জিহ্বোপরি তু সংস্থিতাম্ |
নোত্কৃষ্টং চৈব হীনং চ ত্রিভাগং ছেদযেদ্ভিষক্ ||৫০||
অত্যাদানাত্ স্রবেদ্রক্তং তন্নিমিত্তং ম্রিযেত চ |
হীনচ্ছেদাদ্ভবেচ্ছোফো লালা নিদ্রা ভ্রমস্তমঃ ||৫১||
তস্মাদ্বৈদ্যঃ প্রযত্নেন দৃষ্টকর্মা বিশারদঃ |
গলশুণ্ডীং তু সঞ্ছিদ্য কুর্যাত্ প্রাপ্তমিমং ক্রমম্ ||৫২||
মরিচাতিবিষাপাঠাবচাকুষ্ঠকুটন্নটৈঃ |
ক্ষৌদ্রযুক্তৈঃ সলবণৈস্ততস্তাং প্রতিসারযেত্ ||৫৩||
বচামতিবিষাং পাঠাং রাস্নাং কটুকরোহিণীম্ |
নিষ্ক্বাথ্য পিচুমন্দং চ কবলং তত্র যোজযেত্ ||৫৪||
ইঙ্গুদীকিণিহীদন্তীসরলাসুরদারুভিঃ |
পঞ্চাঙ্গীং কারযেত্ পিষ্টৈর্বর্তিং গন্ধোত্তরাং শুভাম্ ||৫৫||
ততো ধূমং পিবেজ্জন্তুর্দ্বিরহ্নঃ কফনাশনম্ |
ক্ষারসিদ্ধেষু মুদ্গেষু যূষশ্চাপ্যশনে হিতঃ ||৫৬||
তুণ্ডিকের্যধ্রুষে কূর্মে সঙ্ঘাতে তালুপুপ্পুটে |
এষ এব বিধিঃ কার্যো বিশেষঃ শস্ত্রকর্মণি ||৫৭||
তালুপাকে তু কর্তব্যং বিধানং পিত্তনাশনম্ |
স্নেহস্বেদৌ তালুশোষে বিধিশ্চানিলনাশনঃ ||৫৮||
কীর্তিতং তালুজানাং তু... |৫৯|
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... तालव्यानां प्रवक्ष्यते |
अङ्गुष्ठाङ्गुलिसन्दंशेनाकृष्य गलशुण्डिकाम् ||४९||
छेदयेन्मण्डलाग्रेण जिह्वोपरि तु संस्थिताम् |
नोत्कृष्टं चैव हीनं च त्रिभागं छेदयेद्भिषक् ||५०||
अत्यादानात् स्रवेद्रक्तं तन्निमित्तं म्रियेत च |
हीनच्छेदाद्भवेच्छोफो लाला निद्रा भ्रमस्तमः ||५१||
तस्माद्वैद्यः प्रयत्नेन दृष्टकर्मा विशारदः |
गलशुण्डीं तु सञ्छिद्य कुर्यात् प्राप्तमिमं क्रमम् ||५२||
मरिचातिविषापाठावचाकुष्ठकुटन्नटैः |
क्षौद्रयुक्तैः सलवणैस्ततस्तां प्रतिसारयेत् ||५३||
वचामतिविषां पाठां रास्नां कटुकरोहिणीम् |
निष्क्वाथ्य पिचुमन्दं च कवलं तत्र योजयेत् ||५४||
इङ्गुदीकिणिहीदन्तीसरलासुरदारुभिः |
पञ्चाङ्गीं कारयेत् पिष्टैर्वर्तिं गन्धोत्तरां शुभाम् ||५५||
ततो धूमं पिबेज्जन्तुर्द्विरह्नः कफनाशनम् |
क्षारसिद्धेषु मुद्गेषु यूषश्चाप्यशने हितः ||५६||
तुण्डिकेर्यध्रुषे कूर्मे सङ्घाते तालुपुप्पुटे |
एष एव विधिः कार्यो विशेषः शस्त्रकर्मणि ||५७||
तालुपाके तु कर्तव्यं विधानं पित्तनाशनम् |
स्नेहस्वेदौ तालुशोषे विधिश्चानिलनाशनः ||५८||
कीर्तितं तालुजानां तु... |५९|
Adhikarana 11 (59-66) · Śloka 67
... কণ্ঠ্যানাং কর্ম বক্ষ্যতে |
সাধ্যানাং রোহিণীনাং তু হিতং শোণিতমোক্ষণম্ ||৫৯||
ছর্দনং ধূমপানং চ গণ্ডূষো নস্যকর্ম চ |
বাতিকীং তু হৃতে রক্তে লবণৈঃ প্রতিসারযেত্ ||৬০||
সুখোষ্ণন্ স্নেহগণ্ডূষান্ ধারযেচ্চাপ্যভীক্ষ্ণশঃ |
পতঙ্গশর্করাক্ষৌদ্রৈঃ পৈত্তিকীং প্রতিসারযেত্ ||৬১||
দ্রাক্ষাপরূষকক্বাথো হিতশ্চ কবলগ্রহে |
অগারধূমকটুকৈঃ শ্লৈষ্মিকীং প্রতিসারযেত্ ||৬২||
শ্বেতাবিডঙ্গদন্তীষু তৈলং সিদ্ধং সসৈন্ধবম্ |
নস্যকর্মণি যোক্তব্যং তথা কবলধারণে ||৬৩||
পিত্তবত্ সাধযেদ্বৈদ্যো রোহিণীং রক্তসম্ভবাম্ |
বিস্রাব্য কণ্ঠশালূকং সাধযেত্তুণ্ডিকেরিবত্ ||৬৪||
এককালং যবান্নং চ ভুঞ্জীত স্নিগ্ধমল্পশঃ |
উপজিহ্বিকবচ্চাপি সাধযেদধিজিহ্বিকাম্ ||৬৫||
একবৃন্দং তু বিস্রাব্য বিধিং শোধনমাচরেত্ |
গিলাযুশ্চাপি যো ব্যাধিস্তং চ শস্ত্রেণ সাধযেত্ ||৬৬||
অমর্মস্থং সুপক্বং চ ভেদযেদ্গলবিদ্রধিম্ |৬৭|
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... कण्ठ्यानां कर्म वक्ष्यते |
साध्यानां रोहिणीनां तु हितं शोणितमोक्षणम् ||५९||
छर्दनं धूमपानं च गण्डूषो नस्यकर्म च |
वातिकीं तु हृते रक्ते लवणैः प्रतिसारयेत् ||६०||
सुखोष्णन् स्नेहगण्डूषान् धारयेच्चाप्यभीक्ष्णशः |
पतङ्गशर्कराक्षौद्रैः पैत्तिकीं प्रतिसारयेत् ||६१||
द्राक्षापरूषकक्वाथो हितश्च कवलग्रहे |
अगारधूमकटुकैः श्लैष्मिकीं प्रतिसारयेत् ||६२||
श्वेताविडङ्गदन्तीषु तैलं सिद्धं ससैन्धवम् |
नस्यकर्मणि योक्तव्यं तथा कवलधारणे ||६३||
पित्तवत् साधयेद्वैद्यो रोहिणीं रक्तसम्भवाम् |
विस्राव्य कण्ठशालूकं साधयेत्तुण्डिकेरिवत् ||६४||
एककालं यवान्नं च भुञ्जीत स्निग्धमल्पशः |
उपजिह्विकवच्चापि साधयेदधिजिह्विकाम् ||६५||
एकवृन्दं तु विस्राव्य विधिं शोधनमाचरेत् |
गिलायुश्चापि यो व्याधिस्तं च शस्त्रेण साधयेत् ||६६||
अमर्मस्थं सुपक्वं च भेदयेद्गलविद्रधिम् |६७|
Adhikarana 12 (67-75) · Śloka 75
বাতাত্ সর্বসরং চূর্ণৈর্লবণৈঃ প্রতিসারযেত্ ||৬৭||
তৈলং বাতহরৈঃ সিদ্ধং হিতং কবলনস্যযোঃ |
ততোঽস্মৈ স্নৈহিকং ধূমমিমং দদ্যাদ্বিচক্ষণঃ ||৬৮||
শালরাজাদনৈরণ্ডসারৈঙ্গুদমধূকজাঃ |
মজ্জানো গুগ্গুলুধ্যামমাংসীকালানুসারিবাঃ |
শ্রীসর্জরসশৈলেযমধূচ্ছিষ্টানি চাহরেত্ ||৬৯||
তত্সর্বং সুকৃতং চূর্ণং স্নেহেনালোড্য যুক্তিতঃ |
টিণ্টূকবৃন্তং সক্ষৌদ্রং মতিমাংস্তেন লেপযেত্ ||৭০||
এষ সর্বসরে ধূমঃ প্রশস্তঃ স্নৈহিকো মতঃ |
কফঘ্নো মারুতঘ্নশ্চ মুখরোগবিনাশনঃ ||৭১||
পিত্তাত্মকে সর্বসরে শুদ্ধকাযস্য দেহিনঃ |
সর্বঃ পিত্তহরঃ কার্যো বিধির্মধুরশীতলঃ ||৭২||
প্রতিসারণগণ্ডূষৌ ধূমঃ সংশোধনানি চ |
কফাত্মকে সর্বসরে বিধিং কুর্যাত্ কফাপহম্ ||৭৩||
পিবেদতিবিষাং পাঠাং মুস্তং চ সুরদারু চ |
রোহিণীং কটুকাখ্যাং চ কুটজস্য ফলানি চ ||৭৪||
গবাং মূত্রেণ মনুজো ভাগৈর্ধরণসম্মিতৈঃ |
এষ সর্বান্ কফকৃতান্ রোগান্ যোগোঽপকর্ষতি ||৭৫||
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वातात् सर्वसरं चूर्णैर्लवणैः प्रतिसारयेत् ||६७||
तैलं वातहरैः सिद्धं हितं कवलनस्ययोः |
ततोऽस्मै स्नैहिकं धूममिमं दद्याद्विचक्षणः ||६८||
शालराजादनैरण्डसारैङ्गुदमधूकजाः |
मज्जानो गुग्गुलुध्याममांसीकालानुसारिवाः |
श्रीसर्जरसशैलेयमधूच्छिष्टानि चाहरेत् ||६९||
तत्सर्वं सुकृतं चूर्णं स्नेहेनालोड्य युक्तितः |
टिण्टूकवृन्तं सक्षौद्रं मतिमांस्तेन लेपयेत् ||७०||
एष सर्वसरे धूमः प्रशस्तः स्नैहिको मतः |
कफघ्नो मारुतघ्नश्च मुखरोगविनाशनः ||७१||
पित्तात्मके सर्वसरे शुद्धकायस्य देहिनः |
सर्वः पित्तहरः कार्यो विधिर्मधुरशीतलः ||७२||
प्रतिसारणगण्डूषौ धूमः संशोधनानि च |
कफात्मके सर्वसरे विधिं कुर्यात् कफापहम् ||७३||
पिबेदतिविषां पाठां मुस्तं च सुरदारु च |
रोहिणीं कटुकाख्यां च कुटजस्य फलानि च ||७४||
गवां मूत्रेण मनुजो भागैर्धरणसम्मितैः |
एष सर्वान् कफकृतान् रोगान् योगोऽपकर्षति ||७५||
Adhikarana 13 (76) · Śloka 76
ক্ষীরেক্ষুরসগোমূত্রদধিমস্ত্বম্লকাঞ্জিকৈঃ |
বিদধ্যাত্ কবলান্ বীক্ষ্য দোষং তৈলঘৃতৈরপি ||৭৬||
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क्षीरेक्षुरसगोमूत्रदधिमस्त्वम्लकाञ्जिकैः |
विदध्यात् कवलान् वीक्ष्य दोषं तैलघृतैरपि ||७६||
Adhikarana 14 (77-81) · Śloka 81
রোগাণাং মুখজাতানাং সাধ্যানাং কর্ম কীর্তিতম্ |
অসাধ্যা অপি বক্ষ্যন্তে রোগা যে তত্র কীর্তিতাঃ ||৭৭||
ওষ্ঠপ্রকোপে বর্জ্যাঃ স্যুর্মাংসরক্তত্রিদোষজাঃ |
দন্তমূলেষু বর্জ্যৌ তু ত্রিলিঙ্গগতিসৌষিরৌ ||৭৮||
দন্তেষু চ ন সিধ্যন্তি শ্যাবদালনভঞ্জনাঃ |
জিহ্বাগতেষ্বলাসস্তু তালব্যেষ্বর্বুদং তথা ||৭৯||
স্বরঘ্নো বলযো বৃন্দো বিদার্যলস এব চ |
গলৌষ্ঠো মাংসতানশ্চ শতঘ্নী রোহিণী চ যা ||৮০||
অসাধ্যাঃ কীর্তিতা হ্যেতে রোগা নব দশৈব চ |
তেষাং চাপি ক্রিযাং বৈদ্যঃ প্রত্যাখ্যায সমাচরেত্ ||৮১||
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रोगाणां मुखजातानां साध्यानां कर्म कीर्तितम् |
असाध्या अपि वक्ष्यन्ते रोगा ये तत्र कीर्तिताः ||७७||
ओष्ठप्रकोपे वर्ज्याः स्युर्मांसरक्तत्रिदोषजाः |
दन्तमूलेषु वर्ज्यौ तु त्रिलिङ्गगतिसौषिरौ ||७८||
दन्तेषु च न सिध्यन्ति श्यावदालनभञ्जनाः |
जिह्वागतेष्वलासस्तु तालव्येष्वर्बुदं तथा ||७९||
स्वरघ्नो वलयो वृन्दो विदार्यलस एव च |
गलौष्ठो मांसतानश्च शतघ्नी रोहिणी च या ||८०||
असाध्याः कीर्तिता ह्येते रोगा नव दशैव च |
तेषां चापि क्रियां वैद्यः प्रत्याख्याय समाचरेत् ||८१||
Adhikarana puShpikA · Śloka 22
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মুখরোগচিকিত্সিতং নাম দ্বাবিংশোঽধ্যাযঃ ||২২||
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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मुखरोगचिकित्सितं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ||२२||