Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো নেত্রবস্তিপ্রমাণপ্রবিভাগচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो नेत्रबस्तिप्रमाणप्रविभागचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো নেত্রবস্তিপ্রমাণপ্রবিভাগচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो नेत्रबस्तिप्रमाणप्रविभागचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4
তত্র স্নেহাদীনাং কর্মণাং বস্তিকর্ম প্রধানতমমাহুরাচার্যাঃ | কস্মাত্? অনেককর্মকরত্বাদ্বস্তেঃ; ইহ খলু বস্তির্নানাবিধদ্রব্যসংযোগাদ্দোষাণাং সংশোধনসংশমনসঙ্গ্রহণানি করোতি, ক্ষীণশুক্রং বাজীকরোতি, কৃশং বৃংহযতি, স্থূলং কর্শযতি, চক্ষুঃ প্রীণযতি, বলীপলিতমপহন্তি, বযঃ স্থাপযতি ||৩|| শরীরোপচযং বর্ণং বলমারোগ্যমাযুষঃ | কুরুতে পরিবৃদ্ধিং চ বস্তিঃ সম্যগুপাসিতঃ ||৪||
तत्र स्नेहादीनां कर्मणां बस्तिकर्म प्रधानतममाहुराचार्याः | कस्मात्? अनेककर्मकरत्वाद्बस्तेः; इह खलु बस्तिर्नानाविधद्रव्यसंयोगाद्दोषाणां संशोधनसंशमनसङ्ग्रहणानि करोति, क्षीणशुक्रं वाजीकरोति, कृशं बृंहयति, स्थूलं कर्शयति, चक्षुः प्रीणयति, वलीपलितमपहन्ति, वयः स्थापयति ||३|| शरीरोपचयं वर्णं बलमारोग्यमायुषः | कुरुते परिवृद्धिं च बस्तिः सम्यगुपासितः ||४||
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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5
তথা জ্বরাতীসারতিমিরপ্রতিশ্যাযশিরোরোগাধিমন্থার্দিতাক্ষেপকপক্ষাঘাতৈকাঙ্গসর্বাঙ্গরোগাধ্মানোদর- যোনিশূলশর্করাশূলবৃদ্ধ্যুপদংশানাহমূত্রকৃচ্ছ্রগুল্মবাতশোণিতবাতমূত্রপুরীষোদাবর্ত- শুক্রার্তবস্তন্যনাশহৃদ্ধনুমন্যাগ্রহশর্করাশ্মরীমূঢগর্ভপ্রভৃতিষু চাত্যর্থমুপযুজ্যতে ||৫||
तथा ज्वरातीसारतिमिरप्रतिश्यायशिरोरोगाधिमन्थार्दिताक्षेपकपक्षाघातैकाङ्गसर्वाङ्गरोगाध्मानोदर- योनिशूलशर्कराशूलवृद्ध्युपदंशानाहमूत्रकृच्छ्रगुल्मवातशोणितवातमूत्रपुरीषोदावर्त- शुक्रार्तवस्तन्यनाशहृद्धनुमन्याग्रहशर्कराश्मरीमूढगर्भप्रभृतिषु चात्यर्थमुपयुज्यते ||५||
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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
ভবতি চাত্র- বস্তির্বাতে চ পিত্তে চ কফে রক্তে চ শস্যতে | সংসর্গে সন্নিপাতে চ বস্তিরেব হিতঃ সদা ||৬||
भवति चात्र- बस्तिर्वाते च पित्ते च कफे रक्ते च शस्यते | संसर्गे सन्निपाते च बस्तिरेव हितः सदा ||६||
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Adhikarana 5 (7-9) · Śloka 9
তত্র সাংবত্সরিকাষ্টদ্বিরষ্টবর্ষাণাং ষডষ্টদশাঙ্গুলপ্রমাণানি কনিষ্ঠিকানামিকামধ্যমাঙ্গুলিপরিণাহান্যগ্রেঽধ্যর্ধাঙ্গুলদ্ব্যঙ্গুলার্ধতৃতীযাঙ্গুলসন্নিবিষ্টকর্ণিকানি কঙ্কশ্যেনবর্হিণপক্ষনাডীতুল্যপ্রবেশানি মুদ্গমাষকলাযমাত্রস্রোতাংসি বিদধ্যান্নেত্রাণি | তেষু চাস্থাপনদ্রব্যপ্রমাণমাতুরহস্তসম্মিতেন প্রসৃতেন সম্মিতৌ প্রসৃতৌ দ্বৌ চত্বারোঽষ্টৌ চ বিধেযাঃ ||৭|| বর্ষান্তরেষু নেত্রাণাং বস্তিমানস্য চৈব হি | বযোবলশরীরাণি সমীক্ষ্যোত্কর্ষযেদ্বিধিম্ ||৮|| পঞ্চবিংশতেরূর্ধ্বং দ্বাদশাঙ্গুলং, মূলেঽঙ্গুষ্ঠোদরপরীণাহম্, অগ্রে কনিষ্ঠিকোদরপরীণাহম্, অগ্রে ত্র্যঙ্গুলসন্নিবিষ্টকর্ণিকং, গৃধ্রপক্ষনাডীতুল্যপ্রবেশং, কোলাস্থিমাত্রছিদ্রং, ক্লিন্নকলাযমাত্রছিদ্রমিত্যেকে; সর্বাণি মূলে বস্তিনিবন্ধনার্থং দ্বিকর্ণিকানি | আস্থাপনদ্রব্যপ্রমাণং তু বিহিতং দ্বাদশপ্রসৃতাঃ | সপ্ততেস্তূর্ধ্বং নেত্রপ্রমাণমেতদেব, দ্রব্যপ্রমাণং তু দ্বিরষ্টবর্ষবত্ ||৯||
तत्र सांवत्सरिकाष्टद्विरष्टवर्षाणां षडष्टदशाङ्गुलप्रमाणानि कनिष्ठिकानामिकामध्यमाङ्गुलिपरिणाहान्यग्रेऽध्यर्धाङ्गुलद्व्यङ्गुलार्धतृतीयाङ्गुलसन्निविष्टकर्णिकानि कङ्कश्येनबर्हिणपक्षनाडीतुल्यप्रवेशानि मुद्गमाषकलायमात्रस्रोतांसि विदध्यान्नेत्राणि | तेषु चास्थापनद्रव्यप्रमाणमातुरहस्तसम्मितेन प्रसृतेन सम्मितौ प्रसृतौ द्वौ चत्वारोऽष्टौ च विधेयाः ||७|| वर्षान्तरेषु नेत्राणां बस्तिमानस्य चैव हि | वयोबलशरीराणि समीक्ष्योत्कर्षयेद्विधिम् ||८|| पञ्चविंशतेरूर्ध्वं द्वादशाङ्गुलं, मूलेऽङ्गुष्ठोदरपरीणाहम्, अग्रे कनिष्ठिकोदरपरीणाहम्, अग्रे त्र्यङ्गुलसन्निविष्टकर्णिकं, गृध्रपक्षनाडीतुल्यप्रवेशं, कोलास्थिमात्रछिद्रं, क्लिन्नकलायमात्रछिद्रमित्येके; सर्वाणि मूले बस्तिनिबन्धनार्थं द्विकर्णिकानि | आस्थापनद्रव्यप्रमाणं तु विहितं द्वादशप्रसृताः | सप्ततेस्तूर्ध्वं नेत्रप्रमाणमेतदेव, द्रव्यप्रमाणं तु द्विरष्टवर्षवत् ||९||
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Adhikarana 6 (10) · Śloka 10
মৃদুর্বস্তিঃ প্রযোক্তব্যো বিশেষাদ্বালবৃদ্ধযোঃ | তযোস্তীক্ষ্ণঃ প্রযুক্তস্তু বস্তির্হিংস্যাদ্ বলাযুষী ||১০||
मृदुर्बस्तिः प्रयोक्तव्यो विशेषाद्बालवृद्धयोः | तयोस्तीक्ष्णः प्रयुक्तस्तु बस्तिर्हिंस्याद् बलायुषी ||१०||
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Adhikarana 7 (11) · Śloka 11
(ব্রণনেত্রমষ্টাঙ্গুলং মুদ্গবাহিস্রোতঃ; ব্রণমবেক্ষ্য যথাস্বং স্নেহকষাযে বিদধীত) ||১১||
(व्रणनेत्रमष्टाङ्गुलं मुद्गवाहिस्रोतः; व्रणमवेक्ष्य यथास्वं स्नेहकषाये विदधीत) ||११||
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Adhikarana 8 (12) · Śloka 12
তত্র নেত্রাণি সুবর্ণরজততাম্রাযোরীতিদন্তশৃঙ্গমণিতরুসারমযানি শ্লক্ষ্ণানি দৃঢানি গোপুচ্ছাকৃতীন্যৃজূনি গুটিকামুখানি চ ||১২||
तत्र नेत्राणि सुवर्णरजतताम्रायोरीतिदन्तशृङ्गमणितरुसारमयानि श्लक्ष्णानि दृढानि गोपुच्छाकृतीन्यृजूनि गुटिकामुखानि च ||१२||
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Adhikarana 9 (13-14) · Śloka 14
বস্তযশ্চ বন্ধ্যা মৃদবো নাতিবহলা দৃঢাঃ প্রমাণবন্তো গোমহিষবরাহাজোরভ্রাণাম্ ||১৩|| নেত্রালাভে হিতা নাডী নলবংশাস্থিসম্ভবা | বস্ত্যলাভে হিতং চর্ম সূক্ষ্মং বা তান্তবং ঘনম্ ||১৪||
बस्तयश्च बन्ध्या मृदवो नातिबहला दृढाः प्रमाणवन्तो गोमहिषवराहाजोरभ्राणाम् ||१३|| नेत्रालाभे हिता नाडी नलवंशास्थिसम्भवा | बस्त्यलाभे हितं चर्म सूक्ष्मं वा तान्तवं घनम् ||१४||
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Adhikarana 10 (15-17) · Śloka 17
বস্তিং নিরুপদিগ্ধং তু শুদ্ধং সুপরিমার্জিতম্ | মৃদ্বনুদ্ধতহীনং চ মুহুঃ স্নেহবিমর্দিতম্ ||১৫|| নেত্রমূলে প্রতিষ্ঠাপ্য ন্যুব্জং তু বিবৃতাননম্ | বদ্ধ্বা লোহেন তপ্তেন চর্মস্রোতসি নির্দহেত্ ||১৬|| পরিবর্ত্য ততো বস্তিং বদ্ধ্বা গুপ্তং নিধাপযেত্ | আস্থাপনং চ তৈলং চ যথাবত্তেন দাপযেত্ ||১৭||
बस्तिं निरुपदिग्धं तु शुद्धं सुपरिमार्जितम् | मृद्वनुद्धतहीनं च मुहुः स्नेहविमर्दितम् ||१५|| नेत्रमूले प्रतिष्ठाप्य न्युब्जं तु विवृताननम् | बद्ध्वा लोहेन तप्तेन चर्मस्रोतसि निर्दहेत् ||१६|| परिवर्त्य ततो बस्तिं बद्ध्वा गुप्तं निधापयेत् | आस्थापनं च तैलं च यथावत्तेन दापयेत् ||१७||
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Adhikarana 11 (18) · Śloka 18
তত্র দ্বিবিধো বস্তিঃ- নৈরূহিকঃ, স্নৈহিকশ্চ | আস্থাপনং, নিরূহ ইত্যনর্থান্তরং; তস্য বিকল্পো মাধুতৈলিকঃ; তস্য পর্যাযশব্দো যাপনো, যুক্তরথঃ, সিদ্ধবস্তিরিতি | স দোষনির্হরণাচ্ছরীরনীরোহণাদ্বা নিরূহঃ, বযঃস্থাপনাদাযুঃস্থাপনাদ্বা আস্থাপনম্ | মাধুতৈলিকবিধানং চ নিরূহোপক্রমচিকিত্সিতে বক্ষ্যামঃ | যথাপ্রমাণগুণবিহিতঃ স্নেহবস্তিবিকল্পোঽনুবাসনঃ পাদাব(প)কৃষ্টঃ | অনুবসন্নপি ন দুষ্যত্যনুদিবসং বা দীযত ইত্যনুবাসনঃ | তস্যাপি বিকল্পোঽর্ধার্ধমাত্রাবকৃষ্টোঽপরিহার্যো মাত্রাবস্তিরিতি ||১৮||
तत्र द्विविधो बस्तिः- नैरूहिकः, स्नैहिकश्च | आस्थापनं, निरूह इत्यनर्थान्तरं; तस्य विकल्पो माधुतैलिकः; तस्य पर्यायशब्दो यापनो, युक्तरथः, सिद्धबस्तिरिति | स दोषनिर्हरणाच्छरीरनीरोहणाद्वा निरूहः, वयःस्थापनादायुःस्थापनाद्वा आस्थापनम् | माधुतैलिकविधानं च निरूहोपक्रमचिकित्सिते वक्ष्यामः | यथाप्रमाणगुणविहितः स्नेहबस्तिविकल्पोऽनुवासनः पादाव(प)कृष्टः | अनुवसन्नपि न दुष्यत्यनुदिवसं वा दीयत इत्यनुवासनः | तस्यापि विकल्पोऽर्धार्धमात्रावकृष्टोऽपरिहार्यो मात्राबस्तिरिति ||१८||
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Adhikarana 12 (19) · Śloka 19
নিরূহঃ শোধনো লেখী স্নৈহিকো বৃংহণো মতঃ |১৯|
निरूहः शोधनो लेखी स्नैहिको बृंहणो मतः |१९|
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Adhikarana 13 (19-20) · Śloka 20
নিরূহশোধিতান্মার্গান্ সম্যক্ স্নেহোঽনুগচ্ছতি | অপেতসর্বদোষাসু নাডীষ্বিব বহজ্জলম্ ||১৯|| সর্বদোষহরশ্চাসৌ শরীরস্য চ জীবনঃ | তস্মাদ্বিশুদ্ধদেহস্য স্নেহবস্তির্বিধীযতে ||২০||
निरूहशोधितान्मार्गान् सम्यक् स्नेहोऽनुगच्छति | अपेतसर्वदोषासु नाडीष्विव वहज्जलम् ||१९|| सर्वदोषहरश्चासौ शरीरस्य च जीवनः | तस्माद्विशुद्धदेहस्य स्नेहबस्तिर्विधीयते ||२०||
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Adhikarana 14 (21) · Śloka 21
তত্রোন্মাদভযশোকপিপাসারোচকাজীর্ণার্শঃপাণ্ডুরোগভ্রমমদমূর্চ্ছাচ্ছর্দিকুষ্ঠমেহোদরস্থৌল্য- শ্বাসকাসকণ্ঠশোষশোফোপসৃষ্টক্ষতক্ষীণচতুস্ত্রিমাসগর্ভিণীদুর্বলাগ্ন্যসহা বালবৃদ্ধৌ চ বাতরোগাদৃতে ক্ষীণা নানুবাস্যা নাস্থাপযিতব্যাঃ ||২১||
तत्रोन्मादभयशोकपिपासारोचकाजीर्णार्शःपाण्डुरोगभ्रममदमूर्च्छाच्छर्दिकुष्ठमेहोदरस्थौल्य- श्वासकासकण्ठशोषशोफोपसृष्टक्षतक्षीणचतुस्त्रिमासगर्भिणीदुर्बलाग्न्यसहा बालवृद्धौ च वातरोगादृते क्षीणा नानुवास्या नास्थापयितव्याः ||२१||
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Adhikarana 15 (22) · Śloka 22
উদরী চ প্রমেহী চ কুষ্ঠী স্থূলশ্চ মানবঃ | অবশ্যং স্থাপনীযাস্তে নানুবাস্যাঃ কথঞ্চন ||২২||
उदरी च प्रमेही च कुष्ठी स्थूलश्च मानवः | अवश्यं स्थापनीयास्ते नानुवास्याः कथञ्चन ||२२||
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Adhikarana 16 (23) · Śloka 23
অসাধ্যতা বিকারাণাং স্যাদেষামনুবাসনাত্ | অসাধ্যত্বেঽপি ভূযিষ্ঠং গাত্রাণাং সদনং ভবেত্ ||২৩||
असाध्यता विकाराणां स्यादेषामनुवासनात् | असाध्यत्वेऽपि भूयिष्ठं गात्राणां सदनं भवेत् ||२३||
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Adhikarana 17 (24-25) · Śloka 25
পক্বাশযে তথা শ্রোণ্যাং নাভ্যধস্তাচ্চ সর্বতঃ | সম্যক্প্রণিহিতো বস্তিঃ স্থানেষ্বেতেষু তিষ্ঠতি ||২৪|| পক্বাশযাদ্বস্তিবীর্যং খৈর্দেহমনুসর্পতি | বৃক্ষমূলে নিষিক্তানামপাং বীর্যমিব দ্রুমম্ ||২৫||
पक्वाशये तथा श्रोण्यां नाभ्यधस्ताच्च सर्वतः | सम्यक्प्रणिहितो बस्तिः स्थानेष्वेतेषु तिष्ठति ||२४|| पक्वाशयाद्बस्तिवीर्यं खैर्देहमनुसर्पति | वृक्षमूले निषिक्तानामपां वीर्यमिव द्रुमम् ||२५||
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Adhikarana 18 (26) · Śloka 26
স চাপি সহসা বস্তিঃ কেবলঃ সমলোঽপি বা | প্রত্যেতি বীর্যং ত্বনিলৈরপানাদ্যৈর্বিনীযতে ||২৬||
स चापि सहसा बस्तिः केवलः समलोऽपि वा | प्रत्येति वीर्यं त्वनिलैरपानाद्यैर्विनीयते ||२६||
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Adhikarana 19 (27-28) · Śloka 28
বীর্যেণ বস্তিরাদত্তে দোষানাপাদমস্তকাত্(ন্) | পক্বাশযস্থোঽম্বরগো ভূমেরর্কো রসানিব ||২৭|| স কটীপৃষ্ঠকোষ্ঠস্থান্ বীর্যেণালোড্য সঞ্চযান্ | উত্খাতমূলান্ হরতি দোষাণাং সাধুযোজিতঃ ||২৮||
वीर्येण बस्तिरादत्ते दोषानापादमस्तकात्(न्) | पक्वाशयस्थोऽम्बरगो भूमेरर्को रसानिव ||२७|| स कटीपृष्ठकोष्ठस्थान् वीर्येणालोड्य सञ्चयान् | उत्खातमूलान् हरति दोषाणां साधुयोजितः ||२८||
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Adhikarana 20 (29-31) · Śloka 31
দোষত্রযস্য যস্মাচ্চ প্রকোপে বাযুরীশ্বরঃ | তস্মাত্তস্যাতিবৃদ্ধস্য শরীরমভিনিঘ্নতঃ ||২৯|| বাযোর্বিষহতে বেগং নান্যা বস্তেরৃতে ক্রিযা | পবনাবিদ্ধতোযস্য বেলা বেগমিবোদধেঃ ||৩০|| শরীরোপচযং বর্ণং বলমারোগ্যমাযুষঃ | কুরুতে পরিবৃদ্ধিং চ বস্তিঃ সম্যগুপাসিতঃ ||৩১||
दोषत्रयस्य यस्माच्च प्रकोपे वायुरीश्वरः | तस्मात्तस्यातिवृद्धस्य शरीरमभिनिघ्नतः ||२९|| वायोर्विषहते वेगं नान्या बस्तेरृते क्रिया | पवनाविद्धतोयस्य वेला वेगमिवोदधेः ||३०|| शरीरोपचयं वर्णं बलमारोग्यमायुषः | कुरुते परिवृद्धिं च बस्तिः सम्यगुपासितः ||३१||
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Adhikarana 21 (32) · Śloka 32
অত ঊর্ধ্বং ব্যাপদো বক্ষ্যামঃ | তত্র নেত্রং বিচলিতং, বিবর্তিতং, পার্শ্বাবপীডিতম্, অত্যুত্ক্ষিপ্তম্, অবসন্নং, তির্যক্প্রক্ষিপ্তমিতি ষট্ প্রণিধানদোষাঃ; অতিস্থূলং, কর্কশম্, অবনতং, অণুভিন্নং , সন্নিকৃষ্টবিপ্রকৃষ্টকর্ণিকং, সূক্ষ্মাতিচ্ছিদ্রম্, অতিদীর্ঘম্, অতিহ্রস্বম্ , অস্রিমদিত্যেকাদশ নেত্রদোষাঃ; বহলতা, অল্পতা, সচ্ছিদ্রতা , প্রস্তীর্ণতা, দুর্বদ্ধতেতি পঞ্চ বস্তিদোষাঃ; অতিপীডিততা, শিথিলপীডিততা, ভূযো ভূযোঽবপীডনং, কালাতিক্রম ইতি চত্বারঃ পীডনদোষাঃ; আমতা, হীনতা, অতিমাত্রতা, অতিশীততা, অত্যুষ্ণতা, অতিতীক্ষ্ণতা, অতিমৃদুতা, অতিস্নিগ্ধতা, অতিরূক্ষতা, অতিসান্দ্রতা, অতিদ্রবতা, ইত্যেকাদশ দ্রব্যদোষাঃ; অবাক্শীর্ষোচ্ছীর্ষন্যুব্জোত্তানসঙ্কুচিতদেহস্থিতদক্ষিণপার্শ্বশাযিনঃ প্রদানমিতি সপ্ত শয্যাদোষাঃ; এবমেতাশ্চতুশ্চত্বারিংশদ্ব্যাপদো বৈদ্যনিমিত্তাঃ | আতুরনিমিত্তাঃ পঞ্চদশ আতুরোপদ্রবচিকিত্সিতে বক্ষ্যন্তে | স্নেহস্ত্বষ্টভিঃ কারণৈঃ প্রতিহতো ন প্রত্যাগচ্ছতি ত্রিভির্দোষৈঃ, অশনাভিভূতো, মলব্যামিশ্রো, দূরানুপ্রবিষ্টো, অস্বিন্নস্য, অনুষ্ণো, অল্পম্ভুক্তবতো, অল্পশ্চেতি বৈদ্যাতুরনিমিত্তা ভবন্তি | অযোগস্তূভযোঃ, আধ্মানং, পরিকর্তিকা, পরিস্রাবঃ, প্রবাহিকা, হৃদযোপসরণম্, অঙ্গপ্রগ্রহো, অতিযোগো, জীবাদানমিতি নব ব্যাপদো বৈদ্যনিমিত্তা ভবন্তি ||৩২||
अत ऊर्ध्वं व्यापदो वक्ष्यामः | तत्र नेत्रं विचलितं, विवर्तितं, पार्श्वावपीडितम्, अत्युत्क्षिप्तम्, अवसन्नं, तिर्यक्प्रक्षिप्तमिति षट् प्रणिधानदोषाः; अतिस्थूलं, कर्कशम्, अवनतं, अणुभिन्नं , सन्निकृष्टविप्रकृष्टकर्णिकं, सूक्ष्मातिच्छिद्रम्, अतिदीर्घम्, अतिह्रस्वम् , अस्रिमदित्येकादश नेत्रदोषाः; बहलता, अल्पता, सच्छिद्रता , प्रस्तीर्णता, दुर्बद्धतेति पञ्च बस्तिदोषाः; अतिपीडितता, शिथिलपीडितता, भूयो भूयोऽवपीडनं, कालातिक्रम इति चत्वारः पीडनदोषाः; आमता, हीनता, अतिमात्रता, अतिशीतता, अत्युष्णता, अतितीक्ष्णता, अतिमृदुता, अतिस्निग्धता, अतिरूक्षता, अतिसान्द्रता, अतिद्रवता, इत्येकादश द्रव्यदोषाः; अवाक्शीर्षोच्छीर्षन्युब्जोत्तानसङ्कुचितदेहस्थितदक्षिणपार्श्वशायिनः प्रदानमिति सप्त शय्यादोषाः; एवमेताश्चतुश्चत्वारिंशद्व्यापदो वैद्यनिमित्ताः | आतुरनिमित्ताः पञ्चदश आतुरोपद्रवचिकित्सिते वक्ष्यन्ते | स्नेहस्त्वष्टभिः कारणैः प्रतिहतो न प्रत्यागच्छति त्रिभिर्दोषैः, अशनाभिभूतो, मलव्यामिश्रो, दूरानुप्रविष्टो, अस्विन्नस्य, अनुष्णो, अल्पम्भुक्तवतो, अल्पश्चेति वैद्यातुरनिमित्ता भवन्ति | अयोगस्तूभयोः, आध्मानं, परिकर्तिका, परिस्रावः, प्रवाहिका, हृदयोपसरणम्, अङ्गप्रग्रहो, अतियोगो, जीवादानमिति नव व्यापदो वैद्यनिमित्ता भवन्ति ||३२||
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Adhikarana 22 (33) · Śloka 33
ভবতি চাত্র- ষট্সপ্ততিঃ সমাসেন ব্যাপদঃ পরিকীর্তিতাঃ | তাসাং বক্ষ্যামি বিজ্ঞানং সিদ্ধিং চ তদনন্তরম্ ||৩৩||
भवति चात्र- षट्सप्ततिः समासेन व्यापदः परिकीर्तिताः | तासां वक्ष्यामि विज्ञानं सिद्धिं च तदनन्तरम् ||३३||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 35
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে নেত্রবস্তিপ্রমাণপ্রবিভাগচিকিত্সিতং নাম পঞ্চত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩৫||
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने नेत्रबस्तिप्रमाणप्रविभागचिकित्सितं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ||३५||
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