Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো গর্ভব্যাকরণং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो गर्भव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো গর্ভব্যাকরণং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो गर्भव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
অগ্নিঃ সোমো বাযুঃ সত্ত্বং রজস্তমঃ পঞ্চেন্দ্রিযাণি ভূতাত্মেতি প্রাণাঃ ||৩||
अग्निः सोमो वायुः सत्त्वं रजस्तमः पञ्चेन्द्रियाणि भूतात्मेति प्राणाः ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তস্য খল্বেবম্প্রবৃত্তস্য শুক্রশোণিতস্যাভিপচ্যমানস্য ক্ষীরস্যেব সন্তানিকাঃ সপ্ত ত্বচো ভবন্তি | তাসাং প্রথমাঽবভাসিনী নাম, যা সর্বান্ বর্ণানবভাসযতি পঞ্চবিধাং চ ছাযাং প্রকাশযতি, সা ব্রীহেরষ্টাদশভাগপ্রমাণা, সিধ্মপদ্মকণ্টকাধিষ্ঠানা; দ্বিতীযা লোহিতা নাম, ষোডশভাগপ্রমাণা, তিলকালকন্যচ্ছব্যঙ্গাধিষ্ঠানা; তৃতীযা শ্বেতা নাম, দ্বাদশভাগপ্রমাণা, চর্মদলাজগল্লীমষকাধিষ্ঠানা; চতুর্থী তাম্রা নামাষ্টভাগপ্রমাণা, বিবিধকিলাসকুষ্ঠাধিষ্ঠানা; পঞ্চমী বেদিনী নাম পঞ্চভাগপ্রমাণা, কুষ্ঠবিসর্পাধিষ্ঠানা; ষষ্ঠী রোহিণী নাম ব্রীহিপ্রমাণা, গ্রন্থ্যপচ্যর্বুদশ্লীপদগলগণ্ডাধিষ্ঠানা; সপ্তমী মাংসধরা নাম ব্রীহিদ্বযপ্রমাণা, ভগন্দরবিদ্রধ্যর্শোঽধিষ্ঠানা | যদেতত্ প্রমাণং নির্দিষ্টং তন্মাংসলেষ্ববকাশেষু, ন ললাটে সূক্ষ্মাঙ্গুল্যাদিষু চ; যতো বক্ষ্যত্যুদরেষু- ‘ব্রীহিমুখেনাঙ্গুষ্ঠোদরপ্রমাণমবগাঢং বিধ্যেত্’ (চি.১৪) ইতি ||৪||
तस्य खल्वेवम्प्रवृत्तस्य शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य क्षीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति | तासां प्रथमाऽवभासिनी नाम, या सर्वान् वर्णानवभासयति पञ्चविधां च छायां प्रकाशयति, सा व्रीहेरष्टादशभागप्रमाणा, सिध्मपद्मकण्टकाधिष्ठाना; द्वितीया लोहिता नाम, षोडशभागप्रमाणा, तिलकालकन्यच्छव्यङ्गाधिष्ठाना; तृतीया श्वेता नाम, द्वादशभागप्रमाणा, चर्मदलाजगल्लीमषकाधिष्ठाना; चतुर्थी ताम्रा नामाष्टभागप्रमाणा, विविधकिलासकुष्ठाधिष्ठाना; पञ्चमी वेदिनी नाम पञ्चभागप्रमाणा, कुष्ठविसर्पाधिष्ठाना; षष्ठी रोहिणी नाम व्रीहिप्रमाणा, ग्रन्थ्यपच्यर्बुदश्लीपदगलगण्डाधिष्ठाना; सप्तमी मांसधरा नाम व्रीहिद्वयप्रमाणा, भगन्दरविद्रध्यर्शोऽधिष्ठाना | यदेतत् प्रमाणं निर्दिष्टं तन्मांसलेष्ववकाशेषु, न ललाटे सूक्ष्माङ्गुल्यादिषु च; यतो वक्ष्यत्युदरेषु- ‘व्रीहिमुखेनाङ्गुष्ठोदरप्रमाणमवगाढं विध्येत्’ (चि.१४) इति ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
কলাঃ খল্বপি সপ্ত ভবন্তি ধাত্বাশযান্তরমর্যাদাঃ ||৫||
कलाः खल्वपि सप्त भवन्ति धात्वाशयान्तरमर्यादाः ||५||
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Adhikarana 5 (6-7) · Śloka 7
ভবতশ্চাত্র- যথা হি সারঃ কাষ্ঠেষু ছিদ্যমানেষু দৃশ্যতে | তথাহি ধাতুর্মাংসেষু ছিদ্যমানেষু দৃশ্যতে ||৬|| স্নাযুভিশ্চ প্রতিচ্ছন্নান্ সন্ততাংশ্চ জরাযুণা | শ্লেষ্মণা বেষ্টিতাংশ্চাপি কলাভাগাংস্তু তান্ বিদুঃ ||৭||
भवतश्चात्र- यथा हि सारः काष्ठेषु छिद्यमानेषु दृश्यते | तथाहि धातुर्मांसेषु छिद्यमानेषु दृश्यते ||६|| स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्च जरायुणा | श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान् विदुः ||७||
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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
তাসাং প্রথমা মাংসধরা, যস্যাং মাংসে সিরাস্নাযুধমনীস্রোতসাং প্রতানা ভবন্তি ||৮||
तासां प्रथमा मांसधरा, यस्यां मांसे सिरास्नायुधमनीस्रोतसां प्रताना भवन्ति ||८||
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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
যথা বিসমৃণালানি বিবর্ধন্তে সমন্ততঃ | ভূমৌ পঙ্কোদকস্থানি তথা মাংসে সিরাদযঃ ||৯||
यथा बिसमृणालानि विवर्धन्ते समन्ततः | भूमौ पङ्कोदकस्थानि तथा मांसे सिरादयः ||९||
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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10
দ্বিতীযা রক্তধরা মাংসস্যাভ্যন্তরতঃ, তস্যাং শোণিতং বিশেষতশ্চ সিরাসু যকৃত্প্লীহ্নোশ্চ ভবতি ||১০||
द्वितीया रक्तधरा मांसस्याभ्यन्तरतः, तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृत्प्लीह्नोश्च भवति ||१०||
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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
বৃক্ষাদ্যথাভিপ্রহতাত্ ক্ষীরিণঃ ক্ষীরিমাবহেত্ | মাংসাদেবং ক্ষতাত্ ক্ষিপ্রং শোণিতং সম্প্রসিচ্যতে ||১১||
वृक्षाद्यथाभिप्रहतात् क्षीरिणः क्षीरिमावहेत् | मांसादेवं क्षतात् क्षिप्रं शोणितं सम्प्रसिच्यते ||११||
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
তৃতীযা মেদোধরা; মেদো হি সর্বভূতানামুদরস্থমণ্বস্থিষু চ, মহত্সু চ মজ্জা ভবতি ||১২||
तृतीया मेदोधरा; मेदो हि सर्वभूतानामुदरस्थमण्वस्थिषु च, महत्सु च मज्जा भवति ||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
স্থূলাস্থিষু বিশেষেণ মজ্জা ত্বভ্যন্তরাশ্রিতঃ | অথেতরেষু সর্বেষু সরক্তং মেদ উচ্যতে | শুদ্ধমাংসস্য যঃ স্নেহঃ সা বসা পরিকীর্তিতা ||১৩||
स्थूलास्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तराश्रितः | अथेतरेषु सर्वेषु सरक्तं मेद उच्यते | शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता ||१३||
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Adhikarana 12 (14-15) · Śloka 15
চতুর্থী শ্লেষ্মধরা সর্বসন্ধিষু প্রাণভৃতাং ভবতি ||১৪|| স্নেহাভ্যক্তে যথা হ্যক্ষে চক্রং সাধু প্রবর্ততে | সন্ধযঃ সাধু বর্তন্তে সংশ্লিষ্টাঃ শ্লেষ্মণা তথা ||১৫||
चतुर्थी श्लेष्मधरा सर्वसन्धिषु प्राणभृतां भवति ||१४|| स्नेहाभ्यक्ते यथा ह्यक्षे चक्रं साधु प्रवर्तते | सन्धयः साधु वर्तन्ते संश्लिष्टाः श्लेष्मणा तथा ||१५||
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Adhikarana 13 (16-17) · Śloka 17
পঞ্চমী পুরীষধরা নাম; যাঽন্তঃকোষ্ঠে মলমভিবিভজতে পক্বাশযস্থা ||১৬|| যকৃত্সমন্তাত্ কোষ্ঠং চ তথাঽন্ত্রাণি সমাশ্রিতা | উণ্ডু(ন্দু)কস্থং বিভজতে মলং মলধরা কলা ||১৭||
पञ्चमी पुरीषधरा नाम; याऽन्तःकोष्ठे मलमभिविभजते पक्वाशयस्था ||१६|| यकृत्समन्तात् कोष्ठं च तथाऽन्त्राणि समाश्रिता | उण्डु(न्दु)कस्थं विभजते मलं मलधरा कला ||१७||
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Adhikarana 14 (18) · Śloka 18
ষষ্ঠী পিত্তধরা ; যা চতুর্বিধমন্নপানমামাশযাত্ প্রচ্যুতং পক্বাশযোপস্থিতং ধারযতি ||১৮||
षष्ठी पित्तधरा ; या चतुर्विधमन्नपानमामाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति ||१८||
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Adhikarana 15 (19) · Śloka 19
অশিতং খাদিতং পীতং লীঢং কোষ্ঠগতং নৃণাম্ | তজ্জীর্যতি যথাকালং শোষিতং পিত্ততেজসা ||১৯||
अशितं खादितं पीतं लीढं कोष्ठगतं नृणाम् | तज्जीर्यति यथाकालं शोषितं पित्ततेजसा ||१९||
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Adhikarana 16 (20-21) · Śloka 21
সপ্তমী শুক্রধরা, যা সর্বপ্রাণিনাং সর্বশরীরব্যাপিনী ||২০|| যথা পযসি সর্পিস্তু গূঢশ্চেক্ষৌ রসো যথা | শরীরেষু তথা শুক্রং নৃণাং বিদ্যাদ্ভিষগ্বরঃ ||২১||
सप्तमी शुक्रधरा, या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी ||२०|| यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चेक्षौ रसो यथा | शरीरेषु तथा शुक्रं नृणां विद्याद्भिषग्वरः ||२१||
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Adhikarana 17 (22) · Śloka 22
দ্ব্যঙ্গুলে দক্ষিণে পার্শ্বে বস্তিদ্বারস্য চাপ্যধঃ | মূত্রস্রোতঃপথাচ্ছুক্রং পুরুষস্য প্রবর্ততে ||২২||
द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः | मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं पुरुषस्य प्रवर्तते ||२२||
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Adhikarana 18 (23) · Śloka 23
কৃত্স্নদেহাশ্রিতং শুক্রং প্রসন্নমনসস্তথা | স্ত্রীষু ব্যাযচ্ছতশ্চাপি হর্ষাত্তত্ সম্প্রবর্ততে ||২৩||
कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा | स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् सम्प्रवर्तते ||२३||
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Adhikarana 19 (24) · Śloka 24
গৃহীতগর্ভাণামার্তববহানাং স্রোতসাং বর্ত্মান্যবরুধ্যন্তে গর্ভেণ, তস্মাদ্গৃহীতগর্ভাণামার্তবং ন দৃশ্যতে; ততস্তদধঃ প্রতিহতমূর্ধ্বমাগতমপরং চোপচীযমানমপরেত্যভিধীযতে; শেষং চোর্ধ্বতরমাগতং পযোধরাবভিপ্রতিপদ্যতে, তস্মাদ্গর্ভিণ্যঃ পীনোন্নতপযোধরা ভবন্তি ||২৪||
गृहीतगर्भाणामार्तववहानां स्रोतसां वर्त्मान्यवरुध्यन्ते गर्भेण, तस्माद्गृहीतगर्भाणामार्तवं न दृश्यते; ततस्तदधः प्रतिहतमूर्ध्वमागतमपरं चोपचीयमानमपरेत्यभिधीयते; शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते, तस्माद्गर्भिण्यः पीनोन्नतपयोधरा भवन्ति ||२४||
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Adhikarana 20 (25) · Śloka 25
গর্ভস্য যকৃত্প্লীহানৌ শোণিতজৌ, শোণিতফেনপ্রভবঃ ফুপ্ফুসঃ , শোণিতকিট্টপ্রভব উণ্ডুকঃ ||২৫||
गर्भस्य यकृत्प्लीहानौ शोणितजौ, शोणितफेनप्रभवः फुप्फुसः , शोणितकिट्टप्रभव उण्डुकः ||२५||
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Adhikarana 21 (26-30) · Śloka 30
অসৃজঃ শ্লেষ্মণশ্চাপি যঃ প্রসাদঃ পরো মতঃ | তং পচ্যমানং পিত্তেন বাযুশ্চাপ্যনুধাবতি ||২৬|| ততোঽস্যান্ত্রাণি জাযন্তে গুদং বস্তিশ্চ দেহিনঃ | উদরে পচ্যমানানামাধ্মানাদ্রুক্মসারবত্ ||২৭|| কফশোণিতমাংসানাং সারাজ্জিহ্বা প্রজাযতে | যথার্থমূষ্মণা যুক্তো বাযুঃ স্রোতাংসি দারযেত্ ||২৮|| অনুপ্রবিশ্য পিশিতং পেশীর্বিভজতে তথা | মেদসঃ স্নেহমাদায সিরাস্নাযুত্বমাপ্নুযাত্ ||২৯|| সিরাণাং তু মৃদুঃ পাকঃ স্নাযূনাং চ ততঃ খরঃ | আশয্যাভ্যাসযোগেন করোত্যাশযসম্ভবম্ ||৩০||
असृजः श्लेष्मणश्चापि यः प्रसादः परो मतः | तं पच्यमानं पित्तेन वायुश्चाप्यनुधावति ||२६|| ततोऽस्यान्त्राणि जायन्ते गुदं बस्तिश्च देहिनः | उदरे पच्यमानानामाध्मानाद्रुक्मसारवत् ||२७|| कफशोणितमांसानां साराज्जिह्वा प्रजायते | यथार्थमूष्मणा युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत् ||२८|| अनुप्रविश्य पिशितं पेशीर्विभजते तथा | मेदसः स्नेहमादाय सिरास्नायुत्वमाप्नुयात् ||२९|| सिराणां तु मृदुः पाकः स्नायूनां च ततः खरः | आशय्याभ्यासयोगेन करोत्याशयसम्भवम् ||३०||
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Adhikarana 22 (31-32) · Śloka 32
রক্তমেদঃপ্রসাদাদ্বৃক্কৌ; মাংসাসৃক্কফমেদঃপ্রসাদাদ্বৃষণৌ; শোণিতকফপ্রসাদজং হৃদযং, যদাশ্রযা হি ধমন্যঃ প্রাণবহাঃ; তস্যাধো বামতঃ প্লীহা ফুপ্ফুসশ্চ, দক্ষিণতো যকৃত্ ক্লোম চ; তদ্বিশেষেণ চেতনাস্থানম্, অতস্তস্মিংস্তমসাঽঽবৃতে সর্বপ্রাণিনঃ স্বপন্তি ||৩১|| ভবতি চাত্র- পুণ্ডরীকেণ সদৃশং হৃদযং স্যাদধোমুখম্ | জাগ্রতস্তদ্বিকসতি স্বপতশ্চ নিমীলতি ||৩২||
रक्तमेदःप्रसादाद्वृक्कौ; मांसासृक्कफमेदःप्रसादाद्वृषणौ; शोणितकफप्रसादजं हृदयं, यदाश्रया हि धमन्यः प्राणवहाः; तस्याधो वामतः प्लीहा फुप्फुसश्च, दक्षिणतो यकृत् क्लोम च; तद्विशेषेण चेतनास्थानम्, अतस्तस्मिंस्तमसाऽऽवृते सर्वप्राणिनः स्वपन्ति ||३१|| भवति चात्र- पुण्डरीकेण सदृशं हृदयं स्यादधोमुखम् | जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतश्च निमीलति ||३२||
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Adhikarana 23 (33) · Śloka 33
নিদ্রাং তু বৈষ্ণবীং পাপ্মানমুপদিশন্তি, সা স্বভাবত এব সর্বপ্রাণিনোঽভিস্পৃশতি | তত্র যদা সঞ্জ্ঞাবহানি স্রোতাংসি তমোভূযিষ্ঠঃ শ্লেষ্মা প্রতিপদ্যতে তদা তামসী নাম নিদ্রা সম্ভবত্যনববোধিনী, সা প্রলযকালে; তমোভূযিষ্ঠানামহঃসু নিশাসু চ ভবতি, রজোভূযিষ্ঠানামনিমিত্তং, সত্ত্বভূযিষ্ঠানামর্ধরাত্রে; ক্ষীণশ্লেষ্মণামনিলবহুলানাং মনঃশরীরাভিতাপবতাং চ নৈব, সা বৈকারিকী ভবতি ||৩৩||
निद्रां तु वैष्णवीं पाप्मानमुपदिशन्ति, सा स्वभावत एव सर्वप्राणिनोऽभिस्पृशति | तत्र यदा सञ्ज्ञावहानि स्रोतांसि तमोभूयिष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यते तदा तामसी नाम निद्रा सम्भवत्यनवबोधिनी, सा प्रलयकाले; तमोभूयिष्ठानामहःसु निशासु च भवति, रजोभूयिष्ठानामनिमित्तं, सत्त्वभूयिष्ठानामर्धरात्रे; क्षीणश्लेष्मणामनिलबहुलानां मनःशरीराभितापवतां च नैव, सा वैकारिकी भवति ||३३||
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Adhikarana 24 (34-35) · Śloka 35
ভবতশ্চাত্র- হৃদযং চেতনাস্থানমুক্তং সুশ্রুত ! দেহিনাম্ | তমোভিভূতে তস্মিংস্তু নিদ্রা বিশতি দেহিনম্ ||৩৪|| নিদ্রাহেতুস্তমঃ, সত্ত্বং বোধনে হেতুরুচ্যতে | স্বভাব এব বা হেতুর্গরীযান্ পরিকীর্ত্যতে ||৩৫||
भवतश्चात्र- हृदयं चेतनास्थानमुक्तं सुश्रुत ! देहिनाम् | तमोभिभूते तस्मिंस्तु निद्रा विशति देहिनम् ||३४|| निद्राहेतुस्तमः, सत्त्वं बोधने हेतुरुच्यते | स्वभाव एव वा हेतुर्गरीयान् परिकीर्त्यते ||३५||
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Adhikarana 25 (36) · Śloka 36
পূর্বদেহানুভূতাংস্তু ভূতাত্মা স্বপতঃ প্রভুঃ | রজোযুক্তেন মনসা গৃহ্ণাত্যর্থাঞ্ শুভাশুভান্ ||৩৬||
पूर्वदेहानुभूतांस्तु भूतात्मा स्वपतः प्रभुः | रजोयुक्तेन मनसा गृह्णात्यर्थाञ् शुभाशुभान् ||३६||
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Adhikarana 26 (37) · Śloka 37
করণানাং তু বৈকল্যে তমসাঽভিপ্রবর্ধিতে | অস্বপন্নপি ভূতাত্মা প্রসুপ্ত ইব চোচ্যতে ||৩৭||
करणानां तु वैकल्ये तमसाऽभिप्रवर्धिते | अस्वपन्नपि भूतात्मा प्रसुप्त इव चोच्यते ||३७||
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Adhikarana 27 (38) · Śloka 38
সর্বর্তুষু দিবাস্বাপঃ প্রতিষিদ্ধোঽন্যত্র গ্রীষ্মাত্, প্রতিষিদ্ধেষ্বপি তু বালবৃদ্ধস্ত্রীকর্শিতক্ষতক্ষীণমদ্যনিত্যযানবাহনাধ্বকর্মপরিশ্রান্তানামভুক্তবতাং মেদঃস্বেদকফরসরক্তক্ষীণানামজীর্ণিনাং চ মুহূর্তং দিবাস্বপনমপ্রতিষিদ্ধম্ | রাত্রাবপি জাগরিতবতাং জাগরিতকালাদর্ধমিষ্যতে দিবাস্বপনম্ | বিকৃতির্হি দিবাস্বপ্নো নাম; তত্র স্বপতামধর্মঃ সর্বদোষপ্রকোপশ্চ, তত্প্রকোপাচ্চ কাসশ্বাসপ্রতিশ্যাযশিরোগৌরবাঙ্গমর্দারোচকজ্বরাগ্নিদৌর্বল্যানি ভবন্তি; রাত্রাবপি জাগরিতবতাং বাতপিত্তনিমিত্তাস্ত এবোপদ্রবা ভবন্তি ||৩৮||
सर्वर्तुषु दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र ग्रीष्मात्, प्रतिषिद्धेष्वपि तु बालवृद्धस्त्रीकर्शितक्षतक्षीणमद्यनित्ययानवाहनाध्वकर्मपरिश्रान्तानामभुक्तवतां मेदःस्वेदकफरसरक्तक्षीणानामजीर्णिनां च मुहूर्तं दिवास्वपनमप्रतिषिद्धम् | रात्रावपि जागरितवतां जागरितकालादर्धमिष्यते दिवास्वपनम् | विकृतिर्हि दिवास्वप्नो नाम; तत्र स्वपतामधर्मः सर्वदोषप्रकोपश्च, तत्प्रकोपाच्च कासश्वासप्रतिश्यायशिरोगौरवाङ्गमर्दारोचकज्वराग्निदौर्बल्यानि भवन्ति; रात्रावपि जागरितवतां वातपित्तनिमित्तास्त एवोपद्रवा भवन्ति ||३८||
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Adhikarana 28 (39-40) · Śloka 40
ভবন্তি চাত্র- তস্মান্ন জাগৃযাদ্রাত্রৌ দিবাস্বপ্নং চ বর্জযেত্ | জ্ঞাত্বা দোষকরাবেতৌ বুধঃ স্বপ্নং মিতং চরেত্ ||৩৯|| অরোগঃ সুমনা হ্যেবং বলবর্ণান্বিতো বৃষঃ | নাতিস্থূলকৃশঃ শ্রীমান্ নরো জীবেত্ সমাঃ শতম্ ||৪০||
भवन्ति चात्र- तस्मान्न जागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत् | ज्ञात्वा दोषकरावेतौ बुधः स्वप्नं मितं चरेत् ||३९|| अरोगः सुमना ह्येवं बलवर्णान्वितो वृषः | नातिस्थूलकृशः श्रीमान् नरो जीवेत् समाः शतम् ||४०||
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Adhikarana 29 (41) · Śloka 41
(নিদ্রা সাত্ম্যীকৃতা যৈস্তু রাত্রৌ চ যদি বা দিবা|) দিবারাত্রৌ চ যে নিত্যং স্বপ্নজাগরণোচিতাঃ | ন তেষাং স্বপতাং দোষো জাগ্রতাং বাঽপি জাযতে ||৪১||
(निद्रा सात्म्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा|) दिवारात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः | न तेषां स्वपतां दोषो जाग्रतां वाऽपि जायते ||४१||
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Adhikarana 30 (42-46) · Śloka 46
নিদ্রানাশোঽনিলাত্ পিত্তান্মনস্তাপাত্ ক্ষযাদপি | সম্ভবত্যভিঘাতাচ্চ প্রত্যনীকৈঃ প্রশাম্যতি ||৪২|| নিদ্রানাশেঽভ্যঙ্গযোগো মূর্ধ্নি তৈলনিষেবণম্ | গাত্রস্যোদ্বর্তনং চৈব হিতং সংবাহনানি চ ||৪৩|| শালিগোধূমপিষ্টান্নভক্ষ্যৈরৈক্ষবসংস্কৃতৈঃ | ভোজনং মধুরং স্নিগ্ধং ক্ষীরমাংসরসাদিভিঃ ||৪৪|| রসৈর্বিলেশযানাং চ বিষ্কিরাণাং তথৈব চ | দ্রাক্ষাসিতেক্ষুদ্রব্যাণামুপযোগো ভবেন্নিশি ||৪৫|| শযনাসনযানানি মনোজ্ঞানি মৃদূনি চ | নিদ্রানাশে তু কুর্বীত তথাঽন্যান্যপি বুদ্ধিমান্ ||৪৬||
निद्रानाशोऽनिलात् पित्तान्मनस्तापात् क्षयादपि | सम्भवत्यभिघाताच्च प्रत्यनीकैः प्रशाम्यति ||४२|| निद्रानाशेऽभ्यङ्गयोगो मूर्ध्नि तैलनिषेवणम् | गात्रस्योद्वर्तनं चैव हितं संवाहनानि च ||४३|| शालिगोधूमपिष्टान्नभक्ष्यैरैक्षवसंस्कृतैः | भोजनं मधुरं स्निग्धं क्षीरमांसरसादिभिः ||४४|| रसैर्बिलेशयानां च विष्किराणां तथैव च | द्राक्षासितेक्षुद्रव्याणामुपयोगो भवेन्निशि ||४५|| शयनासनयानानि मनोज्ञानि मृदूनि च | निद्रानाशे तु कुर्वीत तथाऽन्यान्यपि बुद्धिमान् ||४६||
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Adhikarana 31 (47) · Śloka 47
নিদ্রাতিযোগে বমনং হিতং সংশোধনানি চ | লঙ্ঘনং রক্তমোক্ষশ্চ মনোব্যাকুলনানি চ ||৪৭||
निद्रातियोगे वमनं हितं संशोधनानि च | लङ्घनं रक्तमोक्षश्च मनोव्याकुलनानि च ||४७||
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Adhikarana 32 (48) · Śloka 48
কফমেদোবিষার্তানাং রাত্রৌ জাগরণং হিতম্ |৪৮|
कफमेदोविषार्तानां रात्रौ जागरणं हितम् |४८|
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Adhikarana 33 (48) · Śloka 48
দিবাস্বপ্নশ্চ তৃট্শূলহিক্কাজীর্ণাতিসারিণাম্ ||৪৮||
दिवास्वप्नश्च तृट्शूलहिक्काजीर्णातिसारिणाम् ||४८||
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Adhikarana 34 (49) · Śloka 49
ইন্দ্রিযার্থেষ্বসম্প্রাপ্তির্গৌরবং জৃম্ভণং ক্লমঃ | নিদ্রার্তস্যেব যস্যেহা তস্য তন্দ্রাং বিনির্দিশেত্ ||৪৯||
इन्द्रियार्थेष्वसम्प्राप्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः | निद्रार्तस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ||४९||
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Adhikarana 35 (50) · Śloka 50
পীত্বৈকমনিলোচ্ছ্বাসমুদ্বেষ্টন্ বিবৃতাননঃ | যং মুঞ্চতি সনেত্রাস্রং স জৃম্ভ ইতি সঞ্জ্ঞিতঃ ||৫০||
पीत्वैकमनिलोच्छ्वासमुद्वेष्टन् विवृताननः | यं मुञ्चति सनेत्रास्रं स जृम्भ इति सञ्ज्ञितः ||५०||
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Adhikarana 36 (51) · Śloka 51
যোঽনাযাসঃ শ্রমো দেহে প্রবৃদ্ধঃ শ্বাসবর্জিতঃ | ক্লমঃ স ইতি বিজ্ঞেয ইন্দ্রিযার্থপ্রবাধকঃ ||৫১||
योऽनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः | क्लमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रबाधकः ||५१||
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Adhikarana 37 (52) · Śloka 52
সুখস্পর্শপ্রসঙ্গিত্বং দুঃখদ্বেষণলোলতা | শক্তস্য চাপ্যনুত্সাহঃ কর্মস্বালস্যমুচ্যতে ||৫২||
सुखस्पर्शप्रसङ्गित्वं दुःखद्वेषणलोलता | शक्तस्य चाप्यनुत्साहः कर्मस्वालस्यमुच्यते ||५२||
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Adhikarana 38 (53-54) · Śloka 54
উত্ক্লিশ্যান্নং ন নির্গচ্ছেত্ প্রসেকষ্ঠীবনেরিতম্ | হৃদযং পীড্যতে চাস্য তমুত্ক্লেশং বিনির্দিশেত্ ||৫৩|| বক্ত্রে মধুরতা তন্দ্রা হৃদযোদ্বেষ্টনং ভ্রমঃ | ন চান্নমভিকাঙ্ক্ষেত গ্লানিং তস্য বিনির্দিশেত্ ||৫৪||
उत्क्लिश्यान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकष्ठीवनेरितम् | हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्क्लेशं विनिर्दिशेत् ||५३|| वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्वेष्टनं भ्रमः | न चान्नमभिकाङ्क्षेत ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत् ||५४||
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Adhikarana 39 (55) · Śloka 55
আর্দ্রচর্মাবনদ্ধং বা যো গাত্রং মন্যতে নরঃ | তথা গুরু শিরোঽত্যর্থং গৌরবং তদ্বিনির্দিশেত্ ||৫৫||
आर्द्रचर्मावनद्धं वा यो गात्रं मन्यते नरः | तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद्विनिर्दिशेत् ||५५||
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Adhikarana 40 (56) · Śloka 56
মূর্চ্ছা পিত্ততমঃপ্রাযা, রজঃপিত্তানিলাদ্ভ্রমঃ | তমোবাতকফাত্তন্দ্রা, নিদ্রা শ্লেষ্মতমোভবা ||৫৬||
मूर्च्छा पित्ततमःप्राया, रजःपित्तानिलाद्भ्रमः | तमोवातकफात्तन्द्रा, निद्रा श्लेष्मतमोभवा ||५६||
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Adhikarana 41 (57) · Śloka 57
গর্ভস্য খলু রসনিমিত্তা মারুতাধ্মাননিমিত্তা চ পরিবৃদ্ধির্ভবতি ||৫৭||
गर्भस्य खलु रसनिमित्ता मारुताध्माननिमित्ता च परिवृद्धिर्भवति ||५७||
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Adhikarana 42 (58-59) · Śloka 59
ভবন্তি চাত্র- তস্যান্তরেণ নাভেস্তু জ্যোতিঃস্থানং ধ্রুবং স্মৃতম্ | তদাধমতি বাতস্তু দেহস্তেনাস্য বর্ধতে ||৫৮|| ঊষ্মণা সহিতশ্চাপি দারযত্যস্য মারুতঃ | ঊর্ধ্বং তির্যগধস্তাচ্চ স্রোতাংস্যপি যথা তথা ||৫৯||
भवन्ति चात्र- तस्यान्तरेण नाभेस्तु ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम् | तदाधमति वातस्तु देहस्तेनास्य वर्धते ||५८|| ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य मारुतः | ऊर्ध्वं तिर्यगधस्ताच्च स्रोतांस्यपि यथा तथा ||५९||
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Adhikarana 43 (60) · Śloka 60
দৃষ্টিশ্চ রোমকূপাশ্চ ন বর্ধন্তে কদাচন | ধ্রুবাণ্যেতানি মর্ত্যানামিতি ধন্বন্তরের্মতম্ ||৬০||
दृष्टिश्च रोमकूपाश्च न वर्धन्ते कदाचन | ध्रुवाण्येतानि मर्त्यानामिति धन्वन्तरेर्मतम् ||६०||
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Adhikarana 44 (61) · Śloka 61
শরীরে ক্ষীযমাণেঽপি বর্ধেতে দ্বাবিমৌ সদা | স্বভাবং প্রকৃতিং কৃত্বা নখকেশাবিতি স্থিতিঃ ||৬১||
शरीरे क्षीयमाणेऽपि वर्धेते द्वाविमौ सदा | स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ||६१||
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Adhikarana 45 (62) · Śloka 62
সপ্ত প্রকৃতযো ভবন্তি- দোষৈঃ পৃথক্, দ্বিশঃ, সমস্তৈশ্চ ||৬২||
सप्त प्रकृतयो भवन्ति- दोषैः पृथक्, द्विशः, समस्तैश्च ||६२||
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Adhikarana 46 (63) · Śloka 63
শুক্রশোণিতসংযোগে যো ভবেদ্দোষ উত্কটঃ | প্রকৃতির্জাযতে তেন তস্যা মে লক্ষণং শৃণু ||৬৩||
शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः | प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ||६३||
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Adhikarana 47 (64-67) · Śloka 67
তত্র বাতপ্রকৃতিঃ প্রজাগরূকঃ শীতদ্বেষী দুর্ভগঃ স্তেনো মত্সর্যনার্যো গন্ধর্বচিত্তঃ স্ফুটিতকরচরণোঽল্পরূক্ষশ্মশ্রুনখকেশঃ ক্রাথী দন্তখাদী চ ভবতি ||৬৪|| অধৃতিরদৃঢসৌহৃদঃ কৃতঘ্নঃ কৃশপরুষো ধমনীততঃ প্রলাপী | দ্রুতগতিরটনোঽনবস্থিতাত্মা বিযতি চ গচ্ছতি সম্ভ্রমেণ সুপ্তঃ ||৬৫|| অব্যবস্থিতমতিশ্চলদৃষ্টির্মন্দরত্নধনসঞ্চযমিত্রঃ | কিঞ্চিদেব বিলপত্যনিবদ্ধং মারুতপ্রকৃতিরেষ মনুষ্যঃ ||৬৬|| (বাতিকাশ্চাজগোমাযুশশাখূষ্ট্রশুনাং তথা | গৃধ্রকাকখরাদীনামনূকৈঃ কীর্তিতা নরাঃ) ||৬৭||
तत्र वातप्रकृतिः प्रजागरूकः शीतद्वेषी दुर्भगः स्तेनो मत्सर्यनार्यो गन्धर्वचित्तः स्फुटितकरचरणोऽल्परूक्षश्मश्रुनखकेशः क्राथी दन्तखादी च भवति ||६४|| अधृतिरदृढसौहृदः कृतघ्नः कृशपरुषो धमनीततः प्रलापी | द्रुतगतिरटनोऽनवस्थितात्मा वियति च गच्छति सम्भ्रमेण सुप्तः ||६५|| अव्यवस्थितमतिश्चलदृष्टिर्मन्दरत्नधनसञ्चयमित्रः | किञ्चिदेव विलपत्यनिबद्धं मारुतप्रकृतिरेष मनुष्यः ||६६|| (वातिकाश्चाजगोमायुशशाखूष्ट्रशुनां तथा | गृध्रकाकखरादीनामनूकैः कीर्तिता नराः) ||६७||
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Adhikarana 48 (68-71) · Śloka 71
পিত্তপ্রকৃতিস্তু স্বেদনো দুর্গন্ধঃ পীতশিথিলাঙ্গস্তাম্রনখনযনতালুজিহ্বৌষ্ঠপাণিপাদতলো দুর্ভগো বলীপলিতখালিত্যজুষ্টো বহুভুগুষ্ণদ্বেষী ক্ষিপ্রকোপপ্রসাদো মধ্যবলো মধ্যাযুশ্চ ভবতি ||৬৮|| মেধাবী নিপুণমতির্বিগৃহ্য বক্তা তেজস্বী সমিতিষু দুর্নিবারবীর্যঃ | সুপ্তঃ সন্ কনকপলাশকর্ণিকারান্ সম্পশ্যেদপি চ হুতাশবিদ্যুদুল্কাঃ ||৬৯|| ন ভযাত্ প্রণমেদনতেষ্বমৃদুঃ প্রণতেষ্বপি সান্ত্বনদানরুচিঃ | ভবতীহ সদা ব্যথিতাস্যগতিঃ স ভবেদিহ পিত্তকৃতপ্রকৃতিঃ ||৭০|| (ভুজঙ্গোলূকগন্ধর্বযক্ষমার্জারবানরৈঃ | ব্যাঘ্রর্ক্ষনকুলানূকৈঃ পৈত্তিকাস্তু নরাঃস্মৃতাঃ ) ||৭১||
पित्तप्रकृतिस्तु स्वेदनो दुर्गन्धः पीतशिथिलाङ्गस्ताम्रनखनयनतालुजिह्वौष्ठपाणिपादतलो दुर्भगो वलीपलितखालित्यजुष्टो बहुभुगुष्णद्वेषी क्षिप्रकोपप्रसादो मध्यबलो मध्यायुश्च भवति ||६८|| मेधावी निपुणमतिर्विगृह्य वक्ता तेजस्वी समितिषु दुर्निवारवीर्यः | सुप्तः सन् कनकपलाशकर्णिकारान् सम्पश्येदपि च हुताशविद्युदुल्काः ||६९|| न भयात् प्रणमेदनतेष्वमृदुः प्रणतेष्वपि सान्त्वनदानरुचिः | भवतीह सदा व्यथितास्यगतिः स भवेदिह पित्तकृतप्रकृतिः ||७०|| (भुजङ्गोलूकगन्धर्वयक्षमार्जारवानरैः | व्याघ्रर्क्षनकुलानूकैः पैत्तिकास्तु नराःस्मृताः ) ||७१||
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Adhikarana 49 (72-76) · Śloka 76
শ্লেষ্মপ্রকৃতিস্তু দূর্বেন্দীবরনিস্ত্রিংশার্দ্রারিষ্টকশরকাণ্ডানামন্যতমবর্ণঃ সুভগঃ প্রিযদর্শনো মধুরপ্রিযঃ কৃতজ্ঞো ধৃতিমান্ সহিষ্ণুরলোলুপো বলবাংশ্চিরগ্রাহী দৃঢবৈরশ্চ ভবতি ||৭২|| শুক্লাক্ষঃ স্থিরকুটিলালিনীলকেশো লক্ষ্মীবান্ জলদমৃদঙ্গসিংহঘোষঃ | সুপ্তঃ সন্ সকমলহংসচক্রবাকান্ সম্পশ্যেদপি চ জলাশযান্ মনোজ্ঞান্ ||৭৩|| রক্তান্তনেত্রঃ সুবিভক্তগাত্রঃ স্নিগ্ধচ্ছবিঃ সত্ত্বগুণোপপন্নঃ | ক্লেশক্ষমো মানযিতা গুরূণাং জ্ঞেযো বলাসপ্রকৃতির্মনুষ্যঃ ||৭৪|| (দৃঢশাস্ত্রমতিঃ স্থিরমিত্রধনঃ পরিগণ্য চিরাত্ প্রদদাতি বহু | পরিনিশ্চিতবাক্যপদঃ সততং গুরুমানকরশ্চ ভবেত্ স সদা ||৭৫|| ব্রহ্মরুদ্রেন্দ্রবরুণৈঃ সিংহাশ্বগজগোবৃষৈঃ | তার্ক্ষ্যহংসসমানূকাঃ শ্লেষ্মপ্রকৃতযো নরাঃ ) ||৭৬||
श्लेष्मप्रकृतिस्तु दूर्वेन्दीवरनिस्त्रिंशार्द्रारिष्टकशरकाण्डानामन्यतमवर्णः सुभगः प्रियदर्शनो मधुरप्रियः कृतज्ञो धृतिमान् सहिष्णुरलोलुपो बलवांश्चिरग्राही दृढवैरश्च भवति ||७२|| शुक्लाक्षः स्थिरकुटिलालिनीलकेशो लक्ष्मीवान् जलदमृदङ्गसिंहघोषः | सुप्तः सन् सकमलहंसचक्रवाकान् सम्पश्येदपि च जलाशयान् मनोज्ञान् ||७३|| रक्तान्तनेत्रः सुविभक्तगात्रः स्निग्धच्छविः सत्त्वगुणोपपन्नः | क्लेशक्षमो मानयिता गुरूणां ज्ञेयो बलासप्रकृतिर्मनुष्यः ||७४|| (दृढशास्त्रमतिः स्थिरमित्रधनः परिगण्य चिरात् प्रददाति बहु | परिनिश्चितवाक्यपदः सततं गुरुमानकरश्च भवेत् स सदा ||७५|| ब्रह्मरुद्रेन्द्रवरुणैः सिंहाश्वगजगोवृषैः | तार्क्ष्यहंससमानूकाः श्लेष्मप्रकृतयो नराः ) ||७६||
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Adhikarana 50 (77) · Śloka 77
দ্বযোর্বা তিসৃণাং বাঽপি প্রকৃতীনাং তু লক্ষণৈঃ | জ্ঞাত্বা সংসর্গজা বৈদ্যঃ প্রকৃতীরভিনির্দিশেত্ ||৭৭||
द्वयोर्वा तिसृणां वाऽपि प्रकृतीनां तु लक्षणैः | ज्ञात्वा संसर्गजा वैद्यः प्रकृतीरभिनिर्दिशेत् ||७७||
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Adhikarana 51 (78) · Śloka 78
প্রকোপো বাঽন্যথাভাবো ক্ষযো বা নোপজাযতে | প্রকৃতীনাং স্বভাবেন জাযতে তু গতাযুষঃ ||৭৮||
प्रकोपो वाऽन्यथाभावो क्षयो वा नोपजायते | प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ||७८||
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Adhikarana 52 (79) · Śloka 79
বিষজাতো যথা কীটো ন বিষেণ বিপদ্যতে | তদ্বত্প্রকৃতযো মর্ত্যং শক্নুবন্তি ন বাধিতুম্ ||৭৯||
विषजातो यथा कीटो न विषेण विपद्यते | तद्वत्प्रकृतयो मर्त्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ||७९||
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Adhikarana 53 (80) · Śloka 80
প্রকৃতিমিহ নরাণাং ভৌতিকীং কেচিদাহুঃ পবনদহনতোযৈঃ কীর্তিতাস্তাস্তু তিস্রঃ | স্থিরবিপুলশরীরঃ পার্থিবশ্চ ক্ষমাবাঞ্ শুচিরথ চিরজীবী নাভসঃ খৈর্মহদ্ভিঃ ||৮০||
प्रकृतिमिह नराणां भौतिकीं केचिदाहुः पवनदहनतोयैः कीर्तितास्तास्तु तिस्रः | स्थिरविपुलशरीरः पार्थिवश्च क्षमावाञ् शुचिरथ चिरजीवी नाभसः खैर्महद्भिः ||८०||
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Adhikarana 54 (81-87) · Śloka 88
শৌচমাস্তিক্যমভ্যাসো বেদেষু গুরুপূজনম্ | প্রিযাতিথিত্বমিজ্যা চ ব্রহ্মকাযস্য লক্ষণম্ ||৮১|| মাহাত্ম্যং শৌর্যমাজ্ঞা চ সততং শাস্ত্রবুদ্ধিতা | ভৃত্যানাং ভরণং চাপি মাহেন্দ্রং কাযলক্ষণম্ ||৮২|| শীতসেবা সহিষ্ণুত্বং পৈঙ্গল্যং হরিকেশতা | প্রিযবাদিত্বমিত্যেতদ্বারুণং কাযলক্ষণম্ ||৮৩|| মধ্যস্থতা সহিষ্ণুত্বমর্থস্যাগমসঞ্চযৌ | মহাপ্রসবশক্তিত্বং কৌবেরং কাযলক্ষণম্ ||৮৪|| গন্ধমাল্যপ্রিযত্বং চ নৃত্যবাদিত্রকামিতা | বিহারশীলতা চৈব গান্ধর্বং কাযলক্ষণম্ ||৮৫|| প্রাপ্তকারী দৃঢোত্থানো নির্ভযঃ স্মৃতিমাঞ্ছুচিঃ | রাগমোহমদদ্বেষৈর্বর্জিতো যাম্যসত্ত্ববান্ ||৮৬|| জপব্রতব্রহ্মচর্যহোমাধ্যযনসেবিনম্ | জ্ঞানবিজ্ঞানসম্পন্নমৃষিসত্ত্বং নরং বিদুঃ ||৮৭|| সপ্তৈতে সাত্ত্বিকাঃ কাযা... |৮৮|
शौचमास्तिक्यमभ्यासो वेदेषु गुरुपूजनम् | प्रियातिथित्वमिज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् ||८१|| माहात्म्यं शौर्यमाज्ञा च सततं शास्त्रबुद्धिता | भृत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ||८२|| शीतसेवा सहिष्णुत्वं पैङ्गल्यं हरिकेशता | प्रियवादित्वमित्येतद्वारुणं कायलक्षणम् ||८३|| मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसञ्चयौ | महाप्रसवशक्तित्वं कौबेरं कायलक्षणम् ||८४|| गन्धमाल्यप्रियत्वं च नृत्यवादित्रकामिता | विहारशीलता चैव गान्धर्वं कायलक्षणम् ||८५|| प्राप्तकारी दृढोत्थानो निर्भयः स्मृतिमाञ्छुचिः | रागमोहमदद्वेषैर्वर्जितो याम्यसत्त्ववान् ||८६|| जपव्रतब्रह्मचर्यहोमाध्ययनसेविनम् | ज्ञानविज्ञानसम्पन्नमृषिसत्त्वं नरं विदुः ||८७|| सप्तैते सात्त्विकाः काया... |८८|
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Adhikarana 55 (88-93) · Śloka 95
...রাজসাংস্তু নিবোধ মে | ঐশ্বর্যবন্তং রৌদ্রং চ শূরং চণ্ডমসূযকম্ ||৮৮|| একাশিনং চৌদরিকমাসুরং সত্ত্বমীদৃশম্ | তীক্ষ্ণমাযাসিনং ভীরুং চণ্ডং মাযান্বিতং তথা ||৮৯|| বিহারাচারচপলং সর্পসত্ত্বং বিদুর্নরম্ | প্রবৃদ্ধকামসেবী চাপ্যজস্রাহার এব চ ||৯০|| অমর্ষণোঽনবস্থাযী শাকুনং কাযলক্ষণম্ | একান্তগ্রাহিতা রৌদ্রমসূযা ধর্মবাহ্যতা ||৯১|| ভৃশমাত্রং তমশ্চাপি রাক্ষসং কাযলক্ষণম্ | উচ্ছিষ্টাহারতা তৈক্ষ্ণ্যং সাহসপ্রিযতা তথা ||৯২|| স্ত্রীলোলুপত্বং নৈর্লজ্জ্যং পৈশাচং কাযলক্ষণম্ | অসংবিভাগমলসং দুঃখশীলমসূযকম্ ||৯৩|| লোলুপং চাপ্যদাতারং প্রেতসত্ত্বং বিদুর্নরম্ | ষডেতে রাজসাঃ কাযাঃ,.. |৯৫|
...राजसांस्तु निबोध मे | ऐश्वर्यवन्तं रौद्रं च शूरं चण्डमसूयकम् ||८८|| एकाशिनं चौदरिकमासुरं सत्त्वमीदृशम् | तीक्ष्णमायासिनं भीरुं चण्डं मायान्वितं तथा ||८९|| विहाराचारचपलं सर्पसत्त्वं विदुर्नरम् | प्रवृद्धकामसेवी चाप्यजस्राहार एव च ||९०|| अमर्षणोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम् | एकान्तग्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाह्यता ||९१|| भृशमात्रं तमश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् | उच्छिष्टाहारता तैक्ष्ण्यं साहसप्रियता तथा ||९२|| स्त्रीलोलुपत्वं नैर्लज्ज्यं पैशाचं कायलक्षणम् | असंविभागमलसं दुःखशीलमसूयकम् ||९३|| लोलुपं चाप्यदातारं प्रेतसत्त्वं विदुर्नरम् | षडेते राजसाः कायाः,.. |९५|
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Adhikarana 56 (94-97) · Śloka 98
...তামসাংস্তু নিবোধ মে ||৯৪|| দুর্মেধস্ত্বং মন্দতা চ স্বপ্নে মৈথুননিত্যতা | নিরাকরিষ্ণুতা চৈব বিজ্ঞেযাঃ পাশবা গুণাঃ ||৯৫|| অনবস্থিততা মৌর্খ্যং ভীরুত্বং সলিলার্থিতা | পরস্পরাভিমর্দশ্চ মত্স্যসত্ত্বস্য লক্ষণম্ ||৯৬|| একস্থানরতির্নিত্যমাহারে কেবলে রতঃ | বানস্পত্যো নরঃ সত্ত্বধর্মকামার্থবর্জিতঃ ||৯৭|| ইত্যেতে ত্রিবিধাঃ কাযাঃ প্রোক্তা বৈ তামসাস্তথা |৯৮|
...तामसांस्तु निबोध मे ||९४|| दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्ने मैथुननित्यता | निराकरिष्णुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः ||९५|| अनवस्थितता मौर्ख्यं भीरुत्वं सलिलार्थिता | परस्पराभिमर्दश्च मत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् ||९६|| एकस्थानरतिर्नित्यमाहारे केवले रतः | वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकामार्थवर्जितः ||९७|| इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा |९८|
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Adhikarana 57 (98-99) · Śloka 99
কাযানাং প্রকৃতীর্জ্ঞাত্বা ত্বনুরূপাং ক্রিযাং চরেত্ ||৯৮|| মহাপ্রকৃতযস্ত্বেতা রজঃসত্ত্বতমঃকৃতাঃ | প্রোক্তা লক্ষণতঃ সম্যগ্ভিষক্ তাশ্চ বিভাবযেত্ ||৯৯||
कायानां प्रकृतीर्ज्ञात्वा त्वनुरूपां क्रियां चरेत् ||९८|| महाप्रकृतयस्त्वेता रजःसत्त्वतमःकृताः | प्रोक्ता लक्षणतः सम्यग्भिषक् ताश्च विभावयेत् ||९९||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 4
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে গর্ভব্যাকরণং শারীরং নাম চতুর্থোঽধ্যাযঃ ||৪||
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भव्याकरणं शारीरं नाम चतुर्थोऽध्यायः ||४||
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