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3. garbhāvakrāntiśārīram

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো গর্ভাবক্রান্তিং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

সৌম্যং শুক্রমার্তবমাগ্নেযমিতরেষামপ্যত্র ভূতানাং সান্নিধ্যমস্ত্যণুনা বিশেষেণ, পরস্পরোপকারাত্ (পরস্পরানুগ্রহাত্,) পরস্পরানুপ্রবেশাচ্চ ||৩||

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सौम्यं शुक्रमार्तवमाग्नेयमितरेषामप्यत्र भूतानां सान्निध्यमस्त्यणुना विशेषेण, परस्परोपकारात् (परस्परानुग्रहात्,) परस्परानुप्रवेशाच्च ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তত্র স্ত্রীপুংসযোঃ সংযোগে তেজঃ শরীরাদ্বাযুরুদীরযতি, ততস্তেজোনিলসন্নিপাতাচ্ছুক্রং চ্যুতং যোনিমভিপ্রতিপদ্যতে সংসৃজ্যতে চার্তবেন, ততোঽগ্নীষোমসংযোগাত্ সংসৃজ্যমানো গর্ভাশযমনুপ্রতিপদ্যতে ক্ষেত্রজ্ঞো বেদযিতা স্প্রষ্টা ঘ্রাতা দ্রষ্টা শ্রোতা রসযিতা পুরুষঃ স্রষ্টা গন্তা সাক্ষী ধাতা বক্তা যঃ কোঽসাবিত্যেবমাদিভিঃ পর্যাযবাচকৈর্নামভিরভিধীযতে দৈবসংযোগাদক্ষযোঽব্যযোঽচিন্ত্যো ভূতাত্মনা সহান্বক্ষং সত্ত্বরজস্তমোভির্দৈবাসুরৈরপরৈশ্চ ভাবৈর্বাযুনাঽভিপ্রের্যমাণো গর্ভাশযমনুপ্রবিশ্যাবতিষ্ঠতে ||৪||

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तत्र स्त्रीपुंसयोः संयोगे तेजः शरीराद्वायुरुदीरयति, ततस्तेजोनिलसन्निपाताच्छुक्रं च्युतं योनिमभिप्रतिपद्यते संसृज्यते चार्तवेन, ततोऽग्नीषोमसंयोगात् संसृज्यमानो गर्भाशयमनुप्रतिपद्यते क्षेत्रज्ञो वेदयिता स्प्रष्टा घ्राता द्रष्टा श्रोता रसयिता पुरुषः स्रष्टा गन्ता साक्षी धाता वक्ता यः कोऽसावित्येवमादिभिः पर्यायवाचकैर्नामभिरभिधीयते दैवसंयोगादक्षयोऽव्ययोऽचिन्त्यो भूतात्मना सहान्वक्षं सत्त्वरजस्तमोभिर्दैवासुरैरपरैश्च भावैर्वायुनाऽभिप्रेर्यमाणो गर्भाशयमनुप्रविश्यावतिष्ठते ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

তত্র শুক্রবাহুল্যাত্ পুমান্, আর্তববাহুল্যাত্ স্ত্রী, সাম্যাদুভযোর্নপুংসকমিতি ||৫||

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तत्र शुक्रबाहुल्यात् पुमान्, आर्तवबाहुल्यात् स्त्री, साम्यादुभयोर्नपुंसकमिति ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

ঋতুস্তু দ্বাদশরাত্রং ভবতি দৃষ্টার্তবঃ; অদৃষ্টার্তবাঽপ্যস্তীত্যেকে ভাষন্তে ||৬||

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ऋतुस्तु द्वादशरात्रं भवति दृष्टार्तवः; अदृष्टार्तवाऽप्यस्तीत्येके भाषन्ते ||६||

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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8

ভবন্তি চাত্র- পীনপ্রসন্নবদনাং প্রক্লিন্নাত্মমুখদ্বিজাম্ | নরকামাং প্রিযকথাং স্রস্তকুক্ষ্যক্ষিমূর্ধজাম্ ||৭|| স্ফুরদ্ভুজকুচশ্রোণিনাভ্যূরুজঘনস্ফিচাম্ | হর্ষৌত্সুক্যপরাং চাপি বিদ্যাদৃতুমতীমিতি ||৮||

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भवन्ति चात्र- पीनप्रसन्नवदनां प्रक्लिन्नात्ममुखद्विजाम् | नरकामां प्रियकथां स्रस्तकुक्ष्यक्षिमूर्धजाम् ||७|| स्फुरद्भुजकुचश्रोणिनाभ्यूरुजघनस्फिचाम् | हर्षौत्सुक्यपरां चापि विद्यादृतुमतीमिति ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

নিযতং দিবসেঽতীতে সঙ্কুচত্যম্বুজং যথা | ঋতৌ ব্যতীতে নার্যাস্তু যোনিঃ সংব্রিযতে তথা ||৯||

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नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं यथा | ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

মাসেনোপচিতং কালে ধমনীভ্যাং তদার্তবম্ | ঈষত্কৃষ্ণং বিবর্ণং চ বাযুর্যোনিমুখং নযেত্ ||১০||

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मासेनोपचितं काले धमनीभ्यां तदार्तवम् | ईषत्कृष्णं विवर्णं च वायुर्योनिमुखं नयेत् ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

তদ্বর্ষাদ্দ্বাদশাত্ কালে বর্তমানমসৃক্ পুনঃ | জরাপক্বশরীরাণাং যাতি পঞ্চাশতঃ ক্ষযম্ ||১১||

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तद्वर्षाद्द्वादशात् काले वर्तमानमसृक् पुनः | जरापक्वशरीराणां याति पञ्चाशतः क्षयम् ||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12

যুগ্মেষু তু পুমান্ প্রোক্তো দিবসেষ্বন্যথাঽবলা | পুষ্পকালে শুচিস্তস্মাদপত্যার্থো স্ত্রিযং ব্রজেত্ ||১২||

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युग्मेषु तु पुमान् प्रोक्तो दिवसेष्वन्यथाऽबला | पुष्पकाले शुचिस्तस्मादपत्यार्थो स्त्रियं व्रजेत् ||१२||

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

তত্র সদ্যোগৃহীতগর্ভাযা লিঙ্গানি- শ্রমো গ্লানিঃ পিপাসা সক্থিসদনং শুক্রশোণিতযোরববন্ধঃ স্ফুরণং চ যোনেঃ ||১৩||

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तत्र सद्योगृहीतगर्भाया लिङ्गानि- श्रमो ग्लानिः पिपासा सक्थिसदनं शुक्रशोणितयोरवबन्धः स्फुरणं च योनेः ||१३||

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Adhikarana 12 (14-15) · Śloka 15

স্তনযোঃ কৃষ্ণমুখতা রোমরাজ্যুদ্গমস্তথা | অক্ষিপক্ষ্মাণি চাপ্যস্যাঃ সম্মীল্যন্তে বিশেষতঃ ||১৪|| অকামতশ্ছর্দযতি গন্ধাদুদ্বিজতে শুভাত্ | প্রসেকঃ সদনং চাপি গর্ভিণ্যা লিঙ্গমুচ্যতে ||১৫||

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स्तनयोः कृष्णमुखता रोमराज्युद्गमस्तथा | अक्षिपक्ष्माणि चाप्यस्याः सम्मील्यन्ते विशेषतः ||१४|| अकामतश्छर्दयति गन्धादुद्विजते शुभात् | प्रसेकः सदनं चापि गर्भिण्या लिङ्गमुच्यते ||१५||

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Adhikarana 13 (16-17) · Śloka 17

তদা প্রভৃতি ব্যবাযং ব্যাযামমতিতর্পণমতিকর্শনং দিবাস্বপ্নং রাত্রিজাগরণং শোকং যানারোহণং ভযমুত্কুটুকাসনং চৈকান্ততঃ স্নেহাদিক্রিযাং শোণিতমোক্ষণং চাকালে বেগবিধারণং চ ন সেবেত ||১৬|| দোষাভিঘাতৈর্গর্ভিণ্যা যো যো ভাগঃ প্রপীড্যতে | স স ভাগঃ শিশোস্তস্য গর্ভস্থস্য প্রপীড্যতে ||১৭||

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तदा प्रभृति व्यवायं व्यायाममतितर्पणमतिकर्शनं दिवास्वप्नं रात्रिजागरणं शोकं यानारोहणं भयमुत्कुटुकासनं चैकान्ततः स्नेहादिक्रियां शोणितमोक्षणं चाकाले वेगविधारणं च न सेवेत ||१६|| दोषाभिघातैर्गर्भिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते | स स भागः शिशोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ||१७||

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Adhikarana 14 (18) · Śloka 18

তত্র প্রথমে মাসি কললং জাযতে; দ্বিতীযে শীতোষ্মানিলৈরভিপ্রপচ্যমানানাং মহাভূতানাং সঙ্ঘাতো ঘনঃ সঞ্জাযতে, যদি পিণ্ডঃ পুমান্, স্ত্রী চেত্ পেশী, নপুংসকং চেদর্বুদমিতি; তৃতীযে হস্তপাদশিরসাং পঞ্চপিণ্ডকা নির্বর্তন্তেঽঙ্গপ্রত্যঙ্গবিভাগশ্চ সূক্ষ্মো ভবতি; চতুর্থে সর্বাঙ্গপ্রত্যঙ্গবিভাগঃ প্রব্যক্তো ভবতি, গর্ভহৃদযপ্রব্যক্তিভাবাচ্চেতনাধাতুরভিব্যক্তো ভবতি, কস্মাত্? তত্স্থানত্বাত্ | তস্মাদ্গর্ভশ্চতুর্থে মাস্যভিপ্রাযমিন্দ্রিযার্থেষু করোতি, দ্বিহৃদযাং চ নারীং দৌহৃদিনীমাচক্ষতে | দৌহৃদবিমাননাত্ কুব্জং কুণিং খঞ্জং জডং বামনং বিকৃতাক্ষমনক্ষং বা নারী সুতং জনযতি, তস্মাত্ সা যদ্যদিচ্ছেত্তত্তস্যৈ দাপযেত্, লব্ধদৌহৃদা হি বীর্যবন্তং চিরাযুষং চ পুত্রং জনযতি ||১৮||

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तत्र प्रथमे मासि कललं जायते; द्वितीये शीतोष्मानिलैरभिप्रपच्यमानानां महाभूतानां सङ्घातो घनः सञ्जायते, यदि पिण्डः पुमान्, स्त्री चेत् पेशी, नपुंसकं चेदर्बुदमिति; तृतीये हस्तपादशिरसां पञ्चपिण्डका निर्वर्तन्तेऽङ्गप्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति; चतुर्थे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्तो भवति, गर्भहृदयप्रव्यक्तिभावाच्चेतनाधातुरभिव्यक्तो भवति, कस्मात्? तत्स्थानत्वात् | तस्माद्गर्भश्चतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति, द्विहृदयां च नारीं दौहृदिनीमाचक्षते | दौहृदविमाननात् कुब्जं कुणिं खञ्जं जडं वामनं विकृताक्षमनक्षं वा नारी सुतं जनयति, तस्मात् सा यद्यदिच्छेत्तत्तस्यै दापयेत्, लब्धदौहृदा हि वीर्यवन्तं चिरायुषं च पुत्रं जनयति ||१८||

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Adhikarana 15 (19-21) · Śloka 21

ভবন্তি চাত্র- ইন্দ্রিযার্থাংস্তু যান্ যান্ সা ভোক্তুমিচ্ছতি গর্ভিণী গর্ভাবাধভযাত্তাংস্তান্ ভিষগাহৃত্য দাপযেত্ ||১৯|| সা প্রাপ্তদৌহৃদা পুত্রং জনযেত গুণান্বিতম্ | অলব্ধদৌহৃদা গর্ভে লভেতাত্মনি বা ভযম্ ||২০|| যেষু যেষ্বিন্দ্রিযার্থেষু দৌহৃদে বৈ বিমাননা | প্রজাযেত সুতস্যার্তিস্তস্মিংস্তস্মিংস্তথেন্দ্রিযে ||২১||

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भवन्ति चात्र- इन्द्रियार्थांस्तु यान् यान् सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी गर्भाबाधभयात्तांस्तान् भिषगाहृत्य दापयेत् ||१९|| सा प्राप्तदौहृदा पुत्रं जनयेत गुणान्वितम् | अलब्धदौहृदा गर्भे लभेतात्मनि वा भयम् ||२०|| येषु येष्विन्द्रियार्थेषु दौहृदे वै विमानना | प्रजायेत सुतस्यार्तिस्तस्मिंस्तस्मिंस्तथेन्द्रिये ||२१||

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Adhikarana 16 (22-28) · Śloka 28

রাজসন্দর্শনে যস্যা দৌর্হৃদং জাযতে স্ত্রিযাঃ | অর্থবন্তং মহাভাগং কুমারং সা প্রসূযতে ||২২|| দুকূলপট্টকৌশেযভূষণাদিষু দৌহৃদাত্ | অলঙ্কারৈষিণং পুত্রং ললিতং সা প্রসূযতে ||২৩|| আশ্রমে সংযতাত্মানং ধর্মশীলং প্রসূযতে | দেবতাপ্রতিমাযাং তু প্রসূতে পার্ষদোপমম্ | দর্শনে ব্যালজাতীনাং হিংসাশীলং প্রসূযতে ||২৪|| গোধামাংসাশনে পুত্রং সুষুপ্সুং ধারণাত্মকম্ | গবাং মাংসে তু বলিনং সর্বক্লেশসহং তথা ||২৫|| মাহিষে দৌর্হৃদাচ্ছূরং রক্তাক্ষং লোমসংযুতম্ | বরাহমাংসাত্ স্বপ্নালুং শূরং সঞ্জনযেত্ সুতম্ ||২৬|| মার্গাদ্বিক্রান্তজঙ্ঘালং সদা বনচরং সুতম্ | সৃমরাদ্বিগ্নমনসং নিত্যভীতং চ তৈত্তিরাত্ ||২৭|| অতোঽনুক্তেষু যা নারী সমভিধ্যাতি দৌর্হৃদম্ | শরীরাচারশীলৈঃ সা সমানং জনযিষ্যতি ||২৮||

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राजसन्दर्शने यस्या दौर्हृदं जायते स्त्रियाः | अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ||२२|| दुकूलपट्टकौशेयभूषणादिषु दौहृदात् | अलङ्कारैषिणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ||२३|| आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते | देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पार्षदोपमम् | दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते ||२४|| गोधामांसाशने पुत्रं सुषुप्सुं धारणात्मकम् | गवां मांसे तु बलिनं सर्वक्लेशसहं तथा ||२५|| माहिषे दौर्हृदाच्छूरं रक्ताक्षं लोमसंयुतम् | वराहमांसात् स्वप्नालुं शूरं सञ्जनयेत् सुतम् ||२६|| मार्गाद्विक्रान्तजङ्घालं सदा वनचरं सुतम् | सृमराद्विग्नमनसं नित्यभीतं च तैत्तिरात् ||२७|| अतोऽनुक्तेषु या नारी समभिध्याति दौर्हृदम् | शरीराचारशीलैः सा समानं जनयिष्यति ||२८||

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Adhikarana 17 (29) · Śloka 29

কর্মণা চোদিতং জন্তোর্ভবিতব্যং পুনর্ভবেত্ | যথা তথা দৈবযোগাদ্দৌর্হৃদং জনযেদ্ধৃদি ||২৯||

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कर्मणा चोदितं जन्तोर्भवितव्यं पुनर्भवेत् | यथा तथा दैवयोगाद्दौर्हृदं जनयेद्धृदि ||२९||

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Adhikarana 18 (30) · Śloka 30

পঞ্চমে মনঃ প্রতিবুদ্ধতরং ভবতি, ষষ্ঠে বুদ্ধিঃ, সপ্তমে সর্বাঙ্গপ্রত্যঙ্গবিভাগঃ প্রব্যক্ততরঃ; অষ্টমেঽস্থিরীভবত্যোজঃ , তত্র জাতশ্চেন্ন জীবেন্নিরোজস্ত্বান্নৈরৃতভাগত্বাচ্চ , ততো বলিং মাংসৌদনমস্মৈ দাপযেত্; নবমদশমৈকাদশদ্বাদশানামন্যতমস্মিঞ্জাযতে, অতোঽন্যথা বিকারী ভবতি ||৩০||

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पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतरं भवति, षष्ठे बुद्धिः, सप्तमे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरः; अष्टमेऽस्थिरीभवत्योजः , तत्र जातश्चेन्न जीवेन्निरोजस्त्वान्नैरृतभागत्वाच्च , ततो बलिं मांसौदनमस्मै दापयेत्; नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिञ्जायते, अतोऽन्यथा विकारी भवति ||३०||

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Adhikarana 19 (31-32) · Śloka 32

মাতুস্তু খলু রসবহাযাং নাড্যাং গর্ভনাভিনাডীপ্রতিবদ্ধা, সাঽস্য মাতুরাহাররসবীর্যমভিবহতি | তেনোপস্নেহেনাস্যাভিবৃদ্ধির্ভবতি | অসঞ্জাতাঙ্গপ্রত্যঙ্গপ্রবিভাগমানিষেকাত্ প্রভৃতি সর্বশরীরাবযবানুসারিণীনাং রসবহানাং তির্যগ্গতানাং ধমনীনামুপস্নেহো জীবযতি ||৩১|| গর্ভস্য খলু সম্ভবতঃ পূর্বং শিরঃ সম্ভবতীত্যাহ শৌনকঃ, শিরোমূলত্বাত্ প্রধানেন্দ্রিযাণাং ; হৃদযমিতি কৃতবীর্যো, বুদ্ধের্মনসশ্চ স্থানত্বাত্; নাভিরিতি পারাশর্যঃ, ততো হি বর্ধতে দেহো দেহিনঃ; পাণিপাদমিতি মার্কণ্ডেযঃ, তন্মূলত্বাচ্চেষ্টাযা গর্ভস্য; মধ্যশরীরমিতি সুভূতির্গৌতমঃ, তন্নিবদ্ধত্বাত্ সর্বগাত্রসম্ভবস্য | তত্তু ন সম্যক্, সর্বাণ্যঙ্গপ্রত্যঙ্গানি যুগপত্ সম্ভবন্তীত্যাহ ধন্বন্তরিঃ, গর্ভস্য সূক্ষ্মত্বান্নোপলভ্যন্তে বংশাঙ্কুরবচ্চূতফলবচ্চ; তদ্যথা- চূতফলে পরিপক্বে কেশরমাংসাস্থিমজ্জানঃ পৃথক্ পৃথগ্দৃশ্যন্তে কালপ্রকর্ষাত্, তান্যেব তরুণে নোপলভ্যন্তে সূক্ষ্মত্বাত্; তেষাং সূক্ষ্মাণাং কেশরাদীনাং কালঃ প্রব্যক্ততাং করোতি; এতেনৈব বংশাঙ্কুরোঽপি ব্যাখ্যাতঃ | এবং গর্ভস্য তারুণ্যে সর্বেষ্বঙ্গপ্রত্যঙ্গেষু সত্স্বপি সৌক্ষ্ম্যাদনুপলব্ধিঃ, তান্যেব কালপ্রকর্ষাত্ প্রব্যক্তানি ভবন্তি ||৩২||

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मातुस्तु खलु रसवहायां नाड्यां गर्भनाभिनाडीप्रतिबद्धा, साऽस्य मातुराहाररसवीर्यमभिवहति | तेनोपस्नेहेनास्याभिवृद्धिर्भवति | असञ्जाताङ्गप्रत्यङ्गप्रविभागमानिषेकात् प्रभृति सर्वशरीरावयवानुसारिणीनां रसवहानां तिर्यग्गतानां धमनीनामुपस्नेहो जीवयति ||३१|| गर्भस्य खलु सम्भवतः पूर्वं शिरः सम्भवतीत्याह शौनकः, शिरोमूलत्वात् प्रधानेन्द्रियाणां ; हृदयमिति कृतवीर्यो, बुद्धेर्मनसश्च स्थानत्वात्; नाभिरिति पाराशर्यः, ततो हि वर्धते देहो देहिनः; पाणिपादमिति मार्कण्डेयः, तन्मूलत्वाच्चेष्टाया गर्भस्य; मध्यशरीरमिति सुभूतिर्गौतमः, तन्निबद्धत्वात् सर्वगात्रसम्भवस्य | तत्तु न सम्यक्, सर्वाण्यङ्गप्रत्यङ्गानि युगपत् सम्भवन्तीत्याह धन्वन्तरिः, गर्भस्य सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते वंशाङ्कुरवच्चूतफलवच्च; तद्यथा- चूतफले परिपक्वे केशरमांसास्थिमज्जानः पृथक् पृथग्दृश्यन्ते कालप्रकर्षात्, तान्येव तरुणे नोपलभ्यन्ते सूक्ष्मत्वात्; तेषां सूक्ष्माणां केशरादीनां कालः प्रव्यक्ततां करोति; एतेनैव वंशाङ्कुरोऽपि व्याख्यातः | एवं गर्भस्य तारुण्ये सर्वेष्वङ्गप्रत्यङ्गेषु सत्स्वपि सौक्ष्म्यादनुपलब्धिः, तान्येव कालप्रकर्षात् प्रव्यक्तानि भवन्ति ||३२||

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Adhikarana 20 (33) · Śloka 33

তত্র গর্ভস্য পিতৃজমাতৃজরসজাত্মজসত্ত্বজসাত্ম্যজানি শরীরলক্ষণানি ব্যাখ্যাস্যামঃ | গর্ভস্য কেশশ্মশ্রুলোমাস্থিনখদন্তসিরাস্নাযুধমনীরেতঃপ্রভৃতীনি স্থিরাণি পিতৃজানি, মাংসশোণিতমেদোমজ্জহৃন্নাভিযকৃত্প্লীহান্ত্রগুদপ্রভৃতীনি মৃদূনি মাতৃজানি, শরীরোপচযো বলং বর্ণঃ স্থিতির্হানিশ্চ রসজানি, ইন্দ্রিযাণি জ্ঞানং বিজ্ঞানমাযুঃ সুখদুঃখাদিকং চাত্মজানি, সত্ত্বজান্যুত্তরত্র বক্ষ্যামঃ, বীর্যমারোগ্যং বলবর্ণৌ মেধা চ সাত্ম্যজানি ||৩৩||

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तत्र गर्भस्य पितृजमातृजरसजात्मजसत्त्वजसात्म्यजानि शरीरलक्षणानि व्याख्यास्यामः | गर्भस्य केशश्मश्रुलोमास्थिनखदन्तसिरास्नायुधमनीरेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि, मांसशोणितमेदोमज्जहृन्नाभियकृत्प्लीहान्त्रगुदप्रभृतीनि मृदूनि मातृजानि, शरीरोपचयो बलं वर्णः स्थितिर्हानिश्च रसजानि, इन्द्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः सुखदुःखादिकं चात्मजानि, सत्त्वजान्युत्तरत्र वक्ष्यामः, वीर्यमारोग्यं बलवर्णौ मेधा च सात्म्यजानि ||३३||

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Adhikarana 21 (34) · Śloka 34

তত্র যস্যা দক্ষিণে স্তনে প্রাক্ পযোদর্শনং ভবতি দক্ষিণকুক্ষিমহত্ত্বং চ পূর্বং চ দক্ষিণং সক্থ্যুত্কর্ষতি বাহুল্যাচ্চ পুন্নামধেযেষু দ্রব্যেষু দৌর্হৃদমভিধ্যাযতি স্বপ্নেষু চোপলভতে পদ্মোত্পলকুমুদাম্রাতকাদীনি পুন্নামান্যেব প্রসন্নমুখবর্ণা চ ভবতি তাং ব্রূযাত্ পুত্রমিযং জনযিষ্যতীতি, তদ্বিপর্যযে কন্যাং, যস্যাঃ পার্শ্বদ্বযমবনতং পুরস্তান্নির্গতমুদরং প্রাগভিহিতং চ লক্ষণং চ তস্যা নপুংসকমিতি বিদ্যাত্, যস্যা মধ্যে নিম্নং দ্রোণীভূতমুদরং সা যুগ্মং প্রসূযত ইতি ||৩৪||

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तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति दक्षिणकुक्षिमहत्त्वं च पूर्वं च दक्षिणं सक्थ्युत्कर्षति बाहुल्याच्च पुन्नामधेयेषु द्रव्येषु दौर्हृदमभिध्यायति स्वप्नेषु चोपलभते पद्मोत्पलकुमुदाम्रातकादीनि पुन्नामान्येव प्रसन्नमुखवर्णा च भवति तां ब्रूयात् पुत्रमियं जनयिष्यतीति, तद्विपर्यये कन्यां, यस्याः पार्श्वद्वयमवनतं पुरस्तान्निर्गतमुदरं प्रागभिहितं च लक्षणं च तस्या नपुंसकमिति विद्यात्, यस्या मध्ये निम्नं द्रोणीभूतमुदरं सा युग्मं प्रसूयत इति ||३४||

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Adhikarana 22 (35) · Śloka 35

ভবন্তি চাত্র- দেবতাব্রাহ্মণপরাঃ শৌচাচারহিতে রতাঃ | মহাগুণান্ প্রসূযন্তে বিপরীতাস্তু নির্গুণান্ ||৩৫||

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भवन्ति चात्र- देवताब्राह्मणपराः शौचाचारहिते रताः | महागुणान् प्रसूयन्ते विपरीतास्तु निर्गुणान् ||३५||

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Adhikarana 23 (36) · Śloka 36

অঙ্গপ্রত্যঙ্গনির্বৃত্তিঃ স্বভাবাদেব জাযতে | অঙ্গপ্রত্যঙ্গনির্বৃত্তৌ যে ভবন্তি গুণাগুণাঃ | তে তে গর্ভস্য বিজ্ঞেযা ধর্মাধর্মনিমিত্তজাঃ ||৩৬||

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अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तिः स्वभावादेव जायते | अङ्गप्रत्यङ्गनिर्वृत्तौ ये भवन्ति गुणागुणाः | ते ते गर्भस्य विज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः ||३६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 3

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে গর্ভাবক্রান্তিশারীরং নাম তৃতীযোঽধ্যাযঃ ||৩||

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इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भावक्रान्तिशारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः ||३||

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3. garbhāvakrāntiśārīram — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi