Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ শরীরসঙ্খ্যাব্যাকরণং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः शरीरसङ्ख्याव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ শরীরসঙ্খ্যাব্যাকরণং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः शरीरसङ्ख्याव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
শুক্রশোণিতং গর্ভাশযস্থমাত্মপ্রকৃতিবিকারসম্মূর্চ্ছিতং ‘গর্ভ’ ইত্যুচ্যতে | তং চেতনাবস্থিতং বাযুর্বিভজতি, তেজ এনং পচতি, আপঃ ক্লেদযন্তি, পৃথিবী সংহন্তি, আকাশং বিবর্ধযতি; এবং বিবর্ধিতঃ স যদা হস্তপাদজিহ্বাঘ্রাণকর্ণনিতম্বাদিভিরঙ্গৈরুপেতস্তদা ‘শরীরং’ ইতি সঞ্জ্ঞাং লভতে | তচ্চ ষডঙ্গং- শাখাশ্চতস্রো, মধ্যং পঞ্চমং, ষষ্ঠং শির ইতি ||৩||
शुक्रशोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसम्मूर्च्छितं ‘गर्भ’ इत्युच्यते | तं चेतनावस्थितं वायुर्विभजति, तेज एनं पचति, आपः क्लेदयन्ति, पृथिवी संहन्ति, आकाशं विवर्धयति; एवं विवर्धितः स यदा हस्तपादजिह्वाघ्राणकर्णनितम्बादिभिरङ्गैरुपेतस्तदा ‘शरीरं’ इति सञ्ज्ञां लभते | तच्च षडङ्गं- शाखाश्चतस्रो, मध्यं पञ्चमं, षष्ठं शिर इति ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
অতঃ পরং প্রত্যঙ্গানি বক্ষ্যন্তে- মস্তকোদরপৃষ্ঠনাভিললাটনাসাচিবুকবস্তিগ্রীবা ইত্যেতা একৈকাঃ, কর্ণনেত্রভ্রূশঙ্খাংসগণ্ডকক্ষস্তনবঙ্ক্ষণবৃষণপার্শ্বস্ফিগ্জানুকূর্পরবাহূরুপ্রভৃতযো দ্বে দ্বে, বিংশতিরঙ্গুলযঃ, স্রোতাংসি বক্ষ্যমাণানি , এষ প্রত্যঙ্গবিভাগ উক্তঃ ||৪||
अतः परं प्रत्यङ्गानि वक्ष्यन्ते- मस्तकोदरपृष्ठनाभिललाटनासाचिबुकबस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः, कर्णनेत्रभ्रूशङ्खांसगण्डकक्षस्तनवङ्क्षणवृषणपार्श्वस्फिग्जानुकूर्परबाहूरुप्रभृतयो द्वे द्वे, विंशतिरङ्गुलयः, स्रोतांसि वक्ष्यमाणानि , एष प्रत्यङ्गविभाग उक्तः ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তস্য পুনঃ সঙ্খ্যানং - ত্বচঃ কলা ধাতবো মলা দোষা যকৃত্প্লীহানৌ ফুপ্ফুস উণ্ডুকো হৃদযমাশযা অন্ত্রাণি বৃক্কৌ স্রোতাংসি কণ্ডরা জালানি কূর্চা রজ্জবঃ সেবন্যঃ সঙ্ঘাতাঃ সীমন্তা অস্থীনি সন্ধযঃ স্নাযবঃ পেশ্যো মর্মাণি সিরা ধমন্যো যোগবহানি স্রোতাংসি চ ||৫||
तस्य पुनः सङ्ख्यानं - त्वचः कला धातवो मला दोषा यकृत्प्लीहानौ फुप्फुस उण्डुको हृदयमाशया अन्त्राणि वृक्कौ स्रोतांसि कण्डरा जालानि कूर्चा रज्जवः सेवन्यः सङ्घाताः सीमन्ता अस्थीनि सन्धयः स्नायवः पेश्यो मर्माणि सिरा धमन्यो योगवहानि स्रोतांसि च ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
ত্বচঃ সপ্ত, কলাঃ সপ্ত, আশযাঃ সপ্ত, ধাতবঃ সপ্ত, সপ্ত সিরাশতানি, পঞ্চ পেশীশতানি, নব স্নাযুশতানি, ত্রীণ্যস্থিশতানি, দ্বে দশোত্তরে সন্ধিশতে, সপ্তোত্তরং মর্মশতং, চতুর্বিংশতির্ধমন্যঃ, ত্রযো দোষাঃ, ত্রযো মলাঃ, নব স্রোতাংসি, (ষোডশ কণ্ডরাঃ, ষোডশ জালানি, ষট্ কূর্চাঃ, চতস্রো রজ্জবঃ, সপ্ত সেবন্যঃ, চতুর্দশ সঙ্ঘাতাঃ, চতুর্দশ সীমন্তাঃ, দ্বাবিংশতির্যোগবহানি স্রোতাংসি, দ্বিকান্যন্ত্রাণি ) চেতি সমাসঃ ||৬||
त्वचः सप्त, कलाः सप्त, आशयाः सप्त, धातवः सप्त, सप्त सिराशतानि, पञ्च पेशीशतानि, नव स्नायुशतानि, त्रीण्यस्थिशतानि, द्वे दशोत्तरे सन्धिशते, सप्तोत्तरं मर्मशतं, चतुर्विंशतिर्धमन्यः, त्रयो दोषाः, त्रयो मलाः, नव स्रोतांसि, (षोडश कण्डराः, षोडश जालानि, षट् कूर्चाः, चतस्रो रज्जवः, सप्त सेवन्यः, चतुर्दश सङ्घाताः, चतुर्दश सीमन्ताः, द्वाविंशतिर्योगवहानि स्रोतांसि, द्विकान्यन्त्राणि ) चेति समासः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
বিস্তারোঽত ঊর্ধ্বং- ত্বচোঽভিহিতাঃ কলা ধাতবো মলা দোষা যকৃত্প্লীহানৌ ফুপ্ফুস উণ্ডুকো হৃদযং বৃক্কৌ চ ||৭||
विस्तारोऽत ऊर्ध्वं- त्वचोऽभिहिताः कला धातवो मला दोषा यकृत्प्लीहानौ फुप्फुस उण्डुको हृदयं वृक्कौ च ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
আশযাস্তু- বাতাশযঃ, পিত্তাশযঃ, শ্লেষ্মাশযো, রক্তাশয, আমাশযঃ, পক্বাশযো, মূত্রাশযঃ , স্ত্রীণাং গর্ভাশযোঽষ্টম ইতি ||৮||
आशयास्तु- वाताशयः, पित्ताशयः, श्लेष्माशयो, रक्ताशय, आमाशयः, पक्वाशयो, मूत्राशयः , स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टम इति ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
সার্ধত্রিব্যামান্যন্ত্রাণি পুংসাং, স্ত্রীণামর্ধব্যামহীনানি ||৯||
सार्धत्रिव्यामान्यन्त्राणि पुंसां, स्त्रीणामर्धव्यामहीनानि ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
শ্রবণনযনবদনঘ্রাণগুদমেঢ্রাণি নব স্রোতাংসি নরাণাং বহির্মুখানি, এতান্যেব স্ত্রীণামপরাণি চ ত্রীণি দ্বে স্তনযোরধস্তাদ্রক্তবহং চ ||১০||
श्रवणनयनवदनघ्राणगुदमेढ्राणि नव स्रोतांसि नराणां बहिर्मुखानि, एतान्येव स्त्रीणामपराणि च त्रीणि द्वे स्तनयोरधस्ताद्रक्तवहं च ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
ষোডশ কণ্ডরাঃ- তাসাং চতস্রঃ পাদযোঃ, তাবত্যো হস্তগ্রীবাপৃষ্ঠেষু; তত্র হস্তপাদগতানাং কণ্ডরাণাং নখা অগ্রপ্ররোহাঃ, গ্রীবাহৃদযনিবন্ধিনীনামধোভাগগতানাং মেঢ্রং, শ্রোণিপৃষ্টনিবন্ধিনীনামধোভাগগতানাং বিম্বং , মূর্ধোরুবক্ষোংঽসপিণ্ডাদীনাং চ ||১১||
षोडश कण्डराः- तासां चतस्रः पादयोः, तावत्यो हस्तग्रीवापृष्ठेषु; तत्र हस्तपादगतानां कण्डराणां नखा अग्रप्ररोहाः, ग्रीवाहृदयनिबन्धिनीनामधोभागगतानां मेढ्रं, श्रोणिपृष्टनिबन्धिनीनामधोभागगतानां बिम्बं , मूर्धोरुवक्षोंऽसपिण्डादीनां च ||११||
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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12
মাংসসিরাস্নায্বস্থিজালানি প্রত্যেকং চত্বারি; তানি মণিবন্ধগুল্ফসংশ্রিতানি পরস্পরনিবদ্ধানি পরস্পরগবাক্ষিতানি চেতি, যৈর্গবাক্ষিতমিদং শরীরম্ ||১২||
मांससिरास्नाय्वस्थिजालानि प्रत्येकं चत्वारि; तानि मणिबन्धगुल्फसंश्रितानि परस्परनिबद्धानि परस्परगवाक्षितानि चेति, यैर्गवाक्षितमिदं शरीरम् ||१२||
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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13
ষট্ কূর্চাঃ, তে হস্তপাদগ্রীবামেঢ্রেষু; হস্তযোর্দ্বৌ, পাদযোর্দ্বৌ, গ্রীবামেঢ্রযোরেকৈকঃ ||১৩||
षट् कूर्चाः, ते हस्तपादग्रीवामेढ्रेषु; हस्तयोर्द्वौ, पादयोर्द्वौ, ग्रीवामेढ्रयोरेकैकः ||१३||
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Adhikarana 13 (14-15) · Śloka 15
মহত্যো মাংসরজ্জবশ্চতস্রঃ- পৃষ্ঠবংশমুভযতঃ পেশীনিবন্ধনার্থং দ্বে বাহ্যে, আভ্যন্তরে চ দ্বে ||১৪|| সপ্ত সেবন্যঃ ; সিরসি বিভক্তাঃ পঞ্চ, জিহ্বাশেফসোরেকৈকা; তাঃ পরিহর্তব্যাঃ শস্ত্রেণ ||১৫||
महत्यो मांसरज्जवश्चतस्रः- पृष्ठवंशमुभयतः पेशीनिबन्धनार्थं द्वे बाह्ये, आभ्यन्तरे च द्वे ||१४|| सप्त सेवन्यः ; सिरसि विभक्ताः पञ्च, जिह्वाशेफसोरेकैका; ताः परिहर्तव्याः शस्त्रेण ||१५||
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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16
চতুর্দশাস্থ্নাং সঙ্ঘাতাঃ; তেষাং ত্রযো গুল্ফজানুবঙ্ক্ষণেষু, এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ, ত্রিকশিরসোরেকৈকঃ ||১৬||
चतुर्दशास्थ्नां सङ्घाताः; तेषां त्रयो गुल्फजानुवङ्क्षणेषु, एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ, त्रिकशिरसोरेकैकः ||१६||
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Adhikarana 15 (17) · Śloka 17
চতুর্দশৈব সীমন্তাঃ; তে চাস্থিসঙ্ঘাতবদ্গণনীযাঃ, যতস্তৈর্যুক্তা অস্থিসঙ্ঘাতাঃ; যে হ্যুক্তাঃ সঙ্ঘাতাস্তে খল্বষ্টাদশৈকেষাম্ ||১৭||
चतुर्दशैव सीमन्ताः; ते चास्थिसङ्घातवद्गणनीयाः, यतस्तैर्युक्ता अस्थिसङ्घाताः; ये ह्युक्ताः सङ्घातास्ते खल्वष्टादशैकेषाम् ||१७||
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Adhikarana 16 (18) · Śloka 18
ত্রীণি সষষ্টান্যস্থিশতানি বেদবাদিনো ভাষন্তে; শল্যতন্ত্রেষু তু ত্রীণ্যেব শতানি | তেষাং সবিংশমস্থিশতং শাখাসু, সপ্তদশোত্তরং শতং শ্রোণিপার্শ্বপৃষ্ঠোরঃসু, গ্রীবাং প্রত্যূর্ধ্বং ত্রিষষ্টিঃ, এবমস্থ্নাং ত্রীণি শতানি পূর্যন্তে ||১৮||
त्रीणि सषष्टान्यस्थिशतानि वेदवादिनो भाषन्ते; शल्यतन्त्रेषु तु त्रीण्येव शतानि | तेषां सविंशमस्थिशतं शाखासु, सप्तदशोत्तरं शतं श्रोणिपार्श्वपृष्ठोरःसु, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं त्रिषष्टिः, एवमस्थ्नां त्रीणि शतानि पूर्यन्ते ||१८||
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Adhikarana 17 (19) · Śloka 19
একৈকস্যাং তু পাদাঙ্গুল্যাং ত্রীণি ত্রীণি তানি পঞ্চদশ, তলকূর্চগুল্ফসংশ্রিতানি দশ, পার্ষ্ণ্যামেকং, জঙ্ঘাযাং দ্বে, জানুন্যেকম্, একমূরাবিতি, ত্রিংশদেবমেকস্মিন্ সক্থ্নি ভবন্তি, এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ; শ্রোণ্যাং পঞ্চ, তেষাং গুদভগনিতম্বেষু চত্বারি, ত্রিকসংশ্রিতমেকং, পার্শ্বে ষট্ত্রিংশদেকস্মিন্ , দ্বিতীযেঽপ্যেবং, পৃষ্ঠে ত্রিংশত্, অষ্টাবুরসি , দ্বে অংসফলকে ; গ্রীবাযাং নব, কণ্ঠনাড্যাং চত্বারি, দ্বে হন্বোঃ , দন্তা দ্বাত্রিংশত্, নাসাযাং ত্রীণি, একং তালুনি, গণ্ডকর্ণশঙ্খেষ্বেকৈকং, ষট্ শিরসীতি ||১৯||
एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां त्रीणि त्रीणि तानि पञ्चदश, तलकूर्चगुल्फसंश्रितानि दश, पार्ष्ण्यामेकं, जङ्घायां द्वे, जानुन्येकम्, एकमूराविति, त्रिंशदेवमेकस्मिन् सक्थ्नि भवन्ति, एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ; श्रोण्यां पञ्च, तेषां गुदभगनितम्बेषु चत्वारि, त्रिकसंश्रितमेकं, पार्श्वे षट्त्रिंशदेकस्मिन् , द्वितीयेऽप्येवं, पृष्ठे त्रिंशत्, अष्टावुरसि , द्वे अंसफलके ; ग्रीवायां नव, कण्ठनाड्यां चत्वारि, द्वे हन्वोः , दन्ता द्वात्रिंशत्, नासायां त्रीणि, एकं तालुनि, गण्डकर्णशङ्खेष्वेकैकं, षट् शिरसीति ||१९||
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Adhikarana 18 (20) · Śloka 20
এতানি পঞ্চবিধানি ভবন্তি; তদ্যথা- কপালরুচকতরুণবলযনলকসঞ্জ্ঞানি | তেষাং জানুনিতম্বাংসগণ্ডতালুশঙ্খশিরঃসু কপালানি, দশনাস্তু রুচকানি , ঘ্রাণকর্ণগ্রীবাক্ষিকোষেষু তরুণানি, পার্শ্বপৃষ্ঠোরঃসু বলযানি , শেষাণি নলকসঞ্জ্ঞানি ||২০||
एतानि पञ्चविधानि भवन्ति; तद्यथा- कपालरुचकतरुणवलयनलकसञ्ज्ञानि | तेषां जानुनितम्बांसगण्डतालुशङ्खशिरःसु कपालानि, दशनास्तु रुचकानि , घ्राणकर्णग्रीवाक्षिकोषेषु तरुणानि, पार्श्वपृष्ठोरःसु वलयानि , शेषाणि नलकसञ्ज्ञानि ||२०||
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Adhikarana 19 (21-23) · Śloka 23
ভবন্তি চাত্র- অভ্যন্তরগতৈঃ সারৈর্যথা তিষ্ঠন্তি ভূরুহাঃ | অস্থিসারৈস্তথা দেহা ধ্রিযন্তে দেহিনাং ধ্রুবম্ ||২১|| তস্মাচ্চিরবিনষ্টেষু ত্বঙ্মাংসেষু শরীরিণাম্ | অস্থীনি ন বিনশ্যন্তি সারাণ্যেতানি দেহিনাম্ | মাংসান্যত্র নিবদ্ধানি সিরাভিঃ স্নাযুভিস্তথা | অস্থীন্যালম্বনং কৃত্বা ন শীর্যন্তে পতন্তি বা ||২৩||
भवन्ति चात्र- अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः | अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां ध्रुवम् ||२१|| तस्माच्चिरविनष्टेषु त्वङ्मांसेषु शरीरिणाम् | अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् | मांसान्यत्र निबद्धानि सिराभिः स्नायुभिस्तथा | अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ||२३||
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Adhikarana 20 (24-25) · Śloka 25
সন্ধযস্তু দ্বিবিধাশ্চেষ্টাবন্তঃ , স্থিরাশ্চ ||২৪|| শাখাসু হন্বোঃ কট্যাং চ চেষ্টাবন্তস্তু সন্ধযঃ | শেষাস্তু সন্ধযঃ সর্বে বিজ্ঞেযা হি স্থিরা বুধৈঃ ||২৫||
सन्धयस्तु द्विविधाश्चेष्टावन्तः , स्थिराश्च ||२४|| शाखासु हन्वोः कट्यां च चेष्टावन्तस्तु सन्धयः | शेषास्तु सन्धयः सर्वे विज्ञेया हि स्थिरा बुधैः ||२५||
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Adhikarana 21 (26) · Śloka 26
সঙ্খ্যাতস্তু দশোত্তরে দ্বে শতে | তেষাং শাখাস্বষ্টষষ্টিঃ, একোনষষ্টিঃ কোষ্ঠে, গ্রীবাং প্রত্যূর্ধ্বং ত্র্যশীতিঃ | একৈকস্যাং পাদাঙ্গুল্যাং ত্রযস্ত্রযঃ, দ্বাবঙ্গুষ্ঠে, তে চতুর্দশ; জানুগুল্ফবঙ্ক্ষণেষ্বেকৈকঃ, এবং সপ্তদশৈকস্মিন্ সক্থ্নি ভবন্তি; এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ; ত্রযঃ কটীকপালেষু, চতুর্বিংশতিঃ পৃষ্ঠবংশে, তাবন্ত এব পার্শ্বযোঃ, উরস্যষ্টৌ; তাবন্ত এব গ্রীবাযাং, ত্রযঃ কণ্ঠে, নাডীষু হৃদযক্লোমনিবদ্ধাস্বষ্টাদশ, দন্তপরিমাণা দন্তমূলেষু, একঃ কাকলকে নাসাযাং চ, দ্বৌ বর্ত্মমণ্ডলযোর্নেত্রাশ্রযৌ, গণ্ডকর্ণশঙ্খেষ্বেকৈকঃ, দ্বৌ হনুসন্ধী, দ্বাবুপরিষ্টাদ্ভ্রুবোঃ শঙ্খযোশ্চ, পঞ্চ শিরঃকপালেষু, একো মূর্ধ্নি ||২৬||
सङ्ख्यातस्तु दशोत्तरे द्वे शते | तेषां शाखास्वष्टषष्टिः, एकोनषष्टिः कोष्ठे, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं त्र्यशीतिः | एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रयस्त्रयः, द्वावङ्गुष्ठे, ते चतुर्दश; जानुगुल्फवङ्क्षणेष्वेकैकः, एवं सप्तदशैकस्मिन् सक्थ्नि भवन्ति; एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ; त्रयः कटीकपालेषु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवंशे, तावन्त एव पार्श्वयोः, उरस्यष्टौ; तावन्त एव ग्रीवायां, त्रयः कण्ठे, नाडीषु हृदयक्लोमनिबद्धास्वष्टादश, दन्तपरिमाणा दन्तमूलेषु, एकः काकलके नासायां च, द्वौ वर्त्ममण्डलयोर्नेत्राश्रयौ, गण्डकर्णशङ्खेष्वेकैकः, द्वौ हनुसन्धी, द्वावुपरिष्टाद्भ्रुवोः शङ्खयोश्च, पञ्च शिरःकपालेषु, एको मूर्ध्नि ||२६||
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Adhikarana 22 (27) · Śloka 27
ত এতে সন্ধযোঽষ্টবিধাঃ- কোরোলূখলসামুদ্গপ্রতরতুন্নসেবনীবাযসতুণ্ডমণ্ডলশঙ্খাবর্তাঃ | তেষামঙ্গুলিমণিবন্ধগুল্ফজানুকূর্পরেষু কোরাঃ সন্ধযঃ, কক্ষাবঙ্ক্ষণদশনেষূলূখলাঃ, অংসপীঠগুদভগনিতম্বেষু সামুদ্গাঃ, গ্রীবাপৃষ্ঠবংশযোঃ প্রতরাঃ, শিরঃকটীকপালেষু তুন্নসেবন্যঃ, হন্বোরুভযতস্তু বাযসতুণ্ডাঃ, কণ্ঠহৃদযনেত্রক্লোমনাডীষু মণ্ডলাঃ, শ্রোত্রশৃঙ্গাটকেষু শঙ্খাবর্তাঃ | তেষাং নামভিরেবাকৃতযঃ প্রাযেণ ব্যাখ্যাতাঃ ||২৭||
त एते सन्धयोऽष्टविधाः- कोरोलूखलसामुद्गप्रतरतुन्नसेवनीवायसतुण्डमण्डलशङ्खावर्ताः | तेषामङ्गुलिमणिबन्धगुल्फजानुकूर्परेषु कोराः सन्धयः, कक्षावङ्क्षणदशनेषूलूखलाः, अंसपीठगुदभगनितम्बेषु सामुद्गाः, ग्रीवापृष्ठवंशयोः प्रतराः, शिरःकटीकपालेषु तुन्नसेवन्यः, हन्वोरुभयतस्तु वायसतुण्डाः, कण्ठहृदयनेत्रक्लोमनाडीषु मण्डलाः, श्रोत्रशृङ्गाटकेषु शङ्खावर्ताः | तेषां नामभिरेवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ||२७||
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Adhikarana 23 (28) · Śloka 28
অস্থ্নাং তু সন্ধযো হ্যেতে কেবলাঃ পরিকীর্তিতাঃ | পেশীস্নাযুসিরাণাং তু সন্ধিসঙ্খ্যা ন বিদ্যতে ||২৮||
अस्थ्नां तु सन्धयो ह्येते केवलाः परिकीर्तिताः | पेशीस्नायुसिराणां तु सन्धिसङ्ख्या न विद्यते ||२८||
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Adhikarana 24 (29) · Śloka 29
নব স্নাযুশতানি | তাসাং শাখাসু ষট্শতানি, দ্বে শতে ত্রিংশচ্চ কোষ্ঠে, গ্রীবাং প্রত্যূর্ধ্বং সপ্ততিঃ | একৈকস্যাং তু পাদাঙ্গুল্যাং ষণ্নিচিতাস্তাস্ত্রিংশত্ , তাবত্য এব তলকূর্চগুল্ফেষু, তাবত্য এব জঙ্ঘাযাং, দশ জানুনি, চত্বারিংশদূরৌ, দশ বঙ্ক্ষণে, শতমধ্যর্ধমেবমেকস্মিন্ সক্থ্নি ভবন্তি; এতেনেতরসক্থি বহূ চ ব্যাখ্যাতৌ; ষষ্টিঃ কট্যাং, পৃষ্ঠেঽশীতিঃ, পার্শ্বযোঃ ষষ্টিঃ, উরসি ত্রিংশত্; ষট্ত্রিংশদ্গ্রীবাযাং, মূর্ধ্নি চতুস্ত্রিংশত্; এবং নব স্নাযুশতানি ব্যাখ্যাতানি ভবন্তি ||২৯||
नव स्नायुशतानि | तासां शाखासु षट्शतानि, द्वे शते त्रिंशच्च कोष्ठे, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं सप्ततिः | एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां षण्निचितास्तास्त्रिंशत् , तावत्य एव तलकूर्चगुल्फेषु, तावत्य एव जङ्घायां, दश जानुनि, चत्वारिंशदूरौ, दश वङ्क्षणे, शतमध्यर्धमेवमेकस्मिन् सक्थ्नि भवन्ति; एतेनेतरसक्थि बहू च व्याख्यातौ; षष्टिः कट्यां, पृष्ठेऽशीतिः, पार्श्वयोः षष्टिः, उरसि त्रिंशत्; षट्त्रिंशद्ग्रीवायां, मूर्ध्नि चतुस्त्रिंशत्; एवं नव स्नायुशतानि व्याख्यातानि भवन्ति ||२९||
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Adhikarana 25 (30-36) · Śloka 36
ভবন্তি চাত্র- স্নাযূশ্চতুর্বিধা বিদ্যাত্তাস্তু সর্বা নিবোধ মে | প্রতানবত্যো বৃত্তাশ্চ পৃথ্ব্যশ্চ শুষিরাস্তথা ||৩০|| প্রতানবত্যঃ শাখাসু সর্বসন্ধিষু চাপ্যথ | বৃত্তাস্তু কণ্ডরাঃ সর্বা বিজ্ঞেযাঃ কুশলৈরিহ ||৩১|| আমপক্বাশযান্তেষু বস্তৌ চ শুষিরাঃ খলু | পার্শ্বোরসি তথা পৃষ্ঠে পৃথুলাশ্চ শিরস্যথ ||৩২|| নৌর্যথা ফলকাস্তীর্ণা বন্ধনৈর্বহুভির্যুতা | ভারক্ষমা ভবেদপ্সু নৃযুক্তা সুসমাহিতা ||৩৩|| এবমেব শরীরেঽস্মিন্ যাবন্তঃ সন্ধযঃ স্মৃতাঃ | স্নাযুভির্বহুভির্বদ্ধাস্তেন ভারসহা নরাঃ ||৩৪|| ন হ্যস্থীনি ন বা পেশ্যো ন সিরা ন চ সন্ধযঃ | ব্যাপাদিতাস্তথা হন্যুর্যথা স্নাযুঃ শরীরিণম্ ||৩৫|| যঃ স্নাযূঃ প্রবিজানাতি বাহ্যাশ্চাভ্যন্তরাস্তথা | স গূঢং শল্যমাহর্তুং দেহাচ্ছক্নোতি দেহিনাম্ ||৩৬||
भवन्ति चात्र- स्नायूश्चतुर्विधा विद्यात्तास्तु सर्वा निबोध मे | प्रतानवत्यो वृत्ताश्च पृथ्व्यश्च शुषिरास्तथा ||३०|| प्रतानवत्यः शाखासु सर्वसन्धिषु चाप्यथ | वृत्तास्तु कण्डराः सर्वा विज्ञेयाः कुशलैरिह ||३१|| आमपक्वाशयान्तेषु बस्तौ च शुषिराः खलु | पार्श्वोरसि तथा पृष्ठे पृथुलाश्च शिरस्यथ ||३२|| नौर्यथा फलकास्तीर्णा बन्धनैर्बहुभिर्युता | भारक्षमा भवेदप्सु नृयुक्ता सुसमाहिता ||३३|| एवमेव शरीरेऽस्मिन् यावन्तः सन्धयः स्मृताः | स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ||३४|| न ह्यस्थीनि न वा पेश्यो न सिरा न च सन्धयः | व्यापादितास्तथा हन्युर्यथा स्नायुः शरीरिणम् ||३५|| यः स्नायूः प्रविजानाति बाह्याश्चाभ्यन्तरास्तथा | स गूढं शल्यमाहर्तुं देहाच्छक्नोति देहिनाम् ||३६||
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Adhikarana 26 (37-38) · Śloka 38
পঞ্চ পেশীশতানি ভবন্তি | তাসাং চত্বারি শতানি শাখাসু, কোষ্ঠে ষট্ষষ্টিঃ, গ্রীবাং প্রত্যূর্ধ্বং চতুস্ত্রিংশত্ | একৈকস্যাং তু পাদাঙ্গুল্যাং তিস্রস্তিস্রস্তাঃ পঞ্চদশ, দশ প্রপদে, পাদোপরি কূর্চসন্নিবিষ্টাস্তাবত্য এব, দশ গুল্ফতলযোঃ, গুল্ফজান্বন্তরে বিংশতিঃ, পঞ্চ জানুনি, বিংশতিরূরৌ , দশ বঙ্ক্ষণে, শতমেবমেকস্মিন্ সক্থ্নি ভবতি; এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ; তিস্রঃ পাযৌ, একা মেঢ্রে, সেবন্যাং চাপরা, দ্বে বৃষণযোঃ , স্ফিচোঃ পঞ্চ পঞ্চ, দ্বে বস্তিশিরসি, পঞ্চোদরে , নাভ্যামেকা, পৃষ্ঠোর্ধ্বসন্নিবিষ্টাঃ পঞ্চ পঞ্চ দীর্ঘাঃ, ষট্ পার্শ্বযোঃ, দশ বক্ষসি, অক্ষকাংসৌ প্রতি সমন্তাত্ সপ্ত, দ্বে হৃদযামাশযযোঃ, ষট্ যকৃত্প্লীহোণ্ডু(ন্দু)কেষু; গ্রীবাযাং চতস্রঃ, অষ্টৌ হন্বোঃ , একৈকা কাকলকগলযোঃ, দ্বে তালুনি, একা জিহ্বাযাং , দ্বে ওষ্ঠযোঃ, দ্বে নাসাযাং , দ্বে নেত্রযোঃ, গণ্ডযোশ্চতস্রঃ, কর্ণযোর্দ্বে, চতস্রো ললাটে, একা শিরসীতি ; এবমেতানি পঞ্চ পেশীশতানি ||৩৭|| ভবতি চাত্র- সিরাস্নায্বস্থিপর্বাণি সন্ধযশ্চ শরীরিণাম্ | পেশীভিঃ সংবৃতান্যত্র বলবন্তি ভবন্ত্যতঃ ||৩৮||
पञ्च पेशीशतानि भवन्ति | तासां चत्वारि शतानि शाखासु, कोष्ठे षट्षष्टिः, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं चतुस्त्रिंशत् | एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां तिस्रस्तिस्रस्ताः पञ्चदश, दश प्रपदे, पादोपरि कूर्चसन्निविष्टास्तावत्य एव, दश गुल्फतलयोः, गुल्फजान्वन्तरे विंशतिः, पञ्च जानुनि, विंशतिरूरौ , दश वङ्क्षणे, शतमेवमेकस्मिन् सक्थ्नि भवति; एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ; तिस्रः पायौ, एका मेढ्रे, सेवन्यां चापरा, द्वे वृषणयोः , स्फिचोः पञ्च पञ्च, द्वे बस्तिशिरसि, पञ्चोदरे , नाभ्यामेका, पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टाः पञ्च पञ्च दीर्घाः, षट् पार्श्वयोः, दश वक्षसि, अक्षकांसौ प्रति समन्तात् सप्त, द्वे हृदयामाशययोः, षट् यकृत्प्लीहोण्डु(न्दु)केषु; ग्रीवायां चतस्रः, अष्टौ हन्वोः , एकैका काकलकगलयोः, द्वे तालुनि, एका जिह्वायां , द्वे ओष्ठयोः, द्वे नासायां , द्वे नेत्रयोः, गण्डयोश्चतस्रः, कर्णयोर्द्वे, चतस्रो ललाटे, एका शिरसीति ; एवमेतानि पञ्च पेशीशतानि ||३७|| भवति चात्र- सिरास्नाय्वस्थिपर्वाणि सन्धयश्च शरीरिणाम् | पेशीभिः संवृतान्यत्र बलवन्ति भवन्त्यतः ||३८||
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Adhikarana 27 (39) · Śloka 39
স্ত্রীণাং তু বিংশতিরধিকা | দশ তাসাং স্তনযোরেকৈকস্মিন্ পঞ্চ পঞ্চেতি, যৌবনে তাসাং পরিবৃদ্ধিঃ; অপত্যপথে চতস্রঃ- তাসাং প্রসৃতে অভ্যন্তরতো দ্বে, মুখাশ্রিতে বাহ্যে চ বৃত্তে দ্বে, গর্ভচ্ছিদ্রসংশ্রিতাস্তিস্রঃ, শুক্রার্তবপ্রবেশিন্যস্তিস্র এব | পিত্তপক্বাশযযোর্মধ্যে গর্ভশয্যা, যত্র গর্ভস্তিষ্ঠতি ||৩৯||
स्त्रीणां तु विंशतिरधिका | दश तासां स्तनयोरेकैकस्मिन् पञ्च पञ्चेति, यौवने तासां परिवृद्धिः; अपत्यपथे चतस्रः- तासां प्रसृते अभ्यन्तरतो द्वे, मुखाश्रिते बाह्ये च वृत्ते द्वे, गर्भच्छिद्रसंश्रितास्तिस्रः, शुक्रार्तवप्रवेशिन्यस्तिस्र एव | पित्तपक्वाशययोर्मध्ये गर्भशय्या, यत्र गर्भस्तिष्ठति ||३९||
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Adhikarana 28 (40) · Śloka 40
তাসাং বহলপেলবস্থূলাণুপৃথুবৃত্তহ্রস্বদীর্ঘস্থিরমৃদুশ্লক্ষ্ণকর্কশভাবাঃ সন্ধ্যস্থিসিরাস্নাযুপ্রচ্ছাদকা যথাপ্রদেশং স্বভাবত এব ভবন্তি ||৪০||
तासां बहलपेलवस्थूलाणुपृथुवृत्तह्रस्वदीर्घस्थिरमृदुश्लक्ष्णकर्कशभावाः सन्ध्यस्थिसिरास्नायुप्रच्छादका यथाप्रदेशं स्वभावत एव भवन्ति ||४०||
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Adhikarana 29 (41) · Śloka 41
ভবতি চাত্র- পুংসাং পেশ্যঃ পুরস্তাদ্যাঃ প্রোক্তা লক্ষণমুষ্কজাঃ | স্ত্রীণামাবৃত্য তিষ্ঠন্তি ফলমন্তর্গতং হি তাঃ ||৪১||
भवति चात्र- पुंसां पेश्यः पुरस्ताद्याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कजाः | स्त्रीणामावृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः ||४१||
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Adhikarana 30 (42) · Śloka 42
মর্মসিরাধমনীস্রোতসামন্যত্র প্রবিভাগঃ ||৪২||
मर्मसिराधमनीस्रोतसामन्यत्र प्रविभागः ||४२||
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Adhikarana 31 (43-44) · Śloka 44
শঙ্খনাভ্যাকৃতির্যোনিস্ত্র্যাবর্তা সা প্রকীর্তিতা | তস্যাস্তৃতীযে ত্বাবর্তে গর্ভশয্যা প্রতিষ্ঠিতা ||৪৩|| যথা রোহিতমত্স্যস্য মুখং ভবতি রূপতঃ | তত্সংস্থানাং তথারূপাং গর্ভশয্যাং বিদুর্বুধাঃ ||৪৪||
शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्ता सा प्रकीर्तिता | तस्यास्तृतीये त्वावर्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ||४३|| यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः | तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ||४४||
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Adhikarana 32 (45) · Śloka 45
আভুগ্নোঽভিমুখঃ শেতে গর্ভো গর্ভাশযে স্ত্রিযাঃ | স যোনিং শিরসা যাতি স্বভাবাত্ প্রসবং প্রতি ||৪৫||
आभुग्नोऽभिमुखः शेते गर्भो गर्भाशये स्त्रियाः | स योनिं शिरसा याति स्वभावात् प्रसवं प्रति ||४५||
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Adhikarana 33 (46) · Śloka 46
ত্বক্পর্যন্তস্য দেহস্য যোঽযমঙ্গবিনিশ্চযঃ | শল্যজ্ঞানাদৃতে নৈষ বর্ণ্যতেঽঙ্গেষু কেষুচিত্ ||৪৬||
त्वक्पर्यन्तस्य देहस्य योऽयमङ्गविनिश्चयः | शल्यज्ञानादृते नैष वर्ण्यतेऽङ्गेषु केषुचित् ||४६||
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Adhikarana 34 (47-48) · Śloka 48
তস্মান্নিঃসংশযং জ্ঞানং হর্ত্রা শল্যস্য বাঞ্ছতা | শোধযিত্বা মৃতং সম্যগ্দ্রষ্টব্যোঽঙ্গবিনিশ্চযঃ ||৪৭|| প্রত্যক্ষতো হি যদ্দৃষ্টং শাস্ত্রদৃষ্টং চ যদ্ভবেত্ | সমাসতস্তদুভযং ভূযো জ্ঞানবিবর্ধনম্ ||৪৮||
तस्मान्निःसंशयं ज्ञानं हर्त्रा शल्यस्य वाञ्छता | शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्योऽङ्गविनिश्चयः ||४७|| प्रत्यक्षतो हि यद्दृष्टं शास्त्रदृष्टं च यद्भवेत् | समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ||४८||
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Adhikarana 35 (49) · Śloka 49
তস্মাত্ সমস্তগাত্রমবিষোপহতমদীর্ঘব্যাধিপীডিতমবর্ষশতিকং নিঃসৃষ্টান্ত্রপুরীষং পুরুষমাবহন্ত্যামাপগাযাং নিবদ্ধং পঞ্জরস্থং মুঞ্জবল্কলকুশশণাদীনামন্যতমেনাবেষ্টিতাঙ্গমপ্রকাশে দেশে কোথযেত্, সম্যক্প্রকুথিতং চোদ্ধৃত্য, ততো দেহং সপ্তরাত্রাদুশীরবালবেণুবল্বজকূর্চানামন্যতমেন শনৈঃ শনৈরবঘর্ষযংস্ত্বগাদীন্ সর্বানেব বাহ্যাভ্যন্তরানঙ্গপ্রত্যঙ্গবিশেষান্ যথোক্তান্ লক্ষযেচ্চক্ষুষা ||৪৯||
तस्मात् समस्तगात्रमविषोपहतमदीर्घव्याधिपीडितमवर्षशतिकं निःसृष्टान्त्रपुरीषं पुरुषमावहन्त्यामापगायां निबद्धं पञ्जरस्थं मुञ्जवल्कलकुशशणादीनामन्यतमेनावेष्टिताङ्गमप्रकाशे देशे कोथयेत्, सम्यक्प्रकुथितं चोद्धृत्य, ततो देहं सप्तरात्रादुशीरबालवेणुबल्वजकूर्चानामन्यतमेन शनैः शनैरवघर्षयंस्त्वगादीन् सर्वानेव बाह्याभ्यन्तरानङ्गप्रत्यङ्गविशेषान् यथोक्तान् लक्षयेच्चक्षुषा ||४९||
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Adhikarana 36 (50) · Śloka 50
ন শক্যশ্চক্ষুষা দ্রষ্টুং দেহে সূক্ষ্মতমো বিভুঃ | দৃশ্যতে জ্ঞানচক্ষুর্ভিস্তপশ্চক্ষুর্ভিরেব চ ||৫০||
न शक्यश्चक्षुषा द्रष्टुं देहे सूक्ष्मतमो विभुः | दृश्यते ज्ञानचक्षुर्भिस्तपश्चक्षुर्भिरेव च ||५०||
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Adhikarana 37 (51) · Śloka 51
শরীরে চৈব শাস্ত্রে চ দৃষ্টার্থঃ স্যাদ্বিশারদঃ | দৃষ্টশ্রুতাভ্যাং সন্দেহমবাপোহ্যাচরেত্ ক্রিযাঃ ||৫১||
शरीरे चैव शास्त्रे च दृष्टार्थः स्याद्विशारदः | दृष्टश्रुताभ्यां सन्देहमवापोह्याचरेत् क्रियाः ||५१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 5
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে শরীরসঙ্খ্যাব্যাকরণশারীরং নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ ||৫||
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शरीरसङ्ख्याव्याकरणशारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ||५||
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