Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতশ্চিকিত্সিতপ্রবিভাগবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ (সুশ্রুতায) ||২||
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अथातश्चिकित्सितप्रविभागविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः (सुश्रुताय) ||२||
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ষট্সপ্ততির্যেঽভিহিতা ব্যাধযো নামলক্ষণৈঃ |
চিকিত্সিতমিদং তেষাং সমাসব্যাসতঃ শৃণু ||৩||
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षट्सप्ततिर्येऽभिहिता व्याधयो नामलक्षणैः |
चिकित्सितमिदं तेषां समासव्यासतः शृणु ||३||
Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
ছেদ্যাস্তেষু দশৈকশ্চ নব লেখ্যাঃ প্রকীর্তিতাঃ |
ভেদ্যাঃ পঞ্চ বিকারাঃ স্যুর্ব্যধ্যাঃ পঞ্চদশৈব তু ||৪||
দ্বাদশাঽশস্ত্রকৃত্যাশ্চ যাপ্যাঃ সপ্ত ভবন্তি হি |
রোগা বর্জযিতব্যাঃ স্যুর্দশ পঞ্চ চ জানতা |
অসাধ্যৌ বা ভবেতাং তু যাপ্যৌ চাগন্তুসঞ্জ্ঞিতৌ ||৫||
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छेद्यास्तेषु दशैकश्च नव लेख्याः प्रकीर्तिताः |
भेद्याः पञ्च विकाराः स्युर्व्यध्याः पञ्चदशैव तु ||४||
द्वादशाऽशस्त्रकृत्याश्च याप्याः सप्त भवन्ति हि |
रोगा वर्जयितव्याः स्युर्दश पञ्च च जानता |
असाध्यौ वा भवेतां तु याप्यौ चागन्तुसञ्ज्ञितौ ||५||
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
অর্শোঽন্বিতং ভবতি বর্ত্ম তু যত্তথাঽর্শঃ শুষ্কং তথাঽর্বুদমথো পিডকাঃ সিরাজাঃ |
জালং সিরাজমপি পঞ্চবিধং তথাঽর্ম ছেদ্যা ভবন্তি সহ পর্বণিকামযেন ||৬||
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अर्शोऽन्वितं भवति वर्त्म तु यत्तथाऽर्शः शुष्कं तथाऽर्बुदमथो पिडकाः सिराजाः |
जालं सिराजमपि पञ्चविधं तथाऽर्म छेद्या भवन्ति सह पर्वणिकामयेन ||६||
Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
উত্সাঙ্গিনী বহলকর্দমবর্ত্মনী চ শ্যাবং চ যচ্চ পঠিতং ত্বিহ বদ্ধবর্ত্ম |
ক্লিষ্টং চ পোথকিযুতং খলু যচ্চ বর্ত্ম কুম্ভীকিনী চ সহ শর্করযা চ লেখ্যাঃ ||৭||
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उत्साङ्गिनी बहलकर्दमवर्त्मनी च श्यावं च यच्च पठितं त्विह बद्धवर्त्म |
क्लिष्टं च पोथकियुतं खलु यच्च वर्त्म कुम्भीकिनी च सह शर्करया च लेख्याः ||७||
Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
শ্লেষ্মোপনাহলগণৌ চ বিসং চ ভেদ্যা গ্রন্থিশ্চ যঃ কৃমিকৃতোঽঞ্জননামিকা চ |৮|
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श्लेष्मोपनाहलगणौ च बिसं च भेद्या ग्रन्थिश्च यः कृमिकृतोऽञ्जननामिका च |८|
Adhikarana 7 (8) · Śloka 9
আদৌ সিরা নিগদিতাস্তু যযোঃ প্রযোগে পাকৌ চ যৌ নযনযোঃ পবনোঽন্যতশ্চ ||৮||
পূযালসানিলবিপর্যযমন্থসঞ্জ্ঞাঃ স্যন্দাস্তু যান্ত্যুপশমং হি সিরাব্যধেন |৯|
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आदौ सिरा निगदितास्तु ययोः प्रयोगे पाकौ च यौ नयनयोः पवनोऽन्यतश्च ||८||
पूयालसानिलविपर्ययमन्थसञ्ज्ञाः स्यन्दास्तु यान्त्युपशमं हि सिराव्यधेन |९|
Adhikarana 8 (9-10) · Śloka 10
শুষ্কাক্ষিপাককফপিত্তবিদগ্ধদৃষ্টিষ্বম্লাখ্যশুক্রসহিতার্জুনপিষ্টকেষু ||৯||
অক্লিন্নবর্ত্মহুতভুগ্ধ্বজদর্শিশুক্তিপ্রক্লিন্নবর্ত্মসু তথৈব বলাসসঞ্জ্ঞে |
আগন্তুনাঽঽমযযুগেন চ দূষিতাযাং দৃষ্টৌ ন শস্ত্রপতনং প্রবদন্তি তজ্জ্ঞাঃ ||১০||
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शुष्काक्षिपाककफपित्तविदग्धदृष्टिष्वम्लाख्यशुक्रसहितार्जुनपिष्टकेषु ||९||
अक्लिन्नवर्त्महुतभुग्ध्वजदर्शिशुक्तिप्रक्लिन्नवर्त्मसु तथैव बलाससञ्ज्ञे |
आगन्तुनाऽऽमययुगेन च दूषितायां दृष्टौ न शस्त्रपतनं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ||१०||
Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
সম্পশ্যতঃ ষডপি যেঽভিহিতাস্তু কাচাস্তে পক্ষ্মকোপসহিতাস্তু ভবন্তি যাপ্যাঃ |১১|
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सम्पश्यतः षडपि येऽभिहितास्तु काचास्ते पक्ष्मकोपसहितास्तु भवन्ति याप्याः |११|
Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
চত্বার এব পবনপ্রভবাস্ত্বসাধ্যা দ্বৌ পিত্তজৌ কফনিমিত্তজ এক এব |
অষ্টার্ধকা রুধিরজাশ্চ গদাস্ত্রিদোষাস্তাবন্ত এব গদিতাবপি বাহ্যজৌ দ্বৌ ||১১||
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चत्वार एव पवनप्रभवास्त्वसाध्या द्वौ पित्तजौ कफनिमित्तज एक एव |
अष्टार्धका रुधिरजाश्च गदास्त्रिदोषास्तावन्त एव गदितावपि बाह्यजौ द्वौ ||११||
Adhikarana puShpikA · Śloka 8
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে চিকিত্সিতপ্রবিভাগবিজ্ঞানীযো নামাষ্টমোঽধ্যাযঃ ||৮||
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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे चिकित्सितप्रविभागविज्ञानीयो नामाष्टमोऽध्यायः ||८||