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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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7. dr̥ṣṭigatarōgavijñānīyādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো দৃষ্টিগতরোগবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो दृष्टिगतरोगविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

মসূরদলমাত্রাং তু পঞ্চভূতপ্রসাদজাম্ | খদ্যোতবিস্ফুলিঙ্গাভামিদ্ধাং তেজোভিরব্যযৈঃ ||৩|| আবৃতাং পটলেনাক্ষ্ণোর্বাহ্যেন বিবরাকৃতিম্ | শীতসাত্ম্যাং নৃণাং দৃষ্টিমাহুর্নযনচিন্তকাঃ ||৪||

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मसूरदलमात्रां तु पञ्चभूतप्रसादजाम् | खद्योतविस्फुलिङ्गाभामिद्धां तेजोभिरव्ययैः ||३|| आवृतां पटलेनाक्ष्णोर्बाह्येन विवराकृतिम् | शीतसात्म्यां नृणां दृष्टिमाहुर्नयनचिन्तकाः ||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

রোগাংস্তদাশ্রযান্ ঘোরান্ ষট্ চ ষট্ চ প্রচক্ষ্মহে | পটলানুপ্রবিষ্টস্য তিমিরস্য চ লক্ষণম্ ||৫||

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रोगांस्तदाश्रयान् घोरान् षट् च षट् च प्रचक्ष्महे | पटलानुप्रविष्टस्य तिमिरस्य च लक्षणम् ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 7

সিরাভিরভিসম্প্রাপ্য বিগুঽভ্যন্তরে ভৃশম্ | প্রথমে পটলে দোষো যস্য দৃষ্টৌ ব্যবস্থিতঃ ||৬|| অব্যক্তানি স রূপাণি সর্বাণ্যেব প্রপশ্যতি |৭|

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सिराभिरभिसम्प्राप्य विगुऽभ्यन्तरे भृशम् | प्रथमे पटले दोषो यस्य दृष्टौ व्यवस्थितः ||६|| अव्यक्तानि स रूपाणि सर्वाण्येव प्रपश्यति |७|

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Adhikarana 5 (7-10) · Śloka 10

দৃষ্টির্ভৃশং বিহ্বলতি দ্বিতীযং পটলং গতে ||৭|| মক্ষিকা মশকান্ কেশাঞ্জালকানি চ পশ্যতি | মণ্ডলানি পতাকাংশ্চ মরীচীঃ কুণ্ডলানি চ ||৮|| পরিপ্লবাংশ্চ বিবিধান্ বর্ষমভ্রং তমাংসি চ | দূরস্থান্যপি রূপাণি মন্যতে চ সমীপতঃ ||৯|| সমীপস্থানি দূরে চ দৃষ্টের্গোচরবিভ্রমাত্ | যত্নবানপি চাত্যর্থং সূচীপাশং ন পশ্যতি ||১০||

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दृष्टिर्भृशं विह्वलति द्वितीयं पटलं गते ||७|| मक्षिका मशकान् केशाञ्जालकानि च पश्यति | मण्डलानि पताकांश्च मरीचीः कुण्डलानि च ||८|| परिप्लवांश्च विविधान् वर्षमभ्रं तमांसि च | दूरस्थान्यपि रूपाणि मन्यते च समीपतः ||९|| समीपस्थानि दूरे च दृष्टेर्गोचरविभ्रमात् | यत्नवानपि चात्यर्थं सूचीपाशं न पश्यति ||१०||

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Adhikarana 6 (11-14) · Śloka 15

ঊর্ধ্বং পশ্যতি নাধস্তাত্তৃতীযং পটলং গতে | মহান্ত্যপি চ রূপাণি চ্ছাদিতানীব বাসসা ||১১|| কর্ণনাসাক্ষিযুক্তানি বিপরীতানি বীক্ষতে | যথাদোষং চ রজ্যেত দৃষ্টির্দোষে বলীযসি ||১২|| অধঃস্থিতে সমীপস্থং দূরস্থং চোপরিস্থিতে | পার্শ্বস্থিতে তথা দোষে পার্শ্বস্থানি ন পশ্যতি ||১৩|| সমন্ততঃ স্থিতে দোষে সঙ্কুলানীব পশ্যতি | দৃষ্টিমধ্যগতে দোষে স একং মন্যতে দ্বিধা ||১৪|| দ্বিধাস্থিতে ত্রিধা পশ্যেদ্বহুধা চানবস্থিতে | তিমিরাখ্যঃ স বৈ দোষঃ... |১৫|

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ऊर्ध्वं पश्यति नाधस्तात्तृतीयं पटलं गते | महान्त्यपि च रूपाणि च्छादितानीव वाससा ||११|| कर्णनासाक्षियुक्तानि विपरीतानि वीक्षते | यथादोषं च रज्येत दृष्टिर्दोषे बलीयसि ||१२|| अधःस्थिते समीपस्थं दूरस्थं चोपरिस्थिते | पार्श्वस्थिते तथा दोषे पार्श्वस्थानि न पश्यति ||१३|| समन्ततः स्थिते दोषे सङ्कुलानीव पश्यति | दृष्टिमध्यगते दोषे स एकं मन्यते द्विधा ||१४|| द्विधास्थिते त्रिधा पश्येद्बहुधा चानवस्थिते | तिमिराख्यः स वै दोषः... |१५|

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Adhikarana 7 (15-17) · Śloka 17

... চতুর্থং পটলং গতঃ ||১৫|| রুণদ্ধি সর্বতো দৃষ্টিং লিঙ্গনাশঃ স উচ্যতে | তস্মিন্নপি তমোভূতে নাতিরূঢে মহাগদে ||১৬|| চন্দ্রাদিত্যৌ সনক্ষত্রাবন্তরীক্ষে চ বিদ্যুতঃ | নির্মলানি চ তেজাংসি ভ্রাজিষ্ণূনি চ পশ্যতি ||১৭||

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... चतुर्थं पटलं गतः ||१५|| रुणद्धि सर्वतो दृष्टिं लिङ्गनाशः स उच्यते | तस्मिन्नपि तमोभूते नातिरूढे महागदे ||१६|| चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रावन्तरीक्षे च विद्युतः | निर्मलानि च तेजांसि भ्राजिष्णूनि च पश्यति ||१७||

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Adhikarana 8 (18) · Śloka 18

স এব লিঙ্গনাশস্তু নীলিকাকাচসঞ্জ্ঞিতঃ |১৮|

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स एव लिङ्गनाशस्तु नीलिकाकाचसञ्ज्ञितः |१८|

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Adhikarana 9 (18) · Śloka 19

তত্র বাতেন রূপাণি ভ্রমন্তীব স পশ্যতি ||১৮|| আবিলান্যরুণাভানি ব্যাবিদ্ধানি চ মানবঃ |১৯|

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तत्र वातेन रूपाणि भ्रमन्तीव स पश्यति ||१८|| आविलान्यरुणाभानि व्याविद्धानि च मानवः |१९|

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Adhikarana 10 (19) · Śloka 20

পিত্তেনাদিত্যখদ্যোতশক্রচাপতডিদ্গুণান্ ||১৯|| শিখিবর্হবিচিত্রাণি নীলকৃষ্ণানি পশ্যতি |২০|

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पित्तेनादित्यखद्योतशक्रचापतडिद्गुणान् ||१९|| शिखिबर्हविचित्राणि नीलकृष्णानि पश्यति |२०|

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Adhikarana 11 (20-21) · Śloka 22

কফেন পশ্যেদ্রূপাণি স্নিগ্ধানি চ সিতানি চ ||২০|| গৌরচামরগৌরাণি শ্বেতাভ্রপ্রতিমানি চ | পশ্যেদসূক্ষ্মাণ্যত্যর্থং ব্যভ্রে চৈবাভ্রসম্প্লবম্ ||২১|| সলিলপ্লাবিতানীব পরিজাড্যানি মানবঃ |২২|

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कफेन पश्येद्रूपाणि स्निग्धानि च सितानि च ||२०|| गौरचामरगौराणि श्वेताभ्रप्रतिमानि च | पश्येदसूक्ष्माण्यत्यर्थं व्यभ्रे चैवाभ्रसम्प्लवम् ||२१|| सलिलप्लावितानीव परिजाड्यानि मानवः |२२|

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Adhikarana 12 (22) · Śloka 23

তথা রক্তেন রক্তানি তমাংসি বিবিধানি চ ||২২|| হরিতশ্যাবকৃষ্ণানি ধূমধূম্রাণি চেক্ষতে |২৩|

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तथा रक्तेन रक्तानि तमांसि विविधानि च ||२२|| हरितश्यावकृष्णानि धूमधूम्राणि चेक्षते |२३|

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Adhikarana 13 (23-24) · Śloka 24

সন্নিপাতেন চিত্রাণি বিপ্লুতানি চ পশ্যতি ||২৩|| বহুধা বা দ্বিধা বাঽপি সর্বাণ্যেব সমন্ততঃ | হীনাধিকাঙ্গান্যথবা জ্যোতীংষ্যপি চ পশ্যতি ||২৪||

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सन्निपातेन चित्राणि विप्लुतानि च पश्यति ||२३|| बहुधा वा द्विधा वाऽपि सर्वाण्येव समन्ततः | हीनाधिकाङ्गान्यथवा ज्योतींष्यपि च पश्यति ||२४||

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Adhikarana 14 (25) · Śloka 26

পিত্তং কুর্যাত্ পরিম্লাযি মূর্চ্ছিতং রক্ততেজসা | পীতা দিশস্তথোদ্যন্তমাদিত্যমিব পশ্যতি ||২৫|| বিকীর্যমাণান্ খদ্যোতৈর্বৃক্ষাংস্তেজোভিরেব চ |২৬|

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पित्तं कुर्यात् परिम्लायि मूर्च्छितं रक्ततेजसा | पीता दिशस्तथोद्यन्तमादित्यमिव पश्यति ||२५|| विकीर्यमाणान् खद्योतैर्वृक्षांस्तेजोभिरेव च |२६|

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Adhikarana 15 (26) · Śloka 26

বক্ষ্যামি ষড্বিধং রাগৈর্লিঙ্গনাশমতঃ পরম্ ||২৬||

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वक्ष्यामि षड्विधं रागैर्लिङ्गनाशमतः परम् ||२६||

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Adhikarana 16 (27) · Śloka 27

রাগোঽরুণো মারুতজঃ প্রদিষ্টঃ পিত্তাত্ পরিম্লায্যথবাঽপি নীলঃ | কফাত্ সিতঃ শোণিতজস্তু রক্তঃ সমস্তদোষোঽথ বিচিত্ররূপঃ ||২৭||

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रागोऽरुणो मारुतजः प्रदिष्टः पित्तात् परिम्लाय्यथवाऽपि नीलः | कफात् सितः शोणितजस्तु रक्तः समस्तदोषोऽथ विचित्ररूपः ||२७||

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Adhikarana 17 (28) · Śloka 29

রক্তজং মণ্ডলং দৃষ্টৌ স্থূলকাচানলপ্রভম্ | পরিম্লাযিনি রোগে স্যান্ম্লায্যানীলং চ মণ্ডলম্ ||২৮|| দোষক্ষযাত্ কদাচিত্ স্যাত্স্বযং তত্র চ দর্শনম্ |২৯|

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रक्तजं मण्डलं दृष्टौ स्थूलकाचानलप्रभम् | परिम्लायिनि रोगे स्यान्म्लाय्यानीलं च मण्डलम् ||२८|| दोषक्षयात् कदाचित् स्यात्स्वयं तत्र च दर्शनम् |२९|

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Adhikarana 18 (29-33) · Śloka 33

অরুণং মণ্ডলং বাতাচ্চঞ্চলং পরুষং তথা ||২৯|| পিত্তান্মণ্ডলমানীলং কাংস্যাভং পীতমেব বা | শ্লেষ্মণা বহলং স্নিগ্ধং শঙ্খকুন্দেন্দুপাণ্ডুরম্ ||৩০|| চলত্পদ্মপলাশস্থঃ শুক্লো বিন্দুরিবাম্ভসঃ | সঙ্কুচত্যাতপেঽত্যর্থং ছাযাযাং বিস্তৃতো ভবেত্ ||৩১|| মৃদ্যমানে চ নযনে মণ্ডলং তদ্বিসর্পতি | প্রবালপদ্মপত্রাভং মণ্ডলং শোণিতাত্মকম্ ||৩২|| দৃষ্টিরাগো ভবেচ্চিত্রো লিঙ্গনাশে ত্রিদোষজে | যথাস্বং দোষলিঙ্গানি সর্বেষ্বেব ভবন্তি হি ||৩৩||

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अरुणं मण्डलं वाताच्चञ्चलं परुषं तथा ||२९|| पित्तान्मण्डलमानीलं कांस्याभं पीतमेव वा | श्लेष्मणा बहलं स्निग्धं शङ्खकुन्देन्दुपाण्डुरम् ||३०|| चलत्पद्मपलाशस्थः शुक्लो बिन्दुरिवाम्भसः | सङ्कुचत्यातपेऽत्यर्थं छायायां विस्तृतो भवेत् ||३१|| मृद्यमाने च नयने मण्डलं तद्विसर्पति | प्रवालपद्मपत्राभं मण्डलं शोणितात्मकम् ||३२|| दृष्टिरागो भवेच्चित्रो लिङ्गनाशे त्रिदोषजे | यथास्वं दोषलिङ्गानि सर्वेष्वेव भवन्ति हि ||३३||

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Adhikarana 19 (34) · Śloka 35

ষড্ লিঙ্গনাশাঃ ষডিমে চ রোগা দৃষ্ট্যাশ্রযাঃ ষট্ চ ষডেব চ স্যুঃ | তথা নরঃ পিত্তবিদগ্ধদৃষ্টিঃ কফেন চান্যস্ত্বথ ধূমদর্শী ||৩৪|| যো হ্রস্বজাড্যো(ত্যো) নকুলান্ধতা চ গম্ভীরসঞ্জ্ঞা চ তথৈব দৃষ্টিঃ |৩৫|

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षड् लिङ्गनाशाः षडिमे च रोगा दृष्ट्याश्रयाः षट् च षडेव च स्युः | तथा नरः पित्तविदग्धदृष्टिः कफेन चान्यस्त्वथ धूमदर्शी ||३४|| यो ह्रस्वजाड्यो(त्यो) नकुलान्धता च गम्भीरसञ्ज्ञा च तथैव दृष्टिः |३५|

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Adhikarana 20 (35-36) · Śloka 37

পিত্তেন দুষ্টেন গতেন দৃষ্টিং পীতা ভবেদ্যস্য নরস্য দৃষ্টিঃ ||৩৫|| পীতানি রূপাণি চ মন্যতে যঃ স মানবঃ পিত্তবিদগ্ধদৃষ্টিঃ | প্রাপ্তে তৃতীযং পটলং তু দোষে দিবা ন পশ্যেন্নিশি বীক্ষতে চ ||৩৬|| (রাত্রৌ স শীতানুগৃহীতদৃষ্টিঃ পিত্তাল্পভাবাদপি তানি পশ্যেত্) |৩৭|

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पित्तेन दुष्टेन गतेन दृष्टिं पीता भवेद्यस्य नरस्य दृष्टिः ||३५|| पीतानि रूपाणि च मन्यते यः स मानवः पित्तविदग्धदृष्टिः | प्राप्ते तृतीयं पटलं तु दोषे दिवा न पश्येन्निशि वीक्षते च ||३६|| (रात्रौ स शीतानुगृहीतदृष्टिः पित्ताल्पभावादपि तानि पश्येत्) |३७|

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Adhikarana 21 (38) · Śloka 38

তথা নরঃ শ্লেষ্মবিদগ্ধদৃষ্টিস্তান্যেব শুক্লানি হি মন্যতে তু ||৩৭|| ত্রিষু স্থিতোল্পঃ পটলেষু দোষো নক্তান্ধ্যমাপাদযতি প্রসহ্য | দিবা স সূর্যানুগৃহীতচক্ষুরিক্ষেত রূপাণি কফাল্পভাবাত্ ||৩৮||

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तथा नरः श्लेष्मविदग्धदृष्टिस्तान्येव शुक्लानि हि मन्यते तु ||३७|| त्रिषु स्थितोल्पः पटलेषु दोषो नक्तान्ध्यमापादयति प्रसह्य | दिवा स सूर्यानुगृहीतचक्षुरिक्षेत रूपाणि कफाल्पभावात् ||३८||

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Adhikarana 22 (39) · Śloka 39

শোকজ্বরাযাসশিরোভিতাপৈরভ্যাহতা যস্য নরস্য দৃষ্টিঃ | সধূমকান্ পশ্যতি সর্বভাবাংস্তং ধূমদর্শীতি বদন্তি রোগম্ ||৩৯||

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शोकज्वरायासशिरोभितापैरभ्याहता यस्य नरस्य दृष्टिः | सधूमकान् पश्यति सर्वभावांस्तं धूमदर्शीति वदन्ति रोगम् ||३९||

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Adhikarana 23 (40) · Śloka 40

স হ্রস্বজাড্যো দিবসেষু কৃচ্ছ্রাদ্ধ্রস্বানি রূপাণি চ যেন পশ্যেত্ |৪০|

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स ह्रस्वजाड्यो दिवसेषु कृच्छ्राद्ध्रस्वानि रूपाणि च येन पश्येत् |४०|

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Adhikarana 24 (40) · Śloka 41

বিদ্যোততে যেন নরস্য দৃষ্টির্দোষাভিপন্না নকুলস্য যদ্বত্ ||৪০|| চিত্রাণি রূপাণি দিবা স পশ্যেত্ স বৈ বিকারো নকুলান্ধ্যসঞ্জ্ঞঃ |৪১|

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विद्योतते येन नरस्य दृष्टिर्दोषाभिपन्ना नकुलस्य यद्वत् ||४०|| चित्राणि रूपाणि दिवा स पश्येत् स वै विकारो नकुलान्ध्यसञ्ज्ञः |४१|

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Adhikarana 25 (41) · Śloka 42

দৃষ্টির্বিরূপা শ্বসনোপসৃষ্টা সঙ্কুচ্যতেঽভ্যন্তরতশ্চ যাতি ||৪১|| রুজাবগাঢা চ তমক্ষিরোগং গম্ভীরিকেতি প্রবদন্তি তজ্জ্ঞাঃ |৪২|

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दृष्टिर्विरूपा श्वसनोपसृष्टा सङ्कुच्यतेऽभ्यन्तरतश्च याति ||४१|| रुजावगाढा च तमक्षिरोगं गम्भीरिकेति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः |४२|

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Adhikarana 26 (42) · Śloka 43

বাহ্যৌ পুনর্দ্বাবিহ সম্প্রদিষ্টৌ নিমিত্ততশ্চাপ্যনিমিত্ততশ্চ ||৪২|| নিমিত্ততস্তত্র শিরোভিতাপাজ্জ্ঞেযস্ত্বভিষ্যন্দনিদর্শনৈশ্চ |৪৩|

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बाह्यौ पुनर्द्वाविह सम्प्रदिष्टौ निमित्ततश्चाप्यनिमित्ततश्च ||४२|| निमित्ततस्तत्र शिरोभितापाज्ज्ञेयस्त्वभिष्यन्दनिदर्शनैश्च |४३|

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Adhikarana 27 (43-44) · Śloka 44

সুরর্ষিগন্ধর্বমহোরগাণাং সন্দর্শনেনাপি চ ভাস্বরাণাম্ ||৪৩|| হন্যেত দৃষ্টির্মনুজস্য যস্য স লিঙ্গনাশস্ত্বনিমিত্তসঞ্জ্ঞঃ | তত্রাক্ষি বিস্পষ্টমিবাবভাতি বৈদূর্যবর্ণা বিমলা চ দৃষ্টিঃ ||৪৪||

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सुरर्षिगन्धर्वमहोरगाणां सन्दर्शनेनापि च भास्वराणाम् ||४३|| हन्येत दृष्टिर्मनुजस्य यस्य स लिङ्गनाशस्त्वनिमित्तसञ्ज्ञः | तत्राक्षि विस्पष्टमिवावभाति वैदूर्यवर्णा विमला च दृष्टिः ||४४||

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Adhikarana 28 (45) · Śloka 45

বিদীর্যতে সীদতি হীযতে বা নৃণামভীঘাতহতা তু দৃষ্টিঃ ||৪৫||

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विदीर्यते सीदति हीयते वा नृणामभीघातहता तु दृष्टिः ||४५||

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Adhikarana 29 (46) · Śloka 46

ইত্যেতে নযনগতা মযা বিকারাঃ সঙ্খ্যাতাঃ পৃথগিহ ষট্ চ সপ্ততিশ্চ | এতেষাং পৃথগিহ বিস্তরেণ সর্বং বক্ষ্যেঽহং তদনু চিকিত্সিতং যথাবত্ ||৪৬||

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इत्येते नयनगता मया विकाराः सङ्ख्याताः पृथगिह षट् च सप्ततिश्च | एतेषां पृथगिह विस्तरेण सर्वं वक्ष्येऽहं तदनु चिकित्सितं यथावत् ||४६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 7

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে দৃষ্টিগতরোগবিজ্ঞানীযো নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ ||৭||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे दृष्टिगतरोगविज्ञानीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ||७||

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7. dr̥ṣṭigatarōgavijñānīyādhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi