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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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28. skandagrahapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ স্কন্ধগ্রহপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः स्कन्धग्रहप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

স্কন্দগ্রহোপসৃষ্টানাং কুমারাণাং প্রশস্যতে | বাতঘ্নদ্রুমপত্রাণাং নিষ্ক্বাথঃ পরিষেচনে ||৩||

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स्कन्दग्रहोपसृष्टानां कुमाराणां प्रशस्यते | वातघ्नद्रुमपत्राणां निष्क्वाथः परिषेचने ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তেষাং মূলেষু সিদ্ধং চ তৈলমভ্যঞ্জনে হিতম্ | সর্বগন্ধসুরামণ্ডকৈডর্যাবাপমিষ্যতে ||৪||

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तेषां मूलेषु सिद्धं च तैलमभ्यञ्जने हितम् | सर्वगन्धसुरामण्डकैडर्यावापमिष्यते ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

দেবদারুণি রাস্নাযাং মধুরেষু দ্রুমেষু চ | সিদ্ধং সর্পিশ্চ সক্ষীরং পানমস্মৈ প্রযোজযেত্ ||৫||

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देवदारुणि रास्नायां मधुरेषु द्रुमेषु च | सिद्धं सर्पिश्च सक्षीरं पानमस्मै प्रयोजयेत् ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

সর্ষপাঃ সর্পনির্মোকো বচা কাকাদনী ঘৃতম্ | উষ্ট্রাজাবিগবাং চৈব রোমাণ্যুদ্ধূপনং শিশোঃ ||৬||

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सर्षपाः सर्पनिर्मोको वचा काकादनी घृतम् | उष्ट्राजाविगवां चैव रोमाण्युद्धूपनं शिशोः ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

সোমবল্লীমিন্দ্রবল্লীং শমীং বিল্বস্য কণ্টকান্ | মৃগাদন্যাশ্চ মূলানি গ্রথিতান্যেব ধারযেত্ ||৭||

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सोमवल्लीमिन्द्रवल्लीं शमीं बिल्वस्य कण्टकान् | मृगादन्याश्च मूलानि ग्रथितान्येव धारयेत् ||७||

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8

রক্তানি মাল্যানি তথা পতাকা রক্তাশ্চ গন্ধা বিবিধাশ্চ ভক্ষ্যাঃ | ঘণ্টা চ দেবায বলির্নিবেদ্যঃ সুকুক্কুটঃ স্কন্দগ্রহে হিতায ||৮||

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रक्तानि माल्यानि तथा पताका रक्ताश्च गन्धा विविधाश्च भक्ष्याः | घण्टा च देवाय बलिर्निवेद्यः सुकुक्कुटः स्कन्दग्रहे हिताय ||८||

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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9

স্নানং ত্রিরাত্রং নিশি চত্বরেষু কুর্যাত্ পুরং শালিযবৈর্নবৈস্তু | অদ্ভিশ্চ গাযত্র্যভিমন্ত্রিতাভিঃ প্রজ্বালনং ব্যাহৃতিভিশ্চ বহ্নেঃ ||৯||

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स्नानं त्रिरात्रं निशि चत्वरेषु कुर्यात् पुरं शालियवैर्नवैस्तु | अद्भिश्च गायत्र्यभिमन्त्रिताभिः प्रज्वालनं व्याहृतिभिश्च वह्नेः ||९||

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Adhikarana 9 (10-14) · Śloka 14

রক্ষামতঃ প্রবক্ষ্যামি বালানাং পাপনাশিনীম্ | অহন্যহনি কর্তব্যা যা ভিষগ্ভিরতন্দ্রিতৈঃ ||১০|| তপসাং তেজসাং চৈব যশসাং বপুষাং তথা | নিধানং যোঽব্যযো দেবঃ স তে স্কন্দঃ প্রসীদতু ||১১|| গ্রহসেনাপতির্দেবো দেবসেনাপতির্বিভুঃ | দেবসেনারিপুহরঃ পাতু ত্বাং ভগবান্ গুহঃ ||১২|| দেবদেবস্য মহতঃ পাবকস্য চ যঃ সুতঃ | গঙ্গোমাকৃত্তিকানাং চ স তে শর্ম প্রযচ্ছতু ||১৩|| রক্তমাল্যাম্বরঃ শ্রীমান্ রক্তচন্দনভূষিতঃ | রক্তদিব্যবপুর্দেবঃ পাতু ত্বাং ক্রৌঞ্চসূদনঃ ||১৪||

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रक्षामतः प्रवक्ष्यामि बालानां पापनाशिनीम् | अहन्यहनि कर्तव्या या भिषग्भिरतन्द्रितैः ||१०|| तपसां तेजसां चैव यशसां वपुषां तथा | निधानं योऽव्ययो देवः स ते स्कन्दः प्रसीदतु ||११|| ग्रहसेनापतिर्देवो देवसेनापतिर्विभुः | देवसेनारिपुहरः पातु त्वां भगवान् गुहः ||१२|| देवदेवस्य महतः पावकस्य च यः सुतः | गङ्गोमाकृत्तिकानां च स ते शर्म प्रयच्छतु ||१३|| रक्तमाल्याम्बरः श्रीमान् रक्तचन्दनभूषितः | रक्तदिव्यवपुर्देवः पातु त्वां क्रौञ्चसूदनः ||१४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 28

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কুমারতন্ত্রে স্কন্দপ্রতিষেধো নামা(দ্বিতীযোঽধ্যাযঃ, আদিতোঽ)ষ্টাবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৮||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे स्कन्दप्रतिषेधो नामा(द्वितीयोऽध्यायः, आदितोऽ)ष्टाविंशोऽध्यायः ||२८||

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